Wednesday, 17 January 2024
1990 वाली गलती 2024 में भी दोहरा रहा विपक्ष
Tuesday, 16 January 2024
सनातन धर्म के धर्माचार्यों के बीच सामंजस्य बेहद जरूरी
शंकराचार्य का पद बेहद सम्मानित है किंतु जब वे गद्दी के लिए एक दूसरे पर व्यक्तिगत आरोप लगाते हैं तब इस पद की गरिमा कम होती है। ज्योतिष्पीठ के शंकराचार्य को लेकर ब्रह्मलीन स्वामी स्वरूपानंद जी और स्वामी वासुदेवानंद जी के बीच मुकदमा सर्वोच्च न्यायालय तक गया जिसने फैसला स्वरूपानंद जी के पक्ष में दिया। उनकी मृत्यु के बाद स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद जी को उनका उत्तराधिकारी बनाने के घोषणा हुई जिस पर वासुदेवानंद जी ने आपत्ति उठाते हुए खुद को उस पीठ का शंकराचार्य घोषित कर दिया। यही नहीं तो गोवर्धन पीठ के जगद्गुरु स्वामी निश्चलानंद जी ने भी उनकी नियुक्ति पर ऐतराज जताया। ये मामला भी अदालत में गया। यहां तक कि अविमुक्तेश्वरानंद जी की जाति पर भी सवाल उठा दिए गए। दुख की बात ये है कि जो धर्माचार्य स्वयं को सनातन धर्म का सबसे बड़ा संरक्षक और प्रवक्ता बताते हैं वे पदवी और उससे जुड़ी धन - संपत्ति का अधिकार पाने के लिए अदालत में शपथपत्र दाखिल करते हैं। होना तो ये चाहिए कि सनातन धर्म के धर्माचार्यों के बीच होने वाले इस प्रकार के विवादों का हल करने के लिए धर्म संसद या अखाड़ा परिषद जैसी किसी संस्था के निर्णय को अंतिम माना जाए। उल्लेखनीय है स्वामी स्वरूपानंद जी और वासुदेवानंद जी के शिष्य भी आपस में बंटे हुए थे। हाल ही में निश्चलानंद जी ने भी शंकराचार्यों की बढ़ती संख्या पर नाराजगी व्यक्त की थी। कुंभ मेले में महामंडलेश्वर का पद प्राप्त अनेक साधु - संन्यासी विवादग्रस्त हुए। आद्य शंकराचार्य ने मूल रूप से चार पीठ बनाई थीं। कालांतर में धर्म प्रचार की सुविधा और बेहतर प्रबंधन को ध्यान रखते हुए अनेक उप पीठ बनाई गईं। लेकिन इसकी आड़ में अनेक स्वयंभू शंकराचार्य भी पनपे जिनकी प्रामाणिकता को लेकर प्रमुख धर्माचार्य भी आपस में उलझते रहे। यहां तक कि कुंभ मेले के दौरान स्थान आवंटन के अलावा शाही स्नान जैसे अवसरों पर महत्व को लेकर मतभेद अप्रिय रूप ले लेते हैं। कहने का आशय ये कि सांसारिक मोह - माया को त्यागने का उपदेश देने वाले साधु - संत भी जब साधारण लोगों की तरह आरोप - प्रत्यारोप में उलझ जाते हैं तो उससे उनके प्रति श्रद्धा में कमी आती है। जगद्गुरु संबोधन ही अपने आप में सम्मान का भाव उत्पन्न करने वाला होता है परंतु जब इस पद को हासिल करने के लिए भी होड़ मचती है तब इसकी प्रतिष्ठा में ह्रास होना स्वाभाविक है । और इस पदवी से वंचित रह जाने वाले जब अपनी कुंठा व्यक्त करते हैं तब उनमें और एक साधारण इंसान के बीच का फर्क समाप्त हो जाता है। वर्तमान में राम जन्मभूमि पर निर्मित मंदिर के शुभारंभ समारोह में नहीं जाने को लेकर शंकराचार्य काफी चर्चाओं में हैं। उनमें से एक दो खुलकर बयानबाजी भी कर रहे हैं। दावा किया जा रहा है कि 22 जनवरी को अयोध्या में होने जा रहे आयोजन में नहीं जाने के लिए चारों मुख्य शंकराचार्य एक मत हैं। लेकिन इनके बीच की ये एकता भी इस विशिष्ट मुद्दे पर तो नजर आ रही है किंतु जो मतभेद अन्य मुद्दों पर उनके बीच हैं क्या वे भी इसी तरह सुलझ जायेंगे ये बड़ा सवाल है। बीते कुछ दिनों में शंकराचार्य जिस प्रकार राष्ट्रीय परिदृश्य पर उभरे वह इस लिहाज से अच्छा है कि समस्त प्रमुख धर्माचार्य पूरी तरह सक्रिय हैं। अन्यथा सोशल मीडिया पर ये सवाल तेजी से उठाए जा रहे हैं कि महत्वपूर्ण मुद्दों पर ये मौन ही रहते हैं। धार्मिक विषयों पर हुए अनेक आंदोलनों में शंकराचार्यों की अनुपस्थिति को लेकर भी आलोचनात्मक टिप्पणियां सुनाई दे रही हैं। ऐसे में अब ये जरूरी हो गया है कि सनातन धर्म से जुड़े जितने भी प्रमुख धर्माचार्य हैं वे सब आपसी तालमेल बनाएं और किसी भी बड़े मामले में अपनी राय समय रहते दें। राम मंदिर के मामले में बात जब मूर्तियां रखने तक आ गई तब आपत्तियां व्यक्त करने से विशाल हिंदू समाज पक्ष - विपक्ष में विभाजित होने लगा है। लोगों में इस बात की चर्चा है कि शंकराचार्य एक ऐतिहासिक आयोजन के विरोध में मात्र इसलिए एकजुट हो गए क्योंकि उन्हें उनकी अपेक्षानुसार महत्व नहीं मिला। अब एक बात तो तय है कि 22 जनवरी का कार्यक्रम यथावत रहेगा और ये भी कि इसमें शामिल न होकर चारों प्रमुख शंकराचार्य फिलहाल तो अलग - थलग पड़ जायेंगे क्योंकि हिन्दुओं का बहुमत इस आयोजन से उत्साहित और प्रफुल्लित है। हालांकि ये स्थिति अच्छी इसलिए नहीं है क्योंकि सनातन विरोधी मानसिकता वाले वर्ग को इस विवाद के बहाने अपना उल्लू सीधा करने का अवसर मिल रहा है। सबसे बड़ी बात ये है कि शंकराचार्यों द्वारा व्यक्त जी जा रही आपत्तियों को सभी धर्मगुरुओं का समर्थन नहीं मिल रहा।
- रवीन्द्र वाजपेयी
Saturday, 13 January 2024
विपक्षी गठबंधन में टकराहट के बीच राहुल का यात्रा निकालना नुकसानदेह
कांग्रेस नेता राहुल गांधी कल मकर संक्रांति से भारत जोड़ो यात्रा का द्वितीय चरण प्रारंभ करने जा रहे हैं। 20 मार्च को इसका मुंबई में समापन होगा। इसे भारत जोड़ो न्याय यात्रा नाम दिया गया है । कांग्रेस को लगता है कि मणिपुर से मुंबई तक की इस यात्रा से उसे लोकसभा चुनाव में लाभ होगा । पिछली यात्रा के बाद उसे हिमाचल , कर्नाटक और तेलंगाना में सफलता मिली थी। लेकिन छत्तीसगढ़ और राजस्थान उसके हाथ से खिसक गए। म.प्र में यद्यपि भाजपा काबिज थी किंतु कांग्रेस ये हवा फैलाने में कामयाब हो गई थी कि प्रदेश में सत्ता विरोधी लहर है। लेकिन परिणाम आए तो उसकी उम्मीदों पर पानी फिर गया। उसके बाद कहा जाने लगा कि भाजपा उत्तरी भारत और कांग्रेस सहित अन्य विपक्षी दल दक्षिणी राज्यों में मजबूत हैं। ये बात भी सामने आई कि न्याय यात्रा के मार्ग में आने वाले ज्यादातर राज्यों में कांग्रेस सत्ता से बाहर है। कुछ में क्षेत्रीय दलों के साथ वह सरकार में शामिल तो है किंतु उसका स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है। ऐसे में यात्रा से किसे मजबूती मिलेगी ये सवाल उठ रहा है। जो क्षेत्रीय दल भाजपा विरोधी हैं वे भी कांग्रेस की ताकत बढ़ने देना नहीं चाहेंगे। तेलंगाना में के.सी.राव के सत्ता से बाहर हो जाने पर अन्य क्षेत्रीय दल भी चौकन्ने हो गए हैं। उल्लेखनीय है उक्त राज्य के चुनाव में कांग्रेस ने श्री राव पर भाजपा की बी टीम होने का खूब प्रचार किया। हालांकि बीआरएस, इंडिया गठबंधन का हिस्सा नहीं थी किंतु भाजपा से भी उसकी दुश्मनी खुलकर सामने आ गई थी। ऐसे में कांग्रेस के साथ गठबंधन में शरीक क्षेत्रीय पार्टियां अपने प्रभाव की कीमत पर कांग्रेस के उत्थान को किसी भी स्थिति में स्वीकार नहीं करेंगी। प.बंगाल से इसके संकेत मिलने भी लगे हैं। ममता बैनर्जी भले ही इंडिया गठबंधन में हैं किंतु अपने राज्य में वे कांग्रेस और वामपंथी दलों को मात्र 2 सीटें देने पर अड़ी हुई हैं। दूसरी तरफ कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी दीदी और मोदी के बीच अदृश्य गठबंधन की बात उछालकर तृणमूल और भाजपा के बीच गुप्त समझौते का आरोप खुले आम लगा रहे हैं। इसी का परिणाम है कि आज इंडिया गठबंधन के नेताओं की जो आभासी ( वर्चुअल ) बैठक चल रही है उससे ममता ने दूरी बना ली है। नीतीश कुमार को गठबंधन का संयोजक बनाए जाने की अटकलों से भी वे नाराज हैं। यहां तक कि नीतीश भी बैठक में शामिल नहीं हुए।इस माहौल में यदि श्री गांधी मणिपुर से मुंबई तक क्षेत्रीय दलों के वर्चस्व वाले राज्यों के बड़े हिस्से से गुजरेंगे तब इंडिया गठबंधन के सदस्य होने के बाद भी वे उनको अपेक्षित सहयोग देंगे , इसमें संदेह है। और फिर ऐसे समय जब गठबंधन में सीटों के बंटवारे को लेकर टांग खिचौवल चल रही हो तब श्री गांधी का यात्रा पर निकल जाना रणनीतिक दृष्टि से भी बुद्धिमत्तापूर्ण नहीं लगता। कांग्रेस को ये देखना और सोचना चाहिए कि भाजपा ने पांच राज्यों के चुनावों से फुरसत होने के बाद एक दिन भी व्यर्थ नहीं गंवाया और लोकसभा चुनाव की तैयारियों में जुट गई। जिन सीटों पर वह 2019 में हारी थी उनके उम्मीदवार वह जल्द घोषित करने के संकेत दे रही है । इसी तरह जिन राज्यों में कमजोर है उनमें भी उसने मोर्चेबंदी शुरू कर दी है। इसके विपरीत कांग्रेस राष्ट्रीय स्तर पर उठने वाले मुद्दों पर अपनी नीति स्पष्ट करने असमर्थ नजर आ रही है। इसका सबसे नया उदाहरण राममंदिर के शुभारंभ पर अयोध्या में आयोजित समारोह में शामिल न होने का निर्णय लेने में किया गया विलंब है। इसके कारण पार्टी का एक बड़ा वर्ग अपने को असहज महसूस कर रहा है। कुछ ने खुलकर शीर्ष नेतृत्व के फैसले को आत्मघाती बताने में हिचक नहीं की। राहुल को यद्यपि न्योता ही नहीं मिला किंतु इस ज्वलंत विषय पर वे स्पष्ट रूप से कुछ नहीं बोल सके। ऐसे में आवश्यकता इस बात की थी कि वे बजाय सवा दो महीनों की लंबी यात्रा निकालने के , गठबंधन के घटक दलों के बीच सामंजस्य बिठाने का काम करते, जिनके बीच वैचारिक मतभेद और महत्वाकांक्षाओं का टकराव सर्वविदित है। केवल भाजपा को हराने के उद्देश्य से वे सब एक साथ आए हैं। और सीटों का बंटवारा ही उनकी एकमात्र रणनीति है। कहने को सोनिया गांधी और मल्लिकार्जुन खरगे गठबंधन के सदस्यों के बीच तालमेल स्थापित करने में जुटे हैं। लेकिन इस महत्वपूर्ण कार्य में राहुल की अन्मयस्कता के कारण ही प्रधानमंत्री पद के लिए उनके नाम को आगे किए जाने के लिए कोई सहयोगी दल सामने नहीं आया। पिछली बैठक में ममता ने श्री खरगे का नाम उछालकर एक तरह से श्री गांधी की किरकिरी करवा दी। लोकसभा चुनाव की रणनीति तय करने के समय उनका दिल्ली से दूर रहना कांग्रेस और गठबंधन दोनों ही लिए नुकसान का सौदा हो सकता है। वैसे भी म.प्र, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में बुरी तरह हारने के बाद से कांग्रेस को लेकर उसके समर्थक वर्ग में ही जबर्दस्त निराशा है।
- रवीन्द्र वाजपेयी
Friday, 12 January 2024
स्वच्छता सर्वेक्षण के अच्छे परिणाम किंतु अभी बहुत कुछ करना जरूरी
राष्ट्रीय स्वच्छता सर्वेक्षण के परिणाम गत दिवस घोषित हो गए जिनमें म.प्र के इंदौर शहर ने एक बार फिर बाजी मारी । गुजरात का सूरत नगर भी उसके साथ सह विजेता है क्योंकि दोनों को एक जैसे अंक मिले। सूरत पहले भी देश के सबसे स्वच्छ शहर होने का गौरव हासिल कर चुका था परंतु इंदौर की प्रशंसा करनी होगी जिसने अपने समृद्ध इतिहास , समन्वित सामाजिक जीवन , खान - पान के शौक और व्यवसायिक गतिविधियों के साथ ही स्वच्छता में भी राष्ट्रीय स्तर पर अपना सम्मानजनक स्थान बना लिया। देश के अनेक शहर इस प्रतियोगिता में चमकने के बाद अपना स्थान बरकरार नहीं रख सके । कुछ तो काफी ऊपर रहने के बाद नीचे लुढ़क आए। लेकिन इंदौर ने शिखर पर पहुंचने के बाद उस पर बने रहने का जो कारनामा कर दिखाया उसके लिए वहां की नगर निगम और नेता तो तारीफ के हकदार हैं ही किंतु सबसे ज्यादा श्रेय दिया जाना चाहिए इंदौर वासियों को जिन्होंने स्वच्छता को अपना स्वभाव बना लिया है। वरना शासकीय फरमान और दंड व्यवस्था के बावजूद यदि जनता सहयोग न करे तो इस तरह की सफलता हासिल करना असंभव होता है। जिस तरह स्व . अटल बिहारी वाजपेयी को देश में सड़क क्रांति लाने के लिए याद किया जाता है उसी तरह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वच्छता को राष्ट्रीय अभियान बनाकर अभिनंदन योग्य कार्य किया। शुरुआत में उसे चोचलेबाजी समझकर उसका उपहास किया गया किंतु धीरे - धीरे इस अभियान को गंभीरता से लिया जाने लगा । यद्यपि ये कहना तो गलत होगा कि देश ने स्वच्छता के मामले में पूरी तरह सफलता हासिल कर ली है किंतु इस प्रतिस्पर्धा के कारण छोटे - छोटे शहरों तक में जागरूकता और दायित्वबोध दिखाई देने लगा है। इसका उदाहरण उन शहरों की स्थिति में आया सुधार है जिनके दामन पर सर्वेक्षण के शुरुआती सालों में सबसे गंदा होने का दाग लगा। प्रदेशों की राजधानियों को एक बार छोड़ दें किंतु छोटे और मध्यम श्रेणी के शहरों में भी स्वच्छता एक मुद्दा बनने लगा है। रेल गाड़ी के वातानुकूलित डिब्बों में सफर करने वाले तक पहले गंदगी करने से बाज नहीं आते थे , लेकिन अब हालात काफी सुधरे हैं। स्वच्छता की स्थिति को बेहतर करने में घरों से कचरा एकत्र करने की व्यवस्था का भी बड़ा योगदान है। चाट और चाय बेचने वाले ठेले और गुमटी वाले भी डस्टबिन रखने लगे हैं। सबसे बड़ी बात ये है कि छोटे - छोटे बच्चे भी इस दिशा में प्रेरित हो रहे हैं। लेकिन शहरों से अलग कस्बाई और ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी स्वच्छता को लेकर काफी कुछ करने की गुंजाइश है। लोगों को ये समझाना जरूरी है कि स्वच्छता केवल किसी क्षेत्र की सुंदरता नहीं बढ़ाती अपितु उसके वाशिंदों के स्वास्थ्य और मानसिकता को भी प्रभावित करती है। इसके साथ ही देश में पर्यटन की वृद्धि में भी स्वच्छता की बड़ी भूमिका है। भारत उस दृष्टि से काफी पीछे रह जाता है। हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दारा लक्षद्वीप में पर्यटन की सम्भावना पर की गई टिप्पणी पर मालदीव के कुछ मंत्रियों द्वारा जो कटाक्ष किया गया उसमें गंदगी का भी उल्लेख था। भले ही उस बात ने दूसरा मोड़ ले लिया किंतु जो यथार्थ है उसे तो स्वीकार करना ही होगा। हमारे देश में प्राकृतिक और ऐतिहासिक दोनों ही दृष्टियों से पर्यटन की असीम संभावनाएं हैं। लेकिन स्वच्छता की कमी की वजह से हम उनका अपेक्षित लाभ नहीं ले पाते। विशाल जनसंख्या के अलावा गरीबी और अशिक्षा भी इसके लिए काफी हद तक जिम्मेदार है। बढ़ते शहरीकरण ने पहले तो महानगरों का बोझ बढ़ाया किंतु अब मध्यम श्रेणी के शहर भी उससे प्रभावित होने लगे हैं। इसका असर गंदगी के ढेर बढ़ने के तौर पर देखने मिलने लगा है। इसके अलावा ग्रामीण क्षेत्रों में भी जहां देखो वहां प्लास्टिक बिखरा दिख जाता है। तीर्थस्थलों में आवाजाही बढ़ने से वहां भी स्वच्छता बनाए रखना आसान नहीं है। लेकिन इस अभियान के राष्ट्रव्यापी फैलाव से नई पीढ़ी में जो सुखद बदलाव आया वह उम्मीद जगाने वाला है। हमारा पड़ोसी चीन भारी - भरकम जनसंख्या के बावजूद यदि अन्य विकसित देशों की तरह ही साफ -सुथरा बन सका तो उसमें वहां की जनता का भी योगदान है। यद्यपि हमारे देश में चीन जैसी तानाशाही नहीं है किंतु लोगों के मन में ये बात बिठाने की ज़रूरत है कि वे देश की तरक्की और अपनी बेहतर जिंदगी चाहते हैं तो फिर कुछ शहरों को ही नहीं बल्कि पूरे देश को स्वच्छ रखना जरूरी है। बीते कुछ समय से ग्रामीण पर्यटन को विकसित करने का प्रयास हो रहा है और उसके प्रारंभिक परिणाम भी अच्छे आए हैं। लेकिन इसे पूरी तरह सफल बनाने के लिए स्वच्छता के स्तर को अपेक्षित ऊंचाई तक ले जाना होगा । इस वर्ष सर्वेक्षण के जो परिणाम आए उनमें कुछ नए शहर भी स्वच्छता पायदान में ऊपर आए हैं। चूंकि प्रतिस्पर्धा शहरों की आबादी के पैमाने पर होने लगी है इसलिए छोटे - छोटे शहरों के पास भी राष्ट्रीय स्तर पर प्रशंसा और प्रसिद्धि हासिल करने का अवसर है। हमारे देश में निजी स्तर पर तो स्वच्छता का पाठ पढ़ाया जाता है किंतु केवल अपना घर साफ - सुथरा रहे और बाहर गंदगी बिखरी पड़ी हो तो वह स्थिति अच्छी नहीं कही जाएगी। इसलिए स्वच्छता को सामूहिक सोच और संस्कार बनाना पड़ेगा ।
-रवीन्द्र वाजपेयी
Thursday, 11 January 2024
विधानसभा अध्यक्ष के निर्णय लेने की समय सीमा तय होनी चाहिए
Wednesday, 10 January 2024
22 जनवरी सदियों से दोहराए जा रहे संकल्प के पूरा होने का अवसर होगी
Tuesday, 9 January 2024
लक्षद्वीप की प्रशंसा के जरिए मोदी द्वारा मालदीव की रीढ़ पर कड़ा प्रहार
हिन्द महासागर में स्थित द्वीपनुमा देश मालदीव इन दिनों चर्चा में है। कुछ समय पहले वहां चीन समर्थक मोहम्मद मुइज्जू राष्ट्रपति चुन लिए गए। उनके चुनाव प्रचार में भारत विरोध स्पष्ट रूप से झलक रहा था। जबकि पूर्ववर्ती राष्ट्रपति मोहम्मद सोलिह खुलकर भारत के साथ थे। मुइज्जू ने चुनाव जीतने के साथ ही वहां मौजूद भारतीय सैनिकों को वापस बुलाने की मांग कर डाली। दरअसल वहां कुछ ऐसे काम चल रहे हैं जिनके कारण भारतीय सेना के कुछ लोग मालदीव में हैं। हेलीकाप्टर एवं कुछ अन्य उपकरणों के संचालन के लिए दोनों देशों में हुए समझौते के अंतर्गत वे सैनिक वहां पदस्थ हैं । हालांकि ये संख्या इतनी बड़ी नहीं कि उसके आंतरिक मामलों में दखल दे सके। मुस्लिम बहुल मालदीव के साथ भारत के रिश्ते काफी अच्छे रहे। इस देश की मुख्य आय पर्यटन है । यहां के समुद्र तट बेहद खूबसूरत हैं। चूंकि भारत से यह देश करीब है इसलिए यहां से प्रतिवर्ष लाखों सैलानी मालदीव घूमने जाते रहे हैं। अनेक भारतीय फिल्मों की शूटिंग भी यहां हो चुकी है। लेकिन राष्ट्रपति मुइज्जू ने जब भारत विरोधी मोर्चा खोला तब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लक्षद्वीप नामक भारतीय टापू की यात्रा के दौरान वहां के समुद्र तट पर घूमते अपने चित्रों के साथ भारतीय सैलानियों को लक्षद्वीप आने की समझाइश देते हुए उसके प्राकृतिक सौंदर्य की प्रशंसा कर डाली। वैसे भी प्रधानमंत्री जहां जाते हैं वहां की खूबियों का बखान करना नहीं भूलते। कुछ समय पहले वे उ.प्र के पिथौरागढ़ में स्थित आदि कैलाश गए थे जहां से तिब्बत स्थित कैलाश पर्वत नजर आता है। उनकी इस यात्रा के चित्र प्रसारित होते ही आदि कैलाश एक नए पर्यटन केंद्र के तौर पर प्रसिद्ध हो गया। 2019 के लोकसभा चुनाव का प्रचार बंद होते ही प्रधानमंत्री केदारनाथ की एक गुफा में जाकर रहे जिसके बाद उस धाम और गुफा दोनों के प्रति रुचि बढ़ी जिसका परिणाम वहां जाने वालों की संख्या में हुई अकल्पनीय वृद्धि के रूप में सामने आया। श्री मोदी ने घरेलू पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए गुजरात में सरदार पटेल की जो स्टेच्यू ऑफ लिबर्टी बनवाई उस पर हुए खर्च को लेकर तमाम आलोचनाएं हुईं किंतु उस प्रकल्प के पूर्ण होते ही वह स्थान देश के प्रमुख पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित हो गया। वाराणसी में विश्वनाथ और उज्जैन के महाकाल मंदिरों के परिसर का उन्नयन भी कुछ लोगों को रास नहीं आ रहा था किंतु आज उसके चमत्कारिक लाभ देखने मिल रहे हैं। हालांकि श्री मोदी के मन में लक्षद्वीप के पर्यटन को बढ़ावा देने का भाव था या आगामी लोकसभा चुनाव के मद्देनजर वहां के मतदाताओं को लुभाने की सोच , ये तो वही जानें किंतु उनकी सहज टिप्पणी पर मालदीव की नई सरकार के कुछ मंत्रियों के हल्के स्तर के बयानों के बाद से मालदीव और लक्षद्वीप के बीच प्रतिस्पर्धा शुरू हो गई। भारत में जिस तेजी से मालदीव के बहिष्कार और लक्षद्वीप के प्रति उत्सुकता उत्पन्न हुई उसने मालदीव की अकड़ ढीली कर दी। राष्ट्रपति मुइज्जू ने चीन की यात्रा पर रवाना होने से पहले ही भारत और मोदी विरोधी टिप्पणी करने वाले तीन मंत्रियों की छुट्टी करते हुए विवाद को ठंडा करने का प्रयास किया किंतु तब तक उसे जो नुकसान होना था वह तो हो ही चुका था। मालदीव जाने वाले भारतीय पर्यटकों द्वारा यात्रा रद्द होने की खबरें आने लगीं। इसी के साथ ही लक्षद्वीप के प्रति जबरदस्त रुझान देखा जाने लगा। अनेक अभिनेताओं और प्रमुख हस्तियों द्वारा मालदीव की बजाय लक्षद्वीप को प्राथमिकता देने की अपील किए जाने से मुइज्जू सरकार सकते में आ गई। भारत सरकार ने भी उनके राजदूत को बुलाकर कड़े शब्दों में समझा दिया। सबसे बड़ी बात ये हुई कि मालदीव के भीतर ही नए राष्ट्रपति के भारत विरोधी रवैए की आलोचना शुरू हो गई। उनको याद दिलाया जाने लगा कि दशकों पहले जब श्रीलंका से चीन की शह पर आए सशस्त्र आतंकवादियों ने मालदीव पर कब्जा कर लिया तब भारतीय सेना ने जाकर ही उनको वहां से भागने मजबूर किया था। कुल मिलाकर इस घटनाक्रम में प्रधानमंत्री श्री मोदी की दूरदर्शिता और भारत की कूटनीतिक दृढ़ता एक बार फिर प्रमाणित हो गई । मालदीव की नई सरकार के भारत विरोधी रुख के जवाब में प्रधानमंत्री ने लक्षद्वीप के समुद्र तट पर टहलते हुए थोड़े शब्दों में जो कुछ कहा उसका इतना बड़ा असर होगा ये किसी ने नहीं सोचा था। राष्ट्रपति मुइज्जू के भारत विरोधी बयानों का सीधा जवाब देने के बजाय उन्होंने मालदीव की पर्यटन रूपी रीढ़ पर प्रहार कर दिया। निश्चित रूप से ये बहुत ही चतुराई भरा दांव था जिसका जबरदस्त असर देखने मिला। भले ही राष्ट्रपति बनने के बाद मुइज्जू सबसे पहले चीन की यात्रा पर गए हों किंतु नई दिल्ली के कड़े रुख के बाद उनको ये तो महसूस हो ही गया होगा कि भारत से ऐंठना उतना सरल नहीं जितना वे समझ बैठे थे।
- रवीन्द्र वाजपेयी