Monday, 16 October 2023

इजराइल एक वास्तविकता है जिसे अरब देशों को स्वीकारना ही होगा


इजराइल और हमास के बीच  युद्ध को एक सप्ताह से ज्यादा बीत चुका । 7 अक्टूबर को हमास द्वारा गाज़ा पट्टी से हजारों राकेट छोड़े जाने के अलावा उसके पैराग्लाइडर्स द्वारा इसराइल के भीतर आकर हत्या , अपहरण , बलात्कार जैसे अमानवीय कृत्य किए जाने के बाद पूरी दुनिया कांप गई । गाज़ा पट्टी पर कब्जा किए बैठे आतंकवादी संगठन हमास ने इसराइल की सुरक्षा व्यवस्था को जिस तरह बेअसर किया उसने अमेरिका में हुए  9/11 हमले की स्मृतियां ताजा कर दी थीं। लेकिन कुछ घंटों के भीतर ही इसराइल ने  पलटवार करते हुए लड़ाई का केंद्र गाज़ा पट्टी को बना दिया। उसके प्रधानमंत्री नेतन्याहू ने  स्पष्ट कर दिया कि हमास को उसी की भाषा में उत्तर दिया जाएगा । और फिर गाज़ा में बिजली और पेयजल के अलावा सारी जरूरी आपूर्ति रोक दी गई। सैकड़ों इमारतें मलबे में बदल गईं । हजारों लोग मारे जा चुके हैं। हमास कमांडरों को खत्म किया जा रहा है। लेबनान ने भी इजराइल पर हमले की कोशिश की लेकिन उसे भी ठंडा कर दिया गया। हमास के सबसे बड़े मददगार ईरान ने  उसे इस हमले के लिए उकसा तो दिया किंतु वह भी  धमकियां देने के अलावा और कुछ न कर सका । उधर इजराइल ने गाज़ा पर कब्जे की मंशा व्यक्त कर डाली । जिसके बाद  लोग बोरिया - बिस्तर समेटकर सुरक्षित स्थान की तलाश में चल दिए। गाज़ा से मिस्र जाने वाले  सभी रास्तों पर जनसैलाब उमड़ पड़ा। लेकिन मिस्र ने अपनी सीमा सील करते हुए  उनके प्रवेश पर पाबंदी लगा दी। संरासंघ ,  इजराइल को युद्ध के नियमों से परे जाकर गाज़ा को बरबाद करने के विरुद्ध चेतावनी दे रहा है। लेकिन नेतन्याहू ने साफ कह दिया कि वे पीछे नहीं हटेंगे।  लगता है जिन ताकतों ने हमास को उकसाया उनको इजराइल से ऐसे जवाब की उम्मीद नहीं थी। खुद हमास भी अंदाज लगाने में चूक गया । उल्लेखनीय है स्व.यासर अराफात के जीवनकाल में ही फिलीस्तीनियों के साथ इजराइल का समझौता होने के बाद दोनों शांति के साथ रहने तैयार हो गए थे। लेकिन कट्टरपंथी इस्लामिक देश यहूदियों को वहां से बेदखल करने पर अड़े हुए हैं। बीते हफ्ते भर में इजराइल ने जिस दृढ़ता का परिचय दिया वह सीखने लायक है । वहां का प्रत्येक नागरिक सैनिक की भूमिका में आ गया है। विदेशों में रह रहे यहूदी देश को संकट में देख घर लौट रहे हैं। विपक्ष के साथ आपातकालीन राष्ट्रीय सरकार भी बना ली गई है। कुल मिलाकर इजराइल शत्रु की जड़ों में मठा डालने की जिस चाणक्य नीति पर चल रहा है वही तो वे सभी देश अपनाते हैं जो उसे संयम रखने की सलाह दे रहे हैं । अमेरिका ने 9/11 के सूत्रधार ओसामा बिन लादेन को सात समंदर पार कर दूसरे देश की सीमा में घुसकर मारा। रूस अपने राष्ट्रीय हितों के लिए यूक्रेन में जो कुछ कर रहा है उसके बाद उसे  इजराइल को रोकने का नैतिक अधिकार ही नहीं है। चीन भी तिब्बत में जिस निर्दयता से मानवीय अधिकारों का कत्लेआम करता आया और उइगर मुसलमानों को जैसे खून के आंसू रुलाता है , वह भी किसी से छिपा नहीं है। आज जो इस्लामिक जगत यहूदियों को अत्याचारी बताता है उसे इस बात का भी जवाब देना पड़ेगा कि जिस धरती पर यहूदी धर्म जन्मा वह उनकी भी तो मातृभूमि है। येरुशलम को ईसाई , यहूदी और मुसलमान तीनों अपना पवित्र स्थल मानते हैं। ऐसे में पूरी सहानुभूति फिलीस्तीनियों के साथ जोड़ देना एकपक्षीय है। इजराइल एक वास्तविकता है जिसे स्वीकार करने  के अलावा  कोई और विकल्प नहीं है। इस युद्ध के पहले ही संयुक्त अरब अमीरात और मिस्र जैसे अनेक देश इजराइल के साथ कारोबारी रिश्ते बना चुके थे। वहीं सऊदी अरब भी दोस्ताना कायम करने जा रहा था । लेकिन ईरान सहित कुछ  विघ्नसंतोषियों ने पश्चिम एशिया को आग में झोंकने का षडयंत्र रच दिया।  देखने वाली बात ये है कि बीते 75 सालों में अनेक मुस्लिम देशों ने कभी अकेले तो कभी मिलकर इजराइल को मिटाने का दुस्साहस किया । लेकिन हर युद्ध में वह पहले से ज्यादा ताकतवर होकर उभरा और फिलिस्तीनियों की जमीन घटती चली गई। मौजूदा विवाद का अंजाम भी वैसा ही होने का अंदेशा है। गाज़ा पट्टी की घेराबंदी तो इजराइल शुरू से करता आया है।  लेकिन अब वह उस पर कब्जा करने आमादा है जिसके लिए इस्लामिक कट्टरता के पोषक तत्व जिम्मेदार हैं। बतौर इंसान फिलिस्तीनी समुदाय के अधिकारों की रक्षा बेशक होनी चाहिए लेकिन जब तक उनको केवल मुसलमान माना जायेगा तब तक वे इसी तरह खानाबदोश बने रहेंगे। इजराइल को किसी पर ज्यादती का अधिकार कतई नहीं है परंतु अपनी सार्वभौमिकता की रक्षा करने के उसके अधिकार की अनदेखी भी नहीं की जा सकती।


- रवीन्द्र वाजपेयी


Friday, 13 October 2023

चुनाव बना डिस्काउंट सेल और मतदाता ग्राहक


कांग्रेस महासचिव प्रियंका वाड्रा ने गत दिवस म.प्र के आदिवासी जिले मंडला में पार्टी द्वारा आयोजित  जनाक्रोश रैली में प्रदेश की भाजपा सरकार पर ताबड़तोड़ आरोपों की झड़ी लगाने के साथ कुछ चुनावी वायदे भी कर डाले। जिनमें पहली से 12 वीं तक की मुफ्त शिक्षा के अलावा कक्षा आठवीं तक के छात्रों को  500 रु. , नौवीं और दसवीं में 1000 रु. और 11 वीं तथा 12 वीं के छात्रों को 1500 रु. हर महीने देने का वायदा कर दिया। अपने भाषण में श्रीमती वाड्रा ने अनेक वही बातें दोहराईं जो उनके भ्राता राहुल गांधी हाल ही में पड़ोसी जिले शहडोल में बोलकर गए थे। स्कूली छात्रों को निशुल्क शिक्षा  सरकारी शालाओं में तो अभी भी दी जाती है। कापी, किताबें , सायकिल , स्कूटी , लैपटॉप जैसी चीजों का वितरण भी पात्रतानुसार किया जाता है।  मध्यान्ह भोजन की भी व्यवस्था है। बावजूद इसके आदिवासी क्षेत्रों में शिक्षा की स्थिति दयनीय है। शाला के भवन खस्ता हालत में हैं। शिक्षकों की पर्याप्त संख्या नहीं है । जो हैं वे भी  नियमित नहीं आते। लड़कियों के बारे में तो स्थिति और भी खराब है। आदिवासी  वर्ग को  सरकार से अनेक प्रकार की और भी  सुविधाएं मुफ्त में दी जाती हैं किंतु अपेक्षित परिणाम नहीं निकल रहे। ऐसे में प्रियंका द्वारा नगद रुपए देने का वायदा चुनावी पैंतरा  हो सकता है किंतु इससे आदिवासी बच्चों की शिक्षा का स्तर सुधारने में कोई मदद मिलेगी , यह सोचना गलत है। ऐसा लगता है शिवराज सरकार द्वारा लाड़ली बहना योजना लागू किए जाने के जवाब में  कांग्रेस अब शालेय छात्रों को नगद राशि देने का प्रलोभन देकर उनके माता - पिता को अपनी ओर खींचना चाह रही है। अभी ये स्पष्ट नहीं है कि उक्त योजना केवल गरीब परिवारों के बच्चों के लिए रहेगी अथवा सभी आय वर्गों को इसका लाभ मिलेगा । बहरहाल , चुनावी वायदों से हटकर विचारणीय मुद्दा ये है कि ग्रामीण क्षेत्रों में संचालित सरकारी विद्यालयों की दशा जब तक नहीं सुधारी जाती तब तक जो हश्र मध्यान्ह भोजन का हुआ वही छात्रों को दी जाने वाली नगद राशि का होगा। गरीब परिवार के  बच्चों को मिली राशि को उनकी शिक्षा पर खर्च करने के बजाय अभिभावक उससे अपने घर का खर्च चलाएंगे । बेहतर होता श्रीमती वाड्रा ये वायदा करतीं कि आदिवासी क्षेत्रों में संचालित सरकारी विद्यालयों को उच्चस्तरीय एवं सर्वसुविधा संपन्न  बनाया जावेगा। उनमें शिक्षकों की उपस्थिति सुनिश्चित की जाएगी और वे निजी विद्यालयों की तुलना में कुछ कम भले हों लेकिन दोनों में जमीन - आसमान का अंतर न रहेगा। वास्तविकता ये है कि  शालेय छात्रों को सरकार की तरफ से दी जाने वाली मुफ्त सुविधाएं भी यदि सरकारी विद्यालयों को प्रतिस्पर्धा में खड़ा नहीं कर पा रहीं तो उसका कारण  गुणवत्ता का अभाव है। यहां तक कि दोपहर में दिए जाने वाले मुफ्त आहार तक के सकारात्मक परिणाम नहीं आए , उल्टे भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिला । ये देखते हुए प्रियंका ने छात्रों को नगद रुपए दिए जाने का जो वायदा किया वह सुनने में तो आकर्षक है। और हो सकता है उसके लालच में कांग्रेस को चुनावी लाभ भी हो जाए किंतु जब तक सरकारी विद्यालयों का स्तर नहीं सुधरेगा तब तक छात्रों को दी जानी मुफ्त सुविधाएं पैसे की बरबादी ही कहलाएगी। यदि राजनीतिक दल केवल चुनावी वायदे उछालकर शिक्षा को बढ़ावा देना चाहते हैं तो फिर ये कहने में कुछ भी गलत नहीं है कि न तो उन्हें विद्यालयों में रुचि है और न ही विद्यार्थियों में । केवल श्रीमती वाड्रा ही नहीं अपितु अन्य राजनीतिक दल भी इसी ढर्रे पर चलकर चुनाव रूपी वैतरणी पार करना चाहते हैं। शिक्षा ही क्यों जनकल्याण की ज्यादातर योजनाएं इसी प्रवृत्ति का शिकार होकर अपने लक्ष्य से भटक जाती हैं। इस बारे में  दिल्ली की केजरीवाल सरकार की तारीफ करनी होगी जिसने सरकारी शालाओं को निजी क्षेत्र की शिक्षण संस्थाओं के मुकाबले ला खड़ा किया। जिन राज्यों में भी आगामी माह विधानसभा चुनाव होने वाले हैं उनमें सत्तारूढ़ पार्टी के अलावा विपक्ष नगद राशि बांटने पर जोर दे रहा है । मुफ्त शिक्षा और चिकित्सा  की बात भी जोर शोर से की जा रही है किंतु इसके लिए ढांचागत सुधार किए जाने की जो जरूरत है उसके बारे में कोई योजना नजर नहीं आती। राजनीतिक दलों का समूचा चिंतन येन -  केन - प्रकारेण चुनाव जीतने पर केंद्रित हो गया है। मुफ्त की योजनाओं से व्यवस्था में सुधार का असली काम उपेक्षित हो जाता है । निष्पक्ष आकलन करें तो ये लगेगा कि जितना धन मुफ्त उपहारों में खर्च होता है उतने में  शिक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था को सुधारा जाए तो जनकल्याण का उद्देश्य कहीं बेहतर तरीके से पूरा हो सकेगा । दुर्भाग्य से भारतीय राजनीति भी पूरी तरह बाजारवाद के शिकंजे में फंसकर रह गई है और चुनाव डिस्काउंट सेल बन गए हैं। मतदाता को ग्राहक समझकर लुभाने की प्रतिस्पर्धा जिस तरह से बढ़ती जा रही है उसके कारण लोकतंत्र मजाक बनकर रह गया है। जिस आदिवासी क्षेत्र में श्रीमती वाड्रा ने गत दिवस रैली की वहां आदिवासियों के विकास के नाम पर बीते 75 साल में अरबों - खरबों रुपए खर्च होने के बाद भी गरीबी , अशिक्षा और पिछड़ापन क्यों है इस सवाल का उत्तर भी दिया जाना चाहिए। 


- रवीन्द्र वाजपेयी


Thursday, 12 October 2023

मंडल तो पूरी तरह लागू हुआ नहीं और ये नया बखेड़ा खड़ा हो गया


इन दिनों सोशल मीडिया पर दो वीडियो प्रसारित हो रहे हैं। एक में स्व. इंदिरा गांधी  को ये कहते  सुना जा सकता है कि जाति शब्द को ही देश से हटा देना चाहिए क्योंकि इसके नाम पर लोग समाज को तोड़ते हैं। दूसरे में उनके पोते राहुल गांधी जातिगत आधार पर हिस्सेदारी  की मांग कर रहे हैं। यद्यपि ये मुद्दा मंडल की राजनीति करने वालों ने गर्माया। खास तौर पर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने तो अपने राज्य में जातिगत जनगणना करवाकर उसके आंकड़े भी सार्वजनिक कर दिए। अब कांग्रेस कह रही है वह पूरे देश में जातिगत जनगणना करवाएगी। यद्यपि कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया अपने  पिछले कार्यकाल में करवाई गई जातिगत जनगणना के आंकड़े दोबारा सत्ता में आने के बाद भी जारी करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे और न ही श्री गांधी ने अब तक उन पर ऐसा करने का दबाव ही बनाया। धीरे - धीरे ये बात भी सामने आ रही है कि नीतीश की पार्टी  के साथ ही कांग्रेस में भी जातिगत जनगणना को लेकर विरोध सामने आने लगा है। कुछ नेता खुलकर तो कुछ दबी जुबान बोल रहे हैं।  लेकिन पिछड़ी जातियों को एकजुट करने की रणनीति के अंतर्गत जातिगत जनगणना के जिस दांव को कुछ विपक्षी  दल और कांग्रेस चलना चाह रहे हैं , उसका दुष्प्रभाव भी सामने आने लगा है। मसलन बिहार में ऊंची जातियों का गुस्सा तो अपनी जगह है किंतु पिछड़े और अति पिछड़े जाति समूह जिस तरह जातिगत जनगणना के आंकड़ों को फर्जी बताते हुए दोबारा जनगणना की मांग कर रहे हैं उससे नीतीश के साथ ही लालू प्रसाद यादव और उनका परिवार  दबाव में आ गया है। प्रदेश कांग्रेस के नेता भी उसकी प्रामाणिकता पर  उंगली उठा रहे हैं। राष्ट्रीय स्तर पर भी भले ही विपक्षी गठबंधन में ज्यादातर पार्टियां जातिगत जनगणना के पक्ष में हों किंतु ममता बैनर्जी जैसी प्रमुख नेता अपने राज्य में उसके लिए राजी नहीं हैं।  उ.प्र में भी कांग्रेस के साथ ही सपा के गैर यादव नेता ये कहते सुने जा सकते हैं कि इसका उद्देश्य पहले से ताकतवर बनी हुई ओबीसी जातियों के वर्चस्व पर सरकारी मोहर लगवाना है। बिहार में यादवों के सबसे बड़ी जाति बनकर सामने आने से  उ.प्र में भी हड़कंप है। उधर दलितों और आदिवासियों के बीच भी ये जनगणना असंतोष फैला रही है क्योंकि राहुल जनसंख्या के हिसाब से हिस्सेदारी की जो बात कर रहे हैं उससे उनको डर है कि कांग्रेस और उसकी सहयोगी पार्टियां मिलकर आरक्षण का प्रतिशत इतना न बढ़ा दें जिससे उनके अधिकारों पर अतिक्रमण हो जाए। कुल मिलाकर इस जनगणना पर ओबीसी नेता भले ही खुशी जाहिर कर रहे हों लेकिन आम जनता को इसमें कोई फायदा नजर नहीं आ रहा। इसके साथ ही मुस्लिम समुदाय में भी इस बात  पर नाराजगी है कि उनको न तो पिछड़े वर्ग का लाभ मिलता है और न ही दलित समुदाय का । दूसरी तरफ यदि श्री गांधी के सुझाए अनुसार जनसंख्या के अनुसार आरक्षण और उस जैसे लाभों का बंटवारा किया जाए तब मुस्लिम भी उसके दायरे में आएंगे जो ओबीसी और दलितों को नागवार गुजरेगा।  ऐसे में जातिगत जनगणना भी महज राजनीतिक प्रपंच का शिकार होकर रह जाएगी। उल्लेखनीय है मंडल आयोग की सिफारिशें लागू हुए तीन दशक से ज्यादा बीतने के बाद भी ओबीसी आरक्षण की गुत्थी उलझी हुई है और अनेक राज्यों के मामले सर्वोच्च न्यायालय में लंबित हैं। अब जातिगत जनगणना के आंकड़ों के आधार पर आरक्षण सहित उससे जुड़ी अन्य सुविधाओं का पुनर्निर्धारण किस तरह किया जाएगा ये यक्ष प्रश्न है। राजनीतिक विश्लेषक मान रहे हैं कि ये सारी उठापटक भाजपा को मिल रहे जबरदस्त ओबीसी और दलित मतदाताओं के समर्थन को रोकने की जा रही है। लेकिन नीतीश और श्री गांधी भूल जाते हैं कि दलितों और आदिवासियों के बीच जातिगत भेदभाव उतने नहीं हैं जितने ओबीसी में शामिल दर्जनों जातियों और उनके भीतर से उत्पन्न हुई नई - नई उपजातियों में हैं । और इन छोटे - छोटे जाति समूहों में जो नए नेता  उभर आए हैं वे भी  सौदेबाजी  सीख चुके हैं। इसलिए जातिगत जनगणना की राजनीति भी शेर की सवारी जैसी है। नीतीश और लालू प्रसाद तो राजनीति के घाघ हैं किंतु राहुल अभी भी नौसिखिया जैसा व्यवहार कर रहे हैं । उनके भाषण सुनने के बाद ये कहा जा सकता है कि उनको जो रटा दिया जाता है वे उसे ही दोहराते रहते हैं। इसीलिए उनको गंभीरता से नहीं लिया जाता क्योंकि वे किसी मुद्दे की गहराई को जाने बिना ही उसमें कूद जाते हैं। गौरतलब है  हर राज्य में दलित , आदिवासी और ओबीसी का वर्गीकरण अलग - अलग है। ऐसे में किसी एक सर्वमान्य फार्मूले को लागू करना सामाजिक विद्वेष और विघटन का कारण बने नहीं रहेगा । याद रखने  वाली बात है कि अभी तक मंडल की सिफारिशों से तय हुआ आरक्षण ही पूरी तरह लागू नहीं किया जा सका तब इस नए बखेड़े को खड़ा करने का औचित्य समझ से परे है।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 10 October 2023

मुस्लिमों के डर से हमास का विरोध करने से बच रही कांग्रेस




इजरायल और फिलिस्तीनियों का झगड़ा पुराना है। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद जब इजरायल अस्तित्व में आया तभी से इस बात का विवाद चला आ रहा है कि यहूदियों ने सैकड़ों साल बाद लौटकर अपना मुल्क आबाद करते हुए वहां रह रहे मुस्लिमों को उनकी जमीन से खदेड़ दिया। लेकिन यहां ये प्रश्न भी तो उठता है कि आखिर यहूदियों का भी तो उस भूभाग पर अधिकार था। जिस येरुशलम  से मुस्लिम और ईसाई समुदाय के लोगों की भावना जुड़ी हुई है वह यहूदियों का भी  पवित्र स्थल है। ऐसे में उससे उनको दूर कैसे रखा जा सकता है ? रही बात फिलिस्तीनियों की तो उनके लिए जो स्थान दोनों पक्षों में हुए समझौते के अंर्तगत आवंटित  किया गया वे उस पर शांति के साथ रहें इसमें किसी को परेशानी नहीं होना चाहिए । लेकिन  इजरायल के अस्तित्व को खत्म करने का जो पागलपन उनके दिमाग में है वह उनके लिए समस्या बना हुआ है। बीते शनिवार गाजा पट्टी पर काबिज हमास नामक इस्लामी उग्रवादी संगठन द्वारा इजरायल पर किए हमले के बाद उत्पन्न हालातों में एक बार फिर ये समस्या चर्चित हो चली है। हमास ने जो किया वह निश्चित रूप से बर्बरता थी और अब इजरायल जो जवाबी कार्रवाई कर रहा है उसमें भी निरपराध लोग जान गंवा रहे हैं।  लेकिन चूंकि हमास ने इस युद्ध को भड़काया इसलिए इजरायल को भी पलटवार करने का अवसर प्राप्त हो गया। जहां तक बात भारत की है तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बिना संकोच किए इजरायल का समर्थन कर दिया। लेकिन देश की दूसरी राष्ट्रीय पार्टी कांग्रेस इस मामले में एक बार फिर बड़ी गलती कर बैठी । पार्टी की राष्ट्रीय समिति ने प्रस्ताव पारित कर फिलीस्तीनियों के भूस्वामित्व और स्व - शासन के अधिकार का समर्थन करते हुए मौजूदा संकट के हल हेतु बातचीत का रास्ता तो सुझाया किंतु हमास के हमले की निंदा करने का साहस पार्टी नहीं जुटा सकी ।  इसे लेकर   कार्यसमिति के भीतर भी  मतभेद उभरकर सामने आए। वरिष्ट सदस्य रमेश चेन्निथला ने फिलीस्तीन का समर्थन करने के साथ ही हमास के हमले की निंदा का सुझाव दिया जिसे नजरंदाज कर दिया गया। पार्टी प्रवक्ता जयराम रमेश ने भी अपनी प्रतिक्रिया में हमास या आतंकवाद का जिक्र करने से परहेज किया । फिर भी कार्यसमिति के कुछ सदस्य ये कहने से नहीं चूके कि पार्टी आतंकवाद का विरोध करने से बच रही है। निश्चित रूप से कांग्रेस का ये रवैया मुस्लिम समुदाय को खुश करने के लिए ही अपनाया जा रहा है। भारत की घोषित नीति सदा से फिलीस्तीन समर्थक रही है। उसके सर्वोच्च नेता  यासर अराफात को इंदिरा गांधी ने नेहरू शांति पुरस्कार और राजीव गांधी ने इंदिरा शांति पुरस्कार देकर करोड़ों रुपए भी दिए। लेकिन इसका विरोधाभासी पहलू ये रहा कि अराफात ने कभी भी कश्मीर मामले में भारत का समर्थन नहीं किया जबकि उनके संघर्ष को भारत सदैव सहयोग देता रहा। अराफात ही नहीं शायद ही किसी मुस्लिम राष्ट्र ने कश्मीर को भारत का हिस्सा मानने की तरफदारी की हो। ऐसे में फिलीस्तीनियों के न्यायोचित अधिकार के प्रति समर्थन तो मानवीयता की दृष्टि से जरूरी है । ठीक उसी तरह इजरायल भी अब एक ऐसी वास्तविकता है जिसे नकारना असंभव है। ऐसे में कांग्रेस द्वारा हमास की निंदा करने से कन्नी काट जाना ये दर्शाता है कि पार्टी बदलते वैश्विक परिदृश्य के साथ सामंजय नहीं बैठा पा रही। उसे ये भय सता रहा है कि हमास की निंदा से देश के मुसलमान उससे नाराज हो जायेंगे । लेकिन पार्टी  को अपने राजनीतिक फायदे से ऊपर उठकर देश के दूरगामी हितों के बारे में भी सोचना चाहिए। फिलिस्तीनियों के प्रति सहानुभूति वाजिब  है। यासर अराफात ने उनके लिए जो संघर्ष किया उसके लिए उनकी प्रशंसा करना भी गलत नहीं है किंतु  कूटनीति में आपसी संबंध एक पक्षीय नहीं होते। मसलन यदि भारत ने यासर अराफात के संघर्ष को समर्थन दिया तब उन पर भी कश्मीर पर भारत के रुख का समर्थन करने का दबाव बनाना था । यही चूक तिब्बत पर चीन द्वारा कब्जा किए जाने का समर्थन करते समय हुई जब हिंदी - चीनी , भाई - भाई की खुश फहमी में डूबकर हमने चीन के विस्तारवाद को मान्यता दी । लेकिन वही चीन कश्मीर के मामले में पाकिस्तान का सबसे बड़ा समर्थक बना हुआ है । समय आ गया है जब कांग्रेस को ढर्रे से निकलना चाहिए। फिलिस्तीन का समर्थन  बुरा नहीं किंतु हमास जैसे आतंकवादी संगठन द्वारा की जा रही बर्बरता की भी खुले शब्दों में निंदा जरूरी है क्योंकि दुनिया में जितने भी इस्लामिक आतंकवादी संगठन हैं उनके  बीच प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से निकटता है । और  वे सभी भारत विरोधी हैं । वैसे ये अच्छा संकेत है कि कांग्रेस पार्टी में थोड़े ही सही किंतु कुछ नेता तो हैं जो ऐसे मामलों में खुलकर राय व्यक्त करने  का साहस दिखाते हैं।

- रवीन्द्र वाजपेयी 


हमास को जो करना था कर चुका अब इजरायल की बारी है


बीते शनिवार को फिलिस्तीन समर्थक हमास नामक उग्रवादी लड़ाकों द्वारा इजरायल पर जिस तरह का भीषण हमला किया गया उससे पूरी दुनिया थर्रा उठी। वैसे इस इलाके में बीते सात दशक से भी ज्यादा युद्ध के हालात स्थायी रूप से बने हुए हैं। हालांकि  इजरायल ने अपनी वायु और थल सीमा को पूरी तरह से अभेद्य बना लिया था किंतु हमास ने हजारों राकेट छोड़कर उसकी आकाशीय रक्षा प्रणाली को तो ध्वस्त किया ही , थल सीमा पर बनी दीवारें बुलडोजरों से गिराकर  मारकाट मचा दी। पैरा ग्लाइडर से भी उसके लड़ाके इजरायल में प्रविष्ट हो गए। हमला इतना आकस्मिक और सुनियोजित था कि किसी को कुछ समझ में ही नहीं आया । सैकड़ों लोग मारे गए और बड़ी संख्या में इजरायली और अन्य देशों के लोगों को बंधक बनाकर ले जाया गया।  यद्यपि हमास के साथ इजरायल की झड़प होती रहती है लेकिन ये  तो सीधा - सीधा युद्ध ही है और इसीलिए इजरायल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू ने बिना देर लगाए जवाबी कार्रवाई के आदेश दिए और कुछ घंटों के भीतर ही लड़ाई का केंद्र इजरायल से हटकर हमास के कब्जे वाले गाजा पट्टी में स्थानांतरित हो गया। बीते दो दिनों से इजरायल ने जो रौद्र रूप दिखाया उसके कारण पूरी गाजा पट्टी में बरबादी का आलम है। लाखों लोग पलायन करने मजबूर हैं।  महज 365 वर्ग कि.मी आकार के इस क्षेत्र में लगभग 21 लाख लोग रहते हैं। जो दुनिया की सबसे घनी रिहायश है। गाजा के पीछे समुद्र होने से वहां के लोगों के लिए बचाव का एकमात्र रास्ता मिस्र से लगी सीमा ही है । इजरायल ने लंबे समय से गाजा की घेराबंदी कर रखी है जहां चुनाव के जरिए काबिज हुए हमास ने  लोकतांत्रिक प्रक्रिया खत्म कर दी। उसे ईरान और मिस्र सहित कुछ मुस्लिम देश आर्थिक और सैन्य सहायता देते हैं । लेकिन जो लड़ाई फिलहाल चला रही है उसकी शुरुआत जिस धमाकेदार अंदाज में हमास द्वारा की गई उससे लगता है उस पर किसी बड़ी ताकत का हाथ है जो चीन या रूस भी हो सकते हैं। हमले के समय का सामरिक से ज्यादा कूटनीतिक महत्व है क्योंकि मुस्लिम जगत का मुखिया माने जाने वाले सऊदी अरब ने इजरायल के साथ दोस्ती का हाथ बढ़ाते हुए उसे मान्यता देने का निर्णय कर लिया था ।  लेकिन ईरान को ये दोस्ती रास नहीं आ रही थी। संभवतः  हमास को उसी ने आक्रमण हेतु उकसाया और मदद भी की जिससे इजरायल की तरफ झुक रहे अरब देशों के बढ़ते  कदम रुक जाएं। संयुक्त अरब अमीरात के अलावा ज्यादातर मुस्लिम देश हमास के पक्ष में नजर आ रहे हैं। सऊदी अरब को भी फिलिस्तीनियों का समर्थन करना पड़ रहा है। यद्यपि उसने और तुर्किए ने सुलह के लिए मध्यस्थता की पेशकश भी की है किंतु इजरायल  शुरुआती झटका खाने के बाद जिस तरह से गाजा पर कब्जे का इरादा जताते हुए भीषण हमले कर रहा है उसके कारण  पूरा इलाका खंडहर में तब्दील होता जा रहा है। उसने  वहां रहने वालों की बिजली , पानी और भोजन सामग्री की आपूर्ति रोक दी है। इसे अमानवीय भी कहा जा सकता है किंतु इजरायल की ये बात गौरतलब है कि जैसा दुश्मन  ही वैसा ही व्यवहार उसके साथ किया जावेगा। आगे आने वाले 50 सालों तक न भूलने वाला सबक देने की जो धमकी नेतन्याहू ने दी है वह कार्यरूप में बदलती दिखने लगी है। हमास ने इजरायली गुप्तचर एजेंसी मोसाद के साथ उसकी आकाशीय रक्षा प्रणाली को भेदने में तो सफलता हासिल कर पूरी दुनिया का ध्यान खींच लिया लेकिन दो दिन बाद ही उसके पैर उखड़ने लगे हैं । सर्वविदित है इजरायल अपने शत्रुओं से निपटने में किसी भी तरह का रहम नहीं करता । यही कारण है कि दुश्मनों से घिरा होने के बाद भी छोटा सा यह देश मुस्तैदी से टिका हुआ है। उसकी असली ताकत इजरायली जनता में देश के प्रति सम्पूर्ण समर्पण की भावना है । हमास का हमला इजरायल की गुप्तचर एजेंसी , सेना और सरकार तीनों की विफलता मानी जा रही है। नेतन्याहू के विरुद्ध काफी समय से चल रहे जनांदोलन के कारण राजनीतिक अस्थिरता भी बनी हुई थी। बावजूद इसके हमला होते ही पूरा देश एकजुट हो गया। सेना में रहे हुए एक पूर्व प्रधानमंत्री ने तत्काल सेना में जाकर कार्य शुरू कर दिया। नौजवान सेना में  शामिल होने भर्ती  दफ्तरों के सामने जमा हो गए। विपक्ष ने  सरकार के विरुद्ध एक शब्द तक नहीं कहा और हमास के विरुद्ध कार्रवाई में उसके साथ खड़ा हुआ है। भारत ने भी जिस तरह इजरायल के साथ खड़े होने का साहस दिखाया वह हमारी विदेश नीति का बेहद साहसिक पक्ष है । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अतीत में  संकट के समय इजरायल द्वारा दी गई सहायता के बदले उसको समर्थन देकर ये संकेत दे दिया कि भारत दबाव से बाहर आकर अपने विशुद्ध राष्ट्रीय हितों के प्रति जागरूक है। इस लड़ाई  का अंत क्या होगा ये तो कहना कठिन है क्योंकि फिलीस्तीन और इजरायल दोनों में सांप - नेवले जैसी जन्मजात दुश्मनी है किंतु इसकी वजह से दुनिया का संकट और बढ़ गया है। विशेष तौर पर कच्चे तेल की कीमतों में उछाल आना तय है जिसका प्रभाव भारतीय अर्थव्यवस्था पर भी पड़े बिना नहीं रहेगा। बहरहाल , इजरायल कहां जाकर रुकेगा ये देखने वाली बात है क्योंकि हमास को जो करना था वह कर चुका है । ईरान और मिस्र जैसे देशों के बहकावे में  आकर उसने शेर की सवारी तो कर ली किंतु उस पर से उतरना उसके लिए आत्मघाती साबित होगा। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Sunday, 8 October 2023

जातिगत जनगणना ढोल में पोल साबित हो रही :नीतीश का दांव उल्टा पड़ सकता है


बिहार में जिस जातिगत जनगणना को लेकर नीतीश कुमार सामाजिक न्याय के महानायक बनकर उभरना चाहते थे वह उनके गले की फांस बनती जा रही है। उसके आंकड़ों ने विभिन्न जाति समूहों में असंतोष की लहर पैदा कर दी है। जिस  आधार पर  आंकड़े जारी किए गए उसकी प्रामाणिकता पर सवाल सवर्ण उठाते तब तो उपेक्षित किया जा सकता था परंतु  जब पिछड़ी और अति पिछड़ी जातियां ही उनको फर्जी बता रही हैं तब नीतीश को बजाय लाभ होने के राजनीतिक नुकसान होने के आसार बढ़ रहे हैं। उल्लेखनीय है एक तरफ तो कांग्रेस नेता राहुल गांधी जातिगत जनगणना की मांग जोरदार तरीके से उठा रहे हैं किंतु कर्नाटक में उनकी ही पार्टी के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया अपने पिछले कार्यकाल में करवाई जातिगत जनगणना के आंकड़े सार्वजनिक करने का साहस नहीं जुटा पा रहे क्योंकि उनसे  लिंगायत और वोक्कालिंगा समुदाय के नाराज हो जाने की जो आशंका है उससे  राज्य सरकार खतरे में पड़ सकती है। बिहार को ही लें तो चुनाव सर्वेक्षण करने के बाद राजनीति के मैदान में उतरे प्रशांत किशोर ने ही इस जनगणना पर सवाल उठाकर नीतीश और लालू प्रसाद यादव को कठघरे में खड़ा करते हुए कहा है कि राज्य में बीते तीस वर्षों से उन दोनों ने ही  सत्ता चलाई लेकिन किसी अति पिछड़े या मुस्लिम को मुख्यमंत्री नहीं बनाया।  इस सर्वे पर एतराज करते हुए अनेक जाति समूहों ने भी कहा है कि यादवों को ताकतवर बनाने के लिए विभिन्न जातियों और उपजातियों को अनेक हिस्सों में बांटकर उनकी संख्या कम बताई गई ताकि उनकी राजनीतिक वजनदारी घट जाए। सवर्ण जातियों में वैश्य वर्ग को भी अनेक हिस्सों में बांटकर उनकी संख्या घटा दी गई जबकि सभी को जोड़ने पर वे 9 फीसदी से भी अधिक हैं । वहीं 10 यदुवंशी उपजातियों को यादव नाम देकर 14 प्रतिशत का  सबसे बड़ा जाति समूह बना दिया गया। अन्य जातियों के साथ भी ऐसा ही खेल हुआ। ब्राह्मणों को भी शिकायत है कि उनकी जनसंख्या पहले से भी कम कर दी गई। अति पिछड़ी जातियों को उपजातियों में विभाजित कर उनके आंकड़े कम दर्शाने की शिकायतें आ रही हैं । इससे लगता है कि जातिगत जनगणना सामाजिक न्याय की बजाय विद्वेष का आधार बन रही है। यादवों के साथ जिन यदुवंशी उपजातियों को समाहित कर लिया गया वे भी इस बात से रूष्ट हैं कि उनको लालू परिवार के अधीन कर उनके नेतृत्व को खत्म करने की चाल चली गई है। इस सबके कारण बिहार में नए जातिगत जनगणना आयोग की मांग उठ खड़ी हुई है जिसका अध्यक्ष उच्च न्यायालय के किसी सेवानिवृत्त  न्यायाधीश को बनाने कहा जा रहा है। इससे यह स्पष्ट है कि जातिगत जनगणना की आड़ में पिछड़ी जातियों को गोलबंद करने की जो चाल चली गई थी वह नाकामयाब साबित हुई । पिछड़ी और अति पिछड़ी जातियों के बीच ही जबरदस्त असंतोष देखने मिल रहा है और ज्यादातर की शिकायत है कि उनकी ताकत को कमतर दिखाकर राजनीतिक हिस्सेदारी छीनी जा रही है। इस माहौल से लगता है कि आगामी चुनावों में बिहार में विपक्षी दलों का गठबंधन होने की बजाय दलों का दलदल देखने मिलेगा और छोटे - छोटे जाति समूह अपनी ताकत दिखाने के लिए चुनावी मैदान में उतरे बिना नहीं रहेंगे। नीतीश  की अपनी पार्टी जनता दल (यू)  में ही जातिगत जनगणना को लेकर जिस तरह की उथल - पुथल है उससे लगता है कि भाजपा को पटकनी देने का नीतीश का दांव उनके अपने लिए खतरे की घंटी बन गया है। हालांकि विपक्ष इसे राष्ट्रव्यापी मुद्दा बनाने की सोच रहा है किंतु बिहार से आ रही खबरें उससे होने वाले नुकसान का भी संकेत दे रही हैं। बिहार के बाद अब पूरे देश में छोटी जातियां गोलबंद होने लगी हैं ताकि जाति आधारित जनगणना होने पर उनकी सही संख्या सामने आ सके । इसी तरह कुछ उपजातियां आपस में मिलकर खुद को बड़ा साबित करने की राह पर बढ़ रही हैं। इसका प्रभाव सवर्णों पर भी देखा जा सकता है। विशेष रूप से वैश्य समुदाय में जो बिखराव है उसे दूर कर एक बड़ी जातीय शक्ति के तौर पर वे उभर सकते हैं । दूसरी तरफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गरीबी को सबसे बड़ी जाति बताकर विपक्ष को चौकन्ना कर दिया है । विपक्ष के इस पैंतरे की काट के तौर पर वे  ऐसा कुछ कर सकते हैं जिससे आरक्षण की मौजूदा व्यवस्था को रखते हुए भी बिना  जातिगत भेदभाव के समूचा वंचित वर्ग लाभान्वित हो सके । यदि मोदी सरकार  आर्थिक आधार पर लोगों की मदद करने की कोई नई योजना लेकर आई तो जातिगत जनगणना का कथित मास्टर स्ट्रोक बेअसर होकर रह जावेगा क्योंकि साधारण लोगों को तो रोटी , कपड़ा और मकान के साथ ही अपनी दैनंदिन जरूरतें पूरा होने से मतलब होता है। प्रधानमंत्री इस वास्तविकता से परिचित हैं  और इसीलिए उन्होंने जनकल्याण की जितनी भी योजनाएं चलाई उनका सीधा लाभ कमजोर वर्ग को मिल रहा है। उ.प्र विधानसभा के पिछले चुनाव में अखिलेश यादव द्वारा जयंत चौधरी , ओमप्रकाश राजभर और स्वामी प्रसाद मौर्य जैसे नेताओं को मिलाकर महागठबंधन बनाए जाने के बावजूद भाजपा की सत्ता में वापसी को नहीं रोका जा सका। इसलिए ये आकलन गलत नहीं है कि नीतीश कुमार द्वारा करवाई गई जातिगत जनगणना ढोल में पोल साबित होगी क्योंकि जिन पिछड़ी जातियों को एकजुट करने यह दांव खेला गया उनमें तो पहले से ज्यादा बिखराव नजर आने लगा है । 


- रवीन्द्र वाजपेयी


यूक्रेन संकट से दुनिया उबर पाती उसके पहले ही हमास ने नई मुसीबत पैदा कर दी




इजरायल पर हमास द्वारा किया गया हमला पश्चिम एशिया में नए संकट का आरंभ माना जा सकता है। ऐसे समय जब सऊदी अरब इजरायल को मान्यता देने जा रहा था तभी फिलिस्तीनी इलाके से एक साथ 5000 राकेट दागे जाने से इजरायल के हवाई रक्षा कवच की अभेद्यता पर भी सवाल खड़े हो गए हैं। भारत के लिए ये इसलिए ध्यान देने योग्य है क्योंकि उसने इजरायल से ये तकनीक हासिल की है। इसके अलावा भी रक्षा उपकरण के क्षेत्र में दोनों देशों के बीच काफी सौदे हुए हैं। हमास का हमला इस बात का संकेत है कि यूक्रेन संकट में फंसे विश्व को राहत की सांस लेने का अवसर जल्द मिलने की संभावना नजर नहीं आती। इसका कारण इजरायल के आक्रामक शैली है जिसमें वह दुश्मन के प्रति रत्ती भर भी उदारता बरतने में यकीन नहीं करता। 

गत दिवस हमास द्वारा राकेटों से किए गए ताबड़तोड़ हमलों के बाद इजरायल को लंबे समय बाद बड़ा धक्का पहुंचा। उसके सैकड़ों लोग मारे जाने के साथ ही बड़ी संख्या में बंधक भी बना लिए गए जिनका उपयोग इजरायल में बंद अपने लोगों को छुड़ाने के लिए किए जाने की बात भी उसने कही है। हमलावरों ने इजरायली नागरिकों विशेष तौर पर महिलाओं के साथ जिस तरह का दुर्व्यवहार किया उसके बाद इजरायल का पलटवार स्वाभाविक था और प्रधानमंत्री नेतन्याहू द्वारा बिना देर लगाए युद्ध की घोषणा कर हमास को नतीजे भुगतने की चेतावनी दे डाली। इसी के साथ इजरायली वायुसेना भी हरकत में आई और गाजा पर हमले शुरू करते हुए सैकड़ों लोगों को मारने के साथ अनेक इमारतें ध्वस्त कर दीं। 

फिलिस्तीन का यह संकट लाइलाज बन गया है। हालांकि अरब जगत के अनेक मुस्लिम देशों ने इजरायल के साथ राजनयिक और व्यापारिक रिश्ते कायम कर लिए हैं। सऊदी अरब के अलावा खाड़ी के कई मुस्लिम मुल्क पुरानी दुश्मनी भूलकर यहूदियों के इस देश से हाथ मिलाने आगे आए हैं। सैन्य शक्ति के साथ ही इजरायल ने विज्ञान और तकनीक के मामले में भी जबरदस्त तरक्की की है। इसमें कोई शक नहीं है कि अमेरिका और अन्य पश्चिमी देशों का संरक्षण न होता तो उसके पड़ोसी मुस्लिम देश उसे कभी का नेस्तनाबूत कर चुके होते । लेकिन इसके बावजूद भी यहूदी कौम की तारीफ करननी होगी जिसने सदियों की खानाबदोशी के बाद भी अपनी भाषा , संस्कृति और प्रतिभा को अक्षुण्ण रखा। 

1948 में अस्तित्व में आते ही उस पर पड़ोसी देशों ने आक्रमण कर दिया किंतु नवजात इजरायल ने जिस तरह मुंहतोड़ उत्तर दिया उससे उसकी मारक क्षमता और आत्मविश्वास प्रगट हो गया। तब से अभी तक वह अनेक युद्धों का सामना करते हुए विजेता बनकर खड़ा हुआ है। वैसे तो उसके सीमावर्ती इलाके हर समय युद्धभूमि का नजारा उत्पन्न करते हैं। दरअसल येरूशलम नामक जिस शहर के कारण इजरायल की अन्य मुस्लिम देशों से शत्रुता है वह इस्लाम , ईसाई और यहूदी तीनों के लिए अत्यंत पवित्र है। वर्तमान में वह इजरायल के आधिपत्य में है। दरअसल मुस्लिम देश शुरू से ही इजरायल के अस्तित्व को पचाने तैयार नहीं है। उनको लगता है पश्चिमी ताकतों ने दूसरे महायुद्ध से उत्पन्न हालातों का लाभ लेते हुए उनके सिर पर अपना पिट्ठू लाद दिया । इस बारे में ये बात भी गौरतलब है कि ईसाई समुदाय यहूदियों के प्रति अच्छी भावना नहीं रखता था। यूरोप के अनेक देशों में उनके साथ दोयम दर्जे का व्यवहार होता रहा। हिटलर द्वारा उनका नरसंहार तो इतिहास का काला अध्याय है । चूंकि अमेरिका में यहूदी आर्थिक दृष्टि से संपन्नता के कारण राजनीतिक तौर पर प्रभावशाली हो चले थे , लिहाजा उसने भी इजरायल पर अपना हाथ रखकर उसे मजबूत बनाया । 

अब तक के इतिहास के मुताबिक हमास द्वारा किए गए ताजा हमले का नुकसान तो उसे उठाना ही पड़ेगा क्योंकि इजरायल अपने एक भी नागरिक की हत्या बर्दाश्त नहीं कर सकता। पश्चिमी देशों ने हमेशा की तरह उसको समर्थन दे दिया है और भारत ने भी तत्काल उसकी तरफदारी का ऐलान कर डाला।  

लेकिन यह युद्ध लंबा चला तब भारत के लिए समस्या बढ़ जावेगी क्योंकि प.एशिया में होने वाली किसी भी गड़बड़ी का तात्कालिक असर कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि के रूप में देखने मिलता है। पिछले कुछ समय से सऊदी अरब और रूस ने उत्पादन घटाकर कीमतें बढ़ने के हालात उत्पन्न कर दिए हैं। यह युद्ध उसमें और वृद्धि का कारण बन जाए तो आश्चर्य नहीं होगा। ऐसे में कच्चे तेल के बड़े आयातक के रूप में भारत को नुकसान होने की आशंका है। साथ ही इजरायल से प्राप्त होने वाले सैनिक साजो - सामान की आपूर्ति भी बाधित होने की आशंका बनी रहेगी। 

इसके अलावा वैश्विक हालात और खराब हो सकते हैं क्योंकि यूक्रेन पर रूस के हमले से मची उथल - पुथल से ही दुनिया उबर नहीं पाई है। कोरोना की विभीषिका किसी तरह खत्म हो पाती उसके पहले ही रूस ने यूक्रेन पर हमला कर दिया। इसकी वजह से शीतयुद्ध के पुराने दिन लौट आए । इसका असर जी 20 के नई दिल्ली में संपन्न सम्मेलन में रूस और चीन के राष्ट्रपति क्रमशः पुतिन और जिनपिंग के शामिल न होने के रूप में देखने मिला। 

चूंकि रूस और चीन फिलिस्तीन के साथ हैं और प.एशिया के संकट में रूस अमेरिका विरोधी खेमे के साथ खुलकर खड़ा होता रहा इसलिये इस युद्ध के दूसरा यूक्रेन संकट बन जाने का खतरा है। भारत ने उसमें तो तटस्थता की नीति अपना ली लेकिन हमास के हमले की प्रतिक्रिया स्वरूप इजरायल का समर्थन कर अपना रुख स्पष्ट कर दिया । उसका ये फैसला रूस को नागवार गुजर सकता है किंतु भारत ने जिस तरह यूक्रेन युद्ध में अपने राष्ट्रीय हितों को सर्वोपरि रखा उसी तरह से इजरायल को समर्थन देना भी जरूरी है। 
ताजा रिपोर्ट के अनुसार लेबनान ने भी इजरायल पर हमला बोल दिया है। इससे लगता है हमास का आक्रमण किसी बड़ी लड़ाई की शुरुआत है। बड़ी बात नहीं मिस्र और सीरिया भी इसमें कूद पड़ें और वैसा हुआ तो 1967 में हुई जंग के हालात देखने मिल सकते हैं। ये भी सच है कि अचानक हुए इस हमले से इजरायल भौचक रह गया है। जिस बड़ी संख्या में उसके सैनिक और नागरिक मारे गए उसके कारण उसका बौखलाना बनता है और वह अपना दबदबा कायम रखने के लिए दुश्मनों से चौतरफा मुकाबला करने में भी सक्षम है। लेकिन इस युद्ध से प.एशिया एक बार फिर नये संकट में फंसने जा रहा है जिसका दुनिया की अर्थव्यवस्था के साथ ही कूटनीतिक संतुलन पर भी असर पड़ेगा। 
क्या होगा इसका अंदाजा तत्काल लगाना कठिन है लेकिन हमास ने बर्र के छत्ते को छेड़ने का जो दुस्साहस किया उसका दुष्परिणाम उसे तो भोगना ही पड़ेगा । देखने वाली बात ये है कि मुस्लिम देशों का मुखिया कहलाने वाले सऊदी अरब का इस संकट पर क्या रुख रहता है जो इजरायल को मान्यता देने के रास्ते पर पर आगे बढ़ रहा है।

: रवीन्द्र वाजपेयी