Monday, 11 December 2023

जहां हुए बलिदान मुखर्जी.....



सर्वोच्च न्यायालय द्वारा धारा 370 हटाए जाने को संविधान सम्मत ठहराए जाने से एक देश दो विधान जैसी विसंगति एक अंतिम संस्कार हो गया। ये राष्ट्रवाद की पोषक ताकतों की बड़ी जीत  तथा कश्मीर की आजादी के नाम पर देश को तोड़ने का षडयंत्र रचने वाली टुकड़े - टुकड़े गैंग की जोरदार पराजय है।

आखिरकार 70 साल बाद डा.मुखर्जी का बलिदान सार्थक हुआ :-

डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी जम्मू-कश्मीर को भारत का पूर्ण और अभिन्न अंग बनाना चाहते थे। संसद में अपने भाषण में उन्होंनें धारा-370 को समाप्त करने की भी जोरदार वकालत की। अगस्त 1952 में जम्मू कश्मीर की विशाल रैली में उन्होंने अपना संकल्प व्यक्त किया था कि ''या तो मैं आपको भारतीय संविधान प्राप्त कराऊंगा या फिर इस उद्देश्य की पूर्ति के लिये अपना जीवन बलिदान कर दूंगा''। डॉ. मुखर्जी अपने संकल्प को पूरा करने के लिये 1953 में बिना परमिट लिये जम्मू-कश्मीर की यात्रा पर निकल पड़े। वहां पहुंचते ही उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। 23 जून 1953 को जेल में रहस्यमय परिस्थितियों में उनकी मृत्यु हो गयी। जेल में उनकी मृत्यु ने देश को हिलाकर रख दिया और परमिट सिस्टम समाप्त हो गया। उन्होंने कश्मीर को लेकर एक नारा दिया था,“नहीं चलेगा एक देश में दो विधान, दो प्रधान और दो निशान”

छत्तीसगढ़ में आदिवासी मुख्यमंत्री भाजपा की दूरगामी सोच का संकेत


भाजपा ने छत्तीसगढ़ में  विष्णुदेव साय को मुख्यमंत्री बनाकर उन नेताओं और राजनीतिक दलों को संदेश दे दिया  जिन्होंने पिछले कुछ समय से जाति के नाम पर समाज को विभाजित करने का खेल शुरू कर दिया था । जातीय जनगणना के मुद्दे को चुनावी वायदा बनाने वाले राहुल गांधी जैसे नेता के लिए श्री साय का चयन एक तमाचा है, जो इन दिनों ओबीसी का झुनझुना बजाते घूम रहे हैं। भाजपा द्वारा आदिवासी बहुल छत्तीसगढ़ में आदिवासी मुख्यमंत्री देना इस राज्य में ईसाई मिशनरियों और उनकी छत्रछाया में पनप रहे नक्सलियों को ये इशारा है कि अब उनसे आमने - सामने का मुकाबला करने वाली ताकत खड़ी हो गई है। हालांकि लगातार 15 साल तक भाजपा ने गैर आदिवासी डा.रमन सिंह को मुख्यमंत्री बनाए रखा । लेकिन बीते कुछ सालों के भीतर रास्वसंघ ने आदिवासी अंचलों में अपना जनाधार तेजी से बढ़ाया जिसका प्रमाण कुछ समय पहले तब मिला जब हिंदुओं का धर्मांतरण करने पहुंचे ईसाई मिशनरीज को ग्रामीण जनों ने खदेड़ दिया। सही बात तो ये है कि छत्तीसगढ़ की सबसे बड़ी समस्या धर्मांतरण और नक्सलवाद से मुक्ति पाना है। और इसीलिए संघ की पसंद के ऐसे व्यक्ति को मुख्यमंत्री बनाया गया जो आदिवासी होने के साथ ही जनाधार भी रखता हो और वैचारिक प्रतिबद्धता भी। श्री साय उस दृष्टि से बेहद उपयुक्त हैं। उनका परिवार संघ और भाजपा की विचारधारा से लंबे समय तक जुड़ा रहा है उनके पिता और वे स्वयं सांसद , विधायक और मंत्री रहे हैं। श्री साय छत्तीसगढ़ में पार्टी के अध्यक्ष भी रहे । सबसे बड़ी बात उनकी साफ - सुथरी छवि है। कहने को नवगठित छत्तीसगढ़ के पहले मुख्यमंत्री स्व .अजीत जोगी भी आदिवासी कहे जाते थे किंतु  ईसाई  होने के कारण वे  हिन्दू परंपराओं से जुड़े मूल आदिवासियों के बीच पैठ न बना सके। यही वजह रही कि उनके राज में कांग्रेस का जनाधार खिसकता चला गया। अंततः उनको भी कांग्रेस  से हटना पड़ा और उन्होंने अपनी पार्टी भी बनाई जिसे बाद में भाजपा की बी टीम कहकर कांग्रेस ने प्रचारित किया  क्योंकि उसकी वजह से कांग्रेस के वोट बंटने का लाभ भाजपा को मिलता रहा। 2018 में भाजपा के विरुद्ध सत्ता विरोधी रुझान चरम पर जा पहुंचा और कांग्रेस भारी बहुमत के साथ सत्ता में आ गई। लेकिन उससे यहीं चूक हो गई और उसने भूपेश बघेल को सत्ता में बिठा दिया जो पिछड़ी जाति के हैं।  कांग्रेस यह भूल गई कि उसे बस्तर के आदिवासी इलाकों से जबर्दस्त सफलता मिली थी । यद्यपि श्री बघेल ने भाजपा से हिंदुत्व का मुद्दा छीनने का जबरदस्त प्रयास किया जिसके कारण वे पूरे देश में ये माहौल बनाने में सफल हुए कि छत्तीसगढ़ में भाजपा की वापसी असंभव है। जिस तरह की  योजनाएं उनके द्वारा  लागू की गईं उनका विरोध करना भाजपा के लिए भी संभव नहीं था किंतु श्री बघेल जरूरत से ज्यादा आत्ममुग्ध हो गए और पार्टी संगठन पर भी पूरा कब्जा कर लिया। कांग्रेस हाईकमान ने भी उनको कुछ ज्यादा ही महत्व दिया जिसके चलते टी. एस.सिंहदेव को ढाई साल बाद मुख्यमंत्री बनाए जाने का वायदा रद्दी की टोकरी में फेंक दिया गया। इसके कारण कांग्रेस ऊपर से तो मजबूत नजर आती रही किंतु भीतर से उसकी जड़ें कमजोर होने लगीं। और जब सनातन के विरोध का मुद्दा उठा तब पार्टी ने जिस तरह का गैर जिम्मेदाराना आचरण किया उसने श्री बघेल की हिंदुत्व समर्थक छवि को नुकसान पहुंचाया । बची - खुची कसर पूरी कर दी उनके पिता द्वारा सनातन धर्म विरोधी बयान देकर जिसका प्रतिवाद न मुख्यमंत्री कर सके और न ही कांग्रेस पार्टी। यही कारण रहा कि चुनाव शुरू होने के काफी समय बाद तक कांग्रेस का  मजबूत किला मनाकर जिस  छत्तीसगढ़ को भाजपा के लिए अपराजेय माना जाने लगा था , उसने कांग्रेस को पूरी तरह नकार दिया। शहरी क्षेत्रों के साथ ही सरगुजा और बस्तर जैसे आदिवासी वर्चस्व वाले इलाकों में भी भाजपा को जो जबरदस्त समर्थन मिला उसने उन राजनीतिक विश्लेषकों को भी चौंका दिया जो मतगणना की सुबह तक कांग्रेस सरकार की वापसी सुनिश्चित बता रहे थे। इसमें दो मत नहीं है कि म.प्र,  और राजस्थान में कांग्रेस की विजय को लेकर शंकाएं थीं किंतु छत्तीसगढ़ में तो ज्यादातर भाजपाई ही अपनी जीत के प्रति नाउम्मीद थे। लेकिन रास्वसंघ की जमीनी मेहनत और भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व की आत्मविश्वास भरी व्यूह रचना ने चमत्कार कर दिखाया । अमित शाह ने तो श्री साय के चुनाव प्रचार के दौरान ही मतदाताओं से कहा था कि वे उनको जिता दें तो बड़ा आदमी बनाने के जिम्मेदारी मेरी है। इसका संकेत साफ था कि भाजपा आदिवासी मुख्यमंत्री बनाएगी जबकि कांग्रेस भूपेश बघेल के आभामंडल को ही जीत का नुस्खा मानकर आत्ममुग्ध बनी रही। श्री साय का मुख्यमंत्री बनना भाजपा की दूरगामी राजनीति का संकेत है जिसका प्रभाव झारखंड , बिहार , म.प्र और उड़ीसा के आदिवासी अंचलों में पड़े बिना नहीं रहेगा। इसके जरिए जातीय जनगणना  की पैरोकार कांग्रेस सहित अन्य विपक्षी पार्टियों को भाजपा ने ये बता  दिया कि सोशल इंजीनियरिंग की राजनीति में वह उन सबसे ज्यादा सिद्धहस्त है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 9 December 2023

हर छापे पर हल्ला मचाने वाली कांग्रेस इस मामले में खामोश क्यों


झारखंड से कांग्रेस के राज्यसभा सदस्य और उड़ीसा के बड़े शराब व्यापारी धीरज साहू के  विभिन्न ठिकानों पर  पड़े आयकर के छापों में  अब तक 300 करोड़ रुपए नगद प्राप्त हो चुके हैं। ये गिनती कहां जाकर रुकेगी कहना मुश्किल है। संभवतः आयकर छापों में मिली नगदी की ये सबसे बड़ी राशि है। इसके पूर्व प.बंगाल के एक मंत्री और कन्नौज के इत्र व्यापारी के यहां पड़े छापे में भी बड़े पैमाने पर नगदी जप्त की गई थी। पिछले कुछ वर्षों में केंद्र सरकार पर ये आरोप लगाए जाते रहे हैं कि वह आयकर , सीबीआई और ईडी जैसे विभागों का इस्तेमाल विपक्ष को डराने के लिए करती है। इस बारे में ये कहना गलत नहीं है कि मोदी सरकार के राज में विपक्षी नेताओं के अलावा अनेक ऐसे लोगों के यहां  छापे पड़े जिनको विपक्ष के नजदीक माना जाता है। छत्तीसगढ़  विधानसभा चुनाव के पूर्व भी ईडी ने वहां छापेमारी की। महाराष्ट्र में शिवसेना नेता संजय राउत सहित उद्धव ठाकरे सरकार के दो मंत्री भी जेल जा चुके हैं।  दिल्ली सरकार के दो मंत्रियों सहित उसके राज्यसभा सदस्य संजय सिंह भी जेल में हैं। संदर्भित प्रकरण में जिस मात्रा में नगदी बरामद हुई वह निश्चित रूप से काला धन ही है। लेकिन ऐसे छापों को लेकर सरकार पर हमला करने वाली कांग्रेस  जिस तरह से मौन साधकर बैठी है उससे उसका अपराध बोध उजागर होता है। जो जानकारी आ रही है उसके अनुसार अभी नोट गिनने में जांच एजेंसी को दो - तीन दिन और लगेंगे। इस छापे का अंतिम परिणाम क्या होगा ये तो बाद में पता चलेगा किंतु किसी भी व्यवसायी के पास इतनी बड़ी रकम होने से साधारण बुद्धि वाला भी ये मानेगा कि यह वैध कमाई  नहीं है। शराब व्यवसाय में तो वैसे भी काली कमाई की बड़ी भूमिका रहती है। राजनीतिक पार्टी को चंदा देने वालों में शराब माफिया सबसे आगे रहता है। कांग्रेस द्वारा श्री साहू को राज्यसभा की सदस्यता प्रदान करना  इस बात को दर्शाता है कि वह पार्टी को आर्थिक संसाधन उपलब्ध कराता रहा होगा। यद्यपि शराब व्यवसायी को राज्यसभा में भेजने का ये पहला उदाहरण नहीं है । विजय माल्या ने राज्यसभा की सीट हासिल करने के लिए निर्दलीय के साथ भाजपा विधायकों तक को खरीद लिया था। अनेक उद्योगपति और बड़े वकील राजनीतिक दलों के सदस्य न होते हुए भी राज्यसभा की सीट पा जाते हैं। कपिल सिब्बल कांग्रेस छोड़ने के बाद समाजवादी पार्टी की मदद से राज्यसभा में आ गए किंतु वे उसके सदस्य नहीं हैं। स्व.राम जेठमलानी और स्व.राहुल बजाज को शिवसेना ने संसद के उच्च सदन की सदस्यता प्रदान की। लेकिन  श्री साहू  को संसद में भेजने का संकेत साफ है । हमारे देश की चुनावी व्यवस्था में काले धन की भूमिका लगातार बढ़ती जा रही है। सोचने वाली बात ये है कि श्री साहू जैसे व्यवसायियों के पास अरबों रुपए इस तरह रखे रहते हों तो इस बात का अंदाज लगाया जा सकता है कि वे सांसद बनने के लिए संबंधित राजनीतिक पार्टी  को कितना धन देते होंगे। अनेक शराब और खनिज व्यवसायी राजनीतिक दलों से बाकायदा टिकिट हासिल कर विधानसभा और लोकसभा चुनाव लड़कर जीतकर सदन में बैठते हैं। कुछ तो मंत्री भी बन जाते हैं। चूंकि चुनाव में धन की भूमिका बढ़ती ही जा रही है इसलिए इस प्रकार के लोगों की मदद चाहे - अनचाहे राजनीतिक दलों को लेनी पड़ती है। श्री साहू के यहां बड़ी मात्रा में नगदी बरामद होने से ये आशंका भी बढ़ रही है कि या तो शराब व्यवसाय के अलावा  उनके पास और भी काले धंधे हैं या फिर ये रकम किसी राजनेता के जरिए उनके पास जमा की गई होगी जिसका उपयोग लोकसभा चुनाव में किया जाने वाला हो। उल्लेखनीय है आम आदमी पार्टी पर भी ये आरोप है कि दिल्ली में नई शराब नीति के जरिए उसने गोवा और पंजाब चुनाव के लिए धन जुटाया था। सही बात तो ये है कि लगभग सभी राजनीतिक दल अवैध तरीकों से धन कमाने वाले तत्वों से चंदा लेते हैं । शराब और खनन माफिया तो राजनीतिक बिरादरी का अभिन्न हिस्सा है। उस दृष्टि से धीरज साहू तो महज बानगी है। यदि पूरे देश पर नजर डालें तो उस जैसे दर्जनों कारोबारी मिल जाएंगे जो अपनी काली कमाई से राजनीतिक पार्टियों को उपकृत करने में आगे रहते हैं। जाहिर है ये उपकार निःस्वार्थ नहीं होता। उसके बदले वे क्या हासिल करते हैं ये किसी से छिपा नहीं है। गत दिवस तृणमूल कांग्रेस की लोकसभा सदस्य महुआ मोइत्रा की सदस्यता भी जिस कारण गई उसके पीछे भी एक उद्योगपति से उनके संबंध ही थे जिन्हें उन्होंने    संसद की वेबसाइट का पासवर्ड दे दिया था जिससे वे दुबई में बैठे - बैठे उनके नाम से प्रश्न लोकसभा सचिवालय भेजा करते थे। कुल मिलाकर श्री साहू के यहां पड़े छापे ने एक बार फिर राजनीतिक दलों और काले धंधों वालों का संबंध उजागर कर दिया है।  हर छापे के बाद केंद्र सरकार पर हमले करने वाली कांग्रेस इस मामले में जिस तरह शांत है उससे भी बहुत कुछ जाहिर हो रहा है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 8 December 2023

तीन राज्य हार जाने से इंडिया गठबंधन में कांग्रेस की वजनदारी घटी




ऐसा लगता है इंडिया नामक विपक्षी गठबंधन का जन्म सही मुहूर्त में नहीं हुआ । तभी तो उसकी गाड़ी अभी से हिचकोले खाने लगी है। हाल ही में संपन्न विधानसभा चुनावों को 2024 के लोकसभा चुनाव का सेमी फाइनल माना जा रहा था। उस दृष्टि से विपक्षी एकता के लिए ये चुनाव नुकसानदेह रहे। तेलंगाना में कांग्रेस ने जिस बीआरएस से सत्ता छीनी वह  भाजपा विरोधी होने से विपक्षी ही कहलाएगी। लेकिन म.प्र, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में कांग्रेस और इंडिया गठबंधन में शामिल दलों के बीच सीटों का बंटवारा नहीं होने से भाजपा विरोधी मतों में विभाजन से कांग्रेस का नुकसान तो हुआ ही , अविश्वास की खाई और चौड़ी हो गई। सपा , आम आदमी पार्टी और जनता दल (यू) ने कांग्रेस से कुछ सीटें मांगी थीं । लेकिन उसने किसी को भाव नहीं दिया। यहां तक कि भोपाल में होने वाली इंडिया की रैली भी रद्द कर गठबंधन के सदस्य दलों से दूरी बना ली। सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव और कमलनाथ के बीच तो तीखी टिप्पणियों का आदान - प्रदान भी चला। उक्त तीनों राज्यों में कांग्रेस बुरी तरह हारी जिसके बाद  गठबंधन में शामिल ज्यादातर दलों ने उसे अहंकारी तक बता डाला। यही नहीं तो 6 दिसंबर को गठबंधन के सदस्यों की जो बैठक श्री खरगे ने आमंत्रित की थी उसमें आने से भी विपक्ष के ज्यादातर दिग्गजों ने इंकार कर दिया। उनका कहना था कि बैठक की तिथि तय करने से पहले किसी से सलाह नहीं ली गई । उसके बाद बैठक टालनी पड़ी जिससे कांग्रेस की जमकर किरकिरी हुई। बाद में पता चला कि राहुल गांधी को चूंकि 8 दिसंबर को विदेश यात्रा पर निकलना है इसलिए बैठक 6 तारीख को रख ली गई। अनेक नेताओं ने श्री गांधी की विदेश यात्राओं पर भी सवाल दागे। अगली बैठक कब और कहां होगी ये निश्चित नहीं है। कांग्रेस इसे लेकर बेहद चौकन्नी है क्योंकि अगली बैठक में गठबंधन के संयोजक का नाम तय होने के साथ ही लोकसभा चुनाव में सीटों के बंटवारे का फार्मूला तय किया जाना है। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पहले दिन से संयोजक बनने के लिए लालायित हैं । लेकिन शिवसेना के प्रवक्ता संजय राउत ने उद्धव ठाकरे का नाम उछालकर खींचातानी और बढ़ा दी। शरद पवार भी अपनी पार्टी में हुई  टूटन से उबर नहीं पा रहे। उधर ममता बैनर्जी प.बंगाल में कांग्रेस और वामपंथी गठबंधन के लिए लोकसभा सीट छोड़ने के बारे में पहले से ही नकारात्मक रवैया दिखाती आई हैं। यही हालात केरल के हैं जहां वाममोर्चा और कांग्रेस एक दूसरे के विरुद्ध तलवारें भांजते रहते हैं। उत्तर भारतीय राज्यों में  इंडिया गठबंधन के अनेक घटक दल मजबूत स्थिति में होने से कांग्रेस को उपकृत करने से हिचक रहे हैं। म.प्र में कमलनाथ और अखिलेश यादव के बीच चले शब्द बाणों के  दौरान ही श्री यादव  उ.प्र में लोकसभा सीटों के बंटवारे को लेकर कांग्रेस से वैसा ही व्यवहार किए जाने की धमकी दे चुके हैं। यहां तक कि उ.प्र कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय के प्रति  चिरकुट जैसा शब्द तक उनके द्वारा प्रयोग किया गया। पांच राज्यों के चुनाव के बाद इंडिया गठबंधन के सदस्य कांग्रेस पर दबाव बनाने में जुट गए हैं । जिस तरह की बयानबाजी हो रही है उसे देखते हुए कहा जा सकता है कि 2024 में भाजपा को रोकने के लिए विपक्ष इंडिया गठबंधन के बैनर तले एकत्रित तो होना चाहता है लेकिन ज्यादातर पार्टियां कांग्रेस के वर्चस्व को स्वीकार करने के प्रति अनिच्छुक हैं । ऊपर से आए दिन आने वाले गैर जिम्मेदाराना बयान भी इस गठबंधन के भविष्य को संकट में डाल देते हैं। मसलन संसद में एक द्रमुक सांसद ने उत्तर भारत को गौमूत्र राज्य कहकर उनका उपहास किया। जबरदस्त विरोध के बाद उन्होंने अपने बयान को वापस लेते हुए माफी भी मांगी । लेकिन उसके पीछे स्वेच्छा न होकर तमिलनाडु के मुख्यमंत्री स्टालिन की समझाइश थी जो अपने बेटे के सनातन संबंधी बयान के कारण उत्तर भारत में घृणा का पात्र बने हुए हैं। ये विवाद ठंडा भी नहीं हुआ था कि तेलंगाना के नए मुख्यमंत्री कांग्रेस नेता रेवंत रेड्डी ने निवर्तमान मुख्यमंत्री के. सी.राव को बिहार से जोड़ते हुए उन्हें कुर्मी बताकर टिप्पणी की कि तेलंगाना का डी.एन.ए बिहार से बेहतर है। उक्त बयान आए दो दिन बीत गए किंतु कांग्रेस ने उस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। जाहिर है बिहार से तेलंगाना का डी.एन.ए बेहतर होने संबंधी बयान पर कांग्रेस और नीतीश के बीच नाराजगी और बढ़ सकती है। सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि 3 दिसंबर के बाद  राहुल गांधी और प्रियंका वाड्रा ने मौन साध रखा है। सही बात तो ये है कि उनके पास बोलने के लिए कुछ है ही नहीं। भाजपा के हमलों को झेलना तो ठीक किंतु इंडिया गठबंधन के घटक दलों के नेताओं द्वारा कांग्रेस पर जो आक्रमण किए जा रहे हैं ,  उनका निशाना दरअसल राहुल ही हैं। घटक दल कांग्रेस को जिस प्रकार घेरने लगे हैं उससे ऐसा लगता है संयोजक पद और सीटों के बंटवारे को लेकर होने वाली बैठक में जबरदस्त खींचातानी होगी। वैसे भी सनातन  और डी. एन.ए जैसे मुद्दों पर कांग्रेस की खामोशी उसके लिए मुसीबत का कारण बन गई है। हिन्दी पट्टी के तीन प्रमुख राज्य हार जाने के बाद उसके भाव वैसे भी गिरे हुए हैं।

- रवीन्द्र वाजपेयी 

Thursday, 7 December 2023

म.प्र में दिग्विजय - कमलनाथ का युग खत्म : कांग्रेस में नए नेतृत्व का अभाव



म.प्र देश का वह राज्य है जहां राजनीति पूरी तरह दो ध्रुवीय हो चुकी है। एक जमाना था जब जनसंघ के अलावा समाजवादी और साम्यवादी विचारधारा के भी कुछ गढ़ थे। अनेक निर्दलीय विधायकों ने भी लंबे समय तक प्रदेश की राजनीति को प्रभावित किया। 1968 में बनी संविद सरकार बहुदलीय राजनीति का ही उदाहरण था। बाद में 1977 में जनता पार्टी की सरकार में भी जनसंघ और  समाजवादी विचारधारा के लोग शामिल हुए। लेकिन उस पार्टी के टूटने और जनसंघ का भाजपा के रूप में पुनर्जन्म होने के पश्चात समाजवादी खेमा बिखराव का शिकार हुआ और धीरे - धीरे उसका अस्तित्व केवल कागजों तक सीमित हो गया। यही हाल दलित राजनीति की प्रतिनिधि बसपा का देखने मिला । आदिवासियों के बीच गोंडवाना गणतंत्र पार्टी और जयस जैसे संगठन उभरे किंतु एक - दो चुनाव में  ताकत दिखाने के बाद  वोट कटवा बनकर रह गए। हाल ही में संपन्न विधानसभा चुनाव के बाद जो परिदृश्य उभरा उससे साफ हो गया कि प्रदेश के मतदाताओं ने तीसरी ताकत को पूरी तरह तिरस्कृत कर दिया। 2018 में सपा , बसपा और निर्दलीय मिलाकर  अन्य की संख्या 7 थी जबकि इस चुनाव में भारत आदिवासी पार्टी नामक नए उभरे दल का एक उम्मीदवार जीता और 229 सीटों में 163 भाजपा तथा 66 कांग्रेस को मिल गईं। इसके बाद से अब भविष्य के चुनावों के मद्देनजर ये कहा जा सकता है कि जनता तीसरी ताकत को भाव देने के पक्ष में नहीं है। सिंगरौली में आम आदमी पार्टी की रानी अग्रवाल के महापौर चुने जाने के बाद उसके उदय के दावे होने लगे थे किंतु विधानसभा चुनाव में वे चौथे स्थान पर आईं। इससे लगता है लोकसभा चुनाव में भी प्रदेश के मतदाता भाजपा और कांग्रेस में से ही चयन करेंगे। ये देखते हुए विधानसभा चुनाव के ताजा परिणाम के बाद कांग्रेस के भविष्य पर पूरे प्रदेश की निगाहें लगी है। 2019 में कमलनाथ की सरकार होने के बाद भी भाजपा ने छिंदवाड़ा छोड़कर सभी 28 लोकसभा सीटें जीत लीं थीं। यहां तक कि गुना से ज्योतिरादित्य सिंधिया और भोपाल से दिग्विजय सिंह जैसे दिग्गज बुरी तरह परास्त हुए। बाद में श्री सिंधिया ने भाजपा में शामिल होकर उस सरकार को चलता किया। लेकिन मुख्यमंत्री पद से हटने के बाद भी कमलनाथ प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष बने रहे। और पूरा संगठन उनके इशारों पर नाचता रहा। चुनाव संचालन का हर कार्य उनके निर्देशन में हुआ। ये कहने में कुछ भी गलत न होगा कि उनको दिग्विजय सिंह का पूरा साथ मिला जो श्री नाथ को बड़ा भाई कहते आए हैं । हालांकि 2018 के पहले तक दोनों के बीच ये अघोषित समझौता था कि श्री सिंह जहां प्रदेश की राजनीति चलाएंगे वहीं कमलनाथ राष्ट्रीय राजनीति में सक्रिय रहेंगे। चूंकि दिग्विजय की छवि हिंदू विरोधी बन गई इसलिए कांग्रेस ने 2018 में श्री सिंधिया को बतौर मुख्यमंत्री पेश किया जिसका लाभ भी हुआ किंतु दिग्विजय एक बार फिर सिंधिया परिवार और मुख्यमंत्री पद के बीच आ गए और श्री नाथ की ताजपोशी करवा दी । उससे खिन्न ज्योतिरादित्य ने बगावत कर दी । सरकार चली जाने के बाद से श्री नाथ  म.प्र में पूरा समय देकर 2023 के चुनाव के लिए तैयारियां करते रहे और बतौर मुख्यमंत्री वे पार्टी के निर्विवाद चेहरे बने। दिग्विजय भी पूरी तरह उनके साथ थे,  लेकिन 3 दिसंबर को जो नतीजे आए उनमें कांग्रेस की लुटिया पूरी तरह डूब गई। छिंदवाड़ा छोड़ बाकी जिलों में उसका सूपड़ा साफ हो गया। अपराजेय कहे जाने वाले  बड़े - बड़े कांग्रेसी दिग्गज हार गए। नेता प्रतिपक्ष गोविंद सिंह के अलावा दिग्विजय सिंह के अनुज और भतीजे भी पराजय का शिकार बने। 2003 , 2008 और 2013 में भी कांग्रेस हारी थी किंतु तब उसके पास श्री सिंह , श्री नाथ और श्री सिंधिया के अलावा भी अनेक युवा चेहरे थे जिनकी जड़ें प्रदेश की राजनीति में गहराई तक जम चुकी थीं। लेकिन बीते पांच साल में कमलनाथ ने एक - एक कर सबको किनारे लगा दिया। यहां तक कि  दिग्विजय सिंह को कमजोर करने में भी पीछे नहीं रहे। यही वजह है कि आज कांग्रेस के पास कोई भी ऐसा नेता नहीं है जो पार्टी को इस दुर्दशा से बाहर लाने में सक्षम हो। अजय सिंह राहल जैसे कुछ छत्रप जीतकर विधानसभा में आए जरूर किंतु वे अतीत में भी विफल साबित हो चुके हैं। यहां तक कि विंध्य अंचल में भी उनका वैसा प्रभाव नहीं रहा जैसा उनके स्वर्गीय पिता अर्जुन सिंह का था। यही स्थिति दूसरी पंक्ति के पार्टी नेताओं की है। इस सबके कारण म.प्र में कांग्रेस के पास वैकल्पिक नेतृत्व का अभाव हो गया है। गत दिवस कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष ने कमलनाथ से म.प्र में पराजय के कारणों के साथ ही नए प्रदेश अध्यक्ष के लिए नाम पूछे। हालांकि अभी तक श्री नाथ ने पद नहीं छोड़ा लेकिन उनके सामने भी समस्या है कि वे अपने उत्तराधिकारी के तौर पर किसका नाम आगे बढ़ाएं ? इस विधानसभा चुनाव के बाद कांग्रेस में दिग्विजय सिंह और कमलनाथ का  युग समाप्त हो गया है। लोकसभा चुनाव के पूर्व कांग्रेस को नया नेतृत्व मिलने की संभावना है । लेकिन इन दोनों ने पार्टी को इतनी खराब स्थिति में लाकर खड़ा कर दिया कि उसके लिए लोकसभा के लिए मजबूत उम्मीदवार ढूढ़ना कठिन हो गया है।

- रवीन्द्र वाजपेयी 


Wednesday, 6 December 2023

ईवीएम पर ठीकरा फोड़ने से दूर नहीं होगी कांग्रेस की दुर्दशा


तीन राज्यों के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की  पराजय का विश्लेषण सभी अपने - अपने तरीके से कर रहे हैं। म.प्र में तो शिवराज सरकार की लाड़ली बहना योजना को भाजपा की जीत का कारण बताया जा रहा है किंतु छत्तीसगढ़ और राजस्थान में कांग्रेस वैसी ही योजनाएं लागू करने के बाद भी  हार गई । इन परिणामों ने ये साबित कर दिया कि उत्तर भारतीय राज्यों में कांग्रेस का जनाधार तेजी से सिमट रहा है। राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा भी म.प्र और राजस्थान के जिन अंचलों से गुजरी , उनमें कांग्रेस का  सफाया हो गया। इंडिया गठबंधन में शामिल अन्य विपक्षी पार्टियां कांग्रेस के अहंकार को इस पराजय के लिए जिम्मेदार बता रही हैं। कुल मिलाकर ये कहना गलत नहीं होगा कि मतदाताओं ने राजस्थान और छत्तीसगढ़ में  कांग्रेस की मुफ्त योजनाओं को ठुकराकर भी भाजपा को अपना समर्थन दिया। कर्मचारियों को  पुरानी पेंशन का लालच देना भी काम नहीं आया । सच ये है कि  कांग्रेस जनभावनाओं को समझ पाने में पूरी तरह असमर्थ है। कहने को तो भाजपा ने भी  प्रधानमंत्री के चेहरे को ही सामने रखा और मोदी की गारंटी के नाम पर मतदाताओं को इस बात के लिए आश्वस्त करने का प्रयास किया कि वह जो वायदे कर रही है वे पूरे होंगे। लेकिन  सबसे बड़ी बात है राष्ट्रवाद और हिंदुत्व ,  जिसका दिखावा तो कांग्रेस भी बहुत करने लगी है किंतु उसका मन साफ नहीं है। पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के बेटे द्वारा सनातन को खत्म करने वाली टिप्पणी  का समर्थन किए जाने वाले बयान पर उनसे सवाल किए जाने की हिम्मत किसी की नहीं हुई । लेकिन कमलनाथ द्वारा ये कहे जाने पर कि देश की आबादी में 82 फीसदी हिन्दू हैं तो वह हिन्दू राष्ट्र कहलाएगा ही ,  तो पार्टी के तमाम नेता उनकी आलोचना पर उतर आए।  ऐसे में कांग्रेस नेता आचार्य प्रमोद कृष्णम की ये टिप्पणी सच्चाई के काफी करीब प्रतीत होती है कि सनातन का श्राप कांग्रेस की हार का कारण बना। इस बारे में ये बात भी ध्यान देने योग्य है कि राहुल गांधी द्वारा ओबीसी को लुभाने के लिए जातीय जनगणना का को लॉलीपॉप दिखाया गया उसे भी मतदाताओं ने भाव नहीं दिया। दरअसल कांग्रेस चूंकि सत्य को स्वीकार करने का नैतिक साहस खो चुकी है इसलिए  वह इस वास्तविकता से आंखें चुरा लेती है कि गांधी परिवार का आकर्षण ढलान पर है। और इसीलिए अब उसके नेता घिसे - पिटे बहाने के तौर पर ईवीएम ( इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीन ) पर अपना गुस्सा उतारने लगे हैं। म.प्र के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह का कहना है कि जिस उपकरण में भी चिप लगी हो उससे छेड़छाड़ मुमकिन है । इसी तरह प्रदेश में  कांग्रेस की तरफ से मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार कमलनाथ भी घुमा फिराकर यही कह रहे हैं। कांग्रेस के अनेक प्रवक्ता टीवी चैनलों पर पार्टी की हार के लिए वोटिंग मशीनों में हेराफेरी का मुद्दा उठाकर मतपत्रों से चुनाव करवाए जाने की मांग दोहरा रहे हैं। लेकिन ये प्रलाप केवल उन्हीं राज्यों में सुनाई दे रहा है जिनमें कांग्रेस को पराजय झेलनी पड़ी। हिमाचल , कर्नाटक और तेलंगाना में  मिली जीत के बाद किसी भी कांग्रेसी या अन्य नेता ने ईवीएम पर शंका व्यक्त की हो ऐसा देखने में नहीं आया। दिल्ली और  पंजाब में आम आदमी पार्टी की ऐतिहासिक विजय पर भी कांग्रेस ने वोटिंग मशीन पर शक नहीं जताया। प.बंगाल के विधानसभा चुनाव में तृणमूल की आंधी में कांग्रेस और वामपंथी एक भी सीट नहीं जीत सके थे । केरल में भी हर चुनाव में सत्ता बदलने के रिवाज को तोड़ते हुए वामपंथी सरकार की वापसी पर कांग्रेस ने चुनाव प्रक्रिया पर किसी भी तरह से  ऐतराज जताया हो ये किसी ने नहीं सुना। लेकिन जब किसी चुनाव में भाजपा को जीत हासिल होती है तो कांग्रेस बलि के बकरे के तौर पर ईवीएम मशीन पर ठीकरा फोड़ने लगती है। म.प्र , छत्तीसगढ़ और राजस्थान में मतदाताओं द्वारा पूरी तरह नकारे जाने के बाद उसको चाहिए वह ईमानदारी से अपनी कमजोरियों का विश्लेषण कर उन्हें दूर करने का प्रयास करे। उसे इस बात पर भी ध्यान देना चाहिए कि इंडिया गठबंधन के अन्य घटक दल कांग्रेस की हार के जो कारण बता रहे हैं उनमें  अहंकार और क्षेत्रीय दलों की उपेक्षा मुख्य हैं। ऐसे में  बेहतर यही होगा कि कांग्रेस तीनों राज्यों में अपनी पराजय के जमीनी कारणों का  ईमानदारी से विश्लेषण कर उनमें सुधार करने के लिए आवश्यक कदम उठाते हुए जनता की आकांक्षाओं के अनुरूप आचरण करे। केवल भाजपा और मोदी को कोसने से उसके दुरावस्था दूर होने वाली नहीं है। उसे ये नहीं भूलना चाहिए कि 2004 और 2009 में उसके नेतृत्व में बनी यूपीए सरकार भी ईवीएम से निकले जनादेश का ही परिणाम थी ।


-रवीन्द्र वाजपेयी


Tuesday, 5 December 2023

विपक्षी एकता के ढांचे में दरार चौड़ी होने की आशंका


पांच  राज्यों में से मिजोरम को छोड़ भी दें तो म.प्र , छत्तीसगढ़ और राजस्थान में कांग्रेस जिस तरह औंधे मुंह गिरी उसने राहुल गांधी के  उठते हुए राजनीतिक ग्राफ को एक बार फिर ढलान की और धकेल दिया है। ऐसे में भाजपा  उनका उपहास करे तो बात समझ में भी आती है किंतु अब विपक्ष के बाकी दल भी  कांग्रेस के बहाने राहुल की खिंचाई करने में जुट गए जिससे इंडिया नामक  विपक्षी गठबंधन में बिखराव के संकेत मिलने लगे हैं। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने 6 दिसंबर को इंडिया की जो बैठक बुलाई उसमें आने से  प.बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी ने  मना कर दिया वहीं समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव भी अनिच्छुक बताए जाते हैं। इसीलिए बैठक रद्द करने की नौबत आ गई। नीतीश कुमार तो इंडिया गठबंधन की निष्क्रियता को लेकर कांग्रेस पर पहले ही शब्दबाण छोड़ते रहे हैं।  ज्यादातर विपक्षी दलों को इस बात की शिकायत है  कि हिमाचल और कर्नाटक विधानसभा चुनाव जीतने के बाद कांग्रेस विशेष रूप से राहुल का रवैया पूरी तरह बदल गया है। उत्तर भारत के तीनों राज्यों में सपा , जनता दल (यू) और आम आदमी पार्टी कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव लड़ना चाहती थीं परंतु उसने किसी को घास नहीं डाली। उल्टे कांग्रेस  विपक्षी दलों को ये एहसास करवाने में जुट गई कि भारत जोड़ो यात्रा के बाद श्री गांधी प्रधानमंत्री श्री मोदी के विकल्प के तौर पर उभरे हैं और जनता में उनकी स्वीकार्यता बढ़ी है। कर्नाटक चुनाव में पार्टी को मिली कामयाबी के बाद भाजपा विरोधी कुछ यू ट्यूबर पत्रकारों को राहुल के पक्ष में माहौल बनाने का अघोषित ठेका दे दिया गया । लेकिन म.प्र , छत्तीसगढ़ और राजस्थान में कांग्रेस की जो दुर्गति मतदाताओं ने की उसके बाद  उसकी बेरूखी झेलते आ रहे विपक्षी दल बीते दो दिनों से ऐंठते नजर आ रहे हैं। ममता ने तो साफ कह दिया कि ये भाजपा की जीत नहीं , कांग्रेस की हार है। नीतीश कुमार , अखिलेश यादव , के.सी त्यागी , अरविंद केजरीवाल सहित इंडिया गठबंधन के शेष घटक दल भी कांग्रेस की खुलकर इस बात के लिए आलोचना कर रहे हैं कि वह गठबंधन धर्म का पालन करने की बजाय एकला चलो की जो नीति अपना रही है वह  श्री मोदी को तीसरी पारी खेलने का अवसर प्रदान करने में सहायक बनेगी। एक भी विपक्षी दल ऐसा नहीं है जिसने तेलंगाना की विजय के लिए राहुल या कांग्रेस को बधाई दी हो । लेकिन तीन अन्य राज्यों में उसकी शिकस्त का मजाक उड़ाने के साथ ही आलोचनात्मक टिप्पणियों की बाढ़ जिस तरह से आई है उसे देखते  कांग्रेस  इंडिया की लगाम अपने हाथ में रखने का जो प्रयास करने लगी थी उसे जरूर धक्का लगा है। नीतीश कुमार को इस गठबंधन का जन्मदाता माना जाता है किंतु उसके संयोजक सहित अन्य नीतिगत मुद्दों पर कांग्रेस ने  जिस प्रकार से हावी होने की कोशिश की उससे बाकी पार्टियां चौकन्नी हो उठी थीं । लेकिन श्री गांधी की भारत जोड़ो यात्रा के अलावा  हिमाचल तथा कर्नाटक में कांग्रेस की  जीत के बाद उसकी वजनदारी अचानक से बढ़ने लगी। कांग्रेस थोड़ा बड़प्पन दिखाते हुए  तीन राज्यों के चुनाव में  छोटे विपक्षी दलों को भी साथ ले लेती तो भले ही  भाजपा का विजय रथ रोकना संभव न हो पाता परंतु विपक्षी एकता में दरार नहीं पड़ती और हार का जिम्मा सामूहिक होता। लेकिन कांग्रेस का केंद्रीय नेतृत्व छोटी सी बात नहीं भांप सका। दूसरी तरफ पार्टी के प्रादेशिक नेता भी अपनी ऐंठ में रहे और ये कहते हुए गठबंधन से  मुकर गए कि वह तो लोकसभा चुनाव के लिए है। उल्लेखनीय है चुनाव के पहले भोपाल में  इंडिया गठबंधन की एक संयुक्त रैली आयोजित की गई थी किंतु कमलनाथ ने इस डर से उसे रद्द करवा दिया कि कहीं कांग्रेस पर अन्य विपक्षी दलों के लिए कुछ सीटें छोड़ने का दबाव न बन जाए। बाद में जब सपा के साथ बात टूटी तब कमलनाथ ने कौन अखिलेश - वखलेश जैसी सस्ती टिप्पणी कर आग में घी डाल दिया। राहुल द्वारा श्री यादव को फुसलाने का प्रयास भी हुआ किंतु सपा अध्यक्ष ने कांग्रेस पर धोखेबाज होने का आरोप लगाते हुए म.प्र में धुआंधार प्रचार किया। राजस्थान और छत्तीसगढ़ में आम आदमी पार्टी ने भी कांग्रेस को खूब गरियाया। चुनाव परिणाम आने तक कांग्रेस  इस बात के प्रति आश्वस्त थी कि म.प्र और छत्तीसगढ़ के साथ ही तेलंगाना में भी वह जीत जाएगी और तब शायद उसे किसी से गठजोड़ की ज़रूरत ही न पड़े किंतु उसकी उम्मीदों पर पानी फिर गया और तेलंगाना में मिली शानदार जीत के बावजूद वह शेष तीनों राज्यों में मुंह के बल गिरी। ये देखते हुए तीन राज्यों में कांग्रेस की हार इंडिया गठबंधन के विघटन की शुरुआत बन जाए तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए जिसके लिए कांग्रेस का  अहंकार और राहुल गांधी सहित उनके परिवार की सामंतवादी सोच सबसे ज्यादा जिम्मेदार होगी।


- रवीन्द्र वाजपेयी