Saturday, 17 February 2024

किसान आंदोलन : दोनों पक्षों को लचीला रुख दिखाना चाहिए


किसान आंदोलन एक बार फिर खबरों में है। पंजाब से किसानों के ट्रेक्टर और अन्य वाहन दिल्ली की ओर बढ़ना चाह रहे हैं जिनको हरियाणा पुलिस आगे नहीं बढ़ने दे रही । उनको रोकने के लिए  लाठीचार्ज , अश्रुगैस और रबर की गोलियों जैसे तरीके भी इस्तेमाल हो रहे हैं। किसान नेताओं और केंद्रीय मंत्रियों के एक दल के बीच वार्ता भी जारी है । जिसमें कुछ बिंदुओं पर सहमति के संकेत भी मिले हैं। हालांकि  किसान नेता राकेश टिकैत अभी तक आंदोलन को दूर से ही समर्थन दे रहे हैं जिससे दिल्ली तक किसानों की टोलियां नहीं पहुंच सकीं। लगता है इस आंदोलन के पहले श्री टिकैत सहित किसानों के अन्य नेताओं को विश्वास में नहीं लिया गया। राजनीतिक पार्टियां भी लोकसभा चुनाव की व्यूह रचना  में व्यस्त हैं।  ऐसे में केंद्र सरकार ऐसा कोई निर्णय लेने से बचना चाहेगी जो भविष्य में समस्या बन जाए।  अन्नदाता जैसे सम्मानजनक संबोधन के साथ ही किसानों के प्रति समाज में हमदर्दी भी है। जिन हालातों में वे काम करते हैं ,  वे निश्चित तौर पर बेहद कठिन  हैं। जब तक फसल का सुरक्षित भंडारण अथवा विक्रय न हो जाए तब तक  उनकी चिंता बनी रहती है। फसल बीमा के साथ ही प्राकृतिक आपदा में हुए नुकसान के मुआवजे की व्यवस्था भी उतनी पुख्ता नहीं है। नौकरशाही की कार्यशैली भी  परेशानी का कारण बनती है। लेकिन किसान जिन मांगों को पूरा करने के लिए दबाव बना रहे हैं वे जस की तस पूरी करना किसी भी सरकार के लिए संभव नहीं है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने एम.एस.पी (न्यूनतम समर्थन मूल्य ) को कानूनी रूप देने का आश्वासन दे डाला किंतु दस साल तक डा.मनमोहन सिंह की सरकार रहने के बावजूद श्री गांधी ने उक्त व्यवस्था क्यों नहीं करवाई इसका उत्तर भी मिलना चाहिए। केंद्र सरकार समय - समय पर एम.एस.पी में वृद्धि करती  है। उसके अलावा राज्य सरकारें बोनस आदि जोड़कर उसे और बढ़ा देती हैं। लेकिन समर्थन मूल्य कुछ फसलों पर ही है जबकि किसान नेता चाहते हैं समूचे कृषि उत्पादनों के लिए एम.एस.पी तय की जाए। और सरकार के अलावा बाजार में व्यापारी भी उससे कम पर खरीदे तो उसे दंडित किया जाए। इसके अलावा वृद्ध किसानों की पेंशन जैसी कुछ मांगें भी हैं। इन सबको स्वीकार करने पर केंद्र और राज्य सरकारों के कंधों पर जो आर्थिक बोझ आएगा वह आज के हालातों में तो सहने योग्य नहीं हैं । हालांकि एम.एस.पी का उद्देश्य किसानों को उत्पादन का उचित दाम दिलवाना है। जिसका लाभ भी उन्हें होता है। लेकिन उसको कानूनी शक्ल देकर निजी क्षेत्र को भी उसके लिए बाध्य किया जाए ये न तो सैद्धांतिक दृष्टि से उचित होगा और न ही व्यवहारिक। पिछले आंदोलन के बाद सरकार ने इसके लिए समिति भी बनाई थी और गत दिवस हुई बातचीत में भी इसी दिशा में विचार हुआ किंतु समूचे कृषि उत्पादनों को एम.एस.पी के अंतर्गत लाने और उसे कानून का जामा पहनाने जैसी मांग मान लेना किसी भी सरकार के बस में नहीं है। लोकसभा चुनाव  के कारण हो सकता है केंद्र सरकार नर्म रुख दिखाते हुए किसानों को कुछ आश्वासन देकर आंदोलन को खत्म करवा दे किंतु वह ऐसा कुछ भी  करने से बचेगी जो भविष्य में सिरदर्द बन जाए। हालांकि , जो किसान संगठन आंदोलन में शामिल हैं उनकी प्रामाणिकता को लेकर भी तरह - तरह की बातें सुनने में आ रही हैं। जिनमें सबसे प्रमुख तो ये है कि सही मायने में जिसे किसान कहा जाता है उसकी मौजूदगी इस आंदोलन में बेहद कम है। लेकिन आर्थिक तौर पर सम्पन्न किसान की बात की भी अनसुना नहीं किया जा सकता।  दूसरा पक्ष ये भी है कि राजनीतिक दलों द्वारा किसान आंदोलन को हवा देने के कारण इसका स्वरूप बिगड़ जाता है। पिछले आंदोलन में खालिस्तानी तत्व भी उसमें घुस आए।  एक बात और ये भी है कि किसान आंदोलन चुनाव के समय ही क्यों होता है। पिछली बार उ.प्र , उत्तराखंड और पंजाब में चुनाव होना थे। चुनाव हो जाने के बाद आंदोलन भी ठंडा पड़ गया था। इस बार लोकसभा चुनाव के पहले किसान फिर सड़कों पर उतरे हैं। उनके तेवर भी पिछली बार जैसे ही हैं किंतु अब तक वैसा समर्थन नहीं मिल सका ,जैसा उस समय दिखाई दिया था । इसका कारण उ.प्र और उत्तराखंड के बाद म.प्र , राजस्थान और छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव में भाजपा को मिली जबर्दस्त जीत के अलावा राजनीतिक नेताओं का लोकसभा चुनाव के तैयारियों में जुटना भी है। उम्मीद है कि किसान नेताओं और केंद्र सरकार के बीच हो रही वार्ता में कुछ न कुछ समाधान निकल ही आएगा लेकिन उसके लिए दोनों पक्षों को लचीलापन दिखाना होगा। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 15 February 2024

इलेक्टोरल बॉन्ड का विकल्प न होने से काले धन में चंदा बढ़ेगा



सर्वोच्च न्यायालय ने वर्ष 2018 में प्रारंभ की गई इलेक्टोरल बॉन्ड व्यवस्था को असंवैधानिक निरूपित करते हुए उस पर तत्काल रोक लगा दी। इसके साथ ही अब तक इस माध्यम से विभिन्न राजनीतिक दलों को चुनावी चंदा देने वालों का नाम उजागर किए जाने का आदेश भी भारतीय स्टेट बैंक को दिया। अपने फैसले में न्यायालय ने इलेक्टोरल बॉन्ड व्यवस्था को इसलिए असंवैधानिक माना क्योंकि उसके लिए अधिकृत स्टेट बैंक , बॉन्ड खरीदने वाले की जानकारी होते हुए भी उसे उजागर करने के लिए बाध्य नहीं था जो सूचना के अधिकार के कानून का उल्लंघन है। अदालत का कहना है कि चंदा देने वाले का नाम गोपनीय रखने से पारदर्शिता नहीं रहती और स्वार्थों का आदान - प्रदान भी स्वाभाविक रूप से होता है। इस बारे में केंद्र सरकार की दलील मुख्य रूप से ये थी कि इस व्यवस्था के कारण राजनीतिक दलों को काले धन से चंदा मिलने पर रोक लगी । वहीं चंदा देने वाले की पहचान गोपनीय रखे जाने का उद्देश्य उसे संभावित राजनीतिक प्रतिशोध से बचाना था। इस योजना के तहत अब तक 11723 करोड़ रु.चंदा मिला । इसका लगभग 55 प्रतिशत भाजपा को मिलने से बाकी राजनीतिक दल भन्नाए हुए थे। चूंकि सभी पार्टियों को अपना हिसाब - किताब चुनाव आयोग में देना पड़ता है इसीलिए उनको बॉन्ड के जरिए प्राप्त चंदे की जो जानकारी मिली उसके मुताबिक कांग्रेस को जहां 1123 करोड़ वहीं तृणमूल कांग्रेस को उससे थोड़ा कम अर्थात 1092 करोड़ रु. मिले । बीजू जनता दल को 774 करोड़, द्रमुक को 616 करोड़ , बीआरएस को 912 करोड़ , वाई.एस.आर कांग्रेस को 382 करोड़ , तेलुगु देशम को 146 करोड़ के अलावा अन्य दलों को भी 372 करोड़ रु. इलेक्टोरल बॉन्ड के जरिए मिले। इससे ये स्पष्ट है कि बॉन्ड का विरोध करने वाली पार्टियों ने भी उसके माध्यम से चंदा हासिल करने से इंकार नहीं किया । 10 वर्षों में भाजपा राष्ट्रीय पार्टी के तौर पर कांग्रेस से काफी आगे निकल गई और केंद्र में लगातार दूसरी बार सत्ता में आने से उसका प्रभुत्व भी बढ़ा। जाहिर है ऐसे में चंदा देने वाले आधे से ज्यादा दान दाता उसकी तरफ आकर्षित हो गए । लेकिन चौंकाने वाली बात ये है कि तृणमूल कांग्रेस को बॉन्ड से मिला चंदा कांग्रेस के लगभग बराबर है। कांग्रेस के पास उक्त अवधि में कुछ छोटे राज्यों में ही सत्ता थी। इसी तरह तेलंगाना जैसे छोटे राज्य में सत्तासीन रही बी.आर.एस को भी 912 करोड़ चंदा मिलना चौंकाता है। विभिन्न दलों का जो विवरण सामने आया उसने स्पष्ट कर दिया कि चंदा देने वाले विचारधारा से प्रेरित होकर नहीं अपितु स्वार्थों के कारण चंदा देते हैं। राजनीतिक दबाव तो काम करते ही हैं। उस दृष्टि से सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय औचित्य की कसौटी पर उचित प्रतीत होता है । लेकिन न्यायालय ने ऐसे समय फैसला सुनाया जब लोकसभा चुनाव एकदम करीब आ चुके हैं और सरकार के लिए कोई वैकल्पिक व्यवस्था करना भी इतनी जल्दी न तो संभव है और न ही उचित। ऐसे में चुनाव के समय एकत्र किए जाने वाले चंदे में काले धन का उपयोग खुलकर होगा । सर्वोच्च न्यायालय ने इस बात पर भी ऐतराज किया कि इलेक्टोरल बॉन्ड खरीदने के लिए किसी भी कंपनी का लाभ में होना जरूरी नहीं और घाटे में चलने के बावजूद वे बॉन्ड के जरिए चंदा दे सकती थीं। कुछ और विसंगतियों पर भी टिप्पणियां की गईं हैं किंतु मुख्य आपत्ति चंदा देने वाले का नाम गोपनीय रखने पर ही रही। अब सवाल ये है कि राजनीतिक दलों को चंदा देने वाले क्या बिना किसी भय के वैसा कर सकेंगे ? दिग्गज उद्योगपतियों को भले छोड़ दें किंतु मध्यम और लघु श्रेणी के उद्योगपति और व्यवसायी अपनी पहचान उजागर करने का साहस शायद ही प्रदर्शित कर सके। इस प्रकार बात फिर काले धन पर आकर टिक गई क्योंकि चुनाव और चंदे का चोली दामन का साथ है। बिना उसके चुनाव लड़ना लगभग असंभव है। ऐसे में उक्त फैसले के बाद एक शून्य की स्थिति उत्पन्न हो गई है। इसलिए लोकसभा चुनाव के लिए बटोरे जाने वाले चंदे में काले धन की बड़ी मात्रा होने से इंकार नहीं किया जा सकता। इस फैसले के बाद एक देश एक चुनाव की जरूरत और बढ़ गई है क्योंकि कभी न रुकने वाले चुनाव रूपी सिलसिले ने भ्रष्टाचार और नीतिगत अस्थिरता के साथ ही क्षेत्रीय भावनाओं को बढ़ावा दिया है जिसके कारण संघीय ढांचे पर भी संकट उठ खड़ा होता है। 

- रवीन्द्र वाजपेयी 

उच्च सदन की उच्चता बनाए रखना अपेक्षित भी है और आवश्यक भी


म.प्र सहित अनेक राज्यों से राज्यसभा उम्मीदवारों के नाम सामने आ गए हैं। इस चुनाव में विभिन्न पार्टियां अपने संख्याबल के मुताबिक प्रत्याशी उतारती हैं। जिस पार्टी के पास  निर्धारित कोटे से अधिक मत होते हैं वह या तो दूसरी पार्टी में सेंध लगाकर अपने अतिरिक्त प्रत्याशी को जिताने का प्रयास करती है या  किसी धनकुबेर या अन्य हस्ती के साथ सौदेबाजी कर लेती है। राज्यसभा संसद का स्थायी सदन है। इसे उच्च सदन भी कहा जाता है । इसका गठन उन लोगों के लिए किया गया था जो पूर्णकालिक राजनीति तो नहीं करते किंतु देश को उनके योगदान की ज़रूरत होती है। ऐसे लोग चूंकि चुनाव लड़ना पसंद नहीं करते और लड़ते भी हैं तो जीत नहीं पाते ,  लिहाजा विभिन्न पार्टियां अपनी पसंद के इन लोगों को राज्यसभा में लाती हैं। कुछ विशिष्ट गैर राजनीतिक हस्तियों को राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत भी किया जाता है।  राज्यसभा सदस्यों का कार्यकाल 6 वर्ष का होता है । बीते एक - दो दिनों में जिन उम्मीदवारों के नाम सामने आए उनमें कांग्रेस नेत्री सोनिया गांधी और भाजपा अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा भी हैं। सपा ने फिल्म अभिनेत्री जया बच्चन को फिर अवसर दिया तो भाजपा ने महाराष्ट्र में कांग्रेस से दो दिन पहले आए अशोक चव्हाण को प्रत्याशी बना दिया । म.प्र में केंद्रीय मंत्री डा.मुरुगन भी भाजपा की सूची में है जो मूलतः तमिलनाडु के हैं किंतु वहां भाजपा के पास आवश्यक  संख्या बल न होने से उन्हें दूसरी बार यहां से राज्यसभा भेजा जा रहा है। तृणमूल कांग्रेस द्वारा सागरिका घोष नामक महिला पत्रकार को उच्च सदन भेजने की जानकारी भी आई जो प्रख्यात पत्रकार राजदीप सरदेसाई की धर्मपत्नी हैं। कुछ केंद्रीय मंत्री भी उनके मूल राज्य की बजाय अन्य राज्य से उतारे जा रहे हैं। लेकिन इससे हटकर प्रश्न ये है कि राज्यसभा जिस उद्देश्य के लिए बनाई गई थी , क्या प्रत्याशी चयन करते समय राजनीतिक पार्टियां उसका ध्यान रखती हैं ? अभी तक जो नाम विभिन्न पार्टियों के सामने आए हैं उनमें से अनेक ऐसे हैं जो सिर्फ इसलिए नहीं चौंकाते क्योंकि वे अनजान चेहरे हैं या सक्रिय राजनीति से उनका वास्ता नहीं बल्कि इसलिए क्योंकि उनका कृतित्व इस सदन के अपेक्षित मापदंड के  मुताबिक अपर्याप्त  लगता है। समाज के पिछड़े , वंचित और दलित वर्ग के ऐसे लोगों को राज्यसभा में लाना तो समझ में आता है जो भले ही प्रचार से दूर रहकर समाज की भलाई हेतु कार्य करते रहे हों , परंतु राजनीतिक सौदेबाजी और जातिगत वोटबैंक को साधने के लिए किसी को उच्च सदन में लाना औचित्यहीन है। देश की राजनीति चूंकि जाति के जंजाल में बुरी तरह उलझकर रह गई है इसलिए प्रत्येक राजनीतिक दल के भीतर जाति आधारित दबाव समूह बन गए हैं । अनेक ऐसे व्यक्तियों को , जिनके नाम और उपनाम से भले पता न चले परंतु उम्मीदवार बनाने के साथ ही उनकी जाति की जानकारी दे दी जाती है। ऐसा करने से उस जाति विशेष के लोग खुश होते हों किंतु राज्यसभा सांसद बन जाने के बाद व्यक्ति पर जाति की छाप लगने से अन्य वर्ग उससे छिटकने लगते हैं । ये देखते हुए बेहतर होगा राजनीतिक दल यदि पिछड़े ,  दलित या आदिवासी वर्ग के किसी उम्मीदवार को मैदान में उतारते हैं तो जाति के बजाय उसके सामाजिक योगदान का उल्लेख होना चाहिए। मौजूदा  केंद्र सरकार द्वारा पद्म पुरस्कारों के लिए अनेक ऐसे गुमनाम व्यक्तियों का चयन किया गया जो चुपचाप समाज की बेहतरी के लिए काम करते रहे।  लेकिन उनकी जाति या समुदाय का बखान न करते हुए केवल उनके कारनामों को प्रचारित करने से उनके प्रति स्वप्रेरित सम्मान उत्पन्न होता है। इसी तरह राज्यसभा के लिए विभिन्न राजनीतिक दलों द्वारा जिन उम्मीदवारों का चयन किया जाता है उनकी जाति की बजाय राजनीति के अलावा भी सामाजिक जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान को  प्रचारित किया जाए तो वे सीमित दायरे से निकलकर पूरे समाज के लिए सम्मानित बन सकते हैं। जाति के नाम पर चल रहे क्षेत्रीय दलों से तो इस बारे में कोई अपेक्षा करना व्यर्थ है किंतु भाजपा और कांग्रेस को तो कम से कम उम्मीदवारों की जाति के बजाय  शैक्षणिक और पेशेवर योग्यता के अलावा सामाजिक जीवन में योगदान को चयन का आधार बनाना चाहिए। समय आ गया है जब लोकसभा और राज्यसभा के स्वरूप में अंतर स्पष्ट नजर आए। संसद के उच्च सदन की उच्चता बनाए रखना संवैधानिक दृष्टि से अपेक्षित ही नहीं आवश्यक भी है।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 14 February 2024

अबू धाबी में हिन्दू मंदिर का शुभारंभ राष्ट्रीय गौरव का विषय



अबू धाबी में स्वामीनारायण संप्रदाय के  भव्य मंदिर का आज शुभारंभ हो रहा है। प्रधानमंत्री इस आयोजन के लिए गत दिवस वहां पहुंच गए। उन्होंने इस बारे में जो जानकारी दी वह सुनकर वाकई सुखद आश्चर्य हुआ क्योंकि संयुक्त अरब अमीरात में हिन्दू धर्म के अनुसार सार्वजनिक रूप से पूजा - पाठ विशेष रूप से मूर्ति पूजा की अनुमति नहीं थी। लेकिन बीते कुछ दशकों में कुछ छोटे - छोटे देशों के इस समूह में भारतीयों की संख्या जिस तेजी से बढ़ी उसने उन्हें अमीरात की जरूरत बना दिया। ये कहना गलत नहीं है कि यदि ये भारतीय वापस आ जाएं तो वहां की व्यवस्था गड़बड़ा जायेगी। व्यवसायी वर्ग के अतिरिक्त भी दुबई और अबूधाबी में श्रमिक , तकनीशियन , ड्राइवर जैसे कामों में भारतीय बड़ी संख्या में कार्यरत हैं। इनके अलावा इन्फ्रा स्ट्रक्चर के कार्यों में भी भारतीय कंपनियों की काफी सहभागिता है। भारत और संयुक्त अरब अमीरात के बीच आपसी व्यापार भी लगातार बढ़ता जा रहा है। भारत से लाखों सैलानी हर साल दुबई  जाते हैं। इस प्रकार संयुक्त अरब अमीरात के साथ हमारे रिश्ते व्यापार और कूटनीति से ऊपर भावनात्मक स्तर पर पहुंच गए हैं। आज जिस मंदिर का शुभारंभ हो रहा है उसके लिए अबू धाबी के शासक ने बड़ी ही उदारता से भूमि प्रदान की जो किसी इस्लामिक देश में कल्पनातीत  है। इसका श्रेय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को दिया जाना पूरी तरह सही होगा क्योंकि उन्होंने अपने दस वर्ष के कार्यकाल में  संयुक्त अरब अमीरात के शाही परिवारों से आत्मीय रिश्ते बना लिए। यही वजह है कि पाकिस्तान और भारत के बीच किसी भी प्रकार के विवाद की स्थिति में वे हमारे पक्ष में खड़े नजर आए। निश्चित रूप से इसके पीछे उन लाखों भारतीयों का भी योगदान है जिन्होंने  अपने परिश्रम और सदाचरण से वहां की सरकार और समाज का विश्वास अर्जित किया। दुनिया के अनेक देशों में स्वामी नारायण संप्रदाय के भव्य मंदिर बने हैं किंतु अबूधाबी का यह मंदिर उन लोगों के मुंह पर तमाचा है जो भारत में मंदिर बनाए जाने पर नाक सिकोड़ते हैं। इसी के साथ ये मुस्लिम कट्टरपंथियों के लिए भी सबक है जो अतीत में मंदिरों को तोड़कर बनाई गई मस्जिदों पर हिंदुओं के दावे को स्वीकार करने की सौजन्यता दिखाने के बजाय उसमें अड़ंगे लगाया करते हैं।  अयोध्या में गत 22 जनवरी को राममंदिर के शुभारंभ के अवसर पर समूचे विश्व के सनातन प्रेमियों ने हर्षोल्लास मनाया किंतु मुस्लिम समाज का बड़ा वर्ग  कोपभवन में बैठा रहा। उसके प्रवक्ता भी अपनी खीझ व्यक्त करने से बाज नहीं आए। बाबरी ढांचे को दोबारा खड़ी करने जैसी डींगें भी हांकी गईं। पाकिस्तान ने भी राममंदिर के निर्माण को लेकर बकवास करते हुए भारत के मुसलमानों को भड़काने  के उद्देश्य से बयान जारी किए। यहां तक कि संरासंघ तक में शिकायत की। लेकिन अबूधाबी के मुस्लिम शासकों द्वारा प्रदत्त 27 एकड़ के भूखंड पर  बना यह मंदिर इस्लामिक कट्टरपंथियों के लिए जबरदस्त संदेश है। हालांकि सोशल मीडिया के विभिन्न मंचों पर अनेक प्रतिक्रियाओं में संयुक्त अरब अमीरात के हुक्मरानों की  आलोचना करते हुए कहा जा रहा है कि अरब की धरती पर हिन्दू मंदिर के निर्माण की अनुमति विनाश की शुरुआत है। किसी ने यहां तक टिप्पणी कर डाली कि ऐसा लगता है जैसे इस्लामिक जगत में भी हिंदुत्व को स्वीकार किया जाने लगा है। लेकिन इस मंदिर का विरोध करने वाले  कट्टरपंथियों को ये सोचना चाहिए कि  सारी दुनिया में आतंकवाद के कारण मुस्लिमों को संदेह की नजर से देखा जाता है । यूरोप के जिन देशों ने सीरिया संकट के बाद अरब देशों से भाग कर आए लोगों को मानवीय आधार पर शरण दी वे आतंकवाद का दंश भोगने के बाद अब उनको निकाल बाहर करने की सोचने लगे हैं। दूसरी तरफ  दुनिया भर में फैले हिंदुओं के साथ ऐसी समस्या उत्पन्न नहीं हुई । अबू धाबी में बना मंदिर उनकी इसी साख का प्रमाण है । वैसे तो इंडोनेशिया और मलेशिया जैसे इस्लामिक देशों में भी हिन्दू मंदिर प्राचीनकाल से हैं परंतु किसी अरब देश में इतना भव्य नया मंदिर बनना भारत की कूटनीतिक से अधिक सांस्कृतिक विजय है । संयुक्त अरब अमीरात ने  इस्लामिक कानून से चलने वाली सत्ता होने के बावजूद अपने देश को विकास के रास्ते पर आगे बढ़ाने हेतु उदारवादी रवैया दिखाते हुए पूरी दुनिया से लोगों को वहां आकर काम करने और कमाने का  अवसर दिया। लेकिन हिन्दू मंदिर बनाने के लिए पहले अनुमति और फिर भूमि प्रदान करना इस बात का प्रमाण है कि वहां के शासक भारत और भारतीयों के महत्व को महसूस कर उनके प्रति सम्मान का भाव रखते हैं। इस मंदिर को इसीलिए धर्म विशेष से न जोड़कर राष्ट्रीय गौरव के तौर पर देखा जाना चाहिए। 
 

- रवीन्द्र वाजपेयी 


Tuesday, 13 February 2024

भारत की शानदार कूटनीतिक सफलता


कतर में जासूसी के आरोप में गिरफ्तार 8 पूर्व भारतीय नौसेना अधिकारियों को अगस्त 2022 में  गिरफ्तार करने के बाद गत वर्ष अक्टूबर में मृत्युदंड दिए जाने की जानकारी आई तो परिवारजनों के अलावा पूरा देश चिंता में पड़ गया। केंद्र सरकार पर जनता और विपक्ष का दबाव भी आने लगा। इसके बाद बिना शोर मचाए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने प्रयास शुरू किए। पहली सफलता मृत्यदंड को आजीवन कारावास में बदले जाने के तौर पर मिली। उसके बाद  विदेश मंत्री एस.जयशंकर , राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल और कतर में रह चुके प्रधानमंत्री कार्यालय में पदस्थ विदेश सेवा के एक पूर्व अधिकारी द्वारा बनाई कार्ययोजना के कारण कतर के अमीर द्वारा उक्त सभी को माफी दे दी गई और कल वे भारत लौट भी आए। समूचे अभियान को जिस कुशलता से संचालित किया गया वह परिपक्व कूटनीति का शानदार उदाहरण है। 135 करोड़ की आबादी वाले देश के कुछ नागरिकों की जान किसी अन्य देश में संकट में पड़ने पर सामान्य दृष्टि से सरकार उसे प्रतिष्ठा का विषय बनाए ये जरूरी नहीं लगता । लेकिन सही सोच ये है कि देश के बाहर रह रहे हर भारतीय  की चिंता करना सरकार का कर्तव्य है। जो पूर्व नौसेना अधिकारी कतर में गिरफ्तार हुए वे पेशेवर अपराधी नहीं थे। एक निजी कम्पनी के लिए वहां काम करने के दौरान वे किसी गलतफहमी वश ही गिरफ्तार हुए होंगे। कतर में इस्लामिक कानून लागू होने से बेहद सख्ती है। लेकिन भारत सरकार की प्रशंसा करनी होगी जिसके प्रयासों से उनको फांसी के तख्ते से सुरक्षित वापस लाया जा  सका । देखने में भले ये छोटी सी बात लगे किंतु इससे भारत की प्रतिष्ठा के साथ ही कूटनीतिक वजनदारी भी प्रमाणित हुई और आम भारतीय का आत्मविश्वास भी बढ़ा है। प्रधानमंत्री और उनके नेतृत्व में कार्यरत सभी लोग इस कामयाबी के लिए अभिनंदन के पात्र हैं।


- रवीन्द्र वाजपेयी

म.प्र का अंतरिम बजट : मोहन सरकार की अच्छी शुरुआत


म.प्र की डा. मोहन यादव सरकार ने गत दिवस 1 अप्रैल से 31 जुलाई तक की अवधि के लिए रु.1,45,229 करोड़ का अंतरिम बजट प्रस्तुत किया। हालांकि प्रदेश सरकार चाहती तो वित्तीय वर्ष 2024 - 25 के लिए पूर्ण बजट भी ला सकती थी।लेकिन लोकसभा चुनाव नजदीक होने की वजह से  चूंकि केंद्र सरकार द्वारा भी अंतरिम बजट पेश किया गया इसीलिए म.प्र सरकार को भी वैसा ही करना पड़ा । दरअसल  केंद्र सरकार द्वारा राज्यों को विभिन्न मदों में दी जाने वाली राशि का प्रावधान पूर्ण बजट में ही किया जाएगा । ऐसे में इस अंतरिम बजट को चार माह तक के लिए तदर्थ व्यवस्था के तौर पर ही देखा जाना चाहिए। लेकिन ये  बजट पूरे साल के प्रारंभिक एक तिहाई हिस्से को प्रभावित करने वाला है इसलिए इसकी समीक्षा करना औचित्यपूर्ण है। विशेष रूप से इसलिए भी क्योंकि मुख्यमंत्री डा.यादव की सरकार का यह प्रथम बजट होने से उनकी आर्थिक नीतियों का एहसास करवाने वाला है। उस दृष्टि से देखें तो इस बजट पर मोदी की गारंटी के साथ ही विधानसभा चुनाव में भाजपा द्वारा पेश किए संकल्प पत्र की छाया स्पष्ट तौर पर दिखाई देती है। लाड़ली बहना योजना को जारी रखने के बारे में विपक्ष शुरू से संदेह जताता रहा है। लेकिन मोहन सरकार ने लगातार दो महीनों से 10 तारीख को उक्त योजना की राशि लाभार्थी महिलाओं के खाते में जमा करवाकर विपक्ष के प्रचार को गलत साबित कर दिया । साथ ही अंतरिम बजट से इस बात की पुष्टि कर दी कि शिवराज सरकार द्वारा प्रारंभ जनकल्याण की सभी योजनाएं जारी रहेंगी। इसी के साथ ही केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा स्वीकृत सभी जनहितैषी और विकास संबंधी योजनाओं पर प्रदेश में अमल लिए जाने का प्रावधान भी किया गया है। इसमें दो राय नहीं हैं कि म.प्र पर काफी कर्ज है । इसके बाद भी सरकार ने  86 हजार करोड़ कर्ज लेने का इरादा जताया है जो निश्चित तौर पर चिंता का कारण है। प्रदेश सरकार को इस बारे में गंभीरता से सोचना चाहिए। भले ही ऋण , रिजर्व बैंक द्वारा स्वीकृत सीमा के भीतर हो किंतु उसके ब्याज की अदायगी का बोझ अंततः प्रदेश के विकास को प्रभावित करता है। इस अंतरिम बजट की सबसे अच्छी बात ये है कि इसमें यदि किसी नई योजना की घोषणा नहीं की गई तो नया कर भी नहीं लगाया गया। हालांकि विपक्ष ने इसे निराशजनक बताया है किंतु वर्तमान हालात में वित्तमंत्री का दायित्व संभाल रहे उप मुख्यमंत्री जगदीश देवड़ा इससे बेहतर और कुछ नहीं कर सकते थे। संक्षेप में कहें तो म.प्र का अंतरिम बजट प्रधानमंत्री द्वारा वर्णित  गरीब, युवा ,महिला और किसान नामक चार जातियों पर केंद्रित है। इसलिए डा.मोहन यादव सरकार की अच्छी शुरुआत कहना हर दृष्टि से सही होगा।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 12 February 2024

मुस्लिम समाज को प्रशांत किशोर की बात को गंभीरता से लेना चाहिए


चुनाव विश्लेषक से राजनेता बनने की ओर बढ़ रहे प्रशांत किशोर बिहार में घूम - घूमकर जनता से सीधा संपर्क कर रहे हैं। राजनीति और राजनेताओं के बारे में बेबाक विचार व्यक्त करने में भी वे परहेज नहीं करते। उनके साक्षात्कार समाचार माध्यमों में छाए रहते हैं। 2014 में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने पर श्री किशोर प्रकाश में आए जिन्होंने भाजपा की रणनीति बनाई थी। लेकिन ज्यादा दिनों तक ये रिश्ता नहीं चला और कुछ माह बाद हुए बिहार विधानसभा चुनाव में प्रशांत किशोर ने नीतीश कुमार    का दामन पकड़ा और उनका चुनाव अभियान संचालित कर उन्हें जितवाने में मुख्य भूमिका निभाई। वे मुख्यमंत्री के सलाहकार और जनता दल (यू) में भी शामिल हुए किंतु वहां भी पटरी नहीं बैठी तो फिर चुनाव रणनीतिकार बनकर ममता बैनर्जी के अभियान में शामिल होकर उनको जबरदस्त जीत दिलवाई । इसके अलावा भी कुछ राज्यों में विभिन्न पार्टियों को सेवाएं देते रहे किंतु बीते एक दो सालों से जन सुराज अभियान नामक संगठन बनाकर बिहार के कोने - कोने में घूमकर लोगों को व्यवस्था की बुराइयों के साथ उनके कर्तव्यों का स्मरण करवा रहे हैं । देर सवेर राजनीतिक दल बनाकर चुनाव मैदान में उतरने का भी इरादा वे व्यक्त कर चुके हैं। इसी सिलसिले में उन्होंने मुस्लिम समुदाय के बीच कुछ ऐसी बातें कहीं जो निश्चित रूप से आंखें खोलने वाली हैं। उन्होंने साफ तौर पर ये कहा कि मुस्लिमों की वर्तमान दुरावस्था का कारण  भाजपा नहीं हैं । ये कहना भी गलत होगा कि उनको लालू या अन्य भाजपा विरोधी संगठनों ने ठगा है।  असलियत ये है कि मुसलमानों ने अपने रहनुमा चुनने में भारी भूल की जिसका खामियाजा वे भुगत रहे हैं। उन्होंने याद दिलाया कि मोहम्मद पैगंबर साहब ने  नसीहत दी थी कि जिस कौम को अपने रहनुमाओं की समझ न हो वह मुसीबत में फंसती है। उनके कहने का आशय ये था कि मुसलमानों में डर पैदा करने वाली पार्टियों ने उनके वोट तो जमकर बटोरे लेकिन उनकी भलाई के बारे में नहीं सोचा। यही बात असदुद्दीन ओवैसी भी अक्सर कहा करते हैं कि मुसलमानों को कांग्रेस , सपा और राजद जैसे दलों का पिछलग्गू बनने की बजाय अपना स्वयं का नेतृत्व विकसित करना चाहिये जो उनकी स्थिति का आकलन करते हुए उनकी जरूरतों को जमीनी स्तर पर समझकर पूरा करे। ये बात बिलकुल सही है कि आजादी के 76 साल बाद भी मुसलमान मुख्यधारा से अलग - थलग बने हुए हैं। उनके बीच से राजनीतिक नेता तो बहुत सारे निकले किंतु उनका अपना स्वतंत्र अस्तित्व नहीं बन सका। कहने को तो देश के राष्ट्रपति के अलावा केंद्र तथा राज्यों में तमाम मंत्री मुस्लिम समाज से बने । उच्च और सर्वोच्च न्यायालय में न्यायपालिका के उच्च पदों पर  भी अनेक मुस्लिम आसीन रहे। कला और संस्कृति के क्षेत्र में भी मुस्लिम समाज से बड़ी - बड़ी हस्तियां निकलीं किंतु राजनीतिक नेतृत्व की अग्रिम पंक्ति में उन्हें स्थान नहीं मिला। जिन राजनीतिक दलों ने उनका हितचिंतक बनने का दिखावा किया उनका स्वार्थ केवल उनके वोट कबाड़ने तक सीमित रहा।।बाबरी कांड के बाद  कांग्रेस से नाराज होकर मुस्लिम समुदाय ने मुलायम ,  लालू , ममता और पवार जैसे नेताओं को अपना भाग्यविधाता बनाया । इन नेताओं ने मुसलमानों के मन में रास्वसंघ और भाजपा के विरुद्ध जहर तो खूब भरा लेकिन उनके सामाजिक , शैक्षणिक और आर्थिक विकास की दिशा में ऐसा कुछ भी नहीं किया जिससे वे बदहाली से बाहर आ पाते। उल्टे उन्हें और धर्मांध बनाकर मुल्ला या मौलवियों की मानसिक गुलामी करने की ओर धकेल दिया। नतीजा ये हुआ कि मुसलमान राजनीति का मोहरा बनकर किनारे लगा दिया गया। मुस्लिम वोट बैंक कभी जीत की गारंटी हुआ करता था किंतु उत्तरप्रदेश सहित अनेक राज्यों में हुए चुनावों में मुसलमानों की गोलबंदी भी बेअसर साबित होने लगी है। इसका कारण हिंदुओं का ध्रुवीकरण है। इसीलिए अब कांग्रेस जैसी पार्टी भी खुद को हिंदू हितचिंतक साबित करने में लगी है। अरविंद केजरीवाल मंच से हनुमान चालीसा और ममता बैनर्जी चंडी पाठ करते हुए खुद को हिंदू दिखाने का दावा करती हैं । राहुल गांधी और प्रियंका वाड्रा मंदिरों में जाकर पूजा - पाठ करते फोटो प्रचारित करते दिखाई देते हैं। कमलनाथ ने खुद को हनुमान भक्त घोषित कर रखा है।  सभी को समझ आ रहा है कि अब हिंदुत्व ही राजनीतिक सफलता का  मूल मंत्र है। इसके लिए मुस्लिमों को महज वोट बैंक बनाकर रखने  वाले राजनेता ही जिम्मेदार हैं । प्रशांत किशोर ने मुस्लिम समाज को इन्हीं से बचने की समझाइश दी है। हालांकि मुसलमानों में भी अब  एक वर्ग ऐसा  हो गया है जो इस्लाम के नाम पर उन्हें मुख्य धारा से अलग किए जाने के  षडयंत्र को समझकर उसके विरुद्ध सोचने और बोलने लगा है किंतु अधिकांश मुस्लिम समाज अभी भी मुल्लाओं और मौलवियों के इशारों पर नाचता देखा जा सकता है। यहां तक कि अनेक पढ़े - लिखे मुसलमान भी धर्मांधता के शिकंजे में फंसे हुए हैं। श्री किशोर चूंकि बिना लाग - लपेट के बात करते हैं इसलिए उन्होंने साफ शब्दों में मुस्लिम समाज को समयानुकूल सलाह दे डाली। उनका जुड़ाव किसी पार्टी या विचारधारा से नहीं होने से उनकी बात निष्पक्ष है। यदि मुसलमान इस बारे में गंभीरता से सोचें तो उनका भविष्य संवर सकता है।


- रवीन्द्र वाजपेयी