Thursday, 25 January 2024
विपक्षी एकता का गुब्बारा फूलने से पहले ही फूटने के कगार पर
Tuesday, 23 January 2024
भारत रत्न ने याद दिलाया कोई कर्पूरी ठाकुर भी थे !
राम मंदिर : सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के रूप में जन जाग्रति का प्रतीक
अयोध्या स्थित राम मंदिर में प्राण - प्रतिष्ठा का महोत्सव न सिर्फ भारत अपितु समूचे विश्व में जिस उत्साह से मनाया गया वह निश्चित रूप से ऐतिहासिक कहा जाएगा । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उक्त अवसर पर अपने उद्बोधन में सही कहा कि आने वाले एक हजार सालों बाद भी 22 जनवरी 2024 की तिथि लोगों को इस महान दिवस की याद दिलाती रहेगी। इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती कि प्राण - प्रतिष्ठा का आयोजन अपनी भव्यता के लिए तो विश्व भर में चर्चा का विषय बना ही लेकिन उसके साथ अरबों सनातन धर्मियों को उसने भावनात्मक तौर पर भी जोड़ दिया। आयोजन के पहले देश के ज्यादातर विपक्षी दलों ने तरह - तरह के बहाने बनाकर उसका बहिष्कार किया। वामपंथी मानसिकता के बुद्धिजीवियों और पत्रकारों ने भी राम मंदिर के शुभारंभ को लेकर अनर्गल बातें कीं। यहां तक कि सनातन परंपरा के सबसे बड़े धर्माचार्य शंकराचार्यों द्वारा भी इस आयोजन में रीति - रिवाजों का पालन न किए जाने के आधार पर उससे दूरी बनाए रखने की घोषणा करने के साथ ही जिस तरह की बयानबाजी की उसके कारण अप्रिय स्थिति बन गई। इस विवाद का सबसे दुखद पहलू ये रहा कि पहली बार आम जनता द्वारा शंकराचार्यों के बारे में आलोचनात्मक टिप्पणियां की गईं। यद्यपि उनके एतराज के बाद भी राम जन्मभूमि न्यास के आमंत्रण पर सनातन धर्म से जुड़े तमाम प्रमुख संत,महात्मा तो प्राण - प्रतिष्ठा समारोह में शामिल हुए ही लेकिन उनके अलावा जैन , सिख और बौद्ध धर्मगुरु भी कल अयोध्या में इस ऐतिहासिक पल के साक्षी रहे। एक - दो मुस्लिम धार्मिक हस्तियां भी नजर आईं। उद्योग, मनोरंजन , क्रीड़ा , साहित्य जैसे विभिन्न क्षेत्रों के नामचीन चेहरे जिस उत्साह के साथ प्राण - प्रतिष्ठा समारोह में नजर आए वह अपने आप में बहुत कुछ कह गया। सुरक्षा प्रबंधों को दुरस्त रखने के अलावा अव्यवस्था को रोकने के लिए आयोजन स्थल पर केवल 8 हजार आमंत्रित जनों की ही उपस्थिति रखी गई । लेकिन न सिर्फ भारत अपितु दुनिया भर में जिस तरह से उक्त आयोजन का सीधा प्रसारण टेलीविजन के साथ ही इंटरनेट के जरिए विभिन्न संचार माध्यमों पर देखा गया , वह अपने आप में एक कीर्तिमान तो है ही किंतु वह इस बात का प्रमाण भी है कि इस मंदिर के निर्माण से सनातन और हिंदुत्व के प्रति दुनिया भर में नए सिरे से रुचि पैदा हुई है । वरना दुबई के बुर्ज खलीफा , पेरिस की ईफिल टॉवर और न्यूयॉर्क के टाइम्स स्क्वायर जैसे विश्व प्रसिद्ध स्थानों पर अयोध्या के पूरे समारोह का सीधा प्रसारण न दिखाया जाता। अनेक देशों के राजनेताओं ने अपने यहां स्थित हिन्दू मंदिरों में जाकर भारत के प्रति अपना लगाव प्रदर्शित किया। इस आयोजन का विराट स्वरूप और सफलता मंदिर की व्यवस्था देख रहे न्यास के अलावा प्रधानमंत्री श्री मोदी और उ.प्र के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की उस समन्वित सोच का परिणाम है जिसने अयोध्या को देखते - देखते देश के सबसे सुंदर और सुविधा संपन्न नगरों की सूची में स्थान दिलवा दिया। इसी तरह सनातन संस्कृति के अभूतपूर्व पुनर्जागरण के तौर पर समाज के प्रत्येक वर्ग ने बीते दो दिनों में जिस उमंग और उत्साह से राम मंदिर में प्राण - प्रतिष्ठा को राष्ट्रीय पर्व का स्वरूप प्रदान किया वह सामाजिक समरसता का संदेश वाहक बन गया। देश के प्रत्येक हिस्से में जिस प्रकार का हर्षोल्लास देखा गया उसने पूरी दुनिया को यह एहसास करवा दिया कि भारत में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के रूप में जो जन जाग्रति आई है वह वैश्विक स्तर पर अपना प्रभाव छोड़े बिना नहीं रहेगी। रास्वसंघ के सरसंघचालक डा.मोहन भागवत ने उक्त आयोजन में सही कहा कि राम मंदिर , राष्ट्र मंदिर है। प्रधान मंत्री श्री मोदी ने यही समय है , सही समय है जैसी बात कहकर भारत के आत्मविश्वास का प्रकटीकरण तो किया ही लेकिन उन्होंने देव से देश और राम से राष्ट्र तक का जो संदेश दिया वह सही मायनों में इस भव्य आयोजन की परिणिति है। कोरोना नामक महामारी से लड़ने के लिए प्रधानमंत्री ने जब एक दिन के जनता कर्फ्यू का आह्वान किया तब लोगों को उसका उद्देश्य समझ नहीं आया था। उसके बाद उन्होंने देशवासियों से शंख और घंटे बजाने के साथ ही घरों पर दीपमालिका का आग्रह किया । उस समय भी उसका मजाक उड़ाने वाले कम नहीं थे किंतु उक्त दोनों प्रयोग सफल रहे । उसके जरिए प्रधानमंत्री ने लोगों में एकजुटता और विश्वास का जो संचार किया उसी के कारण लॉक डाउन जैसी असुविधाजनक स्थिति में भी अनुशासन और व्यवस्था बनी रही। राम मंदिर में प्राण - प्रतिष्ठा के जरिए भी उसी तरह का सामंजस्य और एकजुटता का संचार हुआ है। जिसका लाभ देश को एकजुट रखने में मिलेगा ये विश्वास किया जा सकता है।
-रवीन्द्र वाजपेयी
Monday, 22 January 2024
भारत के नए विश्वास की प्राण प्रतिष्ठा
Saturday, 20 January 2024
उत्साह , उमंग और हर्ष के चरमोत्कर्ष से पूरा देश राम मय हो गया
इसके पहले भारत में किसी तिथि की इतनी बेसब्री से प्रतीक्षा 15 अगस्त 1947 की ही की गई होगी , जिस दिन देश को सैकड़ों सालों की गुलामी के बाद आजादी मिलने वाली थी। तीन चौथाई सदी के बाद देश एक बार फिर प्रतीक्षारत है। अयोध्या में राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा को मात्र 2 दिन शेष हैं। सर्वत्र अभूतपूर्व उत्साह , उमंग और हर्ष का चरमोत्कर्ष है। यह वातावरण प्रभु श्री राम के लंका विजय के उपरांत अयोध्या लौटने के पूर्व वहां के निवासियों की मनःस्थिति का जीवंत आभास करवा रहा है। लेकिन यह हर्षोल्लास अयोध्या या भारत की सीमाओं को तोड़कर विश्वव्यापी है। अनेक देशों में बसे हिन्दू धर्मावलंबी तो राम मंदिर में प्राण - प्रतिष्ठा को लेकर उत्साहित हैं ही ,अनेक ऐसे देश भी इसमें सहभागिता दे रहे हैं जो अन्य किसी धर्म का पालन करते हैं । यह इस बात का प्रमाण है कि श्री राम की स्वीकार्यता पूरे विश्व में है। उस दृष्टि से 22 जनवरी 2024 की तिथि विश्व इतिहास में सदा के लिए अमर रहेगी। राम मंदिर के निर्माण में किस - किस का योगदान रहा ये इस समय सोचने का कोई अर्थ नहीं है। 1949 में बाबरी ढांचे में मूर्तियों के प्रकटीकरण से लेकर अब तक जो कुछ भी घटा वह तो नई पीढ़ी को ज्ञात हो जाता है किंतु बीते सैकड़ों सालों में हजारों ज्ञात -अज्ञात लोगों ने राम जन्मभूमि पर मुस्लिम शासकों के संरक्षण में कब्जा कर जो ढांचा खड़ा किया , उसको हटाने के लिए अपना बलिदान दिया । उस दृष्टि से आने वाली 22 जनवरी उन राम भक्तों के सपनों के साकार होने का दिन होगा । भारत जैसे हिन्दू बहुल देश में प्रभु श्री राम की जन्मस्थली को मुक्त करवाने में जिस तरह के अवरोध उत्पन्न किए गए वे अकल्पनीय हैं । यदि सोमनाथ के साथ ही राम जन्मभूमि का मसला भी तत्कालीन नेहरू सरकार सुलझा लेती तब शायद इसे लेकर राजनीति करने का किसी को अवसर नहीं मिलता । लेकिन दुर्भाग्य है कि देश की बहुसंख्यक आबादी के आराध्य श्री राम की जन्मभूमि को मुगलकालीन अवैध कब्जे से मुक्त करवाने का कार्य अदालत के फैसले से संभव हो सका। और वह प्रक्रिया भी बरसों नहीं दशकों तक चली। यह भी कम दुखद नहीं है कि उस फैसले के बाद भी मंदिर निर्माण में अड़ंगे लगाने वाले विघ्नसंतोषी अपनी हरकतों से बाज नहीं आए। यहां तक कि प्राण - प्रतिष्ठा के ऐतिहासिक आयोजन की पूरी तैयारियां हो जाने के बाद भी उसे विफल करवाने में एक वर्ग जी जान से जुटा है। कुछ धर्माचार्य भी इस मुहिम में शामिल हो गए हैं। हिन्दू समाज की इसी चारित्रिक कमजोरी के कारण देश ने लगातार विदेशी आक्रमण सहने के बाद सैकड़ों सालों की गुलामी सही। स्व. अटल बिहारी वाजपेयी ने एक बार संसद में कहा था कि राम मंदिर का निर्माण राष्ट्रीय स्वाभिमान का मुद्दा है। उनका वह वक्तव्य सही मायने में एक संदेश था जिसमें राजनीति नहीं थी। सही बात तो ये है कि राम मंदिर का विरोध करने वालों ने ही इसे वोट बैंक की राजनीति का हिस्सा बना दिया। कांग्रेस और अन्य कुछ दल मुस्लिम मतों के कारण इस मुद्दे पर हिंदुओं के न्यायोचित दावों की अनदेखी करते रहे। प्रतिक्रिया स्वरूप इस मामले ने दूसरा मोड़ ले लिया । सबसे बड़ी बात ये हुई कि बाबरी ढांचे की तरफदारी मुस्लिम धर्मगुरुओं के साथ ही साथ धर्मनिरपेक्षता के झंडाबरदार बने हिन्दू नेतागण भी करते रहे । इससे हिन्दू जनमानस में रोष उत्पन्न हुआ । निश्चित रूप से भाजपा ने इसका लाभ उठाया और वह मुख्यधारा की पार्टी बनने के बाद देश की सत्ता पर काबिज हो गई। राम मंदिर का श्रेय उसे न मिल पाए इसके लिए उसके राजनीतिक और वैचारिक विरोधियों ने हर संभव प्रयास किए जिन्हें षडयंत्र भी कहना गलत नहीं होगा। लेकिन उनका विरोध जितना तीव्र हुआ भाजपा को उतना ज्यादा लाभ मिलता गया। प्राण - प्रतिष्ठा के ऐतिहासिक आयोजन को रोकने और धर्म विरोधी साबित करने के लिए जो कुछ भी किया जा रहा है वह जितना हास्यास्पद है , उतना ही दुखद भी। लेकिन ये परम संतोष का विषय है कि देश के जनमानस ने आधुनिक मंथराओं को पूरी तरह तिरस्कृत कर दिया है। यहां तक कि कतिपय धर्माचार्यों की आपत्तियों का संज्ञान भी नहीं लिया जा रहा। यह बात भी बेहद उत्साहवर्धक है कि देश भर में फैले लाखों सनातनी धर्मगुरु , पंडित , पुरोहित और कथावाचक पूरे प्राण - प्रण से 22 जनवरी के आयोजन को भव्य और अविस्मरणीय बनाने में जुटे हुए हैं । देश का प्रत्येक कोना इन दिनों राम मय हो गया है। इतना बड़ा चमत्कार दैवीय कृपा से ही हो सकता है। ऐसे में जो लोग प्राण - प्रतिष्ठा के आयोजन को विफल करना चाह रहे हैं वे भारतीय जनमानस को पढ़ने में बुरी तरह विफल हैं। उनके इसी आचरण की वजह से वे जनता की निगाह से उतरते चले गए और बची खुची कसर आगामी लोकसभा चुनाव में पूरी हो जाएगी।
- रवीन्द्र वाजपेयी
Friday, 19 January 2024
मोरबी के बाद गुजरात सरकार सतर्क होती तो वडोदरा में इतनी जानें न जातीं
वडोदरा में एक विद्यालय के बच्चे शिक्षकों के साथ स्थानीय हरणी झील में नौका विहार कर रहे थे। मोबाइल से सेल्फी लेते समय कुछ बच्चे एक तरफ जमा हो गए जिससे संतुलन बिगड़ा और नाव पलट गई। एक दर्जन से ज्यादा बच्चे और 2 शिक्षक काल के गाल में समा गए। यद्यपि 10 बच्चों और 2 शिक्षकों को बचा लिया गया। नाव के असंतुलित होकर पलट जाने को दुर्घटना का कारण बताया जाना तो समझ में आता है किंतु नौका में बैठे किसी भी बच्चे और शिक्षक का लाइफ जैकेट नहीं पहने होना निश्चित रूप से दुखद है। विद्यालय में पढ़ने वाले बच्चों के अनुभवहीन होने की बात तो स्वाभाविक है किंतु उनके साथ गए शिक्षकों द्वारा लाइफ जैकेट पहनने का ध्यान न रखा जाना भी अव्वल दर्जे की लापरवाही है। उससे भी बड़ी गलती उक्त झील में नाव चलाने वाली एजेंसी या ठेकेदार की मानी जानी चाहिए। जो जानकारी आई उसके मुताबिक हरणी झील वडोदरा नगर निगम के अधीन है। जाहिर है उसमें नौका विहार का ठेका होता होगा। लेकिन सुरक्षा प्रबंधों की जांच करना निगम अधिकारियों के साथ ही प्रशासन का भी दायित्व है। अक्सर देखने में आया है कि इस तरह के स्थानों पर नाव में बैठने वाला कोई व्यक्ति लाइफ जैकेट के लिए जिद करता है तो उसे दे दी जाती है किंतु वह भी उसकी हैसियत देखकर। जिस एजेंसी या व्यक्ति को उक्त झील में नाव चलाने का ठेका दिया गया होगा उसमें लाइफ जैकेट की शर्त जरूर जुड़ी होगी किंतु नगर निगम और स्थानीय प्रशासन के जिम्मेदार अधिकारियों को इस तरफ देखने की फुरसत भी नहीं मिली । निश्चित तौर पर इस अनदेखी के लिए ठेकेदार से किसी न किसी रूप में उन्हें सौजन्य भेंट प्राप्त होती होगी। प्रारंभिक जांच के बाद बताया गया कि 15 सवारियों की क्षमता वाली नाव में दोगुने लोगों का बैठना भी दुर्घटना का कारण बना। सरकारी परंपरानुसार मृतकों के परिवारजनों को मुआवजा और घायलों को सहायता राशि की घोषणा कर दी गई। उल्लेखनीय है अक्टूबर 2022 में गुजरात के ही मोरबी में एक पुल पर स्वीकृत संख्या से ज्यादा पर्यटकों के जमा होने से वह टूट गया था जिसमें 140 से ज्यादा लोग मारे गए। ब्रिटिशकाल के उस पुल को मरम्मत के बाद लोगों के लिए खोला गया था किंतु उसके लिए तकनीकी अनापत्ति नहीं ली गई और क्षमता से ज्यादा लोगों के आ जाने से वह टूटा । उक्त पुल पर लोग टिकिट खरीदकर नदी का मनोरम दृश्य देखने आते थे। इसका भी बाकायदा ठेका होता है । सुधार कार्य के लिए कुछ समय के लिए बंद किए जाने के बाद जब पुल को जनता के लिए दोबारा शुरू किया गया तब ये देखने की जरूरत ही नहीं समझी गई कि काम ठीक तरीके से हुआ अथवा नहीं। वडोदरा की झील में दर्दनाक हादसा भी ठेकेदार की लापरवाही के साथ ही प्रशासन की उदासीनता का दुष्परिणाम है। क्षमता से दोगुनी सवारियां बिठाने के बावजूद यदि उनको लाइफ जैकेट पहना दी जाती तब नाव पलटने के बाद भी ज्यादातर लोगों को बचाया जा सकता था। दुर्भाग्य ये है कि इस तरह की घटनाओं को रोकना जिनकी जिम्मेदारी है वे सभी अव्वल दर्जे के भ्रष्ट और निकम्मे हैं। वडोदरा की ताजा घटना ने अनेक सवाल खड़े कर दिए हैं। जहां - जहां नाव का उपयोग होता है वहां उसके डूबने या पलटने के खतरे को रोकने के इंतजाम कानूनी अनिवार्यता होना चाहिए । साथ ही जो भी लोग इन दुर्घटनाओं के लिए दोषी पाए जाएं उनको इतना कड़ा दंड दिया जाए जिससे कि इस तरह के कार्यों में लगे बाकी लोग सजा के नाम से डरने लगें। मौजूदा जो चलन है उसमें कसूरवारों को बचाने के लिए सत्ताधारी नेता और बड़े नौकरशाह सक्रिय भूमिका निभाते हैं परंतु अपने थोड़े से लाभ के लिए लोगों की जिंदगी छीन लेने वाले को तो हत्यारा ही कहा जाएगा और उसे उसी के अनुरूप सजा भी मिलनी चाहिए। मरने वालों और घायलों को मुआवजा देना तो जायज भी है और जरूरी भी लेकिन ऐसा करने के साथ ये भी उतना ही जरूरी है कि इस तरह की दुर्घटनाओं को रोकने के प्रति पूरी तरह सावधानी रखी जाए और जिस तरह वी.आई.पी सुरक्षा के प्रति शासन और प्रशासन मुस्तैद रहते हैं वैसी ही सतर्कता आम जनता के बारे में भी रखी जाए । संदर्भित घटना में प्राथमिक गलती तो उस ठेकेदार की है जिसके पास नौका विहार का काम था । लेकिन वडोदरा नगर निगम के उन अधिकारियों को भी कठघरे में खड़ा किया जाना चाहिए जिनके पास झील संबंधी व्यवस्थाओं का प्रभार था। ठेके पर दिए जाने वाले काम में नौकरशाही द्वारा जो अनुचित लाभ लिए जाते हैं उसके बदले ठेकेदार को नियम विरुद्ध काम करने की छूट दे दी जाती है। प्रत्येक घटना के बाद कुछ दिन तो सब चाक - चौबंद रहता है किंतु जल्द ही पुराना ढर्रा लौट आता है। मोरबी की घटना के बाद गुजरात सरकार ने अगर ऐसे स्थानों पर जहां लोग आमोद - प्रमोद हेतु एकत्र होते हों , सुरक्षा प्रबंधों को लागू करने के प्रति सावधानी बरती होती तब शायद वडोदरा में इतने लोगों की जान न जाती।
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रवीन्द्र वाजपेयी