Tuesday, 26 December 2023

म.प्र में मंत्रीमंडल के गठन के पीछे भाजपा की दूरगामी सोच


कांग्रेस नेता राहुल गांधी बीते काफी समय से संसद और अन्य स्थानों पर जो ओबीसी राग अलाप रहे थे , वह कांग्रेस के गले पड़ गया। भाजपा ने म.प्र में ओबीसी की सबसे प्रमुख यादव जाति का मुख्यमंत्री और छत्तीसगढ़ में उपमुख्यमंत्री बनाकर अपनी सोशल इंजीनियरिंग का डंका पीट दिया। जातिगत जनगणना का जो वायदा कांग्रेस ने चुनाव घोषणापत्र में किया था उसकी भी हवा निकल गई । वह मुद्दा जितनी तेजी से उठा उतनी ही तेजी से धड़ाम हो गया। गत दिवस म.प्र मंत्रीमंडल के विस्तार में भी भाजपा ने ओबीसी पर विशेष ध्यान दिया और 12 मंत्री इस वर्ग के बनाकर लोकसभा चुनाव के लिए अपनी रणनीति का संकेत दे दिया ।  प्रदेश में कुल 35 मंत्री बनाए जा सकते हैं जिनमें से मुख्यमंत्री और 2 उपमुख्यमंत्री के अलावा 28 मंत्री बनाए जाए के बाद अब 4 स्थान मंत्रीमंडल में रिक्त हैं। जिनको संभवतः लोकसभा चुनाव के बाद भरे जाने की नीति बनाई गई है। ये भी मुमकिन है कि कुछ युवा विधायकों को और भी शामिल किया जाए जिनकी क्षमता का आकलन केंद्रीय नेतृत्व करेगा । बहरहाल , फिलहाल तो जातीय संतुलन के लिहाज से भाजपा ने बाजी मार ली है। यद्यपि कांग्रेस ने आदिवासी नेता प्रतिपक्ष और ओबीसी प्रदेश अध्यक्ष के साथ ही ब्राह्मण को उप नेता प्रतिपक्ष बनाकर मुकाबले में खड़ा होने का प्रयास तो किया है किंतु तीनों चेहरे ऐसे नहीं हैं जो लोकसभा चुनाव में उसकी नैया पार लग सकें। मंत्रीमंडल के गठन में  भले ही 10 दिन का समय लगा लेकिन क्षेत्रीय संतुलन के साथ ही वरिष्टता और नए खून को समुचित महत्व देकर पार्टी ने भविष्य की व्यूह रचना जमा ली है। उसकी तुलना में कांग्रेस अभी तक पराजय के झटके से उबर नहीं पा रही। कमलनाथ और दिग्विजय सिंह को पूरी तरह किनारे किए जाने के बाद नई पीढ़ी का मार्गदर्शन करने वाला कोई वरिष्ट नेता नजर नहीं आ रहा। प्रदेश में पार्टी का संगठन पूरी तरह से बिखरा हुआ है। छिंदवाड़ा छोड़कर बाकी एक भी जिला नहीं है जहां कांग्रेस का एक छत्र प्रभाव हो। विधानसभा चुनाव में ज्यादातर दिग्गज हार चुके हैं और जो जीते वे अब हथियार उठाने लायक नहीं रहे। ऐसे में भाजपा सरकार का नया मंत्रीमंडल लोकसभा चुनाव के मद्देनजर एक मजबूत दस्ते की तरह है जो  प्रदेश में उसको और ताकतवर बनाने में सहायक होगा। कांग्रेस दरअसल इस समय निहत्थी है क्योंकि वह राहुल की भारत जोड़ो यात्रा पर जरूरत से ज्यादा निर्भर हो गई थी। हिमाचल और कर्नाटक की जीत को भी उसी से जोड़कर देखा जा रहा था। इसी वजह से इंडिया गठबंधन में  उसने बड़े भाई की भूमिका निभाने का दबाव बनाया किंतु म. प्र , छत्तीसगढ़ और राजस्थान में करारी हार के बाद पार्टी में सन्नाटा छा गया। गठबंधन में शामिल बाकी दलों ने चुनाव परिणाम आते ही कांग्रेस पर हमला बोल दिया। 19 दिसंबर को इंडिया की जो बैठक हुई उसमें प. बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी ने तो गठबंधन की ओर से कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे का नाम प्रस्तावित कर राहुल गांधी को हाशिए पर धकेलने का जो दांव चला उसे समर्थन देने में दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने एक क्षण भी नहीं गंवाया। बैठक में मौजूद अन्य दलों के नेताओं में से किसी ने भी ममता और अरविंद की उस जुगलबंदी का विरोध नहीं किया जिसे मौन समर्थन ही कहा जायेगा । हालांकि श्री खरगे ने चुनाव के बाद प्रधानमंत्री तय होने की बात कहकर मुद्दे को टालने की कोशिश की लेकिन तीर तो धनुष से निकल ही चुका था। बहरहाल , कांग्रेस तीन राज्यों में मिली पराजय के बाद पूरी तरह हताश नजर आ रही है। दूसरी तरफ भाजपा तिहरी जीत की खुशी में डूबी रहने की बजाय लोकसभा चुनाव की मोर्चेबंदी में जुट चुकी है। म. प्र में मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री के बाद मंत्रीमंडल के सदस्यों का जिस तरह चयन हुआ उससे ये बात स्पष्ट है कि पार्टी का शीर्ष नेतृत्व 2024 की रणभूमि में अपनी सेना और उसके नायकों की तैनाती काफी सोच - समझकर कर रही है। छत्तीसगढ़ और राजस्थान में भी सरकार का नेतृत्व तय करते समय बहुत ही दूरदर्शिता दिखाई गई। सबसे बड़ी बात ये रही कि जिन दिग्गजों को अपरिहार्य माना जाता था उनको दौड़ से बाहर कर ये संदेश दे दिया गया कि भाजपा के पास वैकल्पिक नेतृत्व की कमी नहीं है। पार्टी ने पीढ़ी परिवर्तन की प्रक्रिया को जिस चतुराई से शुरू किया वह अन्य पार्टियों के लिए सबक है। विशेष तौर पर कांग्रेस के लिए जो कुछ नेताओं के शिकंजे से बाहर ही नहीं निकल पाती। हालांकि म.प्र जनसंघ के जमाने से हिंदुत्ववादी राजनीति का गढ़ रहा है लेकिन वह मध्य भारत और मालवा अंचल तक ही सीमित था परंतु भाजपा ने समूचे प्रदेश में अपनी जड़ें मजबूत कर ली हैं। ये देखते हुए लोकसभा चुनाव में प्रदेश की सभी 29 लोकसभा सीटें जीतने का जो दावा पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने किया वह सच हो जाए तो आश्चर्य नहीं होगा क्योंकि विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की जो दुर्गति हुई उसके बाद छिंदवाड़ा के मतदाताओं में कमलनाथ को लेकर जो आकर्षण था उसका भी ढलान पर आना तय है।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 25 December 2023

मस्जिद में अजान देने वाले की हत्या आतंकवादियों की बौखलाहट का प्रमाण


कश्मीर घाटी के बारामूला में मस्जिद से अजान दे रहे एक पूर्व पुलिस अधिकारी को आतंकवादियों ने गोलियों से भून दिया। बीते काफी समय से घाटी में पाकिस्तान प्रवर्तित आतंकवादी निर्दोष नागरिकों की  बेरहमी से हत्या कर रहे हैं।  पुलिस कर्मियों के साथ ही छुट्टी पर घर लौटे फौजी भी उनका निशाना बनते हैं। बीच - बीच में कुछ ऐसे लोग भी गोलियों के शिकार बने जिनका शासन या प्रशासन से कोई संबंध नहीं है। अनेक मर्तबा मस्जिदों पर भी वे धावा बोल चुके हैं। उल्लेखनीय ये है कि इस्लाम के नाम पर आतंक का सहारा लेने वाले मुसलमानों की जान लेने में भी नहीं हिचक रहे। जिस पूर्व पुलिस अधिकारी को गत दिवस बारामूला में गोली मारी गई वह मस्जिद में नमाज के लिए अजान दे रहा था , जो इस्लाम के नजरिए से बड़ा ही पवित्र कार्य होता है। ऐसे व्यक्ति को मौत के घाट उतारने वाले लोग कानून की नजर में तो अपराधी हैं ही किंतु इस्लाम की स्थापित मान्यताओं के तहत भी गुनहगार कहे जाएंगे। हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा जम्मू कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाली धारा 370 को समाप्त करने और राज्य का विभाजन किए जाने के फैसले को सही बताए जाने  के बाद घाटी  में सक्रिय भारत विरोधी तत्वों की बौखलाहट बढ़ गई है। न्यायालय के आदेश पर विधानसभा चुनाव की तैयारी भी की जाने लगी है। संसद के शीतकालीन सत्र के दौरान राज्य में परिसीमन संबंधी व्यवस्था भी पारित कर ली गई। इसके बाद वहां की  राजनीति पर कुंडली मारकर बैठे अब्दुल्ला और मुफ्ती परिवार के होश उड़े हुए हैं। जम्मू कश्मीर को पूर्ण राज्य का दर्जा भी लौटाया जा रहा है। लेकिन जम्मू अंचल में विधानसभा सीटें बढ़ जाने से अलगाववादी चिंतित हैं । राज्य की राजनीति में घाटी का जो दबदबा था वह खत्म तो मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद से ही होने लगा था। रही - सही कसर पूरी हो गई धारा 370 हटाए जाने के बाद बने हालातों से। सर्वोच्च न्यायालय में उस निर्णय के विरुद्ध दायर याचिकाओं के निपटारे तक घाटी में कार्यरत पाकिस्तान समर्थक नेताओं और संगठनों की उम्मीदें जीवित थीं  किंतु फैसला आने के बाद वे हताश हो उठे। उसके बाद से घाटी में फौजी काफिले पर हमले जैसी घटनाएं देखने मिल रही हैं। लेकिन मस्जिद में अजान दे रहे पूर्व पुलिस अधिकारी की हत्या निश्चित रूप से साबित करती है कि आतंकवादी बदहवासी पर उतर आए हैं। दरअसल ये सब राज्य में पिछले चार वर्षों के दौरान बने शांतिपूर्ण वातावरण को खत्म कर एक बार फिर घाटी को हिंसा की आग में झोंकने का षडयंत्र है । इसे अलगाववादी नेता और उनकी पार्टियां परदे के पीछे रहते हुए समर्थन और सहायता दे रही हैं। ये वही तबका है जिसने चेतावनी दी थी कि कश्मीर से धारा 370 हटाने के बाद वहां तिरंगा उठाने वाला कोई नहीं मिलेगा। लेकिन केंद्र सरकार की तगड़ी मोर्चेबंदी के कारण जब उस फैसले के बाद कश्मीर घाटी में भारत विरोधी ताकतों की कमर टूटने लगी और आम जनता को केंद्र सरकार की जन कल्याणकारी योजनाओं का लाभ बिना भ्रष्टाचार के मिलने लगा तो घाटी के अंदरूनी इलाकों तक में लोग खुश हुए किंतु अलगाववादी इस बदलाव को बर्दाश्त नहीं पा रहे थे। और इसीलिए वे कभी छोटी तो कभी बड़ी घटना के जरिए भय का माहौल बनाए रखने की कोशिशें करते रहे। सेना द्वारा किसी आतंकवादी को मारे जाने पर हल्ला मचाने वाले अब्दुल्ला और मुफ्ती ब्रांड नेताओं द्वारा न तो किसी शिक्षक की हत्या पर आंसू बहाए गए न ही वर्दीधारी पुलिस कर्मी अथवा फौजी जवान या अधिकारी की। गत दिवस बारामूला में की गई हत्या मस्जिद में की गई किंतु घाटी के नेताओं ने मुंह में दही जमा रखा है। इस सबसे लगता है कि ज्यों - ज्यों चुनाव की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी त्यों - त्यों घाटी को अशांत करने वाली घटनाएं दोहराई जा सकती हैं। धारा 370 हटाए जाने के बाद से जम्मू कश्मीर में पर्यटन उद्योग में जिस तरह का उछाल आया वह इस दावे को सही साबित करने के लिए पर्याप्त है कि घाटी में आतंकवादी ताकतें कमजोर हुई हैं। इसका कारण जनता का भी उनसे दूरी बनाना है । उसे ये बात  समझ में आने लगी है कि आतंकवाद के रहते उसके जीवन में शांति और समृद्धि नहीं आ सकती। घाटी के नेताओं को यही बात अखर रही है। पाकिस्तान भी ये देखकर हैरान है कि अब उसके भेजे आतंकवादियों को जनता का पहले जैसा सहयोग नहीं मिल रहा। कुल मिलाकर 370 हटाए जाने का दर्द छोटी - छोटी घटनाओं के तौर पर देखने मिलता रहेगा । इसलिए केंद्र सरकार को पूरी तरह सतर्क रहना होगा क्योंकि आतंकवादी और अलगाववादी ताकतें बौखलाहट में किसी भी हद तक जा सकती हैं।


-रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 23 December 2023

कर्ज : विकास के लिए अच्छा किंतु खैरात के लिए नुकसानदेह


एक तरफ तो अनेक विश्वस्तरीय संगठन भारत की आर्थिक प्रगति की प्रशंसा करते हैं। विश्व की पांचवी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने के बाद जल्द ही उसके तीसरे स्थान पर पहुंचने की संभावना है। भारत के प्रति विदेशी निवेशकों का आकर्षण बढ़ा है। विदेशी मुद्रा भंडार रिकॉर्ड स्तर से भी ऊपर है। शेयर बाजार नई ऊंचाइयां छूने लगा है। चीन से निकलीं अनेक बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने भारत का रुख किया है। मोबाइल फोन उत्पादन के पश्चात भारत अब ऑटोमोबाइल उद्योग में भी विश्वस्तरीय हो रहा है। सॉफ्टवेयर के क्षेत्र में तो दबदबा पहले से ही था किंतु  अंतरिक्ष और सैन्य उपकरणों के मामले में भी भारत ने ऊंची छलांग लगाई है। बावजूद इसके अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष द्वारा बढ़ते हुए कर्ज पर दी गई चेतावनी चर्चा का विषय  है।  तमाम विशेषज्ञों ने उसके पक्ष - विपक्ष में अपने विचार रखे हैं। केंद्र सरकार ने स्पष्टीकरण दिया कि  हालात नियंत्रण में हैं क्योंकि कुल कर्ज में विदेशी  हिस्सेदारी बहुत कम है ।  बड़ा हिस्सा भारतीय स्रोतों से लिए जाने से परेशानी नहीं होगी। आंकड़ों के अनुसार देश के हर नागरिक पर 1.50 लाख रु. का कर्ज है। उल्लेखनीय है डा.मनमोहन सिंह की सरकार ने जो कर्ज लिया वह पहले से तीन गुना अधिक था। नरेंद्र मोदी के  कार्यकाल में उसमें तीन गुनी वृद्धि और हो जाने से वह भारी - भरकम नजर आने लगा। मुद्रा कोष को चिंता है कि भारत इसी गति से कर्ज लेता रहा तो  श्रीलंका सरीखे हालात पैदा हो सकते हैं। दरअसल  1991 में पी.वी. नरसिम्हा राव की सरकार के वित्तमंत्री रहते हुए डा. सिंह द्वारा आर्थिक सुधारों की जो शुरुआत की उसने पूंजी को महत्वपूर्ण बना दिया । जिस शेयर बाजार पर पैसे वालों का एकाधिकार  था उसमें मध्यम वर्ग का प्रवेश होने लगा । बैंकों में जमा राशि पर ब्याज घटने से घरेलू बचत का रुख पूंजी बाजार की तरफ हो गया। उदारीकरण ने उधारीकरण को भी बढ़ावा दिया जिससे न सिर्फ सरकार अपितु आम उपभोक्ता में भी कर्ज लेकर जरूरतें पूरी करने की प्रवृत्ति जागी। परिणामस्वरूप चारों तरफ विकास के नाम पर समृद्धि नजर आने लगी। जिस साधारण नौकर पेशा की पहिचान  साइकिल थी  ,वह कर्ज के बल पर स्कूटर  और मोटर सायकिल से बढ़ते हुए छोटी कार तक आ पहुंचा। 20 साल पहले तक जितने युवाओं के पास सायकिल थी उससे ज्यादा के पास आज मोटर सायकिल है। दुनिया के सर्वाधिक मोबाइल फोन उपभोक्ता इस देश में हैं। झुग्गियों में भी टीवी की मौजूदगी है। इसके अलावा देश में विश्वस्तरीय राजमार्गों का निर्माण हो सका। पुल  , फ्लायओवर , नई रेल लाइनें, हवाई सेवा का विस्तार , विशाल हवाई अड्डे , बंदरगाह , पांच सितारा होटल , पर्यटन केंद्रों पर बढ़ती भीड़ , विदेश यात्रा का बढ़ता चलन , उच्च शिक्षा हेतु विदेश जाने वालों की बढ़ती संख्या  कर्ज की सहज उपलब्धता के कारण ही संभव हो सकी।  साथ ही अनेक ऐसे कार्य किए गए  जो  आय का साधन बनते जा रहे हैं।  सच तो यह है कि कर्ज चाहे घरेलू हो या विदेशी , यदि उसका उपयोग अनुत्पादक कार्यों में होता है तब वह समस्या बनता है किंतु अधोसंरचना जैसे प्रकल्पों में उसे इस्तेमाल करें तो कालांतर में वह समृद्धि का आधार बनता है। मसलन राजमार्गों के उन्नयन में लगाया गया धन टोल टैक्स के जरिए तो लौटता ही है उसकी वजह से परिवहन और ऑटोमोबाइल उद्योग भी तेज गति से आगे बढ़ा है। आधुनिक  स्टेडियम बनाने से विश्वस्तरीय आयोजन संभव होते हैं जिनसे खेल और खिलाड़ियों के विकास के साथ ही मोटी कमाई होती है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण हाल ही में संपन्न क्रिकेट  विश्व  कप है जिससे बीसीसीआई को करोड़ों की आय हुई और आज वह दुनिया का सबसे धनवान खेल संगठन है। आईपीएल का सफल आयोजन भी अच्छे स्टेडियम होने के कारण ही संभव हो सका जिसने इंग्लिश काउंटी जैसे क्लब क्रिकेट की चमक फीकी कर दी। लेकिन चिंता का विषय केंद्र और  राज्यों की वे योजनाएं हैं जिनके जरिए लोगों को विभिन्न नामों से  नगद राशि , मुफ्त अनाज  और घर ,  सायकिल , स्कूटी, टीवी , सस्ती और मुफ्त बिजली तथा रसोई गैस आदि  मिलती हैं । इनके जरिए   राजनीतिक दल चुनाव तो जीत जाते हैं लेकिन इनका बोझ करदाताओं पर पड़ता है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण है पेट्रोल और डीजल पर लगाया जाने  वाला भारी - भरकम कर। जीएसटी लागू होने पर इसे एक देश , एक कर का नाम दिया गया  परंतु राज्यों की जिद में उक्त दोनों को जीएसटी में शामिल नहीं किया जाता ताकि उनकी आय न घटे । लेकिन वही सरकारें वोट बैंक को लुभाने के लिए दोनों हाथों से लुटाती हैं तब उनको घाटे की फिक्र नहीं रहती। हो सकता है हालिया विधानसभा चुनावों में मुफ्त खैरातों की बाढ़ के कारण मुद्रा कोष को चिंता हुई हो क्योंकि ये चलन बढ़ता ही जा रहा है। म.प्र के नए मुख्यमंत्री डा. मोहन यादव ने सत्ता संभालते ही  नौकरशाहों को बुलाकर आय बढ़ाने के रास्ते खोजने कहा किंतु वे तो निहायत ही सीमित हैं। ऐसे में सरकारों को अनुत्पादक खर्च रोकने पर ध्यान देना चाहिए। प्रधानमंत्री स्वयं भी मुफ्तखोरी के विरुद्ध चेतावनी दे चुके हैं किंतु उनकी अपनी सरकार और भाजपा शासित राज्य सरकारें भी  सबक नहीं ले रहीं , जो समझ से परे है। समय आ गया है जब चुनाव जीतने हेतु की जाने वाली मुफ्त योजनाओं की प्रतिस्पर्धा रोकी जाए। अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष का अपना नजरिया हो सकता है किंतु उसकी चेतावनी में छिपे खतरे को नजरंदाज नहीं किया जाना चाहिए।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 22 December 2023

ईडी के समन से आखिर कब तक बचेंगे केजरीवाल


दिल्ली के मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल दिल्ली शराब घोटाले से संबंधित पूछताछ हेतु ईडी द्वारा भेजे गए समन की उपेक्षा करते हुए 10 दिनों के लिए अज्ञात स्थान पर चले गए जहां वे विपश्यना का अभ्यास करेंगे । कुछ माह पहले भी उन्हें ईडी द्वारा समन भेजा गया था किंतु श्री केजरीवाल ने उसे राजनीतिक करार देते हुए आने से इंकार कर दिया। ताजा समन पर उनकी आपत्ति लगभग पुरानी ही है। इस बार भी उसे राजनीतिक बनाते हुए उन्होंने ये कहा है कि ईडी ने उनके द्वारा पूर्व में उठाई गई आपत्तियों का निराकरण नहीं किया । इसके अलावा ये भी स्पष्ट नहीं है कि उनसे पूछताछ मुख्यमंत्री की हैसियत से होगी अथवा आम आदमी पार्टी संयोजक के रूप में ? ईडी के बुलावे पर उन्होंने ये भी कहा कि उनके पास छिपाने के लिए कुछ नहीं है। ऐसे में प्रश्न उठता है कि जब वे स्वयं को पारदर्शी मानते हैं तब उनको ईडी के सामने जाने में क्या परेशानी है ? इस बारे में जानकारों का कहना है कि ईडी को चूंकि समन का पालन न करने वाले की गिरफ्तारी का अधिकार नहीं है इसीलिए श्री केजरीवाल उसकी अवहेलना करने का साहस दिखा सके। कुछ लोगों का ये भी मानना है कि वे इस बात से भयभीत हैं कि पूछताछ के दौरान ही ईडी उनको गिरफ्तार कर सकती है और वैसा होने पर उनके और आम आदमी पार्टी के लिए अकल्पनीय परेशानी उत्पन्न हो सकती हैं। लोकसभा चुनाव जैसे - जैसे नजदीक आ रहे हैं वैसे - वैसे आम आदमी पार्टी की चिंता बढ़ रही हैं । श्री केजरीवाल के दाहिने हाथ कहे जाने वाले मनीष सिसौदिया और बेहद आक्रामक नेता संजय सिंह पहले से ही जेल में हैं। ऐसे में यदि मुख्यमंत्री भी गिरफ्तार हुए तो उनकी सरकार के सामने जबरदस्त संकट आ खड़ा होगा। सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि इंडिया गठबंधन का सदस्य होने के बावजूद आम आदमी पार्टी और कांग्रेस के बीच रिश्ते खटास भरे हैं। लोकसभा चुनाव के लिए सीटों के बंटवारे के सवाल पर दिल्ली और पंजाब में आम आदमी पार्टी कांग्रेस के लिए सीटें छोड़ने के प्रति अनिच्छुक है। दिल्ली प्रदेश के तमाम दिग्गज भी आम आदमी पार्टी के साथ गठबंधन के विरुद्ध हैं। शराब घोटाले में हो रही कार्रवाई का भी अनेक कांग्रेसी नेताओं ने समर्थन किया है। इन परिस्थितियों में श्री केजरीवाल का गिरफ्तार होना कांग्रेस के लिए तो फायदेमंद रहेगा किंतु आम आदमी पार्टी की ऐंठ खत्म हो जावेगी। 19 दिसंबर को दिल्ली में हुई इंडिया गठबंधन की बैठक में प.बंगाल की मुख्यमंत्री और तृणमूल नेत्री ममता बैनर्जी द्वारा नरेंद्र मोदी के मुकाबले प्रधानमंत्री पद हेतु कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे का नाम प्रस्तावित किए जाने पर श्री केजरीवाल ने जिस तत्परता से उसका समर्थन किया उससे कांग्रेस के साथ ही नीतीश कुमार और अखिलेश यादव भी खफा हैं। ऐसे में यदि ईडी द्वारा उनको गिरफ्तार किया गया तो हो सकता है उनको कांग्रेस सहित उक्त नेताओं का वैसा समर्थन मिलना संदिग्ध है जिसकी उन्हें अपेक्षा होगी। यही वजह है कि वे विपश्यना के बहाने 10 दिन के लिए दिल्ली से बाहर चले गए। लेकिन कहावत है बकरे की मां कब तक खैर मनाएगी, और उस दृष्टि से श्री केजरीवाल ईडी के बुलावे को कब तक टालते रहेंगे ये सोचने वाली बात है। यदि समन के पीछे राजनीति होने के उनके आरोप को सही मान लें तब भी किसी कानूनी प्रक्रिया से वे ज्यादा समय तक नहीं बच सकेंगे। और उनके इर्दगिर्द शक का घेरा बड़ा होता जाएगा। उन्हीं की तरह झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन भी ईडी के समन की अवहेलना करते हुए गैर हाजिरी के लिए नए - नए बहाने खोज रहे हैं। जहां तक बात श्री केजरीवाल की है तो एक बात तो उन्हें माननी ही होगी कि शराब घोटाले में गिरफ्तार हुए उनके उपमुख्यमंत्री श्री सिसौदिया और सांसद श्री सिंह की जमानत अदालतों द्वारा लगातार रद्द की जाती रही है। ऐसे में शराब घोटाले के संबंध में आए समन को राजनीति से प्रेरित बताने का दिल्ली के मुख्यमंत्री का प्रयास गले नहीं उतर रहा। बेहतर तो यही होगा कि वे विपश्यना  से लौटने के बाद खुद ईडी के सामने प्रस्तुत हों और उसके सवालों का उत्तर दें क्योंकि वे ज्यादा समय तक उससे बच नहीं सकेंगे।

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रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 21 December 2023

सस्ते न्याय के बिना आजादी अधूरी है



लोकसभा में गत दिवस भारतीय न्याय संहिता , भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता और भारतीय साक्ष्य अधिनियम विधेयक पारित हो गए। अब इनको राज्यसभा में भी पेश किया जाएगा । उसकी स्वीकृति के बाद राष्ट्रपति के हस्ताक्षर होकर ये कानून का रूप ले लेंगे । ब्रिटिश काल के दंड संहिता और साक्ष्य संबंधी कानूनों को बदलने की मांग लंबे समय से चली आ रही थी। राजद्रोह जैसे कानूनों के दुरुपयोग का मुद्दा भी गर्माता रहा। इसके साथ ही अदालत में प्रकरण की सुनवाई का अंतहीन सिलसिला भी न्याय प्रणाली के प्रति गुस्से में वृद्धि का कारण बनता गया।  सुनवाई होने के बाद फैसला सुनाने की अवधि निश्चित न होने से भी आशंकाएं जन्म लेती थीं। कुल मिलाकर ये कहना गलत नहीं है कि भले ही 1947 में भारत ने अंग्रेजों से आजादी हासिल कर ली और 26 जनवरी 1950 से अपना संविधान लागू होने के बाद हम सार्वभौमिक गणराज्य की हैसियत में आ गए किंतु  कानूनों का  अंबार न सिर्फ आम जनता अपितु कानूनविदों के लिए भी मुश्किलें खड़ी करता रहा है। इसी तरह तमाम दावों के बावजूद न्याय प्रणाली पर भी अंग्रेजी राज की छाया बनी हुई है। सैकड़ों अपराधिक कानून ऐसे रहे जो कभी उपयोग में नहीं आने के बाद भी किताबों की शोभा बढ़ाते हैं । उनके दुरुपयोग की शिकायतें भी यदाकदा आती रहीं। राजद्रोह भी उनमें से ही है। सवाल ये उठता है कि आज तक इस बारे में क्यों नहीं सोचा गया , और यदि सोचा गया तो समुचित कदम उठाने से परहेज करने की वजह क्या रही ? बीते 75 सालों में न्याय व्यवस्था में समयानुसार बदलाव और सुधार हेतु अनेक समितियां और आयोग बने । उनकी रिपोर्ट और अनुशंसा पर समाज और संसद तक में विमर्श हुआ। कुछ पर अमल भी किया गया किंतु न्याय प्रणाली में परिस्थितिजन्य सुधार के प्रति साहस की बजाय उदासीनता का आलम बरकरार रहा।  रोचक बात ये है कि कानून मंत्री के पद पर देश के अनेक प्रख्यात अधिवक्ताओं के पदस्थ रहने के बाद भी कानूनों का जो ढांचा अंग्रेज छोड़ गए थे उसको भारतीय जरूरतों और हालातों के अनुसार ढालने के प्रति उदासीनता ही बरती गई। कई बार तो ऐसा लगा जैसे कानूनों की किताबों को धार्मिक ग्रंथ मानकर उनमें बदलाव को पाप समझा जाता रहा। बहरहाल , वर्तमान केंद्र सरकार की प्रशंसा करनी होगी जिसने अपना दूसरा कार्यकाल खत्म होने के पहले यह क्रांतिकारी कदम उठाकर न्याय प्रणाली में महत्वपूर्ण सुधार करने का साहस दिखाया। हालांकि ऐसे कार्यों का आम जनता द्वारा समुचित संज्ञान नहीं लिया जाता किंतु कानून और न्याय व्यवस्था से जुड़े वर्ग में  निश्चित रूप से इन विधेयकों का स्वागत किया जावेगा। इनके पारित होने के बाद कई स्थापित परिभाषाएं और अवधारणाएं बदल जाएंगी। कानूनों  की अधिकता के साथ ही उनमें व्याप्त जटिलता और   फैसले में विलंब जैसी विसंगति दूर करने के लिए उठाए गए इस कदम का सकारात्मक असर देखने मिलेगा  । यद्यपि अभी भी कतिपय  न्यायाधीशों में अंग्रेजी राज वाली श्रेष्ठता का भाव देखने मिलता है किंतु दूसरी तरफ न्यायाधीशों की नई पीढ़ी में अनेक चेहरे ऐसे भी हैं जो आम जनता की पीड़ा को गंभीरता से महसूस करते हुए संवेदनशीलता का परिचय देते हैं। सही बात ये है कि अंग्रेजों के समय अदालतों में बैठे मी लॉर्ड नस्लीय भेदभाव की मानसिकता से प्रेरित होने के कारण भारतीयों के प्रति अनुदार रहते थे । आजादी के बाद उस स्थिति में तो सुधार हुआ है परंतु न्याय प्राप्त करने की प्रक्रिया इतनी कठिन और महंगी है कि आम जनता आज भी खून के आंसू रोने बाध्य है। नए विधेयकों के कानून में तब्दील होने के बाद निश्चित तौर पर अनेक स्वागत योग्य बदलाव देखने मिलेंगे किंतु केंद्र सरकार को चाहिए वह न्याय प्राप्त  करने में आने वाले खर्च को कम करने संबंधी कदम भी उठाए। वकीलों की आसमान छूती फीस के कारण अनेक लोग अदालत जाने का साहस ही नहीं बटोर पाते। ये आरोप भी लगते रहे हैं  कि न्यायाधीश लाखों रुपए प्रतिदिन की फीस लेने वाले दिग्गज अधिवक्ताओं से प्रभावित होकर फैसले देते हैं। केंद्र सरकार आम जनता के कल्याण के लिए अनेक योजनाओं का संचालन करती है। अच्छा हो आम जनता को सस्ता  न्याय दिलवाने के लिए भी कोई योजना बने क्योंकि इसके बिना आजादी अधूरी ही कही जाएगी।


-रवीन्द्र वाजपेयी 


Wednesday, 20 December 2023

इंडिया : चार बैठकों के बाद भी न नेता तय न रणनीति



जैसी उम्मीद थी वैसा ही हुआ। इंडिया गठबंधन की बहुप्रतीक्षित बैठक  चाय - पानी के बाद एक सामूहिक चित्र खिंचवाकर समाप्त हो गई। कहा जा रहा था कि इसमें  संयोजक के साथ ही लोकसभा चुनाव के लिए सीटों के बंटवारे का आधार निश्चित कर लिया जाएगा। पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के परिणामों के बाद 7 दिसंबर को जो बैठक आयोजित थी वह ज्यादातर घटक दलों के नेताओं द्वारा आने में असमर्थता व्यक्त किए जाने से रद्द कर दी गई। कांग्रेस उस समय तीन राज्यों की करारी पराजय के बाद सदमे में थी। बहरहाल , गत दिवस दिल्ली  में विपक्षी दलों के शीर्ष नेता जमा हुए। इस बैठक का उद्देश्य 2024 के लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को तिकड़ी बनाने से रोकने हेतु सेनापति और रणनीति तय करना था किंतु दोनों ही काम नहीं हो सके । जिसकी मुख्य वजह ये रही कि बाकी के दलों में कांग्रेस का नेतृत्व स्वीकार करने के प्रति झिझक कम होने का नाम नहीं ले रही। इसका प्रमाण तब मिल गया जब बैठक के पूर्व शिवसेना (उद्धव) के मुखपत्र सामना में साफ - साफ लिखा गया कि इंडिया 27 घोड़ों वाला रथ है किंतु इसका कोई सारथी नहीं होने से वह जमीन में धंस गया है। इसी के साथ कांग्रेस पर भी  तंज कसा गया कि बजाय 150 सीटें जीतने की कार्ययोजना बनाने के वह 138 साल पूरे होने के जश्न में डूबी हुई है। स्मरणीय है पार्टी के प्रवक्ता संजय राउत काफी समय से उद्धव ठाकरे को संयोजक बनाने की मांग कर रहे हैं। यद्यपि उसका किसी भी घटक दल ने समर्थन नहीं किया जिससे लगता है कि उन सबमें  विश्वास की कमी है। इसका प्रमाण भी तब मिल गया जब कांग्रेस की तरफ से तो  संयोजक का नाम तय करने की पहल नहीं हुई किंतु प.बंगाल की मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस की सर्वेसर्वा ममता बैनर्जी ने प्रधानमंत्री के लिए श्री खरगे का नाम प्रस्तावित कर दिया । कांग्रेस के लिए ये एक असहज करने वाली बात थी जिसे राहुल गांधी के अलावा किसी और का नाम  मंजूर ही नहीं है। इसीलिए बैठक के बाद खरगे जी ने ये मुद्दा चुनाव के बाद बहुमत आने तक के लिए छोड़ने की बात कह डाली किंतु संयोजक तय करने में क्या अड़चन थी , ये बताने वाला कोई नहीं है। इसी तरह सीटों के बंटवारे को लेकर भी कोई ठोस नीति बनाने की बजाय राज्य स्तर पर रास्ता निकालने की बात कही गई और क्षेत्रीय दलों के वर्चस्व वाले 6 राज्यों के लिए अनौपचारिक समिति भी बनाई गई जो 14 जनवरी तक निर्णय करेगी। लेकिन इसका आधार तय नहीं होने से अनिश्चितता बनी रहेगी । सबसे बड़ी बात ये रही कि जब ममता ने श्री खरगे का नाम प्रधानमंत्री के लिए आगे बढ़ाया तब आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल ने तो बिना देर लगाए समर्थन कर दिया किंतु अन्य दलों के नेताओं ने चुप्पी साधे रखी। स्मरणीय है इंडिया के अस्तित्व में आने के पहले ममता ने जिस तीसरे मोर्चे की कोशिश की थी उसमें श्री केजरीवाल भी साथ थे। यद्यपि तृणमूल नेत्री मन ही मन खुद भी प्रधानमंत्री पद पर आसीन होने की इच्छा रखती हैं किंतु राहुल का सीधा विरोध करने के बजाय उन्होंने श्री खरगे का कंधा उपयोग करने की चाल चली। इसका मकसद किसी भी तरह से श्री गांधी को रोकना है। संयोजक का मसला अनसुलझा रहने का कारण भी कांग्रेस ही है जो किसी भी स्थिति में लगाम दूसरे किसी दल के नेता के हाथ नहीं देना चाहती। रही बात सीटों के बंटवारे की तो जब तक गठबंधन का कोई चेहरा तय नहीं होता तब तक इस बारे में आगे बढ़ना संभव नहीं होगा।  राज्य स्तर पर गठबंधन की जो बात उठी वही सबसे बड़ी अड़चन है क्योंकि कांग्रेस और क्षेत्रीय दलों में इसी मुद्दे पर जमकर टकराव होगा। हाल ही में हुए म.प्र विधानसभा के चुनाव में समाजवादी पार्टी और जनता दल (यू) ने कांग्रेस द्वारा  बेरूखी दिखाई जाने के बाद अपने उम्मीदवार उतारे थे। अब सवाल ये है कि अखिलेश यादव और नीतीश कुमार क्रमशः उ.प्र और बिहार में कांग्रेस को कितनी सीटें देंगे ? ये प्रश्न इसलिए महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि जिस आधार पर अपने प्रभावक्षेत्र वाले राज्यों में कांग्रेस अपना हाथ ऊपर रखना चाहती है वही नजरिया  क्षेत्रीय दलों का उनके वर्चस्व वाले राज्यों में है। लोकसभा चुनाव में कांग्रेस 350 सीटों पर खुद लड़ना चाहती है जबकि बाकी के दल उसे 250 से ज्यादा देने राजी नहीं हैं। इस मुकाबले के लिए भाजपा ने अपनी मैदानी तैयारियां लगभग पूरी कर ली हैं। ऐसे में यदि इंडिया गठबंधन बेनतीजा  बैठकें ही करता रहा तो आम जनता के मन में उसके प्रति विश्वसनीयता नहीं बन पाएगी। ये सवाल तो उठने ही लगा है कि जो नेता गठबंधन का संयोजक तय नहीं कर पा रहे वे भला प्रधानमंत्री के नाम पर कैसे एकमत हो सकेंगे ?

-रवीन्द्र वाजपेयी 

Tuesday, 19 December 2023

हंगामा : इसीलिए अब संसद न प्रेरित करती है और न प्रभावित



लोकसभा और राज्यसभा के दर्जनों विपक्षी सांसदों को मौजूदा सत्र के लिए निलंबित कर दिया गया। आज की मिलाकर ये संख्या 141 हो चुकी है। लोकसभा में दो युवकों की घुसपैठ के बाद से विपक्ष सरकार पर आक्रामक है। गृहमंत्री से बयान की मांग  अनसुनी किए जाने से नाराज विपक्षी सांसद गर्भगृह में आकर सदन की कार्यवाही बाधित कर रहे थे। सरकार का कहना है कि लोकसभा सचिवालय पूरी घटना की जांच कर रहा है जिसके पूरा होते ही गृहमंत्री सदन को  जानकारी देंगे। वैसे इतने अधिक सदस्यों का एक साथ निलंबन अभूतपूर्व है। इसके औचित्य को लेकर सवाल उठना भी स्वाभाविक है। ऐसा लगता है कि सरकार शीतकालीन सत्र के बचे हुए दिनों में  लंबित विधायी कार्य पूरे करा लेना चाहती है। चूंकि इसके बाद लोकसभा का  सत्र फरवरी में होगा जिसमें नई सरकार के बनने तक खर्च चलाने के लिए कामचलाऊ बजट स्वीकृत करवाने के अलावा विदाई का माहौल रहेगा । इसलिए सही मायनों में इस लोकसभा का ये अंतिम कामकाजी सत्र ही है। ये देखते हुए इसका सुचारू रूप से चलना बेहद जरूरी है किंतु हमेशा की तरह गतिरोध जारी है। संसद में विपक्ष का हमलावर होना अनपेक्षित नहीं है। जनहित के मुद्दों पर सरकार को कठघरे में खड़ा करना उसका दायित्व है। लेकिन इसके लिए संसदीय प्रणाली में जो अपेक्षित तौर - तरीके हैं उन्हीं का उपयोग किया जाना चाहिए । हालांकि इस स्थिति के लिए केवल विपक्ष को कसूरवार ठहराना सही नहीं होगा क्योंकि अनेक मामलों में सत्ता पक्ष की हठधर्मिता भी उसे आंदोलित होने बाध्य कर देती है। बीते कुछ वर्षों में ये देखने मिला है कि सदन के निर्बाध संचालन में सत्ता और विपक्ष दोनों की रुचि नहीं है। सरकार चाहती है कि उसके द्वारा प्रस्तुत विधेयक और प्रस्ताव बिना बहस के पारित हो जाएं। दूसरी तरफ विपक्ष भी हंगामे में उलझकर बहस का अवसर गंवा देता है। ये स्थिति संसदीय प्रणाली के लिए बेहद नुकसानदेह है। एक समय ऐसा था जब संसद में महत्वपूर्ण विषयों पर होने वाली बहस सुनने के लिए दर्शक दीर्घाएं भरी होती थीं। लेकिन अब तो ये आलम है कि टेलीविजन पर सदन की कार्यवाही का सीधा प्रसारण होने पर भी लोग उसे देखने में रुचि नहीं रखते। दूसरी बात ये भी है कि अब दोनों पक्षों के पास अच्छे वक्ताओं का अभाव हो गया है। दोनों ओर से तीखे - तीखे शब्दबाण तो खूब चलते हैं लेकिन भाषा की गरिमा का ध्यान नहीं रखा जाता। कभी - कभी लगता है कि राजनीतिक दल ही अपने सांसदों को मर्यादाहीन व्यवहार की छूट देते हैं । इस मामले में दोनों पक्ष बराबर के दोषी कहे जा सकते हैं। विपक्ष ये आरोप लगाता है कि सदन से निलंबन और ऐसे ही अन्य कड़े कदम आसंदी द्वारा उसी के सांसदों के विरुद्ध उठाए जाते हैं जबकि सत्ता पक्ष के  आपत्तिजनक व्यवहार को नजरंदाज किया जाता है।   इस बारे में रोचक बात ये है कि प्रत्येक सत्र के पहले अध्यक्ष सभी दलों की बैठक बुलाकर सदन को ठीक से चलाने हेतु सहयोग मांगते हैं किंतु अपवादस्वरूप कुछ अवसरों को छोड़कर एक भी दिन ऐसा नहीं जाता जब शोर - शराबा न होता हो। इससे ज्यादा विडंबना क्या होगी कि राष्ट्रपति के अभिभाषण तक पर विपक्ष सदन में अनुपस्थित हो जाए। सांसदों के इसी गैर जिम्मेदाराना आचरण के कारण आम जनता के मन में संसद के प्रति सम्मान लगातार घटता जा रहा है। ये कहने में कुछ भी गलत नहीं है कि बीते अनेक वर्षों से संसद के दोनों सदनों में सिवाय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के एक भी लंबा भाषण सुनने नहीं मिला। विपक्ष में सबसे ज्यादा प्रतीक्षा राहुल गांधी के भाषण की रहती थी जो बोलते तो तैश में हैं किंतु विषयवस्तु से भटककर हर बात को अडानी पर ले जाने की गलती कर बैठते हैं । वैसे कांग्रेस के पास लोकसभा में शशि थरूर जैसे अनुभवी सदस्य हैं किंतु उनको समुचित अवसर नहीं मिलता। राज्यसभा में तो विपक्ष के एक से एक कद्दावर सदस्य हैं किंतु उनकी प्रतिभा हंगामे में दबकर रह जाती है। जनता के मन में इस बात को लेकर काफी गुस्सा है कि जिस संसद के संचालन पर प्रतिदिन करोड़ों रुपए खर्च होते हैं उसका ज्यादातर समय हंगामे में नष्ट हो जाता है। गर्भगृह में जाकर होहल्ला न करने के बारे में अनेक बार आम सहमति बनाई जा चुकी है किंतु उसका उल्लंघन करना सांसद अपना अधिकार समझते हैं। यही कारण है कि संसद अब न प्रेरित करती है और न ही प्रभावित। ऐसे में जब किसी को सर्वश्रेष्ठ सांसद घोषित किया जाता है तब आश्चर्य के साथ ही हंसी भी आती है। दरअसल  राजनीतिक दल उम्मीदवार तय करते समय  जीतने की क्षमता का आकलन तो करते हैं किंतु ये नहीं देखा जाता कि वह संसद में बैठने लायक है भी या नहीं । मौजूदा विवाद के लिए सत्ता और प्रतिपक्ष एक - दूसरे पर दोषारोपण करते हुए खुद को दूध का धुला साबित करने का प्रयास कर रहे हैं किंतु यथार्थ ये है कि इस दुरावस्था के लिए सभी बराबर के जिम्मेदार हैं । आज जो सत्ता में हैं वे भी विपक्ष में रहते हुए यही करते थे और जो विपक्ष में हैं उनका इतिहास भी इसी तरह का है।

- रवीन्द्र वाजपेयी