Thursday, 9 November 2023

बिना रुके , बिना झुके जारी रहेगी ये यात्रा



 वर्ष 1989 में आज ही के दिन  मध्यप्रदेश हिन्दी एक्सप्रेस का पहला अंक प्रकाशित हुआ था | उस समय मंडल और मंदिर जैसे मुद्दों के कारण  राजनीतिक  समीकरण नया आकार ले रहे थे | महत्वाकांक्षाओं के खतरनाक रूप में सामने आने से  समाज को जातियों में खंडित करने के  षडयंत्र के साथ ही बेमेल गठबंधनों के जरिए स्थापित  छत्रपों के स्थान पर ही नए पुतलों में प्राण प्रतिष्ठा की जा रही थी । अविश्वास  और अस्थिरता के कारण  भ्रम और भय का माहौल बन गया | उस वातावरण में  महाकोशल की  चेतनास्थली संस्कारधानी जबलपुर में जब एक नए सांध्य दैनिक का उदय हुआ तब उसके लिए अपनी पहिचान बनाना सरल नहीं था | लेकिन देखते - देखते मध्यप्रदेश हिन्दी एक्सप्रेस पाठकों की पसंद बन गया | निर्भीक और सटीक टिप्पणियों के कारण उसे  हर वर्ग का प्यार और समर्थन जिस मात्रा में मिला उसके कारण ही  हम अपने कर्तव्य का निर्वहन करने में समर्थ हो सके |  34 वर्ष  की इस यात्रा में मध्यप्रदेश हिन्दी एक्सप्रेस दायित्वबोध से कभी विमुख नहीं हुआ  |  स्वस्थ पत्रकारिता की ध्वजा को हमने जिस मजबूती से थामे रखा उसके कारण इसकी जो अलग पहिचान बनी , वह यथावत है | यद्यपि इसके लिए हमें अनेकानेक तकलीफों और  विरोध से गुजरना पड़ा | वैसे भी तकनीक में हो रहे बदलाव के कारण लघु और मध्यम श्रेणी के समाचार पत्रों के समक्ष आर्थिक संसाधनों का जबरदस्त संकट आ खड़ा हुआ है | वहीं  डिजिटल माध्यम  ने भी नई प्रतिस्पर्धा उत्पन्न कर दी है | बावजूद इसके  मध्यप्रदेश हिन्दी एक्सप्रेस आगे बढ़ता जा रहा है | पाठकों का इस पर जो भरोसा है वही इसकी शक्ति है | इस वर्ष आपका यह अखबार आठ पृष्ठों के साथ रंगीन हो गया है।  निःस्वार्थ भाव से  सहयोग देने वाले विज्ञापनदाताओं की उदारता हमारा संबल है | पत्रकारिता के आदर्श रास्ते पर बिना रुके चलते रहना हमारा संकल्प है। साथ ही  जिसे पढ़े बिना शाम अधूरी है नामक विशेषण को जीवंत रखने हम प्रतिबद्ध हैं | मौजूदा समय बेहद चुनौतीपूर्ण है | राजनीतिक घटनाक्रम नित बदल रहा  है | इस समय  म.प्र , राजस्थान , छत्तीसगढ़ , तेलंगाना और मिजोरम में  विधानसभा चुनाव  की सरगर्मी है। 3 दिसंबर को आने वाले परिणाम आगामी वर्ष होने वाले लोकसभा चुनाव को प्रभावित कर सकते हैं। इस बीच एक बार फिर मंदिर और मंडल का दौर लौटता दिख रहा है। अयोध्या में राममंदिर का शुभारंभ होने के सुखद क्षण ज्यों - ज्यों नजदीक आ रहे हैं त्यों -  त्यों जातिगत जनगणना और आरक्षण का मुद्दा  गरमाया जा रहा है , जिसके निहित उद्देश्य सर्वविदित हैं। इन हालातों में  समाचार माध्यमों को अपनी विश्वसनीयता और छवि बचाए रखने के प्रति गंभीर रहना होगा | जिस तेजी से उन पर आरोपों और आक्षेपों की बौछार की जा रही है वह भी सुनियोजित है ताकि उनकी आवाज को दबाया जा सके।  हालांकि इसके लिए इस पवित्र पेशे में घुस आए धंधेबाज किस्म के तत्व ही  जिम्मेदार हैं | लेकिन मध्यप्रदेश हिन्दी एक्सप्रेस पाठकों के विश्वास और पत्रकारिता की गरिमा को सुरक्षित रखने के लिए पूरी ईमानदारी से खड़ा रहेगा  |   34 साल के इस सफर में हर तरह के दबाव आते रहे परन्तु हमने साहस के साथ उनका प्रतिकार किया और आगे भी हमारी ये तासीर जारी रहेगी । ब्लैक एंड व्हाइट से शुरू यह अखबार भले ही अब रंगीन होकर आपके सामने आने लगा है किंतु पत्रकारिता की मौलिकता और समाज में सकारात्मकता के प्रसार के अपने मिशन को हम पूरे समर्पण भाव से जारी रखेंगे।


- रवीन्द्र वाजपेयी 


Wednesday, 8 November 2023

नक्सलवाद और आतंकवाद जैसी ही नुकसानदेह है जातिवादी राजनीति


बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की गिनती  सुलझे हुए राजनेताओं में  थी। नरेंद्र मोदी के राष्ट्रीय राजनीति में उभरने से पहले उनको एनडीए का प्रधानमंत्री चेहरा माना जाता था। लंबे समय तक भाजपा के साथ रहते हुए  वे केंद्र में मंत्री और बिहार के मुख्यमंत्री बने और इस बीमारू राज्य की छवि काफी बदली। लालू  यादव को जेल भिजवाने में भी श्री कुमार की भूमिका मानी जाती रही। सुशासन  बाबू कहलाने वाले नीतीश ने जाति और परिवार से हटकर अपनी एक सौम्य छवि बनाई थी। बिहार में जंगल राज खत्म करने का कारनामा भी उनके और भाजपा के नाम पर है। लेकिन 2013 में ज्योंही भाजपा ने श्री मोदी को प्रधानमंत्री पद का चेहरा बनाया त्योंही श्री कुमार खफा हो उठे और दोबारा लालू एंड कंपनी से मिल गए। हालांकि  कुछ समय बाद पलटी मारकर एनडीए में लौट आए और मिलकर लोकसभा तथा विधानसभा चुनाव भी लड़ा किंतु  अचानक भाजपा से दोबारा न मिलने की कसम खाते हुए लालू और कांग्रेस के साथ हो लिए। सैद्धांतिक मतभेदों के चलते पार्टी छोड़ना और तोड़ना स्व.डा. लोहिया के मानसपुत्रों का चरित्र रहा है और इस लिहाज से श्री कुमार भी अपवाद नहीं हैं । उन्होंने भी स्व.जॉर्ज फर्नांडीज के साथ मिलकर समता पार्टी बनाई थी जिसे बाद  में जनता दल (यू) में विलय कर दिया गया। फिलहाल वे इसके सर्वेसर्वा हैं।  इन दिनों नीतीश 2024 के लोकसभा चुनाव  में मोदी विरोधी विपक्ष का  गठबंधन बनाने को लेकर चर्चा में हैं । बिहार में इस बात की चर्चाएं आम हैं कि उनका राजनीतिक सफर पूर्ण विराम की ओर बढ़ रहा है जिससे उनके साथी भी छिटकते जा रहे हैं । इससे बचने के लिए उन्होंने भी वही हथकंडे अपनाने शुरू कर दिए जिसके लिए वे लालू और स्व.शरद यादव को कोसा करते थे। भले ही वे कितना भी इंकार करें किंतु उनके मन में प्रधानमंत्री बनने की इच्छा हिलोरें मार रही है। इसीलिए वे  विपक्षी एकता के स्वयंभू झंडाबरदार बन बैठे। लेकिन इसके लिए उनको कोई राष्ट्रीय मुद्दा तैयार करना था।  आखिरकार वे मंडलवादी  राजनीति के उसी दौर को पुनर्जीवित करने में जुट गए जिसने 1990 में  समाज में  जातिवाद की खाई को और चौड़ा कर दिया। जाति आधारित जनगणना , जातीय - आर्थिक सर्वे और उसके साथ ही आरक्षण का प्रतिशत बढ़ाकर 75 फीसदी कराने के प्रस्ताव के जरिए वे  खुद को देश का सबसे बड़ा ओबीसी चेहरा साबित करने में जुट गए हैं। दरअसल उनके मन में एक बात घर कर चुकी है कि राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनाने के लिए शरद पवार , ममता बैनर्जी , अरविंद केजरीवाल जैसे नेता राजी नहीं होंगे। तेलंगाना चुनाव में कांग्रेस के मैदान में उतरने के कारण मुख्यमंत्री के. सी.रेड्डी का भी इसी जमात में शामिल होना तय है।  इसीलिए उन्होंने श्री मोदी के हिंदुत्व के मुकाबले ओबीसी कार्ड खेलकर राजनीतिक विमर्श को विपरीत दिशा में मोड़ने का दुस्साहस कर डाला।उनके पहले कदम का अन्य गैर भाजपा पार्टियों को भी समर्थन करने मजबूर होना पड़ा जिससे उनका हौसला बढ़ा और उन्होंने जातिगत जनगणना और जातीय - आर्थिक सर्वे के फौरन बाद आरक्षण की सीमा 75 फीसदी बढ़ाए जाने का अस्त्र फेंक दिया । हालांकि तमिलनाडु में पहले से आरक्षण की सीमा सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों से ज्यादा है। म.प्र सहित अनेक  राज्यों में भी ओबीसी आरक्षण को लेकर लंबे समय से राजनीतिक और कानूनी पचड़ा फंसा हुआ है। कमलनाथ ने ओबीसी को 27 फीसदी आरक्षण का  चुनावी वायदा भी कर दिया है। लेकिन नीतीश को एक बात  समझ लेना चाहिए कि जाति , भाषा और क्षेत्र की राजनीति करने वाले नेताओं का   आभामंडल सीमित ही रहता है। यदि  ऐसा न  होता तो तमिलनाडु की दोनों प्रमुख पार्टियों की जड़ें देश भर में रह रहे  तमिल भाषियों के बीच फैल जातीं । इसी तरह शिवसेना भी राष्ट्रीय पार्टी बन जाती। 1990 में  मंडल  मुद्दे के उठने पर मुलायम सिंह यादव , शरद यादव और लालू यादव जैसे नेताओं को प्रधानमंत्री बनने के सपने आने लगे थे। लेकिन वे रेत के घरौंदे की तरह ढह गए। जातिवाद का लाभ लेकर प्रधानमंत्री तो चौधरी चरण सिंह भी बने किंतु  जल्द ही अर्श से फर्श पर  आ गए। पता  नहीं क्यों नीतीश जैसे अनुभवी राजनीतिज्ञ सब समझते हुए  भी ओबीसी की राजनीति के फेर में बिहार के साथ ही पूरे देश को जातीय संघर्ष की ओर धकेलने का पाप कर रहे हैं? भाजपा और श्री मोदी के प्रति उनके मन में जो  कुंठा है उसकी वजह से वे  सामाजिक ढांचे को कमजोर करने पर आमादा हो जाएं तो ऐसी राजनीति क्षणिक आवेग  पैदा करने के बाद फुस्स हो जाती है। गौरतलब है मंडल राजनीति के उदय के  बाद ही नई - नई जातियां और उपजातियां उभरकर सामने आने लगीं। लेकिन उनके नेता बहुत ही छोटे से  दायरे में हैं। नीतीश  इस वास्तविकता को जानते हुए भी ऐसा क्यों कर रहे हैं ये बड़ा सवाल है। दुर्भाग्य से कोई भी पार्टी ऐसे मामलों में सच्ची बात कहने का साहस नहीं दिखा पाती। ये देखते हुए बुद्धिजीवियों और समाजशास्त्रियों को आगे आकर दिशा देनी चाहिए। इस बारे में ये कहना गलत न होगा कि देश की एकता और अखंडता के लिए जितना नुकसानदेह नक्सलवाद और आतंकवाद है उतनी ही जातिवादी राजनीति भी । इसलिए इसको रोकना जरूरी है। आज की जरूरत जाति व्यवस्था से उत्पन्न विसंगतियां मिटाने की है न कि उसे और मजबूत करने की।


- रवीन्द्र वाजपेयी


Tuesday, 7 November 2023

बिहार के जातीय - आर्थिक सर्वे से नए सवाल उठे बिना नहीं रहेंगे



जातीय जनगणना के बाद बिहार में जातीय - आर्थिक सर्वे के जो आंकड़े आए हैं उनको लेकर राष्ट्रव्यापी राजनीति शुरू हो जाए तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए।  सर्वे के अनुसार राज्य में 96 लाख लोगों को गरीब की श्रेणी में रखा गया है। यहां तक तो बात  सामान्य थी किंतु राज्य में  25 फीसदी सवर्णों के गरीबों की सूची में आने से जातीय जनगणना को लेकर अब नए सिरे से बहस और विवाद शुरू हो गया। उल्लेखनीय है जाति आधारित जनगणना में  यादवों की सबसे बड़ी संख्या सामने आने से अन्य पिछड़ी जातियों में नाराजगी पैदा हुई। अहीर और गोप कहलाने वालों ने भी ये कहकर विरोध जताया कि उनकी अलग पहिचान ही नष्ट कर दी गई।  मुख्यमंत्री नीतीश कुमार द्वारा करवाई गई जातीय जनगणना को अन्य विपक्षी दल भी समर्थन दे रहे हैं।  कांग्रेस भी उसका वायदा कर रही है। लेकिन जातीय - आर्थिक सर्वे के आंकड़े आ जाने के बाद आर्थिक आधार पर आरक्षण की मांग को बल मिलना तय है। बिहार में सवर्ण आबादी भले कम हो किंतु गरीबों  में  25 फीसदी सवर्ण आबादी यदि  6 हजार प्रतिमाह से कम कमाती है तो निश्चित रूप से अन्य राज्यों में भी राजनीति का मुद्दा बन सकता है। सोचने वाली बात ये है कि आजकल ज्यादातर पार्टियां वोट बैंक के कारण सवर्णों को भाव नहीं दे रहीं। यहां तक कि ब्राह्मण और बनियों की पार्टी कही जाने वाली भाजपा भी सोशल इन्जीनियरिंग का सहारा लेने लगी है। 1989 से उत्तर भारत की उच्च जातियां भाजपा की खेवनहार बनना शुरू हुईं जिसके कारण वह लोकसभा में 2 से 100 सीटों तक पहुंचने लगी। लेकिन जब उसे लगा कि महज उतने से ही वह देश की सत्ता हासिल नहीं कर सकेगी  तब उसने  पिछड़ी और दलित जातियों को अपने पाले में खींचने की रूपरेखा बनाई जिसमें उसे  सफलता भी मिली। आर्थिक आधार पर आरक्षण की मांग के प्रति भी भाजपा काफी पहले से मुखर रही है। लेकिन अब उसके भीतर भी जातीय दबाव समूह पैदा हो गए हैं। यही कारण है कि अन्य पार्टियों की तरह ही चुनावी टिकिट देते समय प्रत्याशी की योग्यता और क्षमता के अलावा उसकी जाति का  संज्ञान भाजपा भी लेना नहीं भूलती । इस उधेड़बुन में आर्थिक आरक्षण का मुद्दा छूने के बारे में भी वह काफी सतर्कता बरतने लगी है। लेकिन बिहार के जातीय - आर्थिक सर्वे के नतीजों ने प्रधानमंत्री द्वारा गरीबी को सबसे बड़ी जाति बताए जाने की बात को बल प्रदान किया है। हालांकि आज के राजनीतिक हालात में ऐसा होना बेहद कठिन प्रतीत होता है लेकिन जिस  तरह का बदलाव समाज में देखने मिल रहा है उसके मद्देनजर संदर्भित सर्वे के आंकड़े उथल पुथल मचाए बिना नहीं रहेंगे । सरकारी नौकरियों के लगातार घटते जाने से भी  आर्थिक स्थितियां जातिगत आरक्षण पर हावी होना सुनिश्चित है। चूंकि जातीय जनगणना का मुद्दा बिहार से ही गरमाया इसलिए बड़ी बात नहीं यदि गरीबी को लेकर आए जातीय सर्वे के आंकड़े अन्य राज्यों में भी इसकी  मांग बुलंद करें।  गौरतलब है कि सवर्ण जातियों में भी राजनीतिक गोलबंदी के तहत बसपा जैसी पार्टी से गठबंधन किए जाने के दृष्टांत सामने आ रहे हैं।  म.प्र विधानसभा के मौजूदा चुनाव में मुरैना में अनेक सीटों पर बसपा ने ब्राह्मण प्रत्याशी उतारकर भाजपा और कांग्रेस के सामने कड़ी चुनौती पेश की है । केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर भी दिमनी सीट पर ऐसे ही मुकाबले में फंसे हुए हैं। इसी तरह भाजपा छोड़ने वाले पूर्व मंत्री रुस्तम सिंह द्वारा अपने बेटे को बसपा से लड़वा दिया,जबकि वे खुद प्रभावशाली गुर्जर जाति से हैं। कहने का आशय ये है। कि यदि राष्ट्रीय पार्टियां आर्थिक स्थिति के आधार पर जातियों को सुविधा देने से परहेज करेंगी तब उच्च जातियों के गरीब भी बसपा या फिर ऐसी ही अन्य किसी ताकत से जुड़कर अपना महत्व साबित करने से नहीं चूकेंगे। म.प्र में कांग्रेस ने ओबीसी कार्ड खेलकर जो चाल चली है उसके जवाब में भाजपा शिवराज सिंह चौहान को पिछड़ी जाति का बताकर पलटवार कर रही है। इसी तरह उसने केंद्रीय मंत्री प्रहलाद सिंह पटेल को भी वैकल्पिक चेहरे के तौर पर आगे कर दिया है। लेकिन न सिर्फ म.प्र अपितु अन्य राज्यों में भी सवर्ण जातियों का  गरीब तबका  अपनी उपेक्षा से खिन्न होकर नए  विकल्प तलाशने में जुटा है।  इसमें दो मत नहीं है कि दलित , आदिवासी और पिछड़ी जातियों के सामाजिक , आर्थिक और शैक्षणिक उत्थान के लिए अभी बहुत कुछ किया जाना जरूरी है लेकिन  सामाजिक समरसता  जीवंत रखने के लिए आर्थिक दृष्टि से कमजोर लोगों का ध्यान रखा जाना भी बेहद जरूरी है। गरीब चाहे किसी भी जाति या धर्म का हो उस पर सरकार की दया दृष्टि पड़नी ही चाहिए। बिहार सरकार के जातीय - आर्थिक सर्वे का समुचित विश्लेषण कर इस बारे में राष्ट्रीय नीति बनाया जाना समय की मांग भी है और जरूरत भी।

- रवीन्द्र वाजपेयी 




Monday, 6 November 2023

गरीबी आर्थिक प्रगति के दावों पर प्रश्नचिन्ह लगाती है


चुनाव प्रचार करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक बार फिर गरीबी को सबसे बड़ी जाति बताया है। कांग्रेस द्वारा जातिगत जनगणना कराए जाने के चुनावी वायदे से होने वाले संभावित नुकसान की काट के तौर पर  श्री मोदी गरीबी को सबसे बड़ी जाति बताकर उन वर्गों को साधने की कोशिश में जुटे हुए हैं जो ओबीसी श्रेणी में आने के बावजूद लाभान्वित नहीं हो सके। बिहार में जातिगत जनगणना  के बाद उससे जुड़ी विसंगतियां जिस तरह से सामने आने लगी हैं उसका सूक्ष्म अध्ययन करते हुए भाजपा  2024 के लोकसभा चुनाव के पहले कांग्रेस और मंडलवादी अन्य पार्टियों के हाथ से ये हथियार छीनने की फिराक में हैं।  सुनने में आ रहा है कि पांच राज्यों के चुनाव परिणाम आने के बाद पार्टी आरक्षण और जातिगत जनगणना के राजनीतिक प्रभाव का आकलन करने के बाद किसी ऐसी नीति का ऐलान करने पर विचार करेगी जिससे आरक्षण का मौजूदा ढांचा बदले बिना ही आर्थिक दृष्टि से कमजोर तबके को सभी प्रकार से संतुष्ट कर दिया जाए। आज के राजनीतिक माहौल में जातिगत आरक्षण को आर्थिक आधार प्रदान करना तो खतरे से खाली नहीं होगा परंतु एक बात अब निष्कर्ष में बदलने लगी है कि जातिगत आरक्षण केवल  राजनीतिक नेताओं और उनके परिवारों की मिल्कियत बनकर रह गया है। उनके अलावा नौकरशाहों का एक वर्ग भी उसके फायदों पर कुंडली मारकर बैठा हुआ है। सर्वोच्च न्यायालय ने  इस संबंध में अनेक बार टिप्पणी भी की । सामाजिक मंचों पर भी इस बारे में मंथन चल रहा है। लेकिन राजनेता  साहस नहीं दिखा पा रहे। कुछ साल पहले बिहार विधानसभा के चुनाव के समय रास्वसंघ प्रमुख डा.मोहन भागवत ने सहज रूप से आरक्षण की समीक्षा किए जाने का सुझाव दिया था। उसकी बेहद तीखी प्रतिक्रिया हुई और भाजपा को काफी नुकसान हो गया। हालांकि बाद में संघ प्रमुख ने इस बात को कई बार दोहराया कि फिलहाल आरक्षण को हटाने की स्थितियां नहीं बनी हैं। तभी से भाजपा भी इस विषय में सतर्क हो गई । और  सोशल इन्जीनियरिंग का  उपयोग करते हुए पिछड़ी जातियों को अपने साथ जोड़ लिया  जिससे दूसरी पार्टियों को तकलीफ है। जातिगत जनगणना का अस्त्र दरअसल इसी के जवाब में निकाला गया। भाजपा की दुविधा ये है कि इसका समर्थन करने पर उसका सवर्ण जनाधार खिसक जाएगा और विरोध करने पर  पिछड़ी और दलित जातियां हाथ से निकल जाएंगी। प्रधानमंत्री चूंकि इस बात को समझ गए हैं इसीलिए उन्होंने जातिगत जनगणना  के जवाब में गरीबी को सबसे बड़ी जाति बताकर नए विमर्श को जन्म दे दिया। हालांकि अभी तक ये मुख्यधारा की राजनीति का विषय तो नहीं बन सका किंतु जिस तरह वे लगातार इसे दोहरा रहे हैं उससे लगता है कि गरीबी को सबसे बड़ी जाति बनाना किसी बड़े खेल का पूर्वाभ्यास है। गौरतलब है कि श्री मोदी  शतरंज के खेल की तरह बहुत आगे की सोचकर चाल चलते हैं। म.प्र में चूंकि कांग्रेस ने जातिगत जनगणना को अपने चुनावी वायदे में शामिल कर लिया है इसलिए उन्होंने भी पलटवार कर दिया है। लेकिन भाजपा के बाकी नेता  इस बारे में उतने मुखर नहीं है। सही मायनों में अब समय आ गया है जब आरक्षण के मामले में राजनेताओं को  खुलकर अपने विचार व्यक्त करना चाहिए क्योंकि ये मुद्दा अब समाज में जातिगत दरारें चौड़ी करने का कारण बनता जा रहा है। एक समय था जब बिहार और उ.प्र ही जाति की राजनीति का बोलबाला था किंतु वोटों की राजनीति ने अब जाति को भारतीय राजनीति की अनिवार्य बुराई बना दिया है। पहले क्षेत्रीय पार्टियां ही इस बारे में  मुखर थीं किंतु जिस तरह से राष्ट्रीय पार्टियां  इससे जुड़ती जा रही हैं वह खतरनाक है। भाजपा शुरू में हालांकि सवर्ण जातियों की हितचिंतक मानी जाती थी किंतु धीरे - धीरे  उसने भी जाति की राजनीति को अपना हथियार बनाया। हालांकि उसे इसका लाभ भी हुआ किंतु एक राष्ट्रीय पार्टी के तौर पर उसे साहस के साथ आगे आना होगा। इसके पहले कि स्वार्थी राजनेता  देश को जातीय गृहयुद्ध की आग में झोंक दें  , इस मुद्दे को सही दिशा देना जरूरी है। गरीबी वाकई एक कलंक है जो हमारी सारी प्रगति पर सवालिया निशान लगा देती है । पांच  राज्यों के विधानसभा चुनाव के बाद इस बारे में खुली राष्ट्रीय बहस होनी चाहिए । समाज में ऊंच - नीच का पैमाना यदि आर्थिक स्थिति बना दी जाए तभी सबके विकास का लक्ष्य पूरा हो सकेगा । अन्यथा चुनाव आते - जाते रहेंगे और जनता नारों और वायदों के भूल - भुलैयों में फंसकर ठगी जाती रहेगी।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 4 November 2023

2024 के पहले ही बिखरने लगा विपक्ष

2024 के पहले ही बिखरने लगा विपक्ष 


समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच म.प्र विधानसभा चुनाव में सीटों के बंटवारे को लेकर जो विवाद उत्पन्न हुआ उसको शांत करने की कोशिश कांग्रेस आलाकमान द्वारा की गई थी। सुनने में आया कि राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खरगे ने इस बारे में सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव से बात कर उनके गुस्से पर पानी डालने की कोशिश भी की। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ और पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह को दिल्ली तलब भी किया गया था।कांग्रेस द्वारा सपा के लिए 6 सीटें छोड़ने के आश्वासन से मुकर जाने के बाद अखिलेश ने  धोखेबाजी का आरोप लगाते हुए अपने  उम्मीदवार भी घोषित कर दिए । इधर कमलननाथ ने कौन अखिलेश - वखलेश जैसी टिप्पणी कर सपा अध्यक्ष को और नाराज कर दिया । अखिलेश ने तो इस पर  ये धमकी भी दे डाली कि कांग्रेस के साथ भविष्य में होने वाले गठबंधन के बारे में उन्हें सोचना पड़ेगा  । गत दिवस म.प्र के छतरपुर जिले में सपा प्रत्याशी का प्रचार करने के दौरान उन्होंने एक बार फिर कांग्रेस को भला - बुरा कहते हुए याद दिलाया कि 2018 में कमलनाथ की सरकार सपा के समर्थन से ही बनी थी। लेकिन इस बार उसके विधायक जीते तो किसी का साथ नहीं देंगे क्योंकि कांग्रेस और भाजपा मिले हुए हैं। इसीलिए उनके नेता एक दूसरे में आते - जाते रहते हैं। स्मरणीय है बुंदेलखंड का उक्त इलाका उ.प्र से सटा हुआ है जहां सपा का प्रभाव कुछ सीटों पर है। बीच में लगा था कि श्री गांधी और श्री खरगे के प्रयासों से अखिलेश ठंडे पड़ गए किंतु गत दिवस उन्होंने जिस तरह कांग्रेस को गरियाया उससे लगा कि उनके तेवर अभी भी गर्म हैं। प्रदेश में सपा को कितनी सफलता मिलेगी ये कोई नहीं बता सकता । लेकिन वह कांग्रेस के लिए सिरदर्द तो बन ही गई है। विचारणीय प्रश्न  ये है कि कमलनाथ द्वारा  अन्य विपक्षी दलों के साथ गठबंधन नहीं किए जाने की रणनीति प्रदेश स्तर पर तय की गई अथवा राष्ट्रीय नेतृत्व द्वारा ? बहरहाल प्रदेश में  सपा के  अलावा आम आदमी पार्टी और जनता दल (यू) ने भी अपने उम्मीदवार उतार दिए हैं। दो दिन पहले अरविंद केजरीवाल और भगवंत सिंह मान ने सिंगरौली आकर  भाजपा के साथ कांग्रेस पर भी खूब हमले किए। यद्यपि जनता दल (यू) के प्रचार हेतु कोई बड़ा नेता तो नहीं आया किंतु बिहार में सीपीआई के एक आयोजन में नीतीश कुमार ने कांग्रेस पर इंडिया गठबंधन की उपेक्षा करने का जो आरोप लगाया उसके बाद से 2024 के महासमर के पहले ही विपक्षी खेमे में मतभेद उभरने लगे हैं। राजनीतिक विश्लेषक भी ये लिख रहे  हैं कि कांग्रेस में अहंकार लौटता लग रहा है। जिन पांच राज्यों में फिलहाल चुनाव हो रहे हैं उनमें अनुकूल नतीजों की उम्मीद में वह बाकी विपक्षी दलों की उपेक्षा करने लगी है। नीतीश ने खुले मंच से कटाक्ष किया कि गठबंधन का काम छोड़कर कांग्रेस इन दिनों चुनाव में व्यस्त है। कांग्रेस  नेतृत्व भी जिस तरह से इंडिया में शामिल अन्य दलों के प्रति उदासीन नजर आ रहा है उससे लगता है पार्टी लोकसभा चुनाव में अपना हाथ ऊपर रखने की तैयारी अभी से कर रही है। तेलंगाना में के.सी.रेड्डी की पार्टी बी.आर.एस और कांग्रेस में घमासान चल रहा है। आम आदमी पार्टी के दोनों मुख्यमंत्री चुनाव वाले राज्यों में जिस तरह कांग्रेस को भ्रष्ट बता रहे हैं वह जगजाहिर है। इसी तरह पंजाब में मान सरकार अनेक कांग्रेस नेताओं पर कार्रवाई में जुटी है तो दिल्ली में आम आदमी पार्टी नेताओं के आबकारी मामले में गिरफ्त में आने पर स्थानीय कांग्रेसी नेता खुशी जता रहे हैं। कुल मिलाकर लोकसभा चुनाव के पहले विपक्ष भाजपा के विरुद्ध जिस एकजुटता का प्रदर्शन कर सकता था वह किसी भी कोण से नजर नहीं आ रही। उल्टे जो सौजन्यता  उपजी वह भी  कटुता में तब्दील होती दिखती है । दरअसल इंडिया में शामिल दलों के मन में ये आशंका जगह बनाने लगी है कि पांच राज्यों के चुनाव में कांग्रेस को यदि उसकी उम्मीद के अनुसार सफलता मिल गई तब वह 2024 के आम चुनाव में उन सबको ठेंगे पर रखने से बाज नहीं आयेगी। उनका सोचना रहा कि पांच राज्यों के चुनाव में इंडिया गठबंधन रूपी प्रयोग को आजमाकर जनता के सामने विपक्षी एकता का उदाहरण पेश किया जा सकता था। लेकिन कांग्रेस ने इसमें रुचि दिखाना तो दूर उल्टे अन्य दलों को बातों में उलझाए रखते हुए अपने उम्मीदवार घोषित कर दिए। अखिलेश , नीतीश और अरविंद की कांग्रेस पर नाराजगी देखते हुए विपक्षी एकता की आशाओं पर पानी फिरता लग रहा है। बड़ी बात नहीं पांच राज्यों के चुनाव परिणाम आने के बाद तीसरे मोर्चे की  कवायद नए सिरे से जन्म लेने लगे क्योंकि सपा , जदयू और आप के प्रभावक्षेत्र क्रमशः उ.प्र , बिहार और दिल्ली में कांग्रेस का स्वतंत्र अस्तित्व लगभग खत्म सा हो चुका है।

- रवीन्द्र वाजपेयी 

Friday, 3 November 2023

जहरीली होती हवा : जनता उदासीन और नेता मौन



देश की राजधानी दिल्ली में हालात गंभीर हैं। शालाओं में अवकाश घोषित कर दिया गया है। लोग सांस लेने में कठिनाई अनुभव कर रहे हैं।  शुद्ध हवा के लिये  सैर पर जाने वालों के फेफड़ों में जहर समाने लगा है। अस्थमा  से ग्रसित लोगों के लिए ऐसी स्थितियां जानलेवा  हो सकती हैं। घरों में तो वायु शुद्ध करने वाले उपकरण लगाए जा सकते हैं किंतु बाहर निकलने पर प्रदूषित  सांस ही लेनी पड़ती है। और फिर जो लोग झुग्गियों में रहते हैं उनकी तकलीफ का अंदाजा लगाया जा सकता है। देश का दिल कहे जाने वाले  महानगर पर दुनिया के सर्वाधिक प्रदूषित शहर होने का कलंक लग चुका है। बावजूद उसके हालात साल दर साल बद से बदतर होते जा रहे हैं। कभी पंजाब से आने वाले पराली के  धुएं तो कभी औद्योगिक इकाइयों से होने वाले प्रदूषण से दिल्ली का वायुमंडल जहर भरा हो जाता है। वाहनों से निकलने वाले धुएं को रोकने के लिए सीएनजी और बैटरी चलित वाहनों के उपयोग को बढ़ावा देने की नीति बनी। 10 वर्ष पुरानी गाड़ियों को सड़क से बाहर करने का प्रावधान भी अस्तित्व में है। मेट्रो ट्रेन चलने से निजी वाहनों का प्रयोग कुछ कम हुआ है। लेकिन बढ़ती आबादी और वाहनों की संख्या में बेतहाशा वृद्धि की वजह से आगे पाट पीछे सपाट की स्थिति बनती रही है।  सर्वोच्च न्यायालय , केंद्र और राज्य सरकार के अलावा तमाम स्वयंसेवी संगठन पर्यावरण सुधारने में लगे हैं ।  लेकिन परिणाम कुछ नहीं निकल पा रहा। उल्टे स्थितियां खराब हो रही हैं। प्रतिवर्ष इसका हल्ला मचता है । जनहित याचिकाएं लगती हैं । पहले दिल्ली की केजरीवाल सरकार पंजाब को कोसती थी जहां के किसान फसल कटने के बाद खेतों में आग लगा  दिया करते हैं। लेकिन अब तो उस राज्य में भी आप आदमी पार्टी की ही सरकार है। ऐसे में अरविंद केजरीवाल और भगवंत सिंह मान दोनों को मिलकर  कोई रास्ता निकालना चाहिए। केंद्र सरकार को भी इस समस्या के स्थायी समाधान के प्रति गंभीर होना पड़ेगा। वैसे ये समस्या पूरे देश की है। चंडीगढ़ जैसे कुछ शहर ही अपवाद हैं जहां प्रदूषण काफी हद तक नियंत्रित है । अन्यथा क्या मुंबई और क्या कोलकाता , सभी में हालात संगीन हो रहे हैं। मुंबई में में वरली सी फेस के पास समुद्र से आने वाली बदबू वहां से निकलने वालों की नाक में घुसे बिना नहीं रहती। कोलकाता के कंधे तो आबादी के  बोझ से पहले से ही दबे जा रहे हैं। दो दशक पहले तक बेंगुलुरु जैसे महानगर का मौसम बेहद खुशनुमा हुआ करता था किंतु सायबर सिटी बनने का गौरव हासिल होने के साथ ही वहां का पर्यावरण खराब होने लगा । वाहनों की कतारें और उनके  धुएं ने पुराने मैसूर रियासत की इस ग्रीष्मकालीन राजधानी के मौसम का सत्यानाश कर डाला। दुर्भाग्य से पर्यावरण संरक्षण को लेकर होने वाला समूचा  कर्मकांड दिखावा होकर रह गया है। जब देश की राजधानी के वाशिंदे ज़हर भरी सांसें लेने बाध्य हैं तब बाकी की क्या दशा होगी ?  लेकिन सबसे बड़ी बात ये है कि कोई भी राजनीतिक पार्टी या नेता प्रदूषण के विरुद्ध लड़ाई को मुख्य मुद्दा नहीं बनाता। मोदी सरकार के  परिवहन मंत्री नितिन गडकरी जरूर बैटरी चालित वाहनों के अलावा पेट्रोल में एथनाल मिलाए जाने और हाइड्रोजन को पेट्रोल - डीजल का विकल्प बनाए जाने जैसे उपायों के प्रति गंभीर हैं किंतु बाकी राजनेता उदासीन नजर आते हैं ।  ये भी सही है कि जनता भी ऐसे मुद्दों पर जागरूक नहीं है। यही कारण है कि आज तक एक भी चुनाव , प्रदूषण दूर करने के नाम पर नहीं हुआ। वर्तमान में जिन पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव हो रहे हैं वहां  भी मुफ्त खैरात बांटकर मतदाता को लुभाने की प्रतिस्पर्धा चल रही है । कोई नगदी दे रहा है तो कोई सस्ती गैस। मुफ्त बिजली , सायकिल और स्कूटी भी चुनावी वायदों में है । सड़कें  , स्कूल , अस्पताल जैसी सुविधाओं का भी जिक्र हो रहा है। लेकिन पर्यावरण संरक्षण कहीं भी  चर्चा का विषय नहीं है। दरअसल जनता की इन विषयों में रुचि न होने से नेता भी इस तरफ ध्यान नहीं देते।  दिल्ली के मतदाताओं ने आम आदमी पार्टी को विधानसभा और नगर निगम में जिताया । वहीं लोकसभा सीटों पर भाजपा का एकाधिकार चला आ रहा है। दोनों पार्टियां अलग - अलग मुद्दों पर जनता का समर्थन हासिल करती रही हैं किंतु दिल्ली की हवा को प्रदूषण से मुक्त करवाने की प्रतिबद्धता दोनों ने नहीं दर्शाई। औद्योगिकीकरण और आबादी , प्रदूषण का बड़ा कारण है। सुख - सुविधाओं से भरी जीवन शैली भी पर्यावरण को क्षति पहुंचाती है। समस्या क्यों और कैसे है  , इस बारे में जानकारी सभी को है किंतु  उसे दूर करने के लिए आगे कोई नहीं आना चाहता ।   आजादी मिले 75 साल से ज्यादा बीत गए किंतु आज भी जनता को न शुद्ध पीने का पानी नसीब है और न ही हवा । बड़ी बात नहीं भविष्य में होने वाले चुनावों में वायु शुद्ध करने वाले उपकरण (एयर प्योरीफायर) भी चुनावी उपहारों की सूची में शामिल हो जाएं। 

-रवीन्द्र वाजपेयी 

Thursday, 2 November 2023

काले धन और चुनावी चंदे का चोली दामन का साथ है



सर्वोच्च न्यायालय में चुनावी बॉन्ड की गोपनीयता को लेकर बहस चल रही है। सरकार की तरफ से बॉन्ड के जरिए चंदा देने वालों के नाम उजागर करने की आवश्यकता को नकारा जा रहा है वहीं याचिकाकर्ता चाहता है कि पारदर्शिता के मद्देनजर पहिचान सामने आना चाहिए। गत दिवस प्रधान न्यायाधीश डी. वाय. चंद्रचूड़ ने पूछा कि बॉन्ड खरीदने वाले का पूरा विवरण  भारतीय स्टेट बैंक के पास है तब  गोपनीयता कहां रह जाती है ? दरअसल ये एक तरह का वचन पत्र है जिसे  बैंक से खरीदकर किसी  राजनीतिक दल को दिया जाता है और इसमें चंदा देने वाला उजागर नहीं होता। इसका उद्देश्य नगद चंदे को रोकना था जो काले धन के रूप में होता था। बॉन्ड से जो चंदा मिलता है वह पार्टियों के बैंक खातों में जमा होने से चुनाव आयोग के जरिए जनता को पता चलता है। बॉन्ड खरीदने वालों की पहिचान छिपाने के पीछे सरकारी वकील ने तर्क दिया कि  किसी  दल को मिलने वाले चंदे का स्रोत जानना  मौलिक अधिकार नहीं है और इससे एक दल को चंदा देने वाला दूसरे के कोप भाजन का शिकार हो सकता है। रही बात चुनावी चंदे में पारदर्शिता की तो जब तक देश में काला धन रहेगा तब ये गोरखधंधा चलेगा । आजादी के पहले से बिरला और बजाज जैसे घराने कांग्रेस के आर्थिक स्रोत हुआ करते थे। घनश्याम दास बिरला और जमनालाल बजाज की महात्मा गांधी और पं. जवाहरलाल नेहरू से निकटता किसी से छिपी नहीं रही। कई दशकों तक लाइसेंस राज चलाकर कांग्रेस ने इनके साथ ही कुछ अन्य उद्योगपतियों को जी भरकर उपकृत किया । इंदिरा जी के दौर में प्रणब मुखर्जी के जरिए धीरुभाई अंबानी उभरे । फिर जब पी.वी. नरसिम्हा राव उदारीकरण लेकर आए तो और भी नए समूहों ने पैर जमाए। संचार क्रांति के आने से गैर परंपरागत उद्योगों ने  पहिचान बनाई। बीते दो दशक में भारतीय ऑटोमोबाइल उद्योग भी वैश्विक स्तर पर अपनी धाक जमा रहा है। विदेशी कम्पनियां भी खूब कारोबार कर रही हैं । मोबाइल फोन , दवाइयां , अनाज और अन्य चीजों का निर्यात होने लगा है। इस प्रकार देश में अब दो चार उद्योगपति ही धनकुबेर नहीं रहे अपितु संख्या काफी बड़ी हो गई है। इसी तरह चुनाव तंत्र भी  साठ - सत्तर के  दशक से बहुत आगे निकल आया है। तब  राष्ट्रीय नेता तक सड़क मार्ग से दौरे करते थे और  आज हेलीकाप्टर और विमान सामान्य बात हो चली है।  इन सबसे चुनाव  खर्च बढ़ रहा है और  राजनीतिक दलों की चंदे की भूख भी। जाहिर है कार्यकर्ताओं और  समर्थकों के सहयोग से राजनीति संभव नहीं रही । इस तरह चुनावी चंदे और  काले धन में चोली दामन का साथ हो गया है। जब इलेक्टोरल बॉन्ड  नहीं थे तब भी रतन टाटा और राहुल बजाज ने चैक से राजनीतिक दलों को चंदा देने की पहल की किंतु  उसे ज्यादा समर्थन नहीं मिला । बॉन्ड आने के बाद कम से कम बैंक खातों में आए चंदे की जानकारी तो मिलने लगी।  वरना एक जमाने में  कांग्रेस के भीतर प्रचलित कहावत  , न खाता न बही - जो केसरी कहे वो सही  , हर पार्टी पर  लागू होती थी।जो कांग्रेस पार्टी भाजपा को मिलने वाले चंदे से बौखलाई है जब वह  सत्ता में लंबे समय तक रही तब उसने  पारदर्शिता की कभी बात नहीं की। रही बात बॉन्ड दाताओं के नाम उजागर करने की तो क्या हमारे राजनीतिक नेताओं और पार्टियों में इतनी परिपक्वता है कि वे अन्य पार्टियों के समर्थक उद्योगपतियों के प्रति दुर्भावना न रखें ? चूंकि ऐसा होना असंभव है इसलिए  चंदे की पारदर्शिता भी सुन्दर सपने जैसा है। जिस दिन बॉन्ड खरीदने वाले की पहिचान जाहिर होने लगेगी उस दिन इसका कारोबार खत्म ही हो जायेगा।  एक बात  अकाट्य सत्य है कि  बिना चंदे के चुनाव सम्भव नहीं। चूंकि देश में बेशुमार काला धन है इसलिए उसका बतौर चंदा उपयोग होना भी जारी रहेगा। जहां तक बात जनता के जानने के अधिकार की है तो जिस तरह नामांकन पत्र में  दिए जाने वाले धन - संपत्ति और अपराधों के विवरण का कोई संज्ञान नहीं लिया जाता उसी  तरह चंदे संबंधी जानकारी से आम जनता को कुछ भी लेना देना नहीं है। इस बारे में सबसे हास्यास्पद बात चुनाव में प्रत्याशी द्वारा किए जाने वाले खर्च की सीमा का निर्धारण है। चुनाव आयोग जितनी राशि लोकसभा चुनाव में खर्च करने की अनुमति देता है उससे ज्यादा तो पार्षद के चुनाव में अनेक प्रत्याशी खर्च कर देते हैं । 

- रवीन्द्र वाजपेयी