Monday, 8 January 2024
सुरक्षा देकर हिंदुओं के उपकार का बदला चुकाएं शेख हसीना
Friday, 5 January 2024
ईडी पर हमला : ममता भी वामपंथी अराजकता के रास्ते पर चल रहीं
शरणार्थी समस्या : यूरोपीय देशों से सबक लेना समय की मांग
Thursday, 4 January 2024
म.प्र के मुख्यमंत्री ने नौकरशाही को औकात बताकर अच्छी शुरुआत की
अक्सर ये बात सुनने में आती है कि अंग्रेज तो चले गए , किंतु अपनी संतानें छोड़ गए। संतानों से आशय अंग्रेजी मानसिकता से प्रेरित और प्रभावित उन व्यक्तियों से है जो आजादी के 76 वर्ष बाद भी मानसिक दासता से ग्रसित हैं। ऐसी ही एक बिरादरी है भारतीय सिविल सेवा में चयनित प्रशासनिक अधिकारियों की। सरकार की विभिन्न शाखाओं में इनकी नियुक्ति होती है, लेकिन सबसे ज्यादा चर्चा में रहते हैं आई.ए.एस और आई.पी.एस अधिकारी । जनता से इनका सीधा जुड़ाव होता है और वह भी रोजमर्रे की जिंदगी से जुड़े कार्यों की खातिर। इन्हें कुछ लोग काले अंग्रेज भी कहते हैं जिसकी वजह आम जनता के प्रति इनका उपेक्षा पूर्ण व्यवहार है । ये कहने में कुछ भी गलत नहीं है कि प्रशासन और पुलिस विभाग में बैठे आला अफसरों में आज भी अंग्रेजी ठसक दिखाई देती है जिसके कारण ये तबका श्रेष्ठता के भाव में डूबा रहता है। यद्यपि सभी एक समान नहीं होते । प्रशासन और पुलिस के अनेक अधिकारी आम जनता के साथ बहुत ही सौजन्यता से पेश आते हैं किंतु इस तबके के प्रति आम तौर पर अवधारणा यही है कि ये खुद को विशिष्ट और आम जन को भेड़ - बकरी समझते हैं। इसी मानसिकता के कारण इनका एक अलग वर्ग बन गया है जिसके मन में अंग्रेजी राज की राय बहादुर वाली अकड़ कायम है। किसी काम के लिए आने वाले साधारण व्यक्ति के प्रति इनका व्यवहार देखकर ये कहने के लिए मजबूर हो जाना पड़ता है कि आजादी सिद्धांत के रूप में तो मिल गई किंतु व्यवहार में अभी भी उसका एहसास नहीं होता। हालांकि नौकरशाह नामक इस जमात को इतना उच्छश्रृंखल बनाने के लिए हमारे राजनेता ही जिम्मेदार हैं जो निजी स्वार्थवश इनको जनता के प्रति लापरवाह और अनुदार होने की छूट देते हैं। यदि सत्ताधारी राजनेता ईमानदार और जनता के प्रति समर्पित हों तो आई.ए.एस और आई.पी.एस को ये अनुभव करवा सकते हैं कि वे जनता के नौकर हैं और इसलिए उन्हें मालिक बनने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। लेकिन दुर्भाग्य से सत्ता में आने के बाद ज्यादातर नेतागण गलत कामों में लिप्त हो जाते हैं जिनमें इन नौकरशाहों की सहायता लिए जाने की वजह से वे इन के कान पकड़ने का साहस नहीं कर पाते। हमारे देश में शासकीय दफ्तरों में जो भ्रष्टाचार और भर्राशाही है।उसका कारण सत्ताधारी नेताओं और इन नौकरशाहों का गठजोड़ ही है। ऐसा नहीं है कि सभी नेता इनके सरपरस्त हों किंतु अधिकतर के बारे में ये कहा जा सकता है। इस लिहाज से म.प्र के नए मुख्यमंत्री डा.मोहन यादव ने विगत दिवस एक साहसिक कदम उठाते हुए शाजापुर के जिला कलेक्टर का इसलिए तबादला कर उनको भोपाल स्थित राज्य सचिवालय में पदस्थ कर दिया क्योंकि एक दिन पूर्व ही हिट एंड रन संबंधी नए कानूनी प्रावधान के विरुद्ध वाहन चालकों की हड़ताल के दौरान हड़ताली चालकों से चर्चा के दौरान कलेक्टर साहब ने एक चालक को गुस्से में ये कह दिया कि तुम्हारी औकात क्या है ? दरअसल कलेक्टर के लहजे पर ऐतराज जताते हुए उस चालक ने कहा था कि आप ठीक से बात कीजिए जिस पर साहब बहादुर तैश में आ गए और चालक से उसकी औकात पूछने की हद तक बढ़ गए। उक्त वार्तालाप का वीडियो भी प्रसारित हो गया। मुख्यमंत्री ने एक वाहन चालक से अभद्र बातचीत करने के दंडस्वरूप कलेक्टर का तत्काल तबादला कर पूरी नौकरशाही को जो संदेश दिया वह निश्चित रूप से स्वागत योग्य है। डा.यादव की ये टिप्पणी महत्वपूर्ण है कि वे स्वयं एक श्रमिक परिवार से आते हैं इसलिए गरीब का अपमान उन्हें बर्दाश्त नहीं होगा। हालांकि इसके पहले भी इस तरह के तबादले सत्ता में बैठे नेताओं द्वारा किए गए किंतु नौकरशाहों पर उसका खास असर नहीं होता क्योंकि हर बड़ा अधिकारी किसी न किसी नेता का कृपापात्र है। जिन कलेक्टर साहब का मुख्यमंत्री ने तबादला किया वे भी देर सवेर जुगाड़ लगाकर फिर अपनी मनपसंद जगह पहुंच जाएंगे । ये देखते हुए मुख्यमंत्री को ऐसे तेवर बरकरार रखते हुए बाकी मंत्रियों को भी ये हिदायत दे देना चाहिए कि वे नौकरशाहों को मुंह लगाना बंद कर दें। इसका आशय ये भी नहीं है कि आई.ए.एस और आई.पी.एस अधिकारियों को अपेक्षित सम्मान और महत्व न मिले । आखिर शासन उनके बिना चल भी नहीं सकता किंतु उनको ये एहसास तो करवाना ही होगा कि वे आम जनता को गुलाम न समझें।
-रवीन्द्र वाजपेयी
Wednesday, 3 January 2024
क्षेत्रीय दलों के सामने राष्ट्रीय दलों की लाचारी लोकतंत्र के लिए नुकसानदेह
बिहार में छाई राजनीतिक अस्थिरता समाप्त हो पाती उसके पूर्व ही आदिवासी बहुल पड़ोसी राज्य झारखंड में भी सत्ता डगमगाने लगी है। ईडी द्वारा भेजे गए आधा दर्जन समन की उपेक्षा करने के बाद मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की अकड़ ढीली होने लगी है। उनको इस बात का डर सता रहा है कि वे गिरफ्तार कर लिए जाएंगे। उस स्थिति में राज्य की सत्ता हाथ से न खिसक जाए इसलिए वे अपनी पत्नी को मुख्यमंत्री बनाने की कोशिश में जुटे हुए हैं। एक विधायक ने अपनी सीट भी खाली कर दी है जिससे वे उपचुनाव जीतकर विधायक बन सकें। स्मरणीय है चारा घोटाले में जेल जाने पर लालू प्रसाद यादव ने भी अपनी पत्नी राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री बनवा दिया था। हालांकि हेमंत अभी गिरफ्तार नहीं हुए हैं किंतु उनके पैंतरे उस आशंका को मजबूत कर रहे हैं । उनके विरुद्ध राज्यपाल द्वारा की गई एक जांच के निष्कर्ष भी उजागर होने हैं। कुल मिलाकर उनका जेल जाना निश्चित है ऐसा राजनीति और कानून के जानकार मान रहे हैं। लेकिन ऐसा होने पर उनकी पार्टी झारखंड मुक्ति मोर्चा के किसी अन्य नेता की बजाय अपनी पत्नी को सत्ता में बिठाने की गोटियां बिठाने से एक बार फिर ये आरोप प्रमाणित हो जाता है कि क्षेत्रीय दलों के मुखिया जनभावनाओं का दोहन करते हुए अपने और अपने परिजनों को ही सत्ता का सुख प्रदान करने प्रयासरत रहते हैं। जम्मू कश्मीर से तमिलनाडु तक जितने भी छोटे क्षेत्रीय दल कार्यरत हैं वे सभी परिवारवाद के पोषक रहे हैं। बिहार में जनता दल (यू) जरूर नीतीश कुमार की जेबी पार्टी है किंतु उन्होंने उसे परिवार से मुक्त रखा जिसके लिए उनकी प्रशंसा की जानी चाहिए। लेकिन नेशनल कांफ्रेंस , पीडीपी, अकाली दल , सपा, बसपा, लोकदल , राजद , तृणमूल कांग्रेस , झामुमो, शिवसेना , बीआरएस , वाईएसआर कांग्रेस , द्रमुक आदि सभी का जन्म जिन नेताओं के हाथों हुआ वे सभी किसी क्षेत्र , जाति या भाषा के नाम पर ताकतवर बने किंतु धीरे - धीरे शुरुआती संघर्ष के साथियों को दरकिनार करते हुए अपने परिवार के लोगों को ही पार्टी का वारिस बना लिया । हालांकि परिवार को विरासत सौंपने का सिलसिला प्रारंभ कांग्रेस से हुआ । चूंकि ज्यादातर पार्टियां उससे निकले नेताओं द्वारा स्थापित की गईं इसीलिए वे भी अपने परिवारजन को उत्तराधिकारी बनाने की नीति पर आगे बढ़ गए। नतीजा ये हुआ कि पूरे देश में कुछ परिवार पुराने राजा - महाराजाओं जैसे सामंतशाह बनकर उभरे। हेमंत सोरेन को भी राजगद्दी उनकी योग्यता से नहीं अपितु उनके पिता शिबू सोरेन के कारण प्राप्त हो सकी। जिसे वे आपातकालीन व्यवस्था के तहत अपनी पत्नी को सौंपने की तैयारी में हैं। फारुख और उमर अब्दुल्ला , महबूबा मुफ्ती , ओमप्रकाश ,अभय , दुष्यंत चौटाला , जयंत चौधरी , अखिलेश , डिंपल , शिवपाल सहित पूरा यादव कुनबा , मायावती के भतीजे आनंद , लालू का पूरा परिवार , ममता बैनर्जी के भतीजे अभिषेक , नवीन पटनायक , जगनमोहन रेड्डी , के.सी राव का परिवार , स्टालिन और उनके भाई -बहिन, ठाकरे परिवार आदि भारतीय राजनीति के वे कुनबे हैं जो क्षेत्रीय के साथ ही राष्ट्रीय राजनीति को प्रभावित करने की स्थिति में आ गए हैं। विपक्ष द्वारा बनाए गए इंडिया गठबंधन में कांग्रेस जैसी राष्ट्रीय पार्टी भी इन नेताओं के आगे झुकने बाध्य है। गठबंधन के संयोजक के अलावा सीटों के बंटवारे के फार्मूले पर भी क्षेत्रीय नेता कांग्रेस पर हावी हैं। इसका सबसे ज्यादा नुकसान हो रहा है देश के संघीय ढांचे को क्योंकि क्षेत्रीय दलों द्वारा शासित अनेक राज्यों ने केंद्रीय एजेंसियों को अपने यहां आने से रोक रखा है। इसी तरह केंद्र सरकार द्वारा जारी आदेशों की भी खुलकर अवहेलना की जाती है। अब्दुल्ला और मुफ्ती ने धारा 370 हटाए जाने पर तिरंगा थामने वाला नहीं मिलेगा जैसा बयान दे डाला , वहीं तमिलनाडु से हिन्दी के विरोध में देश से अलग हो जाने जैसी धमकी आती है। ये सब देखते हुए कांग्रेस और भाजपा जैसी राष्ट्रीय पार्टियों को चाहिए कि वे अपने राजनीतिक लाभ के लिए ऐसे नेताओं से दूरी बनाएं जिनका दृष्टिकोण बेहद सीमित है। हेमंत सोरेन यदि अपनी पत्नी को मुख्यमंत्री बनाते हैं तो उसमें असंवैधानिक कुछ भी नहीं किंतु संसदीय प्रजातंत्र के भविष्य के लिए ये शुभ संकेत नहीं हैं।
- रवीन्द्र वाजपेयी
Tuesday, 2 January 2024
हिट एंड रन : चालकों की हड़ताल से उठे सवालों का उत्तर भी ढूंढ़ना होगा
किसी को टक्कर मारकर भाग जाने (हिट एंड रन) जैसे कृत्य के लिए 10 लाख रु. का जुर्माना और सात साल की सजा का जो प्रावधान हाल ही में किया गया उसके विरोध में म. प्र सहित अनेक राज्यों के ट्रक , बस और टैंकर चालक बीते दो दिनों से हड़ताल पर हैं । इसके कारण जरूरी चीजों की आपूर्ति प्रभावित होने के साथ ही यात्रियों को भी भारी परेशानी हो रही है। पेट्रोल पंप खाली हो जाने से निजी वाहन चालक भी मुसीबत झेलने मजबूर हैं। । वाहन चालकों का तर्क है कि गलती न होने पर भी घटनास्थल पर उपस्थित जनता टक्कर मारने वाले चालक की बेरहमी से पिटाई करती है। अनेक चालकों की तो मौत भी पिटाई से हुई। वाहन में आग लगाने जैसी वारदात भी आम हैं। इसलिए घटनास्थल पर रुके रहना जान के लिए खतरनाक होता है । चालकों ने उन्हें मिलने वाले वेतन , भत्ते एवं अन्य सुविधाओं को बेहद कम बताते हुए सजा के नए प्रावधान वापस लेने की बात कही है। उनके तर्क विश्लेषण का विषय हैं किन्तु इतना तो है कि टक्कर मारने वाले चालक के रुक जाने पर उसकी और वाहन दोनों की खैर नहीं होती । और बड़े वाहन वाले को ही गलत ठहराकर गुस्सा उतारा जाता है। लेकिन दूसरा पहलू ये भी है कि टक्कर होने के बाद अपनी रक्षा के लिए भागे चालक को निकटस्थ पुलिस थाने में जाकर घटना की जानकारी देते हुए कानून की शरण लेनी चाहिए। यदि वाहन का समुचित बीमा हो तो उसमें दुर्घटना का मुआवजा देने की व्यवस्था भी रहती है। लेकिन इसके लिए वाहन संबंधी कागजात तथा चालक का लायसेंस नियमानुसार होना चाहिए। ज्यादातर मामलों में चूंकि ये चीजें दुरुस्त नहीं होतीं , इसलिए भी दुर्घटना के बाद चालक घटनास्थल पर नहीं रुकते। कुछ दिन पूर्व जबलपुर के निकट बरगी में किसी अज्ञात वाहन ने एक मोटर सायकिल को टक्कर मारी और बिना रुके चला गया। मोटर सायकिल पर बैठी तीन सवारियों में से एक महिला की मौत हो गई। दोपहिया वाहन पर तीन लोगों को बिठाना भी गैर कानूनी है। ऐसे में दुर्घटना का दोषी मोटर सायकिल चलाने वाले को कहा जाए या उस अज्ञात वाहन चालक को जो टक्कर होने के बाद फुर्र हो गया? ऐसे अनेक सवाल इस हड़ताल से उठ खड़े हुए हैं। हमारे देश में सड़क परिवहन में सुरक्षा का सवाल आए दिन उठता है। प्रतिवर्ष लाखों लोग दुर्घटनाओं में मारे जाते हैं। उच्चस्तरीय राजमार्गों के विकास के बाद सड़क परिवहन में अकल्पनीय वृद्धि हुई है। तकनीकी दृष्टि से उत्कृष्ट वाहन भी भारतीय सड़कों पर नजर आते हैं। लेकिन इन महंगे वाहनों के दुर्घटनाग्रस्त होने की खबरें भी नित्य मिलती हैं। प्रसिद्ध उद्योगपति सायरस मिस्त्री की मौत जिस कार दुर्घटना में हुई वह दुनिया की बेहतरीन कारों में गिनी जाती थी। ये सब देखते हुए देश में सड़क परिवहन को सुरक्षित रखने के पुख्ता प्रबंध भी करना होंगे। जिन राज्यों में गोवंश को काटे जाने पर प्रतिबंध है वहां राजमार्गों पर गायों के झुंड दुर्घटना का कारण बन जाते हैं। जिस वाहन से टकराकर गाय घायल होती या मारी जाती है उसका चालक भी तेजी से भाग जाता है क्योंकि रुकने पर वहां मौजूद लोग उसकी पिटाई करने के साथ ही बतौर मुआवजा मोटी रकम भुगतान करने का दबाव बनाते हैं। इस परिप्रेक्ष्य में हड़ताल करने वाले चालकों के पक्ष को भी गंभीरता से समझने की ज़रूरत है। हमारे देश में माल ढोने वाले वाहनों के अलावा व्यवसायिक यात्री वाहन लगातार सड़कों पर दौड़ते हैं। जिन क्षेत्रों में रेल सुविधा नहीं हैं उनके लिए तो सड़क यातायात ही एकमात्र विकल्प है। ग्रामीण सड़कों के विकास की वजह से अब गांव भी बैलगाड़ी युग से बाहर आ चुके हैं। इसीलिए दुर्घटनाएं भी समाचारों का स्थायी हिस्सा बन गई हैं। हड़ताल तो शासन - प्रशासन समझा - बुझाकर खत्म करवा लेगा और वाहन मालिक भी ज्यादा दिन तक अपनी गाड़ी को खड़ा नहीं रख सकते। लेकिन इन वाहनों की फिटनेस और जरूरी दस्तावेजों के अलावा चालक का समुचित प्रशिक्षण और लायसेंस जैसी अनिवार्य चीजों पर भी ध्यान देना चाहिए क्योंकि सभी दुर्घटनाओं में वाहन चालक निर्दोष हो , ये जरूरी नहीं हो सकता। ये बात जरूर सोचने वाली है कि टक्कर होने के बाद चालक और वाहन को नुकसान पहुंचाने वालों के विरुद्ध भी कड़ाई होनी चाहिए क्योंकि किसी को भी कानून अपने हाथ में लेने की छूट नहीं दी जा सकती। चालकों की हड़ताल से जो मुद्दे सामने आए हैं उन पर सरकार को गंभीरता से विचार करते हुए यदि नए प्रावधानों में कुछ विसंगति है तो उसे दूर करने में हिचक नहीं होनी चाहिए।
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रवीन्द्र वाजपेयी
Monday, 1 January 2024
2024 : राम मंदिर का निर्माण देश के नव उत्थान का शुभारंभ होगा
वैसे भारतीय काल गणना में चैत्र नवरात्रि की प्रतिपदा से नववर्ष का प्रारंभ माना जाता है किंतु ईसवी सन को चूंकि पूरे विश्व ने मान्य कर लिया है इसलिए अब 1 जनवरी से नए वर्ष की शुरुआत होने लगी है। देश के संदर्भ में देखें तो आज से प्रारंभ हो रहा वर्ष नवजागरण का कहा जा सकता है। भारत के प्राचीन गौरव की पुनर्स्थापना के प्रतीक स्वरूप अयोध्या में आगामी 22 जनवरी को राम मंदिर में राम लला की प्राण प्रतिष्ठा होने जा रही है। इसके लिए अयोध्या को जो नया स्वरूप दिया जा रहा है वह आधुनिकता के साथ ही परंपरागत वैभव का जीवंत एहसास करवाने वाला है। इसके जरिए भारत अपने विकास संबंधी संकल्प का परिचय पूरे विश्व को देने में सफल होगा। राम मंदिर केवल सनातनी आस्था का केंद्र ही नहीं अपितु आर्थिक क्षेत्र में भारत के बढ़ते कदमों का उद्घोष है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को विरोधी चाहे जो भी कहें किंतु साधारण को असाधारण बनाने की उनकी सोच उन्हें औरों से अलग करती है। कुछ वर्ष पूर्व उन्होंने देशवासियों से घरेलू पर्यटन को बढ़ावा देने का अनुरोध करते हुए प्रमुख दर्शनीय स्थल विशेष रूप से धार्मिक केंद्र घूमने का आग्रह किया था। कोरोना के कारण इसमें व्यवधान उत्पन्न हुआ किंतु उसके बाद से पर्यटकों का उत्साह रिकार्ड तोड़ने की सीमा तक देखने मिला। जम्मू कश्मीर में धारा 370 हटाए जाने के बाद से पर्यटकों की आवाजाही जिस तरह बढ़ी उसने इस समस्याग्रस्त राज्य की समृद्धि के द्वार खोल दिए । यही स्थिति अन्य पर्यटन स्थलों की भी है। लेकिन सबसे बड़ी बात हुई धार्मिक केंद्रों में श्रद्धालुओं के उमड़ने की। प्रधानमंत्री ने इसकी शुरुआत अपने निर्वाचन क्षेत्र स्थित विश्वनाथ मंदिर से की जिसको रिकॉर्ड समय में भव्यतम स्वरूप प्रदान किए जाने का परिणाम ही है कि वाराणसी देश के सबसे बड़े पर्यटन केंद्र के तौर पर विकसित हो उठा। उसके बाद उज्जैन के ऐतिहासिक महाकाल मंदिर को भी उसी तरह की भव्यता प्रदान की गई। हाल ही में ओंकारेश्वर में आद्य शंकराचार्य जी की विशाल प्रतिमा का अनावरण भी किया गया। इन कार्यों का चमत्कारिक परिणाम देखने मिल रहा है। आज वाराणसी और उज्जैन में आठ - आठ लाख श्रद्धालुओं के पहुंचने की जानकारी है। इन कार्यों से प्रेरित होकर विभिन्न राज्यों में स्थित प्रमुख धार्मिक केंद्रों को भी वाराणसी और उज्जैन जैसा नया स्वरूप देने की खबरें मिल रही हैं । उल्लेखनीय है देश में 12 ज्योतिर्लिंग और 50 से अधिक शक्तिपीठ हैं। इनका विकास होने से यहां आने वाले श्रद्धालुओं को तो सुविधा होगी ही उन शहरों की अर्थव्यवस्था में भी आशातीत उछाल आयेगा। उज्जैन के बारे में जो जानकारी आई है उसके अनुसार महाकाल लोक के निर्माण के बाद स्थानीय स्तर पर ही तकरीबन 50 हजार नए रोजगार पैदा हुए , वहीं व्यवसाय को अकल्पनीय लाभ हुआ। वाराणसी से मिलने वाले आंकड़े तो इससे भी कहीं ज्यादा हैं। ये देखते हुए अयोध्या में राम मंदिर के शुभारंभ के उपरांत देश और विदेश से आने वाले दर्शनार्थियों की संख्या प्रतिवर्ष करोड़ों में पहुंचने की उम्मीद है। परिणामस्वरूप समूचे पूर्वी उ.प्र में पर्यटन उद्योग को पंख लगना तय है। इस सबसे जो बात निकलकर आई , वह ये कि जिस तरह भारत दुनिया का बड़ा उपभोक्ता बाजार है उसी तरह यदि योजनाबद्ध प्रयास किए जावें तो घरेलू पर्यटन देश के आर्थिक विकास में बड़ा योगदान दे सकता है। प्रधानमंत्री ने इस बारे में जैसी सार्थक सोच दिखाई उसे कुछ लोग सांप्रदायिकता और भाजपा को राजनीतिक लाभ पहुंचाने वाली कह रहे हैं किंतु ऐसा ही तब भी सुनने में मिला था जब गुजरात के केवड़िया में सरदार पटेल की मूर्ति स्थापित हुई जो दुनिया में सबसे ऊंची है। उस पर हुए खर्च को लेकर भी तरह - तरह के सवाल उठाए गए परंतु जब वहां लाखों पर्यटक पहुंचने लगे और क्षेत्रीय विकास आश्चर्यजनक रूप से होने लगा तब आलोचकों के मुंह बंद हो गए। वर्ष 2024 में देश विकास की जो नई सीढ़ियां चढ़ेगा , उनमें घरेलू पर्यटन का बड़ा योगदान होगा । अयोध्या , वाराणसी ,उज्जैन और ओंकारेश्वर जैसे धार्मिक केंद्रों के नव विकसित स्वरूप ने जो नई दिशा दिखाई है वह आत्मनिर्भर भारत की अवधारणा को और मजबूत करेगी। भारत में स्वयं का इतना सामर्थ्य है कि उसे अपने उत्थान के लिए किसी बाहरी सहायता की आवश्यकता नहीं होगी। अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण को देश के नव उत्थान का शुभारंभ कहना गलत नहीं होगा।
-रवीन्द्र वाजपेयी