Friday, 15 December 2023

संसद में घुसने वालों के पीछे छिपी ताकतों का पर्दाफाश भी जरूरी


लोकसभा में कुछ युवकों के दर्शक दीर्घा से कूदकर सदन में आ जाने और रंगीन धुआं छोड़ने वाली स्मोक गन का उपयोग करने के बाद पूरे देश में संसद की सुरक्षा को लेकर सवाल उठ रहे हैं। इन युवकों के कुछ साथी सदन के बाहर प्रांगण में नारेबाजी के साथ रंगीन धुआं उड़ाते रहे। इस वारदात को अंजाम देने वाले सभी 6 आरोपी पुलिस की गिरफ्त में आ चुके हैं। जिन सुरक्षा कर्मियों की लापरवाही से दो युवक जूते में छिपाकर स्मोक गन दर्शक दीर्घा तक ले जा सके वे सभी निलंबित कर दिए गए।  गत दिवस संसद में इसे लेकर खूब हंगामा हुआ। विपक्ष ने गृहमंत्री अमित शाह से त्यागपत्र मांगा जो स्वाभाविक भी था।  सबसे ज्यादा उंगलियां मैसूर से  भाजपा के सांसद प्रताप सिम्हा पर उठ रही हैं जिनकी सिफारिश पर सदन में कूदे युवकों को प्रवेश पत्र जारी हुआ था। आम तौर पर सभी सांसद अपने क्षेत्र के लोगों के अलावा परिचितों को संसद की कार्रवाई देखने हेतु प्रवेश पत्र जारी करने की अनुशंसा करते हैं। लेकिन जूते के भीतर स्मोक गन छिपाकर ले जाने के लिए सुरक्षा जांच में लापरवाही ही  जिम्मेदार मानी जाएगी। बावजूद इसके श्री सिम्हा से पूछताछ होनी चाहिए और यदि ऐसा लगे कि उन्होंने प्रवेश पत्र जारी करवाने में किसी भी प्रकार की लापरवाही बरती तो उनकी सदस्यता समाप्त किए जाने के साथ ही जो भी उचित दंड हो दिया जावे  , ताकि बाकी सांसद  सतर्क हो जाएं। गृहमंत्री श्री शाह को भी घटना की विस्तृत जानकारी संसद के माध्यम से देश को देते हुए आश्वस्त करना चाहिए कि संसद की सुरक्षा में कोई कमी नहीं छोड़ी जावेगी। वारदात में शरीक सभी लोग तानाशाही नहीं चलेगी जैसे नारे लगाते हुए खुद को बेरोजगारी से त्रस्त बता रहे थे। शहीदे आजम भगतसिंह के नाम पर बने किसी संगठन से इनका जुड़ाव बताया जा रहा हैं। रोचक तथ्य ये है कि वे सभी अलग - अलग - अलग स्थानों के रहने वाले हैं और सोशल मीडिया के जरिए संपर्क में आए। लेकिन उन्होंने संसद में घुसकर हंगामा करने और स्मोक गन का उपयोग कर सनसनी फैलाने का फैसला क्यों किया ये गंभीर प्रश्न है। पकड़ी गई महिला की दिल्ली में हुए सरकार विरोधी आंदोलनों में उपस्थिति से ये संदेह व्यक्त किया जा रहा है कि उसके विपक्ष , विशेष रूप से वामपंथी संगठनों से रिश्ते हैं। अनेक विपक्षी नेताओं ने पकड़े गए लोगों को भटका हुआ बताकर बचाव भी किया और ये प्रचारित करने की कोशिश की कि बेरोजगारी से बढ़ते तनाव के कारण वे ऐसा कदम उठाने मजबूर हुए। यद्यपि ये दलील किसी के गले नहीं उतर रही क्योंकि ये युवक संसद के बाहर अर्थात जंतर - मंतर पर भी धरना - प्रदर्शन कर सकते थे। यदि उनका उद्देश्य महज चर्चाओं में आने का था तो उसके लिए वे और भी कोई उपाय तलाश सकते थे। उन सभी पर यूएपीए जैसे सख्त कानून के अंतर्गत कार्रवाई की जा रही है। लेकिन विपक्ष के कुछ नेताओं सहित वामपंथी रुझान वाले यूट्यूब चैनल चलाने वाले पत्रकारों ने उनका बचाव करते हुए इस कृत्य को  युवाओं में बढ़ते असंतोष का प्रदर्शन बताया जिससे  लगने लगा है कि ये भी शाहीन बाग जैसे किसी प्रयोग की कोशिश है जिसे कांग्रेस , वामपंथी और मुस्लिम कट्टरपंथी ताकतों का मिला जुला समर्थन था। दिल्ली में साल भर चले किसान आंदोलन के बारे में  भी  जब ये कहा गया कि उसमें खालिस्तानी तत्व घुस आए हैं तो उसे किसानों को बदनाम करने का सरकारी षडयंत्र बताया गया किंतु गणतंत्र दिवस के दिन लाल किले पर उत्पात होने और कुछ निहंगों द्वारा वहां तिरंगे वाली जगह धार्मिक ध्वज फहराए जाने के बाद  किसान नेताओं के सामने सिवाय माफी मांगने के और कोई चारा नहीं बचा। लेकिन महेंद्र सिंह टिकैत को उस घटना के पीछे भी रास्वसंघ का हाथ दिखाई दिया। जेएनयू, जामिया मिलिया , उस्मानिया , अलीगढ़ मुस्लिम और जादवपुर  विवि में भारत विरोधी नारे  , नागरिकता कानून और कृषि कानून जैसे अनेक मामलों में हुए आंदोलन को जिस योजनाबद्ध तरीके से प्रचार दिया गया उसके पीछे मोदी सरकार की छवि जनविरोधी बनाने की कार्ययोजना ही रही। हालिया विधानसभा चुनाव में भाजपा को तीन राज्यों में मिली सफलता ने कुंठित मानसिकता वाले पत्रकारों और उनके सरपरस्त विपक्षी राजनेताओं के पेट में जो मरोड़ पैदा किया उसकी प्रतिक्रिया इस तरह की वारदातों के रूप में  सामने आती रहेगी ।किसान आंदोलन के समर्थन में अमेरिका , कैनेडा और ब्रिटेन में हुए आंदोलन इसका प्रमाण थे। संसद में घुसे युवकों ने भले ही कोई हिंसा न की हो किंतु उनका अपराध राष्ट्रविरोधी कृत्य है जिसकी कड़ी सजा उनको तो मिलेगी ही किंतु इस प्रयास के पीछे जिन लोगों का दिमाग है उनकी गर्दन पर भी फंदा कसा जाना चाहिए। अफजल गुरु जैसे गद्दार से सहानुभूति रखने वाले नए - नए रूपों में  सामने आते हैं। 

-रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 14 December 2023

चुनाव तो जीत लिए लेकिन अब रेवड़ियों का इंतजाम करने में पसीने छूटेंगे



पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव सम्पन्न होने के बाद मुख्यमंत्री भी शपथ ले चुके हैं। जल्द ही मंत्रीमंडल भी आकार ले लेंगे। मिजोरम तो ज्यादा चर्चा में नहीं रहा किंतु तेलंगाना , म.प्र , छत्तीसगढ़ और राजस्थान में लोगों की उत्सुकता बनी रही। भाजपा और कांग्रेस जीत हार का विश्लेषण करने में जुटी हैं जिससे कि लोकसभा चुनाव के लिए सटीक रणनीति बनाई जा सके। इसमें दो राय नहीं हैं कि हिमाचल और कर्नाटक में मिली हार के बाद भाजपा दबाव में थी। उधर विपक्ष भी इंडिया गठबंधन के रूप में एकजुट होने लगा था। लेकिन तीन राज्यों की जीत ने भाजपा का मनोबल बढ़ा दिया है। और इसीलिए पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने मुख्यमंत्री चयन करने में सबको चौंका दिया। कांग्रेस द्वारा उक्त चारों राज्यों में जातीय जनगणना करवाए जाने का जो वायदा किया उसका उद्देश्य ओबीसी और दलितों को लुभाना था। इसीलिए तीन राज्यों में भाजपा द्वारा क्रमशः आदिवासी , ओबीसी और सवर्ण मुख्यमंत्री बनाए जाने के साथ ही जो दो - दो मुख्यमंत्री बनाए गए उनमें भी जातीय संतुलन का जबरदस्त ध्यान रखा जिसके कारण जाति की राजनीति करने वाले क्षेत्रीय दल सकते में आ गए हैं। लेकिन असली मुद्दा जो उक्त चार राज्यों में चर्चित रहा वह था मुफ्त उपहारों का ऐलान। तेलंगाना में के. सी राव की बीआरएस सत्ता में थी जबकि म.प्र में भाजपा और राजस्थान तथा छत्तीसगढ़ कांग्रेस के कब्जे में थे। इन चारों राज्यों की सरकारों ने जनकल्याण के नाम पर जिस तरह की योजनाएं और कार्यक्रम लागू कर किए उनकी वजह से सरकारी खजाने पर जबरदस्त बोझ पड़ रहा था। रही - सही कसर पूरी कर दी चुनावी वायदों ने। हालांकि चुनाव परिणामों से मिले संकेत विरोधाभासी हैं। उदाहरण के लिए म.प्र अकेला राज्य है जहां मुफ्त और नगद राशि देने वाली योजनाएं भाजपा की सत्ता में वापसी का आधार बन गईं किंतु तेलंगाना , राजस्थान और छत्तीसगढ़ की सरकारों द्वारा दोनों हाथों से खजाना लुटाए जाने के बावजूद वे बुरी तरह चुनाव हार गईं। इसीलिए म.प्र में शिवराज सरकार की जिस लाड़ली बहना योजना को चुनाव जिताऊ माना गया उस पर अनेक भाजपा नेताओं ने ही सवाल खड़े करते हुए कहा कि राजस्थान और छत्तीसगढ़ में तो भाजपा विपक्ष में रहते हुए ही जीती । इसका अर्थ ये हुआ कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा चला गया मोदी की गारंटी वाला दांव ज्यादा कारगर साबित हुआ। तेलंगाना में चूंकि भाजपा का संगठन उतना सुदृढ़ नहीं है वरना वहां भी भाजपा को सत्ता मिलती। बहरहाल, अब भाजपा और कांग्रेस दोनों के सामने ये समस्या आ खड़ी हुई है कि वे उन वायदों को कैसे पूरा करेंगे जबकि खजाना तो पहले से ही खस्ता हालत में हैं। जो जानकारी आई है उसके अनुसार उक्त राज्यों में वेतन और पेंशन बांटने में रुकावट आ रही है । विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं के अन्तर्गत मिलने वाली धनराशि महीनों से हितग्राहियों के खाते में जमा नहीं हुई। शिवराज सिंह इस बात को संभवतः भांप चुके थे इसीलिए उन्होंने भूतपूर्व होने के दो दिन पहले ही लाड़ली बहना की राशि हितग्राहियों के खातों में जमा करवा दी। इस चुनाव में भाजपा और कांग्रेस दोनों ने जिस तरह के मुफ्त उपहारों का वायदा किया उनको पूरा करने के लिए संसाधन कहां से आयेंगे इसका उत्तर किसी के पास नहीं है। इस बारे में रोचक बात ये है कि विपक्ष में बैठी पार्टी सत्ता पक्ष पर खजाना खाली करने का आरोप लगाती है किंतु सत्ता में आने के लिए वह भी ऐसे ही प्रलोभन देने में पीछे नहीं रहती। उदाहरण के लिए म.प्र को ही लें तो यहां चुनाव के कई महीने पहले कांग्रेस नेत्री प्रियंका वाड्रा ने उन्हीं पांच गारंटियों का ऐलान कर दिया जिनके दम पर पार्टी को हिमाचल और कर्नाटक में सफलता हासिल हुई थी। भाजपा चूंकि उक्त राज्य गंवा चुकी थी अतः उसने बिना देर लगाए लाड़ली बहना योजना लागू कर दी और 450 रु. में रसोई गैस सिलेंडर देना शुरू कर दिया। हालांकि कांग्रेस ने ओल्ड पेंशन योजना लागू करने का वायदा भी किया किंतु शिवराज सरकार ने जो पहल की उसके कारण कांग्रेस के वायदे हवा में झूलते रह गए। अब आम जनता सवाल पूछ रही है कि यदि गैस सिलेंडर 450 रु. में देने से सरकार को कोई नुकसान नहीं होता तो फिर सभी को ये फायदा मिलना चाहिए और यदि नुकसान हो रहा है तो कितने समय तक वह ये बोझ उठा सकेगी , ये सवाल राष्ट्रीय विमर्श का विषय बनता जा रहा है। प्रधानमंत्री श्री मोदी खुद रेवड़ी राजनीति की आलोचना कर चुके हैं । लेकिन जिस तरह आरक्षण के बारे में कोई भी पार्टी किसी प्रकार का खतरा नहीं उठाना चाहती ठीक वैसे ही मुफ्त उपहारों की योजनाओं को शुरू करने के बाद रोकना या वापस लेना खतरे से खाली नहीं है। ऐसा लगता है सर्वोच्च न्यायालय को ही स्वतः संज्ञान लेते हुए इस बंदरबांट पर रोक लगानी पड़ेगी वरना आर्थिक प्रगति के सारे आंकड़े मुफ्तखोरी के खेल में उलझकर रह जाएंगे।

- रवीन्द्र वाजपेयी 

Wednesday, 13 December 2023

भाजपा एक साथ मंडल और कमंडल दोनों को साध रही


म.प्र में आज मोहन यादव के अलावा छत्तीसगढ़ में  विष्णु देव साय ने मुख्यमंत्री की शपथ ले ली। इन दोनों का चयन चौंकाने वाला बताया जा रहा था। पहले आदिवासी और फिर ओबीसी मुख्यमंत्री बनाकर भाजपा ने विपक्ष के  जातीय जनगणना वाले मुद्दे की हवा निकाल दी। लेकिन उससे भी बड़ा दांव चल दिया राजस्थान में जहां पहली  बार विधायक बने भजनलाल शर्मा को मुख्यमंत्री बनाकर  इस अवधारणा को गलत साबित कर दिया कि भाजपा में सवर्ण जातियों को पीछे धकेला जा रहा है।  इस प्रकार जिस सोशल इंजीनियरिंग का ढिंढोरा पीटकर विपक्षी पार्टियां भाजपा को ओबीसी और दलित विरोधी बनाती रहीं उसे भाजपा ने ज्यादा बेहतर तरीके से लागू किया है। नब्बे के दशक में जब विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार ने मंडल आयोग की सिफारिशें लागू कर ओबीसी के लिए 27 फीसदी आरक्षण की व्यवस्था की , उसी समय भाजपा का राम मंदिर मुद्दा भी गरमा उठा और लालकृष्ण आडवाणी सोमनाथ से रथ यात्रा लेकर अयोध्या के लिए निकल पड़े। राजनीतिक विश्लेषकों ने तब ये कहा था कि मंडल का जवाब भाजपा ने कमंडल के रूप में दिया क्योंकि तमाम सनातनी साधु - संत राम मंदिर के कारण भाजपा के साथ खड़े हो गए थे । ये कहना भी पूरी तरह सही होगा कि भाजपा को सत्ता के शिखर तक पहुंचाने में वह रथ यात्रा नींव का पत्थर साबित हुई। लेकिन जल्द ही पार्टी के वैचारिक अभिभावक रास्वसंघ को ये महसूस होने लगा कि मंडलवादी ताकतों के क्षेत्रीय वर्चस्व को तोड़ने के लिए समाज के जातीय संतुलन और समरसता को ध्यान में रखते हुए ही आगे बढ़ा जा सकता है। और उसी का परिणाम है कि उ.प्र जैसे राज्य में भाजपा ने जातीय राजनीति करने वाली सपा और बसपा  का आभामंडल फीका कर दिया। छोटी - छोटी अनेक जातियों और उपजातियों को अपने साथ जोड़कर भाजपा ने जो सार्थक प्रयोग किया वह कारगर होने लगा और अब कोई उसे सवर्ण और व्यापारी वर्ग की पार्टी नहीं कहता । म.प्र, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री के साथ ही विधानसभा अध्यक्ष पद हेतु चयन करते हुए भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने पीढ़ी परिवर्तन को तो ध्यान रखा ही किंतु सबसे ज्यादा महत्व दिया जातिगत संतुलन को जिसकी पूरे देश में  चर्चा हो रही है। कांग्रेस ही नहीं बल्कि नीतीश कुमार ,  अखिलेश यादव  , मायावती और तेजस्वी  यादव जैसे नेता तक हतप्रभ हैं । ये देखते हुए कहा जा सकता है कि आगामी लोकसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए भाजपा ने हिंदुत्व के अपने परंपरागत मुद्दे के साथ ही मंडलवादी ताकतों से उनका मुख्य हथियार छीन लिया है। उल्लेखनीय है आगामी 22 जनवरी को अयोध्या में राम मंदिर का शुभारंभ होने जा रहा है। संघ परिवार उस आयोजन को ऐतिहासिक बनाने के लिए जी जान से जुटा हुआ है। करोड़ों लोगों को पीले चावल भेजकर आमंत्रित किया जा रहा है। निश्चित रूप से यह आयोजन धार्मिक के साथ ही राजनीतिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण होगा । प्रधानमंत्री  को विरोधी कुशल इवेंट मैनेजर कहा करते हैं जो काफी हद तक सच भी है क्योंकि वे ऐसे किसी भी अवसर को भव्य और स्मरणीय बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ते। तीन राज्यों में भाजपा की शानदार जीत के बाद मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री चयन में जिस सूझबूझ का परिचय दिया गया वह इस बात का प्रमाण है कि भाजपा की निगाहें भविष्य पर हैं। जिस चतुराई से बेहद साधारण परिस्थिति से उठे लोगों को सत्ता के सिंहासन पर आसीन करवाया  गया उसमें सामाजिक समरसता और जातीय संतुलन के साथ ही हिंदुत्व की विचारधारा की झलक साफ नजर आती है। हिमाचल और कर्नाटक जीतने के बाद कांग्रेस के  जो हौसले सातवें आसमान पर   थे वे तीन राज्यों के चुनाव परिणाम के बाद  धरती पर आ गिरे । बावजूद इसके कि  वह तेलंगाना में सरकार बनाने में सफल रही। दरअसल उत्तर भारत के तीन राज्यों में भाजपा द्वारा बड़े बहुमत के साथ सत्ता हासिल करने से कांग्रेस सहित समूचा विपक्ष मनोवैज्ञानिक दबाव में आ गया है। इसका प्रमाण चुनाव परिणाम आने के बाद हुई बयानबाजी से मिला । यही नहीं इंडिया नामक गठबंधन भी  आकार लेने के पहले ही बिखराव का शिकार होता लग रहा है। राहुल गांधी को अपनी पूर्व निर्धारित विदेश यात्रा रद्द करनी पड़ी। कुछ समय पहले तक ये लगने लगा था कि मोदी लहर कमजोर पड़ने लगी है।लेकिन तीन राज्यों की जीत के बाद भाजपा ने उस आशंका को निराधार साबित कर दिया। जनवरी में राम मंदिर का शुभारंभ निश्चित रूप से उसके पक्ष में  लहर उत्पन्न करेगा। सर्वोच्च न्यायालय ने भी धारा 370 हटाए जाने को विधि सम्मत बताकर प्रधानमंत्री की प्रतिष्ठा को और बढ़ा दिया ।

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रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 12 December 2023

मोहन यादव का चयन भविष्य को ध्यान में रखकर किया गया : एक तीर से कई निशाने साधे गए


भाजपा द्वारा म.प्र में ओबीसी मुख्यमंत्री बनाए जाने की संभावना के साथ ही ये भी माना जा रहा था कि लोकसभा चुनाव तक शिवराज सिंह चौहान ही बने रहेंगे ताकि उनकी लोकप्रियता का लाभ  लिया जा सके। लेकिन केंद्रीय नेतृत्व ने सभी अनुमान ध्वस्त करते हुए उनकी ही सरकार में उच्च शिक्षा मंत्री रहे मोहन यादव को मुख्यमंत्री बनवा दिया। साथ ही  जातीय संतुलन का ध्यान रखते हुए जगदीश देवड़ा और राजेंद्र शुक्ल को उपमुख्यमंत्री और नरेंद्र सिंह तोमर को विधान सभा अध्यक्ष की कुर्सी सौंप दी। मंत्रीमंडल के बारे में शपथ ग्रहण के समय ही स्थिति स्पष्ट होगी क्योंकि आज की भाजपा में महत्वपूर्ण  निर्णयों को लेकर अंत तक गोपनीयता बनाए रखी जाती है। मुख्यमंत्री की दौड़ में शामिल रहे अन्य नेताओं के भविष्य को लेकर अटकलें लगाई जाने लगी हैं। दरअसल पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व को श्री चौहान के विकल्प के तौर पर ऐसे नेता की तलाश थी जो प्रतिबद्धता , योग्यता और क्षमता तीनों कसौटियों पर खरा साबित होने के साथ ही जातीय समीकरणों के लिहाज से भी स्वीकार्य हो। 58 वर्षीय श्री यादव अभाविप और भाजपा के साथ ही  रास्वसंघ से भी जुड़े रहे। ये देखते हुए उनकी वैचारिक प्रतिबद्धता प्रमाणित है। कांग्रेस द्वारा ओबीसी को लुभाने के लिए जो दांव चले जा रहे थे उनको बेअसर करने के लिए भाजपा ने ये पैंतरा चल दिया । सच तो ये है कि भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व और रास्वसंघ दीर्घकालीन लक्ष्यों पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं। बीते दस सालों में नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने भाजपा को भविष्य की पार्टी बनाने की जो कार्ययोजना बनाई उसे लागू करने में कुछ गलतियां भी हुईं ।  जिनकी वजह से अनेक राज्यों में पार्टी को नुकसान उठाने पड़े  किंतु उन गलतियों को सुधारने की प्रक्रिया भी उतनी ही तेजी से चलने की वजह से ही वह राष्ट्रीय स्तर पर मजबूती से अपने पैर जमाए रखने में सफल है। म.प्र, छत्तीसगढ़ और राजस्थान 2018 में हाथ से निकाल जाने के बाद 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने यहां कांग्रेस को चारों खाने चित्त कर दिया। और पांच साल बाद तीनों में शानदार जीत हासिल कर  दिखा दिया कि गलतियों से कैसी सीखा जा सकता है।  लेकिन पार्टी नेतृत्व इस जीत से संतुष्ट होने के बजाय भविष्य की तैयारी में जुट गया जिसका प्रमाण छत्तीसगढ़ और म.प्र में मुख्यमंत्री का चयन है। वैसे भी म.प्र जनसंघ के जमाने से ही हिंदुत्ववादी राजनीति के लिए अनुकूल  रहा है। ऐसे में यहां के राजनीतिक घटनाक्रम का प्रभाव अन्य राज्यों में भी होता है। और इसीलिए इस बार पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने ऐसे  राजनीतिक समीकरण बिठाए जिससे पड़ोसी प्रदेश प्रभावित हों। मुख्यमंत्री के रूप में मोहन यादव का चयन यह दर्शाने का प्रयास भी है कि भाजपा में नेता पार्टी संचालित नहीं करते अपितु पार्टी नेताओं को चलाती है। शिवराज सिंह भी जब मुख्यमंत्री बने थे तब उनके पास संगठन और सांसदी का अनुभव तो था किंतु प्रशासनिक नहीं । लेकिन उसके बाद भी वे 18 साल से ज्यादा मुख्यमंत्री रहे और कार्यकाल के आखिरी चुनाव में भी पार्टी को जबरदस्त सफलता दिलवाई। उस दृष्टि से देखें तो श्री यादव के पास तो मंत्री पद का अनुभव भी है और उनके साथ बने दोनों उपमुख्यमंत्री भी तजुर्बेकार  हैं। कुछ महीनों बाद ही लोकसभा चुनाव की हलचल शुरू हो जाएगी । ऐसे में श्री यादव के सामने दोहरी चुनौती है। पहली तो शिवराज सरकार की जनकल्याणकारी योजनाओं को जारी रखना और दूसरी लोकसभा चुनाव में 2018 के प्रदर्शन को दोहराना। जहां तक दूसरी का सवाल है तो उसमें तो उनको ज्यादा परेशानी नहीं होगी क्योंकि लोकसभा का मुकाबला तो मोदी के नाम पर लड़ा जाएगा किंतु  लोक लुभावन योजनाओं और कार्यक्रमों की निरंतरता के साथ चुनाव घोषणापत्र में किए गए वायदों को पूरा करने के लिए आर्थिक संसाधन जुटाना बड़ी समस्या है । इस स्थिति से नए मुख्यमंत्री कैसे निपटते हैं उस पर काफी कुछ निर्भर करेगा । मंत्रीमंडल का गठन होने के बाद उनकी टीम की क्षमता का आकलन किया जा सकेगा। लेकिन भाजपा आलाकमान ने जो फैसला म.प्र के बारे में किया उसने विरोधियों से ज्यादा समर्थकों को हैरान कर दिया । हालांकि  सब कुछ बहुत सोच - समझकर किया गया है और इसके पीछे अगले एक दशक की कार्य योजना है। ऐसे समय जब प्रदेश में कांग्रेस के बड़े नेता वृद्धावस्था के कारण थके नजर आने लगे हैं और दूसरी पंक्ति का नेतृत्व पनपने ही नहीं दिया गया तब भाजपा के पास म.प्र को अपना अभेद्य दुर्ग बनाने का स्वर्णिम अवसर है। निवर्तमान मुख्यमंत्री श्री चौहान ने पार्टी को समाज के पिछड़े वर्गों से जोड़ने का जो कारनामा कर दिखाया उसके कारण श्री यादव को काफी सहूलियतें भी हैं। वे चूंकि पार्टी की विचारधारा और कार्य संस्कृति से भली - भांति  परिचित हैं इसलिए सफल मुख्यमंत्री साबित होंगे ये उम्मीद की जा सकती  है। 


-रवीन्द्र वाजपेयी


Monday, 11 December 2023

जहां हुए बलिदान मुखर्जी.....



सर्वोच्च न्यायालय द्वारा धारा 370 हटाए जाने को संविधान सम्मत ठहराए जाने से एक देश दो विधान जैसी विसंगति एक अंतिम संस्कार हो गया। ये राष्ट्रवाद की पोषक ताकतों की बड़ी जीत  तथा कश्मीर की आजादी के नाम पर देश को तोड़ने का षडयंत्र रचने वाली टुकड़े - टुकड़े गैंग की जोरदार पराजय है।

आखिरकार 70 साल बाद डा.मुखर्जी का बलिदान सार्थक हुआ :-

डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी जम्मू-कश्मीर को भारत का पूर्ण और अभिन्न अंग बनाना चाहते थे। संसद में अपने भाषण में उन्होंनें धारा-370 को समाप्त करने की भी जोरदार वकालत की। अगस्त 1952 में जम्मू कश्मीर की विशाल रैली में उन्होंने अपना संकल्प व्यक्त किया था कि ''या तो मैं आपको भारतीय संविधान प्राप्त कराऊंगा या फिर इस उद्देश्य की पूर्ति के लिये अपना जीवन बलिदान कर दूंगा''। डॉ. मुखर्जी अपने संकल्प को पूरा करने के लिये 1953 में बिना परमिट लिये जम्मू-कश्मीर की यात्रा पर निकल पड़े। वहां पहुंचते ही उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। 23 जून 1953 को जेल में रहस्यमय परिस्थितियों में उनकी मृत्यु हो गयी। जेल में उनकी मृत्यु ने देश को हिलाकर रख दिया और परमिट सिस्टम समाप्त हो गया। उन्होंने कश्मीर को लेकर एक नारा दिया था,“नहीं चलेगा एक देश में दो विधान, दो प्रधान और दो निशान”

छत्तीसगढ़ में आदिवासी मुख्यमंत्री भाजपा की दूरगामी सोच का संकेत


भाजपा ने छत्तीसगढ़ में  विष्णुदेव साय को मुख्यमंत्री बनाकर उन नेताओं और राजनीतिक दलों को संदेश दे दिया  जिन्होंने पिछले कुछ समय से जाति के नाम पर समाज को विभाजित करने का खेल शुरू कर दिया था । जातीय जनगणना के मुद्दे को चुनावी वायदा बनाने वाले राहुल गांधी जैसे नेता के लिए श्री साय का चयन एक तमाचा है, जो इन दिनों ओबीसी का झुनझुना बजाते घूम रहे हैं। भाजपा द्वारा आदिवासी बहुल छत्तीसगढ़ में आदिवासी मुख्यमंत्री देना इस राज्य में ईसाई मिशनरियों और उनकी छत्रछाया में पनप रहे नक्सलियों को ये इशारा है कि अब उनसे आमने - सामने का मुकाबला करने वाली ताकत खड़ी हो गई है। हालांकि लगातार 15 साल तक भाजपा ने गैर आदिवासी डा.रमन सिंह को मुख्यमंत्री बनाए रखा । लेकिन बीते कुछ सालों के भीतर रास्वसंघ ने आदिवासी अंचलों में अपना जनाधार तेजी से बढ़ाया जिसका प्रमाण कुछ समय पहले तब मिला जब हिंदुओं का धर्मांतरण करने पहुंचे ईसाई मिशनरीज को ग्रामीण जनों ने खदेड़ दिया। सही बात तो ये है कि छत्तीसगढ़ की सबसे बड़ी समस्या धर्मांतरण और नक्सलवाद से मुक्ति पाना है। और इसीलिए संघ की पसंद के ऐसे व्यक्ति को मुख्यमंत्री बनाया गया जो आदिवासी होने के साथ ही जनाधार भी रखता हो और वैचारिक प्रतिबद्धता भी। श्री साय उस दृष्टि से बेहद उपयुक्त हैं। उनका परिवार संघ और भाजपा की विचारधारा से लंबे समय तक जुड़ा रहा है उनके पिता और वे स्वयं सांसद , विधायक और मंत्री रहे हैं। श्री साय छत्तीसगढ़ में पार्टी के अध्यक्ष भी रहे । सबसे बड़ी बात उनकी साफ - सुथरी छवि है। कहने को नवगठित छत्तीसगढ़ के पहले मुख्यमंत्री स्व .अजीत जोगी भी आदिवासी कहे जाते थे किंतु  ईसाई  होने के कारण वे  हिन्दू परंपराओं से जुड़े मूल आदिवासियों के बीच पैठ न बना सके। यही वजह रही कि उनके राज में कांग्रेस का जनाधार खिसकता चला गया। अंततः उनको भी कांग्रेस  से हटना पड़ा और उन्होंने अपनी पार्टी भी बनाई जिसे बाद में भाजपा की बी टीम कहकर कांग्रेस ने प्रचारित किया  क्योंकि उसकी वजह से कांग्रेस के वोट बंटने का लाभ भाजपा को मिलता रहा। 2018 में भाजपा के विरुद्ध सत्ता विरोधी रुझान चरम पर जा पहुंचा और कांग्रेस भारी बहुमत के साथ सत्ता में आ गई। लेकिन उससे यहीं चूक हो गई और उसने भूपेश बघेल को सत्ता में बिठा दिया जो पिछड़ी जाति के हैं।  कांग्रेस यह भूल गई कि उसे बस्तर के आदिवासी इलाकों से जबर्दस्त सफलता मिली थी । यद्यपि श्री बघेल ने भाजपा से हिंदुत्व का मुद्दा छीनने का जबरदस्त प्रयास किया जिसके कारण वे पूरे देश में ये माहौल बनाने में सफल हुए कि छत्तीसगढ़ में भाजपा की वापसी असंभव है। जिस तरह की  योजनाएं उनके द्वारा  लागू की गईं उनका विरोध करना भाजपा के लिए भी संभव नहीं था किंतु श्री बघेल जरूरत से ज्यादा आत्ममुग्ध हो गए और पार्टी संगठन पर भी पूरा कब्जा कर लिया। कांग्रेस हाईकमान ने भी उनको कुछ ज्यादा ही महत्व दिया जिसके चलते टी. एस.सिंहदेव को ढाई साल बाद मुख्यमंत्री बनाए जाने का वायदा रद्दी की टोकरी में फेंक दिया गया। इसके कारण कांग्रेस ऊपर से तो मजबूत नजर आती रही किंतु भीतर से उसकी जड़ें कमजोर होने लगीं। और जब सनातन के विरोध का मुद्दा उठा तब पार्टी ने जिस तरह का गैर जिम्मेदाराना आचरण किया उसने श्री बघेल की हिंदुत्व समर्थक छवि को नुकसान पहुंचाया । बची - खुची कसर पूरी कर दी उनके पिता द्वारा सनातन धर्म विरोधी बयान देकर जिसका प्रतिवाद न मुख्यमंत्री कर सके और न ही कांग्रेस पार्टी। यही कारण रहा कि चुनाव शुरू होने के काफी समय बाद तक कांग्रेस का  मजबूत किला मनाकर जिस  छत्तीसगढ़ को भाजपा के लिए अपराजेय माना जाने लगा था , उसने कांग्रेस को पूरी तरह नकार दिया। शहरी क्षेत्रों के साथ ही सरगुजा और बस्तर जैसे आदिवासी वर्चस्व वाले इलाकों में भी भाजपा को जो जबरदस्त समर्थन मिला उसने उन राजनीतिक विश्लेषकों को भी चौंका दिया जो मतगणना की सुबह तक कांग्रेस सरकार की वापसी सुनिश्चित बता रहे थे। इसमें दो मत नहीं है कि म.प्र,  और राजस्थान में कांग्रेस की विजय को लेकर शंकाएं थीं किंतु छत्तीसगढ़ में तो ज्यादातर भाजपाई ही अपनी जीत के प्रति नाउम्मीद थे। लेकिन रास्वसंघ की जमीनी मेहनत और भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व की आत्मविश्वास भरी व्यूह रचना ने चमत्कार कर दिखाया । अमित शाह ने तो श्री साय के चुनाव प्रचार के दौरान ही मतदाताओं से कहा था कि वे उनको जिता दें तो बड़ा आदमी बनाने के जिम्मेदारी मेरी है। इसका संकेत साफ था कि भाजपा आदिवासी मुख्यमंत्री बनाएगी जबकि कांग्रेस भूपेश बघेल के आभामंडल को ही जीत का नुस्खा मानकर आत्ममुग्ध बनी रही। श्री साय का मुख्यमंत्री बनना भाजपा की दूरगामी राजनीति का संकेत है जिसका प्रभाव झारखंड , बिहार , म.प्र और उड़ीसा के आदिवासी अंचलों में पड़े बिना नहीं रहेगा। इसके जरिए जातीय जनगणना  की पैरोकार कांग्रेस सहित अन्य विपक्षी पार्टियों को भाजपा ने ये बता  दिया कि सोशल इंजीनियरिंग की राजनीति में वह उन सबसे ज्यादा सिद्धहस्त है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 9 December 2023

हर छापे पर हल्ला मचाने वाली कांग्रेस इस मामले में खामोश क्यों


झारखंड से कांग्रेस के राज्यसभा सदस्य और उड़ीसा के बड़े शराब व्यापारी धीरज साहू के  विभिन्न ठिकानों पर  पड़े आयकर के छापों में  अब तक 300 करोड़ रुपए नगद प्राप्त हो चुके हैं। ये गिनती कहां जाकर रुकेगी कहना मुश्किल है। संभवतः आयकर छापों में मिली नगदी की ये सबसे बड़ी राशि है। इसके पूर्व प.बंगाल के एक मंत्री और कन्नौज के इत्र व्यापारी के यहां पड़े छापे में भी बड़े पैमाने पर नगदी जप्त की गई थी। पिछले कुछ वर्षों में केंद्र सरकार पर ये आरोप लगाए जाते रहे हैं कि वह आयकर , सीबीआई और ईडी जैसे विभागों का इस्तेमाल विपक्ष को डराने के लिए करती है। इस बारे में ये कहना गलत नहीं है कि मोदी सरकार के राज में विपक्षी नेताओं के अलावा अनेक ऐसे लोगों के यहां  छापे पड़े जिनको विपक्ष के नजदीक माना जाता है। छत्तीसगढ़  विधानसभा चुनाव के पूर्व भी ईडी ने वहां छापेमारी की। महाराष्ट्र में शिवसेना नेता संजय राउत सहित उद्धव ठाकरे सरकार के दो मंत्री भी जेल जा चुके हैं।  दिल्ली सरकार के दो मंत्रियों सहित उसके राज्यसभा सदस्य संजय सिंह भी जेल में हैं। संदर्भित प्रकरण में जिस मात्रा में नगदी बरामद हुई वह निश्चित रूप से काला धन ही है। लेकिन ऐसे छापों को लेकर सरकार पर हमला करने वाली कांग्रेस  जिस तरह से मौन साधकर बैठी है उससे उसका अपराध बोध उजागर होता है। जो जानकारी आ रही है उसके अनुसार अभी नोट गिनने में जांच एजेंसी को दो - तीन दिन और लगेंगे। इस छापे का अंतिम परिणाम क्या होगा ये तो बाद में पता चलेगा किंतु किसी भी व्यवसायी के पास इतनी बड़ी रकम होने से साधारण बुद्धि वाला भी ये मानेगा कि यह वैध कमाई  नहीं है। शराब व्यवसाय में तो वैसे भी काली कमाई की बड़ी भूमिका रहती है। राजनीतिक पार्टी को चंदा देने वालों में शराब माफिया सबसे आगे रहता है। कांग्रेस द्वारा श्री साहू को राज्यसभा की सदस्यता प्रदान करना  इस बात को दर्शाता है कि वह पार्टी को आर्थिक संसाधन उपलब्ध कराता रहा होगा। यद्यपि शराब व्यवसायी को राज्यसभा में भेजने का ये पहला उदाहरण नहीं है । विजय माल्या ने राज्यसभा की सीट हासिल करने के लिए निर्दलीय के साथ भाजपा विधायकों तक को खरीद लिया था। अनेक उद्योगपति और बड़े वकील राजनीतिक दलों के सदस्य न होते हुए भी राज्यसभा की सीट पा जाते हैं। कपिल सिब्बल कांग्रेस छोड़ने के बाद समाजवादी पार्टी की मदद से राज्यसभा में आ गए किंतु वे उसके सदस्य नहीं हैं। स्व.राम जेठमलानी और स्व.राहुल बजाज को शिवसेना ने संसद के उच्च सदन की सदस्यता प्रदान की। लेकिन  श्री साहू  को संसद में भेजने का संकेत साफ है । हमारे देश की चुनावी व्यवस्था में काले धन की भूमिका लगातार बढ़ती जा रही है। सोचने वाली बात ये है कि श्री साहू जैसे व्यवसायियों के पास अरबों रुपए इस तरह रखे रहते हों तो इस बात का अंदाज लगाया जा सकता है कि वे सांसद बनने के लिए संबंधित राजनीतिक पार्टी  को कितना धन देते होंगे। अनेक शराब और खनिज व्यवसायी राजनीतिक दलों से बाकायदा टिकिट हासिल कर विधानसभा और लोकसभा चुनाव लड़कर जीतकर सदन में बैठते हैं। कुछ तो मंत्री भी बन जाते हैं। चूंकि चुनाव में धन की भूमिका बढ़ती ही जा रही है इसलिए इस प्रकार के लोगों की मदद चाहे - अनचाहे राजनीतिक दलों को लेनी पड़ती है। श्री साहू के यहां बड़ी मात्रा में नगदी बरामद होने से ये आशंका भी बढ़ रही है कि या तो शराब व्यवसाय के अलावा  उनके पास और भी काले धंधे हैं या फिर ये रकम किसी राजनेता के जरिए उनके पास जमा की गई होगी जिसका उपयोग लोकसभा चुनाव में किया जाने वाला हो। उल्लेखनीय है आम आदमी पार्टी पर भी ये आरोप है कि दिल्ली में नई शराब नीति के जरिए उसने गोवा और पंजाब चुनाव के लिए धन जुटाया था। सही बात तो ये है कि लगभग सभी राजनीतिक दल अवैध तरीकों से धन कमाने वाले तत्वों से चंदा लेते हैं । शराब और खनन माफिया तो राजनीतिक बिरादरी का अभिन्न हिस्सा है। उस दृष्टि से धीरज साहू तो महज बानगी है। यदि पूरे देश पर नजर डालें तो उस जैसे दर्जनों कारोबारी मिल जाएंगे जो अपनी काली कमाई से राजनीतिक पार्टियों को उपकृत करने में आगे रहते हैं। जाहिर है ये उपकार निःस्वार्थ नहीं होता। उसके बदले वे क्या हासिल करते हैं ये किसी से छिपा नहीं है। गत दिवस तृणमूल कांग्रेस की लोकसभा सदस्य महुआ मोइत्रा की सदस्यता भी जिस कारण गई उसके पीछे भी एक उद्योगपति से उनके संबंध ही थे जिन्हें उन्होंने    संसद की वेबसाइट का पासवर्ड दे दिया था जिससे वे दुबई में बैठे - बैठे उनके नाम से प्रश्न लोकसभा सचिवालय भेजा करते थे। कुल मिलाकर श्री साहू के यहां पड़े छापे ने एक बार फिर राजनीतिक दलों और काले धंधों वालों का संबंध उजागर कर दिया है।  हर छापे के बाद केंद्र सरकार पर हमले करने वाली कांग्रेस इस मामले में जिस तरह शांत है उससे भी बहुत कुछ जाहिर हो रहा है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी