Tuesday, 12 September 2023

काश , थरूर और मनमोहन सिंह जैसी समझदारी बाकी भी दिखाते


कांग्रेस सांसद शशि थरूर  अक्सर चर्चाओं में रहते हैं। लेखक होने के साथ ही वे अच्छे वक्ता भी हैं और वैश्विक दृष्टिकोण रखते हैं जिसका कारण संरासंघ में कार्य  का उनका अनुभव है। विभिन्न विषयों पर उनकी टिप्पणियां  राजनीतिक प्रतिबद्धता से अलग होने के कारण उन्हें विवादित भी बना देती हैं। कांग्रेस में  नेतृत्व परिवर्तन की मुहिम चलाने  वाले जी - 23 समूह के  सदस्य रहे श्री थरूर ने कांग्रेस अध्यक्ष का चुनाव भी लड़ा किंतु गांधी परिवार का सहयोग नहीं मिलने के कारण मल्लिकार्जुन खरगे से  बुरी तरह हार गए।  लेकिन श्री थरूर अभी भी मुखर हैं और उनके कुछ बयान पार्टी की रीति - नीति से भिन्न भी होते हैं।  विदेश नीति पर वे मोदी सरकार की जो तारीफ करते हैं उससे उनके भाजपा में जाने के कयास भी लगते हैं । हालांकि  बाकी मसलों पर वे आलोचना करने में पीछे नहीं रहते। इसका ताजा उदाहरण है , जी - 20 सम्मेलन में जारी सर्वसम्मत साझा बयान को  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की  कूटनीतिक उपलब्धि बताना।  हालांकि सम्मेलन में विपक्षी नेताओं को पर्याप्त महत्व नहीं दिए जाने की आलोचना करते हुए उन्होंने ये भी कहा कि घरेलू स्तर पर समन्वय का अभाव है। सतही तौर पर तो उनकी बात में सच्चाई है किंतु इसके लिए केवल सरकार को दोष देना एकपक्षीय होगा। मसलन  विदेशी राष्ट्राध्यक्षों के सम्मान में राष्ट्रपति द्वारा प्रेषित निमंत्रण पत्र में अंग्रेजी में प्रेसीडेंट ऑफ भारत लिखे जाने पर विपक्ष ने जो बवाल मचाया वह  अनावश्यक था। ऐसे समय जब दुनिया के प्रमुख देशों के राष्ट्रप्रमुख भारत आने  शुरू हो चुके थे तब सरकार पर देश का नाम बदलने जैसा आरोप  छवि खराब करने का प्रयास ही था।  जी - 20 सम्मेलन में भी श्री मोदी के सामने रखी पट्टिका पर भारत ही लिखा गया था। इस बारे में श्री थरूर की तरह पूर्व प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह भी प्रशंसा के पात्र हैं जिन्होंने सम्मेलन के पूर्व दिए साक्षात्कार में प्रधानमंत्री श्री मोदी  की इस बात के लिये प्रशंसा की कि उन्होंने रूस - यूक्रेन युद्ध में  सुलझी हुई कूटनीति का परिचय दिया। लेकिन दूसरी तरफ राहुल गांधी  जी - 20 के दौरान बेल्जियम में बैठे हुए भारतीय विदेश नीति की प्रशंसा करने के बजाय लोकतांत्रिक संस्थाओं पर हमले का रोना रोते रहे। हालांकि अपनी प्रत्येक विदेश यात्रा में  वे इसी तरह का प्रयास करते हैं । लेकिन जब सवाल देश की प्रतिष्ठा का हो तब एकजुटता की अपेक्षा की जाती है। दुनिया भर के शीर्षस्थ राष्ट्र प्रमुख भारत में आकर उसकी प्रशंसा कर रहे हों तब विपक्ष का एक नेता देश में लोकतांत्रिक व्यवस्था के खतरे में होने की बात करे तो यह शर्मनाक है । ऐसे में  श्री थरूर से अपेक्षित है वे  पार्टी के भीतर इस बात को उठाएं कि विदेशी धरती पर उसके  नेता इस झूठ को फैलाने से बचें कि भारत में लोकतंत्र को नष्ट किया जा रहा है। अखिरकार श्री गांधी सहित उन जैसे अन्य नेताओं को भी समझना चाहिए कि  हाल ही में कुछ राज्यों में कांग्रेस को सरकार बनाने का अवसर लोकतंत्र ने ही दिलाया और उनकी सांसदी निरस्त करने के फैसले पर सर्वोच्च न्यायालय द्वारा स्थगन भी लोकतंत्र के रहते ही संभव हो सका। विपक्ष के कुछ अन्य नेता भी हैं जो ऊल जलूल टिप्पणियां करने से बाज नहीं आते। जी - 20 सम्मेलन के ठीक पहले भारत और इंडिया का विवाद खड़ा कर विपक्ष ने जिस असंवेदनशीलता का परिचय दिया उसके बाद सरकार से सौजन्यता की अपेक्षा अर्थहीन है। श्री थरूर और डा.मनमोहन सिंह ने  जिस तरह रचनात्मक रवैया प्रदर्शित किया वह अन्य विपक्षी नेता भी अपना लें तो घरेलू राजनीति का मिजाज भी बदल जायेगा। विपक्ष सरकार की शान में कसीदे पढ़े ये तो  अव्यवहारिक होगा लेकिन विदेशों में देश के लोकतंत्र पर सवाल खड़े करना गैर जिम्मेदाराना है। सरकार या प्रधानमंत्री की आलोचना करने का पूरा अधिकार होने के बावजूद  श्री गांधी और अन्य नेताओं को  ध्यान रखना चाहिए कि विदेश में वे भारतीय लोकतंत्र के प्रतिनिधि होते हैं।  स्व.अटल जी को जब स्व. पी.वी नरसिम्हा राव ने कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तान की मोर्चेबंदी विफल करने के लिए जिनेवा में हुए अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन में भारतीय दल का नेता बनाकर भेजा तो उस निर्णय की पूरे देश में प्रशंसा हुई। और वह भी तब जबकि अटल जी , राव साहब और उनकी सरकार के घोर आलोचक थे। आज विपक्ष का एक भी नेता ऐसा नहीं है जो उस कसौटी पर खरा हो। यदि बेल्जियम में बैठकर श्री गांधी , जी - 20 के आयोजन और उसमें भारत की भूमिका की प्रशंसा करते तब श्री थरूर द्वारा घरेलू राजनीति में भी समन्वय बनाने की सरकार से अपेक्षा का औचित्य होता। बड़ी बात नहीं  विदेश नीति की तारीफ करने के लिए श्री थरूर और डा.मनमोहन सिंह भी कठघरे में खड़े किए जाने लगें।


-  रवीन्द्र वाजपेयी 

Monday, 11 September 2023

जी - 20 के सफल आयोजन से विश्व बिरादरी में भारत की साख और धाक बढ़ी


जी - 20 सम्मेलन जिस भव्यता  के साथ  संपन्न हुआ उससे पूरी दुनिया में भारत की प्रबंधन क्षमता के साथ ही कूटनीतिक कौशल का डंका बज उठा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बीते एक साल में इस आयोजन  के लिए जिस तरह की तैयारी की उसका सुफल इस सम्मेलन की अभूतपूर्व सफलता के तौर पर देखने मिला। इसे अब तक का सबसे सफल जी - 20 सम्मेलन माना गया जो कि पूरी तरह से सही है। भारत की आंचलिक विविधता के साथ ही सांस्कृतिक विरासत को जिस प्रभावशाली ढंग से विदेशी मेहमानों के समक्ष पेश किया गया उससे इस सम्मेलन की खूबसूरती और बढ़ गई। राजघाट पर महात्मा गांधी की समाधि के समक्ष 20 राष्ट्रप्रमुखों का एक साथ श्रृद्धावनत खड़े होने का दृश्य भारतीय चिंतन के प्रति वैश्विक स्वीकृति का प्रमाण कहा जा सकता है। विकसित और विकासशील देशों के  प्रतिनिधियों के अलावा अनेक अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संगठनों के जो प्रमुख इस सम्मेलन के दौरान दिल्ली में उपस्थित रहे वे सब भी बदले हुए भारत को देखकर अभिभूत हो उठे। लेकिन दिखावटी चीजों से हटकर यदि कामकाजी बातों की कल्पना करें तो यह सम्मेलन भारत के आर्थिक ,  सामरिक और कूटनीतिक हितों की दृष्टि से बेहद उपयोगी साबित हुआ। विशेष रूप से मध्य पूर्व  से होते हुए यूरोप तथा अमेरिका तक के जिस कारीडोर के प्रस्ताव को इस सम्मेलन में अंतिम रूप दिया गया वह प्रधानमंत्री  श्री मोदी की बड़ी सफलता है क्योंकि इसके कारण चीन के राष्ट्रपति जिनपिंग के  वन बेल्ट वन रोड नामक प्रकल्प की बची खुची हवा भी निकल गई। जिस तरह से इस परियोजना से एक के बाद एक देश हाथ खींचते जा रहे हैं उससे जिनपिंग की चमक और धमक दोनों में कमी आई है। यहां तक कि उसके पिट्ठू पाकिस्तान तक में उसका विरोध होने लगा। अनेक देशों ने वन बेल्ट वन रोड से अपने हाथ खींचकर प्राचीन सिल्क रूट को पुनर्जीवित करने की  चीन की योजना को पलीता लगा दिया है। इसके जरिए चीन अपने व्यापार को यूरोप तक फैलाने आतुर था। भारत भी इससे चिंतित था इसलिए श्री मोदी ने जी - 20 देशों के साथ इस नए कारीडोर के  प्रस्ताव को स्वीकृति दिलवाकर भारत के लिए विदेशी व्यापार की स्वर्णिम संभावनाओं को जन्म दे दिया है। चीन की जो प्रतिक्रिया इस सम्मेलन के बारे में आई है उससे इस कारीडोर की अहमियत  स्पष्ट हो जाती है। इसी तरह अफ्रीका  यूनियन को जी - 20 का सदस्य बनवाने में भी प्रधानमंत्री ने उल्लेखनीय भूमिका का निर्वहन किया। इस सम्मेलन की सबसे खास बात ये रही कि भले ही रूस के राष्ट्रपति पुतिन और चीन के राष्ट्रपति जिनपिंग नई दिल्ली नहीं आए किंतु साझा घोषणापत्र पर जिस तरह सर्वसम्मति बनी वह भारतीय कूटनीति का ही कमाल कहा जायेगा । इसी तरह यूक्रेन के मामले में भी जिस तरह का संयमित रवैया प्रदर्शित किया गया वह  सम्मेलन में शामिल सदस्यों की परिपक्वता का प्रमाण बन गया । कुल मिलाकर यह सम्मेलन वैश्विक सामंजस्य के अतिरिक्त भारत की दृष्टि से भी बेहद कारगर रहा। सबसे बड़ी बात ये रही कि शीतयुद्ध की काली छाया से आयोजन  पूरी तरह मुक्त रहा । इसीलिए जितने भी प्रस्ताव पारित हुए या निर्णय लिए गए उन पर सकारात्मक माहौल में सार्थक चर्चा हो सकी। उस दृष्टि से ये अच्छा हुआ कि राष्ट्रपति द्वय पुतिन और जिनपिंग दोनों नई दिल्ली नहीं आए क्योंकि अमेरिका के राष्ट्रपति बाइडेन के साथ  इनकी उपस्थिति में यूक्रेन और प्रस्तावित नए कारीडोर को लेकर विवाद हो सकता था जिससे सम्मेलन में गुटबाजी के अलावा माहौल खराब होता। हालांकि सम्मेलन में छोटे बड़े देशों के अनेक नेता शामिल हुए किंतु भारत केंद्र बिंदु बना रहा । प्रधानमंत्री श्री मोदी ने इस दौरान लगभग सभी नेताओं से व्यक्तिगत तौर पर बातचीत करते हुए भारत के हित में जो समझौते किए वे इस सम्मेलन की अघोषित उपलब्धि हैं। सम्मेलन में शामिल हुए राष्ट्रप्रमुखों द्वारा आयोजन की  प्रशंसा किया जाना तो स्वाभाविक है किंतु दुनिया भर के समाचार माध्यमों , कूटनीतिक विश्लेषकों और वित्तीय संस्थानों ने  सम्मेलन की सफलता के लिए जिस तरह से भारत और श्री मोदी की तारीफ की वह बेहद उत्साहवर्धक है। आयोजन के पहले राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू द्वारा भेजे गए निमंत्रण में भारत लिखे जाने पर हुए विवाद के कारण लग रहा था कि इस दौरान कोई अप्रिय स्थिति उत्पन्न हो सकती है किंतु सभी राजनीतिक दलों ने बेहद सुलझा हुआ दृष्टिकोण प्रदर्शित किया । इस आयोजन के बाद भारत का कद विश्व बिरादरी में और ऊंचा हुआ है जिसके कारण चीन और पाकिस्तान का चिंतित होना स्वाभाविक है।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 9 September 2023

जी - 20 : वैश्विक नेतृत्व की ओर भारत के बढ़ते कदम



दिल्ली में जी - 20 का सम्मेलन प्रारंभ हो गया। इसमें अमेरिका , फ्रांस , ब्रिटेन ,इटली , बांग्लादेश, जापान , दक्षिण कोरिया , ऑस्ट्रेलिया , ब्राजील ,जर्मनी , मॉरीशस , सिंगापुर , यूरोपियन यूनियन , स्पेन , चीन , अर्जेंटीना आदि के राष्ट्रपति , उपराष्ट्रपति या प्रधानमंत्री शिरकत कर रहे हैं। संरासंघ के बाद ये सबसे बड़ा वैश्विक संगठन है जिसमें बड़ी आर्थिक और सामरिक शक्तियों के साथ ही विकासशील देश भी शामिल हैं । भूमंडलीकरण और उदार अर्थव्यवस्था के चलन में आने के बाद से शीतयुद्ध की बजाय अब आपसी सहयोग से आर्थिक विकास की सोच ने जन्म ले लिया। यही वजह है कि अमेरिका , रूस , चीन जैसे परस्पर विरोधी मानसिकता के देश भी जी - 20 में शामिल हैं।  भारत में इस सम्मेलन की तैयारियां उसी समय से शुरू हो गईं थीं जब उसे इसकी अध्यक्षता का दायित्व प्राप्त हुआ। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी किसी भी आयोजन में भव्यता के साथ उसे  प्रबंधन कौशल का उदाहरण बनाने के लिए प्रसिद्ध हैं। इसीलिए बीते काफी महीनों से देश के विभिन्न राज्यों में जी - 20 की तैयारियों संबंधी बैठकें आयोजित की गईं । इसका लाभ ये हुआ कि उन राज्यों में पर्यटन एवं विदेशी पूंजी निवेश की संभावनाएं उत्पन्न हुईं। श्रीनगर में जी - 20 की बैठक का आयोजन चीन और पाकिस्तान को ये संदेश देने के लिए किया गया कि जम्मू - कश्मीर , भारत का अविभाज्य अंग है और इस बारे में किसी शक की गुंजाइश न रहे। भारत का ये दांव कारगर रहा और चीन तथा पाकिस्तान  दोनों ने उस कदम का विरोध किया। दिल्ली में बने कन्वेंशन सेंटर को देखकर जी - 20 में शामिल अनेक देश ये देखकर चिंतित हो उठे कि वे इतना  शानदार और सुव्यवस्थित आयोजन शायद ही कर पाएं। बहरहाल आर्थिक , पर्यावरण , स्वास्थ्य , शिक्षा  , अंतरिक्ष , भुखमरी , आवास जैसी वैश्विक समस्याओं पर एक समन्वित दृष्टिकोण विकसित करने में जी - 20 एक महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन कर सकता है। हालांकि यूक्रेन संकट के कारण रूस के राष्ट्रपति पुतिन और हाल ही में जारी नक्शे में अरुणाचल को अपना हिस्सा बताए जाने पर भारत के विरोध की वजह से चीन के राष्ट्रपति जिनपिंग नई दिल्ली नहीं आए किंतु बाकी महाशक्तियों का शीर्ष नेतृत्व जिस संख्या में इस सम्मेलन में  शामिल हो रहा है वह इस संगठन के महत्व के साथ वैश्विक मंचों पर भारत की बढ़ती हैसियत और अहमियत का प्रमाण है। इस सम्मेलन के जरिए  विश्व भर के नेताओं को भारत की प्रगति और क्षमता से परिचित करवाने में सफलता मिली है। यह आयोजन संरासंघ की सुरक्षा परिषद में भारत की स्थायी सदस्यता के लिए समर्थन जुटाने में सहायक बनेगा। अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडेन ने इस मुहिम से सहमति दिखाकर ये संकेत दे दिया है कि उसके समर्थक अन्य देश भी भारत के साथ खड़े होंगे। चीन के राष्ट्रपति राष्ट्रपति जिनपिंग ने दिल्ली न आकर अपना ही कूटनीतिक नुकसान किया है । जिस सम्मेलन में अमेरिका , फ्रांस , ब्रिटेन और जापान के राष्ट्रप्रमुख शामिल हों उससे दूरी बनाने का जिनपिंग का निर्णय उनके मन में आए अपराधबोध का संकेत है। बहरहाल सम्मेलन में लिए गए निर्णयों और प्रस्तावों की जानकारी तो बाद में मिलेगी किंतु इसके माध्यम से प्रधानमंत्री ने भारत की जो मार्केटिंग की है उसके सकारात्मक परिणाम आने शुरू हो गए हैं। विशेष रूप से अमेरिका के साथ विभिन्न क्षेत्रों में जिस प्रकार के समझौते , अनुबंध और सौदे हो रहे हैं उनसे काफी उम्मीदें हैं। फ्रांस, ब्रिटेन और जापान के अलावा कोरिया आदि के साथ  भारत के आर्थिक कारोबार को भी  इस सम्मेलन से  नई दिशा मिलेगी। सबसे बड़ी बात ये है कि दुनिया भर के राष्ट्रप्रमुख इस सम्मेलन के दौरान भारत की आयोजन क्षमता , आर्थिक प्रगति और प्रबंधन कौशल का तो प्रत्यक्ष दर्शन करेंगे ही उसके साथ  ही देश की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत एवं विविधता से भी परिचित होंगे। देश में आधारभूत ढांचे में आए सुधार के कारण विदेशी निवेश की संभावनाएं जिस तरह बढ़ी हैं उसे देखते हुए इस सम्मेलन से काफी उम्मीदें हैं। भारत की मजबूत संसदीय प्रणाली , सशक्त न्यायपालिका और विज्ञान के क्षेत्र में  विश्व स्तर की सफलताओं से इस समय पूरी दुनिया प्रभावित है। अन्यथा अमेरिका , फ्रांस ,  ब्रिटेन और जापान के राष्ट्रप्रमुख जी - 20 सम्मेलन में स्वयं नहीं आते।  पाकिस्तान के लिए भी ये सम्मेलन बेहद पीड़ादायक है। जो पश्चिमी ताकतें लंबे समय तक उसे पालती - पोसती रहीं वे अब भारत के बढ़ते आभामंडल से प्रभावित हैं। कुल मिलाकर ये सम्मेलन ऐसे समय हो रहा है जब दुनिया कोरोना महामारी से उबरकर एक नई वैश्विक व्यवस्था के सृजन में लगी हुई है। भारत इसका  नेतृत्व करने की दिशा में आगे बढ़ा है इससे हर भारतवासी को आत्मगौरव की अनुभूति हो रही है।


- रवीन्द्र वाजपेयी 


Friday, 8 September 2023

एशिया में चीन का विकल्प बन रहा भारत : आसियान से मिला संकेत



किसी भी देश की विदेश नीति चूंकि  राष्ट्रीय हितों पर आधारित होती है , इसलिए सरकार बदलने पर भी  उसमें आधारभूत परिवर्तन नहीं होता।  मौजूदा केंद्र सरकार ने आसियान देशों के साथ जिस तरह से नजदीकी रिश्ते बनाकर उनसे राजनयिक , आर्थिक और सामरिक साझेदारी बढ़ाई उसका नजारा दो दिन पहले प्रधानमंत्री श्री मोदी की इंडोनेशिया  यात्रा के दौरान दिखाई दिया जहां वे  भारत - आसियान की बैठक में बतौर सह अध्यक्ष शामिल हुए और उसके बाद पूर्व एशिया सम्मेलन में शिरकत की। इन आयोजनों का महत्व उनमें  अमेरिका की उपराष्ट्रपति कमला हैरिस की मौजूदगी से प्रदर्शित होता है। उल्लेखनीय है आसियान संगठन का सदस्य नहीं होने के बावजूद भारत उससे जुड़ा है । चीन की विस्तारवादी नीतियों के विरोध में एक सशक्त क्षेत्रीय गठबंधन बनाने में भारत की भूमिका को आसियान देश स्वीकार कर रहे हैं । इसीलिए ऐसे समय जब भारत में जी - 20 देशों के सम्मेलन की तैयारियां अंतिम चरण में थीं , श्री मोदी कुछ घंटों के लिए जकार्ता गए । चूंकि चीन के राष्ट्रपति जिनपिंग इस जी - 20 सम्मेलन में नहीं आ रहे इसलिए भारत के प्रधानमंत्री की आसियान सम्मेलन में उपस्थिति ने बड़ा कूटनीतिक संदेश दे दिया है । जो जानकारियां उपलब्ध हैं  उनके मुताबिक चीन अपने दक्षिणी समुद्र में  बेजा कब्जा बढ़ाने के साथ ही छोटे - छोटे देशों  को पिछलग्गू बनाकर उनका शोषण करना चाहता है । लेकिन आसियान में शामिल देशों ने चीन की चाल में आने से मना कर दिया । भारत ने इस अवसर का  लाभ उठाते हुए उनके सिर पर हाथ रखते हुए चीन के दबाव के सामने न झुकने का हौसला दिया। कोरोना के बाद बदली वैश्विक परिस्थितियों में चीन के प्रति दुनिया भर में अविश्वास का भाव बढ़ने से बड़ी संख्या में बहुराष्ट्रीय कंपनियां अपना कारोबार और निवेश वहां से समेट रही हैं। चूंकि दक्षिण पूर्वी एशियाई देशों में श्रमिक सस्ते हैं इसलिए आसियान और भारत पर उनकी नजर है। दूसरी बात ये है कि चीन से होने वाले आयात में कमी करने के साथ भारतीय उत्पादों के निर्यात में वृद्धि के लिए आसियान देश काफी उपयुक्त हैं जिनसे भारत का द्विपक्षीय व्यापार तेजी से बढ़ता जा रहा है । इसीलिए श्री मोदी , जी -20 की व्यस्तता के बावजूद जकार्ता गए और भारत - आसियान सम्मेलन के अलावा पूर्व एशिया सम्मेलन में  प्रभावशाली उपस्थिति दर्ज करवाई।  कुछ घंटों की जकार्ता यात्रा में उन्होंने चीन विरोधी दक्षिण एशियाई देशों को भारत के समर्थन और सहारे का भरोसा तो दिलाया ही लेकिन इसी के साथ  जी - 20  सम्मेलन में शामिल हो रहे राष्ट्राध्यक्षों को ये संदेश भी दे दिया कि भारत एक क्षेत्रीय महाशक्ति के तौर पर उभर रहा है। ऐसा करना इसलिए जरूरी है क्योंकि अभी तक वैश्विक मंचों पर एशिया के सिरमौर के तौर पर चीन को ही मान्यता मिली हुई थी। अमेरिका जैसी महाशक्ति तक उसके आभामंडल से प्रभावित हो गई। लेकिन बीते कुछ सालों में विशेष रूप से कोरोना के बाद से उक्त अवधारणा बदलने लगी । चीन के दक्षिणी समद्री क्षेत्र में उसकी विस्तारवादी नीतियों के विरुद्ध बने क्वाड नामक संगठन में अमेरिका , आस्ट्रेलिया और जापान के साथ भारत को शामिल किया जाना चीन को ये संकेत था कि दुनिया अब भारत को उसके विकल्प के तौर पर देखने लगी है। आसियान और पूर्व एशिया सम्मेलन में प्रधानमंत्री श्री मोदी के जाने से उक्त संदेश और मुखर हुआ है। दिल्ली में जी - 20 सम्मेलन में अमेरिका , फ्रांस और ब्रिटेन जैसी बड़ी शक्तियों की उपस्थिति से  भारत का कूटनीतिक महत्व बढ़ा है। भारत - आसियान बैठक और पूर्व एशिया सम्मेलन के तत्काल बाद जी - 20 का आयोजन विश्व स्तर पर दक्षिण एशिया की बढ़ती अहमियत और जरूरत का भी प्रमाण है। और इन सभी आयोजनों में भारत और श्री मोदी की सक्रिय भूमिका से विदेश नीति के  साथ ही आर्थिक और सामरिक मोर्चे पर भी हमारा महत्व और प्रभुत्व बढ़ा है। इस बारे में ये बात विचारयोग्य है कि महाशक्ति बनने के लिए क्षेत्रीय शक्ति बनना आवश्यक होता है। उस दृष्टि से आसियान  देशों के बीच भारत की बड़े भाई वाली भूमिका ने वैश्विक स्तर हमारी साख और धाक दोनों में वृद्धि की है। रूसी राष्ट्रपति पुतिन तो यूक्रेन के साथ चल रहे युद्ध के कारण जी - 20 सम्मेलन में नहीं आ रहे लेकिन चीन के राष्ट्रपति जिनपिंग का नहीं आना निश्चित रूप से ये दर्शाने के लिए पर्याप्त है कि भारत द्वारा इस आयोजन की शानदार मेजबानी से बीजिंग के पेट में मरोड़ शुरू हो गया है। यद्यपि इसके पहले भी भारत अनेक अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनों का आयोजक बन चुका है लेकिन जिस भव्यता और आत्मविश्वास के साथ जी - 20 का सम्मेलन हो रहा है उसके कारण भारत की क्षमता और कूटनीतिक दक्षता नए कलेवर में उभरकर सामने आ रही है। चंद्रयान की  ऐतिहासिक सफलता और फिर सूर्य के अध्ययन हेतु अपने अंतरिक्ष यान के सफल प्रक्षेपण के तत्काल बाद जी - 20 का आयोजन हमारे बढ़ते कद का  प्रभाव है। प्रधानमंत्री श्री मोदी ने भारतीय विदेश नीति को उसके सर्वोच्च स्तर तक पहुंचा दिया है।

- रवीन्द्र वाजपेयी 


Wednesday, 6 September 2023

जब भारत मां को इंडिया मम्मी नहीं कहा जाता तब भारत को इंडिया क्यों ?



जी - 20 देशों के सम्मेलन के लिए राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू द्वारा दिए गए निमंत्रण पत्र में प्रेसिडेंट आफ भारत लिखे जाने पर वे विपक्षी दल आग बबूला  हैं जिन्होंने हाल ही में  भाजपा विरोधी एक गठबंधन बनाया है जिसका अंग्रेजी नाम संक्षिप्त में इंडिया  है। उनके अनुसार सरकार चूंकि इस नाम से डर गई है लिहाजा संविधान में प्रयुक्त देश के अंग्रेजी नाम इंडिया की जगह उक्त  निमंत्रण पत्र में भारत शब्द का इस्तेमाल किया गया जबकि अभी तक अंग्रेजी के किसी भी सरकारी दस्तावेज में इंडिया ही लिखा जाता रहा।  ये प्रचार भी शुरू कर दिया गया कि 18 सितंबर से प्रारंभ होने जा रहे संसद के विशेष सत्र में संविधान के प्रारंभ में  देश का नाम इंडिया जो कि भारत है ,को बदल दिया जाएगा। और  ये तिथि इसलिए चुनी गई क्योंकि संविधान सभा में भी इसी तारीख को इंडिया और भारत नाम रखे जाने पर बहस हुई थी।  दरअसल  विशेष सत्र की घोषणा ने सभी को आश्चर्यचकित कर दिया। स्वाभाविक तौर पर ये जानने की उत्सुकता हुई कि उसके पीछे का उद्देश्य क्या है ? उम्मीद है जी - 20 समाप्त होने के बाद सरकार इस बारे में स्थिति स्पष्ट करेगी। विपक्ष इसलिए भी परेशान क्योंकि लोकसभा चुनाव के कुछ महीने पहले  विशेष सत्र बुलाने के पीछे प्रधानमंत्री का चुनावी पैंतरा हो  सकता है। बहरहाल जहां तक बात इंडिया की जगह भारत शब्द का उपयोग करने की है तो इसे लेकर बवाल मचाने वालों की बुद्धि पर तरस आता है। ऐसा जाहिर किया जा रहा है मानो संविधान से इंडिया हटा दिया गया तो जो भारत बचेगा वह भाजपा या नरेंद्र मोदी के नाम लिख जायेगा। इंडिया शब्द की उत्पत्ति कब , कहां और कैसे हुई इसका भी इतिहास खंगाला जा रहा है। लेकिन संविधान सभा में जिन लोगों ने भारत के साथ इंडिया नाम रखे जाने का विरोध किया था उनमें स्व.हरि विष्णु कामथ और स्व.सेठ गोविंद दास जैसे लोग थे जिनकी प्रतिभा और देशभक्ति पर शंका नहीं की जा सकती। बहस और विवाद तो हिन्दू शब्द पर भी होते हैं। जिसके बारे में दावा है विदेशी चूंकि स को ह उच्चारित करते थे इसलिए सिंधु नदी के इस पार वाले क्षेत्र को हिंदुस्तान नाम दे दिया। कुछ लोग वेदों में हिमालय से समुद्र के बीच के क्षेत्र को भारत कहे जाने वाले श्लोक को बतौर प्रमाण पेश करते हैं। जैन दर्शन के साथ ही दुष्यंत और शकुंतला के पुत्र भरत के नाम पर देश का नाम भारत रखे जाने की बात भी उठ रही है। और भी अनेक संदर्भ सामने लाए जा रहे हैं। इन सबको विमर्श में शामिल किए जाने में कुछ भी बुराई नहीं है क्योंकि नई पीढ़ी इसके माध्यम से बहुत सारी वे बातें जान सकेगी जिनसे अन्यथा वह अनजान रहती। वैसे , जो लोग राष्ट्रपति द्वारा अंग्रेजी में छपे निमंत्रण पर प्रेसिडेंट ऑफ भारत लिखने पर छाती पीट रहे हैं उसकी असली वजह रास्वसंघ प्रमुख डा. मोहन भागवत द्वारा दो - तीन दिन पहले इंडिया की जगह भारत शब्द का इस्तेमाल किए जाने की अपील थी। संघ के घोषित उद्देश्यों में भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाना भी है। ये महज संयोग है या सुनियोजित , ये कहना तो कठिन है लेकिन भारत शब्द के उपयोग पर आसमान सिर पर उठा लेने का औचित्य समझ से परे है। यदि मान लें कि मोदी सरकार संविधान में इंडिया हटाकर केवल भारत रखने की सोच रही है तो इसमें बुराई क्या है? सही बात तो ये है  कि संविधान में  भारत के साथ इंडिया नाम रखा जाना किसी भी दृष्टि से उचित अथवा आवश्यक नहीं था।  आजादी के आंदोलन में भी हिंदुस्तान और भारत जैसे शब्द ही उपयोग होते  थे। ऐसे में संविधान में इंडिया को भारत पर प्रमुखता देना अंग्रजों को खुश करने के लिए किया गया लगता है। रही बात संविधान में  बदलाव की तो उसमें न जाने कितने संशोधन किए जा चुके हैं । यहां तक कि उसकी प्रस्तावना में भी  आपातकाल लगाए जाने के बाद 1976 में  धर्म निरपेक्ष शब्द जोड़ा गया। सवाल उठता है कि पंडित नेहरू जैसे धर्म निरपेक्षता के पैरोकार ने उस समय उसकी जरूरत नहीं समझी जबकि देश को आजादी सांप्रदायिक हिंसा के बीच प्राप्त हुई थी । और भी सवाल हैं जिन पर आजादी के 75 वर्षों बाद भी चर्चा नहीं हुई तो इतिहास के अनेक अध्याय बिना खुले ही रह जायेंगे। जिन लोगों को इंडिया की जगह भारत के उपयोग पर ऐतराज हो रहा है उनको ये नहीं भूलना चाहिए कि जिस तरह हिंदुस्तान नाम को विदेशियों द्वारा दिए जाने से किनारे कर दिया गया उसी तरह इंडिया से भी मुक्ति पा लेनी चाहिए। ध्यान रहे जिस प्रकार राष्ट्रगान में लिखे भारत भाग्य विधाता का अनुवाद नहीं किया जा सकता , वैसे ही  देश का नाम केवल भारत होना चाहिए। और बिना संशोधन किए भी   इंडिया की जगह भारत का प्रयोग किया जावे तो इसमें बुरा क्या होगा ?  15 अगस्त पर लाल किले से पंडित नेहरू द्वारा जय भारत की जगह जय हिंद का नारा लगवाया गया जिसे बतौर परंपरा हर प्रधानमंत्री निभाता आया है।  ऐसे में यदि राष्ट्रपति ने इंडिया की जगह भारत का उपयोग किया तो उसे सहज भाव से लेना चाहिए  । हमारे देश में हर जगह भारत मां की जय के नारे ही सुनाई देते हैं इंडिया मम्मी कोई नहीं बोलता।


- रवीन्द्र वाजपेयी 

Tuesday, 5 September 2023

सनातन विरोधी बयान पर चुप्पी हिंदू विरोधी मानसिकता का प्रमाण


अपने आपको हिन्दू  साबित करने के लिए यज्ञोपवीत धारण करने का दावा ,  गोत्र का प्रचार   , पारंपरिक वेश में मंदिर जाकर पूजन  , मठों के दर्शन और मानसरोवर जाकर खुद को शिव भक्त होने प्रमाणपत्र  देने वाले नेता सनातन धर्म को नष्ट करने जैसे बयान पर अब तक मुंह में दही जमाए बैठे हैं। जो नेता हिंदुत्व पर भाजपा के एकाधिकार को चुनौती देते हुए खुद को सबसे बड़ा हिंदू साबित करने में आगे - आगे नजर आते हैं उनके मुंह से भी एक शब्द नहीं निकल रहा। जब देश की 82 फीसदी आबादी हिन्दू  है तब वह हिन्दू राष्ट्र नहीं तो और क्या है , जैसी बात कहने वाले नेता जी भी मौन हैं। यही कारण है कि तमिलनाडु के मुख्यमंत्री का बेटा उदयनिधि ताल ठोककर कह रहा है कि वह सनातन धर्म को नष्ट करने के अपने बयान पर कायम है और किसी भी कानूनी प्रकरण का सामना करने तैयार है।  उस बयान से राजनीतिक नुकसान की आशंका देख कांग्रेस  ने बिना देर लगाए उससे दूरी बना ली। हालांकि , हिंदुत्व की तरफ झुकने का संकेत दे रही पार्टी से अपेक्षा थी कि वह बयान देने वाले के पिता स्टालिन को चेतावनी देती कि  इसका प्रभाव इंडिया नामक गठबंधन की एकता पर पड़ेगा। लेकिन पहले पार्टी के वरिष्ट नेता पी.चिदंबरम  के सांसद पुत्र कार्ति और फिर राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के बेटे और कर्नाटक सरकार में मंत्री प्रियांक ने  सनातन धर्म को नष्ट करने वाले बयान का पुरजोर समर्थन कर डाला। ऐसे में जब छत्तीसगढ़ में भूपेश बघेल और  म.प्र में  कमलनाथ जैसे उसके नेता खुद को  राम और हनुमान भक्त साबित करने में जुटे हुए हैं तब पार्टी के अध्यक्ष सहित एक अन्य बड़े नेता के बेटे का सनातन धर्म विरोधी बयान के पक्ष में कूदना कांग्रेस के लिए आत्मघाती साबित हो सकता है।  राहुल गांधी और प्रियंका वाड्रा बीते कुछ सालों से हिंदू मंदिरों में  पूजा - अनुष्ठान करते रहे हैं। ऐसे में इंडिया नामक गठबंधन के एक प्रमुख घटक  के सबसे बड़े नेता और तमिलनाडु के मुख्यमंत्री  के पुत्र द्वारा सनातन विरोधी बयान पर उनकी सरकार में भागीदार  कांग्रेस का मौन , बयान का समर्थन ही माना जाएगा। जहां तक बात उदयनिधि की है तो उनका ऐसा बयान देना चौंकाता नहीं है क्योंकि इनकी पार्टी द्रमुक और करुणानिधि खानदान हिन्दू विरोधी रहा है । उल्लेखनीय है  2014 के लोकसभा चुनाव में  शिकस्त के बाद पार्टी द्वारा बनाई एंटोनी समिति ने उसे नर्म हिंदुत्व की ओर झुकने की सलाह दी थी ।  उसी के बाद से राहुल गांधी के जनेऊ धारण करने , सारस्वत ब्राह्मण और शिवभक्त होने जैसी बातें कांग्रेस के प्रवक्ताओं द्वारा कही जाने लगीं । श्री गांधी खुद भी अपने भाषणों में गीता के उद्धरणों सहित पौराणिक गाथाओं के जरिए ये साबित करने का प्रयास करते रहते हैं कि हिन्दू धर्म में उनकी गहरी आस्था है। उसी क्रम में उनकी अनुजा प्रियंका ने भी मंदिरों में  मत्था टेकना शुरू कर दिया किंतु जब उस धर्म को नष्ट करने जैसा बयान  सहयोगी पार्टी के नेता द्वारा दिया गया तब श्री गांधी का मुंह न खोलना उनके हिंदू  प्रेम पर आशंका पैदा करता है। सबसे बड़ी बात ये है कि मंच से हनुमान चालीसा तथा चंडी पाठ गाने वाले  अरविंद केजरीवाल और ममता बैनर्जी ने भी सनातन विरोधी  बयान पर प्रतिक्रिया व्यक्त करने की हिम्मत नहीं दिखाई। इस प्रकार का दब्बूपन ही तुष्टीकरण को बल प्रदान करता है। जो नेता गण चुनाव प्रचार का शुभारंभ अयोध्या में हनुमान गढ़ी से करने का ढोंग रचाते हों वे हिन्दू धर्म को नष्ट करने वाले का विरोध न करें तो इसे कायरता नहीं तो और क्या कहा जाए?  किसी एक छोटी सी घटना पर असहिष्णुता का ढिंढोरा पीटने वाले और भारत को रहने लायक न बताने वाले भी हिंदुओं की आस्था के साथ होने वाले अपमानजनक व्यवहार पर मुंह सिलकर बैठ जाते हैं। देश की 82 फीसदी आबादी जिस धर्म की अनुयायी हो उसे नष्ट करने वालों का साथ देकर श्री चिदम्बरम और श्री खरगे के बेटों ने कांग्रेस ही नहीं अपितु समूचे इंडिया गठबंधन की असलियत उजागर कर दी । ऐसे में यदि ये आरोप लग रहा है कि ये  गठबंधन हिन्दू विरोधी ताकतों का जमावड़ा है तो उस पर विश्वास करना ही पड़ेगा। कांग्रेस यदि वरिष्ट नेताओं के बेटों पर जो कि सांसद और मंत्री हैं , कार्रवाई नहीं करती तब उसे म.प्र, छत्तीसगढ़ और राजस्थान के विधानसभा चुनावों में नुकसान होना तय है ।उसकी छद्म धर्मनिरपेक्षता तो  पहले ही प्रमाणित हो चुकी है और इस घटना के बाद उसका छद्म हिंदुत्व प्रेम भी  जनता की निगाहों में आए बिना नहीं रहेगा। सबसे बड़ी बात ये है कि उदयनिधि के संदर्भित बयान से यदि शांतिप्रिय हिंदुओं की भावनाएं भड़क उठीं तो देश नए संकट में फंस सकता है।

- रवीन्द्र वाजपेयी 

Monday, 4 September 2023

सनातन धर्म की आड़ में देश का विरोध कर रहे उदयनिधि



तमिलनाडु की राजनीति प्रारंभ से ही उत्तर भारत विरोधी रही है जिसके चलते आजादी के बाद महात्मा गांधी के समधी राजाजी तक हिंदी विरोधी हो गए जो देश के पहले गवर्नर जनरल रहने के बाद  राष्ट्रपति नहीं बनाए जाने से नाराज थे।  राजाजी को बापू ने नागरी प्रचारिणी सभा का प्रमुख बनाकर हिन्दी के प्रचार - प्रसार का दायित्व सौंपा था जो  प्रकांड विद्वान थे और सनातन धर्म पर लिखित उनकी पुस्तकों को अत्यंत प्रामाणिक माना गया । दूसरी तरफ रामास्वामी पेरियार नामक व्यक्ति ने  सनातन धर्म के विरुद्ध जहर फैलाकर  अलग तमिल देश की मांग उठाते हुए हिन्दू धर्म ग्रंथों को जलाने जैसा दुस्साहस भी कर डाला। शुरू में वे कांग्रेस में थे किंतु बाद में  जस्टिस पार्टी बनाकर  हिन्दी भाषा और सनातन धर्म के विरुद्ध मुहिम छेड़ दी। कालांतर में जस्टिस  पार्टी ही द्रमुक (द्रविड़ मुनेत्र कड़गम) बनी और उसी का एक धड़ा अन्ना द्रमुक के रूप में अलग हो गया। कुछ और भी  नेताओं  ने द्रमुक से अलग होकर छोटे दल बना लिए जिनकी राजनीति का आधार भी हिन्दी और उत्तर भारत का विरोध है। श्रीलंका में जब तमिल उग्रवादियों का आतंक चरम पर था तब द्रमुक नेता स्व.करुणानिधि ने खुलकर उसका समर्थन किया और तमिल राष्ट्र की मांग भी उठाई। पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी भी उसी आतंकवाद की बलि चढ़ गए जिसके बाद  करुणानिधि सरकार बर्खास्त कर दी गई। बीते तीन दशक में वहां की सियासत में अनेक बदलाव हुए । राजीव की हत्या के लिए शक के दायरे में रही द्रमुक आज कांग्रेस की सहयोगी पार्टी है और नवगठित इंडिया गठबंधन की प्रमुख इकाई भी। यद्यपि करुणानिधि , एम.जी रामचंद्रन और जयललिता के न रहने के बाद  लगा था कि   उत्तर भारत के विरुद्ध बोए गए जहर का प्रभाव कम होने लगा है। लेकिन गाहे - बगाहे कभी हिन्दी तो कभी  द्रविड़ों को भारत का मूल निवासी बताकर अलग देश की मांग छेड़ी जाती रही है। ये कहने में कुछ भी गलत नहीं है कि दलित और पिछड़ों की जो राजनीति उत्तर भारत में हावी है उसे तमिलनाडु की द्रविड़ पार्टियों ने दशकों पहले अपना लिया था। यद्यपि वहां के समाज में  सनातनी परंपराएं आज भी यथावत हैं और  धार्मिक कट्टरता उत्तर भारत के राज्यों से कई गुना ज्यादा भी । बावजूद उसके 1967 के बाद से कांग्रेस और अन्य कोई दल द्रविड़ वर्चस्व को नहीं तोड़ सका। बीते दो दशक से भाजपा भी हाथ पांव मार रही है किंतु  उत्तर भारतीय होने का ठप्पा लगा होने से वांछित सफलता हाथ नहीं लगी। करुणानिधि  के बाद  विरासत के विवाद  में छोटे बेटे स्टालिन ने बाजी मार ली और मुख्यमंत्री बन गए। उधर जयललिता के बाद अन्ना द्रमुक में बिखराव आ गया । पिता के साए में सियासत करते रहने से स्टालिन भी हिन्दी तथा उत्तर भारत का विरोध करने का कोई अवसर नहीं छोड़ते । लेकिन गत दिवस उनकी सरकार में मंत्री उनके बेटे उदयनिधि ने बयान दे डाला कि सनातन धर्म मलेरिया , डेंगू और कोरोना जैसा है जिसकी केवल रोकथाम ही नहीं अपितु उसे जड़ से नष्ट किया जाना जरूरी है। उनके अनुसार कुछ चीजों को बदला नहीं जा सकता , उनको नष्ट करना ही उपाय है।  उक्त बयान के विरुद्ध भाजपा एवं संघ परिवार तो खुलकर सामने आ गया किंतु इंडिया गठबंधन की प्रमुख घटक कांग्रेस के सामने उगलत निगलत पीर घनेरी वाली स्थिति उत्पन्न  हो गई। इसलिए उसने तत्काल उस बयान से अपने को दूर कर लिया। समाजवादी पार्टी ने भी वही रास्ता अपनाया। गठबंधन की बाकी पार्टियां भी  बचती नजर आ रही हैं। हालांकि हिंदुत्व की प्रबल समर्थक शिवसेना के उद्धव ठाकरे गुट की खामोशी चौंकाने वाली है । लेकिन कांग्रेस के बड़े नेता पी.चिदंबरम के सांसद बेटे कार्ति चिदंबरम ने उदयनिधि के सनातन धर्म विरोधी बयान का समर्थन कर पार्टी को मुसीबत में डाल दिया है। कार्ति की मजबूरी ये है कि वे बिना द्रमुक की सहायता के अगला चुनाव नहीं जीत सकेंगे।  दिल्ली में प्रकरण दर्ज होने के बाद भी  उदयनिधि ने अपने बयान पर कायम रहने की बात कही है।  दरअसल ये  82 फीसदी हिंदुओं की भावनाओं को भड़काने का षडयंत्र है । रही बात सनातन धर्म को नष्ट करने की तो ऐसा सोचने वाले समय के साथ नष्ट होते गए किंतु सनातन धर्म और उसका प्रभाव आज विश्व व्यापी है।  उदयनिधि को ये समझना चाहिए कि नास्तिक होने के बाद भी चार दशक तक प.बंगाल में राज करने पर भी वामपंथी धार्मिक आस्था को खत्म नहीं कर सके । केरल में भी वामपंथी सत्ता में आते - जाते रहे किंतु वहां सनातनी परंपराएं यथावत हैं और नास्तिक कहे जाने वाली सरकार के राज में भी केरल को भगवान का अपना देश कहकर प्रचारित किया जाता है। ऐसे में जाति प्रथा नामक बुराई के नाम पर सनातन धर्म को मिटाने का ऐलान  देश को तोड़ने के साजिश है जिसका हर राजनीतिक दल को खुलकर विरोध करना चाहिए। उदयनिधि को ये याद रखना चाहिए कि पेरियार , अन्ना दोराई और करुणानिधि जैसे दिग्गज तक  डींग हांकते - हांकते चले गए किंतु तमिलनाडु में सनातन धर्म के प्रतीक प्राचीन मंदिरों के प्रति आस्था और सनातनी जीवन पद्धति में श्रद्धा लेश मात्र भी कम नहीं हुई। इसका कारण ये है कि सनातन धर्म में आत्मावलोकन की बेजोड़ क्षमता है और   वह  समय - समय पर अपनी कमियों को खुद होकर दूर करता रहता है।  सही बात तो ये है कि उदयनिधि और उनके बाप - दादे केवल अपनी गली के दादा रहे हैं । इसीलिए तमिलनाडु से बाहर आकर राजनीति करने की हिम्मत नहीं दिखा सके।

- रवीन्द्र वाजपेयी