Thursday, 25 January 2024

विपक्षी एकता का गुब्बारा फूलने से पहले ही फूटने के कगार पर




इंडी नामक विपक्षी गठबंधन में चूंकि वैचारिक साम्यता नहीं है इसीलिए इसकी एकजुटता प्रारंभ से ही संदिग्ध रही है। उससे जुड़े  दल मोदी विरोध पर तो एकमत हैं किंतु आपसी विश्वास नजर नहीं आने से एक कदम आगे , दो कदम पीछे वाली स्थिति बनी हुई है। एक तरफ तो भाजपा अपनी व्यूह रचना  मजबूत करती जा रही है वहीं विपक्षी दलों में सीटों के बंटवारे की गुत्थी उलझती जा रही है। विचारणीय बात ये है कि जिस कांग्रेस को इंडी का आधार माना जाता है वह अन्य दलों के साथ गठजोड़ को दिशा देने के बजाय राहुल गांधी की न्याय यात्रा में लिप्त है। परिणामस्वरूप सीटों के बंटवारे का फार्मूला तैयार नहीं हो पा रहा।  गठबंधन में शामिल उ. प्र , बिहार , प.बंगाल , महाराष्ट्र और तमिलनाडु के क्षेत्रीय दलों के मन में कांग्रेस की जीत को लेकर दुविधा है। इसीलिए वे उसको ज्यादा सीटें देने के लिए राजी नहीं हैं। गत दिवस प.बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी ने ऐलान किया कि तृणमूल कांग्रेस अकेले  मैदान में उतरेगी। वे कांग्रेस और वामपंथियों को 2 सीटें देने पर अड़ी हुई थीं जिसे लेकर गतिरोध कायम है।  ममता ने एकला चलो रे का नारा तब दिया जब न्याय यात्रा उनके राज्य में प्रवेश कर रही थी। उधर भगवंत सिंह मान ने  पंजाब की सभी 13 सीटों पर आम आदमी पार्टी द्वारा अकेले लड़ने का फैसला सुनाते हुए गठबंधन के भविष्य पर बड़ा सवालिया निशान लगा दिया। इसका संकेत ये भी है कि वह दिल्ली में भी कांग्रेस के लिए गुंजाइश नहीं छोड़ेगी। गठबंधन की मुसीबतें बिहार में भी बढ़ती जा रही हैं। नीतीश कुमार ने दो टूक कह दिया कि जनता दल (यू)  2019 में जीती गईं 17 सीटों पर लड़ेगा। शेष 23 सीटों में से लालू यादव राजद  के अलावा कांग्रेस और वामपंथियों के लिए सीटें छोड़ें ,  ऐसा संकेत भी उन्होंने दे दिया। इसे लेकर दोनों  के बीच अविश्वास बढ़ता जा रहा है। नीतीश के एनडीए में आने की अटकलें भी जिस तरह आए दिन उड़ा करती हैं उससे भी लालू खेमा परेशान है। गत दिवस स्व.कर्पूरी ठाकुर के जन्म शताब्दी कार्यक्रम में उन्होंने राजनीति में परिवारवाद पर जिस तरह तीखा हमला किया उसका निशाना लालू ही थे। नीतीश ने बेहिचक ये कहा कि कुछ नेता अपने बेटों को आगे बढ़ाने में ही जुटे रहते हैं। हालांकि प्रसंग कर्पूरी बाबू द्वारा परिवारवाद से परहेज करने का था किंतु जिस अंदाज में नीतीश ने तंज कसा वह लालू के पुत्र प्रेम पर ही निशाना था। महाराष्ट्र में कांग्रेस हावी होने की कोशिश तो कर रही है लेकिन शरद पवार और उद्धव ठाकरे उसके तेवर सहने तैयार नहीं हैं । ऐसे में  विपक्षी एकता का गुब्बारा फूलने के पहले ही फूटता नजर आने लगा है। रोचक बात ये है कि कांग्रेस को ठेंगा दिखाने के बावजूद तृणमूल और आम आदमी पार्टी  गठबंधन में बने रहने की बात भी कर रही है। ऐसे में इस गठबंधन की एकता को लेकर जो संदेह शुरू से ही व्यक्त किया जा रहा था वह दिन ब दिन पुख्ता हो रहा है। बिहार में नीतीश और लालू के बीच खींचतान बनी हुई है। इसके अलावा अपना भविष्य खतरे में देखते हुए जनता दल (यू) के अनेक नेता पार्टी छोड़कर भाजपा में शरण लेते देखे जा सकते हैं। प.बंगाल में कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी लगभग रोजाना ही ममता पर भाजपा से गुपचुप गठजोड़ करने का आरोप लगाया करते हैं। इंडी के जो प्रमुख चेहरे हैं उनका कांग्रेस  से तालमेल न बैठना गठबंधन को मजबूत होने से रोक रहा है। कांग्रेस की समस्या ये है कि मल्लिकार्जुन खरगे भले ही सीटों के बंटवारे पर अन्य दलों के नेताओं के साथ बातचीत करने अधिकृत किए गए  किंतु अंतिम निर्णय चूंकि राहुल के जिम्मे है इसलिए मामला अटका  रहता है। सोनिया गांधी अपने स्वास्थ्य संबंधी कारणों से उतनी सक्रिय नहीं हैं । वहीं तीन राज्यों में बुरी तरह हारने के बाद प्रियंका वाड्रा का दबदबा भी घटा है। कांग्रेस की योजना चूंकि श्री गांधी को प्रधानमंत्री उम्मीदवार बनाने की है इसलिए वह हर फैसले में उन्हें आगे रखने की नीति पर चल रही है। लेकिन इससे उसे  लाभ कम , नुकसान ज्यादा हो रहा है। ममता बैनर्जी और भगवंत सिंह मान ने गत दिवस जो झटके दिए उनसे गठबंधन की कसावट कमजोर पड़ी है। ऐसा लगता है इंडी के बाकी घटक ये जान गए हैं कि कांग्रेस नीति और नेतृत्व की दृष्टि से खस्ता हाल में है। ऐसे में वे उसके साथ डूबने की बजाय खुद का बचाव करने की रणनीति पर आगे बढ़ रहे हैं। ये भी लगता है कि राहुल की न्याय यात्रा से भी गठबंधन के  सदस्य नाराज हैं । उन्हें लगता है कि इस समय गठबंधन का सामूहिक शक्ति प्रदर्शन  ज्यादा असरकारक साबित होता। लेकिन कांग्रेस ने बिना सहयोगियों को विश्वास में लिए ही राहुल की यात्रा शुरू कर दी। 5 अक्टूबर की भोपाल रैली कमलनाथ द्वारा रद्द करवा देने का निर्णय भी गठबंधन के सदस्यों को नागवार गुजरा था।

- रवीन्द्र वाजपेयी 

Tuesday, 23 January 2024

भारत रत्न ने याद दिलाया कोई कर्पूरी ठाकुर भी थे !



आज की पीढ़ी कर्पूरी ठाकुर का नाम भी भूल चुकी होगी। उन्हें संसार से गए 36 साल हो रहे हैं। अचानक वे स्मृति पटल पर तैरने लगे क्योंकि 100 वीं जयंती पर भारत सरकार ने उनको  भारत रत्न देने की घोषणा कर दी। पिछड़ी जाति में जन्मे कर्पूरी बाबू समाजवादियों की उस पीढ़ी से जुड़े थे जिसका संबंध सिद्धांतों की सियासत से था और जिसने डा.राम मनोहर लोहिया के गैर कांग्रेसवाद के नारे को आत्मसात किया । वे बिहार के दो बार मुख्यमंत्री बने । उनका  कार्यकाल उन्हीं नीतियों के क्रियान्वयन के लिए याद किया जाता है जो आचार्य नरेंद्र देव , डा.लोहिया और जयप्रकाश नारायण जैसे  विचारकों  से प्रेरित थीं। पिछड़ी जातियों के उन्नयन के प्रति उनका योगदान अविस्मरणीय है।  सत्ता का उपयोग उन्होंने अपने  लिए न करते हुए वंचित और शोषित वर्ग के उत्थान के लिए किया। ऐसे व्यक्ति को भारत रत्न दिए जाने का कोई भी विरोध नहीं करेगा किंतु विडंबना ये है कि उनकी महानता का मूल्यांकन करने में  36 वर्ष लग गए। यद्यपि ये पहला उदाहरण नहीं है जब भारत रत्न  किसी व्यक्ति को मरणोपरांत प्रदान किया गया हो। संविधान के रचयिता कहे जाने वाले डा. आंबेडकर को उनकी मृत्यु के 46 वर्ष बाद और बनारस हिन्दू विवि के संस्थापक महामना मदनमोहन मालवीय को उनके न रहने के 68 वर्ष  बाद भारत रत्न दिया गया। ये सभी  सर्वथा योग्य थे। लेकिन अवसान के दशकों बाद भारत रत्न देने के पीछे उनके मूल्यांकन से ज्यादा राजनीतिक लाभ की मंशा रही। डा.आंबेडकर का कांग्रेस और पंडित नेहरू से हुआ विवाद जगजाहिर था। उनको भारत रत्न विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार ने दिया जिसके दौर में जातिवादी राजनीति हावी हो चुकी थी। इसी तरह मालवीय जी को भारत रत्न तब मिला जब नरेंद्र मोदी वाराणसी से लोकसभा चुनाव जीतकर प्रधानमंत्री बने।  मालवीय जी को अलंकृत करने के पीछे भी वाराणसी सहित पूर्वांचल को प्रभावित करने का दांव था। ये सब देखते हुए भारत रत्न के राजनीतिकरण से इंकार नहीं किया जा सकता। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री रहे एम.जी.रामचंद्रन और सुप्रसिद्ध असमिया गायक भूपेन हजारिका को मरणोपरांत भारत रत्न  क्षेत्रीय भावनाओं को भुनाने के लिए दिया गया। विख्यात क्रिकेटर सचिन तेंदुलकर को खेल से संन्यास लेने वाले दिन ही जब भारत रत्न देने  का ऐलान हुआ तब सवाल उठा कि सबसे पहले 10 हजार रन बनाने वाले सुनील गावस्कर और 1983 के विश्व कप में भारत को विजय दिलाने वाले कपिल देव को इससे वंचित क्यों रखा गया ? इसी तरह अनेक ऐसे व्यक्तियों को भारत रत्न देने से परहेज किया जाता रहा जिनका इस राष्ट्र के प्रति प्रशंसनीय योगदान रहा । हालांकि मोदी सरकार ने पद्म अलंकरणों की चयन प्रक्रिया को तो  पारदर्शी और गुणवत्ता आधारित बना दिया  किंतु भारत रत्न के बारे में वह स्थिति नहीं है। कर्पूरी ठाकुर को मृत्यु के 36 वर्ष बाद इस सम्मान से विभूषित करने का फैसला भी विशुद्ध राजनीतिक है । इसके जरिए आगामी लोकसभा चुनाव में बिहार में भाजपा की स्थिति मजबूत करने का दांव ही है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने तो फैसले की तारीफ की । वहीं लालू प्रसाद यादव का कहना है कि भाजपा बिहार में  जातिगत जनगणना  के कारण भयभीत हो उठी किंतु लालू और उन के समाजवादी  साथियों को इस बात का जवाब देना चाहिए कि 2004 से 2014 तक जिस केंद्र सरकार का वे भी हिस्सा रहे उस पर स्व.ठाकुर को भारत रत्न दिलवाने का  दबाव क्यों नहीं बनाया ? इसमें दो राय नहीं हैं कि प्रधानमंत्री  हर समय चुनाव लड़ने की मुद्रा में रहते हैं। स्व.ठाकुर को  भारत रत्न देकर उन्होंने  पिछड़े वर्ग की राजनीति करने वाले तबके को चौंका दिया। राम मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा को राजनीतिक बताकर जो विपक्ष अयोध्या नहीं गया वह भी इस निर्णय का विरोध नहीं कर पा रहा। यद्यपि कांग्रेस इसे केंद्र सरकार की हताशा बता रही है परंतु उसके पास इस प्रश्न का कोई उत्तर नहीं है कि समाजवाद के इस प्रतीक पुरुष को अलंकृत करने का ध्यान उसकी सरकार को क्यों नहीं आया ? उल्लेखनीय है पंडित नेहरू और इंदिरा गांधी को उनके  प्रधानमंत्री रहते हुए ही भारत रत्न  प्रदान किया गया जबकि प्रथम राष्ट्रपति राजेंद्र बाबू को पद से निवृत्त होने के बाद । इस प्रकार देश का सबसे बड़ा नागरिक सम्मान भी राजनीतिक प्रपंच से  मुक्त न रह सका। बेहतर हो उन समस्त दिवंगत विभूतियों को  सूचीबद्ध करते हुए एक साथ भारत रत्न दे दिए जाएं जिन्होंने समाज के भले के लिए अपना अमूल्य योगदान दिया हो , क्योंकि किसी के न रहने के दशकों बाद इस तरह का सम्मान अपनी सार्थकता खो बैठता है। 

- रवीन्द्र वाजपेयी 

राम मंदिर : सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के रूप में जन जाग्रति का प्रतीक


अयोध्या स्थित राम मंदिर में  प्राण - प्रतिष्ठा का महोत्सव न सिर्फ भारत अपितु समूचे विश्व में जिस उत्साह से मनाया गया वह निश्चित रूप से ऐतिहासिक कहा जाएगा । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने  उक्त अवसर पर अपने उद्बोधन में सही कहा कि आने वाले एक हजार सालों बाद भी 22 जनवरी 2024 की तिथि लोगों को इस महान दिवस की याद  दिलाती रहेगी। इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती कि प्राण - प्रतिष्ठा का आयोजन अपनी भव्यता के लिए तो विश्व भर में चर्चा का विषय बना ही लेकिन उसके साथ अरबों सनातन धर्मियों को उसने भावनात्मक तौर पर भी जोड़ दिया। आयोजन के पहले देश के ज्यादातर विपक्षी दलों ने तरह - तरह के बहाने बनाकर उसका बहिष्कार किया। वामपंथी मानसिकता के बुद्धिजीवियों और पत्रकारों ने भी राम मंदिर के शुभारंभ को लेकर अनर्गल बातें कीं। यहां तक कि सनातन परंपरा के सबसे बड़े धर्माचार्य शंकराचार्यों द्वारा भी इस आयोजन में रीति - रिवाजों का पालन न किए जाने के आधार पर उससे दूरी बनाए रखने की घोषणा करने के साथ ही जिस तरह की बयानबाजी की उसके कारण अप्रिय स्थिति बन गई। इस विवाद का सबसे दुखद पहलू ये रहा कि पहली बार आम जनता द्वारा शंकराचार्यों के बारे में आलोचनात्मक टिप्पणियां की गईं। यद्यपि उनके एतराज के बाद भी राम जन्मभूमि न्यास के आमंत्रण पर सनातन धर्म से जुड़े तमाम प्रमुख संत,महात्मा तो प्राण - प्रतिष्ठा समारोह में शामिल हुए ही लेकिन उनके अलावा जैन , सिख और बौद्ध धर्मगुरु भी कल अयोध्या में इस ऐतिहासिक पल के साक्षी रहे। एक - दो मुस्लिम धार्मिक हस्तियां भी नजर आईं। उद्योग, मनोरंजन , क्रीड़ा , साहित्य जैसे विभिन्न क्षेत्रों के नामचीन चेहरे जिस उत्साह के साथ  प्राण - प्रतिष्ठा समारोह में नजर आए वह अपने आप में बहुत कुछ कह गया।  सुरक्षा प्रबंधों को दुरस्त रखने के अलावा अव्यवस्था को रोकने के लिए आयोजन स्थल पर केवल 8 हजार आमंत्रित जनों की ही उपस्थिति रखी गई । लेकिन न सिर्फ भारत अपितु दुनिया भर में जिस तरह से उक्त आयोजन का सीधा प्रसारण टेलीविजन के साथ ही इंटरनेट के जरिए विभिन्न संचार माध्यमों पर देखा गया , वह अपने आप में एक कीर्तिमान तो है ही किंतु वह इस बात का प्रमाण भी है कि इस मंदिर के निर्माण से सनातन और हिंदुत्व के प्रति दुनिया भर में नए सिरे से रुचि पैदा हुई है । वरना दुबई के बुर्ज खलीफा , पेरिस की ईफिल टॉवर  और न्यूयॉर्क के टाइम्स स्क्वायर जैसे विश्व प्रसिद्ध स्थानों पर अयोध्या के पूरे समारोह का सीधा प्रसारण न दिखाया जाता। अनेक देशों के राजनेताओं ने अपने यहां स्थित हिन्दू मंदिरों में जाकर भारत के प्रति अपना लगाव प्रदर्शित किया। इस आयोजन का विराट स्वरूप और सफलता मंदिर की व्यवस्था देख रहे न्यास के अलावा प्रधानमंत्री श्री मोदी और उ.प्र के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की उस समन्वित सोच का परिणाम है जिसने अयोध्या को देखते - देखते देश के सबसे सुंदर और सुविधा संपन्न नगरों की सूची में स्थान दिलवा दिया। इसी तरह सनातन संस्कृति के अभूतपूर्व पुनर्जागरण के तौर पर समाज के प्रत्येक वर्ग ने बीते दो दिनों में जिस उमंग और उत्साह से राम मंदिर में प्राण - प्रतिष्ठा को राष्ट्रीय  पर्व का स्वरूप प्रदान किया वह सामाजिक समरसता का संदेश वाहक बन गया। देश के प्रत्येक हिस्से में जिस प्रकार का हर्षोल्लास देखा गया उसने पूरी दुनिया को यह एहसास करवा दिया कि भारत में  सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के रूप में जो जन जाग्रति आई है वह वैश्विक स्तर पर अपना प्रभाव छोड़े बिना नहीं  रहेगी। रास्वसंघ के सरसंघचालक डा.मोहन भागवत ने उक्त आयोजन में सही कहा कि राम मंदिर , राष्ट्र मंदिर है। प्रधान मंत्री श्री मोदी ने यही समय है , सही समय है जैसी बात कहकर भारत के आत्मविश्वास का प्रकटीकरण तो किया ही लेकिन उन्होंने देव से देश और राम से राष्ट्र तक का जो संदेश दिया वह सही मायनों में  इस भव्य आयोजन की परिणिति है। कोरोना नामक महामारी से लड़ने के लिए प्रधानमंत्री ने जब एक दिन के जनता कर्फ्यू का आह्वान किया तब लोगों को उसका उद्देश्य समझ नहीं आया था। उसके बाद उन्होंने देशवासियों से शंख और घंटे बजाने के साथ ही घरों पर दीपमालिका का आग्रह किया । उस समय भी उसका मजाक उड़ाने वाले कम नहीं थे किंतु उक्त दोनों प्रयोग सफल रहे । उसके जरिए प्रधानमंत्री ने लोगों में एकजुटता और विश्वास का जो संचार किया उसी के कारण लॉक डाउन जैसी असुविधाजनक स्थिति में भी अनुशासन और व्यवस्था बनी रही। राम मंदिर में प्राण - प्रतिष्ठा के जरिए भी उसी तरह का सामंजस्य और एकजुटता का संचार हुआ है। जिसका लाभ देश को एकजुट रखने में मिलेगा ये विश्वास किया जा सकता है।


-रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 22 January 2024

भारत के नए विश्वास की प्राण प्रतिष्ठा



सदियों से चले आ रहे संघर्ष की यह सफल परिणिति केवल ईंट - गारे से बना मंदिर ही नहीं अपितु सैकड़ों वर्षों की मानसिक दासता से मुक्ति का दिवस है। 15 अगस्त 1947 को लंबी विदेशी सत्ता से देश को स्वाधीनता प्राप्त हुई थी किंतु सांस्कृतिक गौरव का वह भाव उत्पन्न नहीं किया जा सका जो इस देश के अस्तित्व का आधार रहा है। जिन लोगों को आज अयोध्या में प्राण प्रतिष्ठा का आयोजन राजनीति से प्रेरित लग रहा है उन्होंने स्वयं को  इस ऐतिहासिक समारोह से दूर रखकर हाशिए पर  धकेल दिया है। सही बात तो ये है कि राम मंदिर का निर्माण दुनिया को ये संदेश है कि भारत ने भले ही अपना लक्ष्य राजनीतिक आजादी प्राप्त करने के समय तय किया हो किंतु उस लक्ष्य तक पहुंचने का मार्ग अब जाकर खोजा है। इस मंदिर को किसी धर्म से जोड़कर देखने से बड़ी मूर्खता नहीं होगी क्योंकि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की समाधि पर लिखा हुआ हे राम , जिस तरह समूचे देश की भावनाओं का प्रतिनिधित्व करता है उसी तरह अयोध्या में आज जिस राम मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा हुई वह भारत की शाश्वत और सनातन संस्कृति का उद्घोष है । आज यदि समूचे विश्व में बसे भारतीय हर्षोल्लास से भरे हुए हैं तो उसका कारण इस देश की मिट्टी के प्रति उनकी अखंड आस्था है जो हजारों मील की दूरी के बाद भी यदि अक्षुण्ण है तो उसका कारण कहीं न कहीं राम ही हैं , जो पुरुषोत्तम के रूप में  आदर्शमय जीवन के ऐसे मापदंड हैं जिसका कोई विकल्प हजारों साल बाद भी न उत्पन्न न हुआ और न ही होगा।  उनकी जन्मभूमि पर आततायी मुस्लिम शासकों द्वारा कब्जा करने के विरुद्ध सैकड़ों वर्षों से संघर्ष  चला आ रहा था। कुछ लोग यह मानते हैं कि राम महज एक कल्पना है जिनके अस्तित्व की प्रामाणिकता नहीं है किंतु जिस तरह आंखें मूंद लेने से दोपहर ,  रात में नहीं बदल जाती , वैसे ही इस तरह के  कुतर्क विकृत मानसिकता को ही बढ़ावा देते हैं । इन्हीं के कारण देश को सैकड़ों वर्षों तक विधर्मी विदेशियों की दासता सहन करनी पड़ी । उस दौर में हमारी धार्मिक आस्था  और सांस्कृतिक विरासत को नष्ट करने के प्रयास निरंतर चलते रहे किंतु प्रभु श्री राम के प्रति विश्वास ने ही संकट के उस काल में भी देशवासियों का मनोबल ऊंचा रखा। आजादी के बाद ये उम्मीद थी कि महात्मा गांधी की आकांक्षा के अनुरूप रामराज आयेगा किंतु विदेशी संस्कृति की चकाचौंध से प्रभावित राजनीतिक नेतृत्व ने राष्ट्रपिता के आदेश को रद्दी की टोकरी में फेंकते हुए भारतीयता के उस मूल भाव को उपेक्षित और अपमानित करने का षडयंत्र रचा जो इस देश की एकता और दृढ़ता का आधार स्तंभ रही । लेकिन जिस तरह हर रात का अंत सुबह के तौर पर होता है ठीक वैसे ही समय ने करवट ली और भारत का खोया हुआ स्वाभिमान लौटने लगा जिसकी झलक नब्बे के दशक में दिखाई देने लगी थी। यद्यपि राम जन्मभूमि की मुक्ति का  संघर्ष विभिन्न रूपों में पीढ़ियों से चला आ रहा था किंतु जब वह जनांदोलन बना तभी उसकी सफलता की बुनियाद रखी जा सकी। ये उसी तरह से था जैसे भगवान राम ने महाबली रावण को परास्त करने के लिए अपनी दैवीय शक्ति का उपयोग करने के बजाय वानर सेना का गठन किया जिससे कि राक्षसी शक्तियों को पराजित करने का श्रेय केवल उनके हिस्से में नहीं आए। राम जन्म भूमि की मुक्ति के लिए सैकड़ों वर्षों तक चला संघर्ष जब अपने चरमोत्कर्ष पर पहुंचा तो फिर विधर्मी दासता के प्रतीक ढांचे को धूल - धूसरित होते देर न लगी। वह इस बात का प्रतीक था कि रावण की अभेद्य लंका को भी राम भक्ति की साधारण कही जाने वाली शक्ति छिन्न - भिन्न करने में सक्षम है। 6 दिसंबर 1992 की वह घटना इतिहास के नए अध्याय की शुरुआत थी किंतु उसके पूर्व जिन पूज्य साधु - संतों और ज्ञात - अज्ञात कारसेवकों ने राम काज के लिए अपना बलिदान दिया उनकी पवित्र आत्माएं इस संघर्ष को प्रेरणा और प्रोत्साहन देती रहीं। राम मंदिर के लिए चली लंबी संघर्ष यात्रा का यह पल निश्चित रूप से अविस्मरणीय है। अयोध्या को उसकी प्राचीन भव्यता मिलने के साथ ही आज देश को अपनी दिव्यता का जो अनुभव हुआ वह सही मायने में सनातन परंपरा से जुड़े करोड़ों भारतीयों के मन में  नए विश्वास की प्राण प्रतिष्ठा है। इस दिव्य आयोजन के माध्यम से भारत ने पूरे विश्व को ये एहसास करवा दिया है कि उसने अपने आधारभूत आदर्शों की पुनर्स्थापना का संकल्प ले लिया है। राम मंदिर में हुआ प्राण प्रतिष्ठा समारोह स्वामी विवेकानंद की उस  भविष्यवाणी की पुष्टि करने वाला है कि 21 वीं सदी भारत की होगी। उस दिशा में एक बड़ा कदम आज अयोध्या से उठाया जा चुका है।

- रवीन्द्र वाजपेयी 


Saturday, 20 January 2024

उत्साह , उमंग और हर्ष के चरमोत्कर्ष से पूरा देश राम मय हो गया


इसके पहले भारत में किसी तिथि की  इतनी बेसब्री से प्रतीक्षा 15 अगस्त 1947 की ही की गई होगी , जिस दिन  देश को सैकड़ों सालों की गुलामी के बाद आजादी मिलने वाली थी। तीन चौथाई सदी के बाद देश एक बार फिर प्रतीक्षारत है। अयोध्या में राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा को मात्र 2 दिन शेष हैं। सर्वत्र अभूतपूर्व उत्साह , उमंग और हर्ष का  चरमोत्कर्ष है। यह वातावरण प्रभु श्री राम के लंका विजय के उपरांत अयोध्या लौटने के पूर्व वहां के निवासियों की मनःस्थिति का जीवंत आभास करवा रहा है। लेकिन  यह हर्षोल्लास अयोध्या या भारत की सीमाओं को तोड़कर विश्वव्यापी  है। अनेक देशों में बसे हिन्दू धर्मावलंबी तो राम मंदिर में प्राण - प्रतिष्ठा को लेकर उत्साहित हैं ही ,अनेक ऐसे देश भी इसमें सहभागिता दे रहे हैं जो अन्य किसी धर्म का पालन करते हैं । यह इस बात का प्रमाण है कि श्री राम की स्वीकार्यता पूरे विश्व में है। उस दृष्टि से 22 जनवरी 2024 की तिथि विश्व इतिहास में  सदा के लिए अमर रहेगी। राम मंदिर के निर्माण में किस - किस का योगदान रहा ये इस समय सोचने का कोई अर्थ नहीं है। 1949 में बाबरी ढांचे में मूर्तियों के प्रकटीकरण से लेकर अब तक जो कुछ भी घटा वह तो नई पीढ़ी को ज्ञात हो जाता है किंतु बीते सैकड़ों सालों में  हजारों ज्ञात -अज्ञात लोगों ने राम जन्मभूमि पर मुस्लिम शासकों के संरक्षण में कब्जा कर जो ढांचा खड़ा किया , उसको हटाने के लिए अपना बलिदान दिया । उस दृष्टि से आने वाली 22 जनवरी उन राम भक्तों के सपनों के साकार होने का दिन होगा । भारत जैसे हिन्दू बहुल देश में प्रभु श्री राम की जन्मस्थली को मुक्त करवाने में जिस तरह के अवरोध उत्पन्न किए गए वे अकल्पनीय हैं । यदि सोमनाथ के साथ ही राम जन्मभूमि का मसला भी तत्कालीन नेहरू सरकार सुलझा लेती तब शायद इसे लेकर राजनीति करने का किसी को अवसर नहीं मिलता । लेकिन दुर्भाग्य है कि देश की बहुसंख्यक आबादी के आराध्य श्री राम की जन्मभूमि को मुगलकालीन अवैध कब्जे से मुक्त करवाने का कार्य अदालत के फैसले से संभव हो सका। और वह प्रक्रिया भी बरसों नहीं दशकों तक चली।   यह भी कम दुखद नहीं है कि उस फैसले के बाद भी मंदिर निर्माण में अड़ंगे लगाने वाले विघ्नसंतोषी अपनी हरकतों से बाज नहीं आए। यहां तक कि प्राण - प्रतिष्ठा के ऐतिहासिक आयोजन की पूरी तैयारियां हो जाने के बाद भी उसे विफल करवाने में एक वर्ग जी जान से जुटा  है। कुछ धर्माचार्य भी इस मुहिम में शामिल हो गए हैं। हिन्दू समाज की इसी चारित्रिक  कमजोरी के कारण देश ने लगातार विदेशी आक्रमण सहने के बाद सैकड़ों सालों की गुलामी सही। स्व. अटल बिहारी वाजपेयी ने एक बार संसद में कहा था कि राम मंदिर का निर्माण राष्ट्रीय स्वाभिमान का मुद्दा है। उनका वह वक्तव्य सही मायने में एक संदेश था जिसमें राजनीति नहीं थी। सही बात तो ये है कि राम मंदिर का विरोध करने वालों ने ही इसे वोट बैंक की राजनीति का हिस्सा बना दिया। कांग्रेस और अन्य कुछ दल मुस्लिम मतों के कारण इस  मुद्दे पर हिंदुओं के न्यायोचित दावों की अनदेखी करते रहे। प्रतिक्रिया स्वरूप इस मामले ने दूसरा मोड़ ले लिया । सबसे बड़ी बात ये हुई कि बाबरी ढांचे की तरफदारी मुस्लिम धर्मगुरुओं के साथ ही साथ धर्मनिरपेक्षता के झंडाबरदार बने हिन्दू नेतागण भी करते रहे । इससे हिन्दू जनमानस में रोष उत्पन्न हुआ । निश्चित रूप से भाजपा ने इसका लाभ उठाया और   वह मुख्यधारा की पार्टी बनने के बाद देश की सत्ता पर काबिज हो गई।  राम मंदिर का श्रेय उसे न मिल पाए इसके लिए उसके राजनीतिक और वैचारिक विरोधियों ने हर संभव प्रयास किए जिन्हें षडयंत्र भी कहना गलत नहीं होगा। लेकिन उनका विरोध जितना तीव्र हुआ भाजपा को उतना ज्यादा लाभ मिलता गया। प्राण - प्रतिष्ठा के ऐतिहासिक आयोजन को रोकने और धर्म विरोधी साबित करने के लिए जो कुछ भी किया जा रहा है वह जितना हास्यास्पद है , उतना ही दुखद भी। लेकिन ये परम संतोष का विषय है कि देश के जनमानस ने आधुनिक मंथराओं को पूरी तरह तिरस्कृत कर दिया है। यहां तक कि कतिपय  धर्माचार्यों की आपत्तियों का संज्ञान भी नहीं लिया जा रहा।  यह बात भी बेहद उत्साहवर्धक है कि देश भर में फैले लाखों सनातनी धर्मगुरु , पंडित , पुरोहित और कथावाचक पूरे प्राण - प्रण से 22 जनवरी के आयोजन को भव्य और अविस्मरणीय बनाने में जुटे हुए हैं । देश का प्रत्येक कोना  इन दिनों राम मय  हो गया है। इतना बड़ा चमत्कार दैवीय कृपा से ही हो सकता है। ऐसे में जो लोग प्राण - प्रतिष्ठा के आयोजन को विफल करना चाह रहे हैं वे भारतीय जनमानस को पढ़ने में बुरी तरह विफल  हैं। उनके इसी आचरण की वजह से वे जनता की निगाह से उतरते चले गए और बची खुची कसर आगामी लोकसभा चुनाव में पूरी हो जाएगी।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 19 January 2024

मोरबी के बाद गुजरात सरकार सतर्क होती तो वडोदरा में इतनी जानें न जातीं


वडोदरा में एक विद्यालय के बच्चे शिक्षकों के साथ स्थानीय हरणी झील में नौका विहार कर रहे थे। मोबाइल से सेल्फी लेते समय कुछ बच्चे  एक तरफ जमा हो गए जिससे संतुलन बिगड़ा और नाव पलट गई। एक दर्जन से ज्यादा बच्चे और 2 शिक्षक काल के गाल में समा गए। यद्यपि 10 बच्चों और 2 शिक्षकों को बचा लिया गया। नाव के असंतुलित होकर पलट जाने को  दुर्घटना का कारण बताया जाना तो समझ में आता है किंतु नौका में बैठे किसी भी बच्चे और शिक्षक का  लाइफ जैकेट नहीं पहने होना निश्चित रूप से दुखद है। विद्यालय में पढ़ने वाले बच्चों के अनुभवहीन  होने की बात तो स्वाभाविक है किंतु उनके साथ गए शिक्षकों द्वारा लाइफ जैकेट पहनने का ध्यान न रखा जाना भी अव्वल दर्जे की लापरवाही है। उससे भी बड़ी गलती उक्त झील में नाव चलाने वाली एजेंसी या ठेकेदार की मानी जानी चाहिए। जो जानकारी आई उसके मुताबिक हरणी झील  वडोदरा नगर निगम के अधीन है। जाहिर है उसमें नौका विहार का ठेका होता होगा। लेकिन सुरक्षा प्रबंधों की जांच करना निगम अधिकारियों के साथ ही प्रशासन का भी दायित्व है। अक्सर देखने में आया है कि इस तरह के स्थानों पर नाव में बैठने वाला कोई व्यक्ति लाइफ जैकेट के लिए जिद करता है तो उसे दे दी जाती है किंतु वह भी उसकी हैसियत देखकर। जिस एजेंसी या व्यक्ति को उक्त झील में नाव चलाने का ठेका दिया गया होगा उसमें लाइफ जैकेट की शर्त जरूर जुड़ी होगी किंतु नगर निगम और स्थानीय प्रशासन के जिम्मेदार अधिकारियों को इस तरफ देखने की फुरसत भी नहीं मिली ।  निश्चित तौर पर इस अनदेखी के लिए ठेकेदार से किसी न किसी रूप में उन्हें सौजन्य भेंट प्राप्त होती होगी। प्रारंभिक जांच के बाद बताया गया कि 15 सवारियों की क्षमता वाली नाव में दोगुने लोगों का बैठना भी दुर्घटना का कारण बना।  सरकारी  परंपरानुसार मृतकों के परिवारजनों को मुआवजा और घायलों को सहायता राशि की घोषणा कर दी गई।   उल्लेखनीय है अक्टूबर 2022 में गुजरात के ही मोरबी में एक पुल पर स्वीकृत संख्या से ज्यादा पर्यटकों के जमा होने से वह टूट गया था जिसमें 140 से ज्यादा लोग मारे गए। ब्रिटिशकाल के उस पुल को मरम्मत के बाद लोगों के लिए खोला गया था किंतु उसके लिए तकनीकी अनापत्ति नहीं ली गई और क्षमता से ज्यादा लोगों के आ जाने से वह टूटा । उक्त पुल पर लोग टिकिट खरीदकर नदी का मनोरम दृश्य देखने आते थे।  इसका भी बाकायदा ठेका होता है । सुधार कार्य के लिए कुछ समय के लिए बंद किए जाने के बाद जब पुल को जनता के लिए दोबारा शुरू किया गया तब ये देखने की जरूरत ही नहीं समझी गई कि काम ठीक तरीके से हुआ अथवा नहीं।    वडोदरा  की झील में  दर्दनाक हादसा भी ठेकेदार की लापरवाही के साथ ही प्रशासन की उदासीनता का दुष्परिणाम है।  क्षमता से दोगुनी  सवारियां बिठाने के बावजूद यदि उनको लाइफ जैकेट पहना दी जाती तब नाव पलटने के बाद भी ज्यादातर लोगों को बचाया जा सकता था। दुर्भाग्य ये है कि इस तरह की घटनाओं को रोकना जिनकी जिम्मेदारी है वे सभी अव्वल दर्जे के भ्रष्ट और निकम्मे हैं।    वडोदरा की ताजा घटना ने अनेक सवाल खड़े कर दिए हैं। जहां - जहां नाव का उपयोग होता है वहां उसके डूबने या पलटने के खतरे को रोकने के इंतजाम  कानूनी  अनिवार्यता होना चाहिए । साथ ही जो भी लोग इन दुर्घटनाओं के लिए दोषी पाए जाएं उनको इतना कड़ा दंड दिया जाए जिससे कि इस तरह के कार्यों में लगे बाकी लोग सजा के नाम से डरने लगें। मौजूदा जो चलन है उसमें कसूरवारों को बचाने के लिए सत्ताधारी नेता और बड़े नौकरशाह सक्रिय भूमिका निभाते हैं परंतु अपने थोड़े से लाभ के लिए लोगों की जिंदगी  छीन लेने वाले को तो हत्यारा ही कहा जाएगा और उसे उसी के अनुरूप सजा भी मिलनी चाहिए। मरने वालों और घायलों को मुआवजा देना तो जायज भी है और जरूरी भी लेकिन ऐसा करने के साथ ये भी उतना ही जरूरी है कि इस तरह की दुर्घटनाओं को रोकने के प्रति पूरी तरह सावधानी रखी जाए और जिस तरह वी.आई.पी सुरक्षा के प्रति शासन और प्रशासन मुस्तैद रहते हैं वैसी ही सतर्कता आम जनता के बारे में भी रखी जाए । संदर्भित घटना में प्राथमिक गलती तो उस ठेकेदार की है जिसके पास नौका विहार का काम था । लेकिन   वडोदरा   नगर निगम के उन अधिकारियों को भी कठघरे में खड़ा किया जाना चाहिए जिनके पास  झील संबंधी व्यवस्थाओं का प्रभार था। ठेके पर दिए जाने वाले काम में नौकरशाही द्वारा जो अनुचित लाभ लिए जाते हैं उसके बदले ठेकेदार को नियम विरुद्ध काम करने की छूट दे दी जाती है। प्रत्येक घटना के बाद कुछ दिन तो सब चाक - चौबंद रहता है किंतु जल्द ही पुराना ढर्रा लौट आता है। मोरबी की घटना के बाद गुजरात सरकार ने अगर ऐसे स्थानों पर जहां लोग आमोद - प्रमोद हेतु एकत्र होते हों , सुरक्षा प्रबंधों को लागू करने के प्रति सावधानी बरती होती तब शायद वडोदरा में इतने लोगों की जान न जाती। 

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 रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 18 January 2024

पाकिस्तान अपने ही बनाए जाल में खुद फंसता जा रहा



पाकिस्तान पर आतंकवादी देश होने का आरोप जब भारत लगाता रहा तब उसने   खंडन करते हुए जवाब में  कहा कि उसके यहां कोई इस्लामी आतंकवादी संगठन नहीं है। यही नहीं तो उसका ये भी रोना रहा  कि वह खुद आतंकवाद का शिकार है। हालांकि अब तो अमेरिका और ब्रिटेन सरीखे उसके पुराने संरक्षक भी मानने लगे हैं कि पाकिस्तान की इस्लामिक आतंकवाद को पालने - पोसने में बड़ी भूमिका है। ओसामा बिन लादेन को वह बरसों अपने यहां छिपाए रहा। मुंबई हमले के साथ ही कंधार विमान अपहरण के समय छोड़े गए आतंकवादियों को  उसी ने संरक्षण प्रदान किया। कश्मीर घाटी में सक्रिय आतंकवादियों को भी  प्रशिक्षण और आर्थिक सहयोग वही प्रदान करता है जिनके जरिए वह भारत के विरुद्ध छद्म युद्ध लड़ता रहता है। लेकिन आतंकवाद की ये विष बेल उसी के लिए घातक साबित हो रही है। इसका ताजा प्रमाण है ईरान और उसके बीच पैदा हुआ तनाव। दो दिन पूर्व ईरान ने बलूचिस्तान पर मिसाइलें दागकर पाकिस्तान को करारा झटका दिया। उसका आरोप है कि जैश अल-अदल नामक जो आतंकवादी संगठन पाकिस्तान से सटी उसकी सीमा पर तैनात ईरानी सैनिकों पर हमले करता है उसका केंद्र बलूचिस्तान में है। ईरान द्वारा कई मर्तबा शिकायत के बावजूद पाकिस्तान ने उसके विरुद्ध कोई कदम नहीं उठाया जिसकी वजह से वह बलूचिस्तान के बड़े इलाके में अपने अड्डे स्थापित कर चुका है। गौरतलब है कि अफगानिस्तान और पाकिस्तान के रिश्ते भी बेहद तनावपूर्ण हैं। जिन तालिबानियों को सत्ता दिलवाने के लिए पाकिस्तान ने अमेरिका तक से दगाबाजी की वही अब उसके लिए समस्या बन गए हैं । सीमावर्ती अपनी जो जमीन  पाकिस्तान ने अमेरिका से लड़ने वाले तालिबानी सैनिकों को अड्डे बनाने के लिए दी वे अब उसे खाली ही नहीं कर रहे। उल्टे तालिबानी सत्ता पाकिस्तान पर हमले करने में भी संकोच नहीं करती। इधर  बलूचिस्तान में भी पाकिस्तान विरोधी भावनाएं उभार पर हैं । हालांकि वह इन्हें दबाने का भरसक प्रयास करता रहता है किंतु हालात उसके नियंत्रण से बाहर होते जा रहे हैं। पश्चिमी सीमांत का इलाका अफगानिस्तान से होने वाले हमले से असुरक्षित है। अब ईरान के साथ भी उसके रिश्ते जिस तरह बिगड़े उसने राजनीतिक अस्थिरता से जूझ रहे इस देश के सामने नया संकट खड़ा कर दिया है। उससे भी बड़ी बात ये है कि ईरान के हमलावर होने के पीछे पाकिस्तान में पल रहा मुस्लिम आतंकवादी संगठन है। ईरान जैसे कट्टर इस्लामी देश के साथ पाकिस्तान के रिश्ते किसी इस्लामिक दहशतगर्द संगठन के कारण खराब होना वाकई चौंकाने वाला है । हालांकि ईरान के संबंध ईराक के साथ तो हमेशा से खराब रहे हैं किंतु पाकिस्तान का मामला इसलिए अलग है क्योंकि ईरान के साथ उसका कोई झगड़ा कभी नहीं रहा।  हालांकि ईरान जहां लंबे समय से अमेरिका का ऐलानिया दुश्मन बना हुआ है वहीं पाकिस्तान उसका पिट्ठू। फिर भी भौगोलिक स्थिति के कारण  दोनों के रिश्ते सामान्य रहे जबकि तेल सौदे के चलते ईरान और भारत भी काफी करीब थे। चाबहार बंदरगाह के निर्माण का काम हाथ में लेकर भारत ने ईरान के साथ कूटनीतिक और व्यापारिक रिश्ते और मजबूत बना लिए थे। इससे चीन भी काफी परेशान था। उसने जवाब में पाकिस्तान का ग्वादर बंदरगाह  विकसित करने का जिम्मा लिया जो बलूचिस्तान में स्थित है और चीन की वन बेल्ट वन रोड प्रकल्प का अहम हिस्सा है। ईरान द्वारा पाकिस्तान पर दागी गई मिसाइलों का समय इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत के विदेश मंत्री हाल ही में ईरान यात्रा पर गए थे। दरअसल हमास और इजरायल के बीच हो रही जंग की शुरुआत में भारत के इजरायल के पक्ष में खड़े होने से ईरान काफी नाराज था किंतु बाद में भारत द्वारा गाजा पट्टी के विस्थापितों के लिए राहत सामग्री पहुंचाकर संतुलन बना लिया गया। अमेरिका द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों के कारण ईरान और भारत के तेल समझौते में व्यवधान आने से दोनों के रिश्तों में कुछ तनाव आया। इसी तरह रूस से सस्ता तेल खरीदने के सौदे भी ईरान को रास नहीं आए। बीच में तो चाबहार बंदरगाह का काम भारत की बजाय चीन को सौंपने की तैयारी तक उसने कर ली किंतु भारत ने धीरे - धीरे उसकी नाराजगी दूर कर दी। पाकिस्तान के साथ ईरान के संबंध अचानक खराब होने को भारतीय विदेश मंत्री  जयशंकर की हालिया तेहरान यात्रा से जोड़कर भी देखा जा रहा है क्योंकि कूटनीति में समय का बड़ा महत्व होता है। और उस दृष्टि से ईरान का पाकिस्तान पर मिसाइल हमला भले ही आतंकवादी संगठन को निशाना बनाकर किया गया हो किंतु इससे भारत के इस पड़ोसी देश की स्थिति और खराब होने की आशंका बढ़ गई है। ये भी महत्वपूर्ण है कि पाकिस्तान को अब अफगानिस्तान और ईरान दोनों से जूझना पड़ रहा है। लेकिन इस स्थिति के लिए वह खुद जिम्मेदार है।क्योंकि जिन आतंकवादियों को उसने भारत को अस्थिर करने के लिए पाला - पोसा ,  अब वे उसे ही बर्बाद करने पर आमादा हैं। पुरानी कहावत भी कि जैसा बोओगे वैसा ही तो काटोगे।

- रवीन्द्र वाजपेयी