Tuesday, 9 January 2024

लक्षद्वीप की प्रशंसा के जरिए मोदी द्वारा मालदीव की रीढ़ पर कड़ा प्रहार


हिन्द महासागर में स्थित द्वीपनुमा देश मालदीव इन दिनों चर्चा में है। कुछ समय पहले वहां चीन समर्थक मोहम्मद मुइज्जू राष्ट्रपति चुन लिए गए। उनके चुनाव प्रचार में भारत विरोध स्पष्ट रूप से झलक रहा था। जबकि पूर्ववर्ती राष्ट्रपति मोहम्मद सोलिह खुलकर भारत के साथ थे। मुइज्जू ने चुनाव जीतने के साथ ही वहां मौजूद भारतीय सैनिकों को वापस बुलाने की मांग कर डाली। दरअसल वहां कुछ ऐसे काम चल रहे हैं जिनके कारण भारतीय सेना के कुछ लोग मालदीव में हैं। हेलीकाप्टर एवं कुछ अन्य उपकरणों के संचालन के लिए दोनों देशों में हुए समझौते के अंतर्गत वे सैनिक वहां पदस्थ हैं । हालांकि ये संख्या इतनी बड़ी नहीं कि उसके आंतरिक मामलों में दखल दे सके। मुस्लिम बहुल मालदीव के साथ भारत के रिश्ते काफी अच्छे रहे। इस देश की मुख्य आय पर्यटन है । यहां के समुद्र तट बेहद खूबसूरत हैं। चूंकि भारत से यह देश करीब है इसलिए यहां से प्रतिवर्ष लाखों सैलानी मालदीव घूमने जाते रहे हैं। अनेक भारतीय फिल्मों की शूटिंग भी यहां हो चुकी है। लेकिन राष्ट्रपति  मुइज्जू ने जब भारत विरोधी मोर्चा खोला तब  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लक्षद्वीप नामक भारतीय टापू की यात्रा के दौरान वहां के समुद्र तट पर घूमते अपने चित्रों के साथ भारतीय सैलानियों को लक्षद्वीप आने की समझाइश देते हुए उसके प्राकृतिक सौंदर्य की प्रशंसा कर डाली। वैसे भी प्रधानमंत्री जहां जाते हैं वहां की खूबियों का बखान करना नहीं भूलते। कुछ समय पहले वे उ.प्र के पिथौरागढ़ में स्थित आदि कैलाश गए थे जहां से तिब्बत स्थित कैलाश पर्वत नजर आता है। उनकी इस यात्रा के चित्र प्रसारित होते ही आदि कैलाश एक नए पर्यटन केंद्र के तौर पर प्रसिद्ध हो गया। 2019 के लोकसभा चुनाव का प्रचार बंद होते ही प्रधानमंत्री केदारनाथ की एक गुफा में जाकर रहे जिसके बाद उस धाम और गुफा दोनों के प्रति रुचि बढ़ी जिसका परिणाम वहां जाने वालों की संख्या में हुई अकल्पनीय वृद्धि के रूप में सामने आया। श्री मोदी ने  घरेलू पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए गुजरात में सरदार पटेल की जो स्टेच्यू ऑफ लिबर्टी बनवाई उस पर हुए खर्च को लेकर तमाम आलोचनाएं हुईं किंतु उस प्रकल्प के पूर्ण होते ही वह स्थान देश के प्रमुख पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित हो गया।  वाराणसी में विश्वनाथ और उज्जैन के महाकाल मंदिरों के परिसर का उन्नयन भी कुछ लोगों को रास नहीं आ रहा था किंतु आज उसके चमत्कारिक लाभ देखने मिल रहे हैं। हालांकि श्री मोदी के मन में लक्षद्वीप के पर्यटन को बढ़ावा देने का भाव था या आगामी लोकसभा चुनाव के मद्देनजर वहां के मतदाताओं को लुभाने की सोच , ये तो वही जानें किंतु उनकी सहज टिप्पणी पर मालदीव की नई सरकार के कुछ मंत्रियों के हल्के स्तर के बयानों के बाद से मालदीव और लक्षद्वीप के बीच प्रतिस्पर्धा शुरू हो गई। भारत में जिस तेजी से मालदीव के बहिष्कार और लक्षद्वीप के प्रति उत्सुकता उत्पन्न हुई उसने मालदीव की अकड़ ढीली कर दी। राष्ट्रपति मुइज्जू ने चीन की यात्रा पर रवाना होने से पहले ही भारत और मोदी विरोधी टिप्पणी करने वाले तीन मंत्रियों की छुट्टी करते हुए विवाद को ठंडा करने का प्रयास किया किंतु तब तक उसे जो नुकसान होना था वह तो  हो ही चुका था। मालदीव जाने वाले भारतीय पर्यटकों द्वारा यात्रा रद्द होने की खबरें आने लगीं। इसी के साथ ही लक्षद्वीप के प्रति जबरदस्त रुझान देखा जाने लगा। अनेक अभिनेताओं और प्रमुख हस्तियों द्वारा मालदीव की बजाय लक्षद्वीप को प्राथमिकता देने की अपील किए जाने से मुइज्जू सरकार सकते में आ गई। भारत सरकार ने भी उनके राजदूत को बुलाकर कड़े शब्दों में समझा दिया। सबसे बड़ी बात ये हुई कि मालदीव के भीतर ही नए राष्ट्रपति के भारत विरोधी रवैए की आलोचना शुरू हो गई। उनको याद दिलाया जाने लगा कि  दशकों पहले जब श्रीलंका से चीन की शह पर आए सशस्त्र आतंकवादियों ने मालदीव पर कब्जा कर लिया तब भारतीय सेना ने जाकर ही उनको वहां से भागने मजबूर किया था। कुल मिलाकर इस घटनाक्रम में प्रधानमंत्री श्री मोदी की दूरदर्शिता और भारत की कूटनीतिक दृढ़ता एक बार फिर प्रमाणित हो गई । मालदीव की नई सरकार के भारत विरोधी रुख के जवाब में प्रधानमंत्री ने लक्षद्वीप के समुद्र तट पर  टहलते हुए थोड़े शब्दों में जो कुछ कहा उसका इतना बड़ा असर होगा ये किसी ने नहीं सोचा था। राष्ट्रपति मुइज्जू के भारत विरोधी बयानों का सीधा जवाब देने के बजाय उन्होंने मालदीव की पर्यटन रूपी रीढ़ पर प्रहार कर दिया। निश्चित रूप से ये बहुत ही चतुराई भरा दांव था जिसका जबरदस्त असर देखने मिला। भले ही राष्ट्रपति बनने के बाद मुइज्जू सबसे पहले चीन की यात्रा पर गए हों किंतु नई दिल्ली के कड़े रुख के बाद उनको ये तो महसूस हो ही गया होगा कि भारत से ऐंठना उतना सरल नहीं जितना वे समझ बैठे थे। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 8 January 2024

सुरक्षा देकर हिंदुओं के उपकार का बदला चुकाएं शेख हसीना



बांग्ला देश के आम चुनाव में शेख हसीना ने लगातार चौथी जीत हासिल करते हुए सत्ता पर कब्जा बनाए रखा। उनकी पार्टी आवामी लीग ने संसद की ज्यादातर सीटें हासिल कर लीं। विपक्षी पार्टी  बीएनपी और जमायत ए इस्लामी ने चुनाव का बहिष्कार किया था। ऐसे में विपक्ष में जीते ज्यादातर उम्मीदवार निर्दलीय हैं जिनमें हसीना समर्थक भी बताए जाते हैं। बहिष्कार करने वाले दलों ने चुनावों की निष्पक्षता पर संदेह जताया है। जबकि आवामी लीग का कहना है कि चुनाव से भागने वाली पार्टियों का लोकतंत्र में विश्वास ही नहीं है। शेख हसीना बांग्ला देश के संस्थापक स्व.मुजीबुर्रहमान की बेटी हैं। उनके भारत के साथ अच्छे संबंध भी हैं। इस चुनाव में उन्हें हिंदुओं का जबरदस्त समर्थन मिला।  एक प्रकार से यह चुनाव इकतरफा होकर रह गया। लेकिन विपक्ष शांत बैठा रहेगा ये कहना मुश्किल है । इसलिए आने वाले दिन इस देश में राजनीतिक उथल - पुथल भरे होंगे। चीन और पाकिस्तान नहीं चाहेंगे कि हसीना और भारत के संबंध और मजबूत हों । इसीलिए दोनों मिलकर बांग्ला देश में सक्रिय भारत विरोधी संगठनों को मदद देते हैं। ये भी किसी से छिपा नहीं है कि बांग्ला देश तस्करी का बड़ा अड्डा बनता जा रहा है जिनमें नशीले पदार्थों का कारोबार भी शामिल है। भारत के इस देश से वैसे तो काफी नरम - गरम रिश्ते रहे हैं। लेकिन शेख हसीना के सत्ता में आने के बाद से मतभेद काफी हद तक दूर करने में मदद मिली। बीते दस सालों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने साझा सांस्कृतिक विरासत के आधार पर आपसी रिश्तों को काफी बेहतर बनाया और बांग्ला देश को सहायता और संरक्षण देने में कोई कसर नहीं छोड़ी। सीमा विवाद के कई मामले इस दौरान सुलझाने के अलावा आर्थिक मोर्चे पर भी सहयोग बढ़ा। लेकिन भारत के प्रति उदार रहने के बावजूद हसीना सरकार अपने देश में कट्टरपंथियों पर नियंत्रण स्थापित करने में अपेक्षित सफलता हासिल नहीं कर सकी। हिंदुओं पर होने वाले हमले बढ़ते ही जा रहे हैं। उनके मंदिरों को तोड़े जाने के अलावा त्यौहारों पर उत्पात आम बात हो चली है। बांग्ला देश का हर शख्स जानता है कि उसके निर्माण में भारत की निर्णायक भूमिका रही है वरना  आज भी यह पूर्वी पाकिस्तान ही रहा होता।शुरुआती दौर में भारत के प्रति आभार नजर भी आया किंतु शेख मुजीब की हत्या के बाद वहां भारत विरोधी ताकतें सत्ता में आईं और उसी दौरान रिश्ते खराब होते गए। हालांकि हसीना के शासनकाल में  काफी बदलाव आए किंतु हिंदुओं और उनके धार्मिक स्थलों की सुरक्षा जैसे मुद्दों पर स्थिति बिगड़ती ही जा रही है। घुसपैठियों की समस्या भी विवाद का कारण है। उल्लेखनीय है भारत सरकार जल्द ही सी.ए.ए नामक कानून लागू  करने जा रही है । इसके कारण भी दोनों देशों के बीच  तनाव उत्पन्न हो सकता है। लेकिन पांचवी बार प्रधानमंत्री बनने जा रही हसीना को ये नहीं भूलना चाहिए कि उनकी ताजा जीत में हिंदुओं का बड़ा योगदान है । और इसलिए उनको इस अल्पसंख्यक समुदाय की सुरक्षा और हितों का ध्यान रखना चहिए। ये कहने में कुछ भी गलत नहीं है कि बांग्ला देश भले ही मुस्लिम बहुल देश हो किंतु उसका  सांस्कृतिक ढांचा पूरी तरह से भारतीय ही है।  भाषा , साहित्य और संगीत जैसी विधाओं में परंपरागत एकरूपता है। लेकिन 1971 में आजाद होने के कुछ सालों बाद से वहां भारत विरोधी तत्व आक्रामक होने लगे। दुर्भाग्य से जिस पाकिस्तान ने बांग्लादेशी जनता पर अमानुषिक अत्याचार किए उसी की मदद से आतंकवादी संगठन भारत में अस्थिरता और अशांति फैलाने में जुटने लगे। पाकिस्तान प्रवर्तित आतंकवाद का बांग्ला देश के रास्ते भारत में आना निश्चित तौर पर इस देश के लिए भी खतरनाक है किंतु इस्लाम के नाम पर हिंदुओं के विरोध के चलते वहां भी वही सब होने लगा जो पाकिस्तान में होता है। हिंदुओं की घटती आबादी ये दर्शाने के लिए पर्याप्त है कि राजनीतिक तौर पर पाकिस्तान से आजाद होने के बाद भी ये देश उसकी भारत विरोधी मानसिकता से मुक्त नहीं हो सका। ऐसे में अब जबकि हसीना बांग्ला देश की सत्ता पर मजबूती से काबिज हो गई हैं तब उनको चाहिए वे  हिन्दू विरोधी कट्टरपंथी  ताकतों पर नियंत्रण लगाएं। इसके साथ ही उनको घुसपैठ की समस्या के बारे में भी सकारात्मक दृष्टिकोण रखते हुए आगे बढ़ना होगा। सबसे बड़ी आवश्यकता उनके लिए चीन के दबाव से मुक्त रहना है जो भारत के सभी पड़ोसियों को अपने शिकंजे में कसने की नीति पर चल रहा है। नेपाल , म्यांमार , 
श्रीलंका और मालदीव इसके उदाहरण हैं। भूटान की सीमा पर भी वह लगातार दबाव बनाए हुए है । फिलहाल भारत में हसीना सरकार की वापसी से राहत है। ये भी सही है कि उन्हें हिंदुओं का जो अभूतपूर्व समर्थन मिला उसमें भारत की भूमिका को भी नजरंदाज नहीं किया जा सकता।  इसलिए अब हसीना को चाहिए वे बांग्ला देश में असुरक्षा के साये में जी रहे हिंदुओं और उनके धर्मस्थलों की सुरक्षा के लिए साहस के साथ आगे आएं।क्योंकि इसमें उनका भी भला है।


- रवीन्द्र वाजपेयी 

Friday, 5 January 2024

ईडी पर हमला : ममता भी वामपंथी अराजकता के रास्ते पर चल रहीं



प.बंगाल के उत्तरी 24 परगना जिले  में राशन घोटाले के संबंध में सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस के कुछ नेताओं के यहां छापा मारने गए ईडी के दल पर सैकड़ों लोगों की भीड़ द्वारा हमला कर जरूरी दस्तावेज , लैपटॉप ,मोबाइल , नगदी आदि छीनने के साथ ही उनके वाहनों को भी तोड़ा - फोड़ा गया । हमलावर ईंट ,पत्थर और लाठियों से लैस थे। ईडी के अनेक अधिकारी घायल हो गए।  उक्त घोटाले को लेकर ईडी द्वारा राज्य के 15 स्थानों पर छापेमारी की गई थी। जिन नेताओं के यहां उक्त वारदात हुई वे   लगातार बुलाए जाने पर भी जब नहीं आए तब ईडी द्वारा इस बारे में जिले के पुलिस अधीक्षक से भी संपर्क किया गया किंतु उन्होंने भी कोई सहयोग नहीं किया। ये पहला अवसर नहीं है जब प.बंगाल में किसी केंद्रीय जांच एजेंसी के साथ इस तरह का व्यवहार किया गया हो। पांच साल पहले सीबीआई दल चिटफंड घोटाले में कोलकाता के पुलिस कमिश्नर से पूछताछ करने गया तो बजाय सहयोग करने के उस दल के सदस्यों को ही गिरफ्तार कर लिया गया जिसकी गूंज संसद तक में हुई । बाद में राज्य सरकार द्वारा सीबीआई को राज्य में आने से रोकने का फरमान भी जारी कर दिया गया ।  प.बंगाल में केंद्रीय जांच दलों के साथ आपत्तिजनक व्यवहार की बढ़ती घटनाएं  देश के संघीय ढांचे के लिए खतरनाक संकेत हैं। अनेक मुद्दों पर राज्य और केंद्र के बीच मतभेद रहते हैं। इसके पीछे राजनीति होने से भी इंकार नहीं किया जा सकता किंतु संविधान प्रदत्त व्यवस्था के अंतर्गत राज्य , भारतीय संघ के अधीन हैं। संविधान में उनको अपना शासन चलाने के लिए राज्य सूची के विषयों का स्पष्ट उल्लेख किया गया है। कुछ विषय केंद्र के क्षेत्राधिकार में हैं तो समवर्ती सूची में उल्लिखित विषय केंद्र और राज्य दोनों के लिए खुले हैं। सीबीआई और ईडी केंद्रीय जांच एजेंसियां हैं जिनका कार्य क्षेत्र पूरा देश है। यद्यपि विशेष मामलों में राज्य सरकार की पूर्व स्वीकृति का भी प्रावधान है। यह भी सामान्य प्रक्रिया है कि किसी केंद्रीय एजेंसी या विभाग को राज्य सरकार सहायता और संरक्षण प्रदान करे। गत दिवस जो घटना हुई उसमें भी ये बात सामने आई है  ईडी ने पुलिस अधीक्षक से सहयोग मांगा जो नहीं मिला।  सैकड़ों हथियारबंद लोगों ने जिस प्रकार ईडी दल पर आक्रमण किया उस पर  ममता की खामोशी साधारण नहीं है। गौरतलब है कि उनके शासनकाल में  घोटालों की बाढ़ आ गई जिनमें तृणमूल कांग्रेस के तमाम नेता , सरकार के मंत्री और प्रशासनिक अधिकारी फंसे हुए हैं। यहां तक कि ममता के भतीजे अभिषेक और उनकी पत्नी भी जांच के घेरे में हैं। इसीलिए उनका केंद्र सरकार से टकराव बना हुआ है। लेकिन जिस कांग्रेस के साथ सुश्री बैनर्जी इंडिया नामक गठबंधन में शामिल हैं वह भी वामपंथी दलों के साथ मिलकर उनकी सरकार पर भ्रष्टाचार के गंभीर नआरोप लगाती है । सबसे अधिक चौंकाने वाली बात ये है कि  वामपंथी सत्ता द्वारा किए गए अत्याचारों के विरुद्ध जमीनी संघर्ष करते हुए सत्ता में पहुंची ममता उन्हीं को  दोहरा रही हैं। सीपीएम के साथ जुड़े असामाजिक तत्व देखते - देखते तृणमूल में घुस आए और अराजकता का सहारा लेकर लूटपाट और अन्य हिंसक अपराधों में लिप्त हो गए। ये भी विडंबना ही है कि राजनीतिक हत्याओं के विरोध में लंबी लड़ाई लड़ने वाली ममता के शासनकाल में बड़े पैमाने पर विपक्षी नेताओं और कार्यकर्ताओं की हत्या होती आ रही  है जिनमें भाजपा के अलावा कांग्रेस और वामपंथी भी शामिल हैं। इस सब पर पर्दा डालने के लिए ही वे केंद्र सरकार और उसकी जांच एजेंसियों के विरुद्ध आक्रामक रवैया अपनाती हैं। लेकिन उनको ध्यान रखना चाहिए कि  यही संकीर्ण सोच उनके राष्ट्रीय नेता बनने की राह में आड़े आ जाती है ।  दो दिन पहले ही लोकसभा में कांग्रेस के नेता अधीर रंजन चौधरी ने उनके विरुद्ध तीखी बयानबाजी की। ईडी के छापामार दस्ते पर हुए हमले से प. बंगाल के चिंताजनक हालात एक बार फिर सामने आ गए हैं। यदि ममता सरकार हमलावरों के विरुद्ध कड़ी कार्रवाई नहीं करती तो फिर ये संदेह और पुख्ता हो जायेगा कि केंद्रीय एजेंसियों पर होने वाले घातक हमले उनकी सरकार द्वारा प्रायोजित ही हैं।

- रवीन्द्र वाजपेयी 

शरणार्थी समस्या : यूरोपीय देशों से सबक लेना समय की मांग



गृह मंत्री अमित शाह ने हाल ही में प.बंगाल के अपने दौरे के दौरान ऐलान किया कि जल्द ही देश में सी.ए.ए (नागरिकता संशोधन अधिनियम 2019)लागू कर दिया जावेगा। इसके अंतर्गत 31दिसंबर 2014 को या उसके पहले  अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान से आए हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई  प्रवासियों के लिए नागरिकता नियम आसान बनाए गए हैं। पहले भारत की नागरिकता हासिल करने के लिए कम से कम पिछले 11 साल से यहां रहना अनिवार्य था। इस  अवधि को एक साल से लेकर 6 साल किया गया है। यानी इन तीनों देशों के ऊपर उल्लिखित छह धर्मों के बीते एक से छह सालों में भारत आकर बसे लोगों को नागरिकता मिल सकेगी। इस कानून का जबरदस्त विरोध हुआ क्योंकि इसके लागू होने के बाद बांग्ला देश से अवैध रूप से आए घुसपैठियों को निकाल बाहर करने का रास्ता साफ हो जाएगा । गैर भाजपा पार्टियों द्वारा इस अधिनियम के विरोध में बड़े - छोटे तमाम आंदोलन हुए जिनमें दिल्ली का शाहीन बाग धरना काफी चर्चित रहा। कोरोना के बाद से उक्त मामला ठंडा पड़ा हुआ था किंतु गृहमंत्री के हालिया बयान के बाद एक बार फिर ये मुद्दा गरमाने जा रहा है। भाजपा लोकसभा चुनाव के पहले इस अधिनियम को अमली जामा पहनाकर अपना जनाधार और पुख्ता करना चाहती है । वहीं कांग्रेस , वामपंथी , तृणमूल कांग्रेस ,सपा , राजद , जद (यू) जैसी तथाकथित धर्मनिरपेक्ष पार्टियां इस अधिनियम के विरोध में खड़ी होंगी। राम मंदिर से उत्पन्न हिन्दू लहर को सी.ए.ए और शक्तिशाली बनाएगी ऐसा भाजपा के रणनीतिकार मानते हैं। इस अधिनियम का विरोध करने वाली पार्टियों को इसके लागू होने पर अपने मुस्लिम समर्थकों के खिसकने का डर सता रहा है क्योंकि ऐसा होने पर बांग्ला देश से आकर बसे मुसलमानों की नागरिकता खतरे में पड़ जाएगी। हालांकि ये मुद्दा नया नहीं है । असम में इसे लेकर लंबे समय तक जनांदोलन भी हुए। पहले ये समस्या केवल पूर्वोत्तर राज्यों तक ही सीमित रही किंतु धीरे - धीरे ये देशव्यापी हो गई। महानगरों में तो बांग्ला देशी  मुसलमानों की संख्या लाखों में हैं। सी.ए.ए. लागू होने पर इन बांग्ला देशी नागरिकों की नागरिकता खतरे में पड़ जावेगी। इस अधिनियम के विरोध का सबसे बड़ा कारण यही है कि इसके अंतर्गत  उक्त देशों से आए मुसलमानों को भारत की नागरिकता नहीं दी जावेगी। लेकिन इस मुद्दे का दूसरा पहलू  दरअसल भारत में शरणार्थियों का बढ़ता बोझ और उसके कारण उत्पन्न समस्याएं हैं । भारत में आतंकवाद के फलने - फूलने के लिए भी ये शरणार्थी काफी हद तक जिम्मेदार हैं। अपने राजनीतिक स्वार्थ के लिए राजनीतिक दलों ने इनके नागरिकता दस्तावेज बनवा दिए जिसके कारण ये न सिर्फ मतदाता बन गए अपितु सरकारी योजनाओं का भरपूर लाभ भी उठा रहे हैं। असम,त्रिपुरा और प.बंगाल में कांग्रेस , वामपंथी और तृणमूल कांग्रेस जैसे दलों ने इन घुसपैठियों को सत्ता प्राप्ति का जरिया बनाकर जो नासूर पैदा किया वह लाइलाज बनता गया। इसके साथ ही म्यांमार से रोहिंग्या मुस्लिम शरणार्थी भी बड़ी संख्या में आकर देश के भीतरी हिस्सों में फैलने लगे। जब -  जब इनको बाहर निकालने की कोशिश हुई तब - तब धर्म निरपेक्षता का ढोल पीटने वाली पार्टियां उनके बचाव में आकर खड़ी होने लगीं। राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर और सी.ए.ए इसी समस्या से लड़ने के लिए उठाते गए कदम हैं जिनका निहित राजनीतिक स्वार्थों के कारण विरोध किया और करवाया जाता रहा। लेकिन ऐसा करने वालों को उन यूरोपीय देशों के ताजा हालातों से सबक लेना चाहिए जिन्होंने मानवीयता के आधार पर अरब देशों से आए शरणार्थियों के अपने यहां पनाह देकर मुसीबत मोल ले ली। बदहाली में आकर बसे ये शरणार्थी इन देशों के लिए स्थायी सिरदर्द बन गए हैं। कानून व्यवस्था को बिगाड़ने  के अलावा इस्लामिक आतंकवाद की जड़ें जमाने में भी इन शरणार्थियों की बड़ी भूमिका सामने आ रही है। इसके बाद अनेक यूरोपीय देशों ने शरणार्थियों को निकाल बाहर करने का अभियान शुरू कर दिया है। इस बारे में ताजा खबर इंडोनेशिया से आई जिसने हजारों रोहिंग्या मुस्लिम शरणार्थियों को नावों में भरकर देश से बाहर जाने बाध्य कर दिया। हाल ही में पाकिस्तान ने भी अफगानिस्तान से आकर बसे हजारों मुसलमान शरणार्थियों को खदेड़ने का अभियान शुरू किया है। कहने का आशय ये कि शरणार्थियों को अपने यहां पनाह देना मानवता के आधार पर तो उचित प्रतीत होता है किंतु कालांतर में देश की सुरक्षा के लिए ये नुकसानदेह साबित होते हैं , ये बात इतिहास से लेकर आज तक प्रमाणित होती रही है। ऐसे में अब जबकि  गृहमंत्री ने इस दिशा में निर्णायक कदम उठाने की बात कही तो उसका देशहित में स्वागत होना चाहिए। रही बात इसके राजनीतिक नफे - नुकसान की तो इसका जितना विरोध होगा उतना ही यह मुद्दा  विवादग्रस्त होगा। बेहतर तो यही होगा सभी राजनीतिक दल राष्ट्रीय हित में इस अधिनियम को प्रभावशाली बनाने में एकजुट हों। यूरोपीय देशों  में शरणार्थी समस्या ने जो खतरनाक रूप ले लिया है उससे सबक न लिया गया तो भारत में भी आंतरिक सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा बन जायेगा ।


-रवीन्द्र वाजपेयी 

Thursday, 4 January 2024

म.प्र के मुख्यमंत्री ने नौकरशाही को औकात बताकर अच्छी शुरुआत की


अक्सर ये बात सुनने में आती है कि अंग्रेज तो चले गए , किंतु अपनी संतानें छोड़ गए। संतानों से आशय अंग्रेजी मानसिकता से प्रेरित और प्रभावित उन व्यक्तियों से है जो आजादी के 76 वर्ष बाद भी मानसिक दासता से ग्रसित हैं। ऐसी ही एक बिरादरी है भारतीय सिविल सेवा में चयनित प्रशासनिक अधिकारियों की। सरकार की विभिन्न शाखाओं में इनकी नियुक्ति होती है, लेकिन सबसे ज्यादा चर्चा में रहते हैं आई.ए.एस और आई.पी.एस अधिकारी ।  जनता से इनका सीधा जुड़ाव होता है और वह भी रोजमर्रे की जिंदगी से जुड़े कार्यों की खातिर।  इन्हें कुछ लोग काले अंग्रेज भी कहते हैं जिसकी वजह आम जनता के प्रति इनका उपेक्षा पूर्ण व्यवहार है । ये कहने में कुछ भी गलत नहीं है कि प्रशासन और पुलिस विभाग में बैठे आला अफसरों में आज भी अंग्रेजी ठसक दिखाई देती है जिसके कारण ये तबका श्रेष्ठता के भाव में डूबा रहता है। यद्यपि सभी एक समान नहीं होते । प्रशासन और पुलिस के अनेक अधिकारी आम जनता के साथ बहुत ही सौजन्यता से पेश आते हैं किंतु इस तबके के प्रति  आम तौर पर अवधारणा यही है कि ये खुद को विशिष्ट और आम जन को भेड़ - बकरी समझते हैं। इसी मानसिकता के कारण इनका एक अलग वर्ग बन गया है जिसके मन में अंग्रेजी राज की राय बहादुर वाली अकड़ कायम है।  किसी काम के लिए आने वाले साधारण व्यक्ति के प्रति इनका व्यवहार देखकर ये कहने के लिए मजबूर हो जाना पड़ता है कि आजादी सिद्धांत के रूप में तो मिल गई किंतु व्यवहार में अभी भी उसका एहसास नहीं होता। हालांकि नौकरशाह नामक इस जमात को इतना उच्छश्रृंखल बनाने के लिए हमारे राजनेता ही जिम्मेदार हैं जो निजी स्वार्थवश इनको जनता के प्रति लापरवाह और अनुदार होने की छूट देते हैं। यदि सत्ताधारी राजनेता ईमानदार और जनता के प्रति समर्पित हों तो आई.ए.एस और आई.पी.एस को ये अनुभव करवा सकते हैं कि वे जनता के नौकर हैं और इसलिए उन्हें मालिक बनने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। लेकिन दुर्भाग्य से सत्ता में आने के बाद ज्यादातर नेतागण गलत कामों में लिप्त हो जाते हैं जिनमें इन नौकरशाहों की सहायता लिए जाने की वजह से वे इन के कान पकड़ने का साहस नहीं कर पाते। हमारे देश में शासकीय दफ्तरों में जो भ्रष्टाचार और भर्राशाही है।उसका कारण सत्ताधारी नेताओं और इन नौकरशाहों का गठजोड़ ही है। ऐसा नहीं है कि सभी नेता इनके सरपरस्त हों किंतु अधिकतर के बारे में ये कहा जा सकता है। इस लिहाज से म.प्र के नए मुख्यमंत्री डा.मोहन यादव ने विगत दिवस एक साहसिक कदम उठाते हुए शाजापुर के जिला कलेक्टर का  इसलिए तबादला कर उनको भोपाल स्थित राज्य सचिवालय में पदस्थ कर दिया क्योंकि एक दिन पूर्व ही हिट एंड रन संबंधी नए कानूनी प्रावधान के विरुद्ध वाहन चालकों की हड़ताल के दौरान हड़ताली चालकों से चर्चा के दौरान कलेक्टर साहब ने एक चालक को गुस्से में ये कह दिया कि तुम्हारी औकात क्या है ? दरअसल कलेक्टर के लहजे पर ऐतराज जताते हुए उस चालक ने कहा था कि आप ठीक से बात कीजिए जिस पर साहब बहादुर तैश में आ गए और चालक से उसकी औकात पूछने की हद तक बढ़ गए। उक्त वार्तालाप का वीडियो भी प्रसारित हो गया। मुख्यमंत्री ने एक वाहन चालक से अभद्र बातचीत करने के दंडस्वरूप कलेक्टर का तत्काल तबादला कर पूरी नौकरशाही को जो संदेश दिया वह निश्चित रूप से स्वागत योग्य है। डा.यादव की ये टिप्पणी महत्वपूर्ण है कि वे स्वयं एक श्रमिक परिवार से आते हैं इसलिए गरीब का अपमान उन्हें बर्दाश्त नहीं होगा। हालांकि इसके पहले भी इस तरह के तबादले सत्ता में बैठे नेताओं द्वारा किए गए किंतु नौकरशाहों पर उसका खास असर नहीं होता क्योंकि हर बड़ा अधिकारी किसी न किसी नेता का कृपापात्र है। जिन कलेक्टर साहब का मुख्यमंत्री ने तबादला किया वे भी देर सवेर जुगाड़ लगाकर फिर अपनी मनपसंद जगह पहुंच जाएंगे । ये देखते हुए मुख्यमंत्री को ऐसे तेवर बरकरार रखते हुए बाकी मंत्रियों को भी ये हिदायत दे देना चाहिए कि वे नौकरशाहों को मुंह लगाना बंद कर दें। इसका आशय ये भी नहीं है कि आई.ए.एस  और आई.पी.एस अधिकारियों को अपेक्षित सम्मान और महत्व न मिले । आखिर शासन उनके बिना चल  भी नहीं सकता किंतु उनको ये एहसास तो करवाना ही होगा कि वे आम जनता को गुलाम न समझें। 


-रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 3 January 2024

क्षेत्रीय दलों के सामने राष्ट्रीय दलों की लाचारी लोकतंत्र के लिए नुकसानदेह


बिहार में छाई राजनीतिक अस्थिरता समाप्त हो पाती उसके पूर्व ही आदिवासी बहुल पड़ोसी राज्य झारखंड में भी सत्ता डगमगाने लगी है। ईडी द्वारा भेजे गए आधा दर्जन समन की उपेक्षा करने के बाद मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की अकड़ ढीली होने लगी है। उनको इस बात का डर सता रहा है कि वे गिरफ्तार कर लिए जाएंगे। उस  स्थिति में  राज्य की सत्ता हाथ से न खिसक जाए इसलिए वे अपनी पत्नी को मुख्यमंत्री बनाने की कोशिश में जुटे हुए हैं। एक विधायक ने अपनी सीट भी खाली कर दी है जिससे वे उपचुनाव जीतकर विधायक बन सकें। स्मरणीय है चारा घोटाले में जेल जाने पर लालू प्रसाद यादव ने भी अपनी पत्नी राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री बनवा दिया था। हालांकि हेमंत अभी गिरफ्तार नहीं हुए हैं किंतु उनके पैंतरे उस आशंका को मजबूत कर रहे हैं । उनके विरुद्ध राज्यपाल द्वारा की गई एक जांच के निष्कर्ष भी उजागर होने हैं। कुल मिलाकर उनका जेल जाना निश्चित है ऐसा राजनीति और कानून के जानकार मान रहे हैं। लेकिन ऐसा होने पर उनकी पार्टी झारखंड मुक्ति मोर्चा के किसी अन्य नेता की बजाय अपनी पत्नी को सत्ता में बिठाने की गोटियां बिठाने से एक बार फिर ये आरोप प्रमाणित हो जाता है कि क्षेत्रीय दलों के मुखिया जनभावनाओं का दोहन करते हुए अपने और अपने परिजनों को ही सत्ता का सुख प्रदान करने प्रयासरत रहते हैं। जम्मू कश्मीर से तमिलनाडु तक जितने भी छोटे  क्षेत्रीय दल कार्यरत हैं वे सभी परिवारवाद के पोषक रहे हैं। बिहार में जनता दल (यू) जरूर नीतीश कुमार  की जेबी पार्टी है किंतु उन्होंने उसे परिवार से मुक्त रखा जिसके लिए उनकी प्रशंसा की जानी चाहिए। लेकिन नेशनल कांफ्रेंस , पीडीपी, अकाली दल , सपा, बसपा, लोकदल , राजद , तृणमूल कांग्रेस , झामुमो, शिवसेना , बीआरएस , वाईएसआर कांग्रेस , द्रमुक आदि सभी का जन्म जिन नेताओं के हाथों हुआ वे सभी किसी क्षेत्र , जाति या भाषा के नाम पर ताकतवर बने किंतु धीरे - धीरे शुरुआती  संघर्ष के साथियों को दरकिनार करते हुए अपने परिवार के लोगों को ही पार्टी का वारिस बना लिया । हालांकि परिवार को विरासत सौंपने का सिलसिला प्रारंभ कांग्रेस से हुआ । चूंकि ज्यादातर पार्टियां उससे निकले नेताओं द्वारा स्थापित की गईं इसीलिए वे भी अपने परिवारजन को उत्तराधिकारी बनाने की नीति पर आगे बढ़ गए। नतीजा ये हुआ कि पूरे देश में कुछ परिवार पुराने राजा - महाराजाओं जैसे सामंतशाह बनकर उभरे। हेमंत सोरेन को भी राजगद्दी उनकी योग्यता से नहीं अपितु उनके पिता शिबू सोरेन के कारण प्राप्त हो सकी। जिसे वे आपातकालीन व्यवस्था के तहत अपनी पत्नी को सौंपने की तैयारी में हैं। फारुख और उमर अब्दुल्ला , महबूबा मुफ्ती ,  ओमप्रकाश ,अभय , दुष्यंत चौटाला , जयंत चौधरी , अखिलेश , डिंपल , शिवपाल सहित पूरा यादव कुनबा , मायावती के भतीजे आनंद , लालू  का पूरा परिवार , ममता बैनर्जी के भतीजे अभिषेक , नवीन पटनायक , जगनमोहन रेड्डी , के.सी राव का परिवार , स्टालिन और उनके भाई -बहिन, ठाकरे परिवार आदि भारतीय राजनीति के वे कुनबे हैं जो क्षेत्रीय के साथ ही राष्ट्रीय राजनीति को प्रभावित करने की स्थिति में आ गए हैं। विपक्ष द्वारा बनाए गए इंडिया  गठबंधन में कांग्रेस जैसी राष्ट्रीय पार्टी भी इन नेताओं के आगे झुकने बाध्य है। गठबंधन के संयोजक के अलावा सीटों के बंटवारे के फार्मूले पर भी क्षेत्रीय नेता  कांग्रेस पर हावी हैं। इसका सबसे ज्यादा नुकसान हो रहा है देश के संघीय ढांचे को क्योंकि क्षेत्रीय दलों द्वारा शासित अनेक राज्यों ने  केंद्रीय एजेंसियों को अपने यहां आने से रोक रखा है। इसी तरह केंद्र सरकार द्वारा जारी आदेशों की भी खुलकर अवहेलना की जाती है। अब्दुल्ला और मुफ्ती ने धारा  370 हटाए जाने पर तिरंगा थामने वाला नहीं मिलेगा जैसा बयान दे डाला , वहीं तमिलनाडु से हिन्दी के विरोध में देश से अलग हो जाने जैसी धमकी आती है। ये सब देखते हुए कांग्रेस और भाजपा जैसी राष्ट्रीय पार्टियों को चाहिए कि वे अपने राजनीतिक लाभ के लिए ऐसे  नेताओं से दूरी बनाएं जिनका दृष्टिकोण बेहद सीमित है। हेमंत सोरेन यदि अपनी पत्नी को मुख्यमंत्री बनाते हैं तो उसमें असंवैधानिक कुछ भी नहीं किंतु संसदीय प्रजातंत्र के भविष्य के लिए ये शुभ संकेत नहीं हैं।

- रवीन्द्र वाजपेयी





Tuesday, 2 January 2024

हिट एंड रन : चालकों की हड़ताल से उठे सवालों का उत्तर भी ढूंढ़ना होगा



किसी को टक्कर मारकर भाग जाने (हिट एंड रन) जैसे कृत्य के लिए 10 लाख रु. का जुर्माना और सात साल की सजा का जो प्रावधान हाल ही में किया गया उसके विरोध में म. प्र सहित अनेक राज्यों के ट्रक , बस और टैंकर चालक बीते दो दिनों से हड़ताल पर हैं । इसके कारण जरूरी चीजों की आपूर्ति प्रभावित होने के साथ ही यात्रियों को भी भारी परेशानी हो रही है। पेट्रोल पंप खाली हो जाने से निजी वाहन चालक भी मुसीबत झेलने मजबूर हैं। । वाहन चालकों का तर्क है कि  गलती न होने पर भी घटनास्थल पर उपस्थित जनता टक्कर मारने वाले चालक की बेरहमी से पिटाई करती है। अनेक चालकों की तो मौत भी पिटाई से हुई। वाहन में आग लगाने जैसी वारदात भी आम हैं। इसलिए  घटनास्थल पर रुके रहना  जान के लिए खतरनाक होता है । चालकों ने उन्हें मिलने वाले वेतन , भत्ते एवं अन्य सुविधाओं को बेहद कम बताते हुए सजा के नए प्रावधान वापस लेने की बात कही है। उनके तर्क  विश्लेषण का विषय हैं किन्तु इतना तो है कि टक्कर मारने वाले चालक के रुक जाने पर उसकी और  वाहन दोनों की खैर नहीं होती । और बड़े वाहन वाले को ही गलत ठहराकर  गुस्सा उतारा जाता है। लेकिन दूसरा पहलू  ये भी  है कि टक्कर होने के बाद अपनी रक्षा के लिए भागे चालक को निकटस्थ पुलिस थाने में जाकर घटना की जानकारी देते हुए कानून की शरण लेनी चाहिए। यदि वाहन का समुचित बीमा हो तो उसमें दुर्घटना का मुआवजा देने की व्यवस्था भी रहती है। लेकिन इसके लिए वाहन संबंधी कागजात तथा चालक का लायसेंस नियमानुसार होना चाहिए। ज्यादातर मामलों में चूंकि  ये चीजें दुरुस्त नहीं होतीं , इसलिए भी दुर्घटना के बाद  चालक घटनास्थल पर नहीं रुकते। कुछ दिन पूर्व जबलपुर के निकट बरगी में किसी अज्ञात वाहन ने एक मोटर सायकिल को टक्कर मारी और बिना रुके चला गया। मोटर सायकिल पर बैठी तीन सवारियों में से एक महिला की मौत हो गई। दोपहिया वाहन पर तीन लोगों को बिठाना भी गैर कानूनी है। ऐसे में  दुर्घटना का दोषी मोटर सायकिल चलाने वाले को कहा जाए या उस अज्ञात वाहन चालक को जो टक्कर होने के बाद फुर्र हो गया? ऐसे अनेक सवाल इस हड़ताल से उठ खड़े हुए हैं।  हमारे देश में सड़क परिवहन में सुरक्षा का सवाल आए दिन उठता है। प्रतिवर्ष लाखों  लोग दुर्घटनाओं में मारे जाते हैं। उच्चस्तरीय राजमार्गों के विकास के बाद सड़क परिवहन में अकल्पनीय वृद्धि हुई है। तकनीकी दृष्टि से उत्कृष्ट वाहन भी भारतीय सड़कों पर नजर आते हैं। लेकिन इन महंगे वाहनों के दुर्घटनाग्रस्त होने की खबरें भी  नित्य मिलती हैं। प्रसिद्ध उद्योगपति सायरस मिस्त्री की मौत जिस कार दुर्घटना में हुई वह दुनिया की बेहतरीन कारों में गिनी जाती थी। ये सब देखते हुए देश में सड़क परिवहन को सुरक्षित रखने के पुख्ता प्रबंध भी करना होंगे। जिन राज्यों में गोवंश को काटे जाने पर प्रतिबंध है वहां राजमार्गों पर गायों के झुंड दुर्घटना का कारण बन जाते हैं।  जिस वाहन से टकराकर गाय घायल होती या मारी जाती है उसका चालक भी  तेजी से भाग जाता है क्योंकि रुकने पर वहां मौजूद लोग उसकी पिटाई करने के साथ ही बतौर मुआवजा मोटी रकम भुगतान करने का दबाव बनाते हैं। इस परिप्रेक्ष्य में हड़ताल करने वाले चालकों के पक्ष को भी गंभीरता से समझने की ज़रूरत है। हमारे देश में माल ढोने वाले वाहनों के अलावा व्यवसायिक यात्री  वाहन लगातार सड़कों पर दौड़ते हैं। जिन क्षेत्रों में रेल सुविधा नहीं हैं उनके लिए तो सड़क यातायात ही एकमात्र विकल्प है। ग्रामीण सड़कों के विकास की वजह से अब गांव भी बैलगाड़ी युग से बाहर आ चुके हैं। इसीलिए दुर्घटनाएं भी समाचारों का स्थायी हिस्सा बन गई हैं। हड़ताल तो  शासन - प्रशासन समझा - बुझाकर खत्म करवा लेगा और  वाहन मालिक भी ज्यादा दिन तक अपनी गाड़ी को खड़ा नहीं रख सकते। लेकिन इन वाहनों की फिटनेस  और जरूरी दस्तावेजों के अलावा चालक का समुचित प्रशिक्षण और लायसेंस जैसी अनिवार्य चीजों पर भी ध्यान देना चाहिए क्योंकि सभी दुर्घटनाओं में वाहन चालक निर्दोष हो , ये जरूरी नहीं हो सकता। ये बात जरूर सोचने वाली है कि टक्कर होने के बाद चालक और वाहन को नुकसान पहुंचाने वालों के विरुद्ध भी कड़ाई होनी चाहिए क्योंकि किसी को भी कानून अपने हाथ में लेने की छूट नहीं दी जा सकती। चालकों की हड़ताल से जो मुद्दे सामने आए हैं उन पर सरकार को गंभीरता से विचार करते हुए यदि नए प्रावधानों में  कुछ विसंगति है तो उसे दूर करने में हिचक नहीं होनी चाहिए। 

-

 रवीन्द्र वाजपेयी