Friday, 9 February 2024

हल्द्वानी का दंगा बड़े षडयंत्र का हिस्सा : तराई में बढ़ती मुस्लिम आबादी चिंता का विषय


उत्तराखंड में नैनीताल जिले के अंतर्गत आने वाला हल्द्वानी शहर बीते दो दिनों से दंगे की आग में झुलस रहा है। कुमाऊं अंचल की तराई में बसे इस नगर में एक अवैध मजार को तोड़ने गए प्रशासनिक अमले पर नाराज मुस्लिम समाज की भीड़ ने हमला कर दिया। उसके बाद निकटवर्ती पुलिस थाने को जलाने और उसमें रखे शस्त्र लूटने की कोशिश भी की गई। पूरे शहर में  पथराव और आगजनी की वारदातें भी कैमरों में कैद हो चुकी हैं। छतों से पत्थर बरसाने का सिलसिला भी चला। सैकड़ों पुलिस वाले घायल हो गए हैं। आधा दर्जन मौतों की भी खबर है। बरेली में तौकीर रजा नामक मौलवी द्वारा दिए भड़काऊ भाषण के बाद वहां भी तनाव व्याप्त है। उल्लेखनीय बात ये है कि उक्त मजार को अवैध निर्माण मानकर तोड़ने का आदेश न्यायालय द्वारा दिया गया था। बावजूद उसके मुस्लिम समाज के सैकड़ों लोगों द्वारा प्रशासनिक दस्ते पर हमला किया जाना ये स्पष्ट करने के लिए पर्याप्त है कि धर्म की आड़ में मुस्लिम धर्मगुरु कानून का पालन करने के स्थान पर व्यवस्था के विरुद्ध बगावत भड़काते हैं। तौकीर रजा ने जिस अंदाज में जान लेने की धमकी  दी वह शुभ संकेत नहीं है। उन्होंने पत्रकारों के सामने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ के बारे में जिस शब्दावली का उपयोग किया वह धर्मांधता के साथ ही उनके दुस्साहस का प्रमाण है। जिस शैली में उन्होंने मुसलमानों को भड़काया वह उनको जेल भेजे जाने के लिए पर्याप्त है। दूसरी तरफ  हल्द्वानी में जो कुछ हुआ उसके बाद उत्तराखंड के इस बेहद शांत इलाके के जनसंख्या संतुलन में आए बदलाव को लेकर चर्चा प्रारंभ हो गई है। इस तराई क्षेत्र में बीते कुछ सालों के भीतर ही मुस्लिम आबादी बेतहाशा बढ़ी। उसमें भी रोहिंग्या मुस्लिमों की खासी संख्या बताई जा रही है। जिस अंदाज में अतिक्रमण हटाने गए शासकीय अमले पर हमले के बाद  थाने को लूटने और जलाने की कोशिश हुई वह क्षणिक आवेश न होकर पूर्व नियोजित लगता है । अदालती आदेश के बाद अवैध रूप से बनाई गई मजार को तोड़ने की जानकारी लगते ही जिस तरह मुसलमानों की भीड़ एकत्र होकर हिंसात्मक हुई उसके पीछे तौकीर रजा जैसे लोगों का दिमाग ही लगता है। गौरतलब है वे बीते कुछ दिनों से ज्ञानवापी मस्जिद को लेकर मुस्लिम समुदाय को लामबंद करने में जुटे हुए थे। ज्ञानवापी के अलावा आजकल मथुरा की ईदगाह का मसला भी खबरों में  है। अयोध्या में राम मंदिर के प्राण - प्रतिष्ठा समारोह की अभूतपूर्व सफलता के बाद मुस्लिम समाज के अनेक कट्टरपंथी नेता और धर्मगुरु आए दिन ऐसे बयान दे रहे हैं जिनसे सामाजिक सद्भाव नष्ट होने का अंदेशा है । दरअसल इन लोगों को ये भय सता रहा है कि  पुरातत्व सर्वेक्षण में जिस तरह के प्रमाण मिल रहे हैं उनके आधार पर वाराणसी की  ज्ञानवापी और मथुरा की ईदगाह  भी उनसे छिनना तय है।  अयोध्या विवाद का हल तो सर्वोच्च न्यायालय के फैसले से शांति के साथ हो गया । लेकिन ज्ञानवापी और ईदगाह में हिन्दू मंदिर होने की संभावना बढ़ते जाने से मुस्लिम धर्मगुरु और अल्पसंख्यक वोट बैंक के ठेकेदारों की रातों की नींद उड़ी हुई है। इसीलिए आए दिन जहर बुझे बयान देकर  उत्तेजना फैलाई जा रही है। हल्द्वानी की घटना के पीछे कट्टरपंथी मुस्लिमों की खीझ भी है जिसका कारण राज्य विधानसभा में समान नागरिकता विधेयक पारित होना है। प्रसिद्ध पर्वतीय पर्यटन केंद्र नैनीताल की तराई में स्थित हल्द्वानी की शांति व्यवस्था को भंग करने के पीछे जिन तत्वों का हाथ है उन पर तो कड़ी कार्रवाई होगी ही किंतु इस इलाके में मुस्लिम आबादी में बेतहाशा वृद्धि के पीछे देश विरोधी ताकतों की भूमिका की जांच जरूरी है। विशेष रूप से रोहिंग्या मुस्लिमों की बसाहट के अलावा धड़ाधड़ खुलते मदरसे चिंता का विषय है। मैदानी इलाकों को छोड़कर पर्वतीय क्षेत्रों में मुसलमानों की नई - नई बस्तियां चौंकाने वाली हैं। जिस तरह से समूची घटना को अंजाम दिया गया वह  साधारण उपद्रव  न होकर किसी बड़े षडयंत्र को अमली जामा पहनाने जैसा कृत्य है । जिसकी सूक्ष्म जांच करवाने के बाद दोषियों को कड़ी सजा तो दी ही जाए ,किंतु लगे हाथ हल्द्वानी और उसके आसपास कुकुरमुत्ते की तरह उग आईं मुस्लिम बस्तियों की भी जांच कर पता लगाया जाए कि उसके पीछे है कौन? वरना ये लोग समूचे उत्तराखंड को अशांत कर देंगे।


- रवीन्द्र वाजपेयी

न्याय यात्रा विपक्षी गठबंधन के लिए नुकसानदेह साबित हो रही



भाजपा विरोधी तमाम यू ट्यूब पत्रकार इस बात से चिंतित हैं कि जिस विपक्षी गठबंधन को 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा का विकल्प माना जा रहा था वह बिखराव का शिकार हो रहा है। इसके लिए वे राहुल गांधी को कसूरवार ठहराते हुए आरोप लगा रहे हैं कि घटक दलों के साथ संवाद शून्यता के कारण चुनाव की रणनीति और सीटों के बंटवारे का फार्मूला तय करने का काम लंबित पड़ा हुआ है। राहुल ने जबसे न्याय यात्रा प्रारंभ की तभी से इंडी की गतिविधियां रुकी हुई हैं। इसीलिए क्षेत्रीय दल स्वतंत्र निर्णय ले रहे हैं। प .बंगाल में ममता बैनर्जी ने इसकी शुरुआत की और उसी क्रम में उ.प्र में सपा नेता अखिलेश यादव ने भी कांग्रेस को 11 सीटें देने का फैसला कर डाला। महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे और शरद पवार कांग्रेस के प्रति उदासीन हो रहे हैं। आम आदमी पार्टी ने भी पंजाब और हरियाणा में उसको उपकृत करने से मना कर दिया। वहीं दिल्ली , गुजरात और गोवा में कड़ी शर्तें रख दी हैं। नीतीश कुमार द्वारा भाजपा के साथ चले जाने से बिहार में तेजस्वी यादव सीटों के बड़े हिस्से पर दावा ठोक रहे हैं। यही स्थिति तमिलनाडु और केरल की भी है। दरअसल गठबंधन अस्तित्व में तो आ गया और उसकी कुछ बैठकें भी हुईं किंतु मैदानी स्तर पर आज तक उसकी उपस्थिति दर्ज नहीं हो सकीं। 5 अक्टूबर को भोपाल की जिस रैली में एकता का प्रदर्शन होना था उसे कांग्रेस नेता कमलनाथ ने बिना किसी से सलाह किए ही रद्द करने का फैसला कर डाला। उसके बाद पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के उलझ जाने से अन्य कोई कार्यक्रम नहीं रखा जा सका। दरअसल कांग्रेस सोच रही थी कि उन चुनावों में उसका सितारा बुलंद रहेगा और तब वह सीटों के बंटवारे में अपनी इच्छा थोप सकेगी किंतु उत्तर भारत के तीन राज्यों में वह बुरी तरह पराजित हो गई। उसके बाद हालांकि गठबंधन की बैठक हुई किंतु प्रधानमंत्री के चेहरे और सीटों के बंटवारे पर कोई नीति नहीं बन सकी। होना तो ये चाहिए था कि गठबंधन की संयुक्त रैलियां देश भर में आयोजित कर उन मतदाताओं को आकर्षित किया जाता जो भाजपा विरोधी मानसिकता से प्रेरित और प्रभावित हैं। लेकिन कांग्रेस ने इससे अलग हटकर श्री गांधी की न्याय यात्रा शुरू करने को प्राथमिकता दी। यदि यात्रा गठबंधन के बैनर तले होती तो तमाम विपक्षी दल अपनी सहभागिता देकर इसे प्रभावशाली बनाते किंतु जिन राज्यों से वह गुजर रही है वहां असर रखने वाले क्षेत्रीय दलों को यात्रा में आमंत्रित करने में भी देर की गई जिससे वे कटे रहे। ममता बैनर्जी ने तो अपनी नाराजगी खुलकर जाहिर करते हुए यहां तक भविष्यवाणी कर दी कि कांग्रेस 40 लोकसभा सीट भी बमुश्किल जीत सकेगी। नीतीश कुमार के किनारा करने के बाद ही कांग्रेस ने अखिलेश यादव को यात्रा में शिरकत करने हेतु आमंत्रित किया । वह भी तब जब वे कांग्रेस को 11 सीटें देने का इकतरफा ऐलान कर चुके थे। कुल मिलाकर इंडी समर्थक विश्लेषक इस बात को लेकर निराश हैं कि वह केवल बैठकों और बयानों तक सीमित है जबकि अभी तक तो उसे जबरदस्त मोर्चा खोल देना चाहिए था। इसका एक कारण ये भी है कि गठबंधन के हिस्सेदार दलों में साम्यवादियों को छोड़कर बाकी सब किसी नेता या परिवार के हित के लिए राजनीति करते हैं जिनके निजी स्वार्थ गठबंधन के सामूहिक हितों पर भारी पड़ रहे हैं। नीतीश कुमार चूंकि सबको जोड़कर रखने वाले नेता थे इसलिए उनके अलग हो जाने के बाद गठबंधन में थोड़ी ही सही किंतु जो कसावट थी वह भी ढीली पड़ने लगी। यही कारण है कि विभिन्न राज्यों से कांग्रेस सहित अन्य पार्टियों से नेताओं और जनप्रतिनिधियों की भाजपा के साथ जुड़ने की खबरें आने लगी हैं। उद्धव ठाकरे के हालिया नर्म बयान के अलावा उ.प्र में कांग्रेस नेता आचार्य प्रमोद कृष्णम द्वारा प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को अपने आयोजन में आमंत्रित कर भविष्य के संकेत दे दिए गए। वैसे भी वे राम मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा समारोह का बहिष्कार करने के निर्णय के कारण कांग्रेस की खुलकर आलोचना कर रहे हैं। विपक्षी गठबंधन के कमजोर पड़ने का संकेत पश्चिमी उ.प्र के जाट नेता और रालोद प्रमुख जयंत चौधरी की टेढ़ी चाल से भी मिल रहा है जो भाजपा के साथ गठजोड़ की प्रक्रिया में हैं। इस सबके कारण न तो गठबंधन को लेकर जनमानस में उत्सुकता और आकर्षण है और न ही घटक दलों में सामंजस्य बन पा रहा है। इसके विपरीत भाजपा ने अपनी चुनावी मशीनरी को पूरी तरह मुस्तैद कर दिया है। तीन राज्यों में मिली जीत के कारण उसका मनोबल भी ऊंचा है। प्रधानमंत्री खुद समय निकालकर देश के विभिन्न हिस्सों में जा रहे हैं । यदि यही स्थिति रही तो गठबंधन की एकता और उस पर आधारित सफलता की उम्मीद हवा - हवाई होकर रह जायेगी। प्रधानमंत्री द्वारा संसद में भाजपा को 370 और राजग को 400 से ज्यादा सीटें मिलने का जो दावा किया गया उसे भले ही अतिरंजित माना जाए किंतु विपक्षी गठबंधन में तो कांग्रेस द्वारा पिछले प्रदर्शन को दोहराए जाने को लेकर ही विश्वास का अभाव है । 


- रवीन्द्र वाजपेयी 

Thursday, 8 February 2024

बेहतर होगा मुस्लिम समाज खुद होकर सुधारवादी पहल करे



उत्तराखंड विधानसभा ने समान नागरिक संहिता विधेयक पारित कर दिया। इसके साथ ही अब ये संभावना  है कि भाजपा शासित अन्य राज्य भी इस दिशा में कदम बढ़ा सकते हैं।  दरअसल  स्व.राजीव गांधी के शासनकाल में सर्वोच्च न्यायालय ने शाह बानो के पक्ष में गुजारा भत्ता संबंधी जो फैसला सुनाया था वह समान नागरिक संहिता की मांग को तेज करने का आधार बना। बाद में जब राजीव सरकार द्वारा संसद में उक्त फैसले को रद्द करवा दिया गया तो उसके समर्थकों  को जबरदस्त हथियार हाथ लग गया। सच तो ये है कि स्व.गांधी को जितना राजनीतिक नुकसान बोफोर्स कांड ने पहुंचाया उतना ही शाह बानो वाले फैसले को पलटने से पहुंचा । उसके बाद देश में मिली - जुली सरकारों का दौर चलता रहा । लेकिन 2014 में  नरेंद्र मोदी की जो सरकार बनी उसे स्पष्ट बहुमत हासिल होने के कारण भाजपा अपने मुख्य नीतिगत मुद्दों पर आगे बढ़ी। तीन तलाक , धारा 370 और राम मंदिर के मामले में सफलता प्राप्त होने के बाद अब समान नागरिक संहिता ही शेष है। रोचक बात ये है। कि इसके पक्ष और विपक्ष दोनों में प्रस्तुत याचिकाओं को सर्वोच्च न्यायालय ने ये कहते हुए रद्द कर दिया कि यह संसद के क्षेत्राधिकार का विषय है। ये  भी महत्वपूर्ण है कि उत्तराखंड भले समान नागरिक संहिता लागू करने वाले पहले राज्य के तौर पर प्रचारित हो रहा हो किंतु गोवा में तो यह पुर्तगाली शासन के समय से ही लागू  है। और यह भी कि उसका न मुस्लिम विरोध करते हैं और न ही ईसाई। लेकिन देश के अन्य राज्यों में  समान नागरिक संहिता लागू करने का मुस्लिम समाज ये कहकर विरोध करता है कि पर्सनल लॉ से छेड़छाड़ उनके धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप होगा जो संविधान में अल्पसंख्यकों को प्रदत्त सुरक्षा के मद्देनजर अनुचित है। लेकिन संविधान में सभी नागरिकों के साथ समान व्यवहार की बात भी तो कही गई है। संविधान सभा में  इस विषय पर उस समय के दिग्गज नेताओं ने भी खुलकर अपने विचार रखे थे। ये मुद्दा शायद कभी नहीं उठता यदि पंडित नेहरू की सरकार ने हिंदू विवाह , उत्तराधिकार , पैतृक संपत्ति सहित कुछ और कानूनों में रद्दोबदल न किया जाता। हिन्दू कोड बिल को लेकर कांग्रेस में भी अंतर्विरोध थे।  डा. आंबेडकर द्वारा जब इसे पेश किया गया तब  यह संसद में पारित न हो सका जिस पर उन्होंने मंत्री पद छोड़ दिया। संविधान सभा के अध्यक्ष के तौर पर भी डा.राजेंद्र प्रसाद उसके पक्ष में नहीं थे। अंततः 1955 में अनेक टुकड़ों में उसे पारित करवा लिया गया। कांग्रेस में जो हिंदूवादी नेता उस दौर में थे वे भी नेहरू जी के आभामंडल के सामने ज्यादा कुछ न कर सके। उसी के बाद से हिंदूवादी संगठनों ने ये कहना शुरू कर दिया कि जब बहुसंख्यक होने के बाद भी हिंदुओं के पर्सनल लॉ में सुधार के नाम पर बदलाव किया गया तब मुस्लिम पर्सनल लॉ को समयानुकूल बनाने में सरकार पीछे क्यों रही? जनसंघ के उदय के बाद से ही समान नागरिक संहिता की मांग लगातार उठती आ रही है जो 2014 के बाद से और तेज हो गई। उत्तराखंड की पहल के बाद अब यह मुद्दा और जोर पकड़ेगा। हो सकता है लोकसभा चुनाव में भी यह भाजपा के प्रचार का हिस्सा बने। प्रधानमंत्री श्री मोदी ने लोकसभा में राष्ट्रपति के अभिभाषण का उत्तर देते हुए कहा भी कि अपने तीसरे कार्यकाल में उनकी सरकार कुछ कड़े और बड़े फैसले लेगी। जाहिर है समान नागरिक संहिता उनमें से एक होगी। वैसे अनेक मुस्लिम देशों में एक से अधिक विवाह , तलाक , हलाला , संपत्ति में उत्तराधिकार जैसे अनेक मामलों में बदलाव किया जा चुका है , जिनमें पाकिस्तान भी एक है। भारत में चूंकि मुसलमान वोट बैंक बनकर रह गए हैं इसलिए उनके तुष्टीकरण का खेल चलता रहा। लेकिन उनकी सामाजिक और शैक्षणिक स्थिति को सुधारने के दिशा में वे नेता कुछ नहीं करते जो उनके वोट के बलबूते पर राजनीति चलाया करते हैं। मुस्लिम समुदाय को चाहिए कि वह समाज सुधार की प्रक्रिया के प्रति खुले मन से आगे आए। उसे ये देखना और सोचना चाहिए कि जब अनेक इस्लामिक देशों ने सदियों से  प्रचलित रीति - रिवाजों को बदलने में संकोच नहीं किया तब भारत जैसे धर्म निरपेक्ष कहे कहे वाले देश में उसका विरोध करने का अर्थ क्या है ? समान नागरिक संहिता में  प्रस्तावित किसी बात पर ऐतराज होना तो स्वाभाविक है किंतु उसे सिरे से नकार देना  समाज को विकास की राह पर आगे बढ़ने से रोकना ही है। कट्टरपंथी लोग हिंदुओं में भी कम नहीं हैं किंतु उसके बाद भी उनका बहुमत समय की जरूरत के अनुरूप खुद को ढालते रहने के  कारण ही तरक्की की राह पर आगे निकल गया। समान नागरिक संहिता को इस्लाम विरोधी कहकर उसका अंध विरोध करने की मानसिकता त्यागकर मुस्लिम समाज के समझदार लोगों को खुद होकर पर्सनल लॉ में बदलाव करने की पहल करना चाहिए। ऐसा करने से वे उस पराजयबोध से बच जायेंगे जिसके वे इन दिनों शिकार हैं।


 - रवीन्द्र वाजपेयी 

Wednesday, 7 February 2024

हरदा हादसे के जिम्मेदार नौकरशाहों को भी सह अभियुक्त बनाया जाए


म.प्र के हरदा शहर की  पटाखा फैक्ट्री में गत दिवस हुए अग्निकांड में एक दर्जन से ज्यादा मौतों के अलावा सैकड़ों लोगों के घायल होने की खबर है। बारूद के भंडार में आग लगने के बाद धमाकों की आवाज से पूरा शहर दहल उठा। दूर - दूर तक के मकान धमाके में हिल गए। राह चलते लोग भी बारूदी धमाकों के शिकार हुए। अभी मरने वालों की सही  संख्या का पता नहीं चल सका है क्योंकि फैक्ट्री में कार्यरत अनेक मजदूर लापता हैं। मलबा हटाए जाने के बाद ही सही स्थिति सामने आयेगी। पटाखा फैक्ट्री में इस तरह के हादसे होना स्वाभाविक होता है क्योंकि जहां बड़ी मात्रा में बारूद का भंडार हो वहां छोटी सी असावधानी से आग भड़क जाती है। जाहिर है इस व्यवसाय का लाइसेंस देने के पहले  संबंधित सरकारी विभाग अग्निशमन सहित अन्य सुरक्षा प्रबंधों की जांच करते होंगे। उक्त फैक्ट्री के बारे में जो जानकारी आई  उसके अनुसार नियम विरुद्ध कार्य करने के कारण  उसे प्रशासन ने बंद कर दिया किंतु संभागायुक्त ने उक्त आदेश पर स्थगन आदेश जारी करते हुए फैक्ट्री खोलने की अनुमति दे दी। अब जबकि हादसे की खबर देश भर में फैल चुकी है । मुख्यमंत्री से लेकर  पूरा प्रशासन कड़ी कार्रवाई करने की घोषणा कर रहा है । पहले से ही जमानत पर चल रहे फैक्ट्री मालिक को दोबारा गिरफ्तार भी कर लिया गया। घायलों का इलाज हरदा और भोपाल के अस्पतालों में हो रहा है। भुगतान दिवस होने की वजह से बड़ी संख्या में मजदूर हादसे के समय फैक्ट्री में जमा थे। ऐसी आशंका है कि धमाकों में कुछ श्रमिकों का पूरा परिवार ही भस्म हो गया। फैक्ट्री का रिहायशी इलाके में होना भी स्थानीय प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करता है। मुख्यमंत्री डा.मोहन यादव का ये कहना तो बिलकुल सही है कि दोषियों पर ऐसी कार्रवाई करेंगे कि दोबारा किसी की जुर्रत ऐसी गड़बड़ी करने की न हो। लेकिन हर बड़ी जानलेवा दुर्घटना के बाद दिखाई जाने वाली सख्ती यदि सही समय पर बरती जावे तो उनको रोका जा सकता है। हाल ही में गुना जिले में हुए बस हादसे में काफी संख्या में यात्रियों के मारे जाने के बाद भी मुख्यमंत्री ने परिवहन आयुक्त से लेकर जिले के तमाम अधिकारियों को हटा दिया । जांच शुरू होने के बाद जो तथ्य सामने आए वे प्रशासनिक लापरवाही और भ्रष्टाचार के साथ ही राजनेताओं और नौकरशाहों के  गठजोड़ को उजागर करने वाले थे। दुर्घटनाग्रस्त बस की हालत बेहद खराब थी। उसके बाद भी उसे चलाए जाने की अनुमति दी गई। बस मालिक सत्ताधारी पार्टी के नेता परिवार का होने से वह सम्भव हुआ होगा। उसके बाद पूरे प्रदेश में परिवहन महकमा सक्रिय हुआ। दो - चार दिनों तक जहां देखो वहां व्यवसायिक वाहनों की फिटनेस सहित अन्य  जांच कराने का नाटक हुआ । और उसके बाद सब कुछ ढर्रे पर लौट आया। गत वर्ष जबलपुर के एक निजी अस्पताल  में हुए अग्निकांड में अनेक लोग जान गंवा बैठे थे । उक्त  अस्पताल में एक ही निकासी द्वार  के अलावा आग बुझाने के समुचित इंतजाम नहीं थे। घटना के बाद शहर में फायर आडिट का अभियान चला। अनेक नए अस्पतालों और बहुमंजिला भवनों के निर्माण की अनुमति रोक ली गई। उसके पहले भोपाल के हमीदिया अस्पताल में भी आग लगने की घटना ने पूरे प्रदेश में हलचल मचा दी थी। उसके बाद भी अग्निशमन को लेकर प्रदेश भर में जांच का अभियान चला। लेकिन उसमें कितनी ईमानदारी रही ये हरदा के हादसे से सामने आ गया। बारूद के उपयोग से जुड़े  किसी भी व्यवसाय को रिहायशी इलाके में चलाए जाने की अनुमति देना अपराधिक उदासीनता ही कही जाएगी। उस दृष्टि से संभागायुक्त द्वारा बंद की जा चुकी फैक्ट्री को शुरू करने की अनुमति किस आधार पर दी गई वह सामने आना चाहिए । ऐसे काम केवल दो कारणों से होते हैं  जिनमें पहला राजनीतिक दबाव और दूसरा भ्रष्टाचार ,जो घूसखोरी की शक्ल में होता  है। हरदा  का हादसा एक तमाचा है प्रशासनिक व्यवस्था के निकम्मेपन पर । मुख्यमंत्री डा.यादव ने सत्ता संभालते ही अपने सख्त तेवर दिखाने शुरू कर दिए थे। गुना बस कांड के बाद हरदा अग्निकांड ने आपदा प्रबंधन की अग्रिम सावधानियों की असलियत का पर्दाफाश कर दिया है। मुख्यमंत्री को  प्रदेश भर के प्रशासनिक अधिकारियों को सख्त हिदायत देना चाहिए कि नियम विरुद्ध यदि इस तरह के व्यवसाय की जानकारी सामने आई तो संबंधित अधिकारी को  बराबर का दोषी माना जाएगा  । हरदा का हादसा हुआ ही इस वजह से कि  रिहायशी  इलाके में नियम विरुद्ध चलाई जा रही  पटाखा फैक्ट्री को सील करने के बाद दोबारा खोलने की अनुमति एक बड़े साहब ने दे दी। इसलिए ऐसे हादसों में उन नौकरशाहों को भी सह अभियुक्त बनाया जाना जरूरी हो गया है जो मौत के ऐसे मंजर पैदा करने में सहायक बनते हैं।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 6 February 2024

मोदी के आक्रामक अंदाज के मुकाबले विपक्ष के पास रणनीति का अभाव


राष्ट्रपति के अभिभाषण के प्रति धन्यवाद प्रस्ताव पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हर साल लंबा भाषण देते हुए विपक्ष पर जोरदार हमले करते हैं। ऐसा ही उन्होंने गत दिवस भी किया जिसमें सरकार की उपलब्धियों के बखान को आगामी लोकसभा चुनाव के  प्रचार के तौर पर देखा जा सकता है । अपनी चिर - परिचित शैली में उन्होंने कांग्रेस पर प्रहार में कोई गुंजाइश नहीं छोड़ी और विपक्ष पर यहां तक ताना मारा कि अगले चुनाव में वह दर्शक दीर्घा में नजर आएगा। पिछले स्वाधीनता दिवस पर भी उन्होंने कहा था कि आगामी वर्ष भी वे ही लाल किले की प्राचीर पर ध्वजारोहण करेंगे। गत दिवस लोकसभा में उन्होंने वही आत्म विश्वास दोहराते हुए दावा किया कि 2024  में  भाजपा 370 और एनडीए 400 से ज्यादा सीटें जीतेगा। उन्होंने विपक्षी गठबंधन पर भी निशाना साधा। परिवारवाद पर श्री मोदी हमेशा से ही मुखर रहे हैं। लाल किले से दिए भाषण में भी उन्होंने इस पर हमला बोला था। वैसे भी प्रधानमंत्री काफी हौसले वाले इंसान हैं जो जय - पराजय में अपना संतुलन बनाए रखने के साथ ही अवसर को भुनाने में कभी पीछे नहीं रहते। राहुल गांधी की न्याय यात्रा के कारण कांग्रेस उसमें उलझी हुई है। वहीं दूसरी और नीतीश कुमार के अलग होने के अलावा ममता बैनर्जी के तेवरों से विपक्षी गठबंधन में बिखराव के आसार बढ़ रहे हैं । अखिलेश यादव और अरविंद केजरीवाल भी कांग्रेस पर अपनी मर्जी थोपने पर अमादा हैं । इसका प्रभाव संसद में भी देखने मिल रहा है। उल्लेखनीय है 2019 के लोकसभा चुनाव के पहले म.प्र, छत्तीसगढ़ और राजस्थान के विधानसभा चुनाव में भाजपा की पराजय ने मोदी सरकार की वापसी के प्रति आशंका उत्पन्न कर दी थी। लेकिन वह गलत साबित हो गई। उसके विपरीत इस बार उक्त तीनों राज्यों में भाजपा ने धमाकेदार अंदाज में वापसी करते हुए कांग्रेस का मनोबल तोड़ने में कामयाबी हासिल कर ली है। इसके अलावा इस बार प्रधानमंत्री के पास  उपलब्धियों का लंबा ब्यौरा है। 2014 में सत्ता में आने के बाद उन्होंने जिन योजनाओं और कार्यक्रमों को प्रारंभ किया था उनके प्रति जनविश्वास बढ़ा है। मोदी की गारंटी नामक  नया नारा  उसी आत्मविश्वास का परिचायक है जिसके बल पर वे 370 और 400 सीटों का दावा कर पा रहे हैं।  22 जनवरी को अयोध्या में निर्मित भव्य राम मंदिर में प्राण - प्रतिष्ठा के अवसर पर पूरे देश में जिस तरह से  हर्षोल्लास नजर आया वह भाजपा के पक्ष में वैसी ही लहर का संकेत दे रहा है जैसी 1984 में कांग्रेस के पक्ष में नजर आई थी । विपक्ष के अधिकांश दल भी इस बात को समझ चुके हैं कि कांग्रेस ने प्राण - प्रतिष्ठा समारोह की उपेक्षा कर बहुत बड़ी गलती कर डाली । और इसीलिए वे उससे छिटकने के संकेत दे रहे हैं। आज खबर आई कि उद्धव ठाकरे भी प्रधानमंत्री के विरुद्ध तीखी बयानबाजी से बचते हुए उनके साथ पुराने संबंधों का हवाला देते हुए सौजन्यता का प्रदर्शन करने लगे हैं। इन सबके कारण प्रधानमंत्री का मनोबल ऊंचा होना स्वाभाविक है। कोरोना काल में अर्थव्यवस्था को जो ग्रहण लगा था वह हट चुका है और भारत की विकास दर पूरी दुनिया को आकर्षित कर रही है। विदेशी मोर्चे पर भी हमारी स्थिति बेहद मजबूत है तथा श्री मोदी विश्व के सबसे लोकप्रिय लोकतांत्रिक शासक के तौर पर स्थापित हो चुके हैं। दुनिया के बड़े देश तक भारत के महत्व को स्वीकारने लगे हैं। सही बात तो ये है कि विपक्ष अपनी धार खोता चला जा रहा है। उसका गठबंधन कागज पर बने तो महीनों बीत गए किंतु न उसका कोई सर्वमान्य नेता है और न ही नीति। सीटों के बंटवारे को लेकर विभिन्न घटक दलों के बीच में जबरदस्त अविश्वास है । नीतीश कुमार के साथ छोड़ देने के बाद गठबंधन में कोई भी ऐसा नेता नहीं है जो सभी को एकजुट रख सके। मौजूदा  संसद का ये अंतिम सत्र है और इसमें भी विपक्ष सरकार को घेरने में सफल होता नहीं दिखता । ऐसा नहीं है कि उसके पास हमले करने लायक मुद्दे न हों किंतु आपसी समन्वय का अभाव और दिशाहीनता के कारण वह उसका लाभ नहीं  उठा पाता। होना तो ये चाहिए था कि श्री गांधी न्याय यात्रा को विराम देकर संसद में विपक्ष की तरफ से सरकार पर हमले की अगुआई करते। लेकिन उन्होंने इस तरफ ध्यान ही नहीं दिया। बहरहाल विपक्ष में व्याप्त अव्यवस्था के बीच प्रधानमंत्री ने अपने चुनाव अभियान को पूरे जोर - शोर से शुरू कर दिया है। वे लगातार राज्यों का दौरा करते हुए विकास की नई योजनाओं की शुरुआत के जरिए मोदी की गारंटी के प्रति भरोसा बढ़ा रहे हैं। वहीं कांग्रेस सहित बाकी विपक्ष अभी तक अपनी रणनीति ही नहीं बना सका। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 5 February 2024

दूसरों को फंसाने फेंके जाल में खुद फंस गए केजरीवाल


दिल्ली पुलिस की अपराध शाखा को मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और उनकी मंत्रीमंडलीय साथी आतिशी को नोटिस सौंपने के लिए उनके निवास पर  घंटों इंतजार करना पड़ा। पहले प्रयास में दोनों नेता घर पर नहीं मिले। और जब मिले तो नोटिस देने आए अधिकारियों को खरी - खोटी सुनाते हुए केंद्र सरकार पर आरोपों की झड़ी लगा दी।  इन दोनों ने  सार्वजनिक रूप से आरोप लगाया था कि भाजपा द्वारा 25 - 25 करोड़ रु. में आम आदमी
पार्टी के विधायकों को खरीदने का प्रयास किया जा रहा है। इसके विरुद्ध भाजपा ने रिपोर्ट दर्ज करवाकर श्री केजरीवाल  और  आतिशी से ये बताने कहा कि विधायकों को खरीदने का प्रस्ताव देने वाला कौन था ? अब जबकि अपराध शाखा द्वारा दोनों को बाकायदा नोटिस भेजकर  विधायकों को 25 करोड़ रु . का प्रस्ताव देने वाले का नाम बताने कहा तब संवैधानिक पद पर विराजमान  नेताओं को अपने आरोप के पक्ष में प्रमाण देना चाहिए। लेकिन ऐसा करने के बजाय वे  केंद्र सरकार और भाजपा पर भड़ास निकालने में जुटे हैं। उनको आज नोटिस का जवाब देना है। इसके पहले शराब घोटाले में श्री केजरीवाल ईडी द्वारा अनेक  समन दिए जाने के बावजूद पूछताछ के लिए उपस्थित नहीं हुए और आए दिन अपनी गिरफ्तारी का शिगूफा छोड़ा करते हैं। झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने भी ईडी के कई समन रद्दी की टोकरी में फेंक दिए किंतु आंख - मिचौली करते रहने के बाद अंततः वे उसके सामने पेश हुए और गिरफ्तार कर लिए गए। हो सकता है यदि वे पहले बुलावे पर ही जाकर अपना बयान देते तब ये नौबत नहीं आती। केजरीवाल जी भी यदि ईडी के अनेक बुलावे ठुकराने के बाद गिरफ्तार किए जाएं तो फिर उनके पास सहानुभूति अर्जित करने का अवसर भी नहीं रहेगा। ऐसे मामलों में एक बात और विचारणीय है कि मुख्यमंत्री और मंत्री पद पर विराजमान व्यक्ति संविधान की रक्षा और उसके पालन की शपथ लेने के उपरांत ही कुर्सी पर बैठता है। ऐसे में किसी वैधानिक जांच एजेंसी द्वारा पूछताछ हेतु बुलाए जाने पर उनका उपस्थित न होना एक दो मर्तबा तो व्यस्तता या अन्य किसी कारण से समझ में आता है , लेकिन छह - आठ समन के बाद भी  अवहेलना करना इस बात का प्रमाण  है कि कानून के प्रति उनके मन में तनिक भी सम्मान नहीं हैं। इन नेताओं को इस बात का जवाब देना चाहिए कि इनके मातहत कार्यरत कोई अधिकारी अथवा कर्मचारी इनके द्वारा बुलाए जाने पर  उपस्थित न हो तो क्या उसे ये बख्श देंगे ? अरविंद और आतिशी ने जब खुले आम अपने विधायकों को खरीदे जाने का आरोप भाजपा पर लगाया तो फिर संबंधित व्यक्ति की पहचान भी उनको स्पष्ट करना चाहिए थी। और फिर 25 करोड़ की राशि साधारण नहीं है अतः उनके द्वारा लगाया  आरोप  बेहद गंभीर है। जब भाजपा ने आरोपों की पुष्टि करवाने के लिए विधिवत कार्रवाई की तब ये उनका कानूनी दायित्व है कि वे उसको सत्य सिद्ध करें या उसका जो भी दंड हो उसको भुगतें। स्मरणीय है सत्ता में आने से पहले आम आदमी पार्टी की ओर से श्री केजरीवाल ने देश के सबसे भ्रष्ट नेताओं की सूची जारी की थी। उस पर केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी और स्व.अरुण जेटली सहित अनेक लोगों ने  मानहानि का प्रकरण दर्ज करवाया । ऐसा होते ही केजरीवाल जी की सारी हेकड़ी जाती रही और फिर वे उन सभी के सामने लिखित माफीनामा लेकर यह याचना करते दिखाई दिए कि प्रकरण वापिस ले लें । जिन लोगों से उन्होंने माफी मांगी उनमें विक्रम मजीठिया , श्री गडकरी , स्व.जेटली  और स्व. शीला दीक्षित जैसे अनेक दिग्गज रहे। सबसे रोचक बात ये है कि  कपिल सिब्बल से भी अरविंद ने माफी मांगी जो आजकल ऐसे नेताओं के बचाव में खड़े होते हैं। उनके माफीनामे पर  कांग्रेस नेता अजय माकन ने कटाक्ष भी किया था कि केजरीवाल को अपना नाम बदलकर माफीवाल कर लेना चाहिए । आम आदमी पार्टी के संयोजक आजकल उन तमाम नेताओं के साथ गठबंधन में शामिल हो रहे हैं जिन्हें वे भ्रष्टाचार का सिरमौर बताते रहे। हालांकि उनकी समूची राजनीति विरोधभासों और पलायनवाद पर टिकी रही किंतु इस प्रकरण में एक बार फिर उनके समक्ष  मुसीबत आ खड़ी हुई है। भाजपा पर उनकी पार्टी के विधायकों को 25 - 25 करोड़ में खरीदने का प्रस्ताव देने का आरोप  उनके गले में पड़ गया है। यदि उनके पास इसका कोई प्रमाण होता तो निश्चित रूप से वे अपराध शाखा का नोटिस लेने में विलंब नहीं करते और अब तक उन कथित लोगों के नाम सार्वजनिक कर चुके होते जिन्होंने विधायकों को खरीदने की पेशकश की थी। ऐसा लगता दूसरों को  फंसाने के लिए फेंके गए जाल में केजरीवाल एंड कंपनी खुद फंसती जा रही है।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 3 February 2024

कांग्रेस न्याय यात्रा में व्यस्त : विपक्षी गठबंधन में सब अस्त व्यस्त


ऐसा लगता है इंडी नामक विपक्षी गठबंधन जंग में उतरने के पहले ही बिखराव की ओर बढ़ रहा है। राहुल गांधी की न्याय यात्रा भी इसे कमजोर करने का कारण बन रही है। अभी तक के संकेत गठबंधन और कांग्रेस दोनों के लिए अशुभ कहे जायेंगे। यात्रा के प. बंगाल में घुसते ही तृणमूल कांग्रेस नेत्री ममता बैनर्जी ने राज्य की सभी लोकसभा सीटों पर अकेले लड़ने की घोषणा कर दी।  वे इस बात से नाराज थीं कि  न्याय यात्रा के पूर्व  उनके आग्रह के बावजूद भी श्री गांधी ने उनसे फोन पर बात नहीं की। गत दिवस  सुश्री बैनर्जी का बयान आ गया कि कांग्रेस लोकसभा की 40  सीटें भी नहीं जीत सकेगी। उन्होंने  चुनौती दी कि यदि उसमें हिम्मत है तो वह भाजपा को वाराणसी और प्रयागराज में परास्त करके दिखाए। उन्होंने ये ताना भी मारा कि वह न जाने किस अहंकार में जी रही है। हालांकि वे काफी  पहले से ही राहुल और  कांग्रेस को अक्षम बता चुकी थीं।  विपक्षी मोर्चा बनने के बाद उन्होंने कांग्रेस से साफ कह दिया कि वे उसके लिए वही दो सीटें छोड़ेगी जिन पर 2019 में वह जीती थी। न्याय यात्रा से उनकी खुन्नस इसलिए भी बढ़ी क्योंकि उसमें वामपंथी शामिल हुए। नीतीश कुमार के पाला बदल लेने के बाद ममता ही इंडी की सबसे बड़ी नेता कही जा सकती हैं जिनका प.बंगाल के अलावा एक दो राज्यों में कुछ असर है। जहां तक बात तमिलनाडु के मुख्यमंत्री स्टालिन की है तो वे अपने राज्य के अलावा पांडिचेरी तक ही सिमटे  हैं। एनसीपी के दिग्गज  शरद पवार का करिश्मा भी ढलान पर है। भतीजे अजीत की बगावत के बाद  विपक्षी गठबंधन के बजाय उन्हें अपनी बेटी सुप्रिया सुले के राजनीतिक भविष्य की चिंता सताए जा रही है । कहा तो ये भी जा रहा है कि अजीत के भाजपा में जाने की योजना भी चाचा की  ही तैयार की हुई थी। देर - सवेर अपनी बेटी के  राजनीतिक भविष्य को सुरक्षा चक्र प्रदान करने के लिए वे भी श्री मोदी के मोहपाश में फंस जाएं तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। स्मरणीय है कि आज भले ही नीतीश कुमार को पलटूराम और ऐसे ही न जाने कितने विशेषणों से विभूषित किया जा रहा है परंतु राष्ट्रीय राजनीति में शरद पवार काफी पहले से  पाला बदलने और धोखा देने के लिए कुख्यात रहे हैं। मुख्यमंत्री बनने के लिए अपने राजनीतिक गुरु स्व.बसंत दादा पाटिल की पीठ में छुरा भौंकने में भी उन्होंने शर्म नहीं की। 1999 के लोकसभा चुनाव के पूर्व  सोनिया गांधी के विदेशी मूल को बहाना बनाकर उन्होंने कांग्रेस से इस्तीफा देकर एनसीपी बना ली।   लेकिन कुछ सालों बाद  कांग्रेस के करीब आकर डा.मनमोहन सिंह की सरकार में मंत्री भी बन गए।  इसीलिए वे  पूरी तरह अविश्वसनीय माने जाते हैं। ये सब देखते हुए इंडी की दशा और दिशा दोनों गड़बड़ाती दिख रही हैं । राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार विपक्षी गठबंधन के तमाम घटक जिस प्रकार अपनी ढपली अपना राग लेकर घूम रहे हैं वह उसके भविष्य को लेकर आशंकित कर रहा है। ममता के  सभी सीटों पर लड़ने के ऐलान के बाद जब राहुल ने सीटों के बंटवारे को लेकर बातचीत चलने जैसी टिप्पणी करते हुए उनकी नाराजगी दूर करना चाहा तो तृणमूल नेत्री ने कांग्रेस को 40 सीटें मिलने की भविष्यवाणी कर दूध में नींबू निचोड़ दिया। महाराष्ट्र में श्री पवार और उद्धव ठाकरे भी कांग्रेस को बड़ा भाई मानने राजी नहीं हो रहे। आम आदमी पार्टी ने पंजाब के बाद हरियाणा में भी अकेले लड़ने की धौंस दिखा दी। 22 जनवरी को अयोध्या स्थित राम मंदिर में मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा के अवसर पर समूचे देश में जो स्वस्फूर्त वातावरण निर्मित हुआ उसने कांग्रेस को पिछले पैरों पर धकेल दिया । उक्त आयोजन का आमंत्रण मिलने के बावजूद उसमें शामिल नहीं होने के उसके  निर्णय को राजनीतिक विश्लेषक बहुत बड़ी गलती मान रहे हैं । यद्यपि श्री पवार और ममता सहित ज्यादातर विपक्षी नेता उस दिन अयोध्या नहीं गए किंतु पूरे देश में कांग्रेस जन जिस उत्साह के साथ राम नाम की माला जपते दिखे उसके बाद ये साफ हो गया कि पार्टी का सामान्य कार्यकर्ता ही नहीं अपितु नेतागण भी राम मंदिर निर्माण के कारण पैदा हुई हिन्दू लहर से भयाक्रांत हैं। आचार्य प्रमोद कृष्णम तो खुले आम पार्टी लाइन के विरुद्ध बोलते जा रहे हैं । और तो  और वे प्रधानमंत्री को अपने एक अयोजन का निमंत्रण पत्र देने उनसे भेंट तक कर आए। चौंकाने वाली बात ये है कि विपक्षी गठबंधन में आ रही दरारों को भरने की फुरसत किसी नेता को नहीं है। नीतीश कुमार इसमें सक्षम थे किंतु वे  खुद ही भाजपा की गोद में जा बैठे। पवार साहेब से अपना घर ही नहीं संभल रहा। जहां तक बात ममता की है तो उनके साथ किसी की पटरी नहीं बैठती। बच रहते हैं मल्लिकार्जुन खरगे तो अव्वल तो उनको कोई भाव देता नहीं है और वैसे भी उनका पूरा ध्यान न्याय यात्रा पर लगे रहने से वे विपक्षी एकता के लिए कुछ नहीं कर पा रहे। यदि कुछ दिन और ऐसा ही चला तब इस गठबंधन के छिन्न - भिन्न होने की आशंकाएं प्रबल होती चली जाएंगी।


- रवीन्द्र वाजपेयी