Wednesday, 23 August 2023

चीन के लड़खड़ाने का लाभ हमें मिल सकता है बशर्ते .....



बीते कुछ दिनों से चीन की अर्थव्यवस्था के   हिचकोले लेने की खबरें आ रही है। मंहगाई और बेरोजगारी बढ़ने के साथ ही निर्यात में भी कमी आने की खबर है। विदेशी पूंजी वियतनाम , सिंगापुर , थाईलैंड और भारत जैसे देशों में स्थानांतरित हो रही है। कोरोना संकट के दौरान विश्व भर में चीन की जो नकारात्मक छवि बनी यह उसका ही प्रभाव है। भारत के बाजार भी चीनी सामान के दबाव से उबर रहे हैं । दवा उद्योग में हुए  शोध और अनुसंधान का सुपरिणाम कच्चे माल का आयात घटने के रूप में सामने आया है। लगभग बंद हो चुका घरेलू खिलौना उद्योग भी दोबारा उठ खड़ा हुआ है। उत्पादन के क्षेत्र में भी  भारतीय औद्योगिक इकाइयां बेहतर प्रदर्शन करने लगी हैं। जिसके कारण रोजगार के अवसर बढ़ने के साथ ही आयात में कमी आई है। जीएसटी संग्रह में निरंतर वृद्धि भी  आर्थिक स्थिति मजबूत होने का संकेत है। वहीं ऑटोमोबाइल और  जमीन - जायजाद के व्यवसाय में  उछाल से भी अर्थव्यस्था  में सुधार हुआ है । ऐसे में   वैश्विक स्तर की संस्थाओं द्वारा भारत की विकास दर के बारे में आशाजनक तस्वीर पेश की जा रही हो तब संदेह की गुंजाइश ही नहीं रह जाती।   इस बारे में दो बातें  उल्लेखनीय हैं। पहली तो कोरोना महामारी के दौरान भारत में आर्थिक , सामाजिक और चिकित्सा क्षेत्र में किया गया बेहतर प्रबंधन और दूसरा यूक्रेन संकट से उत्पन्न वैश्विक परिस्थिति में विदेश  और आर्थिक नीतियों में  बेहतरीन सामंजस्य। ये बात पूरी दुनिया स्वीकार कर चुकी  है कि कोविड काल में भारत जैसे विशाल देश में  जरूरी चीजों की आपूर्ति निर्बाध जारी रहने से अराजकता नहीं हुई । लॉक डाउन के दौरान मालवाहक वाहनों को लूटने की एक भी वारदात न होना इसका प्रमाण है । टीकाकरण अभियान  तो पूरी दुनिया के लिए मिसाल बन गया।  लेकिन कोरोना के जाते ही दुनिया एक नए संकट में फंस गई जब रूस ने यूक्रेन पर हमला कर दिया। पहले - लगा था कि यह लड़ाई जल्दी खत्म हो जायेगी क्योंकि रूस जैसी महाशक्ति के सामने यूक्रेन ज्यादा नहीं टिक पाएगा । लेकिन देखते - देखते दो देशों की लड़ाई ने शीतयुद्ध को पुनर्जीवित कर दिया। अमेरिका और उसके समर्थक देशों ने  रूस पर आर्थिक प्रतिबंध लगाने के अलावा यूक्रेन को अस्त्र - शस्त्र के साथ ही  आर्थिक सहायता देना शुरू कर दिया। इसकी वजह से लड़ाई  डेढ़ साल से चली आ रही है। परिणामस्वरूप दुनिया भर में कच्चे तेल , गैस और खाद्यान्न का संकट पैदा हो गया। कोविड रूपी विपदा का असर पूरी तरह खत्म हो पाता उसके पहले ही आ टपकी इस मुसीबत ने  तमाम देशों की अर्थव्यवस्था के लिए दूबरे में दो आषाढ़ वाली स्थिति पैदा कर दी। समूचा यूरोप गैस संकट में फंस गया। रूस और यूक्रेन बड़े खाद्यान्न उत्पादक  रहे हैं। ऐसे में इस युद्ध से दुनिया के बड़े हिस्से में अन्न की कमी हो गई। यूक्रेन तो सूरजमुखी का भी सबसे बड़ा निर्यातक है जिसका उपयोग खाद्य तेल बनाने में किया जाता है। रूसी हमलों ने वहां  जिस पैमाने पर तबाही मचाई उससे भारत भी  अप्रभावित कैसे रह सकता था ? खाद्यान्न तो  नहीं  किंतु कच्चे तेल का काफी आयात चूंकि रूस से होता रहा इसलिए युद्ध शुरू होते ही चिंता  बढ़ने लगी । लेकिन भारत ने अमेरिका के दबाव को नजरंदाज करते हुए तटस्थता की नीति अपनाते हुए  रूस के साथ सस्ती दरों पर कच्चे तेल की खरीदी का जो अनुबंध किया उसने अर्थव्यवस्था को लड़खड़ाने से बचा लिया । अन्यथा हालात बेकाबू हो सकते थे। इसी का असर है कि गाड़ी सुचारू रूप से चलती रही । इस दौरान भारत को खाद्यान्न के अलावा अन्य जरूरी वस्तुओं का निर्यात करने का अवसर मिलने से घरेलू उद्योगों को संजीवनी मिल गई क्योंकि डालर के दाम भारतीय रुपए के तुलना में काफी ऊंचे हैं। कोरोना काल के दौरान भारत में ऑटोमोबाइल और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों में लगने वाले सेमी कंडक्टरों की कमी से बड़ी परेशानी हुई। उससे सबक लेकर सरकार ने इनका उत्पादन भारत में ही करने की दिशा में जो पहल की उससे भी अर्थव्यवस्था का विश्वास बढ़ा है। रक्षा उपकरणों की खरीद के साथ उनका निर्यात भारत के बढ़ते कदमों का प्रमाण है। स्थितियां जिस तरह अनुकूल हो रही हैं उनसे एक सुनहरे भविष्य की कल्पना साकार होने की संभावना बढ़ रही है किंतु अभी भी ब्याज दर , टैक्स ढांचा , जीएसटी की विभिन्न दरें और सबसे बड़ा नेताओं और नौकरशाही में व्याप्त भ्रष्टाचार   आर्थिक क्षेत्र में गति अवरोधक बने हुए हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी यदि उक्त बुराइयां दूर कर सकें  तो अर्थव्यवस्था में अकल्पनीय उछाल आ सकती है। साथ ही केंद्र स्तर पर इस तरह की पहल होना चाहिए  जिससे कि मुफ्तखोरी को बढ़ावा देने पर लगाम लगे। जिस युवा शक्ति को श्री मोदी भारत का भविष्य निर्माता मानते हैं उसकी क्षमता का समुचित उपयोग उत्पादकता बढ़ाने में किया जाना समय की मांग है। जहां तक बात चीन की हालत बिगड़ने की है तो उसका  कारण वह खुद है क्योंकि उसने अपनी अर्थव्यस्था को तो दुनिया के लिए खोल दिया किंतु राजनीतिक व्यवस्था अभी भी साम्यवादी बेड़ियों में जकड़ी है। बहुराष्ट्रीय कंपनियों के चीन से  मोहभंग का कारण पारदर्शिता का अभाव ही है। यदि भारत पूरी तरह से पेशेवर होकर अपने मानव संसाधन को  काम पर लगा दे तो अमृत काल अपने नाम को सार्थक साबित कर देगा।


- रवीन्द्र वाजपेयी 

Tuesday, 22 August 2023

5 फीसदी मत मिले तो भी कमलनाथ का खेल खराब कर देंगे केजरीवाल




आम आदमी पार्टी के संयोजक और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने बीते रविवार म.प्र के विंध्य अंचल में चुनाव प्रचार किया। पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान उनके साथ थे। इसके पूर्व वे दोनों भोपाल और ग्वालियर में भी रैली कर चुके हैं। पार्टी इसके पहले भी म.प्र में चुनाव लड़ चुकी है किंतु उसे अपेक्षित सफलता नहीं मिली। नगरीय चुनाव में जरूर सिंगरौली में महापौर के साथ ही कुछ जगह उसके पार्षद  जीत गए। गुजरात विधानसभा में इस पार्टी ने  जिस तरह   प्रचार किया उस लिहाज से तो उसे कामयाबी नहीं मिली किंतु उसने कांग्रेस की लुटिया जरूर डुबो दी। कर्नाटक के हालिया  चुनाव में भी उसकी जमानत जप्ती का सिलसिला जारी रहा । इसके पूर्व पंजाब में भारी बहुमत के बावजूद हिमाचल में उसके हाथ पूरी तरह से खाली  रहे। उस समय तक आम आदमी पार्टी भाजपा और कांग्रेस दोनों को अपना दुश्मन मानकर चलती थी । लेकिन दिल्ली की स्थानीय परिस्थितियों ने केजरीवाल एंड कम्पनी की अकड़ निकालकर रख दी और वह कांग्रेस के साथ गठजोड़ के लिए हाथ - पांव मारने लगी। यही नहीं तो जो गैर भाजपाई नेता उसके  द्वारा जारी भ्रष्टाचारियों की सूची में सबसे ऊपर थे उन्हीं के साथ गलबहियां करने  लालायित हो उठी । दिल्ली में नौकरशाहों के तबादले और पद स्थापना को लेकर केंद्र सरकार द्वारा जारी अध्यादेश के बाद जब श्री केजरीवाल को लगा कि वे अकेले नहीं लड़ पाएंगे तब वे विपक्षी गठबंधन का हिस्सा बन गए। लेकिन उक्त अध्यादेश को राज्यसभा में पारित होने से रोकने की उनकी सारी कोशिशें विफल हो गईं। वहीं  दिल्ली तथा पंजाब के कांग्रेस नेताओं तक ने आम आदमी पार्टी के साथ रिश्ता रखने का खुलकर विरोध कर दिया । कांग्रेस के कुछ नेताओं ने तो दिल्ली की सभी सातों लोकसभा सीटों पर चुनाव लड़ने का ऐलान तक कर दिया ।  इस घटनाक्रम के बाद श्री केजरीवाल और श्री मान का म.प्र के दौरे पर आकर चुनाव प्रचार करना इस बात का संकेत है कि अध्यादेश को राष्ट्रपति की मंजूरी मिलने के बाद आम आदमी पार्टी का विपक्षी एकता के प्रति नजरिया बदलने लगा है। विंध्य के दौरे में श्री केजरीवाल ने  मुफ्त बिजली , बेरोजगारी भत्ता के साथ विद्यालय और अस्पताल जैसे वायदे ही किए किंतु उनकी विधानसभा चुनाव में मौजूदगी निश्चित रूप से कांग्रेस के लिए नुकसानदेह होगी , जिसका अनुभव गुजरात में हो चुका है। हालांकि हिमाचल और कर्नाटक में आम आदमी पार्टी के मैदान में होने के बावजूद कांग्रेस को सफलता मिली किंतु उसका कारण ये रहा कि उसने  पंजाब पर ज्यादा ध्यान दिया वहीं कर्नाटक में जनता दल (से) की उपस्थिति ने उसके लिए जगह नहीं बनने दी । लेकिन  इस वर्ष के अंत तक जिन तीन राज्यों मसलन म.प्र , छत्तीसगढ़ और राजस्थान में  विधानसभा चुनाव होने वाले हैं वहां की राजनीति अभी तक कांग्रेस और भाजपा के बीच ही सीमित रही है । सपा , बसपा या ऐसी ही कुछ ताकतें मैदान में आईं किंतु उनको ज्यादा समर्थन नहीं मिला । उस दृष्टि से आम आदमी पार्टी चूंकि दिल्ली  के साथ ही पंजाब में  भी सत्ता में आ गई है इसलिए वह तीसरी ताकत के तौर पर उक्त तीनों राज्यों में हाथ आजमाकर 2024 के महा मुकाबले के लिए अभ्यास करना चाह रही है। श्री केजरीवाल जानते हैं कि इन तीनों में सरकार बनाना तो दूर रहा उनकी पार्टी मान्यता प्राप्त विपक्ष तक नहीं बन सकेगी । लेकिन इससे उत्तर भारत में बतौर राष्ट्रीय पार्टी उसका संज्ञान लिया जाने लगेगा और जो मतदाता भाजपा विरोधी और कांग्रेस से निराश हैं वे उसे विकल्प के रूप में स्वीकार कर लेंगे। इस लिहाज से श्री केजरीवाल का म. प्र दौरा  मायने रखता है क्योंकि उक्त तीनों में से यही ऐसा राज्य है जहां भाजपा सत्तासीन है।  आम आदमी पार्टी यहां जितने मत बटोरेगी उसका बड़ा हिस्सा कांग्रेस के खाते से ही निकलेगा। इसीलिए ये चौंकाने वाली बात है कि इंडिया नामक गठबंधन में शामिल रहने के बाद भी श्री केजरीवाल ने कांग्रेस का लिहाज किए बिना म.प्र में मोर्चा खोल दिया। छत्तीसगढ़ और राजस्थान में भी उनकी पार्टी सक्रिय है। दूसरी तरफ जिस कांग्रेस ने संसद में दिल्ली अध्यादेश का खुलकर विरोध करते हुए आम आदमी पार्टी को  समर्थन दिया वह भी इस रवैए को लेकर हतप्रभ है। वैसे जहां तक बात श्री केजरीवाल की है तो वे मौजूदा राजनीति के सबसे चालाक नेता हैं जो केवल अपने फायदे से  मतलब रखते हैं । इसलिए कांग्रेस उनको राष्ट्रीय स्तर पर अपने साथ रखकर यदि सोचती हो कि उनका उपयोग कर लेगी तो इससे बड़ी गलतफहमी दूसरी नहीं हो सकती। श्री केजरीवाल को ये बात अच्छी तरह पता है कि राहुल गांधी को ताकतवर बनाने से उनकी संभावनाएं प्रभावित हो सकती हैं इसलिए वे कांग्रेस के साथ रहकर भी उसे कमजोर करने का कोई अवसर नहीं छोड़ेंगे। ऐसे में म.प्र विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी यदि 5 फीसदी मत भी ले गई तो कांग्रेस के लिए बड़े नुकसान का कारण बनेगी । 2018 में सत्ता से बाहर होने के बाद भी भाजपा को कांग्रेस से 1 प्रतिशत ज्यादा मत मिले थे। ऐसे में केजरीवाल एंड कं. ने वाकई  गुजरात जैसा आक्रामक चुनाव लड़ा तब वे कमलनाथ की महत्वाकांक्षाओं पर पानी फेर देंगे जो बीते लगभग चार साल से अपनी खोई हुई सत्ता हासिल करने के लिए जी तोड़ मेहनत कर रहे हैं।


- रवीन्द्र वाजपेयी 

Monday, 21 August 2023

दिग्विजय अभी भी कांग्रेस का बंटाधार कराने पर आमादा




म.प्र के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह कुछ न कुछ ऐसा कह देते हैं जो कांग्रेस के लिए मुसीबत बन जाता है। प्रदेश में विधानसभा चुनाव की रणभेरी बज उठने के बाद  वरिष्ट राजनेताओं से अपेक्षा की ही जाती है कि ऐसा कुछ न कहें जिससे समाज का वातावरण खराब हो। लेकिन दस साल तक मुख्यमंत्री रहने के बाद भी श्री सिंह  इस तरफ ध्यान नहीं देते और गाहे बगाहे विवादास्पद बयान देकर अपनी छवि खराब करने के साथ ही कांग्रेस के लिए भी मुसीबतें पैदा करने से बाज नहीं आते। विगत दिवस उन्होंने ये कहते हुए सनसनी फैलाने का प्रयास किया कि भाजपा प्रदेश में हरियाणा के नूंह जैसी घटना को अंजाम देने की कोशिश कर रही है। पूर्व मुख्यमंत्री होने के साथ ही श्री सिंह  संगठन के जिम्मेदार पदों पर रहे हैं। वर्तमान में राज्यसभा के सदस्य भी हैं। राजनीतिक प्रतिद्वंदिता के चलते आरोप - प्रत्यारोप अपनी जगह हैं लेकिन जब श्री सिंह ने इतना गंभीर आरोप लगा दिया है  तब उनको चाहिए था पुलिस महानिदेशक से मिलकर ठोस प्रमाण भी देते। लेकिन  उनमें दायित्वबोध का सदैव अभाव रहा है और इसीलिए  चुनाव जैसे संवेदनशील समय में उन्होंने दंगे कराए जाने जैसी बात उछाल दी। नूंह में हुए दंगे का असर  कुछ -  कुछ  पड़ोसी राज्य उ.प्र और राजस्थान में भी हुआ किंतु जनता की समझदारी से जल्द ही हालात सामान्य हो गए । ये बात भी सामने आ गई कि उनमें रोहिंग्या मुसलमानों का हाथ था । वर्तमान में  म.प्र का सांप्रदायिक माहौल पूरी तरह शांत है। सिमी प्रभावित इलाकों में लगातार देश विरोधी तत्वों की धरपकड़ के अलावा माहौल बिगाड़ने वालों पर की गई सख्ती भी कारगर रही है। हाल ही में मोहर्रम और सावन के अवसर पर  पड़ने वाले त्यौहार एक साथ सम्पन्न हुए । यद्यपि कुछ स्थानों पर नूंह जैसी हरकत की गई किंतु उस पर तत्काल काबू कर स्थिति बिगड़ने से बचा ली गई। ये देखते हुए श्री सिंह न जाने किस आधार पर आरोप लगा रहे हैं कि भाजपा म.प्र में भी नूंह जैसा उत्पात करवाने की कोशिश में है। दो दिन पूर्व भोपाल में कांग्रेस द्वारा आयोजित अधिवक्ताओं के सम्मेलन में उन्होंने भाजपा पर घिसे - पिटे आरोप लगाते हुए कहा कि  आगामी विधानसभा चुनाव में पराजय के भय से वह दंगा करवा सकती है। साथ ही  मुसलमानों के प्रति भाजपा के रवैए की भी आलोचना कर डाली ।  पूर्व मुख्यमंत्री होने के नाते  उनका फर्ज  था कि दंगे कराने की  भनक लगते ही कानून व्यवस्था बनाए रखने वाली एजेंसी को उसकी जानकारी देते। ऐसा करने पर निश्चित तौर पर उनकी परिपक्वता और एक जिम्मेदार नागरिक की भूमिका प्रमाणित होती। लेकिन उन्होंने  हवा में  तीर चलाने की अपनी आदत के अनुरूप ही आरोप लगा डाले। फिलहाल  प्रदेश में सांप्रदायिक सद्भाव कायम है। समय - समय पर इसे बिगाड़ने की जो हिमाकत हुई  उसे निष्फल कर दिया गया। उल्लेखनीय है  प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ भाजपा से मुकाबले हेतु  बेहद चतुराई से नर्म हिंदुत्व का सहारा लेते हुए मंदिरों  - मठों में मत्था टेकने के साथ ही बाबाओं की अभ्यर्थना में लगे  हैं। छिंदवाड़ा में बागेश्वर धाम के महंत धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री की आरती उतारे जाने पर विपक्षी गठबंधन में शामिल कुछ दलों ने उस पर सवाल भी उठाए क्योंकि श्री शास्त्री खुले आम  हिन्दू राष्ट्र की वकालत करते हैं। लेकिन  श्री नाथ से जब इस बारे में पूछा गया तो उन्होंने  देश सभी का होने की बात तो कही किंतु ये भी स्वीकारा कि 82 फीसदी हिंदुओं के रहते ये देश हिन्दू  ही तो है। हाल ही में श्री नाथ ने  उज्जैन स्थित महाकालेश्वर में पूजा अर्चना करने के अवसर पर सरकार बनने के बाद  पहली कैबिनेट बैठक उज्जैन में करने की घोषणा तक कर डाली। लेकिन एक तरफ जहां हिन्दू मतदाताओं को लुभाने वे कांग्रेस की घोषित नीतियों तक की अवहेलना कर रहे हैं वहीं उसके दूसरे बड़े नेता दिग्विजय  हिंदुओं को  भाजपा के पक्ष में  ध्रुवीकृत होने उकसा रहे हैं।  कभी -  कभी तो लगता है चर्चा में बने रहने के लिए वे इस तरह के बयान देते हैं । लेकिन इतने अनुभवी नेता को  समझना चहिए कि  ऐसी  टिप्पणियों से कांग्रेस को देश भर में शर्मिंदगी झेलनी पड़ती है। आतंकवादियों के प्रति सम्मानजनक संबोधन के अलावा भारतीय सेना से सर्जिकल स्ट्राइक कर प्रमाण मांगने जैसी उनकी बातों से तो पार्टी तक ने पल्ला झाड़ लिया था। ये देखते हुए  कांग्रेस को चाहिए दिग्विजय सिंह को चुप रहना सिखाए वरना वे कांग्रेस का बंटाधार करवाने से बाज नहीं आयेंगे।


-रवीन्द्र वाजपेयी 

Saturday, 19 August 2023

चुनाव के समय ऐसे आरोप अर्थहीन : कमलनाथ अवसर का लाभ लेने में चूक गए



म.प्र में कांग्रेस द्वारा शिवराज सरकार के कथित घोटालों की जो सूची बड़े ही तामझाम के साथ जारी की उस पर भाजपा की जवाबी प्रतिक्रिया काफी जोरदार है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के साथ ही प्रदेश भाजपा अध्यक्ष विष्णुदत शर्मा ने भी प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ पर तीखे हमले करते हुए उन्हें करप्शन नाथ कहकर संबोधित किया । उल्लेखनीय है अपनी पिछली म.प्र यात्रा के दौरान इंदौर में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने भी श्री नाथ के लिए उक्त संबोधन का उपयोग किया था। वैसे भी  आरोपों की प्रामाणिकता संदिग्ध है। और इसीलिए भाजपा ने बिना देर किए कमलनाथ पर सीधा निशाना साधते हुए 1984 के सिख विरोधी दंगों में उनकी भूमिका का उल्लेख कर दिया जो  उनके  साथ ही समूची कांग्रेस की दुखती रग  है । जहां तक बात घोटालों को उजागर करने की है तो ये विपक्ष का कर्तव्य है लेकिन कमलनाथ और उनकी टीम ने जो समय इसके लिए चुना उससे लग रहा है कि कांग्रेस केवल चुनावी लाभ लेने के लिए घोटालों का ढोल पीट रही है। यदि उसके पास वाकई ठोस प्रमाण हैं तब उसे लोकायुक्त और आर्थिक अपराध अनुसंधान जैसी एजेंसियों के पास शिकायत दर्ज करवाना चाहिए थी। इसके साथ ही वह न्यायपालिका का सहारा भी ले सकती थी। 2003 में दिग्विजय सिंह की सत्ता को जनता ने  हटाया था जिन्हें मिस्टर बंटाधार के नाम से जाना जाता था। उनके दस वर्षीय शासनकाल में म.प्र में सड़कों की हालत बद से बदतर हो गई थी। पूरा प्रदेश बिजली संकट से जूझ रहा था। 2003 के बाद 2018 में एक बार फिर कांग्रेस सत्ता में आई थी किंतु अपनी आंतरिक कलह से उसके विधायक ही उसका साथ छोड़ गए जिससे मात्र 15 महीने में ही कमलनाथ की कुर्सी छिन गई । उस अल्पावधि में जिस व्यापक पैमाने पर तबादले किया गए उनमें भी जबरदस्त भ्रष्टाचार के आरोप लगे । और इसीलिए प्रदेश की जनता ने कुछ महीनों बाद हुए लोकसभा चुनाव में कांग्रेस का सूपड़ा साफ कर दिया। कमलनाथ मामूली अंतर से विधानसभा उपचुनाव जीत सके वहीं लोकसभा  सीट पर  उनका बेटा नकुल नाथ भी फीकी जीत दर्ज कर पाया और वह भी इसलिए कि नरेंद्र मोदी की सभा छिंदवाड़ा में नहीं हो सकी थी। हवा का रुख समझकर ही कांग्रेस का एक धड़ा ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ उससे अलग हो गया और वह सरकार धराशायी हो गई। उसके बाद से ही श्री नाथ दोबारा सत्ता में आने के लिए बेचैन हैं।  लंबे समय तक वे नेता प्रतिपक्ष और प्रदेश अध्यक्ष दोनों बने रहे। जब पार्टी के भीतर ही उनका विरोध होने लगा तो अध्यक्ष का पद रखते हुए दिग्विजय सिंह के खासमखास डा.गोविंद सिंह को नेता प्रतिपक्ष बनवा दिया। बावजूद इसके प्रदेश कांग्रेस में उनके नेतृत्व को लेकर असंतोष सतह पर उतराता रहता है। प्रदेश अध्यक्ष रहते हुए उन्होंने बिना पार्टी की सहमति लिए ही स्वयं को मुख्यमंत्री के चेहरे के तौर पर पेश  कर दिया जिससे पार्टी के भीतर नाराजगी है। हाल ही में आदिवासी मुख्यमंत्री की मांग भी उठाई गई जिसके पीछे श्री नाथ विरोधी गुट बताया जाता है। इस सबसे बचने के लिए ही उन्होंने प्रदेश सरकार के विरुद्ध आरोपों का पिटारा खोलने का दांव चला । लेकिन विधानसभा चुनाव की उल्टी गिनती शुरू होने के बाद इस तरह के पैंतरे विश्वसनीय नहीं माने जाते। सही बात तो ये है कि महज 15 महीने छोड़कर म.प्र  में कांग्रेस बीते लगभग दो दशक से विपक्ष में है । लेकिन जैसा संसद में दिखाई देता है ठीक उसी तरह प्रदेश में भी वह विरोधी दल की भूमिका का निर्वहन ठीक तरह से नहीं कर सकी। विधानसभा के सत्रों में वह सरकार को घेर सकती थी किंतु हंगामा और बहिर्गमन उसकी आदत में शुमार हो जाने के कारण वह सदन का समुचित उपयोग नहीं कर पाई । इसका प्रमाण ये है कि बीते दो दशकों में  विधानसभा का शायद ही कोई सत्र पूरी अवधि तक चल पाया हो। कुछ तो हफ्ते भर भी नहीं चले। ऐसे में श्री नाथ द्वारा गत दिवस जो आरोप प्रदेश सरकार पर लगाए गए वे एक दो दिन तक अखबारी पन्नों में नजर आने के बाद भुला दिए जायेंगे ।  हालांकि ये मान लेना तो अतिशयोक्ति होगा कि  भ्रष्टाचार पूरी तरह समाप्त हो चुका है। लेकिन उसको रोकने के लिए  संबंधित एजेंसियां जिस तरह से सक्रिय हैं वैसा कांग्रेस राज में कभी नहीं देखा गया। लोकायुक्त और आर्थिक अपराध अनुसंधान द्वारा जिस बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचारियों को पकड़ा गया वह इस बात का प्रमाण है कि भ्रष्टाचार को नियंत्रित करने का प्रयास सरकारी स्तर पर चल रहा है। कमलनाथ और उनकी पार्टी  विधानसभा चुनाव के ठीक पहले घोटालों की जो सूची लेकर आई उन पर मतदाताओं का ध्यान इसलिए नहीं जायेगा क्योंकि उसका उद्देश्य भ्रष्टाचार का विरोध न होकर चुनावी लाभ लेने की कोशिश ही है। वहीं भाजपा ने भी तत्काल ढेर सारे तीर छोड़कर आक्रमण ही सबसे अच्छी सुरक्षा की नीति अपना ली। दरअसल कमलनाथ को 15 महीने तक बतौर मुख्यमंत्री पार्टी की छवि सुधारने का जो अवसर मिला उसे उन्होंने गंवा दिया। इसी कारण न वे अपनी विश्वसनीयता बना सके और न ही कांग्रेस की।

- रवीन्द्र वाजपेयी 


Friday, 18 August 2023

गुलाम नबी को अब समझ में आया कि मुस्लिमों के पूर्वज हिन्दू थे




हालांकि वे पहले भी कह चुके हैं कि 600 वर्ष पूर्व इस देश में सभी हिन्दू थे। लेकिन जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री के अलावा केंद्र सरकार में लंबे  समय तक मंत्री रहे गुलाम नबी आजाद द्वारा वर्तमान हालातों में अपनी उक्त बात दोहराया जाना बेहद महत्वपूर्ण है। उन्होंने ये भी कहा कि कश्मीर में जितने मुसलमान हैं वे सैकड़ों वर्ष पहले पंडित ही थे। हाल ही में डोडा में दिए उनके भाषण का जो वीडियो सामने आया उसमें उन्हें ये कहते सुना जा रहा है कि हिन्दू धर्म इस्लाम से बहुत पुराना है। भारत में रहने वाले मुसलमान  इसी देश में जन्मे हैं। 1500 साल पहले इस्लाम के आने तक कोई मुसलमान था ही नहीं। इसी आशय का बयान नेशनल कांफ्रेंस के नेता डा.फारुख अब्दुल्ला भी  देते रहे हैं जिनके मुख्यमंत्री काल में  कश्मीर घाटी के हिंदू कश्मीरी पंडितों के साथ वही सब हुआ जो देश के बंटवारे के समय पाकिस्तान से जान बचाकर आए सिंधी और पंजाबी हिंदुओं के साथ घटा था। आज फारुख कहते हैं कि बिना पंडितों के कश्मीर अधूरा है । यद्यपि  उनके पुत्र उमर अब्दुल्ला भी मुख्यमंत्री बने किंतु दोनों ने  पंडितों की वापसी के लिए सिवाय घड़ियाली आंसू बहाने कुछ नहीं किया।  श्री आजाद भी राज्य और केंद्र की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे किंतु तब उनके श्रीमुख से ऐसे  वचन शायद ही किसी ने सुने हों। जाहिर है ये सब निकट भविष्य में होने वाले   विधानसभा  चुनाव को देखते हुए कहा जा रहा है।  गुलाम नबी जम्मू क्षेत्र के रहने वाले हैं। मुख्यमंत्री बनने के बाद वहीं से विधायक बने । महाराष्ट्र से कांग्रेस ने उन्हें एक -  दो बार जितवाया और बाकी समय  राज्यसभा में रहे। दो साल पहले जब वह रास्ता बंद हुआ तो पार्टी छोड़ अपनी क्षेत्रीय पार्टी बनाकर बैठ गए। कभी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तारीफ करते हैं तो कभी विरोध। हाल ही में लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव पर मतदान के पहले विपक्ष के बहिर्गमन की तो उन्होंने आलोचना की किंतु अगले ही दिन धारा 370 हटाए जाने को भी गलत ठहरा दिया। दरअसल श्री आजाद और उनकी तरह ही  डा.अब्दुल्ला भी अपने पूर्वजों के हिन्दू होने की बात कहकर जम्मू अंचल में भावनात्मक दृष्टि से असर जमाना चाहते हैं क्योंकि नये  परिसीमन के बाद  घाटी का  वर्चस्व पहले जैसा नहीं रह सकेगा। लेकिन वे  धारा 370 को हटाए जाने का विरोध इसलिए करते हैं क्योंकि उसके रहते जम्मू - कश्मीर की मुस्लिम पहिचान बनी हुई थी और हिन्दू समुदाय की स्थिति दांतों के बीच जीभ के समान थी। 370 हटने के बाद घाटी में जुमे की नमाज के बाद पाकिस्तान का झंडा लहराते हुए जुलूस बंद हो गया।   बीते 4 सालों में घाटी में पर्यटकों की रिकॉर्ड आवाजाही के अलावा भी अन्य बातें हैं जो 370  के खात्मे को सही साबित करती  हैं। ऐसे में यदि श्री आजाद जब कश्मीर  के सभी मुसलमानों को मूलतः हिन्दू बताते हैं तब उन्हें धारा 370 हटाए जाने का विरोध बंद करने के साथ ही इस्लाम के नाम पर जो कट्टरता है उसके विरुद्ध उसी तरह मुखर होना चाहिए जिस तरह केरल के राज्यपाल आरिफ मो.खान हैं। यदि वे दिल  से ये बात स्वीकार कर रहे हैं कि हिन्दू धर्म इस्लाम से बहुत पुराना है और देश में रह रहे सभी मुसलमान सैकड़ों वर्ष पहले उनके हिन्दू पूर्वजों द्वारा इस्लाम स्वीकार किए जाने के कारण मुस्लिम बने , तब उन्हें यही बातें कश्मीर से बाहर निकलकर मुस्लिम संगठनों पर काबिज मौलवियों को समझाने के साथ ही समान नागरिक संहिता ,   नागरिकता संशोधन कानून , राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर जैसे मसलों पर भी रचनात्मक विचारों के  साथ आगे आना चाहिए । वर्तमान में वाराणसी में ज्ञानवापी का जो विवाद चर्चाओं में है उसके संदर्भ में भी यदि वे  मुस्लिम पक्ष को ये समझाएं कि उन्हें हिंदुओं की आस्था के प्राचीन केंद्रों पर मुगल काल में किए गए अवैध कब्जे  से हट जाना चाहिए , तब उनके संदर्भित बयान में ईमानदारी समझी जा सकती है । वे चाहें तो डा.अब्दुल्ला के साथ पूरे देश में घूम -घूमकर मुस्लिम समुदाय को ये समझा सकते हैं कि  वे  इंडोनेशिया से प्रेरणा लें जो पूरी तरह इस्लामिक देश होने के बाद भी अपने पूर्वजों की हिन्दू संस्कृति और उसकी परंपराओं को सहेजे हुए है।  दरअसल श्री आजाद का उनके अपने राज्य में कोई जनाधार नहीं है। वहीं अब्दुल्ला खानदान का प्रभाव भी ढलान पर है। ऐसे में इनका ये कहना कि हमारी जड़ें हिन्दू धर्म के साथ जुड़ी हुई हैं , महज दिखावा है। वरना ये धारा 370 को हटाए जाने का स्वागत करते हुए मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड सहित जमीयत उलेमा ए हिंद जैसे संगठनों को भी  समझाते कि समान नागरिक संहिता और नागरिकता संशोधन विधेयक मुसलमानों के मुख्यधारा में शामिल होने का शानदार जरिया हो सकते हैं ।  हालांकि वे ऐसा नहीं करेंगे क्योंकि जिस तरह धर्मनिरपेक्षता का ढोंग रचने वाले दलों का मुस्लिम प्रेम भी स्वार्थों पर आधारित है ठीक उसी तरह गुलाम नबी द्वारा भारतीय मुसलमानों के पुरखों के हिन्दू होने जैसी बात  कहा जाना भी शुद्ध अवसरवाद है। सवाल ये है कि जिंदगी का बड़ा हिस्सा गांधी परिवार के दरबारी बनकर गुजारने के बाद  उनके ज्ञान चक्षु क्यों खुल गए ? यहां तक कि जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री रहते हुए भी उन्होंने कभी ये कहने का साहस नहीं दिखाया कि कश्मीर के सभी मुसलमानों के पूर्वज हिन्दू थे। उल्लेखनीय है कि जब यही बात रास्वसंघ के सरसंघचालक डा.मोहन भागवत और डा. सुब्रमण्यम स्वामी कहते थे तो धर्म निरपेक्षता के ठेकेदार आसमान सिर पर उठा लिया करते थे।

- रवीन्द्र वाजपेयी 


Thursday, 17 August 2023

पहाड़ों को भी शांति और आराम की जरूरत है




पहाड़ों को हौसलों का प्रतीक कहा जाता है। उनकी चोटी तक पहुंचने की इच्छा पर्वतारोहियों के अलावा रोमांच प्रेमी पर्यटकों में भी देखी जाती है। अनेक धार्मिक स्थल पहाड़ों में स्थित होने से श्रद्धालुओं को आकर्षित करते हैं। ग्रीष्म काल में मैदानी इलाके के तापमान से बचने पहाड़ों पर बसे हिल स्टेशनों में भी सैलानियों की भीड़ नजर आती है। प्रकृति प्रेमियों , साहित्यकारों , कलाकारों और छायाकारों में  भी पहाड़ों के प्रति दीवानगी होती है। कोलाहल से दूर किसी पर्वतीय स्थल पर कुछ दिन व्यतीत करना  मानसिक शांति के साथ - साथ स्वास्थ्य के लिए भी लाभदायक माना जाता है। एक समय था जब पहाड़ों में ऋषि - मुनि तपस्या करने जाते थे। जड़ी - बूटियों के खजाने भी पर्वतीय क्षेत्रों में होते थे। और फिर हिमालय से सदा नीरा बड़ी - बड़ी नदियां निकलती हैं। कश्मीर घाटी में बसे श्रीनगर में मुगल बादशाहों द्वारा विकसित उद्यान पर्यटकों से भरे रहते हैं। लद्दाख और अरुणाचल  के भव्य बौद्ध मठ भी पर्वतों के धार्मिक महत्व को साबित करते हैं। ब्रिटिश राज में देश भर में हिल स्टेशन के रूप में पर्वतीय क्षेत्रों का विकास हुआ । वहां तक जाने के लिए  सड़कें और रेल मार्ग भी बने। शिमला को तो अंग्रेजों ने देश के ग्रीष्मकालीन राजधानी बना रखा था। हालांकि आजादी के बाद भी पर्यटन केंद्रों के रूप में तीर्थस्थलों के अलावा अन्य पर्वतीय स्थानों को विकसित किया गया। गौरतलब है बीते कुछ दशकों में मध्यमवर्गीय पर्यटक बढ़ने से पर्वतीय क्षेत्रों में बेतहाशा भीड़ होने लगी है। विकास के तौर पर  सड़कों और पुलों आदि का निर्माण भी बड़ी मात्रा हुआ जिनके  लिए वृक्षों की कटाई और पहाड़ों की छटाई भी व्यापक तौर पर की गई । उत्तराखंड में टिहरी बांध जैसी परियोजना भी बनी । पनबिजली संयंत्रों के लिए नदियों के पानी को घुमाने सुरंगें बनाई गईं। इन सबका दुष्परिणाम धीरे - धीरे आने लगा । भूस्खलन , भूकंप , ग्लेशियरों का सिकुड़ना  आदि लक्षणों के जरिए प्रकृति ने चेतावनी देने का क्रम जारी रखा किंतु विवेकहीन विकास के साथ ही आमोद - प्रमोद के उद्देश्य से किए जाने वाले पर्यटन ने उन संकेतों के प्रति उपेक्षाभाव प्रदर्शित किया । यही कारण है कि  उत्तराखंड , हिमाचल प्रदेश और जम्मू कश्मीर के जिन क्षेत्रों में मानवीय आवाजाही ज्यादा होती  हैं वहां पर्यावरण का संतुलन गड़बड़ा गया । पर्वतों  को क्षति पहुंचाए जाने से उनकी आधारभूत संरचना को जो नुकसान हुआ उसकी वजह से  प्राकृतिक आपदाएं जल्दी - जल्दी आने लगी हैं। ताजा उदाहरण हिमाचल का है जहां कुछ दिनों के भीतर ही सैकड़ों लोग  जान गंवा बैठे। उत्तराखंड में भी पहाड़ों के धसकने की घटनाएं लगातार सुनाई दे रही हैं। यद्यपि इस साल अति वृष्टि को भी इसके लिए जिम्मेदार माना जा रहा है।लेकिन  ये बात भी स्वीकार करनी होगी कि पहाड़ों को भीतर से कमजोर कर दिए जाने के कारण ही अब वे अति वृष्टि अथवा भूकंप के मामूली झटके झेलने में असमर्थ होते जा रहे हैं। ये देखते हुए हिमाचल की मौजूदा स्थिति को तात्कालिक संकट मान लेना बड़ी भूल होगी। यही स्थिति उत्तराखंड की है। वहां भी चार धाम यात्रा में जिस तरह रुकावट आती रही वह इस बात को इंगित करती है कि पहाड़ पर मानवीय गतिविधियों का बोझ कम किया जाना चाहिए। वाहनों की आवाजाही सुलभ करने के लिए बनाई गई  बारहमासी सड़कें भी भूस्खलन के कारण बार - बार अवरुद्ध हो जाती हैं। इन्हें बनाने में भले ही कितनी  भी तकनीकी कुशलता दिखाई गई किंतु ये भूल जाना निरी मूर्खता है कि प्रकृति को बांधकर रखा जा सकता है। बीते वर्ष अमरनाथ में जल सैलाब आया था। केदारनाथ में हो चुकी त्रासदी के दंश तो आज तलक ताजा हैं। दुख इस बात का है कि हर दुर्घटना के बाद प्रकृति और पर्यावरण  सुरक्षा की बातें तो बहुत होती हैं लेकिन जो सुधार होना चाहिए उनकी तरफ ध्यान नहीं दिया जाता । सही बात तो ये है कि पहाड़ों को भी शांति के साथ आराम चाहिए। हम अपने आनंद के लिए उनके निकट जाते हैं किंतु अपने गैर जिम्मेदाराना आचरण के चलते उन्हें दुखी कर आते हैं। इसी कारण  उनकी सहनशक्ति जवाब देने लगी है। कभी - कभी तो लगता है कोरोना काल के दौरान देश भर में लगाए गए लॉक डाउन की तरह साल में कुछ समय तक वहां भी आवाजाही पर नियंत्रण लगाया जावे। उत्तराखंड में स्थित तीर्थस्थलों के साथ हिमाचल प्रदेश और जम्मू कश्मीर के पर्यटन स्थलों में भी  तीर्थयात्रियों और पर्यटकों की संख्या सीमित करना जरूरी हो गया है। उल्लेखनीय है लद्दाख में बीते कुछ दशकों के भीतर जिस तरह से  पर्यटकों की भीड़ उमड़ रही है और लेह से आगे जाकर नुब्रा घाटी जैसे इलाकों तक सैलानी जाने लगे हैं उसकी वजह से वहां के जिम्मेदार लोग चिंतित हैं। उत्तराखंड की स्थिति तो ये है कि पहाड़ों के बदलते मौसम और बिगड़ते मिजाज  के चलते बड़ी संख्या में गांव खाली होते जा रहे हैं। स्थिति और न बिगड़े इस हेतु गंभीर चिंतन आवश्यक है। बेहतर हो बिना समय गंवाए  पहाड़ों के क्रोध को शांत करने का उपाय तलाश लिया जाए वरना जिन मुसीबतों से हिमाचल प्रदेश इन दिनों जूझ रहा है वैसी ही समूचे हिमालय क्षेत्र में नजर आएगी जिससे होने वाली तबाही की कल्पना ही भयभीत कर देती है।

- रवीन्द्र वाजपेयी 


Tuesday, 15 August 2023

अटल जी जैसा निर्विवाद और निष्कलंक नेता दुर्लभ



आज पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की  पुण्य तिथि है | आजाद भारत में एक से एक बढ़कर राजनेता हुए लेकिन पं. जवाहरलाल नेहरू और  इंदिरा गांधी के अलावा अटल जी ही एक मात्र  थे जिन्हें राष्ट्रीय स्तर पर अभूतपूर्व लोकप्रियता हासिल हुई |  नेहरू जी और इंदिरा जी तो सत्ता की राजनीति से ही जुड़े रहे वहीं अटल जी ने विपक्ष में ही अपनी अधिकतर राजनीतिक यात्रा पूरी की | भले ही वे 71 वर्ष की आयु में पहली बार प्रधानमंत्री बने किन्तु उसके पहले  भी जनता के बीच उनका सम्मान प्रधानमन्त्री से कम नहीं था | इसकी वजह उनकी सैद्धांतिक दृढ़ता और साफ़ सुथरी राजनीति थी | 1996 में जब वे प्रधानमंत्री बनने जा रहे थे तब दूरदर्शन ने उनका साक्षात्कार लिया | उसमें उनसे पूछा गया कि आपकी विशेषता क्या है ? और अटल जी ने बड़ी ही सादगी से जवाब दिया -  मैं कमर से नीचे वार नहीं करता | उनके उस उत्तर की सच्चाई पर उनके विरोधी तक संदेह नहीं  करते थे | 

विपक्ष में रहते हुए राष्ट्रीय महत्व के किसी भी विषय पर उन्होंने दलगत सीमाओं से ऊपर उठकर अपने विचार  व्यक्त करने में संकोच नहीं किया | इसकी वजह से उनको राजनीतिक नुकसान भी हुआ लेकिन उन्होंने उसकी परवाह नहीं की | पं. नेहरू के निधन पर संसद में उन्होंने जो श्रद्धांजलि दी वह आज भी उद्धृत की जाती  है | नेहरू जी ने उनकी तेजस्विता को भांपते हुए ही भविष्यवाणी कर दी थी कि आने वाले समय में ये नौजवान देश  का प्रधानमंत्री बनेगा | 

हिन्दी के ओजस्वी वक्ता के तौर पर वे लोकप्रियता के चरमोत्कर्ष तक जा पहुंचे | उनकी जनसभाओं में उनके  विरोधी भी बतौर श्रोता देखे जाते थे | लाखों की भीड़ को लम्बे समय तक अपनी  वक्तृत्व कला से मंत्रमुग्ध करने की उनकी क्षमता भूतो न भविष्यति का पर्याय बन गई |

बिना सत्ता हासिल किये भी लोकप्रियता और सम्मान अर्जित करने का उनसे बेहतर उदाहरण नहीं  हो सकता | 1977 में जनता सरकार में वे विदेश मंत्री बने और मात्र 27 माह के कार्यकाल में ही उन्होंने वैश्विक पटल पर भारत की छवि में जबरदस्त सुधार करते हुए अपनी क्षमता और कूटनीतिक कौशल का परिचय दिया | संरासंघ की  महासभा में हिन्दी में भाषण देने की परम्परा की शुरुवात उन्होंने ही की थी | उसकी वजह से ही हिन्दी को अन्तर्राष्ट्रीय प्रतिष्ठा प्राप्त हो सकी |

मूलतः वे एक कवि थे | अपने जीवन का प्रारंभ उन्होंने बतौर पत्रकार किया था | यद्यपि  व्यस्तताओं की वजह से वे उस विधा को पूर्णकालिक नहीं बना सके और अनेक अवसरों पर उन्होंने ये स्वीकार भी  किया कि राजनीति के मरुस्थल  में काव्यधारा सूख गयी किन्तु समय मिलते ही वे काव्य सृजन करते रहे | देश के अनेक मूर्धन्य कवि और साहित्यकार उन्हें अपना प्रेरणास्रोत मानते रहे | आज के दौर के सबसे लोकप्रिय कवि डॉ.  कुमार विश्वास तो खुलकर कहते हैं कि अटल जी उनके काव्यगुरू हैं | सामाजिक जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में उनका संपर्क और सम्मान उनकी  विराटता का प्रमाण था | संसद में उनकी  सरकार गिराने वाली पार्टियां और नेता भी बाद में निजी तौर पर अफ़सोस व्यक्त किया करते थे | अटल जी के व्यक्तित्व की ऊंचाई का ही परिणाम था कि पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर और पीवी नरसिम्हा राव सार्वजनिक रूप से उन्हें अपना गुरु कहकर आदर देते थे | दो विपरीत ध्रुवों पर रहने के बाद भी इंदिरा जी अक्सर अटल जी से गम्भीर मसलों पर सलाह लिया करती थीं  |

आपातकाल के दौरान लोकसभा चुनाव की घोषणा के बाद जब विपक्षी नेताओं को रिहा कर  दिया गया और दिल्ली के रामलीला मैदान में उनकी बड़ी सभा हुई तो लाखों जनता उमड़ पड़ी | लोकनायक जयप्रकाश नारायण और मोरारजी के अलावा अनेक दिग्गज नेता  मंच पर थे लेकिन अटल जी का भाषण सबसे अंत में रखा गया क्योंकि आयोजक जानते थे कि उन्हें सुनने के लिए श्रोता रुके रहेंगे | इंदिरा सरकार ने दूरदर्शन पर बॉबी फिल्म का प्रसारण करवा दिया लेकिन जनता अटल जी को सुनने के लिए रुकी रही | वे खड़े हुए और भाषण की शुरुवात करते हुए ज्योंही कहा - 
बाद मुद्दत  के मिले हैं दीवाने , 
तो पूरा मैदान करतल ध्वनि से गूँज उठा | अगली पंक्तियों में वे बोले - 
कहने सुनने को हैं बहुत अफ़साने |  
खुली हवा में चलो कुछ देर सांस ले लें ,
कब तक रहेगी आजादी कौन जानें | 

और उसके बाद पूरे  रामलीला मैदान में विजयोल्लास छा गया |  आपातकाल का भय काफूर हो चूका था | अटल जी के  उस भाषण ने देश में लोकतंत्र को पुनर्जीवन दे दिया |

भारतीय संस्कृति और जीवनमूल्यों में उनकी गहरी आस्था थी | हिन्दू तन मन , हिन्दू जीवन नामक उनकी कविता उनके व्यक्तित्व का  बेजोड़ चित्रण प्रतीत होती है | बतौर प्रधानमंत्री गठबंधन सरकार चलाकर उन्होंने जिस राजनीतिक कुशलता का परिचय दिया वह भारतीय राजनीति का एक महत्वपूर्ण अध्याय है | भारतीय विदेश नीति को उन्होंने नए आयाम दिए | परमाणु परीक्षण के साहसिक फैसले के बाद लगे वैश्विक आर्थिक प्रतिबंधों का सामना करने की उनकी दृढ इच्छाशक्ति के कारण देश का आत्मविश्वास बढ़ा और अंततः दुनिया को भारत के प्रति नरम होना पड़ा |

विदेशों में बसे अप्रवासी भारतीय मूल के लोगों को अपनी मातृभूमि से भावनात्मक लगाव रखने के लिए उन्होंने जिस तरह प्रेरित किया वह भारत की प्रगति में बहुत सहायक हुआ | स्वर्णिम चतुर्भुज रूपी  राजमार्गों के विकास , विशेष  रूप से ग्रामीण सड़कों के निर्माण की  उनकी योजना देश की प्रगति  में क्रांतिकारी साबित हुई |

जीवन के अंतिम दशक में वे बीमारी के  कारण राजनीति और सार्वजनिक जीवन से दूर चले गए लेकिन उनके प्रति सम्मान में लेशमात्र कमी नहीं आई | मोदी सरकार ने उन्हें भारत रत्न से भी  विभूषित किया लेकिन देश की जनता ने तो उन्हें बहुत पहले से ही सिर आँखों पर बिठा रखा था | अटल जी  भारतीय राजनीति में  एक युग के प्रवर्तक कहे जा सकते हैं | एक दलीय सत्ता के मिथक को तोड़कर उन्होंने लोकतंत्र की बुनियाद को मजबूत किया | यही वजह है कि उनके घोर विरोधी तक उनका जिक्र आते ही आदर  व्यक्त करना नहीं भूलते |

उन्हें गये पांच वर्ष बीत गये | भारतीय राजनीति आज जिस मोड़ पर आ पहुंची है उसमें उनका अभाव खलता है | संसदीय राजनीति में उनका योगदान इतिहास में अमर रहेगा | देश में नेताओं की भरमार है  लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर उन जैसा निर्विवाद और निष्कलंक व्यक्तित्व  दूरदराज तक नजर नहीं आता | सत्ता से दूर रहकर भी जनता का विश्वास जीतने की उन जैसी क्षमता भी किसी में नहीं दिख रही |

पावन स्मृति में सादर नमन |

चित्र:-1996 में जबलपुर के पत्रकारों के साथ अटल जी का यादगार चित्र।

 - आलेख : रवीन्द्र वाजपेयी