Monday, 28 August 2023
आधी आबादी को साधने का दांव शिवराज का तुरुप का पत्ता
Saturday, 26 August 2023
अवैध कालोनियों को वैध करना जनहित में किंतु भविष्य में सख्ती जरूरी
Thursday, 24 August 2023
कुछ लोगों को देश का गौरवगान भी अच्छा नहीं लगता
चंद्रयान 3 की सफलता पर पूरा देश गौरवान्वित हुआ। इसरो के वैज्ञानिकों ने बीते अनेक वर्षों तक अथक परिश्रम करते हुए भारत को अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में अग्रणी विश्व शक्तियों के समक्ष ला खड़ा किया।चंद्रमा के जिस क्षेत्र में चंद्रयान उतरा उससे अब तक अंतरिक्ष वैज्ञानिक अपरिचित थे । इसलिए यह दुस्साहसिक प्रयास था । लेकिन 23 अगस्त की शाम भारत में उल्लास का अभूतपूर्व सूर्योदय लेकर आई जब चंद्रयान ने चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर धरातल को छू लिया । उसके साथ भेजा गया प्रज्ञान नामक वाहन भी चंद्रमा की धरती पर चहलकदमी करने लगा जिसका काम वहां की भौगोलिक और वातावरण संबंधी जानकारी इसरो को भेजना है। हालांकि ये अभियान महज दो सप्ताह का है, लेकिन इसकी सफलता ने अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में हमें वैश्विक दर्जा दिला दिया जो कम महत्वपूर्ण नहीं है। इस सफलता से उत्साहित इसरो ने तत्काल सूर्य की कक्षा में भेजे जाने वाले आदित्य नामक अभियान की भी घोषणा कर दी। चंद्रयान के चंद्रमा पर उतरने का वीडियो अमेरिका की अंतरिक्ष एजेंसी नासा द्वारा प्रसारित किया जाना जताता है कि ये अभियान कितना महत्वपूर्ण था। पूरी दुनिया में इसे भारतीय वैज्ञानिकों के शानदार कारनामे के तौर पर देखा गया किंतु हमारे देश में कुछ लोग हैं जिन्हें देश का गौरवगान अच्छा नहीं लग रहा। किसी को प्रधानमंत्री द्वारा दक्षिण अफ्रीका से वैज्ञानिकों को बधाई देने के साथ ही पूरी दुनिया को अंतरिक्ष में भारत की ऊंची छलांग का ब्यौरा देने पर ऐतराज है तो कुछ इस बात को प्रचारित करने में जुट गए कि इसरो की स्थापना किसने और कब की । एक तबका ऐसा भी है जिसे लग रहा है कि अंतरिक्ष कार्यक्रमों पर लुटाया जा रहा धन पानी में पैसे फेंकने जैसा है। ये लोग अपनी बात के समर्थन में दावा कर रहे हैं कि जिन देशों ने अंतरिक्ष कार्यक्रमों पर अनाप - शनाप धन खर्च किया , उन्हें उससे कुछ हासिल नहीं हो सका क्योंकि पृथ्वी से लाखों - करोड़ों किलोमीटर दूर स्थित किसी ग्रह पर काबिज होने के बाद भी वहां रहना संभव नहीं है। एक यू ट्यूबर पत्रकार गत रात्रि इस बात का हिसाब देते रहे कि चंद्रयान पर हुए खर्च से ज्यादा तो प्रधानमंत्री की सुरक्षा पर व्यय होता है। यद्यपि एक वर्ग ऐसा है जिसने इस बात की जरूरत जताई कि इसरो सरीखे संगठनों को दिया जाने वाला बजट और बढ़ना चाहिए। लंबे समय से वहां वेतन नहीं मिलने की बात भी उछली। देश में शोध और विकास ( रिसर्च एंड डेवलपमेंट ) पर कम ध्यान दिए जाने की बात भी जोरदार तरीके से उठी। टीवी चैनलों में चंद्रयान के सफल आरोहण पर आयोजित चर्चा में बजाय वैज्ञानिकों के राजनीतिक नेताओं को बिठाए जाने पर भी बहुतों ने एतराज किया। और ये बात सही भी है क्योंकि नेताओं का पूरा जोर वैज्ञानिकों द्वारा अर्जित सफलता का श्रेय लूटने पर केंद्रित रहा। कुछ लोगों ने इस उपलब्धि का ये कहकर मजाक भी उड़ाया कि अमेरिका तो 50 साल पहले ही अपने अंतरिक्ष यात्री चंद्रमा पर उतार चुका था और हम महज एक यान के वहां पहुंचाकर फूले नहीं समा रहे। कुल मिलाकर देखने पर पता चलता है कि राष्ट्रीय गौरव के विषयों पर भी हम एक सुर में बोलना भूलते जा रहे हैं। गनीमत ये रही कि सेना द्वारा सर्जिकल स्ट्राइक किए जाने के प्रमाण मांगने वाले चंद्रयान के सफल आरोहण का प्रमाण मांगने की हिम्मत नहीं कर सके किंतु अभियान की सफलता का श्रेय लूटने के अलावा उसकी उपयोगिता और सार्थकता पर जिस तरह से सवाल उठाए गए वह शुभ संकेत नहीं है क्योंकि इससे दुनिया में हमारी छवि खराब होती है। जिस तरह खेलों में किसी खिलाड़ी अथवा टीम के जीतने पर पूरा देश उसको बधाई देकर प्रोत्साहित करता है ठीक वैसे ही वैज्ञानिकों की उपलब्धि पर उनकी हौसला अफजाई सामूहिक तौर पर होना चाहिए थी। वैसे भी यदि अंतरिक्ष कार्यक्रम की उपादेयता और उपलब्धियों के बारे में उसी क्षेत्र के जानकार अपनी राय व्यक्त करें तो वह बेहतर होता है। लेकिन विज्ञान के बारे में जानकारी न रखने वाले भी जब ऐसे मामलों में अपना ज्ञान बघारकर उपदेश देने लगते हैं तो दुख होता है। कुछ लोगों को तो इसरो प्रमुख सहित कुछ वैज्ञानिकों के तिरुपति देवस्थानम जाकर प्रार्थना किए जाने पर भी आपत्ति हुई। लेकिन उक्त अभियान के प्रमुख सोमनाथन द्वारा वेदों को विज्ञान के स्रोत के तौर स्वीकार कर ऐसे लोगों को करारा जवाब दे दिया गया। चंद्रयान 3 की सफलता के लिए श्रेय के अधिकारी यदि हैं तो केवल वे वैज्ञानिक जो अनेक वर्षों से इस अभियान को अपने जीवन का मिशन मानकर जुटे रहे। इस सफलता ने भारत का मान पूरी दुनिया में बढ़ाया है। इस पर खर्च हुई राशि ऐसे ही अभियानों पर अन्य देशों द्वारा किए गए खर्च से कम होने से अपने उपग्रह छोड़ने के इच्छुक तमाम देश अब इसरो की सेवा लेने आतुर हैं। इससे इस संगठन की आय भी बढ़ेगी और भविष्य में वह आत्मनिर्भर हो सकेगा। सर्वविदित है कि अमेरिका की असली ताकत विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में की जाने वाली रिसर्च ही है। ऐसे में इसरो द्वारा अंतरिक्ष में किए जाने वाले शोध और अध्ययन भारत को वैश्विक शक्ति के रूप में स्थापित करने में सहायक होंगे ये बात उन सभी को समझनी चाहिए जो चंद्रयान 3 की सफलता पर खुश होने के बजाय वैज्ञानिकों की उपलब्धि को कमतर साबित करने का प्रयास कर रहे हैं।
- रवीन्द्र वाजपेयी
चंद्रयान : विफलता के बाद मिली सफलता ज्यादा आनंद देती है
स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि हमारा सबसे बड़ा नुकसान उस उम्मीद का खो जाना है जिसके जरिए हम खोई हुई हर चीज दोबारा हासिल कर सकते हैं। इसरो ( भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन ) ने संभवतः स्वामी जी की उक्त बात से ही प्रेरणा ली । इसीलिए कुछ वर्ष पूर्व चंद्रमा पर अपना यान उतारने में असफल रहने के बावजूद उम्मीद नहीं छोड़ी और अंततः वह कर दिखाया जो अमेरिका , रूस और चीन तक नहीं कर सके। इन देशों की तुलना में इसरो के पास उपलब्ध संसाधन बेहद सीमित हैं। हमारे देश में अंतरिक्ष कार्यक्रमों हेतु दिया जाने वाला बजट भी अपेक्षाकृत काफी कम है। इसके बावजूद भी इसरो के वैज्ञानिकों ने चंद्रयान को चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर उतारकर पूरी दुनिया में अपनी धाक जमा दी। उल्लेखनीय है चंद्रयान 3 के प्रक्षेपण के बाद रूस द्वारा भी लूना 25 नामक यान छोड़ा जो चंद्रमा की धरती को छूने के पहले ही नष्ट हो गया। उसके कारण इसरो में भी आशंका का माहौल बना किंतु चंद्रयान के सारे उपकरण जिस तरह ठीक से काम कर रहे थे उससे वैज्ञानिकों का आत्मविश्वास भी आसमान छू रहा था। पिछले अभियान की असफलता से निराश हुए बिना इसरो ने गलतियों को सुधारने पर पूरा ध्यान दिया और इसीलिए इस बार शुरु से ही वैज्ञानिक पूरी तरह आश्वस्त नजर आ रहे थे जो कल शाम को निर्धारित समय पर चंद्रयान के चंद्रमा की धरती छूते ही सही साबित हुआ। दक्षिणी ध्रुव के बारे में ये कहा जाता है कि वहां सूर्य की रोशनी कम आती है। फिलहाल वहां उजाला है जो अगले 14 दिन जारी रहेगा और इसी दौरान चंद्रयान के साथ गया प्रज्ञान नामक छोटा सा वाहन सतह पर घूम - घूमकर चित्र खींचकर भेजेगा , जिसने आज अपना काम शुरू भी कर दिया है। इस मिशन का असली उद्देश्य चंद्रमा पर पानी की मौजूदगी का पता लगाना है जिसके आधार पर वहां जीवन की संभावना का पता चल सकेगा। इस अभियान को अंतरिक्ष कार्यक्रम का बड़ा कदम कहा जा सकता है क्योंकि यह चंद्रमा के उस हिस्से से जुड़ गया जहां पहुंचने में अभी तक किसी देश को सफलता नहीं मिली थी। इसीलिए पूरी दुनिया की निगाहें चंद्रयान की सफलता पर लगी हुई थीं। अंतरिक्ष अभियान एक जमाने में अमेरिका और रूस के बीच शीतयुद्ध का कारण भी बने। रूस के यूरी गागरिन सबसे पहले मानव थे जो अंतरिक्ष में गए। बाद में अमेरिका ने नील आर्मस्ट्रांग को चंद्रमा पर उतारकर अपनी श्रेष्ठता साबित की। हालांकि सोवियत संघ के बिखरने के बाद रूस कुछ ठंडा पड़ा जिससे प्रतिस्पर्धा थोड़ी कम हुई किंतु इसी बीच चीन भी बड़े खिलाड़ी के तौर पर उभरा । लेकिन अनेक विकसित देशों को अंतरिक्ष कार्यक्रम सफेद हाथी प्रतीत हुआ और उन्होंने दूसरे देशों की प्रक्षेपण सेवाएं लेकर अपने उपग्रह भेजना शुरू कर दिया। प्रारंभ में भारत भी ऐसा ही कर रहा था। रूस के उपग्रह में उसने राकेश शर्मा नामक अपना पहला अंतरिक्ष यात्री भेजा था । लेकिन इसके अलावा मौसम की जानकारी और संचार सुविधाओं के लिए ही उपग्रह छोड़े जाते रहे। 2014 में मंगल यान के जरिए भारत उसकी कक्षा में पहुंचने वाला पहला एशियाई देश बना । वह सफलता इसलिए महत्वपूर्ण थी क्योंकि वह पहले प्रयास में हासिल हुई। उसके बाद से ही इसरो के प्रति दुनिया का नजरिया बदला और अमेरिका तथा रूस सहित बाकी महाशक्तियों के मन में जो श्रेष्ठता का अभिमान था वह जाता रहा। बीते वर्षों में भारत द्वारा अनेक देशों के उपग्रहों का प्रक्षेपण किया गया जो इसरो का व्यवसायिक पक्ष है। दरअसल विकसित देशों की तुलना में इसरो के जरिए प्रक्षेपण सस्ता होने से छोटे - छोटे देश उसकी सेवाएं लेने लगे। इसी सबसे चंद्रमा पर आरोहण का हौसला जन्मा जो गत दिवस मूर्तरूप ले सका। इसके बाद इसरो अंतरिक्ष में अपने यात्री भेजने के संकेत दे रहा है। सूर्य सहित अन्य ग्रहों तक पहुंचने के कार्यक्रम भी घोषित हो रहे हैं। दरअसल अंतरिक्ष कार्यक्रम केवल अन्य ग्रहों तक पहुंचकर वहां के चित्र लेने तक सीमित नहीं रहा, अपितु पृथ्वी के भविष्य से जुड़े प्रश्नों का उत्तर खोजने की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण हैं। मौसम और संचार के अलावा जासूसी भी इसके माध्यम से होती है। भविष्य में यदि भारत गूगल जैसा अपना सर्च इंजिन विकसित करना चाहे तब उसे अपने उपग्रहों के माध्यम से ऐसा करना सुरक्षित रहेगा । सबसे बड़ी बात ये है कि इसरो की इस सफलता के बाद हमारा अंतरिक्ष कार्यक्रम आत्म निर्भरता के स्तर तक जा पहुंचा है। इसका सबसे बड़ा लाभ ये होगा कि देश के वे युवा वैज्ञानिक जो बेहतर भविष्य की खातिर अमेरिका के अंतरिक्ष संगठन नासा से जुड़ना चाहते हैं , उनके मन में भी अपने देश में रहकर काम करने का भाव उत्पन्न होगा। चंद्रयान 3 की सफलता ने हर भारतीय को आत्मगौरव की अनुभूति का अवसर दिया है। इससे विदेशों में रहने वाले उन भारतीयों में भी मातृभूमि के प्रति सम्मान और लगाव विकसित होने की उम्मीदें बढ़ गई हैं जो भारत को हेय दृष्टि से देखते आए हैं। दुनिया जिस तरह से डिजिटल होती जा रही है उसे देखते हुए उपग्रह सेवा के लिए पूर्ण आत्मनिर्भरता आवश्यक है। आज की दुनिया में डेटा सबसे बड़ी पूंजी बनता जा रहा । इसका भंडार और गोपनीयता दोनों महत्वपूर्ण हैं। उस दृष्टि से इसरो ने जो कामयाबी हासिल की है उसे बड़ी यात्रा के लिए बढ़ाए गए कदम के तौर पर देखा जा सकता है। भले ही आज भी वैज्ञानिक अनुसंधान और तकनीक की दृष्टि से भारत , अमेरिका और रूस जैसे देशों से पीछे हो किंतु चंद्रयान 3 की शानदार कामयाबी के बाद यह अंतर कम हुआ है। भले ही हमारे अंतरिक्ष यात्री उनके स्तर तक न पहुंचे हों किंतु चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर अपना यान उतारने वाला प्रथम देश होने का गौरव अंतरिक्ष विज्ञान के इतिहास में भारत के नाम दर्ज होना बहुत बड़ी बात है। इसरो के समूचे दल को इस ऐतिहासिक क्षण का साक्षी बनाने के लिए हर भारतवासी की ओर से हार्दिक बधाई के साथ भावी सफलताओं के लिए अनंत शुभकामनाएं।
-रवीन्द्र वाजपेयी
Wednesday, 23 August 2023
चीन के लड़खड़ाने का लाभ हमें मिल सकता है बशर्ते .....
बीते कुछ दिनों से चीन की अर्थव्यवस्था के हिचकोले लेने की खबरें आ रही है। मंहगाई और बेरोजगारी बढ़ने के साथ ही निर्यात में भी कमी आने की खबर है। विदेशी पूंजी वियतनाम , सिंगापुर , थाईलैंड और भारत जैसे देशों में स्थानांतरित हो रही है। कोरोना संकट के दौरान विश्व भर में चीन की जो नकारात्मक छवि बनी यह उसका ही प्रभाव है। भारत के बाजार भी चीनी सामान के दबाव से उबर रहे हैं । दवा उद्योग में हुए शोध और अनुसंधान का सुपरिणाम कच्चे माल का आयात घटने के रूप में सामने आया है। लगभग बंद हो चुका घरेलू खिलौना उद्योग भी दोबारा उठ खड़ा हुआ है। उत्पादन के क्षेत्र में भी भारतीय औद्योगिक इकाइयां बेहतर प्रदर्शन करने लगी हैं। जिसके कारण रोजगार के अवसर बढ़ने के साथ ही आयात में कमी आई है। जीएसटी संग्रह में निरंतर वृद्धि भी आर्थिक स्थिति मजबूत होने का संकेत है। वहीं ऑटोमोबाइल और जमीन - जायजाद के व्यवसाय में उछाल से भी अर्थव्यस्था में सुधार हुआ है । ऐसे में वैश्विक स्तर की संस्थाओं द्वारा भारत की विकास दर के बारे में आशाजनक तस्वीर पेश की जा रही हो तब संदेह की गुंजाइश ही नहीं रह जाती। इस बारे में दो बातें उल्लेखनीय हैं। पहली तो कोरोना महामारी के दौरान भारत में आर्थिक , सामाजिक और चिकित्सा क्षेत्र में किया गया बेहतर प्रबंधन और दूसरा यूक्रेन संकट से उत्पन्न वैश्विक परिस्थिति में विदेश और आर्थिक नीतियों में बेहतरीन सामंजस्य। ये बात पूरी दुनिया स्वीकार कर चुकी है कि कोविड काल में भारत जैसे विशाल देश में जरूरी चीजों की आपूर्ति निर्बाध जारी रहने से अराजकता नहीं हुई । लॉक डाउन के दौरान मालवाहक वाहनों को लूटने की एक भी वारदात न होना इसका प्रमाण है । टीकाकरण अभियान तो पूरी दुनिया के लिए मिसाल बन गया। लेकिन कोरोना के जाते ही दुनिया एक नए संकट में फंस गई जब रूस ने यूक्रेन पर हमला कर दिया। पहले - लगा था कि यह लड़ाई जल्दी खत्म हो जायेगी क्योंकि रूस जैसी महाशक्ति के सामने यूक्रेन ज्यादा नहीं टिक पाएगा । लेकिन देखते - देखते दो देशों की लड़ाई ने शीतयुद्ध को पुनर्जीवित कर दिया। अमेरिका और उसके समर्थक देशों ने रूस पर आर्थिक प्रतिबंध लगाने के अलावा यूक्रेन को अस्त्र - शस्त्र के साथ ही आर्थिक सहायता देना शुरू कर दिया। इसकी वजह से लड़ाई डेढ़ साल से चली आ रही है। परिणामस्वरूप दुनिया भर में कच्चे तेल , गैस और खाद्यान्न का संकट पैदा हो गया। कोविड रूपी विपदा का असर पूरी तरह खत्म हो पाता उसके पहले ही आ टपकी इस मुसीबत ने तमाम देशों की अर्थव्यवस्था के लिए दूबरे में दो आषाढ़ वाली स्थिति पैदा कर दी। समूचा यूरोप गैस संकट में फंस गया। रूस और यूक्रेन बड़े खाद्यान्न उत्पादक रहे हैं। ऐसे में इस युद्ध से दुनिया के बड़े हिस्से में अन्न की कमी हो गई। यूक्रेन तो सूरजमुखी का भी सबसे बड़ा निर्यातक है जिसका उपयोग खाद्य तेल बनाने में किया जाता है। रूसी हमलों ने वहां जिस पैमाने पर तबाही मचाई उससे भारत भी अप्रभावित कैसे रह सकता था ? खाद्यान्न तो नहीं किंतु कच्चे तेल का काफी आयात चूंकि रूस से होता रहा इसलिए युद्ध शुरू होते ही चिंता बढ़ने लगी । लेकिन भारत ने अमेरिका के दबाव को नजरंदाज करते हुए तटस्थता की नीति अपनाते हुए रूस के साथ सस्ती दरों पर कच्चे तेल की खरीदी का जो अनुबंध किया उसने अर्थव्यवस्था को लड़खड़ाने से बचा लिया । अन्यथा हालात बेकाबू हो सकते थे। इसी का असर है कि गाड़ी सुचारू रूप से चलती रही । इस दौरान भारत को खाद्यान्न के अलावा अन्य जरूरी वस्तुओं का निर्यात करने का अवसर मिलने से घरेलू उद्योगों को संजीवनी मिल गई क्योंकि डालर के दाम भारतीय रुपए के तुलना में काफी ऊंचे हैं। कोरोना काल के दौरान भारत में ऑटोमोबाइल और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों में लगने वाले सेमी कंडक्टरों की कमी से बड़ी परेशानी हुई। उससे सबक लेकर सरकार ने इनका उत्पादन भारत में ही करने की दिशा में जो पहल की उससे भी अर्थव्यवस्था का विश्वास बढ़ा है। रक्षा उपकरणों की खरीद के साथ उनका निर्यात भारत के बढ़ते कदमों का प्रमाण है। स्थितियां जिस तरह अनुकूल हो रही हैं उनसे एक सुनहरे भविष्य की कल्पना साकार होने की संभावना बढ़ रही है किंतु अभी भी ब्याज दर , टैक्स ढांचा , जीएसटी की विभिन्न दरें और सबसे बड़ा नेताओं और नौकरशाही में व्याप्त भ्रष्टाचार आर्थिक क्षेत्र में गति अवरोधक बने हुए हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी यदि उक्त बुराइयां दूर कर सकें तो अर्थव्यवस्था में अकल्पनीय उछाल आ सकती है। साथ ही केंद्र स्तर पर इस तरह की पहल होना चाहिए जिससे कि मुफ्तखोरी को बढ़ावा देने पर लगाम लगे। जिस युवा शक्ति को श्री मोदी भारत का भविष्य निर्माता मानते हैं उसकी क्षमता का समुचित उपयोग उत्पादकता बढ़ाने में किया जाना समय की मांग है। जहां तक बात चीन की हालत बिगड़ने की है तो उसका कारण वह खुद है क्योंकि उसने अपनी अर्थव्यस्था को तो दुनिया के लिए खोल दिया किंतु राजनीतिक व्यवस्था अभी भी साम्यवादी बेड़ियों में जकड़ी है। बहुराष्ट्रीय कंपनियों के चीन से मोहभंग का कारण पारदर्शिता का अभाव ही है। यदि भारत पूरी तरह से पेशेवर होकर अपने मानव संसाधन को काम पर लगा दे तो अमृत काल अपने नाम को सार्थक साबित कर देगा।
- रवीन्द्र वाजपेयी