Friday, 22 December 2023

ईडी के समन से आखिर कब तक बचेंगे केजरीवाल


दिल्ली के मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल दिल्ली शराब घोटाले से संबंधित पूछताछ हेतु ईडी द्वारा भेजे गए समन की उपेक्षा करते हुए 10 दिनों के लिए अज्ञात स्थान पर चले गए जहां वे विपश्यना का अभ्यास करेंगे । कुछ माह पहले भी उन्हें ईडी द्वारा समन भेजा गया था किंतु श्री केजरीवाल ने उसे राजनीतिक करार देते हुए आने से इंकार कर दिया। ताजा समन पर उनकी आपत्ति लगभग पुरानी ही है। इस बार भी उसे राजनीतिक बनाते हुए उन्होंने ये कहा है कि ईडी ने उनके द्वारा पूर्व में उठाई गई आपत्तियों का निराकरण नहीं किया । इसके अलावा ये भी स्पष्ट नहीं है कि उनसे पूछताछ मुख्यमंत्री की हैसियत से होगी अथवा आम आदमी पार्टी संयोजक के रूप में ? ईडी के बुलावे पर उन्होंने ये भी कहा कि उनके पास छिपाने के लिए कुछ नहीं है। ऐसे में प्रश्न उठता है कि जब वे स्वयं को पारदर्शी मानते हैं तब उनको ईडी के सामने जाने में क्या परेशानी है ? इस बारे में जानकारों का कहना है कि ईडी को चूंकि समन का पालन न करने वाले की गिरफ्तारी का अधिकार नहीं है इसीलिए श्री केजरीवाल उसकी अवहेलना करने का साहस दिखा सके। कुछ लोगों का ये भी मानना है कि वे इस बात से भयभीत हैं कि पूछताछ के दौरान ही ईडी उनको गिरफ्तार कर सकती है और वैसा होने पर उनके और आम आदमी पार्टी के लिए अकल्पनीय परेशानी उत्पन्न हो सकती हैं। लोकसभा चुनाव जैसे - जैसे नजदीक आ रहे हैं वैसे - वैसे आम आदमी पार्टी की चिंता बढ़ रही हैं । श्री केजरीवाल के दाहिने हाथ कहे जाने वाले मनीष सिसौदिया और बेहद आक्रामक नेता संजय सिंह पहले से ही जेल में हैं। ऐसे में यदि मुख्यमंत्री भी गिरफ्तार हुए तो उनकी सरकार के सामने जबरदस्त संकट आ खड़ा होगा। सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि इंडिया गठबंधन का सदस्य होने के बावजूद आम आदमी पार्टी और कांग्रेस के बीच रिश्ते खटास भरे हैं। लोकसभा चुनाव के लिए सीटों के बंटवारे के सवाल पर दिल्ली और पंजाब में आम आदमी पार्टी कांग्रेस के लिए सीटें छोड़ने के प्रति अनिच्छुक है। दिल्ली प्रदेश के तमाम दिग्गज भी आम आदमी पार्टी के साथ गठबंधन के विरुद्ध हैं। शराब घोटाले में हो रही कार्रवाई का भी अनेक कांग्रेसी नेताओं ने समर्थन किया है। इन परिस्थितियों में श्री केजरीवाल का गिरफ्तार होना कांग्रेस के लिए तो फायदेमंद रहेगा किंतु आम आदमी पार्टी की ऐंठ खत्म हो जावेगी। 19 दिसंबर को दिल्ली में हुई इंडिया गठबंधन की बैठक में प.बंगाल की मुख्यमंत्री और तृणमूल नेत्री ममता बैनर्जी द्वारा नरेंद्र मोदी के मुकाबले प्रधानमंत्री पद हेतु कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे का नाम प्रस्तावित किए जाने पर श्री केजरीवाल ने जिस तत्परता से उसका समर्थन किया उससे कांग्रेस के साथ ही नीतीश कुमार और अखिलेश यादव भी खफा हैं। ऐसे में यदि ईडी द्वारा उनको गिरफ्तार किया गया तो हो सकता है उनको कांग्रेस सहित उक्त नेताओं का वैसा समर्थन मिलना संदिग्ध है जिसकी उन्हें अपेक्षा होगी। यही वजह है कि वे विपश्यना के बहाने 10 दिन के लिए दिल्ली से बाहर चले गए। लेकिन कहावत है बकरे की मां कब तक खैर मनाएगी, और उस दृष्टि से श्री केजरीवाल ईडी के बुलावे को कब तक टालते रहेंगे ये सोचने वाली बात है। यदि समन के पीछे राजनीति होने के उनके आरोप को सही मान लें तब भी किसी कानूनी प्रक्रिया से वे ज्यादा समय तक नहीं बच सकेंगे। और उनके इर्दगिर्द शक का घेरा बड़ा होता जाएगा। उन्हीं की तरह झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन भी ईडी के समन की अवहेलना करते हुए गैर हाजिरी के लिए नए - नए बहाने खोज रहे हैं। जहां तक बात श्री केजरीवाल की है तो एक बात तो उन्हें माननी ही होगी कि शराब घोटाले में गिरफ्तार हुए उनके उपमुख्यमंत्री श्री सिसौदिया और सांसद श्री सिंह की जमानत अदालतों द्वारा लगातार रद्द की जाती रही है। ऐसे में शराब घोटाले के संबंध में आए समन को राजनीति से प्रेरित बताने का दिल्ली के मुख्यमंत्री का प्रयास गले नहीं उतर रहा। बेहतर तो यही होगा कि वे विपश्यना  से लौटने के बाद खुद ईडी के सामने प्रस्तुत हों और उसके सवालों का उत्तर दें क्योंकि वे ज्यादा समय तक उससे बच नहीं सकेंगे।

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रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 21 December 2023

सस्ते न्याय के बिना आजादी अधूरी है



लोकसभा में गत दिवस भारतीय न्याय संहिता , भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता और भारतीय साक्ष्य अधिनियम विधेयक पारित हो गए। अब इनको राज्यसभा में भी पेश किया जाएगा । उसकी स्वीकृति के बाद राष्ट्रपति के हस्ताक्षर होकर ये कानून का रूप ले लेंगे । ब्रिटिश काल के दंड संहिता और साक्ष्य संबंधी कानूनों को बदलने की मांग लंबे समय से चली आ रही थी। राजद्रोह जैसे कानूनों के दुरुपयोग का मुद्दा भी गर्माता रहा। इसके साथ ही अदालत में प्रकरण की सुनवाई का अंतहीन सिलसिला भी न्याय प्रणाली के प्रति गुस्से में वृद्धि का कारण बनता गया।  सुनवाई होने के बाद फैसला सुनाने की अवधि निश्चित न होने से भी आशंकाएं जन्म लेती थीं। कुल मिलाकर ये कहना गलत नहीं है कि भले ही 1947 में भारत ने अंग्रेजों से आजादी हासिल कर ली और 26 जनवरी 1950 से अपना संविधान लागू होने के बाद हम सार्वभौमिक गणराज्य की हैसियत में आ गए किंतु  कानूनों का  अंबार न सिर्फ आम जनता अपितु कानूनविदों के लिए भी मुश्किलें खड़ी करता रहा है। इसी तरह तमाम दावों के बावजूद न्याय प्रणाली पर भी अंग्रेजी राज की छाया बनी हुई है। सैकड़ों अपराधिक कानून ऐसे रहे जो कभी उपयोग में नहीं आने के बाद भी किताबों की शोभा बढ़ाते हैं । उनके दुरुपयोग की शिकायतें भी यदाकदा आती रहीं। राजद्रोह भी उनमें से ही है। सवाल ये उठता है कि आज तक इस बारे में क्यों नहीं सोचा गया , और यदि सोचा गया तो समुचित कदम उठाने से परहेज करने की वजह क्या रही ? बीते 75 सालों में न्याय व्यवस्था में समयानुसार बदलाव और सुधार हेतु अनेक समितियां और आयोग बने । उनकी रिपोर्ट और अनुशंसा पर समाज और संसद तक में विमर्श हुआ। कुछ पर अमल भी किया गया किंतु न्याय प्रणाली में परिस्थितिजन्य सुधार के प्रति साहस की बजाय उदासीनता का आलम बरकरार रहा।  रोचक बात ये है कि कानून मंत्री के पद पर देश के अनेक प्रख्यात अधिवक्ताओं के पदस्थ रहने के बाद भी कानूनों का जो ढांचा अंग्रेज छोड़ गए थे उसको भारतीय जरूरतों और हालातों के अनुसार ढालने के प्रति उदासीनता ही बरती गई। कई बार तो ऐसा लगा जैसे कानूनों की किताबों को धार्मिक ग्रंथ मानकर उनमें बदलाव को पाप समझा जाता रहा। बहरहाल , वर्तमान केंद्र सरकार की प्रशंसा करनी होगी जिसने अपना दूसरा कार्यकाल खत्म होने के पहले यह क्रांतिकारी कदम उठाकर न्याय प्रणाली में महत्वपूर्ण सुधार करने का साहस दिखाया। हालांकि ऐसे कार्यों का आम जनता द्वारा समुचित संज्ञान नहीं लिया जाता किंतु कानून और न्याय व्यवस्था से जुड़े वर्ग में  निश्चित रूप से इन विधेयकों का स्वागत किया जावेगा। इनके पारित होने के बाद कई स्थापित परिभाषाएं और अवधारणाएं बदल जाएंगी। कानूनों  की अधिकता के साथ ही उनमें व्याप्त जटिलता और   फैसले में विलंब जैसी विसंगति दूर करने के लिए उठाए गए इस कदम का सकारात्मक असर देखने मिलेगा  । यद्यपि अभी भी कतिपय  न्यायाधीशों में अंग्रेजी राज वाली श्रेष्ठता का भाव देखने मिलता है किंतु दूसरी तरफ न्यायाधीशों की नई पीढ़ी में अनेक चेहरे ऐसे भी हैं जो आम जनता की पीड़ा को गंभीरता से महसूस करते हुए संवेदनशीलता का परिचय देते हैं। सही बात ये है कि अंग्रेजों के समय अदालतों में बैठे मी लॉर्ड नस्लीय भेदभाव की मानसिकता से प्रेरित होने के कारण भारतीयों के प्रति अनुदार रहते थे । आजादी के बाद उस स्थिति में तो सुधार हुआ है परंतु न्याय प्राप्त करने की प्रक्रिया इतनी कठिन और महंगी है कि आम जनता आज भी खून के आंसू रोने बाध्य है। नए विधेयकों के कानून में तब्दील होने के बाद निश्चित तौर पर अनेक स्वागत योग्य बदलाव देखने मिलेंगे किंतु केंद्र सरकार को चाहिए वह न्याय प्राप्त  करने में आने वाले खर्च को कम करने संबंधी कदम भी उठाए। वकीलों की आसमान छूती फीस के कारण अनेक लोग अदालत जाने का साहस ही नहीं बटोर पाते। ये आरोप भी लगते रहे हैं  कि न्यायाधीश लाखों रुपए प्रतिदिन की फीस लेने वाले दिग्गज अधिवक्ताओं से प्रभावित होकर फैसले देते हैं। केंद्र सरकार आम जनता के कल्याण के लिए अनेक योजनाओं का संचालन करती है। अच्छा हो आम जनता को सस्ता  न्याय दिलवाने के लिए भी कोई योजना बने क्योंकि इसके बिना आजादी अधूरी ही कही जाएगी।


-रवीन्द्र वाजपेयी 


Wednesday, 20 December 2023

इंडिया : चार बैठकों के बाद भी न नेता तय न रणनीति



जैसी उम्मीद थी वैसा ही हुआ। इंडिया गठबंधन की बहुप्रतीक्षित बैठक  चाय - पानी के बाद एक सामूहिक चित्र खिंचवाकर समाप्त हो गई। कहा जा रहा था कि इसमें  संयोजक के साथ ही लोकसभा चुनाव के लिए सीटों के बंटवारे का आधार निश्चित कर लिया जाएगा। पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के परिणामों के बाद 7 दिसंबर को जो बैठक आयोजित थी वह ज्यादातर घटक दलों के नेताओं द्वारा आने में असमर्थता व्यक्त किए जाने से रद्द कर दी गई। कांग्रेस उस समय तीन राज्यों की करारी पराजय के बाद सदमे में थी। बहरहाल , गत दिवस दिल्ली  में विपक्षी दलों के शीर्ष नेता जमा हुए। इस बैठक का उद्देश्य 2024 के लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को तिकड़ी बनाने से रोकने हेतु सेनापति और रणनीति तय करना था किंतु दोनों ही काम नहीं हो सके । जिसकी मुख्य वजह ये रही कि बाकी के दलों में कांग्रेस का नेतृत्व स्वीकार करने के प्रति झिझक कम होने का नाम नहीं ले रही। इसका प्रमाण तब मिल गया जब बैठक के पूर्व शिवसेना (उद्धव) के मुखपत्र सामना में साफ - साफ लिखा गया कि इंडिया 27 घोड़ों वाला रथ है किंतु इसका कोई सारथी नहीं होने से वह जमीन में धंस गया है। इसी के साथ कांग्रेस पर भी  तंज कसा गया कि बजाय 150 सीटें जीतने की कार्ययोजना बनाने के वह 138 साल पूरे होने के जश्न में डूबी हुई है। स्मरणीय है पार्टी के प्रवक्ता संजय राउत काफी समय से उद्धव ठाकरे को संयोजक बनाने की मांग कर रहे हैं। यद्यपि उसका किसी भी घटक दल ने समर्थन नहीं किया जिससे लगता है कि उन सबमें  विश्वास की कमी है। इसका प्रमाण भी तब मिल गया जब कांग्रेस की तरफ से तो  संयोजक का नाम तय करने की पहल नहीं हुई किंतु प.बंगाल की मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस की सर्वेसर्वा ममता बैनर्जी ने प्रधानमंत्री के लिए श्री खरगे का नाम प्रस्तावित कर दिया । कांग्रेस के लिए ये एक असहज करने वाली बात थी जिसे राहुल गांधी के अलावा किसी और का नाम  मंजूर ही नहीं है। इसीलिए बैठक के बाद खरगे जी ने ये मुद्दा चुनाव के बाद बहुमत आने तक के लिए छोड़ने की बात कह डाली किंतु संयोजक तय करने में क्या अड़चन थी , ये बताने वाला कोई नहीं है। इसी तरह सीटों के बंटवारे को लेकर भी कोई ठोस नीति बनाने की बजाय राज्य स्तर पर रास्ता निकालने की बात कही गई और क्षेत्रीय दलों के वर्चस्व वाले 6 राज्यों के लिए अनौपचारिक समिति भी बनाई गई जो 14 जनवरी तक निर्णय करेगी। लेकिन इसका आधार तय नहीं होने से अनिश्चितता बनी रहेगी । सबसे बड़ी बात ये रही कि जब ममता ने श्री खरगे का नाम प्रधानमंत्री के लिए आगे बढ़ाया तब आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल ने तो बिना देर लगाए समर्थन कर दिया किंतु अन्य दलों के नेताओं ने चुप्पी साधे रखी। स्मरणीय है इंडिया के अस्तित्व में आने के पहले ममता ने जिस तीसरे मोर्चे की कोशिश की थी उसमें श्री केजरीवाल भी साथ थे। यद्यपि तृणमूल नेत्री मन ही मन खुद भी प्रधानमंत्री पद पर आसीन होने की इच्छा रखती हैं किंतु राहुल का सीधा विरोध करने के बजाय उन्होंने श्री खरगे का कंधा उपयोग करने की चाल चली। इसका मकसद किसी भी तरह से श्री गांधी को रोकना है। संयोजक का मसला अनसुलझा रहने का कारण भी कांग्रेस ही है जो किसी भी स्थिति में लगाम दूसरे किसी दल के नेता के हाथ नहीं देना चाहती। रही बात सीटों के बंटवारे की तो जब तक गठबंधन का कोई चेहरा तय नहीं होता तब तक इस बारे में आगे बढ़ना संभव नहीं होगा।  राज्य स्तर पर गठबंधन की जो बात उठी वही सबसे बड़ी अड़चन है क्योंकि कांग्रेस और क्षेत्रीय दलों में इसी मुद्दे पर जमकर टकराव होगा। हाल ही में हुए म.प्र विधानसभा के चुनाव में समाजवादी पार्टी और जनता दल (यू) ने कांग्रेस द्वारा  बेरूखी दिखाई जाने के बाद अपने उम्मीदवार उतारे थे। अब सवाल ये है कि अखिलेश यादव और नीतीश कुमार क्रमशः उ.प्र और बिहार में कांग्रेस को कितनी सीटें देंगे ? ये प्रश्न इसलिए महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि जिस आधार पर अपने प्रभावक्षेत्र वाले राज्यों में कांग्रेस अपना हाथ ऊपर रखना चाहती है वही नजरिया  क्षेत्रीय दलों का उनके वर्चस्व वाले राज्यों में है। लोकसभा चुनाव में कांग्रेस 350 सीटों पर खुद लड़ना चाहती है जबकि बाकी के दल उसे 250 से ज्यादा देने राजी नहीं हैं। इस मुकाबले के लिए भाजपा ने अपनी मैदानी तैयारियां लगभग पूरी कर ली हैं। ऐसे में यदि इंडिया गठबंधन बेनतीजा  बैठकें ही करता रहा तो आम जनता के मन में उसके प्रति विश्वसनीयता नहीं बन पाएगी। ये सवाल तो उठने ही लगा है कि जो नेता गठबंधन का संयोजक तय नहीं कर पा रहे वे भला प्रधानमंत्री के नाम पर कैसे एकमत हो सकेंगे ?

-रवीन्द्र वाजपेयी 

Tuesday, 19 December 2023

हंगामा : इसीलिए अब संसद न प्रेरित करती है और न प्रभावित



लोकसभा और राज्यसभा के दर्जनों विपक्षी सांसदों को मौजूदा सत्र के लिए निलंबित कर दिया गया। आज की मिलाकर ये संख्या 141 हो चुकी है। लोकसभा में दो युवकों की घुसपैठ के बाद से विपक्ष सरकार पर आक्रामक है। गृहमंत्री से बयान की मांग  अनसुनी किए जाने से नाराज विपक्षी सांसद गर्भगृह में आकर सदन की कार्यवाही बाधित कर रहे थे। सरकार का कहना है कि लोकसभा सचिवालय पूरी घटना की जांच कर रहा है जिसके पूरा होते ही गृहमंत्री सदन को  जानकारी देंगे। वैसे इतने अधिक सदस्यों का एक साथ निलंबन अभूतपूर्व है। इसके औचित्य को लेकर सवाल उठना भी स्वाभाविक है। ऐसा लगता है कि सरकार शीतकालीन सत्र के बचे हुए दिनों में  लंबित विधायी कार्य पूरे करा लेना चाहती है। चूंकि इसके बाद लोकसभा का  सत्र फरवरी में होगा जिसमें नई सरकार के बनने तक खर्च चलाने के लिए कामचलाऊ बजट स्वीकृत करवाने के अलावा विदाई का माहौल रहेगा । इसलिए सही मायनों में इस लोकसभा का ये अंतिम कामकाजी सत्र ही है। ये देखते हुए इसका सुचारू रूप से चलना बेहद जरूरी है किंतु हमेशा की तरह गतिरोध जारी है। संसद में विपक्ष का हमलावर होना अनपेक्षित नहीं है। जनहित के मुद्दों पर सरकार को कठघरे में खड़ा करना उसका दायित्व है। लेकिन इसके लिए संसदीय प्रणाली में जो अपेक्षित तौर - तरीके हैं उन्हीं का उपयोग किया जाना चाहिए । हालांकि इस स्थिति के लिए केवल विपक्ष को कसूरवार ठहराना सही नहीं होगा क्योंकि अनेक मामलों में सत्ता पक्ष की हठधर्मिता भी उसे आंदोलित होने बाध्य कर देती है। बीते कुछ वर्षों में ये देखने मिला है कि सदन के निर्बाध संचालन में सत्ता और विपक्ष दोनों की रुचि नहीं है। सरकार चाहती है कि उसके द्वारा प्रस्तुत विधेयक और प्रस्ताव बिना बहस के पारित हो जाएं। दूसरी तरफ विपक्ष भी हंगामे में उलझकर बहस का अवसर गंवा देता है। ये स्थिति संसदीय प्रणाली के लिए बेहद नुकसानदेह है। एक समय ऐसा था जब संसद में महत्वपूर्ण विषयों पर होने वाली बहस सुनने के लिए दर्शक दीर्घाएं भरी होती थीं। लेकिन अब तो ये आलम है कि टेलीविजन पर सदन की कार्यवाही का सीधा प्रसारण होने पर भी लोग उसे देखने में रुचि नहीं रखते। दूसरी बात ये भी है कि अब दोनों पक्षों के पास अच्छे वक्ताओं का अभाव हो गया है। दोनों ओर से तीखे - तीखे शब्दबाण तो खूब चलते हैं लेकिन भाषा की गरिमा का ध्यान नहीं रखा जाता। कभी - कभी लगता है कि राजनीतिक दल ही अपने सांसदों को मर्यादाहीन व्यवहार की छूट देते हैं । इस मामले में दोनों पक्ष बराबर के दोषी कहे जा सकते हैं। विपक्ष ये आरोप लगाता है कि सदन से निलंबन और ऐसे ही अन्य कड़े कदम आसंदी द्वारा उसी के सांसदों के विरुद्ध उठाए जाते हैं जबकि सत्ता पक्ष के  आपत्तिजनक व्यवहार को नजरंदाज किया जाता है।   इस बारे में रोचक बात ये है कि प्रत्येक सत्र के पहले अध्यक्ष सभी दलों की बैठक बुलाकर सदन को ठीक से चलाने हेतु सहयोग मांगते हैं किंतु अपवादस्वरूप कुछ अवसरों को छोड़कर एक भी दिन ऐसा नहीं जाता जब शोर - शराबा न होता हो। इससे ज्यादा विडंबना क्या होगी कि राष्ट्रपति के अभिभाषण तक पर विपक्ष सदन में अनुपस्थित हो जाए। सांसदों के इसी गैर जिम्मेदाराना आचरण के कारण आम जनता के मन में संसद के प्रति सम्मान लगातार घटता जा रहा है। ये कहने में कुछ भी गलत नहीं है कि बीते अनेक वर्षों से संसद के दोनों सदनों में सिवाय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के एक भी लंबा भाषण सुनने नहीं मिला। विपक्ष में सबसे ज्यादा प्रतीक्षा राहुल गांधी के भाषण की रहती थी जो बोलते तो तैश में हैं किंतु विषयवस्तु से भटककर हर बात को अडानी पर ले जाने की गलती कर बैठते हैं । वैसे कांग्रेस के पास लोकसभा में शशि थरूर जैसे अनुभवी सदस्य हैं किंतु उनको समुचित अवसर नहीं मिलता। राज्यसभा में तो विपक्ष के एक से एक कद्दावर सदस्य हैं किंतु उनकी प्रतिभा हंगामे में दबकर रह जाती है। जनता के मन में इस बात को लेकर काफी गुस्सा है कि जिस संसद के संचालन पर प्रतिदिन करोड़ों रुपए खर्च होते हैं उसका ज्यादातर समय हंगामे में नष्ट हो जाता है। गर्भगृह में जाकर होहल्ला न करने के बारे में अनेक बार आम सहमति बनाई जा चुकी है किंतु उसका उल्लंघन करना सांसद अपना अधिकार समझते हैं। यही कारण है कि संसद अब न प्रेरित करती है और न ही प्रभावित। ऐसे में जब किसी को सर्वश्रेष्ठ सांसद घोषित किया जाता है तब आश्चर्य के साथ ही हंसी भी आती है। दरअसल  राजनीतिक दल उम्मीदवार तय करते समय  जीतने की क्षमता का आकलन तो करते हैं किंतु ये नहीं देखा जाता कि वह संसद में बैठने लायक है भी या नहीं । मौजूदा विवाद के लिए सत्ता और प्रतिपक्ष एक - दूसरे पर दोषारोपण करते हुए खुद को दूध का धुला साबित करने का प्रयास कर रहे हैं किंतु यथार्थ ये है कि इस दुरावस्था के लिए सभी बराबर के जिम्मेदार हैं । आज जो सत्ता में हैं वे भी विपक्ष में रहते हुए यही करते थे और जो विपक्ष में हैं उनका इतिहास भी इसी तरह का है।

- रवीन्द्र वाजपेयी 


Monday, 18 December 2023

विपक्षी एकता में सीटों का बंटवारा और संयोजक पद बन रहा बाधक


आगामी लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी की जीत को रोकने के लिए बनाए गए विपक्षी गठबंधन इंडिया की जो बैठक कल होने जा रही है उसमें सीटों के बंटवारे के फार्मूले के साथ ही संयोजक का नाम भी तय होना है। पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में  कांग्रेस तीन प्रमुख राज्यों में भाजपा के हाथों बुरी तरह पराजित हो गई। हालांकि तेलंगाना में वह जीत  गई किंतु छत्तीसगढ़ और राजस्थान  गंवाने से अन्य दलों को उस पर हावी होने का मौका मिल गया। म. प्र में भी वह तमाम अनुकूलताओं के बावजूद भाजपा को सत्ता से बाहर नहीं कर सकी। जिन तीन राज्यों में कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा वहां उसने अन्य विपक्षी दलों के साथ सीटों का बंटवारा करने से इंकार कर दिया था।  कमलनाथ , भूपेश बघेल और अशोक गहलोत जीत के प्रति इतने आश्वस्त थे कि उन्होंने इंडिया गठबंधन के किसी भी सहयोगी के लिए सीटें छोड़ने की जरूरत नहीं समझी। हालांकि कांग्रेस का कहना है कि उनमें से जो भी दल मैदान में उतरे उन्हें मिले मतों का प्रतिशत इतना कम है कि  जहां भी उसकी भाजपा के साथ सीधी टक्कर है वहां इन दलों के साथ सीटों के बंटवारे की कोई गुंजाइश नहीं है। गुजरात , हिमाचल , हरियाणा , उत्तराखंड जैसे राज्यों में कांग्रेस और भाजपा के बीच ही चुनावी जंग सीमित रहती है। दूसरी तरफ जनता दल (यू) , और राजद बिहार में  तथा समाजवादी पार्टी उ.प्र में कांग्रेस को उसी की भाषा में उत्तर देते हुए बता रही है कि इन राज्यों में वह घुटनों के बल चलने की स्थिति में है। इसलिए यदि वह उन्हें अपने प्रभावक्षेत्र में सीटें नहीं देगी तो वे भी बिहार और उ.प्र में उसके साथ वैसा ही व्यवहार करेंगे। उल्लेखनीय है कि म.प्र, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में कुल 66 लोकसभा सीटें हैं जबकि उ.प्र की 80 और बिहार की 40 मिलाकर 120 सीटें हैं । कांग्रेस इन दोनों राज्यों में क्षेत्रीय दलों के रहमो - करम पर पूरी तरह निर्भर है। 2019 में अमेठी  से राहुल गांधी बुरी तरह पराजित हुए थे। वहीं रायबरेली से सोनिया गांधी महज इसलिए जीत सकीं क्योंकि सपा - बसपा ने उनके विरुद्ध प्रत्याशी नहीं उतारा। विधानसभा चुनाव में कांग्रेस का प्रदर्शन इतना दयनीय रहा कि सपा और बसपा लोकसभा चुनाव में उसके साथ जुड़ने से कतरा रही हैं। ऐसी ही स्थिति बिहार में है। वहां नीतीश कुमार और तेजस्वी यादव राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस के रवैए से खुश नहीं हैं।  इंडिया गठबंधन पर कब्जा करने की कांग्रेस की मंशा से नीतीश कुमार का पारा चढ़ा हुआ है। वे इस बात से भी काफी रूष्ट हैं कि पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के बहाने कांग्रेस ने गठबंधन का काम आगे बढ़ने से रोक दिया। उनका सोचना गलत नहीं है। दरअसल कर्नाटक की जीत के बाद कांग्रेस के दिमाग में ये बात बैठ गई कि  गठबंधन के बाकी दलों को उसका नेतृत्व स्वीकार करना चाहिए क्योंकि भले ही उ.प्र और बिहार में उसकी स्थिति बेहद कमजोर हो तथा गुजरात , म.प्र, राजस्थान , छत्तीसगढ़ , हिमाचल और उत्तराखंड जैसे राज्यों में पिछले लोकसभा चुनाव में उसकी स्थिति बहुत खराब रही किंतु विधानसभा चुनाव में वह भाजपा की प्रमुख प्रतिद्वंदी है और उसे मिलने वाले मतों का प्रतिशत भी ठीक- ठाक है। हालिया विधानसभा चुनाव में  कांग्रेस का ये दावा सही साबित हुआ । महाराष्ट्र में भी वह शरद पवार और उद्धव ठाकरे के मुकाबले ज्यादा सीटों पर अड़ेगी। इसी तरह का पेंच फंसा है गठबंधन के संयोजक को लेकर। हालांकि कांग्रेस ने इस बारे में कहा तो कुछ भी नहीं किंतु उसकी दिली तमन्ना है कि  संयोजक पद उसी के पास आए जिससे कि लोकसभा चुनाव की रणनीति तय करने में उसका हाथ ऊंचा रहे । टिकटों के बंटवारे में भी कांग्रेस अपना वर्चस्व चाहती है , जिसे लेकर नीतीश , ममता , पवार , अखिलेश और केजरीवाल चौकन्ने हैं।  चूंकि राहुल और प्रियंका के धुआंधार प्रचार के बाद भी हिन्दी पट्टी के तीन प्रमुख राज्यों में कांग्रेस के हाथ सफलता नहीं लगी इसलिए गैर कांग्रेसी विपक्षी पार्टियां भी ऐंठने की स्थिति में आ गई हैं । उधर नीतीश कुमार की अपनी स्थिति बिहार में दिन ब दिन बिगड़ रही है। ऐसे में उनकी कोशिश है कि वे किसी तरह से इंडिया के संयोजक बन जाएं जिससे राष्ट्रीय राजनीति का बड़ा चेहरा बन सकें ।  कल मंगलवार को होने वाली बैठक में क्या होता है उस पर सभी की निगाहें लगी हैं। हिमाचल और कर्नाटक की जीत के बाद जो उत्साह विपक्ष में उत्पन्न हुआ था वह तीन राज्यों में भाजपा की धमाकेदार जीत से कम हो गया है। जिसकी छाया बैठक में जरूर नजर आयेगी।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Sunday, 17 December 2023

दिग्विजय और कमलनाथ के शिकंजे से मुक्त होकर कांग्रेस ने अक्लमंदी दिखाई





       आखिरकार कांग्रेस ने उस बोझ को उतार फेंका जिसे वह न चाहते हुए भी ढो रही थी। ऐसा करना उसके लिए जरूरी था या मजबूरी ये तो वही जाने । लेकिन बीते तीन दशक से प्रदेश कांग्रेस दिग्विजय सिंह और कमलनाथ की बंधुआ बनकर रह गई थी। स्व.अर्जुन सिंह के रहते तक तो फिर भी गनीमत रही किंतु उनके अवसान के उपरांत उक्त ये दोनों मठाधीश पार्टी संगठन पर  कुंडली मारकर ऐसे बैठे कि बाकी किसी को पनपने ही नहीं दिया। परिणामस्वरूप कांग्रेस लगातार कमजोर होती गई। स्व. इंदिरा गांधी की कृपा से 1980 में छिंदवाड़ा से सांसद बनने के बाद श्री नाथ अंगद के पैर की तरह जम गए। इसी तरह दिग्विजय को अर्जुन सिंह ने रिश्तेदारी के चलते मुख्यमंत्री बनवा दिया जबकि दावा स्व.माधवराव  सिंधिया और स्व.सुभाष यादव का था। 

         उसके बाद कमलनाथ और दिग्विजय सिंह की जो जुगलबंदी चली उसने प्रदेश में कांग्रेस की समूची राजनीति को अपनी मुट्ठी में कैद कर लिया। 2003 के विधानसभा चुनाव में मिली करारी हार के बाद  उसको 2018 में सरकार बनाने का मौका मिला किंतु  चुनाव में पार्टी का चेहरा बनाए गए ज्योतिरादित्य सिंधिया को मुख्यमंत्री बनने से रोकने उक्त दोनों नेताओं ने जबरदस्त मोर्चेबंदी की । बावजूद इसके कि वे राहुल गांधी की पसंद थे । इस प्रकार श्री नाथ की मुख्यमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा तो पूरी हुई परंतु उसके बाद हुए लोकसभा चुनाव में कांग्रेस पूरी तरह चित्त हो गई। छिंदवाड़ा में श्री नाथ के पुत्र नकुल भी इसलिए जीत सके क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वहां सभा नहीं की। वहीं गुना से श्री सिंधिया भी हार गए। 

          लेकिन कमलनाथ का राजयोग महज 15 महीने में ही खत्म हो गया और ज्योतिरादित्य ने उनका तख्ता पलटते हुए भाजपा का दामन थाम लिया। होना तो ये चाहिए था कि गांधी परिवार उस अवसर का लाभ लेकर दिग्विजय - कमलनाथ के शिकंजे से पार्टी को मुक्त करवा लेता। लेकिन दोनों ने हाईकमान को झांसा देते हुए श्री सिंह के खासमखास गोविंद सिंह को नेता प्रतिपक्ष बनवा दिया जबकि प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष के पद पर श्री नाथ ही बने रहे। दरअसल उन्होंने गांधी परिवार सहित पार्टी हाईकमान के अन्य नेताओं को आश्वस्त कर दिया कि वे 2023 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को सत्ता में वापस लाने में सक्षम हैं ।

        उल्लेखनीय है आर्थिक दृष्टि से काफी समृद्ध होने के साथ औद्योगिक जगत में भी श्री नाथ के काफी नजदीकी रिश्ते हैं। जिन गौतम अडानी के विरुद्ध राहुल गांधी दिन - रात चिल्लाया करते हैं उनके बारे में श्री नाथ ने आज तक कुछ नहीं बोला। पार्टी ने उनके आश्वासन पर भरोसा करते हुए 2023 के चुनाव के लिए उनको पूरी छूट दे दी। पार्टी के भीतर अनेक युवा चेहरे श्री नाथ और दिग्विजय के विरुद्ध आवाज उठाते रहे किंतु उन सभी को पृष्ठभूमि में धकेल दिया गया । चुनाव की समूची व्यूह रचना श्री नाथ ने अपने हाथ में ले ली और दिग्विजय सिंह घूम - घूमकर उनके पक्ष में माहौल बनाने में जुटे रहे। उम्मीदवारों के चयन से लेकर प्रचार तक पर  दिग्विजय और कमलनाथ हावी रहे। आखिर में तो पूरा नियंत्रण श्री नाथ ने ले लिया और दिग्विजय तक को किनारे करने से बाज नहीं आए। पार्टी के केंद्रीय पर्यवेक्षक रणदीप सुरजेवाला तक निठल्ले बैठे रहे। 

        श्री नाथ इस हद तक स्वेच्छाचारी हो चले थे कि चुनाव की घोषणा के पूर्व भोपाल में आयोजित इंडिया नामक विपक्षी गठबंधन की रैली तक रद्द कर दी। और तो और सपा तथा जनता दल (यू) को चार - छह सीटें देना तो दूर उल्टे अखिलेश यादव के प्रति बेहद सस्ते शब्दों का प्रयोग कर आग में घी डाल दिया। उनकी कार्यप्रणाली से गांधी परिवार तक अप्रसन्न था किंतु चाहकर भी कुछ न कर सका क्योंकि म.प्र में कांग्रेस में उनके सिवाय कोई और नजर ही नहीं आता था। लेकिन 3 दिसंबर की दोपहर होते - होते तक उनका कथित आभामंडल पराजय के अंधकार में डूब गया। 
 
       20 साल पहले कांग्रेस ने दिग्विजय का पराभव देखा और अब कमलनाथ भी उसी गति को प्राप्त हुए। इस दौरान  भाजपा ने दूसरी पीढ़ी को आगे लाने की कार्य योजना को तो सफलता के साथ लागू कर दिया किंतु  कांग्रेस अधेड़ से बूढ़े होते दो नेताओं के शिकंजे में फंसकर छटपटाती रही। अब , जब सब कुछ लूट चुका तब जाकर पार्टी के राष्ट्रीय नेतृत्व को होश आया या यूं कहें कि हिम्मत हुई दिग्विजय और कमलनाथ से पिंड छुड़ाने की। गत दिवस जीतू पटवारी , उमंग सिंगार और हेमंत कटारे को क्रमशः प्रदेश अध्यक्ष ,नेता प्रतिपक्ष और उप नेता प्रतिपक्ष बनाकर पार्टी हाईकमान ने लंबे समय बाद अक्लमंदी का परिचय दिया। हालांकि इन तीनों से 2024 के महा - मुकाबले में किसी बड़े चमत्कार की उम्मीद करना तो उन्हें दबाव में डालने का  कारण बनेगा किंतु कम से कम पार्टी में ये संदेश तो गया कि नई पीढ़ी के लिए भी गुंजाइश है और नौजवानों की भावनाओं और अपेक्षाओं को समझने वाला प्रदेश नेतृत्व आ गया है। 

         यद्यपि कांग्रेस से ये अपेक्षा करना तो व्यर्थ है कि वह किसी से कुछ सीखेगी क्योंकि उसमें श्रेष्ठता का भाव आज भी यथावत है किंतु इतना तो कहा ही सकता है कि दिग्विजय सिंह और कमलनाथ के चेहरे देखते - देखते जो ऊब पार्टी के भीतर महसूस की जाती थी उससे तो आजादी मिलेगी।  भाजपा ने सबसे अधिक समय तक मुख्यमंत्री रहे शिवराज सिंह चौहान को हटाकर नया नेतृत्व जिस तरह दिया उसके बाद कांग्रेस के लिए भी ऐसा ही करना मजबूरी बन गया था किंतु एक झटके में तीन युवा चेहरे सामने लाकर आलाकमान ने निश्चित रूप से जो साहस दिखाया उसके लिए वह बधाई का पात्र है।

इस नई टीम के समक्ष कुछ महीनों बाद ही लोकसभा चुनाव की चुनौती खड़ी होगी  किंतु  थके और लगातार हारते आ रहे दो नेताओं से मुक्त होकर कांग्रेस में जितना भी उत्साह आएगा वह भविष्य की दृष्टि से उसकी सेहत सुधारने में सहायक होगा , इतनी उम्मीद तो की ही जा सकती है।

-रवीन्द्र वाजपेयी 

Saturday, 16 December 2023

शाही मस्जिद के सर्वेक्षण में अड़ंगेबाजी छोड़ सहयोग करें मुस्लिम धर्मगुरु


सर्वोच्च न्यायालय द्वारा मथुरा स्थित श्रीकृष्ण जन्मभूमि  से सटी शाही मस्जिद के सर्वेक्षण पर रोक लगाने से इंकार किए जाने के बाद अब इस विवाद के हल का रास्ता खुल गया है। स्मरणीय है हिन्दू पक्ष द्वारा लंबे समय से मांग की जा रही थी कि वाराणसी की ज्ञानवापी मस्जिद की तरह से ही मथुरा की शाही मस्जिद का भी सर्वेक्षण कर  पता किया जाए कि वहां हिन्दू मंदिर के प्रतीक चिन्ह हैं। मुस्लिम पक्ष इसका विरोध करता आ रहा है। हाल ही में  अलाहाबाद उच्च न्यायालय के सर्वेक्षण संबंधी आदेश को मुस्लिम पक्ष ने सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी किंतु उसने भी  रोक लगाने से मना कर दिया। दरअसल मुस्लिम पक्ष 1991 के प्लेस  ऑफ वर्शिप एक्ट के आधार पर  तर्क देता है कि 1947 से पहले अस्तित्व में आए किसी धार्मिक स्थल को किसी अन्य के पूजा स्थल में नहीं बदला जा सकता।  इस बारे में उल्लेखनीय है कि श्री कृष्ण जन्मभूमि मंदिर  लगभग 11 एकड़ में है जबकि उससे लगी शाही मस्जिद के पास 2.37 एकड़ भूमि है। हिन्दू पक्ष का दावा है कि इस भूमि पर भी मंदिर था जिसे औरंगजेब के  शासन में मस्जिद का रूप दे दिया गया। इसीलिए उसकी दीवारों पर हिन्दू मंदिरों में प्रयुक्त होने वाले कमल और त्रिशूल आदि के चिन्ह अंकित हैं। इस प्रकार  ज्ञानवापी की तरह से ही शाही मस्जिद के बारे में भी हिन्दू पक्ष का दावा है कि वह  मंदिर का ही हिस्सा है जिसे मुगल काल में जबरदस्ती मस्जिद में परिवर्तित कर दिया गया । ज्ञानवापी में  तो शिवलिंग के अलावा जिस तरह से दीवारों और  स्तंभों पर हिन्दू धार्मिक चिन्ह बने दिखे ठीक वैसे ही शाही मस्जिद के भीतर होने की बात हिन्दू पक्ष कह रहा है। इस बारे में ये कहना गलत न होगा कि मुस्लिम धर्मगुरु और वक्फ बोर्ड जैसी संस्था द्वारा  सर्वेक्षण के काम में अड़ंगा  लगाने से  हिन्दू पक्ष के दावों में सच्चाई लगती है। वैसे भी सर्वविदित है कि काशी विश्वनाथ और श्री कृष्ण जन्मभूमि से सटी मस्जिद बनाने के पीछे तत्कालीन मुस्लिम शासकों का उद्देश्य हिन्दू धर्मावलंबियों को आतंकित करना ही था। विश्वनाथ मंदिर पर तो अनेक बार आक्रमण किए गए। आजादी के बाद से  ही कहा जा रहा है कि हिंदुओं के प्रमुख आराध्य श्री राम , श्री कृष्ण और महादेव शिव से जुड़े पवित्र धर्मस्थलों पर बनी मस्जिदें मंदिरों का ही हिस्सा हैं इसलिए वह स्थान हिंदुओं को लौटा दिया जाए किंतु मुस्लिम समुदाय का एक भी व्यक्ति उस हेतु राजी नहीं हुआ। अयोध्या  विवाद  का हल भी बाबरी ढांचे में मिले हिन्दू प्रतीक चिन्हों के आधार पर ही सर्वोच्च न्यायालय द्वारा किया गया । उसी के बाद से ज्ञानवापी और शाही मस्जिद के मामले ने जोर पकड़ा और  वह निचली अदालतों से होता हुआ सर्वोच्च न्यायालय तक जा पहुंचा जिसने दोनों जगहों पर सर्वेक्षण के आदेश दिए ताकि वास्तविक स्थिति का पता लग सके । होना तो ये  चाहिए था  कि मुस्लिम धर्मगुरु अपने समुदाय को ये समझाइश देते कि सर्वेक्षण के आधार पर यदि हिन्दू पक्ष का दावा सही साबित होता है तो बजाय हठधर्मिता के उन्हें वे स्थान हिंदुओं को सौंप देना चाहिए। वैसे तो मुस्लिम शासकों के दौर में पूरे देश के भीतर हजारों मंदिर ध्वस्त किए गए किंतु अयोध्या , काशी और मथुरा चूंकि सनातन धर्मियों की आस्था के बड़े केंद्र हैं इसलिए उन पर बनाई मस्जिदें भावनाओं को आहत करने वाली हैं। बेहतर तो यही होगा कि मुस्लिम पक्ष  सर्वेक्षण के कार्य में सहयोग करे क्योंकि अदालत बिना पुख्ता सबूत के  कोई भी फैसला नहीं करेगी । अयोध्या का मामला भी बाबरी ढांचा गिरने के कई दशक बाद  तभी निपटा जब पुरातत्व सर्वेक्षण में उसके हिन्दू मंदिर होने के प्रमाण सामने आए। ज्ञानवापी और शाही मस्जिद में भी यदि हिन्दू  मंदिर होने के साक्ष्य मिलते हैं तब अक्लमंदी तो यही  होगी कि मुस्लिम धर्मगुरु स्वेच्छा से वे स्थल हिंदुओं को सौंपकर सद्भावना का वातावरण बनाने आगे आएं। इतिहास की गलतियों को सुधारकर अनेक समस्याओं से बचा जा सकता है। मुस्लिम समुदाय को ये जानना चाहिए कि कांग्रेस सहित अनेक राजनीतिक दलों द्वारा छद्म धर्मनिरपेक्षता और तुष्टीकरण के कारण उसको मुख्य धारा में शामिल नहीं होने दिया गया । उसी का परिणाम है कि वह धार्मिक कट्टरता में फंसकर शिक्षा के क्षेत्र में बेहद पीछे रह गया। यदि वह अभी भी उन्हीं बेड़ियों में जकड़ा रहकर अकबर और औरंगजेब के दौर से बाहर नहीं निकला तो फिर उसको अपनी बेहतरी के बारे में सोचना बंद कर देना चाहिए। 


- रवीन्द्र वाजपेयी