Monday, 18 December 2023

विपक्षी एकता में सीटों का बंटवारा और संयोजक पद बन रहा बाधक


आगामी लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी की जीत को रोकने के लिए बनाए गए विपक्षी गठबंधन इंडिया की जो बैठक कल होने जा रही है उसमें सीटों के बंटवारे के फार्मूले के साथ ही संयोजक का नाम भी तय होना है। पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में  कांग्रेस तीन प्रमुख राज्यों में भाजपा के हाथों बुरी तरह पराजित हो गई। हालांकि तेलंगाना में वह जीत  गई किंतु छत्तीसगढ़ और राजस्थान  गंवाने से अन्य दलों को उस पर हावी होने का मौका मिल गया। म. प्र में भी वह तमाम अनुकूलताओं के बावजूद भाजपा को सत्ता से बाहर नहीं कर सकी। जिन तीन राज्यों में कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा वहां उसने अन्य विपक्षी दलों के साथ सीटों का बंटवारा करने से इंकार कर दिया था।  कमलनाथ , भूपेश बघेल और अशोक गहलोत जीत के प्रति इतने आश्वस्त थे कि उन्होंने इंडिया गठबंधन के किसी भी सहयोगी के लिए सीटें छोड़ने की जरूरत नहीं समझी। हालांकि कांग्रेस का कहना है कि उनमें से जो भी दल मैदान में उतरे उन्हें मिले मतों का प्रतिशत इतना कम है कि  जहां भी उसकी भाजपा के साथ सीधी टक्कर है वहां इन दलों के साथ सीटों के बंटवारे की कोई गुंजाइश नहीं है। गुजरात , हिमाचल , हरियाणा , उत्तराखंड जैसे राज्यों में कांग्रेस और भाजपा के बीच ही चुनावी जंग सीमित रहती है। दूसरी तरफ जनता दल (यू) , और राजद बिहार में  तथा समाजवादी पार्टी उ.प्र में कांग्रेस को उसी की भाषा में उत्तर देते हुए बता रही है कि इन राज्यों में वह घुटनों के बल चलने की स्थिति में है। इसलिए यदि वह उन्हें अपने प्रभावक्षेत्र में सीटें नहीं देगी तो वे भी बिहार और उ.प्र में उसके साथ वैसा ही व्यवहार करेंगे। उल्लेखनीय है कि म.प्र, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में कुल 66 लोकसभा सीटें हैं जबकि उ.प्र की 80 और बिहार की 40 मिलाकर 120 सीटें हैं । कांग्रेस इन दोनों राज्यों में क्षेत्रीय दलों के रहमो - करम पर पूरी तरह निर्भर है। 2019 में अमेठी  से राहुल गांधी बुरी तरह पराजित हुए थे। वहीं रायबरेली से सोनिया गांधी महज इसलिए जीत सकीं क्योंकि सपा - बसपा ने उनके विरुद्ध प्रत्याशी नहीं उतारा। विधानसभा चुनाव में कांग्रेस का प्रदर्शन इतना दयनीय रहा कि सपा और बसपा लोकसभा चुनाव में उसके साथ जुड़ने से कतरा रही हैं। ऐसी ही स्थिति बिहार में है। वहां नीतीश कुमार और तेजस्वी यादव राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस के रवैए से खुश नहीं हैं।  इंडिया गठबंधन पर कब्जा करने की कांग्रेस की मंशा से नीतीश कुमार का पारा चढ़ा हुआ है। वे इस बात से भी काफी रूष्ट हैं कि पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के बहाने कांग्रेस ने गठबंधन का काम आगे बढ़ने से रोक दिया। उनका सोचना गलत नहीं है। दरअसल कर्नाटक की जीत के बाद कांग्रेस के दिमाग में ये बात बैठ गई कि  गठबंधन के बाकी दलों को उसका नेतृत्व स्वीकार करना चाहिए क्योंकि भले ही उ.प्र और बिहार में उसकी स्थिति बेहद कमजोर हो तथा गुजरात , म.प्र, राजस्थान , छत्तीसगढ़ , हिमाचल और उत्तराखंड जैसे राज्यों में पिछले लोकसभा चुनाव में उसकी स्थिति बहुत खराब रही किंतु विधानसभा चुनाव में वह भाजपा की प्रमुख प्रतिद्वंदी है और उसे मिलने वाले मतों का प्रतिशत भी ठीक- ठाक है। हालिया विधानसभा चुनाव में  कांग्रेस का ये दावा सही साबित हुआ । महाराष्ट्र में भी वह शरद पवार और उद्धव ठाकरे के मुकाबले ज्यादा सीटों पर अड़ेगी। इसी तरह का पेंच फंसा है गठबंधन के संयोजक को लेकर। हालांकि कांग्रेस ने इस बारे में कहा तो कुछ भी नहीं किंतु उसकी दिली तमन्ना है कि  संयोजक पद उसी के पास आए जिससे कि लोकसभा चुनाव की रणनीति तय करने में उसका हाथ ऊंचा रहे । टिकटों के बंटवारे में भी कांग्रेस अपना वर्चस्व चाहती है , जिसे लेकर नीतीश , ममता , पवार , अखिलेश और केजरीवाल चौकन्ने हैं।  चूंकि राहुल और प्रियंका के धुआंधार प्रचार के बाद भी हिन्दी पट्टी के तीन प्रमुख राज्यों में कांग्रेस के हाथ सफलता नहीं लगी इसलिए गैर कांग्रेसी विपक्षी पार्टियां भी ऐंठने की स्थिति में आ गई हैं । उधर नीतीश कुमार की अपनी स्थिति बिहार में दिन ब दिन बिगड़ रही है। ऐसे में उनकी कोशिश है कि वे किसी तरह से इंडिया के संयोजक बन जाएं जिससे राष्ट्रीय राजनीति का बड़ा चेहरा बन सकें ।  कल मंगलवार को होने वाली बैठक में क्या होता है उस पर सभी की निगाहें लगी हैं। हिमाचल और कर्नाटक की जीत के बाद जो उत्साह विपक्ष में उत्पन्न हुआ था वह तीन राज्यों में भाजपा की धमाकेदार जीत से कम हो गया है। जिसकी छाया बैठक में जरूर नजर आयेगी।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Sunday, 17 December 2023

दिग्विजय और कमलनाथ के शिकंजे से मुक्त होकर कांग्रेस ने अक्लमंदी दिखाई





       आखिरकार कांग्रेस ने उस बोझ को उतार फेंका जिसे वह न चाहते हुए भी ढो रही थी। ऐसा करना उसके लिए जरूरी था या मजबूरी ये तो वही जाने । लेकिन बीते तीन दशक से प्रदेश कांग्रेस दिग्विजय सिंह और कमलनाथ की बंधुआ बनकर रह गई थी। स्व.अर्जुन सिंह के रहते तक तो फिर भी गनीमत रही किंतु उनके अवसान के उपरांत उक्त ये दोनों मठाधीश पार्टी संगठन पर  कुंडली मारकर ऐसे बैठे कि बाकी किसी को पनपने ही नहीं दिया। परिणामस्वरूप कांग्रेस लगातार कमजोर होती गई। स्व. इंदिरा गांधी की कृपा से 1980 में छिंदवाड़ा से सांसद बनने के बाद श्री नाथ अंगद के पैर की तरह जम गए। इसी तरह दिग्विजय को अर्जुन सिंह ने रिश्तेदारी के चलते मुख्यमंत्री बनवा दिया जबकि दावा स्व.माधवराव  सिंधिया और स्व.सुभाष यादव का था। 

         उसके बाद कमलनाथ और दिग्विजय सिंह की जो जुगलबंदी चली उसने प्रदेश में कांग्रेस की समूची राजनीति को अपनी मुट्ठी में कैद कर लिया। 2003 के विधानसभा चुनाव में मिली करारी हार के बाद  उसको 2018 में सरकार बनाने का मौका मिला किंतु  चुनाव में पार्टी का चेहरा बनाए गए ज्योतिरादित्य सिंधिया को मुख्यमंत्री बनने से रोकने उक्त दोनों नेताओं ने जबरदस्त मोर्चेबंदी की । बावजूद इसके कि वे राहुल गांधी की पसंद थे । इस प्रकार श्री नाथ की मुख्यमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा तो पूरी हुई परंतु उसके बाद हुए लोकसभा चुनाव में कांग्रेस पूरी तरह चित्त हो गई। छिंदवाड़ा में श्री नाथ के पुत्र नकुल भी इसलिए जीत सके क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वहां सभा नहीं की। वहीं गुना से श्री सिंधिया भी हार गए। 

          लेकिन कमलनाथ का राजयोग महज 15 महीने में ही खत्म हो गया और ज्योतिरादित्य ने उनका तख्ता पलटते हुए भाजपा का दामन थाम लिया। होना तो ये चाहिए था कि गांधी परिवार उस अवसर का लाभ लेकर दिग्विजय - कमलनाथ के शिकंजे से पार्टी को मुक्त करवा लेता। लेकिन दोनों ने हाईकमान को झांसा देते हुए श्री सिंह के खासमखास गोविंद सिंह को नेता प्रतिपक्ष बनवा दिया जबकि प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष के पद पर श्री नाथ ही बने रहे। दरअसल उन्होंने गांधी परिवार सहित पार्टी हाईकमान के अन्य नेताओं को आश्वस्त कर दिया कि वे 2023 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को सत्ता में वापस लाने में सक्षम हैं ।

        उल्लेखनीय है आर्थिक दृष्टि से काफी समृद्ध होने के साथ औद्योगिक जगत में भी श्री नाथ के काफी नजदीकी रिश्ते हैं। जिन गौतम अडानी के विरुद्ध राहुल गांधी दिन - रात चिल्लाया करते हैं उनके बारे में श्री नाथ ने आज तक कुछ नहीं बोला। पार्टी ने उनके आश्वासन पर भरोसा करते हुए 2023 के चुनाव के लिए उनको पूरी छूट दे दी। पार्टी के भीतर अनेक युवा चेहरे श्री नाथ और दिग्विजय के विरुद्ध आवाज उठाते रहे किंतु उन सभी को पृष्ठभूमि में धकेल दिया गया । चुनाव की समूची व्यूह रचना श्री नाथ ने अपने हाथ में ले ली और दिग्विजय सिंह घूम - घूमकर उनके पक्ष में माहौल बनाने में जुटे रहे। उम्मीदवारों के चयन से लेकर प्रचार तक पर  दिग्विजय और कमलनाथ हावी रहे। आखिर में तो पूरा नियंत्रण श्री नाथ ने ले लिया और दिग्विजय तक को किनारे करने से बाज नहीं आए। पार्टी के केंद्रीय पर्यवेक्षक रणदीप सुरजेवाला तक निठल्ले बैठे रहे। 

        श्री नाथ इस हद तक स्वेच्छाचारी हो चले थे कि चुनाव की घोषणा के पूर्व भोपाल में आयोजित इंडिया नामक विपक्षी गठबंधन की रैली तक रद्द कर दी। और तो और सपा तथा जनता दल (यू) को चार - छह सीटें देना तो दूर उल्टे अखिलेश यादव के प्रति बेहद सस्ते शब्दों का प्रयोग कर आग में घी डाल दिया। उनकी कार्यप्रणाली से गांधी परिवार तक अप्रसन्न था किंतु चाहकर भी कुछ न कर सका क्योंकि म.प्र में कांग्रेस में उनके सिवाय कोई और नजर ही नहीं आता था। लेकिन 3 दिसंबर की दोपहर होते - होते तक उनका कथित आभामंडल पराजय के अंधकार में डूब गया। 
 
       20 साल पहले कांग्रेस ने दिग्विजय का पराभव देखा और अब कमलनाथ भी उसी गति को प्राप्त हुए। इस दौरान  भाजपा ने दूसरी पीढ़ी को आगे लाने की कार्य योजना को तो सफलता के साथ लागू कर दिया किंतु  कांग्रेस अधेड़ से बूढ़े होते दो नेताओं के शिकंजे में फंसकर छटपटाती रही। अब , जब सब कुछ लूट चुका तब जाकर पार्टी के राष्ट्रीय नेतृत्व को होश आया या यूं कहें कि हिम्मत हुई दिग्विजय और कमलनाथ से पिंड छुड़ाने की। गत दिवस जीतू पटवारी , उमंग सिंगार और हेमंत कटारे को क्रमशः प्रदेश अध्यक्ष ,नेता प्रतिपक्ष और उप नेता प्रतिपक्ष बनाकर पार्टी हाईकमान ने लंबे समय बाद अक्लमंदी का परिचय दिया। हालांकि इन तीनों से 2024 के महा - मुकाबले में किसी बड़े चमत्कार की उम्मीद करना तो उन्हें दबाव में डालने का  कारण बनेगा किंतु कम से कम पार्टी में ये संदेश तो गया कि नई पीढ़ी के लिए भी गुंजाइश है और नौजवानों की भावनाओं और अपेक्षाओं को समझने वाला प्रदेश नेतृत्व आ गया है। 

         यद्यपि कांग्रेस से ये अपेक्षा करना तो व्यर्थ है कि वह किसी से कुछ सीखेगी क्योंकि उसमें श्रेष्ठता का भाव आज भी यथावत है किंतु इतना तो कहा ही सकता है कि दिग्विजय सिंह और कमलनाथ के चेहरे देखते - देखते जो ऊब पार्टी के भीतर महसूस की जाती थी उससे तो आजादी मिलेगी।  भाजपा ने सबसे अधिक समय तक मुख्यमंत्री रहे शिवराज सिंह चौहान को हटाकर नया नेतृत्व जिस तरह दिया उसके बाद कांग्रेस के लिए भी ऐसा ही करना मजबूरी बन गया था किंतु एक झटके में तीन युवा चेहरे सामने लाकर आलाकमान ने निश्चित रूप से जो साहस दिखाया उसके लिए वह बधाई का पात्र है।

इस नई टीम के समक्ष कुछ महीनों बाद ही लोकसभा चुनाव की चुनौती खड़ी होगी  किंतु  थके और लगातार हारते आ रहे दो नेताओं से मुक्त होकर कांग्रेस में जितना भी उत्साह आएगा वह भविष्य की दृष्टि से उसकी सेहत सुधारने में सहायक होगा , इतनी उम्मीद तो की ही जा सकती है।

-रवीन्द्र वाजपेयी 

Saturday, 16 December 2023

शाही मस्जिद के सर्वेक्षण में अड़ंगेबाजी छोड़ सहयोग करें मुस्लिम धर्मगुरु


सर्वोच्च न्यायालय द्वारा मथुरा स्थित श्रीकृष्ण जन्मभूमि  से सटी शाही मस्जिद के सर्वेक्षण पर रोक लगाने से इंकार किए जाने के बाद अब इस विवाद के हल का रास्ता खुल गया है। स्मरणीय है हिन्दू पक्ष द्वारा लंबे समय से मांग की जा रही थी कि वाराणसी की ज्ञानवापी मस्जिद की तरह से ही मथुरा की शाही मस्जिद का भी सर्वेक्षण कर  पता किया जाए कि वहां हिन्दू मंदिर के प्रतीक चिन्ह हैं। मुस्लिम पक्ष इसका विरोध करता आ रहा है। हाल ही में  अलाहाबाद उच्च न्यायालय के सर्वेक्षण संबंधी आदेश को मुस्लिम पक्ष ने सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी किंतु उसने भी  रोक लगाने से मना कर दिया। दरअसल मुस्लिम पक्ष 1991 के प्लेस  ऑफ वर्शिप एक्ट के आधार पर  तर्क देता है कि 1947 से पहले अस्तित्व में आए किसी धार्मिक स्थल को किसी अन्य के पूजा स्थल में नहीं बदला जा सकता।  इस बारे में उल्लेखनीय है कि श्री कृष्ण जन्मभूमि मंदिर  लगभग 11 एकड़ में है जबकि उससे लगी शाही मस्जिद के पास 2.37 एकड़ भूमि है। हिन्दू पक्ष का दावा है कि इस भूमि पर भी मंदिर था जिसे औरंगजेब के  शासन में मस्जिद का रूप दे दिया गया। इसीलिए उसकी दीवारों पर हिन्दू मंदिरों में प्रयुक्त होने वाले कमल और त्रिशूल आदि के चिन्ह अंकित हैं। इस प्रकार  ज्ञानवापी की तरह से ही शाही मस्जिद के बारे में भी हिन्दू पक्ष का दावा है कि वह  मंदिर का ही हिस्सा है जिसे मुगल काल में जबरदस्ती मस्जिद में परिवर्तित कर दिया गया । ज्ञानवापी में  तो शिवलिंग के अलावा जिस तरह से दीवारों और  स्तंभों पर हिन्दू धार्मिक चिन्ह बने दिखे ठीक वैसे ही शाही मस्जिद के भीतर होने की बात हिन्दू पक्ष कह रहा है। इस बारे में ये कहना गलत न होगा कि मुस्लिम धर्मगुरु और वक्फ बोर्ड जैसी संस्था द्वारा  सर्वेक्षण के काम में अड़ंगा  लगाने से  हिन्दू पक्ष के दावों में सच्चाई लगती है। वैसे भी सर्वविदित है कि काशी विश्वनाथ और श्री कृष्ण जन्मभूमि से सटी मस्जिद बनाने के पीछे तत्कालीन मुस्लिम शासकों का उद्देश्य हिन्दू धर्मावलंबियों को आतंकित करना ही था। विश्वनाथ मंदिर पर तो अनेक बार आक्रमण किए गए। आजादी के बाद से  ही कहा जा रहा है कि हिंदुओं के प्रमुख आराध्य श्री राम , श्री कृष्ण और महादेव शिव से जुड़े पवित्र धर्मस्थलों पर बनी मस्जिदें मंदिरों का ही हिस्सा हैं इसलिए वह स्थान हिंदुओं को लौटा दिया जाए किंतु मुस्लिम समुदाय का एक भी व्यक्ति उस हेतु राजी नहीं हुआ। अयोध्या  विवाद  का हल भी बाबरी ढांचे में मिले हिन्दू प्रतीक चिन्हों के आधार पर ही सर्वोच्च न्यायालय द्वारा किया गया । उसी के बाद से ज्ञानवापी और शाही मस्जिद के मामले ने जोर पकड़ा और  वह निचली अदालतों से होता हुआ सर्वोच्च न्यायालय तक जा पहुंचा जिसने दोनों जगहों पर सर्वेक्षण के आदेश दिए ताकि वास्तविक स्थिति का पता लग सके । होना तो ये  चाहिए था  कि मुस्लिम धर्मगुरु अपने समुदाय को ये समझाइश देते कि सर्वेक्षण के आधार पर यदि हिन्दू पक्ष का दावा सही साबित होता है तो बजाय हठधर्मिता के उन्हें वे स्थान हिंदुओं को सौंप देना चाहिए। वैसे तो मुस्लिम शासकों के दौर में पूरे देश के भीतर हजारों मंदिर ध्वस्त किए गए किंतु अयोध्या , काशी और मथुरा चूंकि सनातन धर्मियों की आस्था के बड़े केंद्र हैं इसलिए उन पर बनाई मस्जिदें भावनाओं को आहत करने वाली हैं। बेहतर तो यही होगा कि मुस्लिम पक्ष  सर्वेक्षण के कार्य में सहयोग करे क्योंकि अदालत बिना पुख्ता सबूत के  कोई भी फैसला नहीं करेगी । अयोध्या का मामला भी बाबरी ढांचा गिरने के कई दशक बाद  तभी निपटा जब पुरातत्व सर्वेक्षण में उसके हिन्दू मंदिर होने के प्रमाण सामने आए। ज्ञानवापी और शाही मस्जिद में भी यदि हिन्दू  मंदिर होने के साक्ष्य मिलते हैं तब अक्लमंदी तो यही  होगी कि मुस्लिम धर्मगुरु स्वेच्छा से वे स्थल हिंदुओं को सौंपकर सद्भावना का वातावरण बनाने आगे आएं। इतिहास की गलतियों को सुधारकर अनेक समस्याओं से बचा जा सकता है। मुस्लिम समुदाय को ये जानना चाहिए कि कांग्रेस सहित अनेक राजनीतिक दलों द्वारा छद्म धर्मनिरपेक्षता और तुष्टीकरण के कारण उसको मुख्य धारा में शामिल नहीं होने दिया गया । उसी का परिणाम है कि वह धार्मिक कट्टरता में फंसकर शिक्षा के क्षेत्र में बेहद पीछे रह गया। यदि वह अभी भी उन्हीं बेड़ियों में जकड़ा रहकर अकबर और औरंगजेब के दौर से बाहर नहीं निकला तो फिर उसको अपनी बेहतरी के बारे में सोचना बंद कर देना चाहिए। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 15 December 2023

संसद में घुसने वालों के पीछे छिपी ताकतों का पर्दाफाश भी जरूरी


लोकसभा में कुछ युवकों के दर्शक दीर्घा से कूदकर सदन में आ जाने और रंगीन धुआं छोड़ने वाली स्मोक गन का उपयोग करने के बाद पूरे देश में संसद की सुरक्षा को लेकर सवाल उठ रहे हैं। इन युवकों के कुछ साथी सदन के बाहर प्रांगण में नारेबाजी के साथ रंगीन धुआं उड़ाते रहे। इस वारदात को अंजाम देने वाले सभी 6 आरोपी पुलिस की गिरफ्त में आ चुके हैं। जिन सुरक्षा कर्मियों की लापरवाही से दो युवक जूते में छिपाकर स्मोक गन दर्शक दीर्घा तक ले जा सके वे सभी निलंबित कर दिए गए।  गत दिवस संसद में इसे लेकर खूब हंगामा हुआ। विपक्ष ने गृहमंत्री अमित शाह से त्यागपत्र मांगा जो स्वाभाविक भी था।  सबसे ज्यादा उंगलियां मैसूर से  भाजपा के सांसद प्रताप सिम्हा पर उठ रही हैं जिनकी सिफारिश पर सदन में कूदे युवकों को प्रवेश पत्र जारी हुआ था। आम तौर पर सभी सांसद अपने क्षेत्र के लोगों के अलावा परिचितों को संसद की कार्रवाई देखने हेतु प्रवेश पत्र जारी करने की अनुशंसा करते हैं। लेकिन जूते के भीतर स्मोक गन छिपाकर ले जाने के लिए सुरक्षा जांच में लापरवाही ही  जिम्मेदार मानी जाएगी। बावजूद इसके श्री सिम्हा से पूछताछ होनी चाहिए और यदि ऐसा लगे कि उन्होंने प्रवेश पत्र जारी करवाने में किसी भी प्रकार की लापरवाही बरती तो उनकी सदस्यता समाप्त किए जाने के साथ ही जो भी उचित दंड हो दिया जावे  , ताकि बाकी सांसद  सतर्क हो जाएं। गृहमंत्री श्री शाह को भी घटना की विस्तृत जानकारी संसद के माध्यम से देश को देते हुए आश्वस्त करना चाहिए कि संसद की सुरक्षा में कोई कमी नहीं छोड़ी जावेगी। वारदात में शरीक सभी लोग तानाशाही नहीं चलेगी जैसे नारे लगाते हुए खुद को बेरोजगारी से त्रस्त बता रहे थे। शहीदे आजम भगतसिंह के नाम पर बने किसी संगठन से इनका जुड़ाव बताया जा रहा हैं। रोचक तथ्य ये है कि वे सभी अलग - अलग - अलग स्थानों के रहने वाले हैं और सोशल मीडिया के जरिए संपर्क में आए। लेकिन उन्होंने संसद में घुसकर हंगामा करने और स्मोक गन का उपयोग कर सनसनी फैलाने का फैसला क्यों किया ये गंभीर प्रश्न है। पकड़ी गई महिला की दिल्ली में हुए सरकार विरोधी आंदोलनों में उपस्थिति से ये संदेह व्यक्त किया जा रहा है कि उसके विपक्ष , विशेष रूप से वामपंथी संगठनों से रिश्ते हैं। अनेक विपक्षी नेताओं ने पकड़े गए लोगों को भटका हुआ बताकर बचाव भी किया और ये प्रचारित करने की कोशिश की कि बेरोजगारी से बढ़ते तनाव के कारण वे ऐसा कदम उठाने मजबूर हुए। यद्यपि ये दलील किसी के गले नहीं उतर रही क्योंकि ये युवक संसद के बाहर अर्थात जंतर - मंतर पर भी धरना - प्रदर्शन कर सकते थे। यदि उनका उद्देश्य महज चर्चाओं में आने का था तो उसके लिए वे और भी कोई उपाय तलाश सकते थे। उन सभी पर यूएपीए जैसे सख्त कानून के अंतर्गत कार्रवाई की जा रही है। लेकिन विपक्ष के कुछ नेताओं सहित वामपंथी रुझान वाले यूट्यूब चैनल चलाने वाले पत्रकारों ने उनका बचाव करते हुए इस कृत्य को  युवाओं में बढ़ते असंतोष का प्रदर्शन बताया जिससे  लगने लगा है कि ये भी शाहीन बाग जैसे किसी प्रयोग की कोशिश है जिसे कांग्रेस , वामपंथी और मुस्लिम कट्टरपंथी ताकतों का मिला जुला समर्थन था। दिल्ली में साल भर चले किसान आंदोलन के बारे में  भी  जब ये कहा गया कि उसमें खालिस्तानी तत्व घुस आए हैं तो उसे किसानों को बदनाम करने का सरकारी षडयंत्र बताया गया किंतु गणतंत्र दिवस के दिन लाल किले पर उत्पात होने और कुछ निहंगों द्वारा वहां तिरंगे वाली जगह धार्मिक ध्वज फहराए जाने के बाद  किसान नेताओं के सामने सिवाय माफी मांगने के और कोई चारा नहीं बचा। लेकिन महेंद्र सिंह टिकैत को उस घटना के पीछे भी रास्वसंघ का हाथ दिखाई दिया। जेएनयू, जामिया मिलिया , उस्मानिया , अलीगढ़ मुस्लिम और जादवपुर  विवि में भारत विरोधी नारे  , नागरिकता कानून और कृषि कानून जैसे अनेक मामलों में हुए आंदोलन को जिस योजनाबद्ध तरीके से प्रचार दिया गया उसके पीछे मोदी सरकार की छवि जनविरोधी बनाने की कार्ययोजना ही रही। हालिया विधानसभा चुनाव में भाजपा को तीन राज्यों में मिली सफलता ने कुंठित मानसिकता वाले पत्रकारों और उनके सरपरस्त विपक्षी राजनेताओं के पेट में जो मरोड़ पैदा किया उसकी प्रतिक्रिया इस तरह की वारदातों के रूप में  सामने आती रहेगी ।किसान आंदोलन के समर्थन में अमेरिका , कैनेडा और ब्रिटेन में हुए आंदोलन इसका प्रमाण थे। संसद में घुसे युवकों ने भले ही कोई हिंसा न की हो किंतु उनका अपराध राष्ट्रविरोधी कृत्य है जिसकी कड़ी सजा उनको तो मिलेगी ही किंतु इस प्रयास के पीछे जिन लोगों का दिमाग है उनकी गर्दन पर भी फंदा कसा जाना चाहिए। अफजल गुरु जैसे गद्दार से सहानुभूति रखने वाले नए - नए रूपों में  सामने आते हैं। 

-रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 14 December 2023

चुनाव तो जीत लिए लेकिन अब रेवड़ियों का इंतजाम करने में पसीने छूटेंगे



पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव सम्पन्न होने के बाद मुख्यमंत्री भी शपथ ले चुके हैं। जल्द ही मंत्रीमंडल भी आकार ले लेंगे। मिजोरम तो ज्यादा चर्चा में नहीं रहा किंतु तेलंगाना , म.प्र , छत्तीसगढ़ और राजस्थान में लोगों की उत्सुकता बनी रही। भाजपा और कांग्रेस जीत हार का विश्लेषण करने में जुटी हैं जिससे कि लोकसभा चुनाव के लिए सटीक रणनीति बनाई जा सके। इसमें दो राय नहीं हैं कि हिमाचल और कर्नाटक में मिली हार के बाद भाजपा दबाव में थी। उधर विपक्ष भी इंडिया गठबंधन के रूप में एकजुट होने लगा था। लेकिन तीन राज्यों की जीत ने भाजपा का मनोबल बढ़ा दिया है। और इसीलिए पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने मुख्यमंत्री चयन करने में सबको चौंका दिया। कांग्रेस द्वारा उक्त चारों राज्यों में जातीय जनगणना करवाए जाने का जो वायदा किया उसका उद्देश्य ओबीसी और दलितों को लुभाना था। इसीलिए तीन राज्यों में भाजपा द्वारा क्रमशः आदिवासी , ओबीसी और सवर्ण मुख्यमंत्री बनाए जाने के साथ ही जो दो - दो मुख्यमंत्री बनाए गए उनमें भी जातीय संतुलन का जबरदस्त ध्यान रखा जिसके कारण जाति की राजनीति करने वाले क्षेत्रीय दल सकते में आ गए हैं। लेकिन असली मुद्दा जो उक्त चार राज्यों में चर्चित रहा वह था मुफ्त उपहारों का ऐलान। तेलंगाना में के. सी राव की बीआरएस सत्ता में थी जबकि म.प्र में भाजपा और राजस्थान तथा छत्तीसगढ़ कांग्रेस के कब्जे में थे। इन चारों राज्यों की सरकारों ने जनकल्याण के नाम पर जिस तरह की योजनाएं और कार्यक्रम लागू कर किए उनकी वजह से सरकारी खजाने पर जबरदस्त बोझ पड़ रहा था। रही - सही कसर पूरी कर दी चुनावी वायदों ने। हालांकि चुनाव परिणामों से मिले संकेत विरोधाभासी हैं। उदाहरण के लिए म.प्र अकेला राज्य है जहां मुफ्त और नगद राशि देने वाली योजनाएं भाजपा की सत्ता में वापसी का आधार बन गईं किंतु तेलंगाना , राजस्थान और छत्तीसगढ़ की सरकारों द्वारा दोनों हाथों से खजाना लुटाए जाने के बावजूद वे बुरी तरह चुनाव हार गईं। इसीलिए म.प्र में शिवराज सरकार की जिस लाड़ली बहना योजना को चुनाव जिताऊ माना गया उस पर अनेक भाजपा नेताओं ने ही सवाल खड़े करते हुए कहा कि राजस्थान और छत्तीसगढ़ में तो भाजपा विपक्ष में रहते हुए ही जीती । इसका अर्थ ये हुआ कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा चला गया मोदी की गारंटी वाला दांव ज्यादा कारगर साबित हुआ। तेलंगाना में चूंकि भाजपा का संगठन उतना सुदृढ़ नहीं है वरना वहां भी भाजपा को सत्ता मिलती। बहरहाल, अब भाजपा और कांग्रेस दोनों के सामने ये समस्या आ खड़ी हुई है कि वे उन वायदों को कैसे पूरा करेंगे जबकि खजाना तो पहले से ही खस्ता हालत में हैं। जो जानकारी आई है उसके अनुसार उक्त राज्यों में वेतन और पेंशन बांटने में रुकावट आ रही है । विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं के अन्तर्गत मिलने वाली धनराशि महीनों से हितग्राहियों के खाते में जमा नहीं हुई। शिवराज सिंह इस बात को संभवतः भांप चुके थे इसीलिए उन्होंने भूतपूर्व होने के दो दिन पहले ही लाड़ली बहना की राशि हितग्राहियों के खातों में जमा करवा दी। इस चुनाव में भाजपा और कांग्रेस दोनों ने जिस तरह के मुफ्त उपहारों का वायदा किया उनको पूरा करने के लिए संसाधन कहां से आयेंगे इसका उत्तर किसी के पास नहीं है। इस बारे में रोचक बात ये है कि विपक्ष में बैठी पार्टी सत्ता पक्ष पर खजाना खाली करने का आरोप लगाती है किंतु सत्ता में आने के लिए वह भी ऐसे ही प्रलोभन देने में पीछे नहीं रहती। उदाहरण के लिए म.प्र को ही लें तो यहां चुनाव के कई महीने पहले कांग्रेस नेत्री प्रियंका वाड्रा ने उन्हीं पांच गारंटियों का ऐलान कर दिया जिनके दम पर पार्टी को हिमाचल और कर्नाटक में सफलता हासिल हुई थी। भाजपा चूंकि उक्त राज्य गंवा चुकी थी अतः उसने बिना देर लगाए लाड़ली बहना योजना लागू कर दी और 450 रु. में रसोई गैस सिलेंडर देना शुरू कर दिया। हालांकि कांग्रेस ने ओल्ड पेंशन योजना लागू करने का वायदा भी किया किंतु शिवराज सरकार ने जो पहल की उसके कारण कांग्रेस के वायदे हवा में झूलते रह गए। अब आम जनता सवाल पूछ रही है कि यदि गैस सिलेंडर 450 रु. में देने से सरकार को कोई नुकसान नहीं होता तो फिर सभी को ये फायदा मिलना चाहिए और यदि नुकसान हो रहा है तो कितने समय तक वह ये बोझ उठा सकेगी , ये सवाल राष्ट्रीय विमर्श का विषय बनता जा रहा है। प्रधानमंत्री श्री मोदी खुद रेवड़ी राजनीति की आलोचना कर चुके हैं । लेकिन जिस तरह आरक्षण के बारे में कोई भी पार्टी किसी प्रकार का खतरा नहीं उठाना चाहती ठीक वैसे ही मुफ्त उपहारों की योजनाओं को शुरू करने के बाद रोकना या वापस लेना खतरे से खाली नहीं है। ऐसा लगता है सर्वोच्च न्यायालय को ही स्वतः संज्ञान लेते हुए इस बंदरबांट पर रोक लगानी पड़ेगी वरना आर्थिक प्रगति के सारे आंकड़े मुफ्तखोरी के खेल में उलझकर रह जाएंगे।

- रवीन्द्र वाजपेयी 

Wednesday, 13 December 2023

भाजपा एक साथ मंडल और कमंडल दोनों को साध रही


म.प्र में आज मोहन यादव के अलावा छत्तीसगढ़ में  विष्णु देव साय ने मुख्यमंत्री की शपथ ले ली। इन दोनों का चयन चौंकाने वाला बताया जा रहा था। पहले आदिवासी और फिर ओबीसी मुख्यमंत्री बनाकर भाजपा ने विपक्ष के  जातीय जनगणना वाले मुद्दे की हवा निकाल दी। लेकिन उससे भी बड़ा दांव चल दिया राजस्थान में जहां पहली  बार विधायक बने भजनलाल शर्मा को मुख्यमंत्री बनाकर  इस अवधारणा को गलत साबित कर दिया कि भाजपा में सवर्ण जातियों को पीछे धकेला जा रहा है।  इस प्रकार जिस सोशल इंजीनियरिंग का ढिंढोरा पीटकर विपक्षी पार्टियां भाजपा को ओबीसी और दलित विरोधी बनाती रहीं उसे भाजपा ने ज्यादा बेहतर तरीके से लागू किया है। नब्बे के दशक में जब विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार ने मंडल आयोग की सिफारिशें लागू कर ओबीसी के लिए 27 फीसदी आरक्षण की व्यवस्था की , उसी समय भाजपा का राम मंदिर मुद्दा भी गरमा उठा और लालकृष्ण आडवाणी सोमनाथ से रथ यात्रा लेकर अयोध्या के लिए निकल पड़े। राजनीतिक विश्लेषकों ने तब ये कहा था कि मंडल का जवाब भाजपा ने कमंडल के रूप में दिया क्योंकि तमाम सनातनी साधु - संत राम मंदिर के कारण भाजपा के साथ खड़े हो गए थे । ये कहना भी पूरी तरह सही होगा कि भाजपा को सत्ता के शिखर तक पहुंचाने में वह रथ यात्रा नींव का पत्थर साबित हुई। लेकिन जल्द ही पार्टी के वैचारिक अभिभावक रास्वसंघ को ये महसूस होने लगा कि मंडलवादी ताकतों के क्षेत्रीय वर्चस्व को तोड़ने के लिए समाज के जातीय संतुलन और समरसता को ध्यान में रखते हुए ही आगे बढ़ा जा सकता है। और उसी का परिणाम है कि उ.प्र जैसे राज्य में भाजपा ने जातीय राजनीति करने वाली सपा और बसपा  का आभामंडल फीका कर दिया। छोटी - छोटी अनेक जातियों और उपजातियों को अपने साथ जोड़कर भाजपा ने जो सार्थक प्रयोग किया वह कारगर होने लगा और अब कोई उसे सवर्ण और व्यापारी वर्ग की पार्टी नहीं कहता । म.प्र, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री के साथ ही विधानसभा अध्यक्ष पद हेतु चयन करते हुए भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने पीढ़ी परिवर्तन को तो ध्यान रखा ही किंतु सबसे ज्यादा महत्व दिया जातिगत संतुलन को जिसकी पूरे देश में  चर्चा हो रही है। कांग्रेस ही नहीं बल्कि नीतीश कुमार ,  अखिलेश यादव  , मायावती और तेजस्वी  यादव जैसे नेता तक हतप्रभ हैं । ये देखते हुए कहा जा सकता है कि आगामी लोकसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए भाजपा ने हिंदुत्व के अपने परंपरागत मुद्दे के साथ ही मंडलवादी ताकतों से उनका मुख्य हथियार छीन लिया है। उल्लेखनीय है आगामी 22 जनवरी को अयोध्या में राम मंदिर का शुभारंभ होने जा रहा है। संघ परिवार उस आयोजन को ऐतिहासिक बनाने के लिए जी जान से जुटा हुआ है। करोड़ों लोगों को पीले चावल भेजकर आमंत्रित किया जा रहा है। निश्चित रूप से यह आयोजन धार्मिक के साथ ही राजनीतिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण होगा । प्रधानमंत्री  को विरोधी कुशल इवेंट मैनेजर कहा करते हैं जो काफी हद तक सच भी है क्योंकि वे ऐसे किसी भी अवसर को भव्य और स्मरणीय बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ते। तीन राज्यों में भाजपा की शानदार जीत के बाद मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री चयन में जिस सूझबूझ का परिचय दिया गया वह इस बात का प्रमाण है कि भाजपा की निगाहें भविष्य पर हैं। जिस चतुराई से बेहद साधारण परिस्थिति से उठे लोगों को सत्ता के सिंहासन पर आसीन करवाया  गया उसमें सामाजिक समरसता और जातीय संतुलन के साथ ही हिंदुत्व की विचारधारा की झलक साफ नजर आती है। हिमाचल और कर्नाटक जीतने के बाद कांग्रेस के  जो हौसले सातवें आसमान पर   थे वे तीन राज्यों के चुनाव परिणाम के बाद  धरती पर आ गिरे । बावजूद इसके कि  वह तेलंगाना में सरकार बनाने में सफल रही। दरअसल उत्तर भारत के तीन राज्यों में भाजपा द्वारा बड़े बहुमत के साथ सत्ता हासिल करने से कांग्रेस सहित समूचा विपक्ष मनोवैज्ञानिक दबाव में आ गया है। इसका प्रमाण चुनाव परिणाम आने के बाद हुई बयानबाजी से मिला । यही नहीं इंडिया नामक गठबंधन भी  आकार लेने के पहले ही बिखराव का शिकार होता लग रहा है। राहुल गांधी को अपनी पूर्व निर्धारित विदेश यात्रा रद्द करनी पड़ी। कुछ समय पहले तक ये लगने लगा था कि मोदी लहर कमजोर पड़ने लगी है।लेकिन तीन राज्यों की जीत के बाद भाजपा ने उस आशंका को निराधार साबित कर दिया। जनवरी में राम मंदिर का शुभारंभ निश्चित रूप से उसके पक्ष में  लहर उत्पन्न करेगा। सर्वोच्च न्यायालय ने भी धारा 370 हटाए जाने को विधि सम्मत बताकर प्रधानमंत्री की प्रतिष्ठा को और बढ़ा दिया ।

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रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 12 December 2023

मोहन यादव का चयन भविष्य को ध्यान में रखकर किया गया : एक तीर से कई निशाने साधे गए


भाजपा द्वारा म.प्र में ओबीसी मुख्यमंत्री बनाए जाने की संभावना के साथ ही ये भी माना जा रहा था कि लोकसभा चुनाव तक शिवराज सिंह चौहान ही बने रहेंगे ताकि उनकी लोकप्रियता का लाभ  लिया जा सके। लेकिन केंद्रीय नेतृत्व ने सभी अनुमान ध्वस्त करते हुए उनकी ही सरकार में उच्च शिक्षा मंत्री रहे मोहन यादव को मुख्यमंत्री बनवा दिया। साथ ही  जातीय संतुलन का ध्यान रखते हुए जगदीश देवड़ा और राजेंद्र शुक्ल को उपमुख्यमंत्री और नरेंद्र सिंह तोमर को विधान सभा अध्यक्ष की कुर्सी सौंप दी। मंत्रीमंडल के बारे में शपथ ग्रहण के समय ही स्थिति स्पष्ट होगी क्योंकि आज की भाजपा में महत्वपूर्ण  निर्णयों को लेकर अंत तक गोपनीयता बनाए रखी जाती है। मुख्यमंत्री की दौड़ में शामिल रहे अन्य नेताओं के भविष्य को लेकर अटकलें लगाई जाने लगी हैं। दरअसल पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व को श्री चौहान के विकल्प के तौर पर ऐसे नेता की तलाश थी जो प्रतिबद्धता , योग्यता और क्षमता तीनों कसौटियों पर खरा साबित होने के साथ ही जातीय समीकरणों के लिहाज से भी स्वीकार्य हो। 58 वर्षीय श्री यादव अभाविप और भाजपा के साथ ही  रास्वसंघ से भी जुड़े रहे। ये देखते हुए उनकी वैचारिक प्रतिबद्धता प्रमाणित है। कांग्रेस द्वारा ओबीसी को लुभाने के लिए जो दांव चले जा रहे थे उनको बेअसर करने के लिए भाजपा ने ये पैंतरा चल दिया । सच तो ये है कि भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व और रास्वसंघ दीर्घकालीन लक्ष्यों पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं। बीते दस सालों में नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने भाजपा को भविष्य की पार्टी बनाने की जो कार्ययोजना बनाई उसे लागू करने में कुछ गलतियां भी हुईं ।  जिनकी वजह से अनेक राज्यों में पार्टी को नुकसान उठाने पड़े  किंतु उन गलतियों को सुधारने की प्रक्रिया भी उतनी ही तेजी से चलने की वजह से ही वह राष्ट्रीय स्तर पर मजबूती से अपने पैर जमाए रखने में सफल है। म.प्र, छत्तीसगढ़ और राजस्थान 2018 में हाथ से निकाल जाने के बाद 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने यहां कांग्रेस को चारों खाने चित्त कर दिया। और पांच साल बाद तीनों में शानदार जीत हासिल कर  दिखा दिया कि गलतियों से कैसी सीखा जा सकता है।  लेकिन पार्टी नेतृत्व इस जीत से संतुष्ट होने के बजाय भविष्य की तैयारी में जुट गया जिसका प्रमाण छत्तीसगढ़ और म.प्र में मुख्यमंत्री का चयन है। वैसे भी म.प्र जनसंघ के जमाने से ही हिंदुत्ववादी राजनीति के लिए अनुकूल  रहा है। ऐसे में यहां के राजनीतिक घटनाक्रम का प्रभाव अन्य राज्यों में भी होता है। और इसीलिए इस बार पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने ऐसे  राजनीतिक समीकरण बिठाए जिससे पड़ोसी प्रदेश प्रभावित हों। मुख्यमंत्री के रूप में मोहन यादव का चयन यह दर्शाने का प्रयास भी है कि भाजपा में नेता पार्टी संचालित नहीं करते अपितु पार्टी नेताओं को चलाती है। शिवराज सिंह भी जब मुख्यमंत्री बने थे तब उनके पास संगठन और सांसदी का अनुभव तो था किंतु प्रशासनिक नहीं । लेकिन उसके बाद भी वे 18 साल से ज्यादा मुख्यमंत्री रहे और कार्यकाल के आखिरी चुनाव में भी पार्टी को जबरदस्त सफलता दिलवाई। उस दृष्टि से देखें तो श्री यादव के पास तो मंत्री पद का अनुभव भी है और उनके साथ बने दोनों उपमुख्यमंत्री भी तजुर्बेकार  हैं। कुछ महीनों बाद ही लोकसभा चुनाव की हलचल शुरू हो जाएगी । ऐसे में श्री यादव के सामने दोहरी चुनौती है। पहली तो शिवराज सरकार की जनकल्याणकारी योजनाओं को जारी रखना और दूसरी लोकसभा चुनाव में 2018 के प्रदर्शन को दोहराना। जहां तक दूसरी का सवाल है तो उसमें तो उनको ज्यादा परेशानी नहीं होगी क्योंकि लोकसभा का मुकाबला तो मोदी के नाम पर लड़ा जाएगा किंतु  लोक लुभावन योजनाओं और कार्यक्रमों की निरंतरता के साथ चुनाव घोषणापत्र में किए गए वायदों को पूरा करने के लिए आर्थिक संसाधन जुटाना बड़ी समस्या है । इस स्थिति से नए मुख्यमंत्री कैसे निपटते हैं उस पर काफी कुछ निर्भर करेगा । मंत्रीमंडल का गठन होने के बाद उनकी टीम की क्षमता का आकलन किया जा सकेगा। लेकिन भाजपा आलाकमान ने जो फैसला म.प्र के बारे में किया उसने विरोधियों से ज्यादा समर्थकों को हैरान कर दिया । हालांकि  सब कुछ बहुत सोच - समझकर किया गया है और इसके पीछे अगले एक दशक की कार्य योजना है। ऐसे समय जब प्रदेश में कांग्रेस के बड़े नेता वृद्धावस्था के कारण थके नजर आने लगे हैं और दूसरी पंक्ति का नेतृत्व पनपने ही नहीं दिया गया तब भाजपा के पास म.प्र को अपना अभेद्य दुर्ग बनाने का स्वर्णिम अवसर है। निवर्तमान मुख्यमंत्री श्री चौहान ने पार्टी को समाज के पिछड़े वर्गों से जोड़ने का जो कारनामा कर दिखाया उसके कारण श्री यादव को काफी सहूलियतें भी हैं। वे चूंकि पार्टी की विचारधारा और कार्य संस्कृति से भली - भांति  परिचित हैं इसलिए सफल मुख्यमंत्री साबित होंगे ये उम्मीद की जा सकती  है। 


-रवीन्द्र वाजपेयी