Monday, 2 October 2023

जीएसटी की रिकॉर्ड वसूली के बदले पेट्रोल - डीजल सस्ते किए जाएं


हर माह की आखिरी तारीख के बाद जारी होने वाले जीएसटी के आंकड़े देश की आर्थिक स्थिति का एहसास कराते हैं। उस दृष्टि से सितंबर माह में तकरीबन 1.63 लाख करोड़ की वसूली उत्साहवर्धक है। विगत माह से ये 2 फीसदी ज्यादा है तो गत वर्ष इसी अवधि में हुए संग्रह से 10 प्रतिशत अधिक ।  अनेक माहों से जीएसटी की आवक 1.50 लाख करोड़ से ऊपर होना ये दर्शाता है कि कारोबारी जगत में स्थितियां बेहतर हो  रही हैं। पितृ पक्ष समाप्त होते ही  त्यौहारी मौसम  और विवाहों का सिलसिला शुरू हो जावेगा। खरीफ की फसल भी  आने लगेगी। भारत में तीज - त्यौहार , विवाह समारोह और फसल ,  अर्थव्यवस्था की गतिशीलता को गहराई तक प्रभावित करते  हैं।  इसलिए माना जा सकता है कि आगामी कुछ महीने जीएसटी संग्रह इसी स्तर पर बना रहेगा। दीपावली के कारण वह और ऊपर चला जाए तो अचरज नहीं होगा। कुछ राज्यों के विधानसभा चुनाव जल्द होने जा रहे हैं । उनमें होने वाला खर्च भी बाजार की हलचल बढ़ा देता है।  जुलाई , अगस्त और सितंबर माह पूरे देश में मानसून के रहे। इस दौरान आर्थिक गतिविधियां मंद पड़ जाने की परिपाटी रही है लेकिन ये देखकर संतोष होता है कि  उस  दौरान भी जीएसटी की वसूली वृद्धि की ओर रही । दूसरे शब्दों में  इसे अर्थव्यवस्था में व्याप्त अनिश्चितता दूर होने  का संकेत भी माना जा सकता है। यद्यपि इसके लिए महंगाई को भी बड़ा कारण माना जाता है किंतु देश में उत्पादन और खपत दोनों के आंकड़े जिस तरह बढ़ते जा रहे हैं उनके आधार पर ये कहना गलत नहीं है कि कोरोना काल वाला संकट का  दौर गुजर चुका है। दुनिया के विकसित कहे जाने वाले देशों की तुलना में  भारत की विकास दर यदि सबसे अधिक है तो इसे बड़ी उपलब्धि कहा जा सकता है । लेकिन इसके साथ ही ये सवाल भी जन्म लेता है कि जो जनता सरकारी खजाने को भरने में योगदान दे रही है उसको राहत पहुंचाने के लिए केंद्र और राज्य सरकारें क्या कदम उठा रही हैं ? हाल ही में ये खबरें आई थीं कि अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें फिर उछल गई हैं जिसका कारण सऊदी अरब और रूस द्वारा उत्पादन घटाया जाना है। जबकि कुछ समय पहले तक ये सुनने में  आ रहा था कि रुस से सस्ता तेल खरीदकर भारतीय तेल कंपनियों ने बीते एक साल में जबर्दस्त मुनाफा अर्जित किया  और इसी वजह से पेट्रोल - डीजल सस्ता किया जा सकता है। उल्लेखनीय है प्रधानमंत्री ने गत वर्ष दीपावली के अवसर पर इनके दाम घटाने का ऐलान किया था । जिन राज्यों में विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं वहां तो मतदाताओं को रिझाने के लिए जमकर रेवड़ियां बांटी जा रही हैं लेकिन बाकी की जनता उससे वंचित है। हालांकि केंद्र सरकार ने रसोई गैस का सिलेंडर 200 सस्ता कर दिया है किंतु  राजस्थान में 500 और म.प्र में  महिला लाभार्थियों को 450 रु.में सिलेंडर दिए जाने से बाकी राज्यों में भी वैसी ही मांग हो रही है। साथ ही ये सवाल भी उठने लगा है कि यदि कर्ज में डूबी सरकारें आधे दाम पर सिलेंडर देने की दरियादिली दिखा सकती हैं तो फिर लगे हाथ पेट्रोल - डीजल के मामले में भी थोड़ा हाथ खोला जाए। ये भी आश्चर्य की बात है कि सभी राजनीतिक दल एक दूसरे पर महंगाई बढ़ाने का आरोप लगाते नहीं थकते किंतु जब पेट्रोल - डीजल को जीएसटी के अंतर्गत लाने की बात उठती है तब कोई उसके लिए राजी नहीं होता। वैसे तो हमारे देश में हर समय चुनाव का चक्र चला करता है लेकिन आगामी वर्ष लोकसभा चुनाव होने की वजह से देशव्यापी सरगर्मी बनी रहेगी। ऐसे में ये मुद्दा प्रासंगिक है कि यदि पेट्रोलियम वस्तुओं को जीएसटी के दायरे में ले आया जाए तो विभिन्न राज्यों में उनकी कीमतों का अंतर खत्म होकर  महंगाई में कमी आएगी जिससे आम जनता की क्रय शक्ति में वृद्धि का सकारात्मक परिणाम बढ़ती मांग के रूप में देखने मिलेगा। यद्यपि केंद्र और राज्यों की सरकारें इसके लिए कितनी तैयार होंगी ये कह पाना कठिन है लेकिन प्रधानमंत्री यदि इस बारे में पहल करें तो बात बन भी सकती है। वैसे भी जीएसटी का आदर्श रूप सभी वस्तुओं पर एक ही दर लागू किए जाने का होता है । उस दृष्टि से भारत में त्रिस्तरीय   दरों से विसंगतियां पैदा होती हैं । दैनिक उपयोग की कुछ वस्तुओं और सेवाओं पर 18 फीसदी का कर  कमर तोड़ने जैसा है। अब जबकि बीते छह महीनों से जीएसटी का आंकड़ा 1.50 लाख करोड़ से ऊपर बना हुआ है तब ये उम्मीद करना अनुचित नहीं है कि कर चुकाने वालों को भी आभार स्वरूप कुछ दिया जावे जो पेट्रोल - डीजल और रसोई गैस को जीएसटी के अंतर्गत लाकर सस्ता करने से बेहतर कुछ नहीं हो सकता। 


-रवीन्द्र वाजपेयी

Sunday, 1 October 2023

जेएनयू की दीवारों पर भगवा जलेगा जैसे आपत्तिजनक नारे लिखे गए




जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय  
,नई दिल्ली में एक बार फिर आपत्तिजनक नारे लिखे गए हैं। भाषा अध्ययन केंद्र की दीवारों और फर्श पर देर रात  लिखे उन नारों को जेएनयू प्रशासन ने आज सुबह मिटा दिया है। हालांकि यह विवादित नारे किसने लिखे हैं। इस बारे में प्रशासन में जांच शुरू कर दी है। 

दरअसल, रविवार सुबह जेएनयू के कैंपस से कुछ तस्वीरें सामने आई थी, जिसमें कैंपस की दीवारों और फर्श पर भगवा जलेगा, ...तेरी कब्र खुदेगी, एनआरसी, सीएए जैसे आपत्तिजनक स्लोगन लिखे हुए हैं। साथ ही दीवारों और फर्श पर पीएम मोदी को लेकर भी विवादित टिप्पणी की गई है, जिसको कॉलेज प्रशासन में पोत दिया है। इसको लेकर छात्रों में आक्रोश देखने को मिल रहा है। 
जेएनयू से सामने आई तस्वीरों को देखकर मालूम होता है कि यह तस्वीरें जेएनयू के स्कूल ऑफ लैंग्वेज कैंपस की हैं, जहां दीवारों में फ्री कश्मीर और इंडिया अधिकृत कश्मीर जैसी विवादित बातें लिखी हैं। साथ ही कैंपस के फर्श पर भी नीले रंग से कई आपत्तिजनक बातें लिखी हुए हैं, जिन्हें विश्वविद्यालय प्रशासन ने मिटा दिया है। वैसेयह कोई पहली बार नहीं है। जब विश्वविद्यालय की दीवारों और फर्श पर इस तरह के आपत्तिजनक स्लोगन लिख गए हो। कुछ महीने पहले भी इस तरह के नारे लिखे गए थे, जिसमें जाति विशेष पर टिप्पणी की गई थी। अभी इस बारे में जेएनयू प्रशासन की ओर से आधिकारिक रूप से कोई बयान नहीं दिया गया है।

-रवीन्द्र वाजपेयी 

Saturday, 30 September 2023

पैगंबर के जन्मदिन पर खून खराबा करने वाले इंसानियत के दुश्मन


इस्लाम के अनुयायियों के लिए मोहम्मद पैगंबर साहब सबसे सम्मानित शख्सियत हैं जिनका जन्मदिन पूरी दुनिया में  मुसलमान बड़े ही उत्साह के साथ मनाते हैं। खुशी के इस अवसर पर खून की होली खेलने जैसी बात शायद ही कोई सोचता होगा । लेकिन पाकिस्तान के बलूचिस्तान इलाके में मिलाद उन नबी का जुलूस निकालने एकत्र हुए लोगों के पास आत्मघाती विस्फोट में 50 से अधिक लोगों के मारे जाने और बड़ी संख्या में घायल होने की खबर है। जैसी कि आशंका है ये संख्या और बढ़ सकती है। मस्तुंग में अल फलाह रोड पर स्थित मदीना मस्जिद के पास के पास जमा हुए लोग उक्त धमाके का शिकार हुए।  उसके कुछ घंटों बाद ही हंगू शहर की मस्जिद में हुए धमाके में 5 लोगों की जान चली गई। ये वाकई शोचनीय है कि पैगंबर साहब के जन्मदिन के मौके पर मुस्लिमों के पवित्र शहर मदीना के नाम पर बनी मस्जिद इस्लाम को मानने वाले  निरपराध लोगों की मौत की गवाह बनी । पाकिस्तान के सीमांत इलाके में विस्फोट की घटनाएं पूर्व में भी घटी हैं। बलूचिस्तान में तो पाकिस्तान विरोधी भावनाएं खुलकर सामने आती रही हैं । अफगानिस्तान में तालिबानी सत्ता की वापसी के बाद से दोनों देशों के  बीच सीमा का विवाद भी चल रहा है । पाकिस्तान ने अमेरिकी आधिपत्य के दौर में जिन तालिबानियों को अपनी सीमा के भीतर आकर अड्डे बनाने की सुविधा दी थी वे वापस जाने का नाम नहीं ले रहे और उस जमीन को अपना बता रहे हैं। अमेरिका को अफगानिस्तान से बेदखल करने में तालिबानियों का साथ देने वाले पाकिस्तान ने जो दोगलापन दिखाया उसका दंड वह अब भुगत रहा है। एक तरफ वह तालिबानियों को हर तरह से सहायता और संरक्षण देता रहा वहीं दूसरी तरफ अमेरिकी वायुसेना के विमानों को अफगानिस्तान पर हमले हेतु अपने हवाई अड्डे इस्तेमाल करने की छूट भी उसने दी। अफगानिस्तान से अमेरिकी फौजों की वापसी के बाद पाकिस्तान की छवि काबुल और वॉशिंगटन दोनों की नजर में खराब हो गई । अमेरिका ने उसकी मदद से हाथ खींच लिए तो तालिबानी अपने अड्डे उसकी जमीन से हटाने के बजाय अपना कब्जा जताने लगे। इस सबके कारण पाकिस्तान की अंदरूनी हालत दिन ब दिन खराब होती जा रही है। जिन इस्लामिक आतंकवादी संगठनों को वह पालता रहा वे ही अब उसकी जान के दुश्मन बन बैठे हैं। ये भी देखने मिल रहा है कि आतंकी सरगनाओं के बीच भी गैंगवार जैसे हालात पैदा हो गए हैं। लश्कर ए तैयबा के सह संस्थापक हाफिज सईद के बेटे का पेशावर में अज्ञात लोगों द्वारा अपहरण इसका ताजा प्रमाण है । जिसके बाद  पूरे पाकिस्तान में हड़कंप है। खुफिया एजेंसी आई.एस.आई तक अपहरणकर्ताओं का पता लगाने में असमर्थ साबित हो रही है। इससे पता चलता है कि पाकिस्तान उन्हीं गड्ढों में गिरने की स्थिति में आ चुका है जो उसने दूसरों के लिए  खोदे थे। हालांकि बलूचिस्तान में हुए दोनों धमाकों की जिम्मेदारी किसी संगठन ने नहीं ली किंतु इस घटना से एक बात साबित हो गई कि इस्लाम के नाम पर आतंक का झंडा थामे आतंकवादियों की इस मजहब के प्रति कोई श्रृद्धा या सहानुभूति नहीं है।  वरना वे पैगंबर के जन्मदिवस जैसे पवित्र मौके पर मुस्लिमों को मौत के घाट न उतारते। इस घटना से भारत ही नहीं दुनिया भर के मुसलमानों को ये समझ लेना चाहिए कि इस्लामिक आतंकवाद उनका भी उतना ही बड़ा दुश्मन है जितना दूसरों का। उदाहरण के लिए कश्मीर घाटी में आए दिन पाकिस्तान से आकर आतंकवादी वहां रह रहे मुस्लिमों की हत्या कर देते हैं। अरब जगत के जो इस्लामी देश मजहब के नाम पर पाकिस्तान की तरफदारी करते आए हैं उनके लिए भी ये सोचने का समय आ  गया है कि अंग्रेजों की कुटिल चालों से जन्मे इस देश की तासीर में ही खून - खराबा है। यही वजह है कि 75 साल बीत जाने के बाद भी वह  राजनीतिक तौर पर स्थिर नहीं हो सका ।  कहने को वहां लोकतंत्र है और चुनाव का नाटक भी होता है किंतु विरोधी के प्रति निर्दयता का भाव बना हुआ है। पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ लंदन में निर्वासन  काट रहे हैं वहीं इमरान खान देश में रहते हुए दुर्गति का  शिकार हैं। फौज की मदद से तख्ता पलट और राजनीतिक प्रतिद्वंदी को जेल में डालने या फांसी चढ़ा देने जैसी घटनाएं इस देश के  हालात बयां करने के लिए पर्याप्त हैं। उस दृष्टि से बलूचिस्तान के मस्तुंग और हंगू  शहर में हुए विस्फोट चौंकाते नहीं हैं परंतु इनसे इस्लामिक आतकवादियों का इंसानियत विरोधी चेहरा एक बार फिर उजागर हो गया है।



-रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 29 September 2023

एम. एस.स्वामीनाथन : जिन्होंने क्रांति शब्द को सार्थकता प्रदान की


क्रांति शब्द एक अलग तरह की अनुभूति देता है । आम तौर पर इससे हिंसा के जरिए सत्ता परिवर्तन का एहसास होता है। लेकिन सही अर्थों में इसका अर्थ है किसी नए विचार को मूर्तरूप देना और उस दृष्टि से देश के शीर्षस्थ कृषि वैज्ञानिक डा.एम. एस. स्वामीनाथन को सही मायनों में क्रांतिकारी कहा जा सकता है , जिनके भागीरथी प्रयासों से देश खाद्यान्न के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनने के बाद  निर्यातक बनने की हैसियत में आ गया। उल्लेखनीय है अकाल लंबे  समय तक हमारे देश की नियति बना रहा।  गुलामी का दौर खत्म होने के बाद भी हम इससे जूझते रहे । बढ़ती आबादी के अनुपात में खाद्यान्न उत्पादन काफी कम रहने से अमेरिका , कैनेडा , ऑस्ट्रेलिया और रूस से उसका आयात करना पड़ता था जिससे  अर्थव्यवस्था के साथ ही  विदेश नीति पर भी अनुचित दबाव बना रहता था। इस स्थिति से उबारने के लिए  जिस एक व्यक्ति का नाम इतिहास में दर्ज हुआ वे डा.स्वामीनाथन 98 साल की आयु में गत दिवस चल बसे। आज की पीढ़ी के लिए वे भले ही  सामान्य ज्ञान की विषयवस्तु हों किंतु कृषि क्षेत्र के सबसे सम्मानित विश्व खाद्य पुरस्कार से अलंकृत डा.स्वामीनाथन स्वाधीन भारत की उन महान विभूतियों में से थे जिन्होंने पद , प्रतिष्ठा और पैसे की दौड़ से दूर रहकर देश को आत्मसम्मान के साथ जीने का मंत्र दिया। सत्तर के दशक में जब देश सूखे और अकाल की वजह से पूरी दुनिया से अनाज मांगने की शर्मिंदगी झेल रहा था तब पद्म विभूषण स्वामीनाथन जी  ने हरित क्रांति का बीड़ा उठाते हुए भारत की परंपरागत खेती को समय की जरूरतों के अनुसार नया रूप दिया। उस समय  कृषि प्रधान कहे जाने वाले देश के सामने खाद्यान्न संकट  विचारणीय मुद्दा था। और तब उन्होंने उन्नत खेती की विधि से किसानों को परिचित कराते हुए कृषि से जुड़ी मानसिकता को नए सांचे में ढालने का दुस्साहस किया  । धीरे - धीरे पूरे देश में उनका मॉडल लागू किए जाने से खेती की दशा और दिशा दोनों में आमूल परिवर्तन हुआ  जिसका परिणाम बढ़ते खाद्यान्न उत्पादन के रूप में देखने मिला। स्वामीनाथन जी ऐसे मौन तपस्वी थे जिन्होंने कभी भी स्वयं को महिमामंडित करने की कोशिश नहीं की। शांत भाव और एकाग्र चित्त से की गई उनकी साधना का ही प्रतिफल है कि रूस - यूक्रेन युद्ध से जब दुनिया के सामने गेंहू का संकट उत्पन्न हुआ तो उस परिस्थिति में भारत अनेक देशों की जनता का  पेट भरने आगे आया। इस बारे में एक बात ध्यान रखना जरूरी है कि किसी भी देश की आर्थिक  सम्पन्नता और सामरिक शक्ति तब तक बेमानी है जब तक  वह अपनी जनता का पेट भरने के लिए अनाज उत्पादन में आत्मनिर्भर न बन सके। इसके अलावा यदि उसे विश्वशक्ति बनना है तब भी उसे अपनी जरूरत से अधिक अन्न उत्पादन करना आवश्यक है। प्राकृतिक आपदा के अलावा भी कोरोना जैसा अप्रत्याशित संकट आने पर खाद्यान्न की उपलब्धता उससे लड़ने का हौसला प्रदान करती है। कोरोना के कारण लॉक डाउन के दौरान जब सब कुछ बंद था तब भारत के 80 करोड़ लोगों को मुफ्त अनाज देने की केंद्र सरकार की योजना यदि कामयाब हो सकी तो उसका कारण खाद्यान्न के वे भंडार थे जो कृषि क्षेत्र में आई क्रांति के कारण भरे जा सके । आज केंद्र और राज्य सरकारें मुफ्त अनाज की योजनाओं को संचालित कर जनता से अपनी जो जय - जयकार करवाती हैं उसके सही हकदार दरअसल डा.स्वामीनाथन ही हैं जो अब स्वर्गीय हो चुके हैं ।  रूस और यूक्रेन गेंहू , मक्का और सूरज मुखी के सबसे  बड़े उत्पादक हैं किंतु आपस में युद्धरत हो जाने से उनके  उत्पाद निर्यात नहीं हो पा रहे थे जिससे अनेक विकसित देशों में खाद्यान्न संकट उत्पन्न हो गया । लेकिन भारत को उतनी परेशानी नहीं हुई क्योंकि हमारे अन्न भंडार भरे हुए थे। आज की स्थिति में देश जितना कृषि उत्पादन कर रहा है उसमें कुछ चीजों को छोड़कर बाकी जरूरत से अधिक होने से सरकारी भंडारों  में दो साल तक का अनाज है। देश के किसान और कृषि वैज्ञानिक इस उपलब्धि के लिए बधाई के पात्र हैं किंतु  इस सबके लिए किसी एक व्यक्ति को श्रेय देने की बात हो तो निःसंदेह वे  डा.स्वामीनाथन ही हो सकते हैं। भारत आज  विश्व शक्ति बनने की ओर अग्रसर है तो उसमें उनका योगदान  स्वर्णाक्षरों में लिखा जाना चाहिए। एक सच्चे क्रांतिकारी और महान देशभक्त के रूप में वे सदैव याद किए जाते रहेंगे ।
विनम्र श्रद्धांजलि।

- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 28 September 2023

लालू की पार्टी में ब्राह्मण विरुद्ध ठाकुर का विवाद अच्छा संकेत नहीं


बिहार से लालू प्रसाद यादव यादव की  पार्टी राजद के राज्यसभा सदस्य मनोज झा प्रभावशाली वक्ता हैं। जेएनयू में अध्यापन कर चुके हैं। सामाजिक और राजनीतिक विषयों पर उच्च सदन में उनके भाषण दमदार होते हैं जिनमें वे अपनी पार्टी की विचारधारा का प्रस्तुतीकरण आकर्षक शैली में करते हैं। ये कहने में कुछ भी गलत नहीं है कि श्री झा राज्यसभा के उन चंद सदस्यों में से हैं जो विषय का अध्ययन करने के उपरांत अपनी बात रखते हैं। उनके साथ कोई विवाद भी नहीं जुड़ा। लेकिन संसद के हाल ही में संपन्न विशेष सत्र में महिला आरक्षण संबंधी विधेयक पर बोलते हुए श्री झा ने ओबीसी के अलावा अजा - अजजा के लिए भी आरक्षण की मांग करते हुए एक कविता पढ़ी जिसमें इस बात का उल्लेख था कि ग्रामीण क्षेत्र में सभी चीजें मसलन खेत , तालाब , घर आदि ठाकुर (अर्थात जमींदार ) के आधिपत्य में है किंतु खेतों के अलावा बाकी सभी में कार्यरत श्रमिक पिछड़ी और दलित जातियों के हैं। आरक्षण के भीतर आरक्षण की मांग रखते हुए श्री झा ने उक्त कविता के जरिए पूरे सदन से अपील की कि अपने भीतर बैठे ठाकुर को मारें। जाहिर है उनका मंतव्य सामंतवादी सोच से बाहर निकलकर समतामूलक समाज की स्थापना का था जिसमें संसाधनों  का न्यायोचित वितरण और श्रम का सम्मान  सुनिश्चित किया जा सके। महिला आरक्षण में ओबीसी और अजा-अजजा के लिए भी कोटा की मांग राजद के साथ ही मंडलवादी अन्य दल शुरू से करते आ रहे हैं। यूपीए सरकार के समय भी इसी मुद्दे पर गतिरोध पैदा होता रहा। यद्यपि इस बार कांग्रेस ने भी इस मांग का समर्थन किया किंतु  महिला विरोधी होने के आरोप से बचने के लिए विधेयक को रोकने की हिम्मत किसी की नहीं हुई और लोकसभा के बाद राज्यसभा ने भी उस पर मोहर लगा दी जबकि सरकार के पास उच्च सदन में स्पष्ट बहुमत नहीं है। हालांकि संसद और विधानमंडलों में महिलाओं के लिए एक तिहाई आरक्षण के लिए 2029 तक प्रतीक्षा करनी होगी । इसीलिए सत्र के बाद विपक्ष ने केंद्र सरकार पर महिला आरक्षण के नाम पर रस्म अदायगी का आरोप लगाते हुए इसे तत्काल लागू करने का दबाव बनाया । वहीं भाजपा इस बात का श्रेय ले रही है कि जो काम विपक्ष की सरकारें दशकों तक नहीं कर सकीं वह मोदी सरकार ने आसानी से कर दिखाया। लेकिन इस विधेयक पर श्री झा द्वारा दिए भाषण में ठाकुर संबधी जिस कविता का उल्लेख किया गया उसे लेकर बिहार के क्षत्रिय नेता आक्रामक हो गए हैं। बाकी को तो छोड़ दें लेकिन श्री झा की अपनी पार्टी राजद के बाहुबली नेता आनंद मोहन और उनके विधायक बेटे के अलावा भाजपा के अनेक नेताओं ने श्री झा के विरुद्ध मोर्चा खोलते हुए उन्हें याद दिलाया कि ठाकुरों ( क्षत्रियों ) ने देश की रक्षा में अपना बलिदान दिया है। एक - दो नेताओं ने तो यहां तक कह दिया कि यदि श्री झा ने उनके सामने बयान दिया होता तो उनका मुंह तोड़ देते। यद्यपि श्री झा ने इन आलोचनाओं के प्रत्युत्तर में कुछ नहीं कहा किंतु इससे लालू प्रसाद यादव की पार्टी  की असलियत सामने आ गई । उसके एक ब्राह्मण नेता द्वारा राज्यसभा में सामाजिक व्यवस्था पर उच्च जातियों के वर्चस्व के बारे में जो प्रतीकात्मक कविता पढ़ी गई उस पर मंडलवादी दल के भीतर से ही ब्राह्मण विरुद्ध क्षत्रिय की आवाजें सामने आने लगीं। डा.लोहिया की वैचारिक विरासत के दावेदारों पर दायित्व था जाति तोड़ने का किंतु तमाम दिखावों के बावजूद वे उसके दायरे से बाहर नहीं निकल सके और समतामूलक समाज की बजाय जातिगत वैमनस्य के बीज बोने का अपराध कर बैठे। श्री झा ने जिस उद्देश्य से कविता सुनाई उसमें निश्चित रूप से ठाकुर से अभिप्राय किसी जाति विशेष से न होकर ग्रामीण समाज में उच्च जातियों के वर्चस्व से था जिसे उन्होंने नव सामंतवादी मानसिकता से जोड़ते हुए उससे बाहर आने की बात कही। ऐसे में उनको  क्षत्रिय विरोधी बताकर मुंह तोड़ देना और और जुबान नोच लेने जैसी टिप्पणियां दर्शाती हैं कि राजनीति के क्षेत्र में काम करने वाले लोग जाति रूपी दीवारें गिराने के बजाय उन्हें और ऊंचा करने पर आमादा हैं। इसीलिए अब जातियों के भीतर से उपजातियां नए दबाव समूह के तौर पर सामने आने लगी हैं और 21 वीं सदी का भारत 18 वीं सदी की सोच से बाहर नहीं निकल पा रहा। सबसे ज्यादा चौंकाने वाली बात ये है कि हर बात पर मुंह खोलने को आतुर लालू जी और उनके बड़बोले पुत्र तेजस्वी अपने कथित समतावादी दल के भीतर चल रही ब्राह्मण विरुद्ध ठाकुर लड़ाई पर मौन साधे हुए हैं। इससे लगता है कि पार्टी जानबूझकर इस विवाद को हवा देना चाहती है जिससे वह पिछड़ी जातियों को भड़का सके।इस बारे में उल्लेखनीय है कि विवाद में शामिल ब्राह्मण और क्षत्रिय दोनों नेता लालू जी के बेहद करीबी हैं। चिंता का विषय है कि बिहार की राजनीति जातियों के जंजाल से निकल नहीं पा रही। मंडल आयोग की सिफारिशें लागू होने के बाद जिस सामाजिक क्रांति की उम्मीद लगाई गई थी वह हवा - हवाई होकर रह गई और उसकी जगह जातिगत घृणा का नया रूप सामने आ गया। मनोज झा के भाषण पर जिस तरह की उग्र प्रतिक्रियाएं सुनने मिल रही हैं वे अच्छा संकेत नहीं है। 



- रवीन्द्र वाजपेयी 

Wednesday, 27 September 2023

जनता को तो बस शीघ्र और सस्ता न्याय चाहिए



सर्वोच्च न्यायालय ने उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों की नियुक्ति और स्थानांतरण संबंधी कालेजियम की सिफारिशों को स्वीकृति देने में केंद्र सरकार की तरफ से होने वाले विलंब पर चिंता जताते हुए कहा कि इस मामले में सकारात्मक आश्वासन मिलने तक सर्वोच्च न्यायालय एडवोकेट्स एसो. बेंगलुरु की याचिका पर हर 10 दिन में सुनवाई करेगा। कालेजियम की सिफारिशों को स्वीकार करने में सरकार द्वारा किया जाने वाला विलंब लंबे समय से विवाद का कारण बना हुआ है। मौजूदा सरकार ने इस व्यवस्था के विकल्प के तौर पर न्यायिक नियुक्ति आयोग का गठन किया था किंतु संसद द्वारा सर्व सम्मत फैसला लेकर पारित उक्त कानून को सर्वोच्च न्यायालय ने रद्द कर दिया । और उसी के बाद सरकार और न्यायपालिका के बीच कालेजियम की सिफारिशें खींचातानी का कारण बनी हुई हैं। इस मामले में एक बात विचारणीय है कि कालेजियम कोई संवैधानिक व्यवस्था नहीं है । बावजूद इसके सर्वोच्च न्यायालय इसे जारी रखने पर अड़ा हुआ है। विशेष रूप से वर्तमान प्रधान न्यायाधीश डी. वाय. चंद्रचूड़ तो इस बारे में सुनने तक तैयार नहीं होते। इस विषय पर होने वाली टिप्पणियों के कारण न्यायपालिका और सरकार के बीच कटुता भी बढ़ी । इसी कारण कानून मंत्री कारण रिजजु का विभाग बदला गया। सतही तौर पर तो यही लगता है कि उच्च और सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की नियुक्ति में होने वाले विलंब के लिए सरकार जिम्मेदार है किंतु ये अर्धसत्य है। दरअसल कालेजियम व्यवस्था में व्याप्त विसंगतियों के विरुद्ध तो विधि क्षेत्र से ही आवाजें उठती रही हैं। जिस परिवारवाद के लिए राजनीतिक दलों की आलोचना होती है वह न्यायपालिका में भी पूरे जोर - शोर से हावी है। श्री चंद्रचूड़ की पेशेवर योग्यता और अनुभव पर किसी को संदेह नहीं है किंतु इस तथ्य से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि उनके पूज्य पिता भी सर्वोच्च न्यायालय में सबसे लंबे समय तक सेवा देने वाले प्रधान न्यायाधीश थे। विधि जगत से आने वाली जानकारी के अनुसार देश के कुछ परिवार ऐसे हैं जिनमें न्यायाधीश बनने की परंपरा सी है जो संभवतः कालेजियम व्यवस्था के कारण ही मुमकिन हो सका। सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश मार्कंडेय काटजू द्वारा की गई अंकल जज वाली टिप्पणी इस बारे में खूब चर्चित हुई थी। बहरहाल , सरकार और न्यायपालिका के बीच वर्चस्व और श्रेष्ठता की जो रस्साकशी चली आ रही है उसके कारण होने वाले गतिरोध में न्यायाधीशों के पद खाली पड़े रहने से त्वरित न्याय की उम्मीदें ध्वस्त जाकर रह जाती हैं। सर्वोच्च न्यायालय जब भी कड़ा रुख अख्तियार करता है तब सरकार सक्रिय होकर कुछ नियुक्तियों को हरी झंडी दिखा देती है । लेकिन उसके बाद फिर वही स्थिति जारी रहती है। इस विवाद में दोनों पक्ष अपनी बात पर अड़े हुए हैं। सरकार को न्यायाधीशों की नियुक्ति में न्यायपालिका का सर्वाधिकार रास नहीं आ रहा वहीं न्यायपालिका में बैठे माननीय भी लेशमात्र झुकने राजी नहीं हैं। हां, एक बात जरूर उठती है कि यदि कालेजियम संविधान प्रदत्त व्यवस्था नहीं है तब उसे बदलकर यदि संसद ने एक मत से लोकसेवा आयोग की तर्ज पर न्यायिक नियुक्ति आयोग का गठन किया तब उसे संविधान विरोधी मानकर रद्द करने की क्या जरूरत थी , जबकि वह व्यवस्था अधिक पारदर्शी होती। यदि न्यायपालिका चाहती तो उसमें कुछ कोटा न्यायिक सेवा में कार्यरत अधिकारियों के लिए रखने कह सकती थी। लेकिन उस आयोग को सिरे से खारिज किए जाने से ये स्पष्ट हो गया कि वह कालेजियम के जरिए न्यायाधीशों की नियुक्ति की प्रक्रिया में किसी अन्य को शामिल करने के लिए किसी भी कीमत पर राजी नहीं है। चूंकि न्यायपालिका और न्यायाधीशों के बारे में आलोचनात्मक टिप्पणियां करने से हर कोई बचता है लिहाजा कालेजियम व्यवस्था के विरुद्ध भी अपेक्षित आवाजें नहीं उठतीं। यदि न्यायिक नियुक्ति आयोग अस्तित्व में आ गया होता तब आई.ए. एस और आई.पी. एस जैसे ही न्यायाधीशों की चयन प्रक्रिया भी निश्चित समय पर होती रहती जिससे न्यायाधीशों का अभाव न रहता। बावजूद इस सबके ये बात अच्छी नहीं है कि अदालतों में बढ़ते लंबित मामलों के बाद भी न्यायाधीशों के पद रिक्त पड़े रहें। सरकार सर्वोच्च न्यायालय में क्या उत्तर देगी ये तो वहीं जाने किंतु जनता को समय पर न्याय नहीं मिल पाने की वर्तमान स्थिति के कारण न्याय व्यवस्था में विश्वास और न्यायपालिका के प्रति सम्मान में कमी आती जा रही है । न्याय के महंगे होने का एक कारण न्यायाधीशों की कमी भी है । ये सब देखते हुए कार्यपालिका और न्यायपालिका को आपसी सामंजस्य बनाकर इस समस्या को सुलझाना होगा। रही बात अपनी श्रेष्ठता साबित करने की तो दोनों पक्षों को जनता का हित और सहूलियत देखनी चाहिए । अदालतों में बढ़ती पेशियां और न्याय प्राप्त करने में होने वाले विलंब से त्रस्त आम जनता को न कालेजियम में रुचि है और न ही न्यायिक नियुक्ति आयोग में। उसे तो बस सस्ता और शीघ्र न्याय चाहिए। 

- रवीन्द्र वाजपेयी 


Tuesday, 26 September 2023

पंजाब के सिखों को खालिस्तान विरोधी आवाज उठाना चाहिए




कैनेडा से आ रही खबरें इस बात का संकेत हैं कि भारत विरोधी ताकतें एक बार फिर सिर उठाने की कोशिश कर रही हैं। वहां सक्रिय अनेक सिख संगठनों द्वारा खालिस्तान की मांग जिस तरह उछाली जा रही है वह निश्चित रूप से भारत के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप है क्योंकि अंतर्राष्ट्रीय कानूनों के मुताबिक किसी देश की अखंडता के विरुद्ध षडयंत्र हेतु अपनी धरती का उपयोग करने देना अपराध  माना जाता है। और फिर कैनेडा जी - 20 के अलावा राष्ट्रमंडल का भी सदस्य है। भारत के साथ उसके रिश्ते सामान्य से बेहतर ही रहे  हैं जिसका प्रमाण वहां बड़ी संख्या में भारतीय मूल के लाखों लोगों का स्थायी रूप से बसना है। इसमें सिखों की संख्या आधी है जो कि नौकरी के अलावा कृषि , जमीन - जायजाद के कारोबार और व्यवसाय से जुड़े हैं। चूंकि वे संगठित हैं इसलिए उनकी अहमियत वोट बैंक के तौर पर बनती गई और यही खालिस्तान की मांग करने वालों के लिए सहायक बनी। यद्यपि ये स्थिति बीते अनेक दशकों से बनी हुई है किंतु हाल ही के कुछ सालों में कैनेडा के गुरुद्वारों पर खालिस्तान के बैनर , पोस्टर आदि जिस बड़ी संख्या में लगाए गए उससे ये लगता है मानो वहां रह रहे सभी सिख खालिस्तान के समर्थक हों। हालांकि जिम्मेदार सूत्रों के अनुसार जिस प्रकार नब्बे के दशक में  पंजाब में चले खालिस्तानी उग्रवाद के कारण आम सिख भय के कारण विरोध नहीं कर सके , ठीक वही हालत आज कैनेडा के सिखों की है। वे इस बात को समझते हैं कि भारत विरोधी ताकतों से नियंत्रित चंद सिख कैनेडा में बैठे - बैठे खालिस्तान बनवा लेंगे ये संभव नहीं है किंतु असुरक्षा के भय से वे शांत हैं। जो खबरें आ रही हैं उनके अनुसार प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो चुनावी लाभ के लिए खालिस्तानियों का तुष्टीकरण कर रहे हैं किंतु इसका असर ये हुआ कि वे कैनेडा में बसे गैर सिखों का समर्थन खो बैठे । इस बारे में ब्रिटेन के प्रधानमंत्री ऋषि सुनाक की तारीफ करनी होगी जो भारत सरकार द्वारा सौंपी गई सिख उग्रवादियों की सूची के आधार पर कार्रवाई कर रहे हैं । जी - 20 सम्मेलन के फौरन बाद कैनेडा के प्रधानमंत्री ने जिस तरह से  भारत विरोधी रुख दिखाया वह शत्रुतापूर्ण ही कहा जांवेगा और इसीलिए भारत सरकार ने भी उसी शैली में जवाब देकर कैनेडा सरकार के साथ ही वहां कार्यरत खालिस्तानी संगठनों को भी ये संदेश दे दिया कि उनकी हरकतें बर्दाश्त नहीं की जाएंगी। कैनेडा से आने वालों के वीसा पर रोक लगाकर भारत सरकार ने जो दांव चला उसकी वजह से कैनेडा में बसे भारतीय मूल के लोगों में खालिस्तानियों के विरुद्ध गुस्सा फूटने लगा। इसके अलावा पंजाब के उन परिवारों की चिंता भी बढ़ गई जो अपने बच्चों को कैनेडा भेजने की तैयारी कर रहे थे। ये बात सर्वविदित है कि बीते कुछ सालों से भारत से हजारों लोग प्रतिवर्ष शिक्षा और रोजगार हेतु कैनेडा जाने लगे हैं और उनमें से ज्यादातर की मंशा वहीं बस जाने की रहती है। लेकिन खालिस्तानी संगठनों की हरकतों से उनकी योजना खटाई में पड़ रही है। पंजाब में हजारों परिवार ऐसे भी हैं जिनकी आर्थिक स्थिति कैनेडा में कार्यरत उनके परिजन द्वारा भेजे जाने वाले डालरों पर निर्भर है। ऐसे में भारत विरोधी खालिस्तानियों के कारण इसमें बाधा आ सकती है। पंजाब में खालिस्तान का समर्थन करने वाले अब उंगलियों पर गिनने लायक रह गए हैं । भारत में रह रहे सिखों को ये बात समझ आ चुकी है कि खालिस्तान की मांग पाकिस्तान प्रवर्तित शरारत है जिसे कैनेडा के प्रधानमंत्री अपने राजनीतिक  स्वार्थवश हवा दे रहे हैं । तीस साल पुरानी दर्दनाक यादें आज भी सिखों के मन में हैं जब लंबे समय तक पंजाब आग में जलता रहा। उल्लेखनीय है खालिस्तानी उग्रवाद के खात्मे के बाद पंजाब के सिख मतदाताओं ने राष्ट्रवादी मानसिकता का खुलकर प्रदर्शन किया जिससे कि  वहां शांति कायम हुई । 2 साल पहले किसान आंदोलन की आड़ में जरूर खालिस्तानी तत्व सामने आए लेकिन उसके बाद कुछ छुटपुट घटनाओं के अलावा वे पंजाब में ज्यादा कुछ न कर सके। एक - दो सिखों ने  भिंडरावाले बनने की जुर्रत की तो केंद्र सरकार ने कड़े एकदम उठाकर उनके हौसले पस्त कर दिए। ऐसे में पंजाब के सिखों को चाहिए वे खुलकर कैनेडा के खालिस्तानियों के विरुद्ध आवाज उठाते हुए कहें कि वे पूरी दुनिया में सिखों की छवि धूमिल करने का अपराध कर रहे हैं। उल्लेखनीय है सिख समुदाय कैनेडा के अलावा भी दुनिया भर में बसा हुआ है। अपनी मेहनत से उसने वहां न सिर्फ संपन्नता अपितु सम्मान भी अर्जित कर लिया। ऐसे में यदि कैनेडा में रह रहे खालिस्तानी अपनी हरकतों से बाज नहीं आए तो अन्य देशों में रहने वाले सिखों पर भी संदेह के बादल मंडराने लगेंगे और इसका सबसे अधिक नुकसान पंजाब को होगा। इसलिए समय की मांग है कि सिख पंथ जैसे सेवाभावी और समर्पित समुदाय को कलंकित होने से बचाने पंजाब के सिख संगठनों विशेष रूप से गुरुद्वारों से खालिस्तान विरोधी आवाज उठे जिससे कैनेडा और ब्रिटेन में सिर उठा रहे सिख उग्रवादियों का हौसला कमजोर पड़े। उनको ये एहसास करवाना जरूरी है कि जिस कथित खालिस्तान की मुहिम वे चला रहे हैं  उसकी भारत के सिखों को जरूरत नहीं है और जिस भारत की आजादी के लिए उनकी कौम ने सबसे ज्यादा बलिदान दिए , उसका एक और विभाजन वे नहीं होने देंगे क्योंकि 1947 में हुई त्रासदी की दर्दनाक यादें अभी तक पंजाब के लोगों के मन में ताजा हैं।

-रवीन्द्र वाजपेयी