Monday, 25 September 2023
कानून का सरल भाषा में होना न्याय व्यवस्था के हित में
Sunday, 24 September 2023
पवार का अडानी प्रेम विपक्षी गठबंधन के लिए मुसीबत बना
Saturday, 23 September 2023
जो गलत है वो गलत है चाहे उदयनिधि हो , स्वामीप्रसाद हो या बिधूड़ी
भाजपा सांसद रमेश बिधूड़ी द्वारा गत दिवस लोकसभा में बसपा सदस्य दानिश अली के प्रति असंसदीय भाषा का प्रयोग किए जाने पर विवाद उत्पन्न हो गया । श्री बिधूड़ी ने श्री अली के धर्म को लेकर जिन शब्दों का उपयोग किया उन्हें असंसदीय मानकर कार्यवाही से निकाल दिया गया। लोकसभा अध्यक्ष ने श्री बिधूड़ी को कड़ी चेतावनी दी , वहीं भाजपा अध्यक्ष जगतप्रकाश नड्डा ने 15 दिन में जवाब मांगा है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने अपनी पार्टी के सांसद के अशोभनीय बयान के लिए माफी मांगने की सौजन्यता भी दिखाई । वहीं श्री अली ने अध्यक्ष से मामले को विशेषाधिकार समिति में भेजने की अपील के साथ चेतावनी दी कि न्याय न मिलने पर वे सदस्यता छोड़ देंगे। लेकिन अब तक जो होता आया है उसके अनुसार मामला विशेषाधिकार समिति में जाएगा और श्री बिधूड़ी के माफी मांग लेने पर उसका पटाक्षेप हो जाएगा । हाल ही में कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी द्वारा प्रधानमंत्री के बारे में की गई आपत्तिजनक टिप्पणियों के संदर्भ में भी यही देखने मिला। बावजूद इसके संसद या उसके बाहर ऐसी बातें कहने का अधिकार किसी को भी नहीं है। भाजपा को चाहिए वह श्री बिधूड़ी पर कड़ी कार्रवाई करे। लेकिन एक सांसद पर डंडा चला देने से सब कुछ ठीक हो जाएगा ये मानकर बैठ जाना निरी मूर्खता होगी। भाजपा सांसद के एक मुस्लिम सांसद के प्रति धर्मसूचक शब्द का इस्तेमाल करने से पूरा राजनीतिक जगत हिल गया । ऐसे में तमिलनाडु सरकार के मंत्री द्वारा भारत के 80 फीसदी लोगों के धर्म को डेंगू ,मलेरिया , कोरोना बताकर समूल नष्ट करने की बात कहने और लगातार दोहराए जाने के बाद तो पूरे देश को आंदोलित होना चाहिए था। बजाय इसके कांग्रेस अध्यक्ष के बेटे तक ने सनातन विरोधी बयान का समर्थन कर डाला। उ.प्र में समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष स्वामी प्रसाद मौर्य रामचरित मानस के बारे में अपमानजनक टिप्पणी करने के बावजूद पार्टी के पद पर हैं। बीते कुछ दिनों से वे हिंदू शब्द की बेहद निम्न स्तरीय व्याख्या कर रहे हैं किंतु सपा , बसपा , कांग्रेस या अन्य किसी को उसमें कोई बुराई नजर नहीं आ रही। स्वामी प्रसाद की देखा सीखी बिहार में नीतीश सरकार के कुछ मंत्री भी निरंतर रामचरितमानस और सनातन धर्म पर घटिया टिप्पणियां कर रहे हैं , जिनको न मुख्यमंत्री रोक रहे हैं और न ही लालू प्रसाद यादव । कांग्रेस नेता राहुल गांधी 2019 के चुनाव में चौकीदार चोर का नारा किसके लिए लगवाते थे , ये सब जानते हैं। सभी मोदी चोर हैं जैसी टिप्पणी के लिए तो वे मानहानि के दोषी तक करार दिए गए। इसके अलावा स्वातंत्र्य वीर सावरकर के बारे में उनके सार्वजनिक बयान क्या एक राष्ट्रीय नेता की प्रतिष्ठा के अनुरूप थे ? लेकिन विपक्ष में केवल शिवसेना ने दिखावटी विरोध जताया , वहीं शरद पवार ने महाराष्ट्र में राजनीतिक नुकसान होने का डर दिखाकर उनको रोका । ऐसे में विचारणीय प्रश्न ये है कि क्या हमारी राजनीति और सार्वजनिक जीवन में शालीनता , मर्यादा और संवेदनशीलता पूरी तरह विलुप्त हो चली है और सौजन्यता , परस्पर सम्मान तथा सहनशीलता जैसे संस्कार अपनी आवश्यकता और प्रासंगिकता को बैठे हैं ? इसका उत्तर इसलिए तलाशना जरूरी है क्योंकि राजनेता समाज के चेहरे होते हैं। जनता उनको अपना भाग्यविधाता मानती है। जो नेता संसद अथवा विधानसभा में बैठते हैं वे महज एक व्यक्ति नहीं अपितु लाखों मतदाताओं की आकांक्षाओं के प्रतिनिधि होते हैं किंतु सांसद या विधायक न बनने वाले नेताओं को भी बेलगाम जुबान चलाने की छूट नहीं दी जा सकती। आजकल राजनीति के क्षेत्र में जो गैर जिम्मेदाराना आचरण देखने मिल रहा है , उससे निराशा होती है। राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री तक के लिए बेहद आपत्तिजनक टिप्पणियां की जाने लगी हैं। ये बुराई केवल राजनीति तक सीमित हो ऐसा भी नहीं है। नेता , अभिनेता और धर्माचार्य तक लगातार ऐसी टिप्पणियां कर रहे जिनसे व्यर्थ का तनाव पैदा होता है। लेकिन ऐसा कहने से राजनेताओं के अपराध कम नहीं होते क्योंकि वे देश के सार्वजनिक जीवन में सबसे ज्यादा देखे - सुने जाते हैं। इसलिए उन पर इस बात की जिम्मेदारी है कि वे अपनी अभिव्यक्ति का स्तर बनाए रखें। रमेश बिधूड़ी जैसे लोग हर दल में हैं। लेकिन अपने दामन के दाग किसी को नहीं दिखते। तिलक , तराजू और तलवार , इनको मारो जूते चार का नारा लगाने वाली बसपा ने भले ही हाथी नहीं गणेश हैं , ब्रम्हा , विष्णु ,महेश हैं जैसा दूसरा नारा भी उछाल दिया किंतु पहले वाले के लिए आज तक क्षमा नहीं मांगी। अखिलेश यादव ने पिछले चुनाव में अयोध्या की हनुमान गढ़ी से प्रचार शुरू किया था किंतु स्वामी प्रसाद मौर्य की सनातन और रामचरितमानस विरोधी बकवास पर वे मुंह में दही जमाए बैठे हुए हैं। सनातन धर्म के बारे में द्रमुक अध्यक्ष स्टालिन के बेटे उदयनिधि द्वारा की जा रही अनर्गल टिप्पणियां यदि किसी अन्य धर्म के बारे में की गई होती तो उनका जीना दूभर हो जाता। कहने का आशय ये है कि अशालीन और अपमानजनक टिप्पणियों के विरुद्ध एक जैसी राय रखी जानी चाहिए। इसमें राजनीतिक लाभ और हानि की बजाय गुण - दोष के आधार पर फैसला किया जाना जरूरी है। जो गलत है वो गलत है , फिर चाहे उदयनिधि हों , स्वामी प्रसाद हों या फिर रमेश बिधूड़ी।
- रवीन्द्र वाजपेयी
Friday, 22 September 2023
बिना आरक्षण भी तो महिलाएं एक तिहाई सांसद और विधायक बनाई जा सकती हैं
नारी शक्ति वंदन अधिनियम गत दिवस राज्यसभा में सर्वसम्मति से पारित हो गया। लोकसभा एक दिन पूर्व ही इसे स्वीकृति प्रदान कर चुकी थी। इस विधेयक को भले ही सर्वसम्मति से पारित किया गया किंतु इसमें ओबीसी, अजा/अजजा महिलाओं के लिए आरक्षण का प्रावधान न होने से अनेक दलों ने विरोध जताया किंतु सत्ता पक्ष की दृढ़ता और कांग्रेस के समर्थन से उसके पारित होने में दिक्कत नहीं हुई। श्रेय लूटने की होड़ भी जमकर मची और इतने वर्षों तक ये क्यों लटका रहा इसे लेकर आरोप - प्रत्यारोप भी देखने मिले । विभिन्न पार्टियों ने इस विधेयक को अपना मानस पुत्र बताकर उस पर दावा ठोका किंतु जिस तरह से हॉकी और फुटबॉल में गेंद को गोल तक ले जाने में अनेक खिलाड़ियों की भूमिका के बावजूद जो खिलाड़ी उसे गोल रेखा के भीतर भेजता है, वाहवाही उसी की होती है उसी तरह इस विधेयक को पारित करवाने में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी गोल करने वाले खिलाड़ी के तौर पर उभरे । लेकिन इस कानून के लागू होने के लिए 2029 तक प्रतीक्षा करनी होगी और तब तक भारतीय राजनीति में न जाने कितने बदलाव हो जायेंगे। वैसे भी इस लड़ाई का असली मकसद शुरू से ही महिलाओं की सामाजिक स्थिति में सुधार से अधिक राजनीतिक उल्लू सीधा करना रहा है। उदाहरण स्वरूप महिला आरक्षण के भीतर भी आरक्षण के प्रावधान की मांग करने वाले दल चुनाव में महिलाओं को उम्मीदवार बनाने में फिसड्डी रहे हैं। पिछड़ों और दलितों की राजनीति करने वाली पार्टियों और नेताओं ने अपने समुदाय के नाम पर या तो अपने परिवार जनों को आगे बढ़ाया या फिर धन्ना सेठों को । अन्य दलों ने भी महिलाओं को राजनीति में उतारने के बारे में ऐसा कुछ नहीं किया जिससे उनकी सामाजिक स्थिति मजबूत होती। जहां तक चुनाव की बात है तो उसमें जीतने की क्षमता आड़े आ जाती है। हालांकि पंचायती राज में महिलाओं के लिए आरक्षण की व्यवस्था होने से ग्रामीण और नगरीय निकायों में महिलाएं भी बड़ी संख्या में चुनकर आने लगी हैं। लेकिन कुछ अपवाद छोड़कर अधिकांश के क्रियाकलापों को परिवार के पुरुष या फिर पार्टी नियंत्रित करती है । ऐसे में एक तिहाई आरक्षण और उसके भीतर ओबीसी तथा अजा/अजजा को आरक्षण दिए जाने के बाद भी विभिन्न पार्टियों में जमे बैठे नेता महिलाओं को कितना महत्व देंगे ये प्रश्न महत्वपूर्ण है। और तो और जो महिलाएं राजनीति के शिखर पर जा पहुंची उन्होंने भी अपने उत्तराधिकारी के तौर पर किसी महिला को आगे बढ़ाया हो ये कम ही देखने में मिला है। सही बात ये है कि महिलाओं को सामाजिक , शैक्षणिक और आर्थिक दृष्टि से स्वाबलंबी बनाए बिना उनको सांसद - विधायक बनाने से कुछ हासिल नहीं होगा क्योंकि आज भी समाज के बड़े वर्ग में महिलाओं को बराबरी का दर्जा देने के प्रति हिचक है। गत दिवस राज्यसभा में राजद के मनोज कुमार झा ने अपने भाषण में , यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता: ( जहां नारी की पूजा की जाती है, उसका सम्मान किया जाता है वहां देवताओं का वास होता है।) का उल्लेख करते हुए ठीक ही कहा कि उक्त सुभाषित हमारे संस्कारों का हिस्सा होने के बाद भी महिलाओं के साथ होने वाले यौन अपराध और घरेलू हिंसा के प्रकरण बढ़ते जा रहे हैं। हालांकि वे विधेयक के विरोध में बोले किंतु उनकी बात में वजन है और इसीलिए इस विधेयक को लागू करने की प्रक्रिया के समानांतर महिलाओं को उनकी न्यायोचित स्थिति प्रदान करने के लिए राजनीति से अलग हटकर बड़े सामाजिक आंदोलन की जरूरत है क्योंकि राजनीति की अपनी संस्कृति हैं। जिसका प्रमाण ये है कि वर्तमान परिदृश्य में वसुंधरा राजे , मायावती , उमाश्री भारती ,ममता बैनर्जी और महबूबा मुफ्ती जैसी किसी भी नेत्री ने अपने इर्द - गिर्द किसी अन्य महिला नेत्री को नहीं पनपने दिया । सोनिया गांधी लंबे समय से कांग्रेस की सर्वोच्च नेत्री हैं लेकिन पार्टी में उनकी बेटी प्रियंका को छोड़कर अन्य प्रभावशाली महिला दिखाई नहीं देती। वामपंथी दल भी इस बारे में पीछे हैं। ममता और मायावती तो अपनी - पार्टियों की सर्वेसर्वा मानी जाती हैं किंतु उनके बाद दूसरे क्रमांक का नेतृत्व महिलाओं के पास नहीं होना अपने आप में बहुत कुछ कह देता है। इसलिए महिलाओं को संसद और विधानमंडलों में एक तिहाई सीटें देने संबंधी विधेयक पारित होने पर महिलाओं का उत्थान होने के प्रति आश्वस्त हो जाना सपने देखने जैसा है। यदि राजनीतिक दलों में ईमानदारी है तो वे बिना आरक्षण व्यवस्था लागू हुए ही महिलाओं का प्रतिनिधित्व सदन में बढ़ाने की उदारता दिखाएं । संसद में विधेयक पारित करवाने में कांग्रेस का सहयोग निश्चित तौर पर उल्लेखनीय रहा। भले ही उसने भी मंडलवादी दलों के तुष्टीकरण के लिए आरक्षण के भीतर आरक्षण का झुनझुना बजाया किंतु अंततः पक्ष में मतदान भी किया। ऐसे में सदन के बाहर यदि भाजपा और कांग्रेस इस मामले में भी साथ आएं तो बाकी पार्टियां भी बाध्य होंगी। हालांकि इसके लिए योग्यता को मापदंड रखा जाना चाहिए अन्यथा सांसद और विधायक बनकर भी महिलाएं गूंगी गुड़िया बनकर बैठी रहेंगी । और तब महिला आरक्षण मजाक का विषय बनकर रह जायेगा। स्थानीय निकायों में आजकल पार्षद पति नामक एक नया संबोधन चर्चा में रहता है। इसलिए इस बात का ध्यान रखना जरूरी है कि सांसद और विधायक पति जैसे लोग पैदा न होने लगें।
-रवीन्द्र वाजपेयी
Thursday, 21 September 2023
कांग्रेस को ओबीसी से इतना ही प्रेम था तो मंडल की सिफारिशें दबाकर क्यों रखे रही
महिला आरक्षण विधेयक लोकसभा में भारी बहुमत से पारित हो गया। 454 सदस्यों ने उसका समर्थन किया जबकि विरोध में मात्र 2 मत पड़े। दरअसल इस का विरोध करने का जोखिम उठाने कोई तैयार नहीं था । हालांकि लगभग 90 सदस्यों का मतदान न करना भी चौंकाता है। कांग्रेस का समर्थन मिलने से विधेयक पारित होने में संशय तो था नहीं किंतु जिस तरह सोनिया गांधी और राहुल गांधी ने ओबीसी और अनु. जाति/जनजाति के लिए भी आरक्षण का मुद्दा उठाया वह देखकर लगा कि उनको महिलाओं की कम वोट बैंक की ज्यादा फिक्र है। अतीत में जब मंडल राजनीति के अग्रणी नेता लालू , मुलायम और शरद यादव महिला आरक्षण के साथ ही उसमें उक्त वर्गों के लिए आरक्षण की मांग पर अड़े रहकर विधेयक को पेश होने से रोकते रहे तब श्रीमती गांधी सहित वामपंथी महिला नेत्रियां ये कहती थीं कि पहले 33 फीसदी आरक्षण का विधेयक तो पारित होने दें । 2010 में कांग्रेस नेतृत्व वाली यूपीए सरकार ने इस विधेयक को राज्यसभा में पारित करवाकर स्थायी समिति को भिजवा दिया । लोकसभा में वह इसलिए पेश करने से पीछे हट गई कि कहीं सरकार ही न गिर जाए। उच्च सदन में राजद और सपा ने उसका विरोध किया था जबकि नीतीश कुमार की जद (यू) समर्थन में रही। प्रश्न ये है कि अब गांधी परिवार को अचानक ओबीसी और अजा/अजजा की याद कहां से आ गई और क्यों ? राहुल तो अपने भाषण में केंद्रीय सचिवालय के 90 सचिवों में केवल तीन के ओबीसी होने का हिसाब बताने लगे। इसी के साथ ही ये दबाव भी बनाया जा रहा है कि महिला आरक्षण को जनगणना तथा परिसीमन की प्रतीक्षा किए बिना 2024 के लोकसभा चुनाव में ही प्रभावशील किया जाए। जबकि सरकार का कहना है कि अगली जनगणना के बाद 2026 से लोकसभा क्षेत्रों के नए परिसीमन के उपरांत ही यह विधेयक लागू किया जावेगा । इसका अर्थ ये हुआ कि 2029 के लोकसभा चुनाव से ही महिलाओं के लिए एक तिहाई सीटों के आरक्षण की व्यवस्था हो सकेगी। हालांकि उसके पूर्व होने वाले कुछ राज्यों के विधानसभा चुनाव में भी इसे प्रभावशील किया जा सकता है। उस दृष्टि से ये प्रश्न लाजमी है कि फिर मोदी सरकार ने इसे संसद के विशेष सत्र में ही पारित करवाने की जल्दबाजी क्यों की ? हालांकि नए संसद भवन की लोकसभा में 888 और राज्यसभा में 384 सदस्यों के बैठने की व्यवस्था किए जाने से ही ये स्पष्ट होने लगा था कि प्रधानमंत्री का इरादा महिला आरक्षण लागू करने का है। हाल ही में कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में यह मुद्दा जोर शोर से उठाते हुए केंद्र सरकार पर दबाव बनाया गया। चूंकि कुछ राज्यों में जल्द ही चुनाव होने वाले हैं और लोकसभा चुनाव की तैयारियां भी जोरों पर हैं इसलिए प्रधानमंत्री ने भी जवाबी दांव चल दिया। कांग्रेस के सामने दिक्कत ये है कि इस विधेयक का विरोध करे तो महिला विरोधी कहलाएगी और समर्थन करने पर लालू प्रसाद और अखिलेश यादव जैसे सहयोगी रूठ जायेंगे। इसीलिए उसने विधेयक का समर्थन भी कर दिया और उसमें ओबीसी आदि के आरक्षण की मांग करते हुए मंडल समर्थक दलों को खुश करने का दांव भी चल दिया। लेकिन ऐसा करने से वह खुद भी कठघरे में आ गई। उसे इस बात का जवाब देना चाहिए कि जातिगत जनगणना का मुद्दा उसने इसके पहले कब उठाया था ? और यदि ओबीसी के प्रति उसके मन में इतना प्रेम था तो आजादी के बाद ही अन्य पिछड़ी जातियों का ध्यान क्यों नहीं आया ? जबकि समाजवादी नेता डा.राममनोहर लोहिया तो पंडित नेहरू के ज़माने से ही पिछड़ा पावें सौ में साठ का नारा लगाते रहे। 1977 में जनता पार्टी के समय बने मंडल आयोग की रिपोर्ट सरकार गिरने के कारण ठंडे बस्ते में डाल दी गई। 1980 में इंदिरा जी और उनके बाद राजीव गांधी सत्ता में आए। लेकिन मंडल की सिफारिशों के अनुसार अन्य पिछड़ी जातियों को आरक्षण दिए जाने का फैसला हुआ 1990 में बनी विश्वनाथ सिंह सरकार के जमाने में । और वह भी इसलिए कि उनकी गद्दी मुलायम , लालू और शरद यादव जैसे मंडलवादी नेताओं पर निर्भर थी। कांग्रेस तब उसे जातिवादी राजनीति कहकर विरोध करती रही। समय के साथ पिछड़ी जातियां भी भाजपा के साथ जाने लगीं जो कि लंबे समय तक अगड़ी जातियों की पार्टी समझी जाती रही। उ.प्र और बिहार में कांग्रेस की जो दुर्गति हुई उसके बाद उसे कुछ समझ में नहीं आ रहा था । इसीलिए उसने पहले तो श्री गांधी को जनेऊधारी ब्राह्मण प्रचारित किया। उसी के बाद से वे और उनकी बहिन प्रियंका वाड्रा मंदिरों और मठों में मत्था टेकने लगे। म.प्र में कमलनाथ खुद को भाजपा से बड़ा हिंदूवादी साबित करने हाथ पांव मार रहे हैं। पार्टी द्वारा जनाक्रोश यात्राओं का प्रारंभ मंदिरों से किए जाने का निर्णय भी किया गया है। इसी क्रम में पार्टी का ओबीसी प्रेम जाग उठा है। इससे ये बात सामने आ रही है कि कांग्रेस वैचारिक भटकाव का शिकार होकर रह गई है। उसको ये समझ नहीं आ रहा कि वह कौन सी नीति अपनाए। उसे ये बात अच्छे से समझ लेना चाहिए कि दूसरों का मुद्दा छीनने की कोशिश में वह अपने मुद्दे खो बैठती है। राम जन्मभूमि का ताला खोलकर उसने भाजपा के हिन्दू वोट बैंक में सेंध लगाना चाही परंतु उस फेर में मुस्लिम समुदाय भी उससे छिटक गया। आज कांग्रेस की नीतिगत दृढ़ता इतनी घट चुकी है कि वह उदयनिधि के सनातन विरोधी बयान का विरोध करना तो दूर अपने उन नेता पुत्रों तक को नहीं रोक पा रही जो उस बयान का समर्थन कर रहे हैं। महिला आरक्षण विधेयक का समर्थन करते हुए उसके भीतर आरक्षण का मुद्दा उठाना इसी का प्रमाण है। इन सबसे यही लगता है कि पार्टी किंकर्तव्यविमूढ़ता से उबर नहीं पा रही। यही वजह हैं कि विपक्षी गठबंधन में शामिल दल भी कांग्रेस को ज्यादा भाव नहीं दे रहे।
-रवीन्द्र वाजपेयी
Wednesday, 20 September 2023
ट्रूडो संभल जाएं वरना कैनेडा में बन जाएगा खालिस्तान
जी - 20 सम्मेलन की अभूतपूर्व सफलता के दौरान ही भारत और कैनेडा के बीच तल्खी बढ़ने की खबर आने लगी थी। इसका कारण प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा कैनेडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रुडो के समक्ष खालिस्तान समर्थक गतिविधियों को मिल रहे संरक्षण पर ऐतराज जताया जाना था। सूत्रों के मुताबिक ट्रुडो को ये बात नागवार गुजरी। वतन लौटकर उन्होंने अपनी संसद में बयान देते हुए आरोप लगा दिया कि कैनेडा में रह रहे एक खालिस्तानी नेता की हत्या में भारत सरकार का हाथ है। यहां तक तो फिर भी ठीक था किंतु उसके बाद कैनेडा सरकार ने एक भारतीय राजनयिक को देश छोड़ने का आदेश देकर आग में घी डाल दिया । जी - 20 के फौरन बाद यह घटनाक्रम भारत के लिए चौंकाने वाला था । जवाब में भारत सरकार ने भी कड़ा रुख अपनाते हुए कैनेडा के एक राजनयिक को देश छोड़ने का आदेश सुना दिया । उल्लेखनीय है कैनेडा वासी खालिस्तान समर्थक हरदीप सिंह निज्जर की विगत जून माह में अज्ञात तत्वों द्वारा हत्या कर दी गई थी । कैनेडा सरकार के अनुसार उसमें भारतीय दूतावास में पदस्थ एक राजनयिक का हाथ था जो कि गुप्तचर एजेंसी रॉ जुड़ा है। सही बात ये है कि कैनेडा शुरू से ही खालिस्तानियों की गतिविधियों का बड़ा केंद्र रहा है। वहां सिखों की आबादी 2 प्रतिशत से ज्यादा है जो व्यवसाय , कृषि , नौकरी और राजनीति जैसी विविध भूमिकाओं में संलग्न हैं। पूरे देश में गुरुद्वारों का जाल बिछ गया है । नगर पालिकाओं से संसद तक में सिखों की प्रभावशाली उपस्थिति देखी जा सकती है। बड़ी संख्या में सिख परिवार ऐसे हैं जिनकी तीसरी पीढ़ी कैनेडा वासी है। यही कारण है कि पंजाब में रहने वाले सिखों के बीच कैनेडा जाकर बसने की प्रवृत्ति आम हो चली है। इसका लाभ लेते हुए खालिस्तानी संगठनों ने भारत विरोधी मानसिकता का बीजारोपण किया। 1984 में इंदिरा गांधी के हत्या के बाद पंजाब में तो खालिस्तानी आतंक का खात्मा हो गया किंतु कैनेडा में बब्बर खालसा और ऐसे ही अनेक उग्रवादी संगठन कार्यरत रहे । भारत ने कैनेडा की सरकार को हमेशा इस बात के लिए चेताया भी किंतु अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर वह उपेक्षा करता रहा। दो साल पहले भारत में हुए किसान आंदोलन को ढाल बनाकर खालिस्तानी संगठनों ने एक बार फिर सिर उठाने का प्रयास किया। पंजाब में आम आदमी पार्टी की सरकार बनने के बाद से वे और सक्रिय हुए और हिंदू मंदिरों पर हमले जैसी घटनाएं देखने मिलीं । कैनेडा के अलावा ब्रिटेन और अमेरिका तक में किसान आंदोलन के दौरान जिस तरह से भारत विरोधी प्रदर्शन हुए वे इस बात का प्रमाण थे कि खालिस्तानी आंदोलन के कर्ताधर्ताओं को दोबारा पांव जमाने का अवसर मिल गया। निज्जर नामक जिस खालिस्तानी की हत्या से मौजूदा विवाद पैदा हुआ वह भारत की मोस्ट वांटेड सूची में था। ऐसे आतंकवादी को प्रधानमंत्री ट्रूडो अपने देश का नागरिक बताकर जिस तरह से आंसू बहा रहे हैं उससे उनकी भारत विरोधी सोच उजागर होती है। यद्यपि कैनेडा और भारत के बीच कूटनीतिक और व्यवसायिक संबंध लंबे समय से समान्य चले आ रहे थे। खालिस्तानी संगठनों की वहां मौजूदगी के बाद भी सरकार के अलावा नागरिकों के स्तर पर रिश्तों में करीबी बनी रही। बीते कुछ वर्षों से तो कैनेडा भारतीय युवकों के लिए शिक्षा और कामकाज के लिए बड़ा आकर्षण बन गया है। लेकिन ट्रूडो सरकार ने जिस गैर जिम्मेदाराना रवैए का परिचय दिया वह रिश्तों में खटास पैदा कर सकता है। हालांकि हड़बड़ाहट में उठाए उनके भारत विरोधी कदम का कैनेडा में ही विरोध होने लगा है। यहां तक कि वहां बसे सिखों का एक बड़ा वर्ग खालिस्तानी उग्रवादियों को नापसंद करता है जिनकी हरकतों से पूरी कौम संदेह के घेरे में आ जाती है। और फिर कैनेडा में बसे गैर सिखों के अलावा शिक्षा तथा नौकरी के सिलसिले में गए भारतीय भी खालिस्तानी गतिविधियों से पूरी तरह अलग हैं। कैनेडा सरकार को एक बात ध्यान रखना चाहिए कि उनके देश में बैठे खालिस्तानी हजारों मील दूर भारत में तो खालिस्तान बनाने से रहे लेकिन यदि उनको छूट दी जाती रही तो कुछ साल बाद कैनेडा में जरूर वे अपने लिए अलग देश या विशेष क्षेत्र की मांग लेकर हिंसा पर उतारू हो जायेंगे। वैसे भी अमेरिका की तरह कैनेडा अप्रवासियों द्वारा बसाया गया देश है । बेहतर होगा वहां की सरकार इस बात को जल्द से जल्द समझ जाए वरना जिन खालिस्तानियों को वह अपना नागरिक मानकर उनकी पीठ पर हाथ रखे हुए है वे ही उसकी पीठ में खंजर से वार करने से नहीं चूकेंगे। प्रधानमंत्री ट्रुडो को ये बात जान लेनी चाहिए कि जो लोग अपने देश के वफादार नहीं , वे भला कैनेडा के शुभचिंतक कैसे हो सकते हैं ? जी - 20 के दौरान उन्होंने ये तो देखा ही होगा कि भारत एक विश्व शक्ति बन चुका है जिसके कारण अमेरिका , फ्रांस , ब्रिटेन और जापान जैसे विकसित देश तक उसके साथ निकट संबंध बनाने आतुर हैं। ऐसे में भारत जैसी उभरती विश्व शक्ति से टकराव उन्हें भारी पड़ सकता है।
- रवीन्द्र वाजपेयी
Tuesday, 19 September 2023
विपक्षी गठबंधन में अभी से दरारें आने लगीं
आई. एन. डी.आई.ए गठबंधन के स्थायित्व पर आशंका के बादल मंडराने लगे हैं। बेंगलुरु में संपन्न कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक के दौरान आम आदमी पार्टी के साथ गठबंधन को लेकर जिस तरह का विरोध सामने आया उसके बाद शीर्ष नेतृत्व को ये कहना पड़ा कि राज्यों के नेताओं से पूछे बिना सहयोगी दलों के साथ सीटों का बंटवारा नहीं किया जावेगा । दरअसल दिल्ली और पंजाब के कांग्रेस नेताओं ने आलाकमान को दो टूक बता दिया कि अरविंद केजरीवाल के साथ गलबहियां करने का अर्थ इन राज्यों में कांग्रेस को डुबोना होगा। इसी तरह म.प्र छत्तीसगढ़ और राजस्थान के कांग्रेस जन भी आम आदमी पार्टी के आक्रामक चुनाव प्रचार से बौखलाए हुए हैं। म.प्र में तो भाजपा की सरकार है किंतु शेष दो राज्यों में कांग्रेस सत्ता में है जहां श्री केजरीवाल और पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान प्रदेश सरकार पर चौतरफा हमला करने से बाज नहीं आ रहे। इसी तरह म .प्र का कांग्रेस नेतृत्व इस बात को लेकर चिंतित है कि आम पार्टी यदि अपने उम्मीदवार उतारेगी तो उससे भाजपा को लाभ मिलेगा। जहां तक बात गठबंधन की है तो कांग्रेस ने साफ कर दिया है कि वह आम आदमी पार्टी के लिए कोई भी सीट छोड़ने तैयार नहीं है। गौरतलब है श्री केजरीवाल और श्री मान लगातार म.प्र के चुनावी दौरे में भाजपा के साथ ही कांग्रेस को घेरने में भी संकोच नहीं करते। विपक्षी एकजुटता दिखाने के लिए आई. एन. डी.आई.ए की जो संयुक्त रैली निकट भविष्य में भोपाल में होना प्रस्तावित है वह भी इसी कारण झमेले में पड़ गई है। बेंगलुरु की बैठक से एक बात साफ तौर पर निकलकर आई वह ये है कि लोकसभा चुनाव हेतु सीटों के बंटवारे को कांग्रेस पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव तक टालने के इरादे में है। इसके पीछे की सोच ये है कि यदि हिमाचल और कर्नाटक जैसी सफलता उसे इन राज्यों में हासिल हो गई तब वह लोकसभा चुनाव में छोटे दलों पर दबाव बनाने में सफल हो जावेगी। उसकी यह रणनीति बाकी दल भांप गए हैं। इसीलिए मुंबई में शरद पवार के निवास पर आयोजित बैठक में आम आदमी पार्टी के संयोजक श्री केजरीवाल सहित कुछ और दलों ने भी कांग्रेस पर अभी से सीटों के बंटवारे का दबाव बनाया जिसे राहुल गांधी टाल गए। उधर दूसरी तरफ ममता बैनर्जी ने इकतरफा ऐलान कर दिया कि उनकी पार्टी कांग्रेस के लिए तो 2019 में उसके द्वारा जीती महज दो सीटें छोड़ेगी किंतु वामपथियों के लिए एक भी नहीं। यदि कांग्रेस अपनी दो सीटों में से उन्हें उपकृत करना चाहे तो उसे एतराज नहीं होगा। उसके बाद सीपीएम ने भी घोषणा कर दी कि वह प.बंगाल और केरल में अकेले लड़ेगी और किसी से सीटों का बंटवारा नहीं करेगी। उल्लेखनीय है श्री गांधी केरल की वायनाड सीट से ही सांसद हैं । ऐसे में गठबंधन के लिए ये हास्यास्पद स्थिति होगी कि प्रधानमंत्री के लिए उसके संभावित उम्मीदवार के प्रति भी उसमें मतैक्य का अभाव है। स्मरणीय है गुजरात विधानसभा के चुनाव में आम आदमी पार्टी ज्यादा कुछ तो न कर पाई लेकिन उसने कांग्रेस का कबाड़ा जरूर कर दिया जो महज 17 सीटों पर सिमटकर अब तक के सबसे निचले स्तर पर आ गई। कांग्रेस को यही डर म.प्र, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में सता रहा है। ये तो सभी जानते हैं कि आम आदमी पार्टी इन राज्यों में केवल रस्म अदायगी करेगी। ये भी संभव है कि वह कुछ सीटें जीत भी ले लेकिन उसको मिलने वाले ज्यादातर मत भाजपा विरोधी ही होंगे जिससे कांग्रेस को सीधा नुकसान होगा। कांग्रेस का सोचना था कि आई.इन. डी.आई.ए में शामिल होने के बाद श्री केजरीवाल गठबंधन धर्म का पालन करते हुए दिल्ली और पंजाब के अलावा कांग्रेस के प्रभाव वाले बाकी राज्यों में रोड़ा नहीं अटकाएंगे किंतु उसका सोचना गलत निकला। कुल मिलाकर जो देखने में आ रहा है उसके मुताबिक ऊपर से तो कांग्रेस और अन्य क्षेत्रीय दल आए दिन भाजपा को हराने का हौसला दिखा रहे हैं किंतु भीतर - भीतर वे सब एक दूसरे की टांग खींचने से बाज नहीं आ रहे। सभी पार्टियां मिलकर कांग्रेस को 250 लोकसभा सीटें देना चाहती हैं ताकि सरकार बनने की स्थिति में उस पर शिकंजा कसा जा सके। कांग्रेस नेतृत्व इस चाल को समझ गया है। इसीलिए लोकसभा चुनाव करीब आने पर भी सीटों को लेकर खींचतानी चलते रहने का अंदेशा पैदा हो गया है। अगर कांग्रेस पांच राज्यों के चुनाव तक सीटों के बंटवारे को टालती रही तब अविश्वास और असहयोग की खाई और चौड़ी होती जायेगी। भले ही गठबंधन को शक्ल मिल गई हो किंतु अभी भी आई. एन. डी.आई. ए में विश्वास का संकट बना हुआ है। कांग्रेस की स्थिति इसी वजह से बेहद नाजुक है क्योंकि जिन राज्यों में वह भाजपा से सीधे मुकाबले में है वहां तो छोटे दल उससे हिस्सा मांग रहे हैं लेकिन जिन राज्यों में उनका वर्चस्व हैं उनमें कांग्रेस को अवसर देने की इच्छा उनकी नहीं है। अरविंद , ममता , नीतीश, अखिलेश , स्टालिन , पवार में से कोई भी कांग्रेस को पांव फैलाने की जगह नहीं देना चाह रहा । इस प्रकार गठबंधन में एक कदम आगे दो कदम पीछे वाली स्थिति बनी हुई है।
- रवीन्द्र वाजपेयी