Saturday, 9 September 2023

जी - 20 : वैश्विक नेतृत्व की ओर भारत के बढ़ते कदम



दिल्ली में जी - 20 का सम्मेलन प्रारंभ हो गया। इसमें अमेरिका , फ्रांस , ब्रिटेन ,इटली , बांग्लादेश, जापान , दक्षिण कोरिया , ऑस्ट्रेलिया , ब्राजील ,जर्मनी , मॉरीशस , सिंगापुर , यूरोपियन यूनियन , स्पेन , चीन , अर्जेंटीना आदि के राष्ट्रपति , उपराष्ट्रपति या प्रधानमंत्री शिरकत कर रहे हैं। संरासंघ के बाद ये सबसे बड़ा वैश्विक संगठन है जिसमें बड़ी आर्थिक और सामरिक शक्तियों के साथ ही विकासशील देश भी शामिल हैं । भूमंडलीकरण और उदार अर्थव्यवस्था के चलन में आने के बाद से शीतयुद्ध की बजाय अब आपसी सहयोग से आर्थिक विकास की सोच ने जन्म ले लिया। यही वजह है कि अमेरिका , रूस , चीन जैसे परस्पर विरोधी मानसिकता के देश भी जी - 20 में शामिल हैं।  भारत में इस सम्मेलन की तैयारियां उसी समय से शुरू हो गईं थीं जब उसे इसकी अध्यक्षता का दायित्व प्राप्त हुआ। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी किसी भी आयोजन में भव्यता के साथ उसे  प्रबंधन कौशल का उदाहरण बनाने के लिए प्रसिद्ध हैं। इसीलिए बीते काफी महीनों से देश के विभिन्न राज्यों में जी - 20 की तैयारियों संबंधी बैठकें आयोजित की गईं । इसका लाभ ये हुआ कि उन राज्यों में पर्यटन एवं विदेशी पूंजी निवेश की संभावनाएं उत्पन्न हुईं। श्रीनगर में जी - 20 की बैठक का आयोजन चीन और पाकिस्तान को ये संदेश देने के लिए किया गया कि जम्मू - कश्मीर , भारत का अविभाज्य अंग है और इस बारे में किसी शक की गुंजाइश न रहे। भारत का ये दांव कारगर रहा और चीन तथा पाकिस्तान  दोनों ने उस कदम का विरोध किया। दिल्ली में बने कन्वेंशन सेंटर को देखकर जी - 20 में शामिल अनेक देश ये देखकर चिंतित हो उठे कि वे इतना  शानदार और सुव्यवस्थित आयोजन शायद ही कर पाएं। बहरहाल आर्थिक , पर्यावरण , स्वास्थ्य , शिक्षा  , अंतरिक्ष , भुखमरी , आवास जैसी वैश्विक समस्याओं पर एक समन्वित दृष्टिकोण विकसित करने में जी - 20 एक महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन कर सकता है। हालांकि यूक्रेन संकट के कारण रूस के राष्ट्रपति पुतिन और हाल ही में जारी नक्शे में अरुणाचल को अपना हिस्सा बताए जाने पर भारत के विरोध की वजह से चीन के राष्ट्रपति जिनपिंग नई दिल्ली नहीं आए किंतु बाकी महाशक्तियों का शीर्ष नेतृत्व जिस संख्या में इस सम्मेलन में  शामिल हो रहा है वह इस संगठन के महत्व के साथ वैश्विक मंचों पर भारत की बढ़ती हैसियत और अहमियत का प्रमाण है। इस सम्मेलन के जरिए  विश्व भर के नेताओं को भारत की प्रगति और क्षमता से परिचित करवाने में सफलता मिली है। यह आयोजन संरासंघ की सुरक्षा परिषद में भारत की स्थायी सदस्यता के लिए समर्थन जुटाने में सहायक बनेगा। अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडेन ने इस मुहिम से सहमति दिखाकर ये संकेत दे दिया है कि उसके समर्थक अन्य देश भी भारत के साथ खड़े होंगे। चीन के राष्ट्रपति राष्ट्रपति जिनपिंग ने दिल्ली न आकर अपना ही कूटनीतिक नुकसान किया है । जिस सम्मेलन में अमेरिका , फ्रांस , ब्रिटेन और जापान के राष्ट्रप्रमुख शामिल हों उससे दूरी बनाने का जिनपिंग का निर्णय उनके मन में आए अपराधबोध का संकेत है। बहरहाल सम्मेलन में लिए गए निर्णयों और प्रस्तावों की जानकारी तो बाद में मिलेगी किंतु इसके माध्यम से प्रधानमंत्री ने भारत की जो मार्केटिंग की है उसके सकारात्मक परिणाम आने शुरू हो गए हैं। विशेष रूप से अमेरिका के साथ विभिन्न क्षेत्रों में जिस प्रकार के समझौते , अनुबंध और सौदे हो रहे हैं उनसे काफी उम्मीदें हैं। फ्रांस, ब्रिटेन और जापान के अलावा कोरिया आदि के साथ  भारत के आर्थिक कारोबार को भी  इस सम्मेलन से  नई दिशा मिलेगी। सबसे बड़ी बात ये है कि दुनिया भर के राष्ट्रप्रमुख इस सम्मेलन के दौरान भारत की आयोजन क्षमता , आर्थिक प्रगति और प्रबंधन कौशल का तो प्रत्यक्ष दर्शन करेंगे ही उसके साथ  ही देश की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत एवं विविधता से भी परिचित होंगे। देश में आधारभूत ढांचे में आए सुधार के कारण विदेशी निवेश की संभावनाएं जिस तरह बढ़ी हैं उसे देखते हुए इस सम्मेलन से काफी उम्मीदें हैं। भारत की मजबूत संसदीय प्रणाली , सशक्त न्यायपालिका और विज्ञान के क्षेत्र में  विश्व स्तर की सफलताओं से इस समय पूरी दुनिया प्रभावित है। अन्यथा अमेरिका , फ्रांस ,  ब्रिटेन और जापान के राष्ट्रप्रमुख जी - 20 सम्मेलन में स्वयं नहीं आते।  पाकिस्तान के लिए भी ये सम्मेलन बेहद पीड़ादायक है। जो पश्चिमी ताकतें लंबे समय तक उसे पालती - पोसती रहीं वे अब भारत के बढ़ते आभामंडल से प्रभावित हैं। कुल मिलाकर ये सम्मेलन ऐसे समय हो रहा है जब दुनिया कोरोना महामारी से उबरकर एक नई वैश्विक व्यवस्था के सृजन में लगी हुई है। भारत इसका  नेतृत्व करने की दिशा में आगे बढ़ा है इससे हर भारतवासी को आत्मगौरव की अनुभूति हो रही है।


- रवीन्द्र वाजपेयी 


Friday, 8 September 2023

एशिया में चीन का विकल्प बन रहा भारत : आसियान से मिला संकेत



किसी भी देश की विदेश नीति चूंकि  राष्ट्रीय हितों पर आधारित होती है , इसलिए सरकार बदलने पर भी  उसमें आधारभूत परिवर्तन नहीं होता।  मौजूदा केंद्र सरकार ने आसियान देशों के साथ जिस तरह से नजदीकी रिश्ते बनाकर उनसे राजनयिक , आर्थिक और सामरिक साझेदारी बढ़ाई उसका नजारा दो दिन पहले प्रधानमंत्री श्री मोदी की इंडोनेशिया  यात्रा के दौरान दिखाई दिया जहां वे  भारत - आसियान की बैठक में बतौर सह अध्यक्ष शामिल हुए और उसके बाद पूर्व एशिया सम्मेलन में शिरकत की। इन आयोजनों का महत्व उनमें  अमेरिका की उपराष्ट्रपति कमला हैरिस की मौजूदगी से प्रदर्शित होता है। उल्लेखनीय है आसियान संगठन का सदस्य नहीं होने के बावजूद भारत उससे जुड़ा है । चीन की विस्तारवादी नीतियों के विरोध में एक सशक्त क्षेत्रीय गठबंधन बनाने में भारत की भूमिका को आसियान देश स्वीकार कर रहे हैं । इसीलिए ऐसे समय जब भारत में जी - 20 देशों के सम्मेलन की तैयारियां अंतिम चरण में थीं , श्री मोदी कुछ घंटों के लिए जकार्ता गए । चूंकि चीन के राष्ट्रपति जिनपिंग इस जी - 20 सम्मेलन में नहीं आ रहे इसलिए भारत के प्रधानमंत्री की आसियान सम्मेलन में उपस्थिति ने बड़ा कूटनीतिक संदेश दे दिया है । जो जानकारियां उपलब्ध हैं  उनके मुताबिक चीन अपने दक्षिणी समुद्र में  बेजा कब्जा बढ़ाने के साथ ही छोटे - छोटे देशों  को पिछलग्गू बनाकर उनका शोषण करना चाहता है । लेकिन आसियान में शामिल देशों ने चीन की चाल में आने से मना कर दिया । भारत ने इस अवसर का  लाभ उठाते हुए उनके सिर पर हाथ रखते हुए चीन के दबाव के सामने न झुकने का हौसला दिया। कोरोना के बाद बदली वैश्विक परिस्थितियों में चीन के प्रति दुनिया भर में अविश्वास का भाव बढ़ने से बड़ी संख्या में बहुराष्ट्रीय कंपनियां अपना कारोबार और निवेश वहां से समेट रही हैं। चूंकि दक्षिण पूर्वी एशियाई देशों में श्रमिक सस्ते हैं इसलिए आसियान और भारत पर उनकी नजर है। दूसरी बात ये है कि चीन से होने वाले आयात में कमी करने के साथ भारतीय उत्पादों के निर्यात में वृद्धि के लिए आसियान देश काफी उपयुक्त हैं जिनसे भारत का द्विपक्षीय व्यापार तेजी से बढ़ता जा रहा है । इसीलिए श्री मोदी , जी -20 की व्यस्तता के बावजूद जकार्ता गए और भारत - आसियान सम्मेलन के अलावा पूर्व एशिया सम्मेलन में  प्रभावशाली उपस्थिति दर्ज करवाई।  कुछ घंटों की जकार्ता यात्रा में उन्होंने चीन विरोधी दक्षिण एशियाई देशों को भारत के समर्थन और सहारे का भरोसा तो दिलाया ही लेकिन इसी के साथ  जी - 20  सम्मेलन में शामिल हो रहे राष्ट्राध्यक्षों को ये संदेश भी दे दिया कि भारत एक क्षेत्रीय महाशक्ति के तौर पर उभर रहा है। ऐसा करना इसलिए जरूरी है क्योंकि अभी तक वैश्विक मंचों पर एशिया के सिरमौर के तौर पर चीन को ही मान्यता मिली हुई थी। अमेरिका जैसी महाशक्ति तक उसके आभामंडल से प्रभावित हो गई। लेकिन बीते कुछ सालों में विशेष रूप से कोरोना के बाद से उक्त अवधारणा बदलने लगी । चीन के दक्षिणी समद्री क्षेत्र में उसकी विस्तारवादी नीतियों के विरुद्ध बने क्वाड नामक संगठन में अमेरिका , आस्ट्रेलिया और जापान के साथ भारत को शामिल किया जाना चीन को ये संकेत था कि दुनिया अब भारत को उसके विकल्प के तौर पर देखने लगी है। आसियान और पूर्व एशिया सम्मेलन में प्रधानमंत्री श्री मोदी के जाने से उक्त संदेश और मुखर हुआ है। दिल्ली में जी - 20 सम्मेलन में अमेरिका , फ्रांस और ब्रिटेन जैसी बड़ी शक्तियों की उपस्थिति से  भारत का कूटनीतिक महत्व बढ़ा है। भारत - आसियान बैठक और पूर्व एशिया सम्मेलन के तत्काल बाद जी - 20 का आयोजन विश्व स्तर पर दक्षिण एशिया की बढ़ती अहमियत और जरूरत का भी प्रमाण है। और इन सभी आयोजनों में भारत और श्री मोदी की सक्रिय भूमिका से विदेश नीति के  साथ ही आर्थिक और सामरिक मोर्चे पर भी हमारा महत्व और प्रभुत्व बढ़ा है। इस बारे में ये बात विचारयोग्य है कि महाशक्ति बनने के लिए क्षेत्रीय शक्ति बनना आवश्यक होता है। उस दृष्टि से आसियान  देशों के बीच भारत की बड़े भाई वाली भूमिका ने वैश्विक स्तर हमारी साख और धाक दोनों में वृद्धि की है। रूसी राष्ट्रपति पुतिन तो यूक्रेन के साथ चल रहे युद्ध के कारण जी - 20 सम्मेलन में नहीं आ रहे लेकिन चीन के राष्ट्रपति जिनपिंग का नहीं आना निश्चित रूप से ये दर्शाने के लिए पर्याप्त है कि भारत द्वारा इस आयोजन की शानदार मेजबानी से बीजिंग के पेट में मरोड़ शुरू हो गया है। यद्यपि इसके पहले भी भारत अनेक अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनों का आयोजक बन चुका है लेकिन जिस भव्यता और आत्मविश्वास के साथ जी - 20 का सम्मेलन हो रहा है उसके कारण भारत की क्षमता और कूटनीतिक दक्षता नए कलेवर में उभरकर सामने आ रही है। चंद्रयान की  ऐतिहासिक सफलता और फिर सूर्य के अध्ययन हेतु अपने अंतरिक्ष यान के सफल प्रक्षेपण के तत्काल बाद जी - 20 का आयोजन हमारे बढ़ते कद का  प्रभाव है। प्रधानमंत्री श्री मोदी ने भारतीय विदेश नीति को उसके सर्वोच्च स्तर तक पहुंचा दिया है।

- रवीन्द्र वाजपेयी 


Wednesday, 6 September 2023

जब भारत मां को इंडिया मम्मी नहीं कहा जाता तब भारत को इंडिया क्यों ?



जी - 20 देशों के सम्मेलन के लिए राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू द्वारा दिए गए निमंत्रण पत्र में प्रेसिडेंट आफ भारत लिखे जाने पर वे विपक्षी दल आग बबूला  हैं जिन्होंने हाल ही में  भाजपा विरोधी एक गठबंधन बनाया है जिसका अंग्रेजी नाम संक्षिप्त में इंडिया  है। उनके अनुसार सरकार चूंकि इस नाम से डर गई है लिहाजा संविधान में प्रयुक्त देश के अंग्रेजी नाम इंडिया की जगह उक्त  निमंत्रण पत्र में भारत शब्द का इस्तेमाल किया गया जबकि अभी तक अंग्रेजी के किसी भी सरकारी दस्तावेज में इंडिया ही लिखा जाता रहा।  ये प्रचार भी शुरू कर दिया गया कि 18 सितंबर से प्रारंभ होने जा रहे संसद के विशेष सत्र में संविधान के प्रारंभ में  देश का नाम इंडिया जो कि भारत है ,को बदल दिया जाएगा। और  ये तिथि इसलिए चुनी गई क्योंकि संविधान सभा में भी इसी तारीख को इंडिया और भारत नाम रखे जाने पर बहस हुई थी।  दरअसल  विशेष सत्र की घोषणा ने सभी को आश्चर्यचकित कर दिया। स्वाभाविक तौर पर ये जानने की उत्सुकता हुई कि उसके पीछे का उद्देश्य क्या है ? उम्मीद है जी - 20 समाप्त होने के बाद सरकार इस बारे में स्थिति स्पष्ट करेगी। विपक्ष इसलिए भी परेशान क्योंकि लोकसभा चुनाव के कुछ महीने पहले  विशेष सत्र बुलाने के पीछे प्रधानमंत्री का चुनावी पैंतरा हो  सकता है। बहरहाल जहां तक बात इंडिया की जगह भारत शब्द का उपयोग करने की है तो इसे लेकर बवाल मचाने वालों की बुद्धि पर तरस आता है। ऐसा जाहिर किया जा रहा है मानो संविधान से इंडिया हटा दिया गया तो जो भारत बचेगा वह भाजपा या नरेंद्र मोदी के नाम लिख जायेगा। इंडिया शब्द की उत्पत्ति कब , कहां और कैसे हुई इसका भी इतिहास खंगाला जा रहा है। लेकिन संविधान सभा में जिन लोगों ने भारत के साथ इंडिया नाम रखे जाने का विरोध किया था उनमें स्व.हरि विष्णु कामथ और स्व.सेठ गोविंद दास जैसे लोग थे जिनकी प्रतिभा और देशभक्ति पर शंका नहीं की जा सकती। बहस और विवाद तो हिन्दू शब्द पर भी होते हैं। जिसके बारे में दावा है विदेशी चूंकि स को ह उच्चारित करते थे इसलिए सिंधु नदी के इस पार वाले क्षेत्र को हिंदुस्तान नाम दे दिया। कुछ लोग वेदों में हिमालय से समुद्र के बीच के क्षेत्र को भारत कहे जाने वाले श्लोक को बतौर प्रमाण पेश करते हैं। जैन दर्शन के साथ ही दुष्यंत और शकुंतला के पुत्र भरत के नाम पर देश का नाम भारत रखे जाने की बात भी उठ रही है। और भी अनेक संदर्भ सामने लाए जा रहे हैं। इन सबको विमर्श में शामिल किए जाने में कुछ भी बुराई नहीं है क्योंकि नई पीढ़ी इसके माध्यम से बहुत सारी वे बातें जान सकेगी जिनसे अन्यथा वह अनजान रहती। वैसे , जो लोग राष्ट्रपति द्वारा अंग्रेजी में छपे निमंत्रण पर प्रेसिडेंट ऑफ भारत लिखने पर छाती पीट रहे हैं उसकी असली वजह रास्वसंघ प्रमुख डा. मोहन भागवत द्वारा दो - तीन दिन पहले इंडिया की जगह भारत शब्द का इस्तेमाल किए जाने की अपील थी। संघ के घोषित उद्देश्यों में भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाना भी है। ये महज संयोग है या सुनियोजित , ये कहना तो कठिन है लेकिन भारत शब्द के उपयोग पर आसमान सिर पर उठा लेने का औचित्य समझ से परे है। यदि मान लें कि मोदी सरकार संविधान में इंडिया हटाकर केवल भारत रखने की सोच रही है तो इसमें बुराई क्या है? सही बात तो ये है  कि संविधान में  भारत के साथ इंडिया नाम रखा जाना किसी भी दृष्टि से उचित अथवा आवश्यक नहीं था।  आजादी के आंदोलन में भी हिंदुस्तान और भारत जैसे शब्द ही उपयोग होते  थे। ऐसे में संविधान में इंडिया को भारत पर प्रमुखता देना अंग्रजों को खुश करने के लिए किया गया लगता है। रही बात संविधान में  बदलाव की तो उसमें न जाने कितने संशोधन किए जा चुके हैं । यहां तक कि उसकी प्रस्तावना में भी  आपातकाल लगाए जाने के बाद 1976 में  धर्म निरपेक्ष शब्द जोड़ा गया। सवाल उठता है कि पंडित नेहरू जैसे धर्म निरपेक्षता के पैरोकार ने उस समय उसकी जरूरत नहीं समझी जबकि देश को आजादी सांप्रदायिक हिंसा के बीच प्राप्त हुई थी । और भी सवाल हैं जिन पर आजादी के 75 वर्षों बाद भी चर्चा नहीं हुई तो इतिहास के अनेक अध्याय बिना खुले ही रह जायेंगे। जिन लोगों को इंडिया की जगह भारत के उपयोग पर ऐतराज हो रहा है उनको ये नहीं भूलना चाहिए कि जिस तरह हिंदुस्तान नाम को विदेशियों द्वारा दिए जाने से किनारे कर दिया गया उसी तरह इंडिया से भी मुक्ति पा लेनी चाहिए। ध्यान रहे जिस प्रकार राष्ट्रगान में लिखे भारत भाग्य विधाता का अनुवाद नहीं किया जा सकता , वैसे ही  देश का नाम केवल भारत होना चाहिए। और बिना संशोधन किए भी   इंडिया की जगह भारत का प्रयोग किया जावे तो इसमें बुरा क्या होगा ?  15 अगस्त पर लाल किले से पंडित नेहरू द्वारा जय भारत की जगह जय हिंद का नारा लगवाया गया जिसे बतौर परंपरा हर प्रधानमंत्री निभाता आया है।  ऐसे में यदि राष्ट्रपति ने इंडिया की जगह भारत का उपयोग किया तो उसे सहज भाव से लेना चाहिए  । हमारे देश में हर जगह भारत मां की जय के नारे ही सुनाई देते हैं इंडिया मम्मी कोई नहीं बोलता।


- रवीन्द्र वाजपेयी 

Tuesday, 5 September 2023

सनातन विरोधी बयान पर चुप्पी हिंदू विरोधी मानसिकता का प्रमाण


अपने आपको हिन्दू  साबित करने के लिए यज्ञोपवीत धारण करने का दावा ,  गोत्र का प्रचार   , पारंपरिक वेश में मंदिर जाकर पूजन  , मठों के दर्शन और मानसरोवर जाकर खुद को शिव भक्त होने प्रमाणपत्र  देने वाले नेता सनातन धर्म को नष्ट करने जैसे बयान पर अब तक मुंह में दही जमाए बैठे हैं। जो नेता हिंदुत्व पर भाजपा के एकाधिकार को चुनौती देते हुए खुद को सबसे बड़ा हिंदू साबित करने में आगे - आगे नजर आते हैं उनके मुंह से भी एक शब्द नहीं निकल रहा। जब देश की 82 फीसदी आबादी हिन्दू  है तब वह हिन्दू राष्ट्र नहीं तो और क्या है , जैसी बात कहने वाले नेता जी भी मौन हैं। यही कारण है कि तमिलनाडु के मुख्यमंत्री का बेटा उदयनिधि ताल ठोककर कह रहा है कि वह सनातन धर्म को नष्ट करने के अपने बयान पर कायम है और किसी भी कानूनी प्रकरण का सामना करने तैयार है।  उस बयान से राजनीतिक नुकसान की आशंका देख कांग्रेस  ने बिना देर लगाए उससे दूरी बना ली। हालांकि , हिंदुत्व की तरफ झुकने का संकेत दे रही पार्टी से अपेक्षा थी कि वह बयान देने वाले के पिता स्टालिन को चेतावनी देती कि  इसका प्रभाव इंडिया नामक गठबंधन की एकता पर पड़ेगा। लेकिन पहले पार्टी के वरिष्ट नेता पी.चिदंबरम  के सांसद पुत्र कार्ति और फिर राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के बेटे और कर्नाटक सरकार में मंत्री प्रियांक ने  सनातन धर्म को नष्ट करने वाले बयान का पुरजोर समर्थन कर डाला। ऐसे में जब छत्तीसगढ़ में भूपेश बघेल और  म.प्र में  कमलनाथ जैसे उसके नेता खुद को  राम और हनुमान भक्त साबित करने में जुटे हुए हैं तब पार्टी के अध्यक्ष सहित एक अन्य बड़े नेता के बेटे का सनातन धर्म विरोधी बयान के पक्ष में कूदना कांग्रेस के लिए आत्मघाती साबित हो सकता है।  राहुल गांधी और प्रियंका वाड्रा बीते कुछ सालों से हिंदू मंदिरों में  पूजा - अनुष्ठान करते रहे हैं। ऐसे में इंडिया नामक गठबंधन के एक प्रमुख घटक  के सबसे बड़े नेता और तमिलनाडु के मुख्यमंत्री  के पुत्र द्वारा सनातन विरोधी बयान पर उनकी सरकार में भागीदार  कांग्रेस का मौन , बयान का समर्थन ही माना जाएगा। जहां तक बात उदयनिधि की है तो उनका ऐसा बयान देना चौंकाता नहीं है क्योंकि इनकी पार्टी द्रमुक और करुणानिधि खानदान हिन्दू विरोधी रहा है । उल्लेखनीय है  2014 के लोकसभा चुनाव में  शिकस्त के बाद पार्टी द्वारा बनाई एंटोनी समिति ने उसे नर्म हिंदुत्व की ओर झुकने की सलाह दी थी ।  उसी के बाद से राहुल गांधी के जनेऊ धारण करने , सारस्वत ब्राह्मण और शिवभक्त होने जैसी बातें कांग्रेस के प्रवक्ताओं द्वारा कही जाने लगीं । श्री गांधी खुद भी अपने भाषणों में गीता के उद्धरणों सहित पौराणिक गाथाओं के जरिए ये साबित करने का प्रयास करते रहते हैं कि हिन्दू धर्म में उनकी गहरी आस्था है। उसी क्रम में उनकी अनुजा प्रियंका ने भी मंदिरों में  मत्था टेकना शुरू कर दिया किंतु जब उस धर्म को नष्ट करने जैसा बयान  सहयोगी पार्टी के नेता द्वारा दिया गया तब श्री गांधी का मुंह न खोलना उनके हिंदू  प्रेम पर आशंका पैदा करता है। सबसे बड़ी बात ये है कि मंच से हनुमान चालीसा तथा चंडी पाठ गाने वाले  अरविंद केजरीवाल और ममता बैनर्जी ने भी सनातन विरोधी  बयान पर प्रतिक्रिया व्यक्त करने की हिम्मत नहीं दिखाई। इस प्रकार का दब्बूपन ही तुष्टीकरण को बल प्रदान करता है। जो नेता गण चुनाव प्रचार का शुभारंभ अयोध्या में हनुमान गढ़ी से करने का ढोंग रचाते हों वे हिन्दू धर्म को नष्ट करने वाले का विरोध न करें तो इसे कायरता नहीं तो और क्या कहा जाए?  किसी एक छोटी सी घटना पर असहिष्णुता का ढिंढोरा पीटने वाले और भारत को रहने लायक न बताने वाले भी हिंदुओं की आस्था के साथ होने वाले अपमानजनक व्यवहार पर मुंह सिलकर बैठ जाते हैं। देश की 82 फीसदी आबादी जिस धर्म की अनुयायी हो उसे नष्ट करने वालों का साथ देकर श्री चिदम्बरम और श्री खरगे के बेटों ने कांग्रेस ही नहीं अपितु समूचे इंडिया गठबंधन की असलियत उजागर कर दी । ऐसे में यदि ये आरोप लग रहा है कि ये  गठबंधन हिन्दू विरोधी ताकतों का जमावड़ा है तो उस पर विश्वास करना ही पड़ेगा। कांग्रेस यदि वरिष्ट नेताओं के बेटों पर जो कि सांसद और मंत्री हैं , कार्रवाई नहीं करती तब उसे म.प्र, छत्तीसगढ़ और राजस्थान के विधानसभा चुनावों में नुकसान होना तय है ।उसकी छद्म धर्मनिरपेक्षता तो  पहले ही प्रमाणित हो चुकी है और इस घटना के बाद उसका छद्म हिंदुत्व प्रेम भी  जनता की निगाहों में आए बिना नहीं रहेगा। सबसे बड़ी बात ये है कि उदयनिधि के संदर्भित बयान से यदि शांतिप्रिय हिंदुओं की भावनाएं भड़क उठीं तो देश नए संकट में फंस सकता है।

- रवीन्द्र वाजपेयी 

Monday, 4 September 2023

सनातन धर्म की आड़ में देश का विरोध कर रहे उदयनिधि



तमिलनाडु की राजनीति प्रारंभ से ही उत्तर भारत विरोधी रही है जिसके चलते आजादी के बाद महात्मा गांधी के समधी राजाजी तक हिंदी विरोधी हो गए जो देश के पहले गवर्नर जनरल रहने के बाद  राष्ट्रपति नहीं बनाए जाने से नाराज थे।  राजाजी को बापू ने नागरी प्रचारिणी सभा का प्रमुख बनाकर हिन्दी के प्रचार - प्रसार का दायित्व सौंपा था जो  प्रकांड विद्वान थे और सनातन धर्म पर लिखित उनकी पुस्तकों को अत्यंत प्रामाणिक माना गया । दूसरी तरफ रामास्वामी पेरियार नामक व्यक्ति ने  सनातन धर्म के विरुद्ध जहर फैलाकर  अलग तमिल देश की मांग उठाते हुए हिन्दू धर्म ग्रंथों को जलाने जैसा दुस्साहस भी कर डाला। शुरू में वे कांग्रेस में थे किंतु बाद में  जस्टिस पार्टी बनाकर  हिन्दी भाषा और सनातन धर्म के विरुद्ध मुहिम छेड़ दी। कालांतर में जस्टिस  पार्टी ही द्रमुक (द्रविड़ मुनेत्र कड़गम) बनी और उसी का एक धड़ा अन्ना द्रमुक के रूप में अलग हो गया। कुछ और भी  नेताओं  ने द्रमुक से अलग होकर छोटे दल बना लिए जिनकी राजनीति का आधार भी हिन्दी और उत्तर भारत का विरोध है। श्रीलंका में जब तमिल उग्रवादियों का आतंक चरम पर था तब द्रमुक नेता स्व.करुणानिधि ने खुलकर उसका समर्थन किया और तमिल राष्ट्र की मांग भी उठाई। पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी भी उसी आतंकवाद की बलि चढ़ गए जिसके बाद  करुणानिधि सरकार बर्खास्त कर दी गई। बीते तीन दशक में वहां की सियासत में अनेक बदलाव हुए । राजीव की हत्या के लिए शक के दायरे में रही द्रमुक आज कांग्रेस की सहयोगी पार्टी है और नवगठित इंडिया गठबंधन की प्रमुख इकाई भी। यद्यपि करुणानिधि , एम.जी रामचंद्रन और जयललिता के न रहने के बाद  लगा था कि   उत्तर भारत के विरुद्ध बोए गए जहर का प्रभाव कम होने लगा है। लेकिन गाहे - बगाहे कभी हिन्दी तो कभी  द्रविड़ों को भारत का मूल निवासी बताकर अलग देश की मांग छेड़ी जाती रही है। ये कहने में कुछ भी गलत नहीं है कि दलित और पिछड़ों की जो राजनीति उत्तर भारत में हावी है उसे तमिलनाडु की द्रविड़ पार्टियों ने दशकों पहले अपना लिया था। यद्यपि वहां के समाज में  सनातनी परंपराएं आज भी यथावत हैं और  धार्मिक कट्टरता उत्तर भारत के राज्यों से कई गुना ज्यादा भी । बावजूद उसके 1967 के बाद से कांग्रेस और अन्य कोई दल द्रविड़ वर्चस्व को नहीं तोड़ सका। बीते दो दशक से भाजपा भी हाथ पांव मार रही है किंतु  उत्तर भारतीय होने का ठप्पा लगा होने से वांछित सफलता हाथ नहीं लगी। करुणानिधि  के बाद  विरासत के विवाद  में छोटे बेटे स्टालिन ने बाजी मार ली और मुख्यमंत्री बन गए। उधर जयललिता के बाद अन्ना द्रमुक में बिखराव आ गया । पिता के साए में सियासत करते रहने से स्टालिन भी हिन्दी तथा उत्तर भारत का विरोध करने का कोई अवसर नहीं छोड़ते । लेकिन गत दिवस उनकी सरकार में मंत्री उनके बेटे उदयनिधि ने बयान दे डाला कि सनातन धर्म मलेरिया , डेंगू और कोरोना जैसा है जिसकी केवल रोकथाम ही नहीं अपितु उसे जड़ से नष्ट किया जाना जरूरी है। उनके अनुसार कुछ चीजों को बदला नहीं जा सकता , उनको नष्ट करना ही उपाय है।  उक्त बयान के विरुद्ध भाजपा एवं संघ परिवार तो खुलकर सामने आ गया किंतु इंडिया गठबंधन की प्रमुख घटक कांग्रेस के सामने उगलत निगलत पीर घनेरी वाली स्थिति उत्पन्न  हो गई। इसलिए उसने तत्काल उस बयान से अपने को दूर कर लिया। समाजवादी पार्टी ने भी वही रास्ता अपनाया। गठबंधन की बाकी पार्टियां भी  बचती नजर आ रही हैं। हालांकि हिंदुत्व की प्रबल समर्थक शिवसेना के उद्धव ठाकरे गुट की खामोशी चौंकाने वाली है । लेकिन कांग्रेस के बड़े नेता पी.चिदंबरम के सांसद बेटे कार्ति चिदंबरम ने उदयनिधि के सनातन धर्म विरोधी बयान का समर्थन कर पार्टी को मुसीबत में डाल दिया है। कार्ति की मजबूरी ये है कि वे बिना द्रमुक की सहायता के अगला चुनाव नहीं जीत सकेंगे।  दिल्ली में प्रकरण दर्ज होने के बाद भी  उदयनिधि ने अपने बयान पर कायम रहने की बात कही है।  दरअसल ये  82 फीसदी हिंदुओं की भावनाओं को भड़काने का षडयंत्र है । रही बात सनातन धर्म को नष्ट करने की तो ऐसा सोचने वाले समय के साथ नष्ट होते गए किंतु सनातन धर्म और उसका प्रभाव आज विश्व व्यापी है।  उदयनिधि को ये समझना चाहिए कि नास्तिक होने के बाद भी चार दशक तक प.बंगाल में राज करने पर भी वामपंथी धार्मिक आस्था को खत्म नहीं कर सके । केरल में भी वामपंथी सत्ता में आते - जाते रहे किंतु वहां सनातनी परंपराएं यथावत हैं और नास्तिक कहे जाने वाली सरकार के राज में भी केरल को भगवान का अपना देश कहकर प्रचारित किया जाता है। ऐसे में जाति प्रथा नामक बुराई के नाम पर सनातन धर्म को मिटाने का ऐलान  देश को तोड़ने के साजिश है जिसका हर राजनीतिक दल को खुलकर विरोध करना चाहिए। उदयनिधि को ये याद रखना चाहिए कि पेरियार , अन्ना दोराई और करुणानिधि जैसे दिग्गज तक  डींग हांकते - हांकते चले गए किंतु तमिलनाडु में सनातन धर्म के प्रतीक प्राचीन मंदिरों के प्रति आस्था और सनातनी जीवन पद्धति में श्रद्धा लेश मात्र भी कम नहीं हुई। इसका कारण ये है कि सनातन धर्म में आत्मावलोकन की बेजोड़ क्षमता है और   वह  समय - समय पर अपनी कमियों को खुद होकर दूर करता रहता है।  सही बात तो ये है कि उदयनिधि और उनके बाप - दादे केवल अपनी गली के दादा रहे हैं । इसीलिए तमिलनाडु से बाहर आकर राजनीति करने की हिम्मत नहीं दिखा सके।

- रवीन्द्र वाजपेयी 

Saturday, 2 September 2023

इंडिया : हाथ मिलने के बाद भी दिल मिलते नहीं दिख रहे


2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को हराने के लिए बनाए गए इंडिया नामक विपक्षी दलों के गठबंधन की तीसरी बैठक गत दिवस मुंबई में संपन्न हुई । इसमें एक बार फिर ये भाव उभरकर आया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सत्ता से हटाने के लिए गैर भाजपाई दलों की एकता ही एकमात्र उपाय है। बैठक से हासिल क्या हुआ ये कह पाना तो कठिन है  लेकिन जुड़ेगा भारत जीतेगा इंडिया,  जैसा नारा जरूर तय हो गया। इसके अलावा 14 सदस्यों वाली समन्वय समिति भी गठित हुई किंतु  संयोजक पर मतैक्य न होने से  निर्णय को टाल दिया गया।  इसका कारण विभिन्न नेताओं की महत्वाकांक्षाओं में टकराव को माना जा रहा है । वैसे तो सभी नेता कहते रहे हैं कि वे इस पद हेतु दावेदार नहीं हैं किंतु वास्तविकता ये है कि कांग्रेस येन केन प्रकारेण अपना संयोजक बनाना चाहती है किंतु आम आदमी पार्टी जैसे छोटे दल भी कांग्रेस की अगुआई में काम करने के इच्छुक नहीं हैं । पार्टी के एक दो नेताओं ने तो अरविंद केजरीवाल को प्रधानमंत्री उम्मीदवार के तौर पर पेश करने तक की मांग कर डाली।  बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी संयोजक  बनने के लिए लालायित हैं । लेकिन भीतरी तौर पर लालू प्रसाद यादव  उनके नाम पर राजी नहीं हैं जो नीतीश को राष्ट्रीय  नेता बनते नहीं देखना चाहते। एक परेशानी ये भी है कि यदि मल्लिकार्जुन खरगे या नीतीश संयोजक बनते हैं तो ये शरद पवार खेमे को अपमानजनक महसूस होगा । हालांकि ये भी सही है कि सोनिया गांधी के विदेशी मूल पर कांग्रेस छोड़ राकांपा बनाए जाने का उनका दांव गांधी परिवार भूला नहीं है। और फिर अडानी मामले में जेपीसी की मांग को निरर्थक बताने और फिर वीर सावरकर के बारे में आलोचनात्मक टिप्पणियां करने से राहुल गांधी को रोकने जैसे उनके कदमों से भी कांग्रेस चौकन्ना है। अपने  भतीजे अजीत के भाजपा की गोद में बैठ जाने के बावजूद उनसे मिलते रहने की  वजह से वे अन्य विपक्षी नेताओं के बीच भी अविश्वसनीय हो चले हैं।  ऐसे में इंडिया के लिए संयोजक तय करना मुश्किल होता जा रहा है। यही समस्या सीटों के बंटवारे को लेकर है। श्री केजरीवाल ने बैठक में ये मांग कर डाली कि इस मुद्दे पर तत्काल फैसला किया जाए । लेकिन उनकी बात अनसुनी कर दी गई। जिस  तरह की जानकारी अंदरखाने से आई हैं उनके अनुसार कांग्रेस संयोजक और सीट बंटवारे को म.प्र,छत्तीसगढ़ और राजस्थान के चुनाव तक टालना चाहती है। दरअसल उसे उम्मीद है कि वह कर्नाटक की तरह से ही उक्त तीनों राज्य जीतने जा रही है । और तब संयोजक और सीट बंटवारे के निर्णय में उसका हाथ ऊपर रहेगा। इस प्रकार भले ही राहुल  गांधी कितनी भी  उदारता दिखाते हुए विपक्षी एकता के प्रति समर्पण भाव व्यक्त करें किंतु गठबंधन का स्वरूप नैसर्गिक कम कृत्रिम ज्यादा नजर आ रहा है । दूसरे शब्दों में कहें तो ये मजबूरी से उपजी जरूरत है। यही वजह है कि मोदी विरोध के नाम पर एक साथ बैठने के बाद भी  नेता और सीटों के बंटवारे  पर निर्णय नहीं हो पा रहा। इस बारे में अनेक राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भले ही पचास से ज्यादा नेता इंडिया की बैठक में  शामिल होते हैं किंतु जब श्री मोदी के मुकाबले के लिए किसी को सामने लाने का सवाल उठता है तब एक खालीपन महसूस होने लगता है। गठबंधन में ये डर भी देखा जा रहा है कि संयोजक को प्रधानमंत्री पद का चेहरा मान लिए जाने से पूरा मुकाबला इकतरफा हो जाएगा क्योंकि व्यक्तित्व के मामले में प्रधानमंत्री सब पर भारी पड़ते हैं। मुंबई में हुई बैठक के पहले जो माहौल बनाया गया उसे देखकर लग रहा था कि उसमें ठोस निर्णय होंगे किंतु ऐसा कुछ नहीं हुआ और पांच सितारा होटल में बैठकर गरीबी और बेराजगारी पर केंद्र सरकार की आलोचना कर बैठक खत्म हो गई। गठबंधन की पटना बैठक के बाद श्री पवार की पार्टी टूट गई और मुंबई के जमावड़े के दौरान ही संसद के विशेष सत्र की खबर ने खलबली पैदा कर दी। उस पर भी कपिल सिब्बल के बिना बुलाए पहुंच जाने के कारण पैदा हुआ विवाद इस बात का संकेत दे गया कि हाथ मिलाए जाने के बावजूद अभी दिल नहीं मिले।  अगली बैठक कब होगी और संयोजक बनेगा या केवल समन्वय समिति बनाकर सामूहिक नेतृत्व का प्रयोग होगा , इन प्रश्नों का उत्तर फिलहाल नहीं मिल रहा। सीटों के बंटवारे को जिस तरह से कांग्रेस टरका रही है उसकी वजह से भी अविश्वास बरकरार है। आम आदमी पार्टी जिस प्रकार से दबाव बना रही है उससे  बाकी पार्टियां भी परेशान हैं क्योंकि श्री केजरीवाल की महत्वाकांक्षा प्रधानमंत्री बनने की है जिसे न कांग्रेस भाव देगी , न ही ममता बैनर्जी और नीतीश कुमार। जिन तीन राज्यों में विधानसभा चुनाव आगामी महीनों में होने जा रहे हैं उनमें आम आदमी पार्टी जिस प्रकार से पैर पसार रही है उससे कांग्रेस परेशान है । लेकिन श्री केजरीवाल को रोकने का साहस भी नहीं बटोर पा रही। ऐसा लगता है संसद के विशेष सत्र  की घोषणा ने गठबंधन को रुको , देखो और फिर आगे बढ़ने के लिए बाध्य कर दिया है। मुंबई बैठक के तकरीबन बेनतीजा खत्म होने से ये बात साबित भी हो गई।


- रवीन्द्र वाजपेयी 

Friday, 1 September 2023

विशेष सत्र बुलाने के पीछे कारण भी विशेष ही होगा




हालांकि जब तक कार्यसूची की घोषणा न हो जावे तब तक  कहना कठिन है कि 18 से 22 सितंबर तक आयोजित  संसद के विशेष सत्र के पीछे का उद्देश्य क्या है ? गत रात्रि ज्योंही उक्त खबर आई त्योंही राजनीति में रुचि रखने वालों के साथ ही आम जनता में भी इस बात की उत्सुकता उत्पन्न हुई कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस कदम के जरिए कौन सा धमाका करना चाह रहे हैं ?  पहले - पहल संकेत मिला कि आजादी के अमृत काल के उपलक्ष्य में विशेष सत्र के दौरान सार्थक और रचनात्मक विमर्श होगा । कुछ देर बाद ही जानकारी आई कि कुछ विशेष विधेयक इस सत्र के दौरान पेश किए जा सकते हैं जिनमें समान नागरिक संहिता  और जम्मू कश्मीर को पूर्ण राज्य का दर्जा देने  के अलावा संसद और विधानमंडलों में महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण प्रदान करना है। समाचार माध्यमों में व्यक्त की गई संभावनाओं के अनुसार आगामी लोकसभा चुनाव में ज्यादा मतदाताओं वाले निर्वाचन क्षेत्र से एक पुरुष और एक महिला   सांसद चुने जाने का प्रस्ताव  पारित किया जावेगा। संसद के नए भवन के शुभारंभ से ही इस आशय की अटकलें लगाई जाने लगी थीं कि सांसदों की संख्या बढ़ाई जावेगी। चूंकि नया परिसीमन अभी 3 वर्ष दूर है इसलिए 2024 के चुनाव के लिए  तदर्थ उपाय के जरिए महिला आरक्षण को अमल में लाए जाने की कोशिश की जा सकती है । लेकिन आज सुबह ज्योंही ये खबर आई कि एक देश एक चुनाव , की संभावनाएं तलाशने हेतु एक उच्च स्तरीय समिति गठित की गई है जिसकी अध्यक्षता पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ गोविंद करेंगे , त्योंही तमाम अटकलों को दिशा मिल गई।  हालांकि इतने कम समय में  समिति की रिपोर्ट आना और उसके अनुसार एक देश एक चुनाव की व्यवस्था को लागू कर पाना आसान काम नहीं है किंतु प्रधानमंत्री श्री मोदी की कार्यशैली में चूंकि जबरदस्त गोपनीयता रहती है लिहाजा बड़ी बात नहीं , वे विपक्ष को चौंकाते हुए एक देश एक चुनाव जैसा बड़ा निर्णय संसद के विशेष सत्र के दौरान ही करवाने का दांव चल दें । जहां तक बात समान नागरिक संहिता की है तो उसे लेकर भले ही राजनीतिक दलों में मतभेद हों किंतु महिला आरक्षण का जो विधेयक लंबे समय से लंबित पड़ा हुआ है उसे पेश किए जाने पर विपक्ष का जो गठबंधन आकार ले रहा है उसके सामने भी धर्मसंकट की स्थिति हो जायेगी। उल्लेखनीय है अतीत में इस विधेयक को संसद में जब भी पेश किया गया तब मंडल  राजनीति के पोषक लालू प्रसाद यादव , स्व .मुलायम सिंह यादव और स्व.शरद यादव ने जमकर विरोध किया। यहां तक कि भाजपा नेत्री उमा श्री भारती भी उसके विरोध में थीं। शरद यादव ने तो मंत्री से छीनकर विधेयक फाड़ तक दिया था। इनकी मांग थी कि महिलाओं को संसद और विधानमंडलों में एक तिहाई आरक्षण देने के साथ ही उसमें ओबीसी वर्ग एक हिस्सा तय किया जावे। जबकि भाजपा ,  कांग्रेस और वामपंथी पार्टियां चाह रही थीं कि पहले विधेयक पारित कर लिया जावे और उसके बाद बाकी के संशोधन हों । सहमति न बन पाने की वजह से वह विधेयक आज तक अटका पड़ा है। ऐसे में यदि मोदी सरकार विशेष सत्र में उसे लेकर आती है तब भाजपा में तो विरोध की आवाज शायद ही उठे और  कांग्रेस तथा वामपंथी दल भी उहापोह की स्थिति में होंगे।ममता बैनर्जी भी महिलाओं की नाराजगी मोल लेने का जोखिम शायद ही उठाएं। समान नागरिक संहिता तो भाजपा के घोषणापत्र का स्थायी हिस्सा रहा है। 370 , राममंदिर और तीन तलाक जैसे फैसलों के बाद यही मुख्य मुद्दा शेष है। संसद का गणित  भी भाजपा के पक्ष में है जो अनेक अवसरों पर साबित हो  चुका है।  बहरहाल एक देश एक चुनाव का फैसला संसद में किए जाने के बाद उसे तत्काल लागू करना कितना संभव होगा ये कह पाना कठिन है लेकिन श्री  मोदी और गृह मंत्री  अमित शाह के मन की थाह ले पाना किसी के बस की बात नहीं। इसलिए पूर्व राष्ट्रपति को उस हेतु गठित समिति का अध्यक्ष बनाया जाना महत्वपूर्ण है । छत्तीसगढ़ के कांग्रेसी उपमुख्यमंत्री टी.एस. सिंहदेव ने एक देश एक चुनाव का व्यक्तिगत तौर पर स्वागत करते हुए ये तक कह दिया कि ये विचार काफी पुराना है। यद्यपि विपक्ष की आम प्रतिक्रिया विशेष सत्र को लेकर आलोचनात्मक ही है। बिना विषय सूची का खुलासा हुए ही एक देश एक चुनाव के सुझाव का विरोध किया जाना ये साबित करता है कि विपक्ष भी इससे हतप्रभ रह गया है। क्या होगा , क्या नहीं ये तो फिलहाल श्री मोदी और श्री शाह ही जानते होंगे किंतु ऐसे में जबकि कुछ राज्यों के विधानसभा चुनावों का कार्यक्रम अंतिम रूप ले चुका है तब अचानक संसद का  विशेष सत्र आयोजित करना मोदी सरकार की किसी विशेष कार्ययोजना का हिस्सा होना निश्चित है क्योंकि प्रधानमंत्री की हर बात और काम किसी न किसी दूरगामी सोच पर आधारित होता है और वे अपने फैसलों से न सिर्फ विपक्ष अपितु आम जनता को भी चौंका देते हैं। ये देखते हुए अचानक से ये फैसला निश्चित तौर पर किसी बड़े नीतिगत निर्णय की ओर बढ़ाया कदम है जिसका खुलासा कार्यसूची उजागर होते ही हो जाएगा। वैसे इंडिया गठबंधन का ये कहना गलत नहीं है कि केंद्र सरकार विपक्षी एकता की प्रतिक्रिया स्वरूप ये सब कर रही है। रसोई गैस के दाम घटाए जाने पर भी ऐसे ही बयान आए थे। लेकिन चुनावी रणनीति के लिहाज से इसमें कुछ भी नया नहीं है। स्व. इंदिरा गांधी की राजनीतिक शैली भी विपक्ष को चौंकाने वाली थी। सत्ता में बैठे नेता और पार्टी के साथ ये सुविधा तो रहती ही है कि वह अपनी नीतियों और निर्णयों को लागू कर सके। उस दृष्टि से श्री मोदी भी वही कर  रहे हैं। जिन राज्यों में चुनाव के नगाड़े बज उठे हैं वहां के मुख्यमंत्री भी आए दिन ऐसे फैसले ले रहे हैं जिनसे विपक्ष का हमला कमजोर पड़े। प्रधानमंत्री इस विशेष सत्र के जरिए देश की राजनीति को किस दिशा में मोड़ना चाहते हैं ये अभी तो अज्ञात है किंतु संसद का विशेष सत्र बुलाए जाने के पीछे कारण भी विशेष ही होगा।

- रवीन्द्र वाजपेयी