Friday, 8 December 2023
तीन राज्य हार जाने से इंडिया गठबंधन में कांग्रेस की वजनदारी घटी
Thursday, 7 December 2023
म.प्र में दिग्विजय - कमलनाथ का युग खत्म : कांग्रेस में नए नेतृत्व का अभाव
Wednesday, 6 December 2023
ईवीएम पर ठीकरा फोड़ने से दूर नहीं होगी कांग्रेस की दुर्दशा
तीन राज्यों के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की पराजय का विश्लेषण सभी अपने - अपने तरीके से कर रहे हैं। म.प्र में तो शिवराज सरकार की लाड़ली बहना योजना को भाजपा की जीत का कारण बताया जा रहा है किंतु छत्तीसगढ़ और राजस्थान में कांग्रेस वैसी ही योजनाएं लागू करने के बाद भी हार गई । इन परिणामों ने ये साबित कर दिया कि उत्तर भारतीय राज्यों में कांग्रेस का जनाधार तेजी से सिमट रहा है। राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा भी म.प्र और राजस्थान के जिन अंचलों से गुजरी , उनमें कांग्रेस का सफाया हो गया। इंडिया गठबंधन में शामिल अन्य विपक्षी पार्टियां कांग्रेस के अहंकार को इस पराजय के लिए जिम्मेदार बता रही हैं। कुल मिलाकर ये कहना गलत नहीं होगा कि मतदाताओं ने राजस्थान और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की मुफ्त योजनाओं को ठुकराकर भी भाजपा को अपना समर्थन दिया। कर्मचारियों को पुरानी पेंशन का लालच देना भी काम नहीं आया । सच ये है कि कांग्रेस जनभावनाओं को समझ पाने में पूरी तरह असमर्थ है। कहने को तो भाजपा ने भी प्रधानमंत्री के चेहरे को ही सामने रखा और मोदी की गारंटी के नाम पर मतदाताओं को इस बात के लिए आश्वस्त करने का प्रयास किया कि वह जो वायदे कर रही है वे पूरे होंगे। लेकिन सबसे बड़ी बात है राष्ट्रवाद और हिंदुत्व , जिसका दिखावा तो कांग्रेस भी बहुत करने लगी है किंतु उसका मन साफ नहीं है। पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के बेटे द्वारा सनातन को खत्म करने वाली टिप्पणी का समर्थन किए जाने वाले बयान पर उनसे सवाल किए जाने की हिम्मत किसी की नहीं हुई । लेकिन कमलनाथ द्वारा ये कहे जाने पर कि देश की आबादी में 82 फीसदी हिन्दू हैं तो वह हिन्दू राष्ट्र कहलाएगा ही , तो पार्टी के तमाम नेता उनकी आलोचना पर उतर आए। ऐसे में कांग्रेस नेता आचार्य प्रमोद कृष्णम की ये टिप्पणी सच्चाई के काफी करीब प्रतीत होती है कि सनातन का श्राप कांग्रेस की हार का कारण बना। इस बारे में ये बात भी ध्यान देने योग्य है कि राहुल गांधी द्वारा ओबीसी को लुभाने के लिए जातीय जनगणना का को लॉलीपॉप दिखाया गया उसे भी मतदाताओं ने भाव नहीं दिया। दरअसल कांग्रेस चूंकि सत्य को स्वीकार करने का नैतिक साहस खो चुकी है इसलिए वह इस वास्तविकता से आंखें चुरा लेती है कि गांधी परिवार का आकर्षण ढलान पर है। और इसीलिए अब उसके नेता घिसे - पिटे बहाने के तौर पर ईवीएम ( इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीन ) पर अपना गुस्सा उतारने लगे हैं। म.प्र के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह का कहना है कि जिस उपकरण में भी चिप लगी हो उससे छेड़छाड़ मुमकिन है । इसी तरह प्रदेश में कांग्रेस की तरफ से मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार कमलनाथ भी घुमा फिराकर यही कह रहे हैं। कांग्रेस के अनेक प्रवक्ता टीवी चैनलों पर पार्टी की हार के लिए वोटिंग मशीनों में हेराफेरी का मुद्दा उठाकर मतपत्रों से चुनाव करवाए जाने की मांग दोहरा रहे हैं। लेकिन ये प्रलाप केवल उन्हीं राज्यों में सुनाई दे रहा है जिनमें कांग्रेस को पराजय झेलनी पड़ी। हिमाचल , कर्नाटक और तेलंगाना में मिली जीत के बाद किसी भी कांग्रेसी या अन्य नेता ने ईवीएम पर शंका व्यक्त की हो ऐसा देखने में नहीं आया। दिल्ली और पंजाब में आम आदमी पार्टी की ऐतिहासिक विजय पर भी कांग्रेस ने वोटिंग मशीन पर शक नहीं जताया। प.बंगाल के विधानसभा चुनाव में तृणमूल की आंधी में कांग्रेस और वामपंथी एक भी सीट नहीं जीत सके थे । केरल में भी हर चुनाव में सत्ता बदलने के रिवाज को तोड़ते हुए वामपंथी सरकार की वापसी पर कांग्रेस ने चुनाव प्रक्रिया पर किसी भी तरह से ऐतराज जताया हो ये किसी ने नहीं सुना। लेकिन जब किसी चुनाव में भाजपा को जीत हासिल होती है तो कांग्रेस बलि के बकरे के तौर पर ईवीएम मशीन पर ठीकरा फोड़ने लगती है। म.प्र , छत्तीसगढ़ और राजस्थान में मतदाताओं द्वारा पूरी तरह नकारे जाने के बाद उसको चाहिए वह ईमानदारी से अपनी कमजोरियों का विश्लेषण कर उन्हें दूर करने का प्रयास करे। उसे इस बात पर भी ध्यान देना चाहिए कि इंडिया गठबंधन के अन्य घटक दल कांग्रेस की हार के जो कारण बता रहे हैं उनमें अहंकार और क्षेत्रीय दलों की उपेक्षा मुख्य हैं। ऐसे में बेहतर यही होगा कि कांग्रेस तीनों राज्यों में अपनी पराजय के जमीनी कारणों का ईमानदारी से विश्लेषण कर उनमें सुधार करने के लिए आवश्यक कदम उठाते हुए जनता की आकांक्षाओं के अनुरूप आचरण करे। केवल भाजपा और मोदी को कोसने से उसके दुरावस्था दूर होने वाली नहीं है। उसे ये नहीं भूलना चाहिए कि 2004 और 2009 में उसके नेतृत्व में बनी यूपीए सरकार भी ईवीएम से निकले जनादेश का ही परिणाम थी ।
-रवीन्द्र वाजपेयी
Tuesday, 5 December 2023
विपक्षी एकता के ढांचे में दरार चौड़ी होने की आशंका
पांच राज्यों में से मिजोरम को छोड़ भी दें तो म.प्र , छत्तीसगढ़ और राजस्थान में कांग्रेस जिस तरह औंधे मुंह गिरी उसने राहुल गांधी के उठते हुए राजनीतिक ग्राफ को एक बार फिर ढलान की और धकेल दिया है। ऐसे में भाजपा उनका उपहास करे तो बात समझ में भी आती है किंतु अब विपक्ष के बाकी दल भी कांग्रेस के बहाने राहुल की खिंचाई करने में जुट गए जिससे इंडिया नामक विपक्षी गठबंधन में बिखराव के संकेत मिलने लगे हैं। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने 6 दिसंबर को इंडिया की जो बैठक बुलाई उसमें आने से प.बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी ने मना कर दिया वहीं समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव भी अनिच्छुक बताए जाते हैं। इसीलिए बैठक रद्द करने की नौबत आ गई। नीतीश कुमार तो इंडिया गठबंधन की निष्क्रियता को लेकर कांग्रेस पर पहले ही शब्दबाण छोड़ते रहे हैं। ज्यादातर विपक्षी दलों को इस बात की शिकायत है कि हिमाचल और कर्नाटक विधानसभा चुनाव जीतने के बाद कांग्रेस विशेष रूप से राहुल का रवैया पूरी तरह बदल गया है। उत्तर भारत के तीनों राज्यों में सपा , जनता दल (यू) और आम आदमी पार्टी कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव लड़ना चाहती थीं परंतु उसने किसी को घास नहीं डाली। उल्टे कांग्रेस विपक्षी दलों को ये एहसास करवाने में जुट गई कि भारत जोड़ो यात्रा के बाद श्री गांधी प्रधानमंत्री श्री मोदी के विकल्प के तौर पर उभरे हैं और जनता में उनकी स्वीकार्यता बढ़ी है। कर्नाटक चुनाव में पार्टी को मिली कामयाबी के बाद भाजपा विरोधी कुछ यू ट्यूबर पत्रकारों को राहुल के पक्ष में माहौल बनाने का अघोषित ठेका दे दिया गया । लेकिन म.प्र , छत्तीसगढ़ और राजस्थान में कांग्रेस की जो दुर्गति मतदाताओं ने की उसके बाद उसकी बेरूखी झेलते आ रहे विपक्षी दल बीते दो दिनों से ऐंठते नजर आ रहे हैं। ममता ने तो साफ कह दिया कि ये भाजपा की जीत नहीं , कांग्रेस की हार है। नीतीश कुमार , अखिलेश यादव , के.सी त्यागी , अरविंद केजरीवाल सहित इंडिया गठबंधन के शेष घटक दल भी कांग्रेस की खुलकर इस बात के लिए आलोचना कर रहे हैं कि वह गठबंधन धर्म का पालन करने की बजाय एकला चलो की जो नीति अपना रही है वह श्री मोदी को तीसरी पारी खेलने का अवसर प्रदान करने में सहायक बनेगी। एक भी विपक्षी दल ऐसा नहीं है जिसने तेलंगाना की विजय के लिए राहुल या कांग्रेस को बधाई दी हो । लेकिन तीन अन्य राज्यों में उसकी शिकस्त का मजाक उड़ाने के साथ ही आलोचनात्मक टिप्पणियों की बाढ़ जिस तरह से आई है उसे देखते कांग्रेस इंडिया की लगाम अपने हाथ में रखने का जो प्रयास करने लगी थी उसे जरूर धक्का लगा है। नीतीश कुमार को इस गठबंधन का जन्मदाता माना जाता है किंतु उसके संयोजक सहित अन्य नीतिगत मुद्दों पर कांग्रेस ने जिस प्रकार से हावी होने की कोशिश की उससे बाकी पार्टियां चौकन्नी हो उठी थीं । लेकिन श्री गांधी की भारत जोड़ो यात्रा के अलावा हिमाचल तथा कर्नाटक में कांग्रेस की जीत के बाद उसकी वजनदारी अचानक से बढ़ने लगी। कांग्रेस थोड़ा बड़प्पन दिखाते हुए तीन राज्यों के चुनाव में छोटे विपक्षी दलों को भी साथ ले लेती तो भले ही भाजपा का विजय रथ रोकना संभव न हो पाता परंतु विपक्षी एकता में दरार नहीं पड़ती और हार का जिम्मा सामूहिक होता। लेकिन कांग्रेस का केंद्रीय नेतृत्व छोटी सी बात नहीं भांप सका। दूसरी तरफ पार्टी के प्रादेशिक नेता भी अपनी ऐंठ में रहे और ये कहते हुए गठबंधन से मुकर गए कि वह तो लोकसभा चुनाव के लिए है। उल्लेखनीय है चुनाव के पहले भोपाल में इंडिया गठबंधन की एक संयुक्त रैली आयोजित की गई थी किंतु कमलनाथ ने इस डर से उसे रद्द करवा दिया कि कहीं कांग्रेस पर अन्य विपक्षी दलों के लिए कुछ सीटें छोड़ने का दबाव न बन जाए। बाद में जब सपा के साथ बात टूटी तब कमलनाथ ने कौन अखिलेश - वखलेश जैसी सस्ती टिप्पणी कर आग में घी डाल दिया। राहुल द्वारा श्री यादव को फुसलाने का प्रयास भी हुआ किंतु सपा अध्यक्ष ने कांग्रेस पर धोखेबाज होने का आरोप लगाते हुए म.प्र में धुआंधार प्रचार किया। राजस्थान और छत्तीसगढ़ में आम आदमी पार्टी ने भी कांग्रेस को खूब गरियाया। चुनाव परिणाम आने तक कांग्रेस इस बात के प्रति आश्वस्त थी कि म.प्र और छत्तीसगढ़ के साथ ही तेलंगाना में भी वह जीत जाएगी और तब शायद उसे किसी से गठजोड़ की ज़रूरत ही न पड़े किंतु उसकी उम्मीदों पर पानी फिर गया और तेलंगाना में मिली शानदार जीत के बावजूद वह शेष तीनों राज्यों में मुंह के बल गिरी। ये देखते हुए तीन राज्यों में कांग्रेस की हार इंडिया गठबंधन के विघटन की शुरुआत बन जाए तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए जिसके लिए कांग्रेस का अहंकार और राहुल गांधी सहित उनके परिवार की सामंतवादी सोच सबसे ज्यादा जिम्मेदार होगी।
- रवीन्द्र वाजपेयी
Monday, 4 December 2023
मोदी के मुकाबले एक बार फिर बौने साबित हुए राहुल
Saturday, 2 December 2023
मुसलमानों को अपने पाले में खींचने में कामयाब होती लग रही कांग्रेस
कर्नाटक विधानसभा के चुनाव में कांग्रेस की सफलता का सबसे बड़ा कारण मुस्लिम मतदाताओं का देवगौड़ा परिवार के जनता दल ( सेकुलर ) से छिटक कर उसकी तरफ घूम जाना रहा। परिणामस्वरूप भाजपा का मत प्रतिशत तो यथावत रहा किंतु जनता दल ( सेकुलर ) का 5 प्रतिशत कम होकर कांग्रेस के खाते में आ गया। दरअसल कांग्रेस मुस्लिमों में ये बात फैलाने में पूरी तरह से सफल रही कि पूर्व प्रधानमंत्री एच. डी.देवगौड़ा के पुत्र कुमार स्वामी भाजपा के समर्थन से मुख्यमंत्री बन सकते हैं। इसका कारण प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा काफी समय से देवगौड़ा जी की प्रशंसा किया जाना था। हालांकि 2018 में त्रिशंकु विधानसभा बनने के बाद कुमारस्वामी को कांग्रेस ने मुख्यमंत्री बनवाया था । दलबदल के कारण वह सरकार के गिरने से भाजपा सत्ता में आ गई किंतु 2023 में कांग्रेस और जनता दल ( सेकुलर ) में गठजोड़ नहीं हो सका। बीते अनेक चुनावों से राज्य का मुस्लिम समुदाय जनता दल ( सेकुलर ) से जुड़ा हुआ था। लेकिन पिछले चुनाव में उसका ध्रुवीकरण कांग्रेस के पक्ष में होने से देवगौड़ा परिवार मैसूर अंचल के अपने प्रभाव क्षेत्र तक में मात खा गया। ये भी देखने में आया कि दूसरे राज्यों से मुस्लिम धर्मगुरुओं ने कर्नाटक आकर मुस्लिम मतदाताओं के मन में ये बात बिठा दी कि जनता दल ( सेकुलर ) का समर्थन करने से भाजपा मजबूत होगी। ये समझाइश काम कर गई और कांग्रेस को अच्छा खासा बहुमत मिल गया। उसी के बाद कुमारस्वामी ने भाजपा की ओर हाथ बढ़ाया जिससे वे कम से कम लोकसभा चुनाव में तो प्रासंगिक बने रहें। इस प्रकार कांग्रेस का ये कहना कि फलां पार्टी भाजपा की बी टीम है , उसकी रणनीति का हिस्सा बनने लगा। उल्लेखनीय है असदुद्दीन ओवैसी को लेकर उसका ये प्रचार काफी समय से चला आ रहा है और इसका प्रभाव भी कम से कम उत्तर भारत में तो देखने मिला ही । लेकिन कर्नाटक के बाद कांग्रेस ने जिस कुशलता से तेलंगाना में इस दांव को आजमाया उसके अनुकूल परिणाम देखने मिल रहे हैं। चुनाव पूर्व सर्वेक्षण के बाद एग्जिट पोल के जो निष्कर्ष आए हैं वे सभी तेलंगाना में बीआरएस सरकार की विदाई का संकेत देते हुए कांग्रेस को स्पष्ट बहुमत मिलने का दावा कर रहे हैं। और इसका सबसे बड़ा जो कारण बताया जा रहा है कि हैदराबाद महानगर में ओवैसी के आभामंडल के अलावा अन्य शहरों , कस्बों और गांवों में फैले मुसलमानों के बीच कांग्रेस का ये नारा असर कर गया कि भाजपा के दो यार - ओवैसी और केसीआर । यद्यपि भाजपा गलत फैसले करने के कारण मुकाबले में पूरी तरह नजर नहीं आई किंतु प्रधानमंत्री के इस बयान से कि श्री राव उनके पास एनडीए में शामिल होने आए थे किंतु उन्होंने मना कर दिया , भाजपा को तो लाभ हुआ नहीं किंतु बीआरएस मुसलमानों की नजर में गिर गई जिसका फायदा कांग्रेस को मिला । हालांकि ये मान लेना जल्दबाजी होगी कि एग्जिट पोल ही परिणाम है किंतु इतना तो तय है कि तमाम जनकल्याणकारी योजनाओं के अलावा मुस्लिम तुष्टिकरण के तमाम फैसलों के बावजूद श्री राव 2018 वाला जादू कायम रखने में विफल प्रतीत हो रहे हैं तो उसका कारण मुसलमानों का कांग्रेस पर मेहरबान होना है। यदि ऐसा वाकई होता है और तेलंगाना में तमाम अनुमानों के मुताबिक कांग्रेस सत्ता हथिया लेती है तब ये राष्ट्रीय राजनीति में बड़े बदलाव का कारण बने बिना नहीं रहेगा। विशेष रूप से उ.प्र, बिहार और प.बंगाल में क्रमशः अखिलेश यादव , लालू और नीतीश के अलावा ममता बैनर्जी के लिए चिंता के कारण उत्पन्न हो जाएंगे। सबसे बड़ी बात ये होगी कि इंडिया नामक गठबंधन में कांग्रेस हावी होने की स्थिति में आ जाएगी । महाराष्ट्र में शरद पवार की राजनीति भी काफी हद तक मुस्लिम मतों पर टिकी हुई है जो इस बदलाव से कमजोर हो सकती है। कुल मिलाकर ये मान लेना गलत न होगा कि यदि तेलंगाना कांग्रेस के कब्जे में आता है तो इसका साफ मतलब होगा कि बाबरी ढांचा गिरने के बाद जो मुसलमान उससे दूर चले गए थे वे भाजपा के बढ़ते प्रभुत्व से घबराकर वापस लौट रहे हैं। और ऐसा होने से अल्पसंख्यकों के बल पर राजनीति करने वाली अनेक तीसरी ताकतें घुटनों के बल आने मजबूर हो जाएंगी। ये बदलाव कांग्रेस को कितना लाभ पहुंचा सकेगा वह तो बाद में ही पता चलेगा लेकिन इसका जवाबी असर हिंदुओं के ध्रुवीकरण के तौर पर किस मात्रा में होता है ये देखने वाली बात होगी क्योंकि हिंदुत्व का झंडा उठाकर घूमने के बाद भी भाजपा को सभी राज्यों में हिंदुओं का उतना समर्थन प्राप्त नहीं हो पाता जितना मुस्लिम उसका विरोध करते हैं। ऐसा लगता है कांग्रेस ने काफी सोच - समझकर मुसलमानों को बाकी गैर भाजपाई पार्टियों के शिकंजे से मुक्त करवाने की जो रणनीति कर्नाटक के बाद तेलंगाना में भी अपनाई वह फिलहाल तो काम करती दिख रही है। लोकसभा चुनाव के लिए जो इंडिया गठबंधन बना है उसके घटक दल कांग्रेस के इस पैंतरे पर क्या रुख अपनाते हैं ये उत्सुकता का विषय है।
- रवीन्द्र वाजपेयी
Friday, 1 December 2023
नींद तो एग्जिट पोल करने वालों को भी नहीं आएगी
पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के जो एग्जिट पोल गत दिवस जारी हुए उनमें कुछ तो चुनाव पूर्व सर्वेक्षण से मेल खाते हैं वहीं कुछ में थोड़ा तो कुछ में काफी अंतर है। एग्जिट पोल करने वाली संस्थाएं भी 3 फीसदी घट - बढ़ की संभावना व्यक्त करती हैं। ऐसे में जहां मुकाबला नजदीकी होता है वहां उलटफेर देखने मिलता है परंतु जीत हार के बीच लंबा अंतर वाले अनुमान काफी हद तक सही होते हैं। हमारे देश में चुनाव पूर्व सर्वेक्षण सबसे पहले 1984 के लोकसभा चुनाव में प्रणय रॉय और विनोद दुआ द्वारा शुरू किया गया था। उसके बाद इसका चलन बढ़ा । बाजारवाद के आगमन के साथ ही अनेक सर्वेक्षण संस्थान ग्राहकों की पसंद - नापसंद पता कर उत्पादक को देने लगे जिससे वे अपनी विक्रय रणनीति तय करते हैं। गुणवत्ता में सुधार हेतु भी सर्वेक्षण का उपयोग किया जाने लगा है। धीरे - धीरे राजनीतिक दल भी सर्वेक्षण के जरिए मतदाताओं के मन को पढ़ने का प्रयास करने लगे । आजकल प्रत्याशी चयन के अलावा चुनावी वायदे भी सर्वेक्षण के जरिए तय किए जाते हैं। अनेक पत्र - पत्रिकाएं और टीवी चैनल समय - समय पर देश का मूड जानने के लिए सर्वेक्षण करवाकर उसे प्रचारित करते हैं जिनमें सरकार के प्रति जनमानस की सोच उजागर होती है। ये सब देखते हुए सर्वेक्षण एक बड़े व्यवसाय के तौर पर स्थापित हुआ है। हालांकि चुनाव पूर्व सर्वेक्षण की उपयोगिता तो समझ में आती है किंतु एग्जिट पोल के औचित्य पर ये कहकर सवालिया निशान लगाए जाते हैं कि मतगणना के पहले अंदाजिया घोड़े दौड़ाने से हासिल क्या होता है? इसके जवाब में कहा जाता है कि जहां एक से अधिक चरणों में मतदान होता है वहां राजनीतिक दल हर चरण के बाद एग्जिट पोल से मिले संकेतों के मुताबिक अपनी रणनीति निर्धारित करते हैं। लेकिन कल जो एग्जिट पोल आए वे केवल बुद्धिविलास का विषय हैं । दरअसल , उनके जरिए सर्वेक्षण करने वाली एजेंसियां अपनी कार्यकुशलता प्रमाणित करती हैं। मसलन जिसका एग्जिट पोल परिणाम के जितने नजदीक होगा उसका व्यवसाय और बढ़ेगा । उस दृष्टि से देखें तो जो निष्कर्ष कल जारी हुए उनमें कुछ अनुमान एक दूसरे का समर्थन करते हैं तो कुछ में काफी अंतर है। लेकिन जिन दो - तीन एजेंसियों की साख अच्छी है उनके एग्जिट पोल पर भरोसा करें तो छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की बढ़त स्पष्ट है। उसी तरह तेलंगाना केसीआर के हाथ से खिसकता दिख रहा है। राजस्थान पर जहां भारी अनिश्चितता है वहीं म.प्र में भाजपा आसानी से बहुमत हासिल कर लेगी । यद्यपि वह जितना बड़ा दर्शाया गया है उसे लेकर आश्चर्य व्यक्त किया जा रहा है। हालांकि म.प्र में भाजपा को भारी सफलता मिलती है तो ये उन चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों को झुठलाने वाला होगा जिनमें बेहद करीबी टक्कर के बावजूद कांग्रेस का पलड़ा भारी बताया गया था। इसी तरह राजस्थान में सभी सर्वेक्षण भाजपा की जीत को निश्चित बता रहे थे किंतु एग्जिट पोल के मुताबिक कांग्रेस दौड़ से पूरी तरह बाहर नहीं हुई है। मिजोरम चूंकि राष्ट्रीय राजनीति की मुख्य धारा से अलग है इसलिए लोगों की उसके बारे में ज्यादा रुचि नहीं है किंतु तेलंगाना के अनुमान जरूर चौंकाने वाले हैं क्योंकि के .सी . रेड्डी की बीआरएस नामक क्षेत्रीय पार्टी को 2018 में भारी बहुमत हासिल हुआ था। ऐसे में कांग्रेस को बड़ी सफलता मिलने से श्री रेड्डी का भविष्य खतरे में पड़ जाएगा जो कांग्रेस और भाजपा दोनों के निशाने पर हैं। छत्तीसगढ़ में एकाध एग्जिट पोल ही भाजपा को बहुमत दे रहा है जबकि ज्यादातर में वह 2018 के प्रदर्शन से काफी बेहतर प्रदर्शन करने जा रही है और ऐसे में बहुमत के जादुई आंकड़े को स्पर्श कर ले तो वह सबसे बड़ा उलटफेर होगा। ढेर सारे एग्जिट पोल चूंकि अलग - अलग निष्कर्ष दे रहे हैं इसलिए असमंजस और बढ़ गया है। मसलन म.प्र में कांग्रेस जहां अपनी हार स्वीकार नहीं कर रही वहीं राजस्थान को लेकर भाजपा का भी कहना है कि चुनाव पूर्व सर्वेक्षण में उसकी सरकार बनने का जो अनुमान था वही नतीजे में परिलक्षित होगा। दो दिन बाद दोपहर तक स्थिति पूरी तरह साफ हो जाएगी। तब तक एग्जिट पोल को लेकर चर्चाओं का बाजार गर्म रहेगा। वैसे जो संकेत मोटे तौर पर मिल रहे हैं उनके अनुसार तेलंगाना को छोड़कर तीनों मुख्य राज्यों में राजनीति भाजपा और कांग्रेस के बीच दो ध्रुवीय होती दिख रही है। लेकिन म.प्र, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में कांग्रेस का प्रदर्शन उसकी उम्मीदों के अनुसार नहीं रहा तब सपा और आम आदमी पार्टी को उस पर हावी होने का मौका मिल जायेगा जिनके साथ गठबंधन करने से कांग्रेस ने साफ मना कर दिया था। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा ने म.प्र बचा लिया और राजस्थान कांग्रेस से छीन लिया तो उसका उत्साह बढ़ जाएगा । वहीं तेलंगाना और छत्तीसगढ़ जीतकर भी कांग्रेस भविष्य के प्रति आश्वस्त नहीं हो सकेगी और इंडिया गठबंधन के सहयोगी दल उस पर दबाव बनाने में जुट जाएंगे। के. सी.रेड्डी यदि अपनी गद्दी गंवा बैठे तो वे तीसरा मोर्चा बनाने की कवायद में जुटे बिना नहीं रहेंगे। 3 दिसंबर की शाम तक पांचों राज्यों की स्थिति स्पष्ट होने तक अनुमानों के घोड़े दौड़ते रहेंगे। नींद तो एग्जिट पोल करने वाली एजेंसियों को भी नहीं आएगी क्योंकि उनकी विश्वसनीयता भी तो कसौटी पर है।
- रवीन्द्र वाजपेयी