Sunday, 17 September 2023

नए संसद भवन की भव्यता को गरिमा प्रदान करना सांसदों का दायित्व


गणेश चतुर्थी के पावन पर्व पर नए संसद भवन के शुभारंभ से इतिहास का एक नया पृष्ठ खुल रहा है। आजादी के पूर्व से ही जिस संसद भवन का उपयोग होता आया अब वह अतीत की स्मृतियों का जीवंत स्मारक बन जाएगा।आजादी की लड़ाई से लेकर बीते 75 साल की अनगिनत घटनाओं का साक्षी रहा यह भवन बढ़ती जरूरतों के लिहाज से छोटा पड़ने लगा था।   प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की प्रशंसा करनी होगी जिन्होंने रिकॉर्ड समय के भीतर इस भवन का निर्माण करवाने के साथ ही  प्रधानमंत्री आवास , सचिवालय और राजधानी में जगह -  जगह फैले केंद्र सरकार के दफ्तरों को एक ही परिसर में लाने की समझदारी दिखाई। इस परियोजना का विरोध करने वालों ने इसकी उपयोगिता और लागत पर भी  सवाल उठाए । लेकिन श्री मोदी ने  बिना विचलित हुए कदम आगे बढ़ाए। कोरोना काल में जब सभी गतिविधियां ठप्प पड़ी थीं तब भी इसका काम चलता रहा। सेंट्रल विस्टा नामक इस प्रकल्प के पूर्ण होने से राजधानी दिल्ली में केंद्र सरकार का समूचा प्रशासनिक ढांचा एक परिसर में केंद्रित होने से सरकार और जनता दोनों को सुविधा होगी। साथ ही निजी भवनों में कार्यरत कार्यालयों को दिया जाने वाला किराया भी बचेगा। सबसे बड़ी बात सुरक्षा प्रबंधों की है। उल्लेखनीय है लुटियंस की दिल्ली कहे जाने वाले इलाके में अंग्रेजों के जमाने में बनाए गए  बंगलों की जगह बहुमंजिला इमारतें खड़ी कर सांसदों को फ्लैट दिए जा रहे हैं । इससे बेशकीमती जमीन तो खाली हुई ही ,  सुरक्षा और रखरखाव  पर होने वाला खर्च भी बचने लगा। हाल ही में  जिस भारत मंडपम  में जी - 20 सम्मेलन संपन्न हुआ , वह भी रिकार्ड समय में बनकर तैयार हुआ । उसकी भव्यता वास्तु कला देखकर  संपन्न देशों के राष्ट्राध्यक्ष तक चकित रह गए। गत दिवस ही श्री मोदी ने यशोभूमि नामक जिस एक्सपो सेंटर के एक हिस्से का लोकार्पण किया वह एशिया का सबसे विशाल कन्वेंशन एवं  एग्जीबिशन परिसर होगा जिसमें 3000 वाहनों की  भूमिगत पार्किंग रहेगी। इस प्रकार के निर्माण देश की समृद्धि के साथ  वैश्विक दृष्टिकोण का  प्रतीक होते हैं। किसी भी  देश में ओलंपिक या अन्य ऐसे ही आयोजन के लिए बनाई गई अधो संरचना भावी जरूरतों के लिहाज से उपयोगी होती है। दिल्ली में हुए एशियाई और राष्ट्रमंडल खेलों के लिए बने स्टेडियम खेलों के आयोजन के लिए काम आते  हैं। इसी तरह विश्व कप क्रिकेट के आयोजन से देश में जगह - जगह अंतर्राष्ट्रीय मैचों का आयोजन संभव हो सका। आजकल बहुराष्ट्रीय कंपनियों सहित अंतर्राष्ट्रीय संगठन अपनी बैठकों और सम्मेलनों के लिए ऐसे स्थान तलाशते हैं जो सभी आधुनिक सुविधाओं से युक्त हों । दुबई उसका सबसे अच्छा उदाहरण  है जो  बिना तेल संपदा के भी पूरे विश्व को आकर्षित कर रहा है। यहां तक कि यूरोपीय देशों तक से लोग वहां आने लगे हैं। दुबई फेस्टिवल तो विश्व के सबसे बड़े व्यापार मेलों में गिना जाता है। उस दृष्टि से भारत काफी पीछे था। श्री मोदी ने सत्ता संभालते ही ऐसे प्रकल्पों पर ध्यान केंद्रित किया। गुजरात में  सरदार पटेल की जो मूर्ति बनाई गई वह विश्व में सबसे ऊंची है। उसके निर्माण का भी खूब मजाक बनाया गया किंतु जल्द ही वह स्थान देश का प्रमुख पर्यटन स्थल बन गया है जिससे आसपास के क्षेत्र में आर्थिक समृद्धि आई। इसी तरह काशी में विश्वनाथ और उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर के कायकाल्प ने  इन दोनों शहरों की आर्थिक स्थिति में अकल्पनीय सुधार किया है। सबसे बड़ा उदाहरण अयोध्या का है जहां राम मंदिर का निर्माण पूर्ण होने के पहले ही विकास की अनंत संभावनाएं उभरकर सामने आने लगी हैं। जिस नए भारत का उदय कोरोना काल के उपरांत हुआ उसमें वैश्विक स्तर पर खुद को स्थापित करने का उत्साह जागा है। चंद्रयान की सफलता और फिर सूर्य के अध्ययन के लिए अंतरिक्ष यान का सफल प्रक्षेपण इसका प्रमाण हैं। जी - 20 सम्मेलन ने दुनिया की  बड़ी ताकतों को भारत के उत्थान को निकट से देखने का जो अवसर दिया उसके दूरगामी परिणाम होंगे। गत दिवस नए संसद भवन पर राष्ट्रध्वज   फहराकर उपराष्ट्रपति जगदीप धनगड़ ने उसे संवैधानिक स्थिति भी प्रदान कर दी। लेकिन अब ये पक्ष और विपक्ष  के सांसदों का नैतिक दायित्व है कि वे नए  भवन की  भव्यता को अपने आचरण से गरिमा प्रदान करें। उनको ये बात समझना चाहिए कि जनमानस में लोकतंत्र और संसद के प्रति तो पूरी आस्था और सम्मान है किंतु  सदन के भीतर अशोभनीय और  गैर जिम्मेदाराना आचरण के कारण सांसदों का सम्मान निरंतर घटता जा रहा है । ऐसे में नया संसद भवन सांसदों को दायित्वबोध का एहसास करवाने में सहायक हो तभी उसकी उपयोगिता साबित हो सकेगी। आजादी के 75 वर्ष पूर्ण करने के बाद स्वनिर्मित संसद भवन से भारतीय लोकतंत्र का संचालन  आत्म निर्भरता और आत्म गौरव का संदेश वाहक बनेगा यह अपेक्षा हर देशवासी के मन में  है।


- रवीन्द्र वाजपेयी 

Saturday, 16 September 2023

गांधी परिवार के खूंटे से बंधे पत्रकारों के नाम भी तो उजागर करे विपक्ष


आई.एन .डी .आई .ए नामक गठबंधन द्वारा जिन 10 एंकरों के टीवी शो में न जाने का निर्णय किया उन पर आरोप है कि उनका झुकाव भाजपा के प्रति है। लेकिन उसे उन एंकरों की सूची भी सार्वजनिक करना चाहिए जो सुबह - शाम मोदी और भाजपा की तीखी आलोचना करते रहते हैं। ऐसे में यदि दूसरा पक्ष उनके बहिष्कार की घोषणा कर दे तब विपक्ष उसे मीडिया विरोधी कदम ठहराने से बाज नहीं आएगा। दरअसल बहिष्कार का फैसला कुंठा के सिवाय कुछ भी नहीं। सवाल ये है कि क्या कांग्रेस और शरद पवार में साहस है कि अरविंद केजरीवाल का बहिष्कार करें जिन्होंने तमाम विपक्षी नेताओं को सबसे भ्रष्ट की सूची में रखा था। इसी तरह कांग्रेस में ममता बैनर्जी का बहिष्कार करने की हिम्मत है जो राहुल गांधी को प्रधानमंत्री पद के लिए अनुपयुक्त बता चुकी हैं। ऐसे ही शिव भक्त राहुल और हनुमान भक्त अरविंद में हिम्मत है जो तमिलनाडु के मुख्यमंत्री के बेटे उदयनिधि द्वारा सनातन को खत्म करने वाले बयान पर द्रमुक का बहिष्कार करें। जहां तक बात भाजपा समर्थक होने की है तो देश के उपराष्ट्रपति और लोकसभाध्यक्ष भी तो भाजपा से जुड़े रहे हैं । विपक्ष उन पर भी पक्षपात का आरोप लगाता है। तो क्या वह राज्यसभा और लोकसभा की बैठकों में जाना बंद कर देगा और जिन राज्यों में भाजपा को जबरदस्त जन समर्थन है वहां की जनता से नाता तोड़ लेगा? ऐसे ही कुछ अन्य सवाल भी हैं। याद रहे लोकतंत्र विचारों के आदान - प्रदान से मजबूत होता है। अतीत में सरकारी नियंत्रण वाले दूरदर्शन और आकाशवाणी पर विपक्ष को पर्याप्त महत्व नहीं मिलता था किंतु किसी ने उनके बहिष्कार की बात नहीं की। प्रख्यात पत्रकार स्व.कुलदीप नैयर पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के विरोधी माने जाते थे । 1990 में जनता सरकार ने उनको लंदन में उच्चायुक्त बनाया। 1997 में वे राज्यसभा में नामांकित किए गए। बाद में वे भाजपा और संघ परिवार के घोर विरोधी बन गए। लेकिन किसी ने उनके बहिष्कार की बात नहीं की। इसी तरह प्रसिद्ध लेखक -पत्रकार स्व.खुशवंत सिंह भी कांग्रेस की कृपा से राज्यसभा में भेजे गए किंतु उन पर ऐसे आरोप नहीं लगे। एम.जे.अकबर जनता दल से होते हुए भाजपा में आए। अनेक अखबारों और टीवी चैनलों के मालिकों ने भी राज्यसभा की सीट हासिल की। टीवी चैनलों के एंकरों में बड़ा नाम कहे जाने वाले आशुतोष ने आम आदमी पार्टी से चुनाव लड़ा और हारने के बाद दोबारा पत्रकारिता कर रहे हैं । आज के दौर में दर्जनों पत्रकार , एंकर और यू ट्यूबर हैं जो मोदी और भाजपा के विरोध के सिवाय कुछ और नहीं करते । लेकिन उनके बहिष्कार की बात किसी ने नहीं सुनी। ये सब देखते हुए विपक्ष द्वारा कुछ एंकरों के बहिष्कार का फैसला उसके अपने लिए नुकसानदेह है। पत्रकार का दायित्व है समाचारों को सही रूप में पाठकों अथवा दर्शकों तक पहुंचाए। रही बात प्रशंसा और आलोचना की तो वह समाचार से अलग स्तंभों में ही अच्छी लगती है। समाचार माध्यमों में विभिन्न लेखकों और समीक्षकों की रचनाएं प्रकाशित होती हैं जिनमें सरकार की तारीफ और आलोचना दोनों रहती हैं। विपक्ष यदि चाहे कि समाचार माध्यम उसकी हर बात को सही मानकर प्रचारित करें तो ये अपेक्षा बेमानी है। एक समय था जब पत्रकार बिरादरी में कांग्रेस , समाजवादी और वामपंथी विचारधारा से प्रभावित लोगों की बहुतायत थी।अनेक नेताओं के खुद के पत्र समूह और टीवी चैनल हैं। जिनमें सत्ताधारी और विपक्षी दोनों हैं। शिवसेना का अपना मुखपत्र सामना है जिसके संपादक ही पार्टी के प्रवक्ता होते हैं। कांग्रेस सांसद राजीव शुक्ल भी एक चैनल के मालिक हैं जिसका संचालन उनकी पत्नी करती हैं। सामना ने राहुल गांधी द्वारा वीर सावरकर की आलोचना का खुलकर विरोध किया था । तो क्या कांग्रेस उसका भी बहिष्कार करेगी ? संसद में कांग्रेस और उसके सहयोगी अडानी मामले में जेपीसी की मांग पर अड़े रहे लेकिन शरद पवार और ममता बैनर्जी ने उसका साथ नहीं दिया। श्री पवार ने तो अडानी से मुलाकात कर खुलेआम उसका समर्थन किया। बावजूद उसके कांग्रेस या अन्य किसी की हिम्मत नहीं हुई उनके विरुद्ध बोलने की। ये सब देखते हुए कुछ चुनिंदा एंकरों के बहिष्कार का फैसला अपरिपक्वता की निशानी है। आपातकाल लगाते समय इंदिरा जी ने भी समाचार माध्यमों पर सेंसरशिप थोप दी । उसका क्या परिणाम हुआ ये इतिहास में दर्ज है। दुर्भाग्य से आई.एन .डी .आई .ए नामक गठबंधन में शामिल दलों ने उस अनुभव को भुला दिया। वैसे भी टीवी पर नेताओं के बीच आयोजित होने वाली बहस में जनता की रुचि घटती जा रही है। सत्ता पक्ष को लगता है विपक्ष के एक से ज्यादा प्रतिनिधि होने से वह अपना पक्ष नहीं रख पाता , वहीं विपक्ष को लगता है उसकी उपेक्षा कर भाजपा को महत्व दिया जाता है। कांग्रेस के समय यही शिकायत तत्कालीन विपक्ष को रही। लेकिन बहिष्कार इस समस्या का हल नहीं है। विपक्ष द्वारा समाचार पत्रों और चैनलों पर सरकार का अंधा समर्थन करने का जो आरोप लगाया जाता है वह न पूरी तरह सही है और न ही गलत। पत्रकार बिरादरी में पेशेवर लोगों का आगमन तेजी से हुआ है किंतु अभी भी राजनीतिक प्रतिबद्धता से जुड़े लोग हैं । धीरे - धीरे पत्रकारिता पर व्यावसायिकता का रंग चढ़ गया है। जिसका कारण पत्रकारों के हाथों से निकलकर समाचार माध्यमों का पूंजीपतियों के हाथ चला जाना है । इसके लिए आज विपक्ष में बैठी कांग्रेस भी कम उत्तरदायी नहीं है। इसलिए बेहतर तो यही होगा कि विपक्ष अपने गिरेबान में भी झांके और उन एंकरों और पत्रकारों के नाम भी बताए जो कांग्रेस और विशेष रूप से गांधी परिवार के खूंटे से बंधे हुए हैं। कार्ति चिदंबरम और प्रियांक खरगे द्वारा सनातन धर्म विरोधी बयान पर उनकी खामोशी इसका प्रमाण है।

-रवीन्द्र वाजपेयी 

Friday, 15 September 2023

लोकतंत्र के मंदिरों को अपराधियों से मुक्त रखने आगे आएं राजनीतिक दल



संसद और विधानसभा भवन केवल ईंट और पत्थरों से बने ढांचे नहीं अपितु लोकतंत्र के  मंदिर हैं जिनकी पवित्रता बनाए रखना सभी का कर्तव्य है। और फिर जिन लोगों को सांसद और विधायक बनाकर जनता उनमें बिठाती है , उनकी छवि बेदाग होना और भी जरूरी है। जिस तरह मंदिर या अन्य  धर्मस्थल पर अपवित्र स्थिति में प्रवेश धर्मविरुद्ध है ठीक वैसे ही संसद और विधानसभा में  ऐसे व्यक्ति के बैठने से उसकी गरिमा नष्ट होते है जिसका दामन  दागदार हो। लंबे समय से ये मुद्दा राष्ट्रीय स्तर पर विमर्श का विषय बना हुआ है कि लोकतंत्र के मंदिरों में ऐसे जनप्रतिनिधियों का प्रवेश वर्जित हो जो अपराधी प्रवृत्ति के और सजायाफ्ता  हों। वर्तमान प्रावधान के अनुसार दो वर्ष या उससे अधिक की सजा होते ही सदस्यता समाप्त हो जाती है और सजा पूरी होने के बाद भी छह वर्ष तक चुनाव लड़ने पर रोक रहती है। ऐसे में दागी व्यक्ति जनता के समर्थन से फिर सांसद, विधायक और मंत्री बन सकता है। इस विसंगति के विरुद्ध न्यायपालिका और चुनाव आयोग के साथ ही समाज के जागरूक तबके में जनमत तैयार हो रहा है। इसी सिलसिले में गत दिवस सर्वोच्च न्यायालय द्वारा एक याचिका के सिलसिले में नियुक्त न्याय मित्र विजय हंसारिया ने अपनी रिपोर्ट सौंपकर सुझाव दिया कि सजा पूरी होने के बाद चुनाव लड़ने पर छह साल के बजाय आजीवन प्रतिबंध होना चाहिए। याचिकाकर्ता अश्विनी उपाध्याय की भी यही मांग  है। यद्यपि ये कुछ अर्थों में अव्यवहारिक भी लगती है। मसलन , कांग्रेस नेता राहुल गांधी को मानहानि के आरोप में अदालत द्वारा 2 वर्ष की सजा सुनाए जाने के बाद उनकी सांसदी रद्द कर दी गई। जिस पर सर्वोच्च न्यायालय ने  स्थगन तो दे दिया  किंतु  सजा बहाल रही और वे जेल गए तब आठ साल तक वे चुनाव नहीं लड़ सकेंगे। और कहीं संदर्भित याचिका मंजूर हो गई तब तो आजीवन चुनाव लड़ने से वंचित हो जायेंगे। जो उनके अपराध की गंभीरता देखते हुए ज्यादा लगता है। वहीं दूसरी तरफ ये भी सही है कि हत्या , महिलाओं पर अत्याचार , भ्रष्टाचार जैसे मामलों में  सजा पूरी करने के बाद सांसद या विधायक बनकर सत्ता का हिस्सा बनने के बाद वे कानून बदलवाने का प्रयास कर सकते हैं। अनेक मामलों में ऐसा हो भी चुका है  और ऐसे निर्णयों को सर्वदलीय स्वीकृति भी प्राप्त हुई। मौजूदा सांसदों और विधायकों में औसतन 42 फीसदी पर आपराधिक प्रकरण चल रहे हैं। इनमें से ज्यादातर पांच वर्ष से भी ज्यादा अवधि से अदालतों में लंबित हैं। यद्यपि जनप्रतिनिधियों पर चल रहे अपराधिक प्रकरणों हेतु विशेष न्यायालय बनाए गए हैं जिससे निराकरण जल्द हो सके किंतु अदालती व्यवस्था में व्याप्त पेचीदगियों के चलते ऐसा हो नहीं पा रहा। बहरहाल जहां तक सवाल दागी होने का है तो ये मामला वैधानिक से ज्यादा नैतिकता से जुड़ा हुआ है। भले ही आरोपी होने मात्र से किसी का अपराध साबित नहीं हो जाता और ये भी सही है कि राजनीतिक वैमनस्यता के चलते  झूठे  आरोप लगाकर छवि खराब करने का कुचक्र भी रचा जाता है । बावजूद इसके राजनीतिक दलों की जिम्मेदारी है कि वे चुनाव मैदान में उतारे जाने वाले व्यक्ति की अपराधिक पृष्ठभूमि की अच्छी तरह जांच कर लें। अनेक राजनेताओं के साथ बाहुबली  शब्द जुड़ा होता है जिनकी कोई विचारधारा नहीं होती। ये किसी भी दल से लड़ें इनकी जीत सुनिश्चित होती है। यहां तक कि जेल में रहते हुए भी जनता इन्हें जिता देती है। इससे भी बढ़कर बात ये है कि अपने प्रभावक्षेत्र में ये अपने समर्थक को भी सांसद - विधायक बनवाने की हैसियत रखते हैं। चूंकि राजनीतिक दलों के सामने अपना संख्याबल बढ़ाना ही एकमात्र लक्ष्य रह गया है इसलिए वे उम्मीदवारों  का चयन करते समय चुनाव जीतने की क्षमता पर जोर देते हैं। यदि कोई अपराधी प्रवृत्ति  या दागदार छवि का व्यक्ति निर्दलीय लड़कर सांसद और विधायक बन जाए तो निश्चित तौर पर जनता को दोष दिया जा सकता है किंतु जब राष्ट्रीय पार्टियां ही बाहुबली और अपराधी पृष्ठभूमि के लोगों को टिकिट देती हैं तब ज्यादा दोष उनका माना जाना चाहिए । ऐसे में सर्वोच्च न्यायालय के फैसले की प्रतीक्षा किए बिना राजनीतिक दलों को चाहिए वे दागी उम्मीदवार बनाने से परहेज करें जो पार्टी के साथ ही  लोकतांत्रिक  प्रणाली के प्रति भी जनता के मन में वितृष्णा उत्पन्न करते हैं। आगामी सप्ताह देश की नई संसद में कार्य शुरू होने जा रहा है। लेकिन सोचने वाली बात ये है कि क्या नया भवन बनने मात्र से राजनीति में आई गंदगी दूर हो जाएगी? बेहतर हो  राजनीतिक पार्टियां सामूहिक तौर पर  अपराधी तत्वों से लोकतंत्र को मुक्त रखने का साहस दिखाएं । चुनाव सुधारों पर होने वाली अंतहीन चर्चाओं के बीच यदि दागदार चेहरों से संसद और विधानसभाओं को बचाने की ईमानदारी दिखाई जाए तो भारतीय लोकतंत्र एक नए रूप में सामने आ जाएगा और समाज का वह सुशिक्षित वर्ग भी चुनावी राजनीति में कूदने को तैयार हो जाएगा जो दागी नेताओं के कारण  दूर बना रहता है।

- रवीन्द्र वाजपेयी 

Thursday, 14 September 2023

हिन्दी की सबसे ज्यादा उपेक्षा तो हिन्दी भाषी ही करते हैं


आज एक तरह से हिन्दी का सरकारी जन्मदिवस है। 1953 में 14 सितम्बर को राजभाषा दिवस की घोषणा हुई। कालांतर में  सप्ताह , पखवाड़ा और मास भी मनाए जाने लगे । वैसे तो ये गौरव की बात है कि दर्जनों प्रांतीय भाषाओं के बावजूद इन आयोजनों में  हिन्दी का महिमामंडन करते हुए उसकी सहजता और सरलता की प्रशंसा के साथ ही  स्वीकार्यता का वचन लिया जाता है। इसके निमित्त प्रतियोगिताएँ , पुरस्कार  , सम्मान  , गोष्ठियां , कवि सम्मलेन, पोस्टर - बैनर , जैसे अनेक क्रियाकलाप होते हैं। काफी पहले से केंद्र  सरकार के सभी विभागों  तथा उपक्रमों में राजभाषा अधिकारी कार्यरत हैं जिनका दायित्व  हिन्दी के अधिकतम उपयोग  के लिये गैर हिन्दी भाषियों को प्रशिक्षित करना है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि उनके प्रयासों से सरकारी प्रतिष्ठानों में हिन्दी का उपयोग काफी बढ़ा है। यद्यपि भाषावार प्रान्तों के गठन से उत्पन्न क्षेत्रीयता की भावना  हिन्दी के विरोध का कारण बनती रही है। चुनावी राजनीति ने भाषा को भी वोट बैंक का जरिया बना दिया। उदाहरण के लिए पूर्व केंद्रीय मंत्री डी. राजा ने तो केंद्र सरकार पर हिन्दी थोपने का आरोप लगाते हुए अलग तमिल देश की धमकी तक दे डाली थी । महाराष्ट्र में भी उद्धव ठाकरे की शिवसेना और राज ठाकरे की मनसे मराठी भाषा के नाम पर लोगों को भड़काने का काम करती रही हैं।  परिणामस्वरूप अन्य राज्यों में भी  क्षेत्रीय भाषा के नाम पर  सियासती गोटियां बिठाने का प्रयास होता रहता है। हालांकि राहत की बात है कि उत्तर भारतीय राज्यों में अदालतों के अलावा राष्ट्रीय और प्रांतीय स्तर की  प्रतियोगी परीक्षाओं में भी हिन्दी को मान्यता मिल गयी है। गत दिवस आए इस समाचार ने सभी हिन्दी प्रेमियों को आल्हादित किया कि देश के सबसे बड़े अलाहाबाद उच्च न्यायालय में हाल ही के वर्षों में 20 हजार फैसले हिन्दी में लिखे गए। ऐसी बातें आश्वस्त करती हैं  किंतु इसका विरोधाभासी दूसरा पहलू भी है। अर्थात जिस वर्ग की मातृभाषा हिन्दी है उसके एक बड़े वर्ग द्वारा उसके प्रति  उपेक्षाभाव दिखाया जाना पीड़ा पहुंचाता है। प्रारंभ में तो संपन्न वर्ग ही अंग्रेजी को सभ्यता और आधुनिकता का प्रतीक मानकर उसके मोहपाश में जकड़ा था परंतु समय बीतने के साथ मध्यम आय वर्ग में भी जिस तरह उसके प्रति अनुराग बढ़ा उससे सांस्कृतिक विकृति में भी वृद्धि  हुई। अँग्रेजी माध्यम में शिक्षा को सफलता की  गारंटी मान लेने की मानसिकता की वजह से शालेय स्तर पर पढ़ाई का स्वरूप ही पूरी तरह से  बदल गया।  गली -  गली नजर आने वाले  कान्वेंट स्कूल के बोर्ड  इसका प्रमाण हैं । यदि इनमें  अध्ययन करने वाले निम्न आय वर्ग परिवारों के बच्चे काम चलाऊ अंग्रेजी  ही सीख जाएँ तो भी ठीक है  परंतु अंग्रेजी की चकाचौंध में वे  हिन्दी में ही कमजोर हो जाते हैं। इस अधकचरेपन  के लिये  वे अभिभावक भी जिम्मेदार हैं जो अंग्रेजी की मृगमरीचिका में अपनी संतानों को उनकी  मातृभाषा से ही दूर कर बैठते हैं । यद्यपि भारत में हिन्दी को समाप्त करना असंभव  है क्योंकि वही  राष्ट्रीय स्तर की संपर्क भाषा है। इसीलिए  तमिलभाषी उत्तर  भारत में नौकरी अथवा व्यवसाय करने में लेशमात्र भी  संकोच नहीं करते। इसी तरह उप्र - बिहार के श्रमिक  बड़ी संख्या में दक्षिणी राज्यों में भी कार्यरत हैं। कोरोना काल में महानगरों से मजदूरों की  घर वापसी के समय ये बात उजागर हुई कि गैर हिन्दी भाषी राज्यों में भी इन श्रमिकों का कोई विरोध नहीं है। ये देखते हुए हिन्दी भाषी लोगों को अपनी भाषा के प्रति उपेक्षाभाव त्यागना चाहिए । भाषा के रूप में अंग्रेजी  सीखना कतई बुरा नहीं है । लेकिन उसके जरिए आ रहे संस्कार समाज के लिए घातक हैं। विचारणीय है कि अंग्रेजी साहित्य और संस्कृति का प्रभाव आजादी के 75 वर्ष  बाद भी यथावत है। इतिहास साक्षी है कि विदेशी भाषा के आधिपत्य ने अनेक देशों की सांस्कृतिक पहिचान को नष्ट कर दिया। ये देखते हुए आज से होने वाले सरकारी और गैर सरकारी  आयोजन  प्रचार - प्रसार की दृष्टि से तो अच्छे हैं लेकिन जब तक अपनी मातृभाषा के उपयोग के लिए  हिन्दी भाषी ही आकर्षित नहीं होते तब तक सरकारी संरक्षण चाहे कितना मिल जाए परंतु वह उपेक्षित ही रहेगी। तामिलनाडु  के नेताओं का  हिन्दी विरोध तो राजनीतिक स्वार्थ पर आधारित है किंतु हिन्दी भाषी राज्यों में हिन्दी की उपेक्षा समझ से परे है। मातृभाषा में प्राथमिक शिक्षा हेतु बनी नई शिक्षा नीति इस दिशा में अच्छा कदम है किंतु उसे ईमानदारी से अपनाना जरूरी है क्योंकि हिन्दी को सबसे ज्यादा खतरा हिन्दी भाषियों से ही है।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 13 September 2023

अपने नेता पुत्रों के सनातन विरोधी बयानों पर कांग्रेस की चुप्पी सवाल खड़े कर रही


जी -20 सम्मेलन समाप्त होते ही लोगों का ध्यान एक बार फिर घरेलू मामलों पर केंद्रित होने लगा है। विशेष रूप से तमिलनाडु सरकार में मंत्री उदयनिधि द्वारा सनातन धर्म के बारे में दिए गए आपत्तिजनक बयान को लेकर देश भर में हिंदू धर्मावलंबी अक्रोशित हैं। सनातन धर्म और आध्यात्मिक क्षेत्र की अनेक हस्तियों ने उदयनिधि के कथन की कड़ी निन्दा की है। अनेक शहरों में विरोध स्वरूप जुलूस , धरना -प्रदर्शन भी देखने मिले। लेकिन आश्चर्य की बात ये है कि विपक्ष से जिस तरह की प्रतिक्रिया अपेक्षित थी वह नहीं सुनाई दी। सबसे चौंकाने वाला रवैया कांग्रेस का कहा जा सकता है जो उदयनिधि के बेहद आपत्तिजनक बयान से केवल पल्ला झटककर बैठ गई जबकि उसे चाहिए था कि खुलकर सनातन धर्म की डेंगू , मलेरिया और कोरोना से तुलना करने वाले संदर्भित बयान पर उनके पिता तामिलनाडु के मुख्यमंत्री स्टालिन के समक्ष अपना विरोध व्यक्त करते हुए  चेतावनी देती कि उनके बेटे का सनातन विरोधी रवैया विपक्षी एकता के लिए नुकसानदेह साबित होगा और  जनमानस  में ये बात गहराई तक बैठ जाएगी कि इंडिया नामक विपक्षी गठबंधन हिंदुओं की भावनाओं को ठेस पहुंचाने बना है।  कांग्रेस ही नहीं बल्कि उक्त गठबंधन में शरीक अन्य दलों ने भी उदयनिधि की आलोचना में बेहद नर्म रवैया अपनाकर दिखा दिया कि वे सब द्रमुक के दबाव में हैं। शिवसेना जैसी कट्टर हिंदूवादी पार्टी के  बड़बोले नेता तक दबी जुबान ही विरोध करने का साहस जुटा सके। इससे उदयनिधि का हौसला और बढ़ा और उन्होंने बजाय खेद जताने के अपनी आपत्तिजनक बातों को ही दोहराया। सनातन के बाद वे अपने असली रंग पर आ गए और भाजपा के बारे में भी उसी तरह की टिप्पणी करने लगे। तामिलनाडु के कांग्रेस सांसद कार्ति चिदंबरम और कर्नाटक सरकार में मंत्री प्रियांक खरगे ने भी उदयनिधि के बयान का समर्थन किया जो  कांग्रेस के दिग्गज नेता क्रमशः पी चिदंबरम और मल्लिकार्जुन खरगे के बेटे हैं । इस बारे में ध्यान देने योग्य बात ये है कि कांग्रेस ने उदयनिधि के बयान से तो किनारा कर लिया किंतु पार्टी के सांसद और राज्य सरकार में मंत्री की कुर्सी पर बैठे नेता पुत्रों की सनातन विरोधी टिप्पणियों पर उसका चुप्पी साध लेना ये दर्शाता है कि इस मामले में वह दोहरा रवैया अपना रही है। अन्यथा जिस तत्परता से उसने द्रमुक नेता के बयान से दूरी बनाई वैसी ही मुस्तैदी वह कार्ति और प्रियांक के जहरीले बयान पर भी दिखाती। इंडिया गठबंधन के कुछ नेता जिनमें ममता बैनर्जी भी हैं ,ने केवल ये कहकर रस्म अदायगी की कि किसी को भी दूसरे धर्म की आलोचना नहीं करना चाहिए। इसी के साथ ये बात भी देखने मिली कि इंडिया गठबंधन में शामिल  किसी भी दल की ओर से श्री चिदम्बरम और श्री खरगे के बेटों द्वारा उदयनिधि के समर्थन में दिए बयान की आलोचना करने की हिम्मत नहीं दिखाई गई। इससे ये प्रतीत होता है कि सनातन अथवा हिन्दू धर्म के प्रति इन पार्टियों का दृष्टिकोण बेहद लापरवाही भरा है। भाजपा नेत्री नुपुर  शर्मा द्वारा इस्लाम के प्रवर्तक के बारे में की गई टिप्पणी पर इन्हीं पार्टियों ने पूरे देश में आसमान सिर पर उठा लिया था किंतु कट्टरपंथियों द्वारा नुपुर को जिस तरह की धमकियां दी गईं उनके बारे में कुछ नहीं बोला गया। भाजपा ने तो हिन्दू वादी  होने के बावजूद अपनी नेत्री को निकाल बाहर किया जिस पर पार्टी के भीतर भी असंतोष देखा गया। हालांकि उदयनिधि तो  दूसरे दल के हैं लेकिन कांग्रेस अपने नेता पुत्रों पर सनातन विरोधी बयान का समर्थन किए जाने के दंड स्वरूप कार्रवाई करती तब उसका सर्व धर्म प्रेम साबित होता । लेकिन वह शांत रही जिससे यही एहसास निकलकर सामने आया कि उदयनिधि के बयान से बचने के बाद उसके अपने नेताओं द्वारा उसी बात को सही ठहराया जाना परोक्ष तौर पर बयान का समर्थन ही है। निकट भविष्य में कुछ राज्यों के  विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं। उसके कुछ महीनों बाद से लोकसभा चुनाव की हलचल शुरू हो जायेगी। ऐसे में कांग्रेस के सहयोगी दल द्रमुक के नेता  द्वारा सनातन धर्म का विरोध और कांग्रेस के भीतर से उसका समर्थन हवा में उड़ाने वाली बात नहीं है। भाजपा द्वारा सोनिया गांधी और राहुल गांधी से इस विवाद पर अपना रूख स्पष्ट करने की मांग  उचित ही है क्योंकि ऐसे संवेदनशील मामले में कांग्रेस के प्रथम परिवार का मौन अनेक प्रश्नों को जन्म दे रहा है। देश का नाम इंडिया से भारत किए जाने के मुद्दे को जोर - शोर से उठाने वाली पार्टी देश की 82 फीसदी आबादी की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाए जाने पर यदि चुप रहे तो फिर उस पर लगने वाला तुष्टीकरण का आरोप साबित करने के लिए किसी सबूत की जरूरत ही नहीं रह जाती।


-रवीन्द्र वाजपेयी 

Tuesday, 12 September 2023

काश , थरूर और मनमोहन सिंह जैसी समझदारी बाकी भी दिखाते


कांग्रेस सांसद शशि थरूर  अक्सर चर्चाओं में रहते हैं। लेखक होने के साथ ही वे अच्छे वक्ता भी हैं और वैश्विक दृष्टिकोण रखते हैं जिसका कारण संरासंघ में कार्य  का उनका अनुभव है। विभिन्न विषयों पर उनकी टिप्पणियां  राजनीतिक प्रतिबद्धता से अलग होने के कारण उन्हें विवादित भी बना देती हैं। कांग्रेस में  नेतृत्व परिवर्तन की मुहिम चलाने  वाले जी - 23 समूह के  सदस्य रहे श्री थरूर ने कांग्रेस अध्यक्ष का चुनाव भी लड़ा किंतु गांधी परिवार का सहयोग नहीं मिलने के कारण मल्लिकार्जुन खरगे से  बुरी तरह हार गए।  लेकिन श्री थरूर अभी भी मुखर हैं और उनके कुछ बयान पार्टी की रीति - नीति से भिन्न भी होते हैं।  विदेश नीति पर वे मोदी सरकार की जो तारीफ करते हैं उससे उनके भाजपा में जाने के कयास भी लगते हैं । हालांकि  बाकी मसलों पर वे आलोचना करने में पीछे नहीं रहते। इसका ताजा उदाहरण है , जी - 20 सम्मेलन में जारी सर्वसम्मत साझा बयान को  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की  कूटनीतिक उपलब्धि बताना।  हालांकि सम्मेलन में विपक्षी नेताओं को पर्याप्त महत्व नहीं दिए जाने की आलोचना करते हुए उन्होंने ये भी कहा कि घरेलू स्तर पर समन्वय का अभाव है। सतही तौर पर तो उनकी बात में सच्चाई है किंतु इसके लिए केवल सरकार को दोष देना एकपक्षीय होगा। मसलन  विदेशी राष्ट्राध्यक्षों के सम्मान में राष्ट्रपति द्वारा प्रेषित निमंत्रण पत्र में अंग्रेजी में प्रेसीडेंट ऑफ भारत लिखे जाने पर विपक्ष ने जो बवाल मचाया वह  अनावश्यक था। ऐसे समय जब दुनिया के प्रमुख देशों के राष्ट्रप्रमुख भारत आने  शुरू हो चुके थे तब सरकार पर देश का नाम बदलने जैसा आरोप  छवि खराब करने का प्रयास ही था।  जी - 20 सम्मेलन में भी श्री मोदी के सामने रखी पट्टिका पर भारत ही लिखा गया था। इस बारे में श्री थरूर की तरह पूर्व प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह भी प्रशंसा के पात्र हैं जिन्होंने सम्मेलन के पूर्व दिए साक्षात्कार में प्रधानमंत्री श्री मोदी  की इस बात के लिये प्रशंसा की कि उन्होंने रूस - यूक्रेन युद्ध में  सुलझी हुई कूटनीति का परिचय दिया। लेकिन दूसरी तरफ राहुल गांधी  जी - 20 के दौरान बेल्जियम में बैठे हुए भारतीय विदेश नीति की प्रशंसा करने के बजाय लोकतांत्रिक संस्थाओं पर हमले का रोना रोते रहे। हालांकि अपनी प्रत्येक विदेश यात्रा में  वे इसी तरह का प्रयास करते हैं । लेकिन जब सवाल देश की प्रतिष्ठा का हो तब एकजुटता की अपेक्षा की जाती है। दुनिया भर के शीर्षस्थ राष्ट्र प्रमुख भारत में आकर उसकी प्रशंसा कर रहे हों तब विपक्ष का एक नेता देश में लोकतांत्रिक व्यवस्था के खतरे में होने की बात करे तो यह शर्मनाक है । ऐसे में  श्री थरूर से अपेक्षित है वे  पार्टी के भीतर इस बात को उठाएं कि विदेशी धरती पर उसके  नेता इस झूठ को फैलाने से बचें कि भारत में लोकतंत्र को नष्ट किया जा रहा है। अखिरकार श्री गांधी सहित उन जैसे अन्य नेताओं को भी समझना चाहिए कि  हाल ही में कुछ राज्यों में कांग्रेस को सरकार बनाने का अवसर लोकतंत्र ने ही दिलाया और उनकी सांसदी निरस्त करने के फैसले पर सर्वोच्च न्यायालय द्वारा स्थगन भी लोकतंत्र के रहते ही संभव हो सका। विपक्ष के कुछ अन्य नेता भी हैं जो ऊल जलूल टिप्पणियां करने से बाज नहीं आते। जी - 20 सम्मेलन के ठीक पहले भारत और इंडिया का विवाद खड़ा कर विपक्ष ने जिस असंवेदनशीलता का परिचय दिया उसके बाद सरकार से सौजन्यता की अपेक्षा अर्थहीन है। श्री थरूर और डा.मनमोहन सिंह ने  जिस तरह रचनात्मक रवैया प्रदर्शित किया वह अन्य विपक्षी नेता भी अपना लें तो घरेलू राजनीति का मिजाज भी बदल जायेगा। विपक्ष सरकार की शान में कसीदे पढ़े ये तो  अव्यवहारिक होगा लेकिन विदेशों में देश के लोकतंत्र पर सवाल खड़े करना गैर जिम्मेदाराना है। सरकार या प्रधानमंत्री की आलोचना करने का पूरा अधिकार होने के बावजूद  श्री गांधी और अन्य नेताओं को  ध्यान रखना चाहिए कि विदेश में वे भारतीय लोकतंत्र के प्रतिनिधि होते हैं।  स्व.अटल जी को जब स्व. पी.वी नरसिम्हा राव ने कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तान की मोर्चेबंदी विफल करने के लिए जिनेवा में हुए अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन में भारतीय दल का नेता बनाकर भेजा तो उस निर्णय की पूरे देश में प्रशंसा हुई। और वह भी तब जबकि अटल जी , राव साहब और उनकी सरकार के घोर आलोचक थे। आज विपक्ष का एक भी नेता ऐसा नहीं है जो उस कसौटी पर खरा हो। यदि बेल्जियम में बैठकर श्री गांधी , जी - 20 के आयोजन और उसमें भारत की भूमिका की प्रशंसा करते तब श्री थरूर द्वारा घरेलू राजनीति में भी समन्वय बनाने की सरकार से अपेक्षा का औचित्य होता। बड़ी बात नहीं  विदेश नीति की तारीफ करने के लिए श्री थरूर और डा.मनमोहन सिंह भी कठघरे में खड़े किए जाने लगें।


-  रवीन्द्र वाजपेयी 

Monday, 11 September 2023

जी - 20 के सफल आयोजन से विश्व बिरादरी में भारत की साख और धाक बढ़ी


जी - 20 सम्मेलन जिस भव्यता  के साथ  संपन्न हुआ उससे पूरी दुनिया में भारत की प्रबंधन क्षमता के साथ ही कूटनीतिक कौशल का डंका बज उठा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बीते एक साल में इस आयोजन  के लिए जिस तरह की तैयारी की उसका सुफल इस सम्मेलन की अभूतपूर्व सफलता के तौर पर देखने मिला। इसे अब तक का सबसे सफल जी - 20 सम्मेलन माना गया जो कि पूरी तरह से सही है। भारत की आंचलिक विविधता के साथ ही सांस्कृतिक विरासत को जिस प्रभावशाली ढंग से विदेशी मेहमानों के समक्ष पेश किया गया उससे इस सम्मेलन की खूबसूरती और बढ़ गई। राजघाट पर महात्मा गांधी की समाधि के समक्ष 20 राष्ट्रप्रमुखों का एक साथ श्रृद्धावनत खड़े होने का दृश्य भारतीय चिंतन के प्रति वैश्विक स्वीकृति का प्रमाण कहा जा सकता है। विकसित और विकासशील देशों के  प्रतिनिधियों के अलावा अनेक अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संगठनों के जो प्रमुख इस सम्मेलन के दौरान दिल्ली में उपस्थित रहे वे सब भी बदले हुए भारत को देखकर अभिभूत हो उठे। लेकिन दिखावटी चीजों से हटकर यदि कामकाजी बातों की कल्पना करें तो यह सम्मेलन भारत के आर्थिक ,  सामरिक और कूटनीतिक हितों की दृष्टि से बेहद उपयोगी साबित हुआ। विशेष रूप से मध्य पूर्व  से होते हुए यूरोप तथा अमेरिका तक के जिस कारीडोर के प्रस्ताव को इस सम्मेलन में अंतिम रूप दिया गया वह प्रधानमंत्री  श्री मोदी की बड़ी सफलता है क्योंकि इसके कारण चीन के राष्ट्रपति जिनपिंग के  वन बेल्ट वन रोड नामक प्रकल्प की बची खुची हवा भी निकल गई। जिस तरह से इस परियोजना से एक के बाद एक देश हाथ खींचते जा रहे हैं उससे जिनपिंग की चमक और धमक दोनों में कमी आई है। यहां तक कि उसके पिट्ठू पाकिस्तान तक में उसका विरोध होने लगा। अनेक देशों ने वन बेल्ट वन रोड से अपने हाथ खींचकर प्राचीन सिल्क रूट को पुनर्जीवित करने की  चीन की योजना को पलीता लगा दिया है। इसके जरिए चीन अपने व्यापार को यूरोप तक फैलाने आतुर था। भारत भी इससे चिंतित था इसलिए श्री मोदी ने जी - 20 देशों के साथ इस नए कारीडोर के  प्रस्ताव को स्वीकृति दिलवाकर भारत के लिए विदेशी व्यापार की स्वर्णिम संभावनाओं को जन्म दे दिया है। चीन की जो प्रतिक्रिया इस सम्मेलन के बारे में आई है उससे इस कारीडोर की अहमियत  स्पष्ट हो जाती है। इसी तरह अफ्रीका  यूनियन को जी - 20 का सदस्य बनवाने में भी प्रधानमंत्री ने उल्लेखनीय भूमिका का निर्वहन किया। इस सम्मेलन की सबसे खास बात ये रही कि भले ही रूस के राष्ट्रपति पुतिन और चीन के राष्ट्रपति जिनपिंग नई दिल्ली नहीं आए किंतु साझा घोषणापत्र पर जिस तरह सर्वसम्मति बनी वह भारतीय कूटनीति का ही कमाल कहा जायेगा । इसी तरह यूक्रेन के मामले में भी जिस तरह का संयमित रवैया प्रदर्शित किया गया वह  सम्मेलन में शामिल सदस्यों की परिपक्वता का प्रमाण बन गया । कुल मिलाकर यह सम्मेलन वैश्विक सामंजस्य के अतिरिक्त भारत की दृष्टि से भी बेहद कारगर रहा। सबसे बड़ी बात ये रही कि शीतयुद्ध की काली छाया से आयोजन  पूरी तरह मुक्त रहा । इसीलिए जितने भी प्रस्ताव पारित हुए या निर्णय लिए गए उन पर सकारात्मक माहौल में सार्थक चर्चा हो सकी। उस दृष्टि से ये अच्छा हुआ कि राष्ट्रपति द्वय पुतिन और जिनपिंग दोनों नई दिल्ली नहीं आए क्योंकि अमेरिका के राष्ट्रपति बाइडेन के साथ  इनकी उपस्थिति में यूक्रेन और प्रस्तावित नए कारीडोर को लेकर विवाद हो सकता था जिससे सम्मेलन में गुटबाजी के अलावा माहौल खराब होता। हालांकि सम्मेलन में छोटे बड़े देशों के अनेक नेता शामिल हुए किंतु भारत केंद्र बिंदु बना रहा । प्रधानमंत्री श्री मोदी ने इस दौरान लगभग सभी नेताओं से व्यक्तिगत तौर पर बातचीत करते हुए भारत के हित में जो समझौते किए वे इस सम्मेलन की अघोषित उपलब्धि हैं। सम्मेलन में शामिल हुए राष्ट्रप्रमुखों द्वारा आयोजन की  प्रशंसा किया जाना तो स्वाभाविक है किंतु दुनिया भर के समाचार माध्यमों , कूटनीतिक विश्लेषकों और वित्तीय संस्थानों ने  सम्मेलन की सफलता के लिए जिस तरह से भारत और श्री मोदी की तारीफ की वह बेहद उत्साहवर्धक है। आयोजन के पहले राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू द्वारा भेजे गए निमंत्रण में भारत लिखे जाने पर हुए विवाद के कारण लग रहा था कि इस दौरान कोई अप्रिय स्थिति उत्पन्न हो सकती है किंतु सभी राजनीतिक दलों ने बेहद सुलझा हुआ दृष्टिकोण प्रदर्शित किया । इस आयोजन के बाद भारत का कद विश्व बिरादरी में और ऊंचा हुआ है जिसके कारण चीन और पाकिस्तान का चिंतित होना स्वाभाविक है।


- रवीन्द्र वाजपेयी