Friday, 8 December 2023

तीन राज्य हार जाने से इंडिया गठबंधन में कांग्रेस की वजनदारी घटी




ऐसा लगता है इंडिया नामक विपक्षी गठबंधन का जन्म सही मुहूर्त में नहीं हुआ । तभी तो उसकी गाड़ी अभी से हिचकोले खाने लगी है। हाल ही में संपन्न विधानसभा चुनावों को 2024 के लोकसभा चुनाव का सेमी फाइनल माना जा रहा था। उस दृष्टि से विपक्षी एकता के लिए ये चुनाव नुकसानदेह रहे। तेलंगाना में कांग्रेस ने जिस बीआरएस से सत्ता छीनी वह  भाजपा विरोधी होने से विपक्षी ही कहलाएगी। लेकिन म.प्र, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में कांग्रेस और इंडिया गठबंधन में शामिल दलों के बीच सीटों का बंटवारा नहीं होने से भाजपा विरोधी मतों में विभाजन से कांग्रेस का नुकसान तो हुआ ही , अविश्वास की खाई और चौड़ी हो गई। सपा , आम आदमी पार्टी और जनता दल (यू) ने कांग्रेस से कुछ सीटें मांगी थीं । लेकिन उसने किसी को भाव नहीं दिया। यहां तक कि भोपाल में होने वाली इंडिया की रैली भी रद्द कर गठबंधन के सदस्य दलों से दूरी बना ली। सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव और कमलनाथ के बीच तो तीखी टिप्पणियों का आदान - प्रदान भी चला। उक्त तीनों राज्यों में कांग्रेस बुरी तरह हारी जिसके बाद  गठबंधन में शामिल ज्यादातर दलों ने उसे अहंकारी तक बता डाला। यही नहीं तो 6 दिसंबर को गठबंधन के सदस्यों की जो बैठक श्री खरगे ने आमंत्रित की थी उसमें आने से भी विपक्ष के ज्यादातर दिग्गजों ने इंकार कर दिया। उनका कहना था कि बैठक की तिथि तय करने से पहले किसी से सलाह नहीं ली गई । उसके बाद बैठक टालनी पड़ी जिससे कांग्रेस की जमकर किरकिरी हुई। बाद में पता चला कि राहुल गांधी को चूंकि 8 दिसंबर को विदेश यात्रा पर निकलना है इसलिए बैठक 6 तारीख को रख ली गई। अनेक नेताओं ने श्री गांधी की विदेश यात्राओं पर भी सवाल दागे। अगली बैठक कब और कहां होगी ये निश्चित नहीं है। कांग्रेस इसे लेकर बेहद चौकन्नी है क्योंकि अगली बैठक में गठबंधन के संयोजक का नाम तय होने के साथ ही लोकसभा चुनाव में सीटों के बंटवारे का फार्मूला तय किया जाना है। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पहले दिन से संयोजक बनने के लिए लालायित हैं । लेकिन शिवसेना के प्रवक्ता संजय राउत ने उद्धव ठाकरे का नाम उछालकर खींचातानी और बढ़ा दी। शरद पवार भी अपनी पार्टी में हुई  टूटन से उबर नहीं पा रहे। उधर ममता बैनर्जी प.बंगाल में कांग्रेस और वामपंथी गठबंधन के लिए लोकसभा सीट छोड़ने के बारे में पहले से ही नकारात्मक रवैया दिखाती आई हैं। यही हालात केरल के हैं जहां वाममोर्चा और कांग्रेस एक दूसरे के विरुद्ध तलवारें भांजते रहते हैं। उत्तर भारतीय राज्यों में  इंडिया गठबंधन के अनेक घटक दल मजबूत स्थिति में होने से कांग्रेस को उपकृत करने से हिचक रहे हैं। म.प्र में कमलनाथ और अखिलेश यादव के बीच चले शब्द बाणों के  दौरान ही श्री यादव  उ.प्र में लोकसभा सीटों के बंटवारे को लेकर कांग्रेस से वैसा ही व्यवहार किए जाने की धमकी दे चुके हैं। यहां तक कि उ.प्र कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय के प्रति  चिरकुट जैसा शब्द तक उनके द्वारा प्रयोग किया गया। पांच राज्यों के चुनाव के बाद इंडिया गठबंधन के सदस्य कांग्रेस पर दबाव बनाने में जुट गए हैं । जिस तरह की बयानबाजी हो रही है उसे देखते हुए कहा जा सकता है कि 2024 में भाजपा को रोकने के लिए विपक्ष इंडिया गठबंधन के बैनर तले एकत्रित तो होना चाहता है लेकिन ज्यादातर पार्टियां कांग्रेस के वर्चस्व को स्वीकार करने के प्रति अनिच्छुक हैं । ऊपर से आए दिन आने वाले गैर जिम्मेदाराना बयान भी इस गठबंधन के भविष्य को संकट में डाल देते हैं। मसलन संसद में एक द्रमुक सांसद ने उत्तर भारत को गौमूत्र राज्य कहकर उनका उपहास किया। जबरदस्त विरोध के बाद उन्होंने अपने बयान को वापस लेते हुए माफी भी मांगी । लेकिन उसके पीछे स्वेच्छा न होकर तमिलनाडु के मुख्यमंत्री स्टालिन की समझाइश थी जो अपने बेटे के सनातन संबंधी बयान के कारण उत्तर भारत में घृणा का पात्र बने हुए हैं। ये विवाद ठंडा भी नहीं हुआ था कि तेलंगाना के नए मुख्यमंत्री कांग्रेस नेता रेवंत रेड्डी ने निवर्तमान मुख्यमंत्री के. सी.राव को बिहार से जोड़ते हुए उन्हें कुर्मी बताकर टिप्पणी की कि तेलंगाना का डी.एन.ए बिहार से बेहतर है। उक्त बयान आए दो दिन बीत गए किंतु कांग्रेस ने उस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। जाहिर है बिहार से तेलंगाना का डी.एन.ए बेहतर होने संबंधी बयान पर कांग्रेस और नीतीश के बीच नाराजगी और बढ़ सकती है। सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि 3 दिसंबर के बाद  राहुल गांधी और प्रियंका वाड्रा ने मौन साध रखा है। सही बात तो ये है कि उनके पास बोलने के लिए कुछ है ही नहीं। भाजपा के हमलों को झेलना तो ठीक किंतु इंडिया गठबंधन के घटक दलों के नेताओं द्वारा कांग्रेस पर जो आक्रमण किए जा रहे हैं ,  उनका निशाना दरअसल राहुल ही हैं। घटक दल कांग्रेस को जिस प्रकार घेरने लगे हैं उससे ऐसा लगता है संयोजक पद और सीटों के बंटवारे को लेकर होने वाली बैठक में जबरदस्त खींचातानी होगी। वैसे भी सनातन  और डी. एन.ए जैसे मुद्दों पर कांग्रेस की खामोशी उसके लिए मुसीबत का कारण बन गई है। हिन्दी पट्टी के तीन प्रमुख राज्य हार जाने के बाद उसके भाव वैसे भी गिरे हुए हैं।

- रवीन्द्र वाजपेयी 

Thursday, 7 December 2023

म.प्र में दिग्विजय - कमलनाथ का युग खत्म : कांग्रेस में नए नेतृत्व का अभाव



म.प्र देश का वह राज्य है जहां राजनीति पूरी तरह दो ध्रुवीय हो चुकी है। एक जमाना था जब जनसंघ के अलावा समाजवादी और साम्यवादी विचारधारा के भी कुछ गढ़ थे। अनेक निर्दलीय विधायकों ने भी लंबे समय तक प्रदेश की राजनीति को प्रभावित किया। 1968 में बनी संविद सरकार बहुदलीय राजनीति का ही उदाहरण था। बाद में 1977 में जनता पार्टी की सरकार में भी जनसंघ और  समाजवादी विचारधारा के लोग शामिल हुए। लेकिन उस पार्टी के टूटने और जनसंघ का भाजपा के रूप में पुनर्जन्म होने के पश्चात समाजवादी खेमा बिखराव का शिकार हुआ और धीरे - धीरे उसका अस्तित्व केवल कागजों तक सीमित हो गया। यही हाल दलित राजनीति की प्रतिनिधि बसपा का देखने मिला । आदिवासियों के बीच गोंडवाना गणतंत्र पार्टी और जयस जैसे संगठन उभरे किंतु एक - दो चुनाव में  ताकत दिखाने के बाद  वोट कटवा बनकर रह गए। हाल ही में संपन्न विधानसभा चुनाव के बाद जो परिदृश्य उभरा उससे साफ हो गया कि प्रदेश के मतदाताओं ने तीसरी ताकत को पूरी तरह तिरस्कृत कर दिया। 2018 में सपा , बसपा और निर्दलीय मिलाकर  अन्य की संख्या 7 थी जबकि इस चुनाव में भारत आदिवासी पार्टी नामक नए उभरे दल का एक उम्मीदवार जीता और 229 सीटों में 163 भाजपा तथा 66 कांग्रेस को मिल गईं। इसके बाद से अब भविष्य के चुनावों के मद्देनजर ये कहा जा सकता है कि जनता तीसरी ताकत को भाव देने के पक्ष में नहीं है। सिंगरौली में आम आदमी पार्टी की रानी अग्रवाल के महापौर चुने जाने के बाद उसके उदय के दावे होने लगे थे किंतु विधानसभा चुनाव में वे चौथे स्थान पर आईं। इससे लगता है लोकसभा चुनाव में भी प्रदेश के मतदाता भाजपा और कांग्रेस में से ही चयन करेंगे। ये देखते हुए विधानसभा चुनाव के ताजा परिणाम के बाद कांग्रेस के भविष्य पर पूरे प्रदेश की निगाहें लगी है। 2019 में कमलनाथ की सरकार होने के बाद भी भाजपा ने छिंदवाड़ा छोड़कर सभी 28 लोकसभा सीटें जीत लीं थीं। यहां तक कि गुना से ज्योतिरादित्य सिंधिया और भोपाल से दिग्विजय सिंह जैसे दिग्गज बुरी तरह परास्त हुए। बाद में श्री सिंधिया ने भाजपा में शामिल होकर उस सरकार को चलता किया। लेकिन मुख्यमंत्री पद से हटने के बाद भी कमलनाथ प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष बने रहे। और पूरा संगठन उनके इशारों पर नाचता रहा। चुनाव संचालन का हर कार्य उनके निर्देशन में हुआ। ये कहने में कुछ भी गलत न होगा कि उनको दिग्विजय सिंह का पूरा साथ मिला जो श्री नाथ को बड़ा भाई कहते आए हैं । हालांकि 2018 के पहले तक दोनों के बीच ये अघोषित समझौता था कि श्री सिंह जहां प्रदेश की राजनीति चलाएंगे वहीं कमलनाथ राष्ट्रीय राजनीति में सक्रिय रहेंगे। चूंकि दिग्विजय की छवि हिंदू विरोधी बन गई इसलिए कांग्रेस ने 2018 में श्री सिंधिया को बतौर मुख्यमंत्री पेश किया जिसका लाभ भी हुआ किंतु दिग्विजय एक बार फिर सिंधिया परिवार और मुख्यमंत्री पद के बीच आ गए और श्री नाथ की ताजपोशी करवा दी । उससे खिन्न ज्योतिरादित्य ने बगावत कर दी । सरकार चली जाने के बाद से श्री नाथ  म.प्र में पूरा समय देकर 2023 के चुनाव के लिए तैयारियां करते रहे और बतौर मुख्यमंत्री वे पार्टी के निर्विवाद चेहरे बने। दिग्विजय भी पूरी तरह उनके साथ थे,  लेकिन 3 दिसंबर को जो नतीजे आए उनमें कांग्रेस की लुटिया पूरी तरह डूब गई। छिंदवाड़ा छोड़ बाकी जिलों में उसका सूपड़ा साफ हो गया। अपराजेय कहे जाने वाले  बड़े - बड़े कांग्रेसी दिग्गज हार गए। नेता प्रतिपक्ष गोविंद सिंह के अलावा दिग्विजय सिंह के अनुज और भतीजे भी पराजय का शिकार बने। 2003 , 2008 और 2013 में भी कांग्रेस हारी थी किंतु तब उसके पास श्री सिंह , श्री नाथ और श्री सिंधिया के अलावा भी अनेक युवा चेहरे थे जिनकी जड़ें प्रदेश की राजनीति में गहराई तक जम चुकी थीं। लेकिन बीते पांच साल में कमलनाथ ने एक - एक कर सबको किनारे लगा दिया। यहां तक कि  दिग्विजय सिंह को कमजोर करने में भी पीछे नहीं रहे। यही वजह है कि आज कांग्रेस के पास कोई भी ऐसा नेता नहीं है जो पार्टी को इस दुर्दशा से बाहर लाने में सक्षम हो। अजय सिंह राहल जैसे कुछ छत्रप जीतकर विधानसभा में आए जरूर किंतु वे अतीत में भी विफल साबित हो चुके हैं। यहां तक कि विंध्य अंचल में भी उनका वैसा प्रभाव नहीं रहा जैसा उनके स्वर्गीय पिता अर्जुन सिंह का था। यही स्थिति दूसरी पंक्ति के पार्टी नेताओं की है। इस सबके कारण म.प्र में कांग्रेस के पास वैकल्पिक नेतृत्व का अभाव हो गया है। गत दिवस कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष ने कमलनाथ से म.प्र में पराजय के कारणों के साथ ही नए प्रदेश अध्यक्ष के लिए नाम पूछे। हालांकि अभी तक श्री नाथ ने पद नहीं छोड़ा लेकिन उनके सामने भी समस्या है कि वे अपने उत्तराधिकारी के तौर पर किसका नाम आगे बढ़ाएं ? इस विधानसभा चुनाव के बाद कांग्रेस में दिग्विजय सिंह और कमलनाथ का  युग समाप्त हो गया है। लोकसभा चुनाव के पूर्व कांग्रेस को नया नेतृत्व मिलने की संभावना है । लेकिन इन दोनों ने पार्टी को इतनी खराब स्थिति में लाकर खड़ा कर दिया कि उसके लिए लोकसभा के लिए मजबूत उम्मीदवार ढूढ़ना कठिन हो गया है।

- रवीन्द्र वाजपेयी 


Wednesday, 6 December 2023

ईवीएम पर ठीकरा फोड़ने से दूर नहीं होगी कांग्रेस की दुर्दशा


तीन राज्यों के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की  पराजय का विश्लेषण सभी अपने - अपने तरीके से कर रहे हैं। म.प्र में तो शिवराज सरकार की लाड़ली बहना योजना को भाजपा की जीत का कारण बताया जा रहा है किंतु छत्तीसगढ़ और राजस्थान में कांग्रेस वैसी ही योजनाएं लागू करने के बाद भी  हार गई । इन परिणामों ने ये साबित कर दिया कि उत्तर भारतीय राज्यों में कांग्रेस का जनाधार तेजी से सिमट रहा है। राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा भी म.प्र और राजस्थान के जिन अंचलों से गुजरी , उनमें कांग्रेस का  सफाया हो गया। इंडिया गठबंधन में शामिल अन्य विपक्षी पार्टियां कांग्रेस के अहंकार को इस पराजय के लिए जिम्मेदार बता रही हैं। कुल मिलाकर ये कहना गलत नहीं होगा कि मतदाताओं ने राजस्थान और छत्तीसगढ़ में  कांग्रेस की मुफ्त योजनाओं को ठुकराकर भी भाजपा को अपना समर्थन दिया। कर्मचारियों को  पुरानी पेंशन का लालच देना भी काम नहीं आया । सच ये है कि  कांग्रेस जनभावनाओं को समझ पाने में पूरी तरह असमर्थ है। कहने को तो भाजपा ने भी  प्रधानमंत्री के चेहरे को ही सामने रखा और मोदी की गारंटी के नाम पर मतदाताओं को इस बात के लिए आश्वस्त करने का प्रयास किया कि वह जो वायदे कर रही है वे पूरे होंगे। लेकिन  सबसे बड़ी बात है राष्ट्रवाद और हिंदुत्व ,  जिसका दिखावा तो कांग्रेस भी बहुत करने लगी है किंतु उसका मन साफ नहीं है। पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के बेटे द्वारा सनातन को खत्म करने वाली टिप्पणी  का समर्थन किए जाने वाले बयान पर उनसे सवाल किए जाने की हिम्मत किसी की नहीं हुई । लेकिन कमलनाथ द्वारा ये कहे जाने पर कि देश की आबादी में 82 फीसदी हिन्दू हैं तो वह हिन्दू राष्ट्र कहलाएगा ही ,  तो पार्टी के तमाम नेता उनकी आलोचना पर उतर आए।  ऐसे में कांग्रेस नेता आचार्य प्रमोद कृष्णम की ये टिप्पणी सच्चाई के काफी करीब प्रतीत होती है कि सनातन का श्राप कांग्रेस की हार का कारण बना। इस बारे में ये बात भी ध्यान देने योग्य है कि राहुल गांधी द्वारा ओबीसी को लुभाने के लिए जातीय जनगणना का को लॉलीपॉप दिखाया गया उसे भी मतदाताओं ने भाव नहीं दिया। दरअसल कांग्रेस चूंकि सत्य को स्वीकार करने का नैतिक साहस खो चुकी है इसलिए  वह इस वास्तविकता से आंखें चुरा लेती है कि गांधी परिवार का आकर्षण ढलान पर है। और इसीलिए अब उसके नेता घिसे - पिटे बहाने के तौर पर ईवीएम ( इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीन ) पर अपना गुस्सा उतारने लगे हैं। म.प्र के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह का कहना है कि जिस उपकरण में भी चिप लगी हो उससे छेड़छाड़ मुमकिन है । इसी तरह प्रदेश में  कांग्रेस की तरफ से मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार कमलनाथ भी घुमा फिराकर यही कह रहे हैं। कांग्रेस के अनेक प्रवक्ता टीवी चैनलों पर पार्टी की हार के लिए वोटिंग मशीनों में हेराफेरी का मुद्दा उठाकर मतपत्रों से चुनाव करवाए जाने की मांग दोहरा रहे हैं। लेकिन ये प्रलाप केवल उन्हीं राज्यों में सुनाई दे रहा है जिनमें कांग्रेस को पराजय झेलनी पड़ी। हिमाचल , कर्नाटक और तेलंगाना में  मिली जीत के बाद किसी भी कांग्रेसी या अन्य नेता ने ईवीएम पर शंका व्यक्त की हो ऐसा देखने में नहीं आया। दिल्ली और  पंजाब में आम आदमी पार्टी की ऐतिहासिक विजय पर भी कांग्रेस ने वोटिंग मशीन पर शक नहीं जताया। प.बंगाल के विधानसभा चुनाव में तृणमूल की आंधी में कांग्रेस और वामपंथी एक भी सीट नहीं जीत सके थे । केरल में भी हर चुनाव में सत्ता बदलने के रिवाज को तोड़ते हुए वामपंथी सरकार की वापसी पर कांग्रेस ने चुनाव प्रक्रिया पर किसी भी तरह से  ऐतराज जताया हो ये किसी ने नहीं सुना। लेकिन जब किसी चुनाव में भाजपा को जीत हासिल होती है तो कांग्रेस बलि के बकरे के तौर पर ईवीएम मशीन पर ठीकरा फोड़ने लगती है। म.प्र , छत्तीसगढ़ और राजस्थान में मतदाताओं द्वारा पूरी तरह नकारे जाने के बाद उसको चाहिए वह ईमानदारी से अपनी कमजोरियों का विश्लेषण कर उन्हें दूर करने का प्रयास करे। उसे इस बात पर भी ध्यान देना चाहिए कि इंडिया गठबंधन के अन्य घटक दल कांग्रेस की हार के जो कारण बता रहे हैं उनमें  अहंकार और क्षेत्रीय दलों की उपेक्षा मुख्य हैं। ऐसे में  बेहतर यही होगा कि कांग्रेस तीनों राज्यों में अपनी पराजय के जमीनी कारणों का  ईमानदारी से विश्लेषण कर उनमें सुधार करने के लिए आवश्यक कदम उठाते हुए जनता की आकांक्षाओं के अनुरूप आचरण करे। केवल भाजपा और मोदी को कोसने से उसके दुरावस्था दूर होने वाली नहीं है। उसे ये नहीं भूलना चाहिए कि 2004 और 2009 में उसके नेतृत्व में बनी यूपीए सरकार भी ईवीएम से निकले जनादेश का ही परिणाम थी ।


-रवीन्द्र वाजपेयी


Tuesday, 5 December 2023

विपक्षी एकता के ढांचे में दरार चौड़ी होने की आशंका


पांच  राज्यों में से मिजोरम को छोड़ भी दें तो म.प्र , छत्तीसगढ़ और राजस्थान में कांग्रेस जिस तरह औंधे मुंह गिरी उसने राहुल गांधी के  उठते हुए राजनीतिक ग्राफ को एक बार फिर ढलान की और धकेल दिया है। ऐसे में भाजपा  उनका उपहास करे तो बात समझ में भी आती है किंतु अब विपक्ष के बाकी दल भी  कांग्रेस के बहाने राहुल की खिंचाई करने में जुट गए जिससे इंडिया नामक  विपक्षी गठबंधन में बिखराव के संकेत मिलने लगे हैं। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने 6 दिसंबर को इंडिया की जो बैठक बुलाई उसमें आने से  प.बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी ने  मना कर दिया वहीं समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव भी अनिच्छुक बताए जाते हैं। इसीलिए बैठक रद्द करने की नौबत आ गई। नीतीश कुमार तो इंडिया गठबंधन की निष्क्रियता को लेकर कांग्रेस पर पहले ही शब्दबाण छोड़ते रहे हैं।  ज्यादातर विपक्षी दलों को इस बात की शिकायत है  कि हिमाचल और कर्नाटक विधानसभा चुनाव जीतने के बाद कांग्रेस विशेष रूप से राहुल का रवैया पूरी तरह बदल गया है। उत्तर भारत के तीनों राज्यों में सपा , जनता दल (यू) और आम आदमी पार्टी कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव लड़ना चाहती थीं परंतु उसने किसी को घास नहीं डाली। उल्टे कांग्रेस  विपक्षी दलों को ये एहसास करवाने में जुट गई कि भारत जोड़ो यात्रा के बाद श्री गांधी प्रधानमंत्री श्री मोदी के विकल्प के तौर पर उभरे हैं और जनता में उनकी स्वीकार्यता बढ़ी है। कर्नाटक चुनाव में पार्टी को मिली कामयाबी के बाद भाजपा विरोधी कुछ यू ट्यूबर पत्रकारों को राहुल के पक्ष में माहौल बनाने का अघोषित ठेका दे दिया गया । लेकिन म.प्र , छत्तीसगढ़ और राजस्थान में कांग्रेस की जो दुर्गति मतदाताओं ने की उसके बाद  उसकी बेरूखी झेलते आ रहे विपक्षी दल बीते दो दिनों से ऐंठते नजर आ रहे हैं। ममता ने तो साफ कह दिया कि ये भाजपा की जीत नहीं , कांग्रेस की हार है। नीतीश कुमार , अखिलेश यादव , के.सी त्यागी , अरविंद केजरीवाल सहित इंडिया गठबंधन के शेष घटक दल भी कांग्रेस की खुलकर इस बात के लिए आलोचना कर रहे हैं कि वह गठबंधन धर्म का पालन करने की बजाय एकला चलो की जो नीति अपना रही है वह  श्री मोदी को तीसरी पारी खेलने का अवसर प्रदान करने में सहायक बनेगी। एक भी विपक्षी दल ऐसा नहीं है जिसने तेलंगाना की विजय के लिए राहुल या कांग्रेस को बधाई दी हो । लेकिन तीन अन्य राज्यों में उसकी शिकस्त का मजाक उड़ाने के साथ ही आलोचनात्मक टिप्पणियों की बाढ़ जिस तरह से आई है उसे देखते  कांग्रेस  इंडिया की लगाम अपने हाथ में रखने का जो प्रयास करने लगी थी उसे जरूर धक्का लगा है। नीतीश कुमार को इस गठबंधन का जन्मदाता माना जाता है किंतु उसके संयोजक सहित अन्य नीतिगत मुद्दों पर कांग्रेस ने  जिस प्रकार से हावी होने की कोशिश की उससे बाकी पार्टियां चौकन्नी हो उठी थीं । लेकिन श्री गांधी की भारत जोड़ो यात्रा के अलावा  हिमाचल तथा कर्नाटक में कांग्रेस की  जीत के बाद उसकी वजनदारी अचानक से बढ़ने लगी। कांग्रेस थोड़ा बड़प्पन दिखाते हुए  तीन राज्यों के चुनाव में  छोटे विपक्षी दलों को भी साथ ले लेती तो भले ही  भाजपा का विजय रथ रोकना संभव न हो पाता परंतु विपक्षी एकता में दरार नहीं पड़ती और हार का जिम्मा सामूहिक होता। लेकिन कांग्रेस का केंद्रीय नेतृत्व छोटी सी बात नहीं भांप सका। दूसरी तरफ पार्टी के प्रादेशिक नेता भी अपनी ऐंठ में रहे और ये कहते हुए गठबंधन से  मुकर गए कि वह तो लोकसभा चुनाव के लिए है। उल्लेखनीय है चुनाव के पहले भोपाल में  इंडिया गठबंधन की एक संयुक्त रैली आयोजित की गई थी किंतु कमलनाथ ने इस डर से उसे रद्द करवा दिया कि कहीं कांग्रेस पर अन्य विपक्षी दलों के लिए कुछ सीटें छोड़ने का दबाव न बन जाए। बाद में जब सपा के साथ बात टूटी तब कमलनाथ ने कौन अखिलेश - वखलेश जैसी सस्ती टिप्पणी कर आग में घी डाल दिया। राहुल द्वारा श्री यादव को फुसलाने का प्रयास भी हुआ किंतु सपा अध्यक्ष ने कांग्रेस पर धोखेबाज होने का आरोप लगाते हुए म.प्र में धुआंधार प्रचार किया। राजस्थान और छत्तीसगढ़ में आम आदमी पार्टी ने भी कांग्रेस को खूब गरियाया। चुनाव परिणाम आने तक कांग्रेस  इस बात के प्रति आश्वस्त थी कि म.प्र और छत्तीसगढ़ के साथ ही तेलंगाना में भी वह जीत जाएगी और तब शायद उसे किसी से गठजोड़ की ज़रूरत ही न पड़े किंतु उसकी उम्मीदों पर पानी फिर गया और तेलंगाना में मिली शानदार जीत के बावजूद वह शेष तीनों राज्यों में मुंह के बल गिरी। ये देखते हुए तीन राज्यों में कांग्रेस की हार इंडिया गठबंधन के विघटन की शुरुआत बन जाए तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए जिसके लिए कांग्रेस का  अहंकार और राहुल गांधी सहित उनके परिवार की सामंतवादी सोच सबसे ज्यादा जिम्मेदार होगी।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 4 December 2023

मोदी के मुकाबले एक बार फिर बौने साबित हुए राहुल



चार राज्यों के विधानसभा चुनाव परिणाम भाजपा के लिए जबरदस्त उत्साहवर्धक रहे। हिमाचल और कर्नाटक में मिली पराजय के बाद पार्टी की चिंताएं बढ़ रही थीं। दूसरी तरफ कांग्रेस का मनोबल आसमान छूने लगा। राजनीतिक विश्लेषक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का जादू खत्म होने के साथ ही राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा को पांसा पलटने वाली बताने लगे । यही वजह थी कि कुछ महीनों पहले तक तेलंगाना में हाशिये पर समझी जा रही कांग्रेस पूरे आत्मविश्वास के साथ उतरी और जल्द ही उसकी जीत के संकेत भी आने लगे। इसके बाद से ही ये अवधारणा तेजी से फैली कि म.प्र, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में भी कांग्रेस अपना परचम फहराने में सफल हो जाएगी। म.प्र के बारे में तो खुद भाजपाई भी मानने लगे थे कि मुकाबला कड़ा है और जरा सी चूक से 2018 की पुनरावृत्ति हो सकती है। राजस्थान और छत्तीसगढ़ की सरकार द्वारा चलाई गई जनकल्याणकारी योजनाएं कांग्रेस की वापसी का आधार मानी जा रही थीं। हालांकि बाद में राजस्थान में भाजपा की संभावनाएं बढ़ने लगीं किंतु छत्तीसगढ़ में भूपेश बघेल की सरकार को अपराजेय मानते हुए यहां तक कहा जाने लगा कि वहां भाजपा आधे - अधूरे मन से मैदान में उतरी थी। तेलंगाना में भाजपा ने कुछ समय पहले प्रदेश अध्यक्ष बदलकर अपनी आक्रामकता खत्म कर दी थी जिससे कांग्रेस को अवसर मिल गया। हालांकि वहां पार्टी की सीटें 1 से बढ़कर 8 हो गईं । मतदान के बाद आए एग्जिट पोल के दो निष्कर्ष तो एकमतेन थे कि तेलंगाना और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस आसानी से जीतेगी जबकि म.प्र और राजस्थान को लेकर मतभिन्नता थी। एक दो पोल में म.प्र में भाजपा की बड़ी जीत बताने वालों का खूब मजाक भी उड़ा । वहीं राजस्थान में ज्यादातर लोग बराबरी की टक्कर मान रहे थे। लेकिन नतीजों ने सबको चौंका दिया। म.प्र में भाजपा की प्रचंड विजय के साथ ही राजस्थान में सुविधाजनक बहुमत मिलने तक तो ज्यादा आश्चर्य नहीं हुआ किंतु जैसे - जैसे छत्तीसगढ़ के परिणाम आते गए वैसे - वैसे सभी चौंक गए। भाजपा ने तेलंगाना छोड़ बाकी तीन राज्य जीतकर ये दिखा दिया कि हिमाचल और कर्नाटक की पराजय से सबक लेकर उसने अपनी कमजोरियों को दूर किया और समूचे चुनाव अभियान को बेहद पेशेवर अंदाज में संचालित किया। दूसरी तरफ कांग्रेस इस चुनाव में कर्नाटक की खुमारी से उबरती नहीं दिखी और उसने स्थानीय समीकरणों की घोर उपेक्षा की । गुटबाजी भाजपा में भी कम नहीं थी। टिकटों के लिए उसमें भी वही सब देखने मिला जो कांग्रेस में नजर आता था किंतु उसे दूर करने के लिए केंद्रीय नेतृत्व ने हरसंभव प्रयास किए जिसका सुखद परिणाम निकला। हारी हुई सीटों पर जिस तरह की व्यूह रचना भाजपा द्वारा की गई उसे कांग्रेस समझ ही नहीं सकी जिससे दो राज्य तो उसके हाथ से निकले ही म.प्र में भी उसे शर्मिंदगी उठानी पड़ी । शिवराज सिंह चौहान की लाड़ली बहना योजना ने जो इबारत दीवार पर लिखी उसे न कमलनाथ पढ़ सके और न ही दिग्विजय सिंह। कमलनाथ तो इतने आत्ममुग्ध थे कि उन्होंने चुनाव संचालन में किसी को हिस्सेदारी नहीं दी और पार्टी संगठन को निजी संपत्ति मान बना बैठे । इसीलिए आखिर - आखिर में दिग्विजय भी ठंडे होकर बैठ गए। छत्तीसगढ़ में भूपेश बघेल जरूरत से ज्यादा आत्मविश्वास के शिकार हुए। भाजपा ने दबे पांव वहां के चुनाव में आमद दर्ज कराई और मुकाबला जीत लिया । राजस्थान में कांग्रेस जीत सकती थी लेकिन आलाकमान अशोक गहलोत और सचिन पायलट का झगड़ा सुलझाने में असफल रहा जिसके कारण उसके हाथ से जीत छिन गई। दूसरी तरफ भाजपा ने कांग्रेस की गलतियों से फायदा उठाने के अलावा अपनी कमियों को दूर करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। सही बात ये है कि जिस तरह डा.मनमोहन सिंह की सरकार नीतिगत अनिर्णय के कारण जनता का भरोसा खो बैठी वही स्थिति कांग्रेस के वर्तमान नेतृत्व अर्थात गांधी परिवार की है जो पेचीदा मामलों में निर्णय लेने से बचता है। इसका पहला उदाहरण पंजाब था जहां अमरिंदर सिंह और नवजोत सिद्धू के झगड़े ने कांग्रेस का सत्यानाश कर दिया। लगभग वही कहानी राजस्थान में दोहराई जाती रही। हाईकमान के फैसले के विरुद्ध श्री गहलोत ने जिस तरह से बगावत का झंडा उठाया वह मामूली बात नहीं थी। गांधी परिवार न तो उन पर दबाव बना सका और न ही सचिन पायलट को उनके साथ सामंजस्य बनाने के लिए राज़ी कर सका। छत्तीसगढ़ में भी 2018 की जीत के बाद भूपेश बघेल और टी. एस. सिंहदेव के बीच ढाई - ढाई साल मुख्यमंत्री रहने का समझौता हुआ किंतु उसका पालन नहीं होने से श्री सिंहदेव नाराज बने रहे। चुनावी साल में उनको उपमुख्यमंत्री बनाकर संतुष्ट करने का दांव चला गया किंतु वह कारगर नहीं रहा और श्री सिंहदेव चुनाव हार गए। कुल मिलाकर ये कांग्रेस की नीतिगत दिशाहीनता का नतीजा है। भाजपा की नकल करते हुए हिंदुत्व का चोला धारण करने का दिखावा तो खूब हुआ किंतु पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के बेटे ने जब सनातन को नष्ट करने का समर्थन किया तो उसका राहुल , प्रियंका , कमलनाथ , अशोक गहलोत और श्री बघेल जैसे नेताओं ने विरोध नहीं किया। भाजपा इस मुद्दे पर कांग्रेस को सनातन विरोधी साबित करने में सफल हो गई। इस चुनाव में मोदी की गारंटी नामक नारे का जादू भी कारगर रहा। प्रधानमंत्री की गरीब कल्याण योजनाओं को जिस तरह सफलतापूर्वक लागू किया गया उसका मतदाताओं पर सकारात्मक असर हुआ। कुल मिलाकर तीन राज्य जीतकर भाजपा ने 2024 के लोकसभा चुनाव के लिए अपने हौसले को मजबूत कर लिया है। इन नतीजों का विपक्ष के इंडिया नामक गठबंधन के भविष्य पर भी असर पड़ना तय है क्योंकि हिमाचल और कर्नाटक जीतने के बाद कांग्रेस ने जिस तरह उत्तर भारत के तीन राज्यों में इंडिया के अन्य घटक दलों के साथ गठबंधन से इंकार किया उससे वे काफी नाराज हैं। जाहिर है ये चुनाव परिणाम कांग्रेस के लिए चिंता का कारण हैं क्योंकि श्री मोदी के मुकाबले राहुल गांधी एक बार फिर बौने साबित हुए हैं। म.प्र और राजस्थान के जिन इलाकों से भारत जोड़ो यात्रा निकली वहां कांग्रेस का सफाया हो जाना इसका प्रमाण है ।

-रवीन्द्र वाजपेयी 


Saturday, 2 December 2023

मुसलमानों को अपने पाले में खींचने में कामयाब होती लग रही कांग्रेस


कर्नाटक विधानसभा के चुनाव में कांग्रेस की सफलता का सबसे बड़ा कारण मुस्लिम मतदाताओं का देवगौड़ा परिवार के जनता दल ( सेकुलर ) से छिटक कर उसकी तरफ घूम जाना रहा। परिणामस्वरूप भाजपा का मत प्रतिशत तो यथावत रहा किंतु जनता दल ( सेकुलर ) का 5 प्रतिशत कम होकर कांग्रेस के खाते में आ गया। दरअसल कांग्रेस मुस्लिमों में ये बात फैलाने में पूरी तरह से सफल रही कि  पूर्व प्रधानमंत्री एच. डी.देवगौड़ा के पुत्र कुमार स्वामी भाजपा के समर्थन से मुख्यमंत्री बन सकते हैं। इसका कारण प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा काफी समय से देवगौड़ा जी की प्रशंसा किया जाना था। हालांकि 2018 में त्रिशंकु विधानसभा बनने के बाद कुमारस्वामी को कांग्रेस ने मुख्यमंत्री बनवाया था । दलबदल के कारण वह सरकार के गिरने से भाजपा सत्ता में आ गई किंतु 2023 में कांग्रेस और जनता दल ( सेकुलर ) में गठजोड़ नहीं हो सका। बीते अनेक चुनावों से राज्य का मुस्लिम समुदाय जनता दल ( सेकुलर ) से जुड़ा हुआ था। लेकिन पिछले चुनाव में उसका ध्रुवीकरण कांग्रेस के पक्ष में होने से देवगौड़ा परिवार मैसूर अंचल के अपने प्रभाव क्षेत्र तक में मात खा गया। ये भी देखने में आया कि दूसरे राज्यों से मुस्लिम धर्मगुरुओं ने कर्नाटक आकर मुस्लिम मतदाताओं के मन में ये बात बिठा दी कि जनता दल ( सेकुलर ) का समर्थन करने से भाजपा मजबूत होगी। ये समझाइश काम कर गई और कांग्रेस को अच्छा खासा बहुमत मिल गया। उसी के बाद कुमारस्वामी ने भाजपा की ओर हाथ बढ़ाया  जिससे वे कम से कम लोकसभा चुनाव में तो  प्रासंगिक बने रहें। इस प्रकार कांग्रेस का ये कहना कि फलां पार्टी भाजपा की बी टीम है , उसकी रणनीति का हिस्सा बनने लगा। उल्लेखनीय है असदुद्दीन ओवैसी को लेकर उसका ये प्रचार काफी समय से चला आ रहा है और इसका प्रभाव भी कम से कम उत्तर भारत में तो देखने मिला ही । लेकिन कर्नाटक के बाद कांग्रेस ने जिस कुशलता से तेलंगाना में इस दांव को आजमाया उसके अनुकूल  परिणाम देखने मिल रहे हैं। चुनाव पूर्व सर्वेक्षण के बाद एग्जिट पोल के जो निष्कर्ष आए हैं वे सभी तेलंगाना में बीआरएस  सरकार की विदाई का संकेत देते हुए कांग्रेस को स्पष्ट बहुमत मिलने का दावा कर रहे हैं। और इसका सबसे बड़ा जो कारण बताया जा रहा है कि हैदराबाद महानगर में ओवैसी के आभामंडल के अलावा अन्य शहरों , कस्बों और गांवों में फैले मुसलमानों के बीच कांग्रेस का ये नारा असर कर गया कि भाजपा के दो यार - ओवैसी और केसीआर । यद्यपि भाजपा गलत फैसले करने के कारण मुकाबले में पूरी तरह नजर नहीं आई किंतु प्रधानमंत्री के इस बयान से कि श्री राव उनके पास एनडीए में शामिल होने आए थे किंतु उन्होंने मना कर दिया , भाजपा को तो लाभ हुआ नहीं किंतु बीआरएस मुसलमानों की नजर में गिर गई जिसका  फायदा कांग्रेस को मिला । हालांकि ये मान लेना जल्दबाजी होगी कि एग्जिट पोल ही परिणाम है किंतु इतना तो तय है कि तमाम जनकल्याणकारी योजनाओं के अलावा मुस्लिम तुष्टिकरण  के तमाम फैसलों के बावजूद श्री राव 2018 वाला जादू कायम रखने में विफल प्रतीत हो रहे हैं तो उसका कारण मुसलमानों का कांग्रेस पर मेहरबान होना है। यदि ऐसा वाकई होता है और तेलंगाना में तमाम अनुमानों के मुताबिक कांग्रेस सत्ता हथिया लेती है तब ये राष्ट्रीय राजनीति में बड़े बदलाव का कारण बने बिना नहीं रहेगा। विशेष रूप से उ.प्र, बिहार और प.बंगाल में क्रमशः अखिलेश यादव , लालू और नीतीश के अलावा ममता बैनर्जी के लिए चिंता के कारण उत्पन्न हो जाएंगे। सबसे बड़ी बात ये होगी कि इंडिया नामक गठबंधन में कांग्रेस हावी होने की स्थिति में आ जाएगी । महाराष्ट्र में शरद पवार की राजनीति भी काफी हद तक मुस्लिम मतों पर टिकी हुई है जो इस बदलाव से कमजोर हो सकती है। कुल मिलाकर ये मान लेना गलत न होगा कि यदि तेलंगाना कांग्रेस के कब्जे में आता है तो इसका साफ मतलब होगा कि बाबरी ढांचा  गिरने के बाद जो मुसलमान  उससे दूर चले गए थे वे भाजपा के बढ़ते प्रभुत्व से घबराकर वापस  लौट रहे हैं। और ऐसा होने से अल्पसंख्यकों के बल पर राजनीति करने वाली अनेक तीसरी ताकतें घुटनों के बल आने मजबूर हो जाएंगी। ये बदलाव कांग्रेस को कितना लाभ पहुंचा सकेगा वह तो बाद में ही पता चलेगा लेकिन इसका जवाबी असर हिंदुओं के ध्रुवीकरण के तौर पर किस मात्रा में होता है ये देखने वाली बात होगी क्योंकि हिंदुत्व का झंडा उठाकर घूमने के बाद भी भाजपा को सभी राज्यों में हिंदुओं का उतना  समर्थन प्राप्त नहीं हो पाता जितना मुस्लिम उसका विरोध करते हैं। ऐसा लगता है कांग्रेस  ने काफी सोच - समझकर मुसलमानों को बाकी गैर भाजपाई पार्टियों के शिकंजे से मुक्त करवाने की जो रणनीति कर्नाटक के बाद तेलंगाना में भी अपनाई वह फिलहाल तो काम करती दिख रही है।  लोकसभा चुनाव  के लिए जो इंडिया गठबंधन बना है उसके घटक दल कांग्रेस के इस पैंतरे पर क्या रुख अपनाते हैं ये उत्सुकता का विषय है।

- रवीन्द्र वाजपेयी



Friday, 1 December 2023

नींद तो एग्जिट पोल करने वालों को भी नहीं आएगी


पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के जो एग्जिट पोल गत दिवस जारी हुए उनमें कुछ तो चुनाव पूर्व सर्वेक्षण से मेल खाते हैं वहीं कुछ में थोड़ा तो कुछ में काफी अंतर है। एग्जिट पोल करने वाली संस्थाएं भी 3 फीसदी  घट - बढ़ की संभावना व्यक्त करती हैं। ऐसे में जहां मुकाबला नजदीकी होता है वहां उलटफेर देखने मिलता है परंतु जीत हार के बीच लंबा अंतर वाले अनुमान काफी हद तक सही होते हैं।  हमारे देश में चुनाव पूर्व सर्वेक्षण सबसे पहले 1984 के लोकसभा चुनाव में प्रणय रॉय और विनोद दुआ द्वारा शुरू किया गया था। उसके बाद इसका चलन बढ़ा । बाजारवाद के आगमन के साथ ही अनेक सर्वेक्षण संस्थान   ग्राहकों की  पसंद - नापसंद  पता कर  उत्पादक को देने लगे जिससे वे अपनी विक्रय रणनीति तय करते हैं। गुणवत्ता में सुधार हेतु भी सर्वेक्षण का उपयोग किया जाने लगा है। धीरे - धीरे  राजनीतिक दल भी सर्वेक्षण के जरिए मतदाताओं के मन को पढ़ने का प्रयास करने लगे । आजकल प्रत्याशी चयन के अलावा चुनावी वायदे भी सर्वेक्षण के जरिए तय किए जाते हैं। अनेक पत्र - पत्रिकाएं और टीवी चैनल समय - समय पर देश का मूड जानने के लिए सर्वेक्षण करवाकर उसे प्रचारित करते हैं जिनमें सरकार के प्रति जनमानस की सोच उजागर होती है। ये सब देखते हुए सर्वेक्षण एक बड़े व्यवसाय के तौर पर स्थापित हुआ है। हालांकि चुनाव पूर्व सर्वेक्षण की उपयोगिता तो समझ में आती है किंतु  एग्जिट पोल के  औचित्य पर ये कहकर सवालिया निशान लगाए जाते हैं कि मतगणना के पहले अंदाजिया घोड़े दौड़ाने से हासिल क्या होता है? इसके जवाब में कहा जाता है कि जहां एक से अधिक चरणों में मतदान होता है वहां राजनीतिक दल हर चरण के बाद एग्जिट पोल से मिले संकेतों के मुताबिक अपनी रणनीति निर्धारित करते हैं। लेकिन कल जो एग्जिट पोल आए वे  केवल बुद्धिविलास का विषय हैं । दरअसल , उनके जरिए सर्वेक्षण करने वाली एजेंसियां अपनी कार्यकुशलता प्रमाणित करती हैं। मसलन जिसका एग्जिट पोल  परिणाम के जितने नजदीक होगा उसका व्यवसाय और बढ़ेगा । उस दृष्टि से देखें तो जो निष्कर्ष कल  जारी हुए उनमें कुछ  अनुमान एक दूसरे का समर्थन करते हैं तो कुछ में काफी अंतर है। लेकिन जिन दो - तीन  एजेंसियों की साख अच्छी है उनके एग्जिट पोल पर भरोसा करें तो छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की बढ़त स्पष्ट है। उसी तरह तेलंगाना  केसीआर के हाथ से खिसकता दिख रहा है। राजस्थान पर जहां भारी अनिश्चितता है वहीं म.प्र में भाजपा आसानी से बहुमत हासिल कर लेगी । यद्यपि वह जितना बड़ा दर्शाया गया है उसे लेकर आश्चर्य व्यक्त किया जा रहा है। हालांकि म.प्र में  भाजपा को भारी सफलता मिलती है तो ये उन चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों को झुठलाने वाला होगा जिनमें  बेहद करीबी टक्कर के बावजूद कांग्रेस का पलड़ा भारी बताया गया था। इसी तरह राजस्थान में सभी सर्वेक्षण भाजपा की जीत को निश्चित बता रहे थे किंतु एग्जिट पोल के मुताबिक कांग्रेस  दौड़ से पूरी तरह बाहर नहीं हुई है। मिजोरम  चूंकि राष्ट्रीय राजनीति की मुख्य धारा से अलग है इसलिए लोगों की उसके बारे में ज्यादा रुचि नहीं है किंतु तेलंगाना के अनुमान जरूर चौंकाने वाले हैं  क्योंकि के .सी . रेड्डी की बीआरएस नामक क्षेत्रीय पार्टी को 2018 में भारी बहुमत हासिल हुआ था।  ऐसे में  कांग्रेस को बड़ी सफलता मिलने से श्री रेड्डी का भविष्य  खतरे में पड़ जाएगा जो कांग्रेस और भाजपा दोनों के निशाने पर हैं। छत्तीसगढ़ में  एकाध एग्जिट पोल ही  भाजपा को बहुमत दे रहा है जबकि ज्यादातर में  वह 2018 के प्रदर्शन से काफी बेहतर प्रदर्शन करने जा रही है और ऐसे में  बहुमत के जादुई आंकड़े को स्पर्श कर ले तो वह सबसे बड़ा उलटफेर होगा। ढेर सारे  एग्जिट पोल चूंकि अलग - अलग निष्कर्ष दे रहे हैं इसलिए असमंजस और बढ़ गया है। मसलन म.प्र में कांग्रेस जहां अपनी हार स्वीकार नहीं कर रही वहीं राजस्थान को लेकर भाजपा का भी कहना है कि चुनाव पूर्व सर्वेक्षण में उसकी सरकार बनने का जो अनुमान था वही नतीजे में परिलक्षित होगा। दो दिन बाद दोपहर तक स्थिति पूरी तरह साफ हो जाएगी। तब तक एग्जिट पोल को लेकर चर्चाओं का बाजार गर्म रहेगा। वैसे जो संकेत मोटे तौर पर मिल रहे हैं उनके अनुसार तेलंगाना को छोड़कर तीनों मुख्य राज्यों में राजनीति भाजपा और कांग्रेस के बीच दो ध्रुवीय होती दिख रही है। लेकिन म.प्र, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में कांग्रेस का प्रदर्शन उसकी उम्मीदों के अनुसार नहीं रहा तब सपा और आम आदमी पार्टी को उस पर हावी होने का मौका मिल जायेगा जिनके साथ गठबंधन करने से कांग्रेस ने साफ मना कर दिया था। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा ने  म.प्र बचा लिया और राजस्थान कांग्रेस से छीन लिया तो उसका उत्साह बढ़ जाएगा । वहीं तेलंगाना और छत्तीसगढ़ जीतकर भी कांग्रेस भविष्य के प्रति आश्वस्त नहीं हो सकेगी और इंडिया गठबंधन के सहयोगी दल उस पर दबाव बनाने में जुट जाएंगे। के. सी.रेड्डी यदि अपनी गद्दी गंवा बैठे तो वे तीसरा मोर्चा बनाने की कवायद में जुटे बिना नहीं रहेंगे। 3 दिसंबर की शाम तक  पांचों राज्यों की स्थिति स्पष्ट होने तक अनुमानों के घोड़े दौड़ते रहेंगे। नींद तो एग्जिट पोल करने वाली एजेंसियों को भी नहीं आएगी क्योंकि उनकी विश्वसनीयता भी तो कसौटी पर है।


- रवीन्द्र वाजपेयी