Monday, 28 August 2023

आधी आबादी को साधने का दांव शिवराज का तुरुप का पत्ता




म.प्र के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान मैदानी राजनीति के अनुभवी खिलाड़ी बन चुके हैं। इसमें कोई शक नहीं कि प्रदेश की राजनीति में इस समय उनसे मेहनती राजनेता और कोई नहीं है । और ये भी कि उनका चेहरा शहरों के अलावा ग्रामीण क्षेत्रों में भी जाना - पहिचाना है। लंबे समय  से सत्ता में रहने के कारण प्रदेश के प्रत्येक हिस्से में उनका आना - जाना बना रहा । इसलिए  उनकी  छवि उन नेताओं से अलग है जो चुनाव के समय ही चेहरा दिखाते हैं। ये कहना भी गलत नहीं है कि श्री चौहान हर समय खुद को मुकाबले के लिए तैयार रखते हैं। प्रदेश विधानसभा के आगामी चुनाव हेतु कांग्रेस ने ये  माहौल बनाया था कि वह 2018 के परिणाम को  दोहराते हुए भाजपा को सत्ता से दूर कर देगी। कमलनाथ को मुख्यमंत्री पद का दावेदार बनाकर उसने बढ़त लेने की कोशिश की थी । चूंकि भाजपा में नेतृत्व परिवर्तन को लेकर काफी सुगबुगाहट थी इसलिए कांग्रेस को उस पैंतरे से  मनोवैज्ञानिक लाभ होता दिखाई देने लगा किंतु ज्योंही वह अनिश्चितता खत्म हुई त्योंही शिवराज सिंह ने पूरी ताकत से मुकाबले में उतरने का हौसला दिखाते हुए कांग्रेस पर ताबड़तोड़ हमले करने का दांव चला। कांग्रेस ने महिलाओं को 1500 रु. हर महीने देने के साथ ही 500 रु.में गैस सिलेंडर देने का वायदा कर भाजपा पर दबाव बनाने की जो कोशिश की वह श्री चौहान के एक ही वार में फुस्स हो गई जब उन्होंने लाड़ली बहना नामक योजना के अंतर्गत जून महीने से करोड़ों महिलाओं को प्रति माह 1000  रु. देने के साथ ही ये वायदा भी कर दिया कि धीरे - धीरे इसे 3000 रु.तक बढ़ा दिया जावेगा। और गत दिवस भोपाल में प्रदेश भर से एकत्र हुए लाखों महिलाओं के बीच 250 रु. उनके खाते में जमा करवाते हुए कहा कि अब अक्टूबर से उनको 1250 रु. दिए जावेंगे । इस तरह कांग्रेस का वायदा तो हवा में रह गया किंतु शिवराज सिंह ने करोड़ों बहनों के खाते में पैसे जमा करवाना शुरू कर दिया। कांग्रेस इस पैंतरे के सामने असहाय होकर रह गई। गत दिवस उन्होंने सावन के महीने में 450 रु. का गैस सिलेंडर देने की घोषणा कर एक और जबरदस्त चाल चलते हुए कांग्रेस को पिछले पांव पर जाने मजबूर कर दिया। साथ ही सितंबर में बढ़े हुए बिजली बिल माफी के अलावा महिलाओं को नौकरी में 35 फीसदी  आरक्षण  और 100 रु. में बिजली के अलावा महिलाओं के सामूहिक विरोध पर शराब दुकान बंद करने जैसी घोषणा कर आधी आबादी को अपने पाले में खींचने का जो दांव चला उसका कांग्रेस के पास फिलहाल कोई जवाब नहीं है। सबसे बड़ी बात ये है कि कांग्रेस वायदा करती रह गई लेकिन  शिवराज सरकार ने एक कदम आगे बढ़कर वायदे को कार्यरूप में बदलकर अपनी  विश्वसनीयता स्थापित कर ली। अपनी शुरुआती पारियों में श्री चौहान ने लाड़ली लक्ष्मी योजना के जरिए पूरे देश में ख्याति अर्जित की थी। हाल ही में उन्होंने छात्राओं को स्कूटी प्रदान कर युवा मतदाताओं को आकर्षित किया। लाड़ली बहना की पात्र महिलाओं की बेटियों को निःशुल्क शिक्षा की सुविधा का ऐलान भी शिवराज सिंह का बेहद प्रभावशाली कदम है। कुल मिलाकर ये कहा जा सकता है कि मुख्यमंत्री ने औपचारिक तौर पर चुनावी मुकाबला शुरू होने के पहले ही दबाव से बाहर आकर कांग्रेस को रक्षात्मक होने बाध्य कर दिया है। 2018 में भाजपा थोड़े से  अंतर से चूक गई थी जिसके लिए पार्टी के अति आत्मविश्वास को जिम्मेदार ठहराया गया । ऐसा लगता है इस बार मुख्यमंत्री किसी भी प्रकार की खुश फहमी से दूर रहते हुए कोई कसर नहीं छोड़ रहे। इसीलिए वे कांग्रेस के वायदों के जवाब में नई - नई योजनाओं को अमल में लाकर मतदाताओं पर असर छोड़ने में जुटे हैं। और कुछ  समय पहले तक जो  राजनीतिक विश्लेषक ये मानकर चल रहे थे कि इस बार मुकाबला बेहद कड़ा होगा और कांग्रेस मजबूती के  साथ चुनौती पेश करेगी ,  वे भी मानने लगे हैं कि शिवराज सिंह की सक्रियता और आक्रामक शैली ने  कांग्रेस को फिलहाल तो ठहराव की स्थिति में ला दिया है। भाजपा ने 39 प्रत्याशी घोषित करने का निर्णय लेकर भी कांग्रेस पर मनोवैज्ञानिक दबाव बना दिया है। इसमें दो राय नहीं है कि कांग्रेस कुछ महीनों पहले तक जिस आक्रामक अंदाज में नजर आ रही थी उसमें लगातार कमी आ रही है। ये भी महसूस होने लगा है कि कमलनाथ अकेले ही मैदान में जूझ रहे हैं। दूसरी पंक्ति के नेता भी प्रभाव नहीं छोड़ पा रहे। एकमात्र दिग्विजय सिंह ही कांग्रेस के दूसरे चेहरे हैं लेकिन वे जितना  फायदा करते हैं उससे  ज्यादा अपने बयानों से पार्टी को नुकसान पहुंचाते हैं। चुनावों की तारीखों का ऐलान अक्टूबर के पहले सप्ताह में संभावित है। उसके साथ ही आचार संहिता लग जायेगी और तब नए कार्यक्रमों और योजनाओं का ऐलान नहीं हो सकेगा और इसीलिए मुख्यमंत्री बिना समय गंवाए लोक लुभावन घोषणाएं  करते जा रहे हैं। कांग्रेस को उम्मीद थी कि वह सत्ता विरोधी रुझान का लाभ लेकर भाजपा पर हावी हो सकेगी किंतु मुख्यमंत्री ने उल्टे  दबाव कांग्रेस पर बना दिया। हालांकि चुनाव में लगभग दो माह हैं और आज के दौर में राजनीति भी टी - ट्वेंटी क्रिकेट जैसी हो गई है किंतु शिवराज सिंह धीरे - धीरे अपना स्कोर जिस तरह बढ़ा रहे हैं उसका पीछा कांग्रेस किस तरह करती है ये देखने वाली बात होगी।

- रवीन्द्र वाजपेयी 

Saturday, 26 August 2023

अवैध कालोनियों को वैध करना जनहित में किंतु भविष्य में सख्ती जरूरी



म.प्र के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने गत दिवस प्रदेश की 2700 से अधिक अवैध कालोनियों को वैध घोषित कर उनमें रहने वाले लाखों लोगों को राहत की सांस लेने का अवसर प्रदान कर दिया। इनमें अनेक कालोनियां तो दशकों पहले बनाई गई थीं।अपने घर का सपना  साकार करने के लिए निम्न और मध्यम वर्ग के लोगों ने इन कालोनियों में अपनी मेहनत की कमाई निवेश कर दी। स्थानीय निकायों में व्याप्त भ्रष्टाचार के कारण मकानों  के नक्शे भी स्वीकृत हो गए । उसके बाद वोटों की चाहत में जनप्रतिनिधियों ने वहां बिजली के खंबे लगवा दिए । पानी की पाइप लाइन भी पहुंचा दी गई। लेकिन अवैध कालोनी होने से सड़क , नाली बनाने जैसे कार्य रुके  रहे । जिन कालोनाइजरों ने ऐसी कालोनियाँ बनाईं वे तो पैसा कमाकर चलते बने किंतु उनमें रहने वाले अपने आशियाने के उजड़ जाने के मानसिक तनाव में जी रहे थे  ।  लंबे समय से ये मांग उठती आ रही थी कि इन कालोनियों को वैधता प्रदान की जाए। सरकार भी इनको लेकर अपराध बोध से ग्रसित थी क्योंकि उसका अपना अमला ही इसके लिए जिम्मेदार है। यदि स्थानीय निकाय के अधिकारी - कर्मचारी कर्तव्यनिष्ठ हों तो अवैध कालोनी अस्तित्व में आ ही नहीं सकती । इसलिए ये कहना पूरी तरह सही है कि इनका निर्माण सरकारी मशीनरी द्वारा जानबूझकर की गई अनदेखी के चलते हुआ जिसका कारण किसी से छिपा नहीं है। अन्यथा नौकरशाही के ईमानदार रहते किसी की क्या मजाल है कि कालोनी तो बड़ी बात है , एक मकान भी नियम विरुद्ध बना सके। हालांकि इनमें भूखंड खरीदने वाले की भी ये जिम्मेदारी होती है कि वह कालोनी की वैधता जांच ले किंतु वास्तविकता ये है कि साधारण लोग इतनी गहराई में नहीं जाते और कालोनाइजर तथा बिल्डर  की लुभावनी बातों में फंसकर अपना पैसा फंसा देते हैं। अनेक अवैध कालोनियां ऐसी हैं जिनमें रहने वाले नारकीय स्थिति में जिंदगी बसर कर रहे हैं। विकास होना तो दूर रहा  अवैध होने के कारण आशियाना उजड़ने का डर उनको हमेशा सताया करता था। मौजूदा परिस्थितियों में जब सरकारी भूमि पर बसी झुग्गी झोपड़ी हटाने में भी कानूनी से ज्यादा मानवीयता आड़े आती है तब लाखों घरों को उजाड़ने की कल्पना करना भी असंभव प्रतीत होता है। ये देखते हुए मुख्यमंत्री श्री चौहान की सरकार द्वारा अवैध कालोनियों को  वैधता प्रदान करने का फैसला व्यवहारिक तौर पर समझदारी भरा है।  इसका सबसे बड़ा लाभ ये होगा कि एक तो शासन को इनसे करों की  आय होने लगेगी और दूसरा ये कि उनमें रह रहे लाखों लोगों को समुचित विकास का लाभ मिलेगा। मुख्यमंत्री ने ये स्पष्ट कर दिया कि आगे से अवैध कालोनी बनाने नहीं दी जावेगी । लेकिन ऐसा करने के लिए सरकारी मशीनरी में कसावट लाते हुए उसके मन में ये बात बिठानी जरूरी है कि अवैध कालोनी या उस जैसा कोई भी निर्माण होने पर उसके लिए  संबंधित कालोनाइजर और बिल्डर  तो कसूरवार माना ही जाएगा किंतु अवैध निर्माण को न रोकने वाले अधिकारी और उसके अधीनस्थों पर भी कड़ी कार्रवाई होगी। सही बात तो ये है कि अवैध निर्माण और अतिक्रमण हमारे देश में एक प्रवृत्ति के तौर पर विकसित हो गए हैं। अवैध कालोनियां और झोपड़ पट्टियां लाइलाज बीमारी बन गई हैं । शिवराज सरकार ने अवैध कालोनियों को वैध बनाकर जिस मानवीय पहलू को ध्यान में रखा उसकी जरूरत से कोई इंकार नहीं करेगा । लेकिन देखने वाली बात ये भी है कि अवैध कालोनी , बहुमंजिला काम्प्लेक्स और झुग्गियों की बसाहट में नौकरशाही के साथ राजनेताओं की भी महती भूमिका रहती है। ऐसे में राजनीतिक दलों का भी ये दायित्व है कि अवैध निर्माण करवाने वाले कालोनाइजर , बिल्डर और माफिया को संरक्षण देने से परहेज करें। अक्सर देखा गया है कि किसी अवैध निर्माण को तोड़ने के विरोध में नेतागिरी होने लगती है। इसलिए मुख्यमंत्री श्री चौहान का ये कहना पूरी तरह जायज है कि भविष्य में बनने वाली अवैध कालोनी के विरुद्ध पूरी तरह सख्ती बरती जाएगी। इसमें दो मत नहीं है कि समाज के गरीब और निम्न आय वर्ग के लोगों के लिए  अपना  घर बनाना आज भी सपना है। श्री चौहान ने माफिया से खाली कराई गई हजारों एकड़ भूमि गरीबों को पट्टे पर देने की जो घोषणा की वह भी सही निर्णय है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत बेघरबारों को घर देने की जो योजना शुरू की गई उसके सुखद परिणाम आ रहे हैं। मुंबई में  एशिया की सबसे बड़े झोपड़पट्टी धारावी को सुविकसित कर वहां रह रहे लोगों को पक्के मकानों में स्थानांतरित करने की जो योजना है उसको बाकी शहरों में भी लागू किया जाए तो अरबों -  खरबों की सरकारी जमीन का व्यवसायिक उपयोग किया जा सकता है । साथ ही उस पर काबिज गरीब  भी पक्के घरों में जाकर बेहतर जिंदगी जी सकेंगे। शिवराज सरकार ने अवैध कालोनियों से अवैध का ठप्पा हटाकर सामयिक निर्णय लिया है। लेकिन  भविष्य में अवैध कालोनी बनाने जैसी हिमाकत कोई न कर सके उसके लिए शासन और प्रशासन के साथ ही नेताओं को भी सतर्क रहना होगा । अवैध निर्माण कानूनी अपराध होने के साथ ही सामाजिक बुराई भी है जिसे मिटाए बिना शहर , कस्बे और यहां तक कि गांव तक का व्यवस्थित विकास संभव नहीं है।

- रवीन्द्र वाजपेयी 

Thursday, 24 August 2023

कुछ लोगों को देश का गौरवगान भी अच्छा नहीं लगता


चंद्रयान 3 की सफलता पर पूरा देश गौरवान्वित हुआ। इसरो के वैज्ञानिकों ने बीते अनेक वर्षों तक अथक परिश्रम करते हुए भारत को अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में अग्रणी विश्व शक्तियों के समक्ष ला खड़ा किया।चंद्रमा के जिस क्षेत्र में चंद्रयान उतरा उससे अब तक अंतरिक्ष वैज्ञानिक अपरिचित थे । इसलिए यह दुस्साहसिक प्रयास था । लेकिन 23 अगस्त की शाम भारत में उल्लास का अभूतपूर्व सूर्योदय लेकर आई जब चंद्रयान ने चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर धरातल को छू लिया । उसके साथ भेजा गया प्रज्ञान नामक वाहन भी चंद्रमा की धरती पर चहलकदमी करने लगा जिसका काम वहां की भौगोलिक और वातावरण संबंधी जानकारी इसरो को भेजना है। हालांकि ये अभियान  महज दो सप्ताह का है,  लेकिन इसकी सफलता ने अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में हमें वैश्विक दर्जा दिला दिया जो कम महत्वपूर्ण नहीं है। इस सफलता से उत्साहित इसरो ने तत्काल सूर्य की कक्षा में भेजे जाने वाले आदित्य नामक अभियान की भी घोषणा कर दी। चंद्रयान के चंद्रमा पर उतरने का वीडियो अमेरिका की अंतरिक्ष एजेंसी नासा द्वारा  प्रसारित किया जाना जताता  है कि ये अभियान कितना महत्वपूर्ण था। पूरी दुनिया में इसे भारतीय वैज्ञानिकों के शानदार कारनामे के तौर पर देखा गया किंतु हमारे देश में कुछ लोग हैं  जिन्हें  देश का गौरवगान अच्छा नहीं लग रहा। किसी को प्रधानमंत्री द्वारा दक्षिण अफ्रीका से  वैज्ञानिकों को बधाई देने के साथ ही पूरी दुनिया को अंतरिक्ष में भारत की ऊंची छलांग का ब्यौरा देने पर ऐतराज है तो कुछ इस बात को प्रचारित करने में जुट गए कि इसरो की स्थापना किसने और कब की ।  एक तबका ऐसा भी है जिसे लग रहा है कि अंतरिक्ष कार्यक्रमों पर लुटाया जा रहा धन पानी में पैसे फेंकने जैसा है। ये लोग अपनी बात के समर्थन में  दावा कर रहे हैं कि जिन देशों ने अंतरिक्ष कार्यक्रमों पर अनाप - शनाप धन खर्च किया , उन्हें उससे कुछ हासिल नहीं हो सका क्योंकि पृथ्वी से लाखों - करोड़ों किलोमीटर दूर स्थित किसी ग्रह पर काबिज होने के बाद भी वहां रहना संभव नहीं है। एक यू ट्यूबर पत्रकार गत रात्रि इस बात का हिसाब देते रहे कि चंद्रयान पर हुए खर्च से ज्यादा तो प्रधानमंत्री की सुरक्षा पर व्यय होता है। यद्यपि एक वर्ग ऐसा है जिसने इस बात की जरूरत जताई कि इसरो सरीखे संगठनों को दिया जाने वाला बजट और बढ़ना चाहिए। लंबे समय से वहां वेतन नहीं मिलने की बात भी उछली। देश में शोध और विकास ( रिसर्च एंड डेवलपमेंट ) पर कम ध्यान दिए जाने की बात भी जोरदार तरीके से उठी। टीवी चैनलों में चंद्रयान के सफल आरोहण पर आयोजित चर्चा में बजाय वैज्ञानिकों के राजनीतिक नेताओं को बिठाए जाने पर भी बहुतों ने एतराज किया। और ये बात सही भी है क्योंकि नेताओं का पूरा जोर वैज्ञानिकों द्वारा अर्जित सफलता का श्रेय लूटने पर केंद्रित रहा। कुछ लोगों ने इस उपलब्धि का ये कहकर मजाक भी उड़ाया कि अमेरिका तो 50 साल पहले ही अपने अंतरिक्ष यात्री चंद्रमा पर उतार चुका था और हम महज एक यान के वहां पहुंचाकर फूले नहीं समा रहे। कुल मिलाकर देखने पर पता चलता है कि राष्ट्रीय गौरव के विषयों पर भी हम एक सुर में बोलना भूलते जा रहे हैं। गनीमत ये रही कि सेना द्वारा सर्जिकल स्ट्राइक किए जाने के प्रमाण मांगने वाले चंद्रयान के सफल आरोहण का प्रमाण मांगने की हिम्मत नहीं कर सके किंतु अभियान की सफलता का श्रेय लूटने  के अलावा उसकी उपयोगिता और सार्थकता पर जिस तरह से सवाल उठाए गए वह शुभ संकेत नहीं है क्योंकि इससे दुनिया में हमारी छवि खराब होती है। जिस तरह खेलों में किसी खिलाड़ी अथवा टीम के  जीतने पर पूरा देश उसको बधाई देकर प्रोत्साहित करता है ठीक वैसे ही  वैज्ञानिकों की उपलब्धि पर उनकी हौसला अफजाई सामूहिक तौर पर होना चाहिए थी। वैसे भी यदि अंतरिक्ष कार्यक्रम की उपादेयता और उपलब्धियों के बारे में उसी क्षेत्र के जानकार अपनी राय व्यक्त करें तो वह बेहतर होता है। लेकिन विज्ञान के बारे में जानकारी न  रखने वाले भी जब ऐसे मामलों में अपना ज्ञान बघारकर उपदेश देने लगते हैं तो दुख होता है। कुछ लोगों को तो इसरो प्रमुख सहित कुछ वैज्ञानिकों के  तिरुपति देवस्थानम जाकर प्रार्थना किए जाने पर भी आपत्ति हुई। लेकिन उक्त अभियान के प्रमुख सोमनाथन द्वारा  वेदों को  विज्ञान के स्रोत के तौर स्वीकार कर ऐसे लोगों को करारा जवाब दे दिया गया। चंद्रयान 3 की सफलता के लिए श्रेय के अधिकारी यदि हैं तो केवल वे वैज्ञानिक जो अनेक वर्षों से इस अभियान को अपने जीवन का मिशन मानकर जुटे रहे। इस सफलता ने भारत का मान पूरी दुनिया में बढ़ाया है। इस पर खर्च हुई राशि ऐसे ही अभियानों पर अन्य देशों द्वारा किए गए खर्च से कम होने से अपने उपग्रह छोड़ने के इच्छुक तमाम देश अब इसरो की सेवा लेने आतुर हैं। इससे इस संगठन की आय भी बढ़ेगी और भविष्य में वह आत्मनिर्भर  हो सकेगा। सर्वविदित है कि अमेरिका की असली ताकत विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में की जाने वाली रिसर्च ही है। ऐसे में  इसरो द्वारा अंतरिक्ष में किए जाने वाले शोध और अध्ययन भारत को वैश्विक शक्ति के रूप में स्थापित करने में सहायक होंगे ये बात उन सभी को समझनी चाहिए जो चंद्रयान 3 की सफलता पर खुश होने के बजाय वैज्ञानिकों की उपलब्धि को कमतर साबित करने का प्रयास कर रहे हैं।


- रवीन्द्र वाजपेयी 

चंद्रयान : विफलता के बाद मिली सफलता ज्यादा आनंद देती है


स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि हमारा सबसे बड़ा नुकसान उस उम्मीद का खो जाना है जिसके जरिए हम खोई हुई हर चीज दोबारा हासिल कर सकते हैं। इसरो ( भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन ) ने संभवतः स्वामी जी की उक्त बात से ही प्रेरणा ली । इसीलिए कुछ वर्ष  पूर्व चंद्रमा पर अपना यान उतारने में असफल रहने के बावजूद उम्मीद नहीं छोड़ी और अंततः  वह  कर दिखाया जो अमेरिका , रूस और चीन तक नहीं कर सके। इन देशों की तुलना में इसरो के पास उपलब्ध संसाधन बेहद सीमित हैं। हमारे देश में अंतरिक्ष कार्यक्रमों हेतु दिया जाने वाला बजट भी अपेक्षाकृत  काफी कम है। इसके बावजूद भी  इसरो के  वैज्ञानिकों ने चंद्रयान को चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर उतारकर पूरी दुनिया में अपनी धाक जमा दी। उल्लेखनीय है  चंद्रयान 3 के प्रक्षेपण के बाद रूस द्वारा भी लूना 25 नामक यान  छोड़ा  जो चंद्रमा की धरती को छूने के पहले ही नष्ट हो गया। उसके कारण इसरो में भी आशंका का माहौल बना किंतु चंद्रयान के सारे उपकरण जिस तरह ठीक से काम कर रहे थे उससे वैज्ञानिकों का आत्मविश्वास भी आसमान छू रहा था। पिछले अभियान की असफलता से  निराश हुए बिना इसरो ने गलतियों को सुधारने पर पूरा ध्यान दिया और इसीलिए इस बार शुरु से ही वैज्ञानिक पूरी तरह आश्वस्त नजर आ रहे थे जो कल शाम को निर्धारित समय पर चंद्रयान के चंद्रमा की धरती छूते ही सही साबित हुआ। दक्षिणी ध्रुव के बारे में ये कहा जाता है कि वहां सूर्य की रोशनी कम आती है। फिलहाल वहां उजाला है जो अगले 14 दिन जारी रहेगा और इसी दौरान चंद्रयान के साथ गया प्रज्ञान नामक छोटा सा वाहन सतह पर घूम - घूमकर चित्र खींचकर भेजेगा ,  जिसने आज अपना काम शुरू भी कर दिया है। इस मिशन का असली उद्देश्य चंद्रमा पर पानी की मौजूदगी का पता लगाना है जिसके आधार पर वहां जीवन की संभावना का पता चल सकेगा।  इस अभियान को अंतरिक्ष कार्यक्रम का बड़ा कदम कहा जा सकता है क्योंकि यह चंद्रमा के उस हिस्से से जुड़ गया जहां पहुंचने में अभी तक किसी देश को सफलता नहीं मिली थी। इसीलिए पूरी दुनिया की निगाहें चंद्रयान की  सफलता पर लगी हुई थीं। अंतरिक्ष अभियान एक जमाने में अमेरिका और रूस के बीच  शीतयुद्ध का कारण भी बने। रूस के यूरी गागरिन सबसे पहले मानव थे जो अंतरिक्ष में गए। बाद में अमेरिका ने नील आर्मस्ट्रांग को चंद्रमा पर उतारकर अपनी श्रेष्ठता साबित की। हालांकि सोवियत संघ के बिखरने के बाद रूस कुछ ठंडा पड़ा जिससे प्रतिस्पर्धा थोड़ी कम हुई किंतु इसी बीच चीन भी बड़े खिलाड़ी के तौर पर उभरा । लेकिन अनेक विकसित देशों को अंतरिक्ष कार्यक्रम सफेद हाथी प्रतीत हुआ और उन्होंने दूसरे देशों की प्रक्षेपण  सेवाएं लेकर अपने उपग्रह भेजना शुरू कर दिया। प्रारंभ में भारत भी ऐसा ही कर रहा था। रूस के उपग्रह में उसने राकेश शर्मा नामक  अपना पहला अंतरिक्ष यात्री भेजा था । लेकिन इसके  अलावा मौसम की जानकारी और संचार सुविधाओं के लिए ही उपग्रह छोड़े जाते रहे। 2014  में मंगल यान के जरिए भारत उसकी कक्षा में पहुंचने वाला पहला एशियाई देश बना । वह सफलता इसलिए महत्वपूर्ण थी क्योंकि वह पहले प्रयास में हासिल हुई। उसके बाद से ही इसरो के प्रति दुनिया का नजरिया बदला और अमेरिका तथा रूस सहित बाकी महाशक्तियों के मन में जो श्रेष्ठता का अभिमान था वह जाता रहा। बीते वर्षों में भारत द्वारा अनेक देशों के उपग्रहों का प्रक्षेपण किया गया जो इसरो का व्यवसायिक पक्ष है। दरअसल विकसित देशों की तुलना में इसरो के जरिए प्रक्षेपण  सस्ता होने से छोटे - छोटे देश उसकी सेवाएं लेने लगे। इसी सबसे चंद्रमा पर आरोहण का हौसला जन्मा जो गत दिवस मूर्तरूप ले सका। इसके बाद इसरो अंतरिक्ष में अपने यात्री भेजने के संकेत दे रहा है। सूर्य सहित अन्य ग्रहों तक पहुंचने के कार्यक्रम भी घोषित हो रहे हैं। दरअसल अंतरिक्ष कार्यक्रम केवल अन्य ग्रहों तक पहुंचकर वहां के चित्र लेने तक सीमित नहीं रहा,  अपितु पृथ्वी के  भविष्य से जुड़े प्रश्नों का उत्तर खोजने की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण हैं। मौसम और संचार के अलावा जासूसी भी इसके माध्यम से होती है। भविष्य में यदि भारत गूगल जैसा  अपना सर्च इंजिन विकसित करना चाहे तब उसे अपने उपग्रहों के माध्यम से ऐसा करना सुरक्षित रहेगा । सबसे बड़ी बात ये है कि इसरो की इस सफलता के बाद हमारा अंतरिक्ष कार्यक्रम आत्म निर्भरता के स्तर तक जा पहुंचा है। इसका सबसे बड़ा लाभ ये होगा कि देश के वे युवा वैज्ञानिक जो बेहतर भविष्य की खातिर अमेरिका के अंतरिक्ष संगठन नासा से जुड़ना चाहते हैं , उनके मन में भी अपने देश में रहकर काम करने का भाव उत्पन्न होगा। चंद्रयान 3 की सफलता ने हर भारतीय को आत्मगौरव की अनुभूति का अवसर दिया है। इससे विदेशों में रहने वाले उन भारतीयों  में भी मातृभूमि के प्रति सम्मान और लगाव विकसित होने की उम्मीदें बढ़ गई हैं जो भारत को हेय दृष्टि से देखते आए हैं। दुनिया जिस तरह से डिजिटल होती जा रही है उसे देखते हुए  उपग्रह सेवा के लिए पूर्ण आत्मनिर्भरता आवश्यक है। आज की दुनिया में डेटा सबसे बड़ी पूंजी बनता जा रहा । इसका भंडार और गोपनीयता दोनों महत्वपूर्ण हैं। उस दृष्टि से इसरो ने जो कामयाबी हासिल की है उसे बड़ी यात्रा के लिए बढ़ाए गए कदम के तौर पर देखा जा सकता  है। भले ही आज भी वैज्ञानिक अनुसंधान और तकनीक की दृष्टि से भारत , अमेरिका और रूस जैसे देशों से पीछे हो किंतु चंद्रयान 3 की शानदार कामयाबी के बाद यह अंतर कम हुआ है। भले ही हमारे अंतरिक्ष यात्री उनके स्तर तक  न पहुंचे हों किंतु चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर अपना यान उतारने वाला प्रथम देश होने का गौरव अंतरिक्ष विज्ञान के इतिहास में भारत के नाम दर्ज होना बहुत बड़ी बात है। इसरो के समूचे दल को इस ऐतिहासिक क्षण का साक्षी बनाने के लिए हर भारतवासी की ओर से हार्दिक बधाई के साथ भावी सफलताओं के लिए अनंत शुभकामनाएं। 


-रवीन्द्र वाजपेयी 

Wednesday, 23 August 2023

चीन के लड़खड़ाने का लाभ हमें मिल सकता है बशर्ते .....



बीते कुछ दिनों से चीन की अर्थव्यवस्था के   हिचकोले लेने की खबरें आ रही है। मंहगाई और बेरोजगारी बढ़ने के साथ ही निर्यात में भी कमी आने की खबर है। विदेशी पूंजी वियतनाम , सिंगापुर , थाईलैंड और भारत जैसे देशों में स्थानांतरित हो रही है। कोरोना संकट के दौरान विश्व भर में चीन की जो नकारात्मक छवि बनी यह उसका ही प्रभाव है। भारत के बाजार भी चीनी सामान के दबाव से उबर रहे हैं । दवा उद्योग में हुए  शोध और अनुसंधान का सुपरिणाम कच्चे माल का आयात घटने के रूप में सामने आया है। लगभग बंद हो चुका घरेलू खिलौना उद्योग भी दोबारा उठ खड़ा हुआ है। उत्पादन के क्षेत्र में भी  भारतीय औद्योगिक इकाइयां बेहतर प्रदर्शन करने लगी हैं। जिसके कारण रोजगार के अवसर बढ़ने के साथ ही आयात में कमी आई है। जीएसटी संग्रह में निरंतर वृद्धि भी  आर्थिक स्थिति मजबूत होने का संकेत है। वहीं ऑटोमोबाइल और  जमीन - जायजाद के व्यवसाय में  उछाल से भी अर्थव्यस्था  में सुधार हुआ है । ऐसे में   वैश्विक स्तर की संस्थाओं द्वारा भारत की विकास दर के बारे में आशाजनक तस्वीर पेश की जा रही हो तब संदेह की गुंजाइश ही नहीं रह जाती।   इस बारे में दो बातें  उल्लेखनीय हैं। पहली तो कोरोना महामारी के दौरान भारत में आर्थिक , सामाजिक और चिकित्सा क्षेत्र में किया गया बेहतर प्रबंधन और दूसरा यूक्रेन संकट से उत्पन्न वैश्विक परिस्थिति में विदेश  और आर्थिक नीतियों में  बेहतरीन सामंजस्य। ये बात पूरी दुनिया स्वीकार कर चुकी  है कि कोविड काल में भारत जैसे विशाल देश में  जरूरी चीजों की आपूर्ति निर्बाध जारी रहने से अराजकता नहीं हुई । लॉक डाउन के दौरान मालवाहक वाहनों को लूटने की एक भी वारदात न होना इसका प्रमाण है । टीकाकरण अभियान  तो पूरी दुनिया के लिए मिसाल बन गया।  लेकिन कोरोना के जाते ही दुनिया एक नए संकट में फंस गई जब रूस ने यूक्रेन पर हमला कर दिया। पहले - लगा था कि यह लड़ाई जल्दी खत्म हो जायेगी क्योंकि रूस जैसी महाशक्ति के सामने यूक्रेन ज्यादा नहीं टिक पाएगा । लेकिन देखते - देखते दो देशों की लड़ाई ने शीतयुद्ध को पुनर्जीवित कर दिया। अमेरिका और उसके समर्थक देशों ने  रूस पर आर्थिक प्रतिबंध लगाने के अलावा यूक्रेन को अस्त्र - शस्त्र के साथ ही  आर्थिक सहायता देना शुरू कर दिया। इसकी वजह से लड़ाई  डेढ़ साल से चली आ रही है। परिणामस्वरूप दुनिया भर में कच्चे तेल , गैस और खाद्यान्न का संकट पैदा हो गया। कोविड रूपी विपदा का असर पूरी तरह खत्म हो पाता उसके पहले ही आ टपकी इस मुसीबत ने  तमाम देशों की अर्थव्यवस्था के लिए दूबरे में दो आषाढ़ वाली स्थिति पैदा कर दी। समूचा यूरोप गैस संकट में फंस गया। रूस और यूक्रेन बड़े खाद्यान्न उत्पादक  रहे हैं। ऐसे में इस युद्ध से दुनिया के बड़े हिस्से में अन्न की कमी हो गई। यूक्रेन तो सूरजमुखी का भी सबसे बड़ा निर्यातक है जिसका उपयोग खाद्य तेल बनाने में किया जाता है। रूसी हमलों ने वहां  जिस पैमाने पर तबाही मचाई उससे भारत भी  अप्रभावित कैसे रह सकता था ? खाद्यान्न तो  नहीं  किंतु कच्चे तेल का काफी आयात चूंकि रूस से होता रहा इसलिए युद्ध शुरू होते ही चिंता  बढ़ने लगी । लेकिन भारत ने अमेरिका के दबाव को नजरंदाज करते हुए तटस्थता की नीति अपनाते हुए  रूस के साथ सस्ती दरों पर कच्चे तेल की खरीदी का जो अनुबंध किया उसने अर्थव्यवस्था को लड़खड़ाने से बचा लिया । अन्यथा हालात बेकाबू हो सकते थे। इसी का असर है कि गाड़ी सुचारू रूप से चलती रही । इस दौरान भारत को खाद्यान्न के अलावा अन्य जरूरी वस्तुओं का निर्यात करने का अवसर मिलने से घरेलू उद्योगों को संजीवनी मिल गई क्योंकि डालर के दाम भारतीय रुपए के तुलना में काफी ऊंचे हैं। कोरोना काल के दौरान भारत में ऑटोमोबाइल और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों में लगने वाले सेमी कंडक्टरों की कमी से बड़ी परेशानी हुई। उससे सबक लेकर सरकार ने इनका उत्पादन भारत में ही करने की दिशा में जो पहल की उससे भी अर्थव्यवस्था का विश्वास बढ़ा है। रक्षा उपकरणों की खरीद के साथ उनका निर्यात भारत के बढ़ते कदमों का प्रमाण है। स्थितियां जिस तरह अनुकूल हो रही हैं उनसे एक सुनहरे भविष्य की कल्पना साकार होने की संभावना बढ़ रही है किंतु अभी भी ब्याज दर , टैक्स ढांचा , जीएसटी की विभिन्न दरें और सबसे बड़ा नेताओं और नौकरशाही में व्याप्त भ्रष्टाचार   आर्थिक क्षेत्र में गति अवरोधक बने हुए हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी यदि उक्त बुराइयां दूर कर सकें  तो अर्थव्यवस्था में अकल्पनीय उछाल आ सकती है। साथ ही केंद्र स्तर पर इस तरह की पहल होना चाहिए  जिससे कि मुफ्तखोरी को बढ़ावा देने पर लगाम लगे। जिस युवा शक्ति को श्री मोदी भारत का भविष्य निर्माता मानते हैं उसकी क्षमता का समुचित उपयोग उत्पादकता बढ़ाने में किया जाना समय की मांग है। जहां तक बात चीन की हालत बिगड़ने की है तो उसका  कारण वह खुद है क्योंकि उसने अपनी अर्थव्यस्था को तो दुनिया के लिए खोल दिया किंतु राजनीतिक व्यवस्था अभी भी साम्यवादी बेड़ियों में जकड़ी है। बहुराष्ट्रीय कंपनियों के चीन से  मोहभंग का कारण पारदर्शिता का अभाव ही है। यदि भारत पूरी तरह से पेशेवर होकर अपने मानव संसाधन को  काम पर लगा दे तो अमृत काल अपने नाम को सार्थक साबित कर देगा।


- रवीन्द्र वाजपेयी 

Tuesday, 22 August 2023

5 फीसदी मत मिले तो भी कमलनाथ का खेल खराब कर देंगे केजरीवाल




आम आदमी पार्टी के संयोजक और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने बीते रविवार म.प्र के विंध्य अंचल में चुनाव प्रचार किया। पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान उनके साथ थे। इसके पूर्व वे दोनों भोपाल और ग्वालियर में भी रैली कर चुके हैं। पार्टी इसके पहले भी म.प्र में चुनाव लड़ चुकी है किंतु उसे अपेक्षित सफलता नहीं मिली। नगरीय चुनाव में जरूर सिंगरौली में महापौर के साथ ही कुछ जगह उसके पार्षद  जीत गए। गुजरात विधानसभा में इस पार्टी ने  जिस तरह   प्रचार किया उस लिहाज से तो उसे कामयाबी नहीं मिली किंतु उसने कांग्रेस की लुटिया जरूर डुबो दी। कर्नाटक के हालिया  चुनाव में भी उसकी जमानत जप्ती का सिलसिला जारी रहा । इसके पूर्व पंजाब में भारी बहुमत के बावजूद हिमाचल में उसके हाथ पूरी तरह से खाली  रहे। उस समय तक आम आदमी पार्टी भाजपा और कांग्रेस दोनों को अपना दुश्मन मानकर चलती थी । लेकिन दिल्ली की स्थानीय परिस्थितियों ने केजरीवाल एंड कम्पनी की अकड़ निकालकर रख दी और वह कांग्रेस के साथ गठजोड़ के लिए हाथ - पांव मारने लगी। यही नहीं तो जो गैर भाजपाई नेता उसके  द्वारा जारी भ्रष्टाचारियों की सूची में सबसे ऊपर थे उन्हीं के साथ गलबहियां करने  लालायित हो उठी । दिल्ली में नौकरशाहों के तबादले और पद स्थापना को लेकर केंद्र सरकार द्वारा जारी अध्यादेश के बाद जब श्री केजरीवाल को लगा कि वे अकेले नहीं लड़ पाएंगे तब वे विपक्षी गठबंधन का हिस्सा बन गए। लेकिन उक्त अध्यादेश को राज्यसभा में पारित होने से रोकने की उनकी सारी कोशिशें विफल हो गईं। वहीं  दिल्ली तथा पंजाब के कांग्रेस नेताओं तक ने आम आदमी पार्टी के साथ रिश्ता रखने का खुलकर विरोध कर दिया । कांग्रेस के कुछ नेताओं ने तो दिल्ली की सभी सातों लोकसभा सीटों पर चुनाव लड़ने का ऐलान तक कर दिया ।  इस घटनाक्रम के बाद श्री केजरीवाल और श्री मान का म.प्र के दौरे पर आकर चुनाव प्रचार करना इस बात का संकेत है कि अध्यादेश को राष्ट्रपति की मंजूरी मिलने के बाद आम आदमी पार्टी का विपक्षी एकता के प्रति नजरिया बदलने लगा है। विंध्य के दौरे में श्री केजरीवाल ने  मुफ्त बिजली , बेरोजगारी भत्ता के साथ विद्यालय और अस्पताल जैसे वायदे ही किए किंतु उनकी विधानसभा चुनाव में मौजूदगी निश्चित रूप से कांग्रेस के लिए नुकसानदेह होगी , जिसका अनुभव गुजरात में हो चुका है। हालांकि हिमाचल और कर्नाटक में आम आदमी पार्टी के मैदान में होने के बावजूद कांग्रेस को सफलता मिली किंतु उसका कारण ये रहा कि उसने  पंजाब पर ज्यादा ध्यान दिया वहीं कर्नाटक में जनता दल (से) की उपस्थिति ने उसके लिए जगह नहीं बनने दी । लेकिन  इस वर्ष के अंत तक जिन तीन राज्यों मसलन म.प्र , छत्तीसगढ़ और राजस्थान में  विधानसभा चुनाव होने वाले हैं वहां की राजनीति अभी तक कांग्रेस और भाजपा के बीच ही सीमित रही है । सपा , बसपा या ऐसी ही कुछ ताकतें मैदान में आईं किंतु उनको ज्यादा समर्थन नहीं मिला । उस दृष्टि से आम आदमी पार्टी चूंकि दिल्ली  के साथ ही पंजाब में  भी सत्ता में आ गई है इसलिए वह तीसरी ताकत के तौर पर उक्त तीनों राज्यों में हाथ आजमाकर 2024 के महा मुकाबले के लिए अभ्यास करना चाह रही है। श्री केजरीवाल जानते हैं कि इन तीनों में सरकार बनाना तो दूर रहा उनकी पार्टी मान्यता प्राप्त विपक्ष तक नहीं बन सकेगी । लेकिन इससे उत्तर भारत में बतौर राष्ट्रीय पार्टी उसका संज्ञान लिया जाने लगेगा और जो मतदाता भाजपा विरोधी और कांग्रेस से निराश हैं वे उसे विकल्प के रूप में स्वीकार कर लेंगे। इस लिहाज से श्री केजरीवाल का म. प्र दौरा  मायने रखता है क्योंकि उक्त तीनों में से यही ऐसा राज्य है जहां भाजपा सत्तासीन है।  आम आदमी पार्टी यहां जितने मत बटोरेगी उसका बड़ा हिस्सा कांग्रेस के खाते से ही निकलेगा। इसीलिए ये चौंकाने वाली बात है कि इंडिया नामक गठबंधन में शामिल रहने के बाद भी श्री केजरीवाल ने कांग्रेस का लिहाज किए बिना म.प्र में मोर्चा खोल दिया। छत्तीसगढ़ और राजस्थान में भी उनकी पार्टी सक्रिय है। दूसरी तरफ जिस कांग्रेस ने संसद में दिल्ली अध्यादेश का खुलकर विरोध करते हुए आम आदमी पार्टी को  समर्थन दिया वह भी इस रवैए को लेकर हतप्रभ है। वैसे जहां तक बात श्री केजरीवाल की है तो वे मौजूदा राजनीति के सबसे चालाक नेता हैं जो केवल अपने फायदे से  मतलब रखते हैं । इसलिए कांग्रेस उनको राष्ट्रीय स्तर पर अपने साथ रखकर यदि सोचती हो कि उनका उपयोग कर लेगी तो इससे बड़ी गलतफहमी दूसरी नहीं हो सकती। श्री केजरीवाल को ये बात अच्छी तरह पता है कि राहुल गांधी को ताकतवर बनाने से उनकी संभावनाएं प्रभावित हो सकती हैं इसलिए वे कांग्रेस के साथ रहकर भी उसे कमजोर करने का कोई अवसर नहीं छोड़ेंगे। ऐसे में म.प्र विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी यदि 5 फीसदी मत भी ले गई तो कांग्रेस के लिए बड़े नुकसान का कारण बनेगी । 2018 में सत्ता से बाहर होने के बाद भी भाजपा को कांग्रेस से 1 प्रतिशत ज्यादा मत मिले थे। ऐसे में केजरीवाल एंड कं. ने वाकई  गुजरात जैसा आक्रामक चुनाव लड़ा तब वे कमलनाथ की महत्वाकांक्षाओं पर पानी फेर देंगे जो बीते लगभग चार साल से अपनी खोई हुई सत्ता हासिल करने के लिए जी तोड़ मेहनत कर रहे हैं।


- रवीन्द्र वाजपेयी 

Monday, 21 August 2023

दिग्विजय अभी भी कांग्रेस का बंटाधार कराने पर आमादा




म.प्र के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह कुछ न कुछ ऐसा कह देते हैं जो कांग्रेस के लिए मुसीबत बन जाता है। प्रदेश में विधानसभा चुनाव की रणभेरी बज उठने के बाद  वरिष्ट राजनेताओं से अपेक्षा की ही जाती है कि ऐसा कुछ न कहें जिससे समाज का वातावरण खराब हो। लेकिन दस साल तक मुख्यमंत्री रहने के बाद भी श्री सिंह  इस तरफ ध्यान नहीं देते और गाहे बगाहे विवादास्पद बयान देकर अपनी छवि खराब करने के साथ ही कांग्रेस के लिए भी मुसीबतें पैदा करने से बाज नहीं आते। विगत दिवस उन्होंने ये कहते हुए सनसनी फैलाने का प्रयास किया कि भाजपा प्रदेश में हरियाणा के नूंह जैसी घटना को अंजाम देने की कोशिश कर रही है। पूर्व मुख्यमंत्री होने के साथ ही श्री सिंह  संगठन के जिम्मेदार पदों पर रहे हैं। वर्तमान में राज्यसभा के सदस्य भी हैं। राजनीतिक प्रतिद्वंदिता के चलते आरोप - प्रत्यारोप अपनी जगह हैं लेकिन जब श्री सिंह ने इतना गंभीर आरोप लगा दिया है  तब उनको चाहिए था पुलिस महानिदेशक से मिलकर ठोस प्रमाण भी देते। लेकिन  उनमें दायित्वबोध का सदैव अभाव रहा है और इसीलिए  चुनाव जैसे संवेदनशील समय में उन्होंने दंगे कराए जाने जैसी बात उछाल दी। नूंह में हुए दंगे का असर  कुछ -  कुछ  पड़ोसी राज्य उ.प्र और राजस्थान में भी हुआ किंतु जनता की समझदारी से जल्द ही हालात सामान्य हो गए । ये बात भी सामने आ गई कि उनमें रोहिंग्या मुसलमानों का हाथ था । वर्तमान में  म.प्र का सांप्रदायिक माहौल पूरी तरह शांत है। सिमी प्रभावित इलाकों में लगातार देश विरोधी तत्वों की धरपकड़ के अलावा माहौल बिगाड़ने वालों पर की गई सख्ती भी कारगर रही है। हाल ही में मोहर्रम और सावन के अवसर पर  पड़ने वाले त्यौहार एक साथ सम्पन्न हुए । यद्यपि कुछ स्थानों पर नूंह जैसी हरकत की गई किंतु उस पर तत्काल काबू कर स्थिति बिगड़ने से बचा ली गई। ये देखते हुए श्री सिंह न जाने किस आधार पर आरोप लगा रहे हैं कि भाजपा म.प्र में भी नूंह जैसा उत्पात करवाने की कोशिश में है। दो दिन पूर्व भोपाल में कांग्रेस द्वारा आयोजित अधिवक्ताओं के सम्मेलन में उन्होंने भाजपा पर घिसे - पिटे आरोप लगाते हुए कहा कि  आगामी विधानसभा चुनाव में पराजय के भय से वह दंगा करवा सकती है। साथ ही  मुसलमानों के प्रति भाजपा के रवैए की भी आलोचना कर डाली ।  पूर्व मुख्यमंत्री होने के नाते  उनका फर्ज  था कि दंगे कराने की  भनक लगते ही कानून व्यवस्था बनाए रखने वाली एजेंसी को उसकी जानकारी देते। ऐसा करने पर निश्चित तौर पर उनकी परिपक्वता और एक जिम्मेदार नागरिक की भूमिका प्रमाणित होती। लेकिन उन्होंने  हवा में  तीर चलाने की अपनी आदत के अनुरूप ही आरोप लगा डाले। फिलहाल  प्रदेश में सांप्रदायिक सद्भाव कायम है। समय - समय पर इसे बिगाड़ने की जो हिमाकत हुई  उसे निष्फल कर दिया गया। उल्लेखनीय है  प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ भाजपा से मुकाबले हेतु  बेहद चतुराई से नर्म हिंदुत्व का सहारा लेते हुए मंदिरों  - मठों में मत्था टेकने के साथ ही बाबाओं की अभ्यर्थना में लगे  हैं। छिंदवाड़ा में बागेश्वर धाम के महंत धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री की आरती उतारे जाने पर विपक्षी गठबंधन में शामिल कुछ दलों ने उस पर सवाल भी उठाए क्योंकि श्री शास्त्री खुले आम  हिन्दू राष्ट्र की वकालत करते हैं। लेकिन  श्री नाथ से जब इस बारे में पूछा गया तो उन्होंने  देश सभी का होने की बात तो कही किंतु ये भी स्वीकारा कि 82 फीसदी हिंदुओं के रहते ये देश हिन्दू  ही तो है। हाल ही में श्री नाथ ने  उज्जैन स्थित महाकालेश्वर में पूजा अर्चना करने के अवसर पर सरकार बनने के बाद  पहली कैबिनेट बैठक उज्जैन में करने की घोषणा तक कर डाली। लेकिन एक तरफ जहां हिन्दू मतदाताओं को लुभाने वे कांग्रेस की घोषित नीतियों तक की अवहेलना कर रहे हैं वहीं उसके दूसरे बड़े नेता दिग्विजय  हिंदुओं को  भाजपा के पक्ष में  ध्रुवीकृत होने उकसा रहे हैं।  कभी -  कभी तो लगता है चर्चा में बने रहने के लिए वे इस तरह के बयान देते हैं । लेकिन इतने अनुभवी नेता को  समझना चहिए कि  ऐसी  टिप्पणियों से कांग्रेस को देश भर में शर्मिंदगी झेलनी पड़ती है। आतंकवादियों के प्रति सम्मानजनक संबोधन के अलावा भारतीय सेना से सर्जिकल स्ट्राइक कर प्रमाण मांगने जैसी उनकी बातों से तो पार्टी तक ने पल्ला झाड़ लिया था। ये देखते हुए  कांग्रेस को चाहिए दिग्विजय सिंह को चुप रहना सिखाए वरना वे कांग्रेस का बंटाधार करवाने से बाज नहीं आयेंगे।


-रवीन्द्र वाजपेयी