Sunday, 8 October 2023

जातिगत जनगणना ढोल में पोल साबित हो रही :नीतीश का दांव उल्टा पड़ सकता है


बिहार में जिस जातिगत जनगणना को लेकर नीतीश कुमार सामाजिक न्याय के महानायक बनकर उभरना चाहते थे वह उनके गले की फांस बनती जा रही है। उसके आंकड़ों ने विभिन्न जाति समूहों में असंतोष की लहर पैदा कर दी है। जिस  आधार पर  आंकड़े जारी किए गए उसकी प्रामाणिकता पर सवाल सवर्ण उठाते तब तो उपेक्षित किया जा सकता था परंतु  जब पिछड़ी और अति पिछड़ी जातियां ही उनको फर्जी बता रही हैं तब नीतीश को बजाय लाभ होने के राजनीतिक नुकसान होने के आसार बढ़ रहे हैं। उल्लेखनीय है एक तरफ तो कांग्रेस नेता राहुल गांधी जातिगत जनगणना की मांग जोरदार तरीके से उठा रहे हैं किंतु कर्नाटक में उनकी ही पार्टी के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया अपने पिछले कार्यकाल में करवाई जातिगत जनगणना के आंकड़े सार्वजनिक करने का साहस नहीं जुटा पा रहे क्योंकि उनसे  लिंगायत और वोक्कालिंगा समुदाय के नाराज हो जाने की जो आशंका है उससे  राज्य सरकार खतरे में पड़ सकती है। बिहार को ही लें तो चुनाव सर्वेक्षण करने के बाद राजनीति के मैदान में उतरे प्रशांत किशोर ने ही इस जनगणना पर सवाल उठाकर नीतीश और लालू प्रसाद यादव को कठघरे में खड़ा करते हुए कहा है कि राज्य में बीते तीस वर्षों से उन दोनों ने ही  सत्ता चलाई लेकिन किसी अति पिछड़े या मुस्लिम को मुख्यमंत्री नहीं बनाया।  इस सर्वे पर एतराज करते हुए अनेक जाति समूहों ने भी कहा है कि यादवों को ताकतवर बनाने के लिए विभिन्न जातियों और उपजातियों को अनेक हिस्सों में बांटकर उनकी संख्या कम बताई गई ताकि उनकी राजनीतिक वजनदारी घट जाए। सवर्ण जातियों में वैश्य वर्ग को भी अनेक हिस्सों में बांटकर उनकी संख्या घटा दी गई जबकि सभी को जोड़ने पर वे 9 फीसदी से भी अधिक हैं । वहीं 10 यदुवंशी उपजातियों को यादव नाम देकर 14 प्रतिशत का  सबसे बड़ा जाति समूह बना दिया गया। अन्य जातियों के साथ भी ऐसा ही खेल हुआ। ब्राह्मणों को भी शिकायत है कि उनकी जनसंख्या पहले से भी कम कर दी गई। अति पिछड़ी जातियों को उपजातियों में विभाजित कर उनके आंकड़े कम दर्शाने की शिकायतें आ रही हैं । इससे लगता है कि जातिगत जनगणना सामाजिक न्याय की बजाय विद्वेष का आधार बन रही है। यादवों के साथ जिन यदुवंशी उपजातियों को समाहित कर लिया गया वे भी इस बात से रूष्ट हैं कि उनको लालू परिवार के अधीन कर उनके नेतृत्व को खत्म करने की चाल चली गई है। इस सबके कारण बिहार में नए जातिगत जनगणना आयोग की मांग उठ खड़ी हुई है जिसका अध्यक्ष उच्च न्यायालय के किसी सेवानिवृत्त  न्यायाधीश को बनाने कहा जा रहा है। इससे यह स्पष्ट है कि जातिगत जनगणना की आड़ में पिछड़ी जातियों को गोलबंद करने की जो चाल चली गई थी वह नाकामयाब साबित हुई । पिछड़ी और अति पिछड़ी जातियों के बीच ही जबरदस्त असंतोष देखने मिल रहा है और ज्यादातर की शिकायत है कि उनकी ताकत को कमतर दिखाकर राजनीतिक हिस्सेदारी छीनी जा रही है। इस माहौल से लगता है कि आगामी चुनावों में बिहार में विपक्षी दलों का गठबंधन होने की बजाय दलों का दलदल देखने मिलेगा और छोटे - छोटे जाति समूह अपनी ताकत दिखाने के लिए चुनावी मैदान में उतरे बिना नहीं रहेंगे। नीतीश  की अपनी पार्टी जनता दल (यू)  में ही जातिगत जनगणना को लेकर जिस तरह की उथल - पुथल है उससे लगता है कि भाजपा को पटकनी देने का नीतीश का दांव उनके अपने लिए खतरे की घंटी बन गया है। हालांकि विपक्ष इसे राष्ट्रव्यापी मुद्दा बनाने की सोच रहा है किंतु बिहार से आ रही खबरें उससे होने वाले नुकसान का भी संकेत दे रही हैं। बिहार के बाद अब पूरे देश में छोटी जातियां गोलबंद होने लगी हैं ताकि जाति आधारित जनगणना होने पर उनकी सही संख्या सामने आ सके । इसी तरह कुछ उपजातियां आपस में मिलकर खुद को बड़ा साबित करने की राह पर बढ़ रही हैं। इसका प्रभाव सवर्णों पर भी देखा जा सकता है। विशेष रूप से वैश्य समुदाय में जो बिखराव है उसे दूर कर एक बड़ी जातीय शक्ति के तौर पर वे उभर सकते हैं । दूसरी तरफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गरीबी को सबसे बड़ी जाति बताकर विपक्ष को चौकन्ना कर दिया है । विपक्ष के इस पैंतरे की काट के तौर पर वे  ऐसा कुछ कर सकते हैं जिससे आरक्षण की मौजूदा व्यवस्था को रखते हुए भी बिना  जातिगत भेदभाव के समूचा वंचित वर्ग लाभान्वित हो सके । यदि मोदी सरकार  आर्थिक आधार पर लोगों की मदद करने की कोई नई योजना लेकर आई तो जातिगत जनगणना का कथित मास्टर स्ट्रोक बेअसर होकर रह जावेगा क्योंकि साधारण लोगों को तो रोटी , कपड़ा और मकान के साथ ही अपनी दैनंदिन जरूरतें पूरा होने से मतलब होता है। प्रधानमंत्री इस वास्तविकता से परिचित हैं  और इसीलिए उन्होंने जनकल्याण की जितनी भी योजनाएं चलाई उनका सीधा लाभ कमजोर वर्ग को मिल रहा है। उ.प्र विधानसभा के पिछले चुनाव में अखिलेश यादव द्वारा जयंत चौधरी , ओमप्रकाश राजभर और स्वामी प्रसाद मौर्य जैसे नेताओं को मिलाकर महागठबंधन बनाए जाने के बावजूद भाजपा की सत्ता में वापसी को नहीं रोका जा सका। इसलिए ये आकलन गलत नहीं है कि नीतीश कुमार द्वारा करवाई गई जातिगत जनगणना ढोल में पोल साबित होगी क्योंकि जिन पिछड़ी जातियों को एकजुट करने यह दांव खेला गया उनमें तो पहले से ज्यादा बिखराव नजर आने लगा है । 


- रवीन्द्र वाजपेयी


यूक्रेन संकट से दुनिया उबर पाती उसके पहले ही हमास ने नई मुसीबत पैदा कर दी




इजरायल पर हमास द्वारा किया गया हमला पश्चिम एशिया में नए संकट का आरंभ माना जा सकता है। ऐसे समय जब सऊदी अरब इजरायल को मान्यता देने जा रहा था तभी फिलिस्तीनी इलाके से एक साथ 5000 राकेट दागे जाने से इजरायल के हवाई रक्षा कवच की अभेद्यता पर भी सवाल खड़े हो गए हैं। भारत के लिए ये इसलिए ध्यान देने योग्य है क्योंकि उसने इजरायल से ये तकनीक हासिल की है। इसके अलावा भी रक्षा उपकरण के क्षेत्र में दोनों देशों के बीच काफी सौदे हुए हैं। हमास का हमला इस बात का संकेत है कि यूक्रेन संकट में फंसे विश्व को राहत की सांस लेने का अवसर जल्द मिलने की संभावना नजर नहीं आती। इसका कारण इजरायल के आक्रामक शैली है जिसमें वह दुश्मन के प्रति रत्ती भर भी उदारता बरतने में यकीन नहीं करता। 

गत दिवस हमास द्वारा राकेटों से किए गए ताबड़तोड़ हमलों के बाद इजरायल को लंबे समय बाद बड़ा धक्का पहुंचा। उसके सैकड़ों लोग मारे जाने के साथ ही बड़ी संख्या में बंधक भी बना लिए गए जिनका उपयोग इजरायल में बंद अपने लोगों को छुड़ाने के लिए किए जाने की बात भी उसने कही है। हमलावरों ने इजरायली नागरिकों विशेष तौर पर महिलाओं के साथ जिस तरह का दुर्व्यवहार किया उसके बाद इजरायल का पलटवार स्वाभाविक था और प्रधानमंत्री नेतन्याहू द्वारा बिना देर लगाए युद्ध की घोषणा कर हमास को नतीजे भुगतने की चेतावनी दे डाली। इसी के साथ इजरायली वायुसेना भी हरकत में आई और गाजा पर हमले शुरू करते हुए सैकड़ों लोगों को मारने के साथ अनेक इमारतें ध्वस्त कर दीं। 

फिलिस्तीन का यह संकट लाइलाज बन गया है। हालांकि अरब जगत के अनेक मुस्लिम देशों ने इजरायल के साथ राजनयिक और व्यापारिक रिश्ते कायम कर लिए हैं। सऊदी अरब के अलावा खाड़ी के कई मुस्लिम मुल्क पुरानी दुश्मनी भूलकर यहूदियों के इस देश से हाथ मिलाने आगे आए हैं। सैन्य शक्ति के साथ ही इजरायल ने विज्ञान और तकनीक के मामले में भी जबरदस्त तरक्की की है। इसमें कोई शक नहीं है कि अमेरिका और अन्य पश्चिमी देशों का संरक्षण न होता तो उसके पड़ोसी मुस्लिम देश उसे कभी का नेस्तनाबूत कर चुके होते । लेकिन इसके बावजूद भी यहूदी कौम की तारीफ करननी होगी जिसने सदियों की खानाबदोशी के बाद भी अपनी भाषा , संस्कृति और प्रतिभा को अक्षुण्ण रखा। 

1948 में अस्तित्व में आते ही उस पर पड़ोसी देशों ने आक्रमण कर दिया किंतु नवजात इजरायल ने जिस तरह मुंहतोड़ उत्तर दिया उससे उसकी मारक क्षमता और आत्मविश्वास प्रगट हो गया। तब से अभी तक वह अनेक युद्धों का सामना करते हुए विजेता बनकर खड़ा हुआ है। वैसे तो उसके सीमावर्ती इलाके हर समय युद्धभूमि का नजारा उत्पन्न करते हैं। दरअसल येरूशलम नामक जिस शहर के कारण इजरायल की अन्य मुस्लिम देशों से शत्रुता है वह इस्लाम , ईसाई और यहूदी तीनों के लिए अत्यंत पवित्र है। वर्तमान में वह इजरायल के आधिपत्य में है। दरअसल मुस्लिम देश शुरू से ही इजरायल के अस्तित्व को पचाने तैयार नहीं है। उनको लगता है पश्चिमी ताकतों ने दूसरे महायुद्ध से उत्पन्न हालातों का लाभ लेते हुए उनके सिर पर अपना पिट्ठू लाद दिया । इस बारे में ये बात भी गौरतलब है कि ईसाई समुदाय यहूदियों के प्रति अच्छी भावना नहीं रखता था। यूरोप के अनेक देशों में उनके साथ दोयम दर्जे का व्यवहार होता रहा। हिटलर द्वारा उनका नरसंहार तो इतिहास का काला अध्याय है । चूंकि अमेरिका में यहूदी आर्थिक दृष्टि से संपन्नता के कारण राजनीतिक तौर पर प्रभावशाली हो चले थे , लिहाजा उसने भी इजरायल पर अपना हाथ रखकर उसे मजबूत बनाया । 

अब तक के इतिहास के मुताबिक हमास द्वारा किए गए ताजा हमले का नुकसान तो उसे उठाना ही पड़ेगा क्योंकि इजरायल अपने एक भी नागरिक की हत्या बर्दाश्त नहीं कर सकता। पश्चिमी देशों ने हमेशा की तरह उसको समर्थन दे दिया है और भारत ने भी तत्काल उसकी तरफदारी का ऐलान कर डाला।  

लेकिन यह युद्ध लंबा चला तब भारत के लिए समस्या बढ़ जावेगी क्योंकि प.एशिया में होने वाली किसी भी गड़बड़ी का तात्कालिक असर कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि के रूप में देखने मिलता है। पिछले कुछ समय से सऊदी अरब और रूस ने उत्पादन घटाकर कीमतें बढ़ने के हालात उत्पन्न कर दिए हैं। यह युद्ध उसमें और वृद्धि का कारण बन जाए तो आश्चर्य नहीं होगा। ऐसे में कच्चे तेल के बड़े आयातक के रूप में भारत को नुकसान होने की आशंका है। साथ ही इजरायल से प्राप्त होने वाले सैनिक साजो - सामान की आपूर्ति भी बाधित होने की आशंका बनी रहेगी। 

इसके अलावा वैश्विक हालात और खराब हो सकते हैं क्योंकि यूक्रेन पर रूस के हमले से मची उथल - पुथल से ही दुनिया उबर नहीं पाई है। कोरोना की विभीषिका किसी तरह खत्म हो पाती उसके पहले ही रूस ने यूक्रेन पर हमला कर दिया। इसकी वजह से शीतयुद्ध के पुराने दिन लौट आए । इसका असर जी 20 के नई दिल्ली में संपन्न सम्मेलन में रूस और चीन के राष्ट्रपति क्रमशः पुतिन और जिनपिंग के शामिल न होने के रूप में देखने मिला। 

चूंकि रूस और चीन फिलिस्तीन के साथ हैं और प.एशिया के संकट में रूस अमेरिका विरोधी खेमे के साथ खुलकर खड़ा होता रहा इसलिये इस युद्ध के दूसरा यूक्रेन संकट बन जाने का खतरा है। भारत ने उसमें तो तटस्थता की नीति अपना ली लेकिन हमास के हमले की प्रतिक्रिया स्वरूप इजरायल का समर्थन कर अपना रुख स्पष्ट कर दिया । उसका ये फैसला रूस को नागवार गुजर सकता है किंतु भारत ने जिस तरह यूक्रेन युद्ध में अपने राष्ट्रीय हितों को सर्वोपरि रखा उसी तरह से इजरायल को समर्थन देना भी जरूरी है। 
ताजा रिपोर्ट के अनुसार लेबनान ने भी इजरायल पर हमला बोल दिया है। इससे लगता है हमास का आक्रमण किसी बड़ी लड़ाई की शुरुआत है। बड़ी बात नहीं मिस्र और सीरिया भी इसमें कूद पड़ें और वैसा हुआ तो 1967 में हुई जंग के हालात देखने मिल सकते हैं। ये भी सच है कि अचानक हुए इस हमले से इजरायल भौचक रह गया है। जिस बड़ी संख्या में उसके सैनिक और नागरिक मारे गए उसके कारण उसका बौखलाना बनता है और वह अपना दबदबा कायम रखने के लिए दुश्मनों से चौतरफा मुकाबला करने में भी सक्षम है। लेकिन इस युद्ध से प.एशिया एक बार फिर नये संकट में फंसने जा रहा है जिसका दुनिया की अर्थव्यवस्था के साथ ही कूटनीतिक संतुलन पर भी असर पड़ेगा। 
क्या होगा इसका अंदाजा तत्काल लगाना कठिन है लेकिन हमास ने बर्र के छत्ते को छेड़ने का जो दुस्साहस किया उसका दुष्परिणाम उसे तो भोगना ही पड़ेगा । देखने वाली बात ये है कि मुस्लिम देशों का मुखिया कहलाने वाले सऊदी अरब का इस संकट पर क्या रुख रहता है जो इजरायल को मान्यता देने के रास्ते पर पर आगे बढ़ रहा है।

: रवीन्द्र वाजपेयी 

Friday, 6 October 2023

सांसदों , विधायकों , मंत्रियों और न्यायाधीशों की राजसी सुविधाओं का बोझ भी करदाता पर ही पड़ता है


सर्वोच्च न्यायालय ने म.प्र और राजस्थान के साथ ही केंद्र सरकार तथा रिजर्व बैंक को नोटिस भेजकर चुनाव पूर्व मुफ्त सौगातों पर चार सप्ताह में उत्तर मांगा है। प्रधान न्यायाधीश डी. वाय. चंद्रचूड़ ने एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए उक्त आदेश दिया। साथ ही इस बारे में पहले पेश की जा चुकी याचिकाओं की सुनवाई एक साथ करने की बात भी कही। इन याचिकाओं का सार ये है कि राज्य की वित्तीय स्थिति का ध्यान किए बिना जो खैरात बांटी जाती है उससे करदाताओं पर बोझ बढ़ता है। पुराने घाटे के बावजूद नए कर्ज का बोझ लादकर सत्ताधारी नेता चुनाव आते ही जो मांगोगे वही मिलेगा की तर्ज पर खजाना खोल देते हैं । सर्वोच्च न्यायालय में इसके पहले से जो याचिकाएं पेश हुईं  उनके बाद भी अनेक राज्यों के चुनाव संपन्न हुए जिनमें चुनाव पूर्व खैरातें बांटने के साथ ही मुफ्त उपहारों के वायदे किए गए। उस समय ही सर्वोच्च न्यायालय और चुनाव आयोग  सख्ती दिखाते तो बात इतनी आगे न बढ़ती। वैसे ये बीमारी अब भारतीय राजनीति से स्थायी तौर पर जुड़ चुकी है। विपक्ष सत्ताधारी दल पर खजाना खाली करने का आरोप लगाए बिना नहीं थकता किंतु खुद उससे अधिक मुफ्तखोरी का वायदा करने में नहीं चूकता। कर्नाटक में कांग्रेस ने जो वायदे किए थे  सत्ता में आते ही उनको पूरा करने की इच्छाशक्ति भी दिखाई किंतु जल्द ही केंद्र से मदद प्राप्त न होने का बहाना बनाया जाने लगा। संदर्भित याचिकाओं में करदाता के पैसे से मुफ्त उपहार बांटने पर रोक की मांग की गई है। राजस्थान और म. प्र की सरकारों द्वारा बीते कुछ महीनों में जिस दरियादिली से जनता को नगद पैसा और सुविधाएं प्रदान की गईं  उनका उद्देश्य निश्चित रूप से चुनाव जीतना है ।  याचिकाकर्ता के अनुसार  इस बारे में कोई सीमा रेखा तो होनी ही चाहिए। हालांकि मुफ्त रेवड़ियां बांटने के बारे में सभी दल एक ही नाव पर सवार हैं । फर्क इतना है कि उनके बीच ये प्रतिस्पर्धा चल रही है कि कौन  कितना ज्यादा बांटेगा। मसलन राजस्थान में कांग्रेस की गहलोत सरकार ने 500 रु. में रसोई गैस सिलेंडर देने की व्यवस्था की तो म.प्र में कांग्रेस ने  सत्ता में आने  पर वैसा ही वायदा कर डाला। जवाब में म.प्र की शिवराज सरकार ने 450 रु .में सिलेंडर देकर कांग्रेस के दांव को बेअसर कर दिया । इसी तरह म.प्र में कांग्रेस ने  गरीब महिलाओं को 1500 रुपए प्रति माह देने के वायदे के साथ उनसे आवेदन भरवाने का अभियान चलाकर महिला मतदाताओं को अपने पाले में खींचने का पैंतरा चला तो प्रदेश की भाजपा सरकार ने लाड़ली बहना योजना शुरू करते हुए 1000 रुपए प्रति माह देने की शुरुआत कर दी और उसे 3000 रुपए तक ले जाने  का आश्वासन देते हुए 1250 तक पहुंचा भी दिया।  याचिका में  चुनाव के कुछ समय पहले से  रेवड़ी वितरण पर आपत्ति जताई गई है लेकिन  चुनाव  आते ही सरकारी कर्मचारी भी आंदोलन रूपी दबाव बनाते हैं जिनकी नाराजगी से बचने के लिए उनकी  मांगें सरकार मंजूर कर लेती है। इस बारे में देखने वाली  बात ये है कि सरकार चूंकि पांच साल के लिए चुनी जाती है इसलिए उस अवधि के दौरान वह नीतिगत निर्णय तो कर ही सकती है। चुनाव की तारीख का ऐलान हो जाने के बाद भले ही उसे वैसा करने से रोका जाता है और वह गलत भी नहीं है किंतु अदालत में बैठे न्यायाधीश भी तो सेवानिवृत्ति के कुछ घंटों पहले तक ऐसे मामलों में फैसला देते हैं जिनके नीतिगत दूरगामी परिणाम होते हैं। ऐसे अनेक फैसलों पर उंगलियां भी उठती रही हैं। उस लिहाज से सत्ताधारी यदि चुनावी वर्ष में जनता को फायदा पहुंचाने के लिए नीतियां बनाते और निर्णय लेते हैं तब जनहित के आधार पर उन्हें गलत नहीं माना  जा सकता । रही बात आर्थिक प्रबंधन की है तो वह निश्चित रूप से चिंता और चिंतन दोनों का  विषय है। सरकार के अलावा व्यवसायिक प्रतिष्ठान अथवा व्यक्ति के लिए ये जरूरी होता है कि वह जितनी चादर उतने पांव फैलाने की सीख का पालन करे जिससे उस पर कर्ज का बोझ न बढ़े । हालांकि लोक कल्याणकारी राज्य में जनता को सुख -  सुविधा प्रदान करना सरकार का प्राथमिक दायित्व है लेकिन उसकी सीमा और स्वरूप भी तय होना चाहिए । अतीत में सर्वोच्च न्यायालय ने ही कहा था कि सरकारी गोदामों में सड़ाने से बेहतर है अनाज गरीबों को बांट दिया जावे। धीरे - धीरे बात बढ़ते हुए नगदी वितरण तक आ गई। चिंता इस बात को लेकर है कि मुफ्त सुविधाओं का दायरा सुरसा के मुंह की तरह विस्तार लेता जा रहा है। यदि इन्हें आर्थिक अनुशासन से न जोड़ा गया तब बड़ी बात नहीं आने वाले समय में इन पर पूर्ण विराम लगा दिया जाए। कोरोना के दौरान रेलवे टिकिट में मिलने वाली रियायतें इसी आधार पर बंद कर दी गईं जो आज तक शुरू नहीं की जा सकीं। ऐसे में सर्वोच्च न्यायालय को इस याचिका पर फैसला लेते समय विभिन्न  पहलुओं पर ध्यान देना होगा क्योंकि जनता को मिलने वाली मुफ्त सुविधाओं को बंद करने के पहले  सांसदों , विधायकों ,मंत्रियों और न्यायाधीशों को मिल रही राजसी सुविधाएं बंद करने पर भी विचार करना चाहिए क्योंकि उनका बोझ भी तो आखिर करदाता पर ही पड़ता है।


-रवीन्द्र वाजपेयी

शराब घोटाले में आम आदमी पार्टी का नैतिक पक्ष बेहद कमजोर है




दिल्ली के बहुचर्चित शराब घोटाले की गुत्थी उलझती जा रही है। उपमुख्यमंत्री मनीष सिसौदिया छह महीने से जेल में हैं। उनके अलावा कुछ व्यापारी एवं बिचौलिए भी सीखचों के भीतर किए जा चुके हैं। इसी सिलसिले में ईडी (प्रवर्तन निदेशालय )  द्वारा  आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सांसद संजय सिंह को दो दिन पूर्व लंबी पूछताछ के बाद गिरफ्तार कर लिया गया। दरअसल दिनेश अरोड़ा नामक आरोपी ने अदालत से  सरकारी गवाह बनने की अनुमति मिलने के बाद ये खुलासा किया था कि शराब व्यापारियों की जो  बैठक मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के घर पर हुई थी उसी में संजय सिंह द्वारा चंदे का चैक लिया गया था।  उसी के बाद उन्हें गिरफ्तार कर  जांच एजेंसी ने पांच दिन का रिमांड ले लिया । दिनेश को उनका करीबी माना जाता है। आंध्र प्रदेश की सत्तारूढ़ पार्टी के एक सांसद का बेटा भी सरकारी गवाह बन गया है। इस बहुचर्चित मामले का सबसे बड़ा पेच ये है कि करोड़ों के लेन देन का आरोप होने  के बावजूद अब तक  न तो किसी के पास से बड़ी रकम बरामद हुई और न ही किसी को पैसा मिलने का प्रमाण सामने आया है। अरोड़ा द्वारा किए खुलासे में आम आदमी पार्टी को शराब व्यापारियों से चंदा मिलने की बात कही गई है जिसके बाद  ईडी अब पूरी पार्टी पर शिकंजा कसने की तैयारी में  है । बात तो श्री केजरीवाल की गिरफ्तारी की भी होने लगी है। इस घोटाले के तार दिल्ली से दक्षिण भारत तक जुड़े हुए बताए जा रहे हैं । तेलंगाना के मुख्यमंत्री के. सी.राव की बेटी से भी  ईडी पूछताछ कर चुकी है। इस मामले में कांग्रेस की  भूमिका ढुलमुल है। शुरुआत में  दिल्ली प्रदेश कांग्रेस ने केजरीवाल सरकार पर खुलकर आरोप लगाए। श्री सिसौदिया की गिरफ्तारी पर भी कांग्रेस नेताओं ने खुशी व्यक्त की थी किंतु श्री सिंह के पकड़े जाने का पार्टी नेता वेणुगोपाल ने विरोध किया है। जबकि पंजाब में आम आदमी पार्टी सरकार ने अनेक कांग्रेस नेताओं को भ्रष्टाचार के आरोप में गिरफ्तार किया है। राजनीति और जांच एजेंसियों की कार्रवाई से हटकर देखें तो केजरीवाल सरकार की शराब नीति में भ्रष्टाचार से दिल्ली की आम जनता को कुछ लेना देना नहीं है किंतु उसके अंतर्गत शराब दुकानों की संख्या दोगुनी हो गई और एक बोतल के साथ एक मुफ्त जैसे आकर्षक ऑफर देते हुए शराब पीने के प्रति लोगों को आकर्षित किया जाने लगा । स्कूल और धर्म स्थलों तक के पास शराब दुकानें खोल दी  गईं। इसे लेकर दिल्ली में आम आदमी पार्टी के समर्थक भी नाराज हैं । आम जनता को इस बात पर हैरानी है कि  पार्टी ने एक तरफ तो मोहल्ला क्लीनिक और सरकारी शालाओं के उन्नयन जैसा जनहितकारी काम किया वहीं दूसरी तरफ शराब  दुकानों की संख्या बढ़ाकर लोगों के स्वास्थ्य के साथ ही समाज का वातावरण खराब करने का इंतजाम कर दिया। मुख्यमंत्री सहित आम आदमी पार्टी के तमाम नेता ये सफाई तो देते हैं इस  नीति में किसी भी तरह का भ्रष्टाचार  नहीं हुआ और प्रदेश सरकार को राजस्व का घाटा होने की बात भी तथ्यहीन है। उसके इस दावे की सच्चाई तो  अदालत में ही तय होगी किंतु ये कहना कतई गलत न होगा कि ये नीति श्री केजरीवाल और श्री सिसौदिया के साथ ही आम आदमी पार्टी की छवि के पूरी तरह प्रतिकूल थी। नैतिक दृष्टि से यह बहुत ही गलत फैसला था। जिसे सही साबित करने के बजाय यदि श्री केजरीवाल और उनके सहयोगी जनता से क्षमा याचना कर लेते तो उनके प्रति जनता के मन में सम्मान और बढ़ता । लेकिन बजाय ऐसा करने के वे भाजपा , प्रधानमंत्री , सीबीआई और ईडी के विरुद्ध आंय - बांय बकते रहे। श्री सिंह ने अपने घर पर ईडी का स्वागत किए जाने के पोस्टर लगा रखे थे। श्री केजरीवाल जांच एजेंसी की पैंट गीली होने जैसी शेखी बघारकर उसका उपहास करने से नहीं चूके। गिरफ्तार किए जाते समय श्री सिंह ने प्रधानमंत्री को अडानी का नौकर बताते हुए अपना गुस्सा निकाला । यदि सब कुछ पाक - साफ है तब केजरीवाल सरकार को खुद सीबीआई जांच का प्रस्ताव देना था किंतु वह केंद्र सरकार के विरुद्ध लड़ाई छेड़ने का दांव चलती रही। उसकी ये रणनीति कितनी कारगर होगी ये तो भविष्य बताएगा किंतु फिलहाल उसका संकट बढ़ता जा रहा है। विडंबना ये है कि हमारे देश में जांच और दंड प्रक्रिया कछुआ गति से चलती है जिससे दोष साबित करने में लंबा समय लग जाता है। कई मामलों में तो प्रकरण की  गंभीरता भी नष्ट हो जाती है। इसीलिए सत्ता में रहकर भ्रष्टाचार करने वालों के मन में कानून का भय नहीं रहा। और फिर भ्रष्ट नेताओं को अपने निहित स्वार्थ के लिए समर्थन और संरक्षण देने की जो संस्कृति राजनीतिक दलों में व्याप्त है वह भी समस्या को बढ़ा रही है। मसलन लालू प्रसाद यादव को जेल पहुँचाने वाले नीतीश कुमार उनके साथ खड़े हैं। ऐसे ही केजरीवाल सरकार को भ्रष्ट मानने वाली कांग्रेस उनको बचाने में लगी है। एनसीपी छोड़कर एनडीए में आते ही अजीत पवार बेदाग मान लिए गए। इनसे साबित होता है कि राजनेताओं ने खुद को कानून से ऊपर मान लिया है। दिल्ली शराब घोटाले का हश्र क्या होगा ये अभी से कहना कठिन है किंतु इससे आम आदमी पार्टी और अरविंद केजरीवाल  भी उस जमात में शामिल हो गए हैं जिसकी कथनी और करनी में जमीन - आसमान का फर्क है।


-रवीन्द्र वाजपेयी 


Thursday, 5 October 2023

गरीबी को आधार बनाया जाना सही कदम होगा


देश का राजनीतिक विमर्श एक बार फिर जाति के मकड़जाल में आकर उलझ गया है। बिहार की नीतीश सरकार ने सामाजिक न्याय की अगुआई करने के लिए  जातिगत जनगणना का जो दांव चला उससे ओबीसी के भीतर अति पिछड़ी और आर्थिक दृष्टि से कमजोर  जातियों की उपेक्षा का मसला उठ खड़ा हुआ है। इसका तात्कालिक असर ये होगा कि ओबीसी के भीतर भी वर्ग संघर्ष की स्थिति पैदा हो सकती है। बिहार को ही लें तो तो वहां यादव सबसे  बड़े जातीय समूह के रूप में सामने आए किंतु आर्थिक दृष्टि से बेहद कमजोर होने के साथ ही सामाजिक और राजनीतिक तौर पर उपेक्षित पिछड़ी जातियों की कुल संख्या यादवों से कहीं ज्यादा है।अब तक देखने में ये मिलता रहा कि राजनीतिक सत्ता पर यादवों का प्रभाव ज्यादा रहा । लालू प्रसाद यादव का समूचा कुनबा नव सामंतवादी व्यवस्था का पर्याय बन गया। अर्थात मंडल आयोग की सिफारिशों का अधिकतम लाभ इस जाति के लोगों ने न सिर्फ बिहार अपितु उ.प्र में भी बटोरा जहां जिला पंचायत से लेकर तो संसद तक में स्व.मुलायम सिंह यादव के परिवार के लोग बैठे नजर आएंगे। अब जबकि जातिगत जनगणना के आंकड़े आ गए हैं तब मंडलवादी नेताओं के माथे पर पसीने की बूंदें छलछलाने लगी हैं क्योंकि जिस तरह महादलित जैसी नई श्रेणी सामने आई उसी  तरह से  अब अति पिछड़ी जातियों की संख्या भी स्पष्ट हो चली है। आरक्षण के भीतर आरक्षण की मांग करने वाले ओबीसी नेताओं को ये डर सताने लगा है कि कहीं अति पिछड़ी और आर्थिक दृष्टि से कमजोर जातियां गोलबंद हो गईं तो प्रभावशाली पिछड़े नेताओं की जमीन खिसकने लगेगी। ये आशंका गलत भी नहीं है क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गरीबी को ही आरक्षण का आधार बनाए जाने का मुद्दा छेड़ दिया है। जो लोग जातिगत जनगणना को विपक्ष का तुरुप का पत्ता मान बैठे थे उन्हें भी अपनी राय बदलने बाध्य होना पड़ रहा है क्योंकि  केंद्र सरकार ने आर्थिक तौर पर कमजोर वर्ग को आरक्षण और उससे जुड़े लाभ देने की पहल कर दी तो जातिगत जनगणना का पूरा खेल उलट जावेगा। वैसे भी अब ये कहा जाने लगा है कि जातिगत आरक्षण के अपेक्षित परिणाम नहीं निकले , उल्टे समाज टुकड़ों में विभाजित होता जा रहा है। जब तक अनु. जाति और जनजाति ही आरक्षण के अंतर्गत रहीं तब तक तो सामाजिक विद्वेष नहीं बढ़ा किंतु ओबीसी आरक्षण ने सामाजिक स्तर पर जातिगत टकराव और बढ़ा  दिया । राजनीतिक दलों के भीतर भी इसे लेकर खेमेबाजी बढ़ी है। सबसे बड़ी बात ये हुई कि राष्ट्रीय दलों के भीतर भी पिछड़ी जातियों के नेताओं में  आलाकमान पर दबाव बनाने की प्रवृत्ति नजर आने लगी। जातिगत जनगणना को ही लें तो उसके बारे में जिस तरह की प्रतिक्रियाएं सुनाई दे रही हैं उनसे स्पष्ट है कि आरक्षण को लेकर पार्टियों के भीतर भी खींचातानी चल पड़ी है । लेकिन इस विवाद के बीच  एक बात अच्छी हो रही है  कि ओबीसी की सियासत करने वाले छत्रप भी ये भांप गए हैं कि आर्थिक दृष्टि से कमजोर तबके को मदद पहुंचाए बिना आरक्षण की वर्तमान व्यवस्था को जारी रखना मुश्किल हो जाएगा । बीते तीन दशक में देश की सामाजिक स्थिति में जो बदलाव हुआ उसे देखते हुए  आर्थिक आरक्षण को बेहतर विकल्प मानने वाले बढ़ रहे हैं। प्रधानमंत्री श्री मोदी ने सामाजिक कल्याण की जितनी भी योजनाएं प्रारंभ कीं उनका केंद्र गरीबी रही न कि जाति। मुफ्त और सस्ता अनाज , आवास , रसोई गैस , किसान कल्याण , शौचालय जैसी योजनाओं में जाति को आधार नहीं बनाए जाने से सामाजिक तौर पर ईर्ष्या नहीं पनप सकी। आर्थिक तौर पर कमजोर वर्ग के लिए आरक्षण की जो नीति बनी उसका भी सकारात्मक प्रभाव हुआ। जातिगत आरक्षण के समर्थकों को ये बात समझ लेनी चाहिए कि सरकारी नौकरी दिन ब दिन कम होती जा रही हैं। जो राहुल गांधी केंद्रीय सचिवालय में ओबीसी सचिवों की बेहद कम संख्या को मुद्दा बनाए हुए घूम रहे हैं वे शायद भूल गए कि उनकी ही  पार्टी के प्रधानमंत्री  डा.मनमोहन सिंह ने  सरकार का आकार छोटा करने की शुरुआत करते हुए निजी क्षेत्र को काम सौंपने की शुरुआत की थी। उसी के बाद स्व.रामविलास पासवान ने निजी क्षेत्र में भी आरक्षण की मांग उछाली । यद्यपि उसे ज्यादा बल नहीं मिला। आगामी लोकसभा चुनाव में भाजपा को शिकस्त देने बनाए गठबंधन के पास चूंकि प्रधानमंत्री की टक्कर का दूसरा नेता नहीं है इसलिए उन्होंने जातिगत जनगणना  को मुद्दा बनाने का दांव चल तो दिया लेकिन जैसे संकेत आ रहे हैं उनसे लगता है भाजपा आर्थिक दृष्टि से कमजोर तबके को केंद्र में रखकर इसे नई दिशा दे सकती है। जहां तक बात नौकरी और चुनावी टिकिट की है तो उसकी तुलना में  समाज का बड़ा तबका आर्थिक दृष्टि से मदद का आकांक्षी है। ऐसे में यदि केंद्र सरकार ऐसे कदम उठाती है जिनसे समाज का  गरीब वर्ग लाभान्वित हो तो उससे सामाजिक विद्वेष तो कम  होगा ही ,  आरक्षण की आड़ में  की जाने वाली सौदेबाजी पर भी लगाम लगेगी।


-रवीन्द्र वाजपेयी


Wednesday, 4 October 2023

जातिगत जनगणना जैसे मुद्दों में उलझकर अपना कद छोटा कर रही कांग्रेस


बिहार में जातिगत जनगणना के नतीजों ने राष्ट्रीय राजनीति में उबाल ला दिया है। विपक्ष इस मुद्दे से भाजपा को पटकनी देना चाह रहा है।उसकी परेशानी ये है कि उच्च जातियों की पार्टी कहलाने वाली भाजपा पिछड़ों और दलितों की  पसंद बनकर  केंद्र में स्पष्ट बहुमत हासिल कर ले गई। सबसे बड़ा नुकसान कांग्रेस को हुआ जो उ.प्र और बिहार में हाशिए पर चली गई। मंडल वादियों की कर्मभूमि रहे इन राज्यों में भाजपा का उभार  चौंकाने वाला था। कांग्रेस की मुसीबत ये है कि आज उसके साथ न तो मुस्लिम पूरी तरह हैं और न ही ओबीसी तथा दलित। सवर्ण  पहले ही खिसक चुके थे। उन्हें रिझाने के  लिए राहुल गांधी ने खुद को जनेऊ धारी ब्राह्मण और शिव भक्त  प्रचारित करवाते हुए मंदिरों - मठों में मत्था टेकना शुरू कर दिया । लेकिन ये दांव जब कारगर नहीं हुआ तब कुछ महीनों से वे पिछड़ी जातियों को लुभाने का प्रयास करने लगे। जिसकी जितनी संख्या ,  उसका उतना हिस्सा , वाला नारा लगाकर वे जिस सामाजिक न्याय का ढोल पीट रहे हैं वह बात तो डा.राममनोहर लोहिया ने आजादी के बाद  ही कहना शुरू कर दिया था। जब जातिगत जनगणना का कोई जिक्र तक नहीं करता था तब लोहिया जी ने पिछड़ा पावै 100 में साठ का नारा लगाया था। मंडल आयोग तो उनके न रहने के बरसों बाद बना। सवाल ये है कि कांग्रेस को ओबीसी के हितों की चिंता पहले क्यों नहीं हुई  और अनु. जाति/जनजाति को आरक्षण देते समय संविधान सभा ने ओबीसी को क्यों उपेक्षित किया?  1979 में जब चौधरी चरणसिंह की केंद्र सरकार से कांग्रेस ने समर्थन वापस लिया था तब उसके सांसद स्व.कल्पनाथ राय की टिप्पणी थी , जातिवाद का काला नाग मारा गया। दरअसल चौधरी साहब ने अजगर नामक गठबंधन बनाकर उ. प्र में पहली गैर कांग्रेसी सरकार गठित की थी । अजगर से अभिप्राय अहीर(यादव) , जाट, गुर्जर और राजपूत था। इसमें ब्राह्मण और दलितों को दूर रखा गया । बाद में नए - नए समीकरण बनते बिगड़ते रहे। सवर्ण जातियों को जूते मारने का नारा बुलंद करने वाली बसपा उनके समर्थन के लिए हाथी नहीं गणेश है, ब्रह्मा , विष्णु , महेश है का राग अलापने लगी । 2007 में इन्हीं के बल पर मायावती ने उ. प्र में पूर्ण बहुमत वाली सरकार बनाई। इसी तरह 2012 में अखिलेश यादव को सत्ता में लाने में भी सवर्णों की भूमिका थी जो मायावती के दलित मोह से त्रस्त हो चुके थे। लेकिन वे भी यादव प्रेम में फंसकर सवर्णों के साथ अन्य पिछड़ी जातियों का समर्थन गंवा बैठे जिसका लाभ उठाकर भाजपा ने इस राज्य में  अपने दम पर बहुमत हासिल कर लिया । और पिछड़े या अगड़े के बजाय योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री बनवाया जो हैं तो क्षत्रिय किंतु सन्यासी होने से उनकी  जातिगत पहिचान मुद्दा नहीं बन पाती। 2022 में भाजपा की सोशल इन्जीनियरिंग को ध्वस्त करने अखिलेश ने जाट  नेता जयंत चौधरी से गठजोड़ किया लेकिन वह भी कारगर नहीं हो सका । सबसे चौंकाने वाली ये रही कि इस राज्य कांग्रेस का जनाधार घटता चला गया। बिहार में भी कांग्रेस दुर्गति की शिकार है और लालू प्रसाद यादव और उनके बेटों के इशारों पर नाचने की मजबूरी झेल रही है। सही बात तो ये है कि  जबसे राहुल के हाथ बागडोर आई है तबसे पार्टी वैचारिक  भटकाव का शिकार होकर रह गई है। बिहार में हुई जातिगत जनगणना के नतीजों से बल्लियों उछल रहे श्री गांधी को इस सवाल का उत्तर भी देना चाहिए कि केंद्र में 2004 से 2014 तक जो सरकार चली उसकी लगाम उनके परिवार के हाथ थी। खुद राहुल इतने ताकतवर थे कि केंद्र सरकार द्वारा जारी अध्यादेश को पत्रकार वार्ता में फाड़कर फेंकने जैसा दुस्साहस कर बैठे । यदि जातियों के आधार पर हिस्सेदारी की फिक्र होती तो वे मनमोहन सरकार से कहकर  नीतिगत फैसला करवा लेते। 2011 की जनगणना तो यूपीए के राज में ही हुई थी । और जिस तरह बिहार सरकार ने जातिगत जनगणना के लिए प्रतिबद्धता दिखाई वैसी कांग्रेस शासित पंजाब , राजस्थान और छत्तीसगढ़ भी दिखाते तब ये कहा जा सकता था कि पार्टी जातियों की संख्या के आधार पर सामाजिक और राजनीतिक बंटवारा करने की हिमायती है। अचानक श्री गांधी जिस प्रकार जातिगत जनगणना के पक्षधर बनकर सामने आए उसके बारे में उनकी पार्टी के भीतर भी मतैक्य नहीं है। एक नेता द्वारा  सोशल मीडिया पर की गई विपरीत टिप्पणी हालांकि जल्द ही वापस ले ली गई लेकिन उससे काफी कुछ संकेत तो मिल ही गए । सबसे महत्वपूर्ण ये है कि कांग्रेस कब तक दूसरों के मुद्दों पर राजनीति करेगी जबकि लंबे समय से वह इस प्रवृत्ति का खामियाजा भुगत रही है। उसने तात्कालिक लाभ हेतु जितने भी नीतिगत फैसले किए उस सबकी महंगी कीमत चुकाने के बावजूद उसे अक्ल नहीं आ रही तो फिर ये मानकर चलना गलत न होगा कि देश की सबसे पुरानी पार्टी दिशाहीनता का शिकार होकर निर्णय क्षमता खो बैठी है।  राहुल सहित पूरी पार्टी को ये समझ लेना चाहिए कि नीतीश , लालू और अखिलेश जैसे नेता कांग्रेस को दोबारा उठने नहीं देंगे क्योंकि उससे उनकी राजनीति को ग्रहण लग जाएगा । कांग्रेस को चाहिए वह राष्ट्रीय पार्टी की तरह आचरण करे क्योंकि क्षेत्रीय मुद्दों में उलझकर उसका ऊंचा कद बौनेपन में तब्दील हो चुका है। 


-रवीन्द्र वाजपेयी


Monday, 2 October 2023

आर्थिक स्थिति को पिछड़ेपन का आधार बनाना ही सही उपाय


बिहार में जातिगत जनगणना के आंकड़े घोषित कर दिए गए। इसमें पिछड़ी , अति पिछड़ी , दलित , आदिवासी और सवर्ण जातियों की संख्या बताई गई है। राजनीतिक विश्लेषक इसे मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का बड़ा दांव मान रहे हैं। कांग्रेस नेता राहुल गांधी भी काफी दिनों से जातिगत जनगणना की मांग उठाते हुए भाजपा को चुनौती देने में जुटे हैं। उनको लग रहा है कि अब पिछड़ों की तरफदारी ही उनका बेड़ा पार लगाएगी। कुछ लोग नीतीश के इस कदम को मंडल - 2 भी कह रहे हैं। ये आशंका भी जाहिर की जा रही है कि इसके बाद मंडल और कमंडल के बीच वैसी ही संघर्ष पूर्ण राजनीति शुरू हो जाएगी जैसी 1990 में देखने मिली थी। केंद्र सरकार का इस बारे में कहना है कि वह अलग से जातिगत जनगणना नहीं करवाएगी अपितु अगली जनगणना के साथ ही इसके आंकड़े एकत्र कर लिए जावेंगें। लोकसभा और विधानसभा में सीटों के नए सिरे से आरक्षण के लिए 2026 में परिसीमन की प्रक्रिया शुरू होगी । महिला आरक्षण भी उसके बाद लागू होगा। सवाल ये है कि बिहार में करवाई गई जातिगत जनगणना से होगा क्या ? सर्वेक्षण और आंकड़ों के आधार पर लोक कल्याणकारी योजनाओं का समुचित लाभ वंचित वर्ग तक पहुंचाने में बेशक मदद मिलती है किंतु बीते 75 वर्षों में जातिगत पिछड़ेपन की  स्थिति काफी बदली है। मसलन कुछ जातियां ऐसी हैं जो कहने को तो पिछड़ी हैं लेकिन सामाजिक , आर्थिक और राजनीतिक दृष्टि से वे अगड़ी जातियों के समकक्ष आकर खड़ी हो चुकी हैं। और तो और राजनीतिक सत्ता की बदौलत उन्होंने  सामंतवादी हैसियत भी अर्जित कर ली है। उनके नेताओं ने अपनी पार्टी बनाकर पारिवारिक सत्ता कायम करने में भी सफलता हासिल कर ली है। स्व. चौधरी चरण सिंह ,स्व.मुलायम सिंह यादव  और लालू प्रसाद यादव इसके उदाहरण हैं। बिहार में अनेक नेताओं की जातिगत पार्टियां उनके परिजनों तक सीमित हैं और उनका प्रभावक्षेत्र भी छोटा है। ये नेता अपनी जाति के उत्थान से ज्यादा परिवार को महत्व देते हैं और राजनीतिक ब्लैकमेल ही इनकी कार्यशैली है। ऐसे में जातिगत जनगणना से नीतीश सरकार  कौन सी नई बात सामने लाई ये बड़ा सवाल है।  बिहार ही नहीं बाकी राज्यों का जो सामाजिक ढांचा है उसकी जानकारी किसी से छिपी नहीं  है। ऊंच - नीच की भावना भी अब पहले जैसी नहीं रही। आरक्षण की वजह से शैक्षणिक , सामाजिक और आर्थिक तौर पर भी दलित और पिछड़ों में से काफी लोग संपन्न हुए हैं। इन्हें देखकर ही क्रीमी लेयर जैसी बात उठती रही है। अनेक राजनीतिक नेताओं और नौकरशाहों के परिवार हर दृष्टि से सक्षम और समृद्ध हैं। दरअसल इसी वर्ग के कारण उनके सजातीय बाकी लोग  उन्नति की दौड़ में पिछड़ गए। जातिगत जनगणना के बाद अब जाति की संख्या के आधार पर राजनीतिक हिस्सेदारी मांगी जाएगी ।  वहीं नौकरी में आरक्षण के लिए भी उसी फार्मूले पर जोर दिया जावेगा। ऐसे में जातियों के भीतर भी वर्ग संघर्ष के हालात उत्पन्न होने का खतरा बढ़ जाएगा। इस बारे में उल्लेखनीय है कि मंडलवादी नेताओं में नीतीश सबसे सुलझे और शांत माने जाते रहे हैं । इसीलिए उन्होंने केंद्र और राज्य दोनों में लंबे समय तक भाजपा के साथ सत्ता में भागीदारी की। ये कहना गलत न होगा कि यदि वे भाजपा के साथ न जुड़े होते तो लालू प्रसाद यादव उनकी राजनीति कभी की खत्म कर देते। बिहार के बाकी ओबीसी नेता भी इसीलिए टिके रह सके क्योंकि वे भाजपा के साथ रहे। उ.प्र की स्थिति भी कमोबेश ऐसी ही है जहां मुलायम सिंह ने पिछड़ी जातियों के बाकी नेताओं को दोयम दर्जे का बना दिया। यही हाल मायावती ने दलितों के बीच वैकल्पिक नेतृत्व के उभरने की संभावना मिटाकर पैदा किया। जातिगत जनगणना के आंकड़े प्रकाशित होने के बाद क्या नीतीश उन अति पिछड़ी और दलित जातियों के नेताओं को राजसत्ता में हिस्सेदारी देकर ताकतवर बनायेंगे जिन्हें लालू एंड कंपनी ने दबा रखा था। इस बारे में एक बात और भी महत्वपूर्ण है कि यदि पिछड़ी और दलित जातियों के नेताओं का लक्ष्य वंचितों का उत्थान ही होता तो फिर 1990 के बाद से जनता दल के आधा दर्जन टुकड़े न हुए होते। खुद नीतीश कुमार ने समता पार्टी  बनाकर लालू प्रसाद और स्व.शरद यादव से दूरी बनाई। रामविलास पासवान , उपेंद्र कुशवाहा , जीतनराम मांझी, ओमप्रकाश राजभर , सोनेलाल पटेल के दल इसके उदाहरण हैं। बिहार में जनता दल (यू) और राजद  साथ रहते हुए भी अलग हैं। कर्नाटक में देवगौड़ा परिवार की पार्टी जनता दल ( सेकुलर ) है। जातिवादी राजनीति करने वाले तमाम नेता खुद को स्थापित करने के लिए अपनी जाति का लाभ उठाते हैं। नीतीश जरूर अपवाद हैं किंतु पिछड़ी और दलित जातियों के ज्यादातर नेता अपने परिवार को ताकतवर बनाने में ही जुटे रहे। यही वजह है कि अनु. जाति/जनजाति और ओबीसी वर्ग की राजनीति भी वंशवाद में उलझकर रह गई। स्व.डा.राममनोहर लोहिया ने अगड़ी जाति के होने के बाद भी पिछड़ी जातियों के हक के लिए आवाज उठाई किंतु उनके अनुयायी संकुचित दृष्टिकोण में उलझकर रह गए। भारतीय राजनीति की ये सबसे बड़ी विडंबना है कि जाति की राजनीति करने वाले भी परिवार और कुनबे में सिमटकर रह गए। ऐसे में जातिगत जनगणना के आंकड़ों से नए - नए दबाव समूहों के उभरने की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता। नीतीश कुमार को भी जल्द इसका कटु अनुभव हुए बिना नहीं रहेगा।  विकास की दौड़ में पीछे रह गए वर्ग के उत्थान के लिए अंततः आर्थिक स्थिति को ही आधार बनाना होगा । इस सच्चाई को नेतागण जितनी जल्दी समझ लें वह अच्छा है वरना जातिवाद की चौड़ी होती खाई में रहा - सहा सामाजिक सद्भाव समा जावेगा। लालू प्रसाद की पार्टी के राज्यसभा सदस्य मनोज झा द्वारा संसद में पढ़ी गई ठाकुर का कुआ नामक कविता पर बिहार में मचा राजनीतिक बवाल इसका ताजा उदाहरण है।


- रवीन्द्र वाजपेयी