Sunday, 25 February 2024

उप्र में 80 फीसदी सीटों पर कांग्रेस के न लड़ने से कार्यकर्ता और समर्थक निराश



उ.प्र में कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के बीच लोकसभा चुनाव की सीटों के बंटवारे की गुत्थी सुलझने को इंडिया गठबंधन की बड़ी सफलता प्रचारित किया जा रहा है। इसके अंतर्गत अखिलेश यादव ने कांग्रेस को महज 17 सीटें दी हैं जबकि वह 21 मांग रही थी। इस समझौते के बाद कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के बीच दिल्ली , हरियाणा , गुजरात और गोवा में भी सीटों का बंटवारा तय हो गया। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण राज्य उ.प्र ही है जिसके बारे में कहा जाता है कि दिल्ली की सत्ता का रास्ता लखनऊ होकर जाता है। 80 सीटों वाले इस राज्य ने देश को सबसे अधिक प्रधानमंत्री दिए। स्व अटल बिहारी वाजपेयी और नरेंद्र मोदी क्रमशः म.प्र और गुजरात के मूल निवासी होने के बावजूद प्रधानमंत्री तभी बने जब उन्होंने उ.प्र से लोकसभा चुनाव जीता। और ये भी कि इस राज्य में ज्यादा सीटें जीतने पर ही भाजपा को केंद्र की सत्ता मिली। 2014 की मोदी लहर में भाजपा को यहां 71 और 2019 में 62 सीटें मिली थीं जिसके कारण वह स्पष्ट बहुमत हासिल करने में कामयाब हुई। 

       इस बार विपक्ष का प्रयास है कि भाजपा को उ.प्र में घेरकर उसकी सीटें कम की जाएं ताकि वह बहुमत से पीछे रहे। शुरुआत में इंडिया गठबंधन में सपा और कांग्रेस के अलावा रालोद भी था । लेकिन जयंत चौधरी अचानक इससे दूर हो गए। बहरहाल , सपा और कांग्रेस द्वारा सीटें बांटने के बाद इंडिया की स्थिति तो स्पष्ट हो गई किंतु अभी भाजपा , अनुप्रिया पटेल , जयंत चौधरी , ओमप्रकाश राजभर और निषाद पार्टी के बीच सीटों का आवंटन नहीं होने से एनडीए की मोर्चेबंदी साफ नहीं हो सकी। हालांकि उसमें अधिकतर सीटें भाजपा ही लड़ेगी और ज्यादा से ज्यादा 10 सीटें सहयोगियों को दी जाएंगी। दूसरी तरफ राष्ट्रीय पार्टी होने के बावजूद कांग्रेस सबसे ज्यादा सीटों वाले राज्य में मात्र 20 फीसदी सीटों पर लड़ेगी जिनमें केवल रायबरेली उसके पास है। जो 17 सीटें सपा ने उसे दी हैं उनमें आज की स्थिति में कांग्रेस के जीतने की संभावनाएं बहुत ही कम हैं । सबसे बड़ी बात ये हुई की मात्र 17 सीटें मिलने के कारण बाकी की 63 में कांग्रेस परिदृश्य से बाहर हो गई। वैसे भी उसका मत प्रतिशत चुनाव दर चुनाव घुटता चला गया जिससे संगठन भी बेहद कमजोर हो गया। इसीलिए ये माना जा रहा है कि वह पांच सीटें जीत ले तो आश्चर्य होगा। रायबरेली से सोनिया गांधी के न लड़ने के फैसले के बाद अब तो उसे लेकर भी पार्टी निराश है। 

      हालांकि अखिलेश भी कांग्रेस की खस्ता हालत से परिचित हैं और इसीलिए वे उसके साथ गठबंधन से हिचक रहे थे । लेकिन जयंत चौधरी के भाजपा की ओर झुकने के बाद सपा प्रमुख कांग्रेस को अपने साथ जोड़ने बाध्य हो गए । लेकिन इस गठजोड़ के बाद भी भाजपा को रोक पाना इंडिया के लिए कठिन है क्योंकि सपा और बसपा 2019 में जब मिलकर लड़े तब दोनों ने मिलकर 15 सीटें जीती थीं । इस बार बसपा एकला चलो की नीति अपनाए हुए है। ये भी कहा जा रहा है कि ऐसा वह भाजपा के दबाव में कर रही है। चूंकि कांग्रेस का समर्थन या विरोध चुनाव परिणाम को प्रभावित करने लायक बचा नहीं इसलिए सपा भी बुरी तरह फंस गई है। 2022 के विधानसभा चुनाव में उसके साथ रहे ओमप्रकाश राजभर और स्वामी प्रसाद मौर्य साथ छोड़ चुके हैं। वहीं पल्लवी पटेल भी खुलकर विरोध कर रही हैं। भाजपा ने दलित और ओबीसी वर्ग में अपनी पकड़ को जहां मजबूत किया वहीं राममंदिर में प्राण प्रतिष्ठा होने के बाद सवर्ण मतदाता थोक के भाव उसके साथ नजर आ रहा है। एक बात और जो इंडिया के साथ ही सपा को भी नुकसान पहुंचा रही है वह है किसी वरिष्ट नेता का न होना। 2019 में मुलायम सिंह की भौतिक उपस्थिति के कारण सपा को कुछ राहत थी जिससे वह इस बार वंचित है। दूसरी तरफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अलावा राज्य के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का आभामंडल भी पूरे प्रदेश में भाजपा की ताकत है। 

        दरअसल सपा के साथ सीटों का बंटवारा कांग्रेसजनों को ही नागवार गुजर रहा है। पूर्व विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद ने तो खुलकर अपनी नाराजगी जाहिर भी कर दी है जबकि अन्य कुछ नेता दबी जुबान असंतोष जताते हुए अलग रास्ता तलाश रहे हैं। वैसे भी उ.प्र में पार्टी के पास कोई बड़ा चेहरा बचा ही नहीं है । यदि अमेठी और रायबरेली से गांधी परिवार का कोई सदस्य नहीं लड़ा तब इस राज्य में उसका सफाया होने की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता । 80 फीसदी लोकसभा सीटों पर अपना प्रत्याशी नहीं होने से उसके कार्यकर्ता और समर्थक दिशाहीन होकर रह गए हैं। हालांकि राजनीति के जानकार ये भी कह रहे हैं कि अखिलेश ने कांग्रेस के साथ सीटों का तालमेल कर एक तीर से कई निशाने साध लिए। पहला तो बसपा को इंडिया में आने से रोक लिया और दूसरा 67 सीटों पर कांग्रेस के विरोध की संभावना को खत्म करने में भी कामयाब हो गए। कुल मिलाकर इस समझौते से समाजवादी पार्टी भले ही अपनी चार - पांच सीटें बचाने में कामयाब हो जाए किंतु कांग्रेस के हाथ खाली ही रहेंगे। और इसके लिए गांधी परिवार की अकड़ ही जिम्मेदार है। जो काम प्रियंका वाड्रा ने चार दिन पहले किया वह हफ्ते दो हफ्ते पहले कर लिया जाता तब शायद अखिलेश न्याय यात्रा के उ.प्र में घुसते ही उसके साथ जुड़ते जिसका फायदा इंडिया को होता। लेकिन सीटों का बंटवारा तब हुआ जब यात्रा राज्य से बाहर निकलने को है। आगरा में अखिलेश का उसमें शामिल होना भी महज चेहरा दिखाना होगा। 

      उ.प्र में कांग्रेस का पक्ष प्रभावशाली ढंग से रखने वाले आचार्य प्रमोद कृष्णम के भाजपा के साथ जुड़ने से भी पार्टी को बड़ा झटका लग गया। लोकसभा चुनाव नजदीक आते तक कांग्रेस से नेताओं के बाहर निकलने सिलसिला जारी रहने की संभावना बढ़ती जा रही है। कांग्रेस समर्थकों का मानना है कि यदि पार्टी अकेले दम पर लड़ती तो पूरे प्रदेश में उसकी उपस्थिति महसूस की जाती । उस स्थिति में भी वह अमेठी और रायबरेली के अलावा और किसी सीट की उम्मीद नहीं कर सकती थी और सपा से गठजोड़ के बाद भी वह वहीं अटकी हुई है।

- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 24 February 2024

कांग्रेस के लिए भाजपा से ज्यादा खतरनाक है आम आदमी पार्टी




उ.प्र में  सपा के साथ सीट बंटवारे के बाद कांग्रेस ने आम आदमी पार्टी के साथ दिल्ली , हरियाणा और गुजरात में  लोकसभा चुनाव मिलकर लड़ने का निर्णय कर लिया। दिल्ली में कांग्रेस 3 और आप 4 सीटों पर लड़ेगी। जबकि हरियाणा में कांग्रेस ने 1 और गुजरात में 2 सीटें उसके लिए छोड़ी हैं। कांग्रेस पंजाब में भी तालमेल चाहती थी किन्तु आम आदमी पार्टी  वहां एक भी सीट छोड़ने राजी नहीं हुई। इससे लगता है  गरज आम आदमी पार्टी की नहीं बल्कि कांग्रेस की है । दिल्ली , गुजरात और हरियाणा में 2919 में कांग्रेस- भाजपा के बीच मुकाबला था। वहीं पंजाब में  कांग्रेस ने  8 सीटें जीतने के साथ ही 40 प्रतिशत मत हासिल किए। लेकिन आम आदमी पार्टी द्वारा एक भी सीट न दिया जाना  दर्शाता है कि उसकी नजर में कांग्रेस वहां अस्तित्वहीन हो चुकी है। ऐसे में कांग्रेस को दिल्ली में  ज्यादा की मांग करनी थी। लेकिन  लगता है वह पिछली गलतियां  दोहराने पर अमादा है। 2014 के दिल्ली विधानसभा चुनाव में भाजपा सबसे बड़ा दल थी किंतु कांग्रेस ने 8 विधायकों का समर्थन देकर अरविंद केजरीवाल को मुख्यमंत्री बनवा दिया। कुछ महीनों बाद कांग्रेस द्वारा समर्थन वापस लिए जाने पर सरकार गिर गई। दोबारा हुए चुनाव में कांग्रेस का सफाया हो गया।और भाजपा भी लुढ़ककर 3 पर आ गई। लेकिन 2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस दिल्ली की सभी सीटों पर दूसरे स्थान पर रही और आम आदमी पार्टी की जमानतें जप्त हो गईं । फिर 2020 के विधानसभा और उसके बाद  दिल्ली नगर निगम के चुनाव में भी आम आदमी पार्टी ने शानदार जीत हासिल की। वहीं कांग्रेस घुटनों के बल चलने की स्थिति में ही है। हालांकि दोनों भाजपा की विरोधी हैं और नरेंद्र मोदी को किसी भी कीमत पर हटाना चाहती हैं। लेकिन कांग्रेस  भूल रही है कि दिल्ली और पंजाब में उसकी दुर्गति के लिए भाजपा से ज्यादा आम आदमी पार्टी जिम्मेदार है।  पंजाब में भगवंत सिंह मान की सरकार  अनेक कांग्रेस नेताओं पर भ्रष्टाचार करने का आरोप लगाते हुए कार्रवाई कर रही है। वहीं दिल्ली में कांग्रेस ने शराब घोटाले पर केजरीवाल सरकार को कठघरे में खड़ा करते हुए मनीष सिसौदिया की गिरफ्तारी का स्वागत किया था। दोनों राज्यों के कांग्रेस नेता आम आदमी पार्टी  के साथ गठबंधन का खुलकर विरोध करते रहे । फिर भी दिल्ली की  4 तथा हरियाणा की 1 सीट उसके लिए छोड़ दी गईं। कांग्रेस के लिए आगामी लोकसभा चुनाव जीवन - मरण का प्रश्न  है।  इसीलिए वह क्षेत्रीय दलों के समक्ष  झुकने तैयार हो रही है। लेकिन ये चुनाव आम आदमी पार्टी का भविष्य भी तय करेगा जो राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा का विकल्प बनने की कोशिश में  है जिसका सबसे अधिक नुकसान कांग्रेस को होने की आशंका है। पूरे देश  पर नजर डालें तो कांग्रेस आज भी राष्ट्रीय स्तर की पार्टी है।  भाजपा भले ही केंद्र के साथ अनेक राज्यों में सत्तासीन हो किंतु अनेक राज्यों में  उसकी उपस्थिति नाममात्र की है । ऐसे में आम आदमी पार्टी के विस्तार का सीधा नुकसान कांग्रेस को ही होने वाला है। इसलिए  सीटों का बंटवारा करने से पहले कांग्रेस को ये बात सोचनी चाहिए थी कि शराब घोटाले के सिलसिले में  श्री सिसौदिया और संजय सिंह जेल में न होते तब क्या श्री केजरीवाल उसे दिल्ली की एक भी सीट देते? पंजाब में एकला चलो की नीति अपनाकर उन्होंने अपनी  नीयत  स्पष्ट कर दी। दरअसल कांग्रेस को दिल्ली की सभी सीटों के लिए इस आधार पर अड़ना था कि 2019 में उसे 22 फीसदी से ज्यादा मत मिले थे जबकि आम आदमी पार्टी को 1 प्रतिशत से भी कम। ऐसा करने से  उसे पंजाब की कुछ सीटें मिल सकती थीं  । लेकिन पार्टी का आत्मबल कमजोर हो चुका है। उसके उच्च नेतृत्व को ये बात समझनी चाहिए कि आम आदमी पार्टी  जहां भी मजबूत होगी वहां कांग्रेस का खात्मा होना तय है। 1990 में लालकृष्ण आडवाणी की रथयात्रा रोककर उन्हें गिरफ्तार किए जाने के बाद भाजपा ने  वी.पी. सिंह सरकार से समर्थन वापस ले लिया था । उ.प्र में मुलायम सिंह यादव और बिहार में लालू प्रसाद यादव  की सरकार भी उस कारण खतरे में आ गई । स्व. राजीव गांधी ने समर्थन देकर उन दोनों सरकारों को तो गिरने से बचा लिया लेकिन उसके बाद उ.प्र और बिहार में पार्टी का तम्बू जो उखड़ा तो आज तक दोबारा नहीं लग सका। आम आदमी पार्टी  से भी सबसे ज्यादा नुकसान कांग्रेस को ही हुआ है। ऐसे में उसे पंजाब में भी सीटें मांगनी थीं और यदि श्री केजरीवाल राजी न होते तो दिल्ली में उनको उपकृत करने से इंकार करना था। कांग्रेस को ये बात अच्छी तरह से जान लेना चाहिए कि आम आदमी पार्टी उसके लिए भाजपा से बड़ा खतरा है क्योंकि भाजपा तो सामने से वार करती है जबकि आम आदमी पार्टी उसकी पीठ में छुरा भोंकने में जुटी हुई है।

- रवीन्द्र वाजपेयी 


Friday, 23 February 2024

सपा और कांग्रेस का गठबंधन नेताओं के बीच ही सीमित रहने का अंदेशा


आखिरकार  उ.प्र में समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच लोकसभा चुनाव के लिए सीटों के बंटवारे का मसला सुलझ ही गया। इसके अनुसार कांग्रेस  17 और  63 पर सपा लड़ेगी । जो जानकारी आई उसके अनुसार राहुल गांधी और अखिलेश यादव के बीच पटरी नहीं बैठने के कारण अनिश्चितता बनी हुई थी। अखिलेश ने तो उनकी न्याय यात्रा में शामिल होने तक से  इंकार कर दिया था। लेकिन बात बिगड़ती देख प्रियंका वाड्रा ने श्री यादव से बात की और 21 सीटों की जिद छोड़कर 17 से संतुष्ट होने की पुष्टि कर दी। बताते हैं सपा अध्यक्ष की सांसद पत्नी डिंपल यादव श्रीमती वाड्रा की निकट मित्र हैं। उल्लेखनीय है 2017 के विधानसभा चुनाव में भी अखिलेश और राहुल के बीच सीटों के बंटवारे पर समझौता हुआ था। और तब कांग्रेस ने 100 सीटों पर लड़ने के शर्त स्वीकार कर ली थी। यूपी के दो लड़के नाम से चर्चित उस गठजोड़ के बावजूद भाजपा ने शानदार जीत हासिल की । उस चुनाव के बाद कांग्रेस का जनाधार उ.प्र में और सिकुड़ गया। उसका कारण ये था कि जो 300 विधानसभा सीटें कांग्रेस ने सपा के लिए छोड़ दीं उनमें चुनाव लड़ने के इच्छुक कांग्रेस कार्यकर्ताओं का राजनीतिक भविष्य चौपट हो गया। साथ ही अखिलेश सरकार के दौर में एक जाति विशेष के बढ़ते वर्चस्व के कारण भी कांग्रेस का समर्थक वर्ग नाराज था। परिणामस्वरूप उन 300 सीटों पर पार्टी का कैडर  या तो भाजपा की तरफ चला गया या  निराश होकर घर बैठ गया। इसी तरह कांग्रेस के हिस्से में आईं 100 सीटों पर सपा समर्थकों ने उदासीनता ओढ़ ली। इस प्रकार नेताओं के स्तर पर तो गठजोड़ हो गया और सीटों का बंटवारा भी कर लिया गया किंतु  न तो एक दूसरे के कार्यकर्ताओं में आपसी सामंजस्य  बैठा और न ही प्रतिबद्ध मतदाता ही उस बंटवारे को स्वीकार कर पाए। उस प्रयोग की असफलता के बाद अखिलेश ने 2019 के लोकसभा चुनाव में बुआ और बबुआ नामक दूसरा प्रयोग किया। उसके अंतर्गत सांप और  नेवला जैसी शत्रुता वाली सपा और बसपा साथ आईं । लेकिन उसमें बसपा को तो लाभ मिला किंतु सपा घाटे में रही। चुनाव के बाद फिर दोनों में दूरी बढ़ गई। और 2022 के विधानसभा चुनाव में अखिलेश ने ओमप्रकाश राजभर , स्वामी प्रसाद मौर्य और जयंत चौधरी के साथ गठबंधन करते हुए भाजपा को चुनौती दी। लेकिन पिछली बार से ज्यादा सीटें जीतने के बाद भी योगी सरकार की वापसी नहीं रोकी जा सकी। उसके बाद बिखराव का नया दौर शुरू हुआ जिसके चलते पहले श्री राजभर और बाद में स्वामीप्रसाद सपा से दूर हो गए किंतु सबसे बड़ा झटका लगा जयंत चौधरी द्वारा भाजपा के साथ निकटता कायम करने पर।  उनके दादा चौधरी चरण सिंह को मोदी सरकार द्वारा भारत रत्न दिए जाने के बाद उन्होंने बिना देर लगाए इंडिया गठबंधन से नाता तोड़ लिया।  उसके बाद से अखिलेश के लिए कांग्रेस से समझौता मजबूरी बन गया। यही स्थिति कांग्रेस की भी थी जो उ.प्र के अपने पुश्तैनी गढ़ जीतने लायक भी नहीं बची। सोनिया गांधी के  राज्यसभा सदस्य चुने जाने के बाद रायबरेली में लड़ने योग्य प्रत्याशी पार्टी के पास नहीं है। पहले चर्चा प्रियंका को उतारने की थी लेकिन 2019 में राहुल गांधी को अमेठी में मिली पराजय के कारण गांधी परिवार का आत्मविश्वास डगमगाया हुआ है। ऐसे में सपा और कांग्रेस दोनों के बीच सीटों का बंटवारा होने के बावजूद भाजपा विरोधी मतों को गोलबंद करना मुश्किल है। इसमें सबसे बड़ी बाधा बसपा बनेगी । हालांकि मायावती अब पहले जैसी ताकतवर नहीं रहीं किंतु दलित मतदाताओं का एक वर्ग आज भी उनके आभामंडल से प्रभावित है। अखिलेश यादव के विरुद्ध श्री राजभर और स्वामीप्रसाद तो मुखर थे ही किंतु राज्यसभा चुनाव में जया बच्चन को फिर उम्मीदवार बनाए जाने से अपना दल की विधायक पल्लवी पटेल भी मोर्चा खोलकर बैठ गईं। जयंत चौधरी द्वारा साथ छोड़ देने के बाद पश्चिमी उ.प्र में अखिलेश का गणित पहले ही गड़बड़ा गया था। राम मंदिर से कांग्रेस द्वारा दूरी बनाए जाने के कारण उसका बचा - खुचा आधार भी  खिसक गया है। ऐसे में सपा को उसका साथ कितना लाभान्वित करेगा ये सवाल राजनीतिक विश्लेषकों के मन में घूमने लगा है। सही बात तो ये है कि मुलायम सिंह यादव की मौत के बाद पुराने समाजवादी भी अखिलेश से छिटकने लगे हैं। और फिर योगी सरकार के प्रभावशाली प्रदर्शन के साथ ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की वैश्विक छवि के कारण लोकसभा चुनाव में उ.प्र में भाजपा को रोक पाना असंभव लगता है। 2022 के विधानसभा चुनाव में सरकार नहीं बना पाने के कारण अखिलेश की चमक भी फीकी पड़ी है । उ.प्र की जनता के मन में ये बात बैठ गई  है कि योगी और मोदी की जुगलजोड़ी ने राज्य की तस्वीर बदल दी है।  ऐसे में सपा और कांग्रेस का यह गठबंधन  2017 और 2019 वाली कहानी दोहराने से ज्यादा कुछ नहीं कर सकेगा।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 22 February 2024

किसान आंदोलन को अतिवादियों से बचना होगा वरना हाथ खाली रहेंगे


गत दिवस एक किसान और एक पुलिसकर्मी की मौत होने के बाद किसान आंदोलन के नेताओं ने दिल्ली कूच दो दिन टाल दिया। दरअसल आंदोलन के एक बड़े नेता  तबियत खराब होने से  अस्पताल में भर्ती हो गए। इस कारण भी आंदोलन को  विराम दिया गया। लेकिन दो बातें ऐसी हुईं जो सवाल खड़े करती हैं। पहली तो ये कि आंदोलनकारियों और पुलिस के बीच चल रहे संघर्ष के बीच किसानों की तरफ से सफेद झंडा लहराया गया जो युद्धविराम का संकेत होता है। पुलिस ने भी सफेद झंडे से जवाब दिया। और दूसरी बात ये हुई कि किसानों ने पराली जलाने के साथ ही उसमें मिर्च डाल दी जिससे पुलिस कर्मियों के साथ ही आसपास के लोगों को बेहद परेशानी का सामना करना पड़ा । हालांकि केंद्र सरकार और किसान नेताओं के बीच वार्ता भी जारी है किंतु अभी तक समझौता नहीं हो सका। सरकार जो प्रस्ताव देती है उसे किसान नेता किसी न किसी बहाने से ठुकरा देते हैं।  कृषक वर्ग के प्रति हर किसी की सहानुभूति होने के बावजूद  इस आंदोलन के प्रति ये अवधारणा व्याप्त है कि ये पंजाब के बड़े किसानों द्वारा प्रायोजित है ।जेसीबी और पोकलेन जैसी मशीनों का साथ होना स्पष्ट करता है कि आंदोलन के पीछे कुछ ऐसी शक्तियां छिपी हैं जिनका उद्देश्य शांति - व्यवस्था को खतरे में डालकर  अपना स्वार्थ सिद्ध करना है। यही वजह है कि पंजाब से ही आंदोलन के विरुद्ध आवाजें उठने लगी हैं। जिस अकाली दल ने कृषि कानूनों के विरोध में मोदी सरकार से नाता तोड़ लिया वह भी खुलकर कह रहा है कि किसान पहले पंजाब सरकार के विरुद्ध आंदोलन करें जिसने उनके साथ किए वायदों पर अमल नहीं किया। जहां तक एमएसपी (न्यूनतम समर्थन मूल्य ) का प्रश्न है तो उससे किसी को एतराज नहीं है। लेकिन सभी कृषि उत्पादों के लिए उसका तय किया जाना अव्यवहारिक लगता है। इसी तरह की कुछ और मांगें हैं जिनको सैद्धांतिक सहमति के बावजूद स्वीकार करना मौजूदा स्थितियों में असंभव है । सबसे बड़ी बात ये है कि यह आंदोलन  पूरे देश के किसानों की भावनाओं का प्रतिनिधित्व नहीं करता। पिछली बार दिल्ली में चले लंबे किसान आंदोलन को  ज्यादातर राजनीतिक दलों का समर्थन मिलने के बाद भी वह दिल्ली के निकटवर्ती कुछ राज्यों के किसानों तक सीमित होकर रह गया था। ये बात भी देखने मिल रही है कि आंदोलनकारी जिस अंदाज में  दिल्ली आना चाहते हैं वह किसी हमले की तैयारी जैसा लगता है। पुलिस द्वारा लगाए गए अवरोधों को तोड़ने के लिए जेसीबी और पोकलेन मशीन जैसे उपकरण साथ लाना उनकी मंशा को स्पष्ट करता है । जिस तरह से पुलिस के साथ उनका मुकाबला हो रहा है। उससे इस संदेह की पुष्टि होती है कि किसानों के कंधे पर रखकर कोई और बंदूक चला रहा है। यदि यह आंदोलन समूची किसान बिरादरी की आवाज होता तो अब तक दूसरे राज्यों से भी किसान  दिल्ली आने लगते। और ऐसे समय जब रबी फसल तैयार होने को है और किसान का पूरा ध्यान कटाई के बाद अपनी फसल को सही समय पर बेचने में लगा हो तब उसका अपने खेत से दूर जाकर बैठ जाना चौंकाने वाला है। भारत कृषि प्रधान देश है और किसान को हमारे समाज में सेना के जवानों की तरह ही सम्मान हासिल है। कोई भी सरकार कृषि और कृषक की उपेक्षा नहीं कर सकती । इसीलिए ग्रामीण विकास पर सभी सरकारें भरपूर जोर देती हैं। किसान की आय बढ़े और खेती लाभ का व्यवसाय बने इसमें भी किसी को ऐतराज नहीं होगा। किसान की खुशहाली से ही भारत के उपभोक्ता बाजार में रौनक आती है। सड़क और बिजली पहुंचने के कारण ग्रामीण भारत की तस्वीर काफी हद तक बदल चुकी है। ऐसे में किसान समुदाय में खेती के प्रति लगाव बनाए रखने के लिए आवश्यक है उसका आर्थिक पक्ष सुदृढ़ हो। लेकिन यह एक क्रमिक प्रक्रिया है जो दबाव बनाकर पूरी करवाना संभव नहीं लगता। आंदोलनकारियों को ये समझना होगा कि उनकी सभी बातें स्वीकार करने के बाद भी उनका क्रियान्वयन न हो तो उसका लाभ ही क्या ? और ये भी कि इस तरह के आंदोलन से समाज का एक बड़ा वर्ग नाराज भी है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि ज्यादातर किसान अभी तक बाजारवादी अर्थव्यवस्था के साथ सामंजस्य नहीं बिठा सके। वैसे भी प्रत्येक राज्य के किसानों की समस्याएं अलग - अलग हैं। एमएसपी के बारे में भी ऐसा ही है। बेहतर हो आंदोलन कर रहे किसान इस बात को समझें।लोकसभा चुनाव के कारण उनकी मांगों के प्रति सहानुभूति दिखाना सरकार की मजबूरी है। लेकिन विभिन्न क्षेत्रों से जो प्रतिक्रियाएं मिल रही हैं उनसे लगता है आंदोलन की दशा और दिशा को लेकर लोगों में तरह - तरह की आशंकाएं हैं। पूरा आंदोलन खालिस्तानियों के हाथ में है ये कहना पूर्णतः सही न हो किंतु आंशिक तौर पर तो ऐसा प्रतीत होता ही है।  आंदोलन और युद्ध में अंतर नहीं किया गया तो पिछली बार की तरह इस बार भी कुछ हाथ नहीं लगेगा । वैसे भी इस बार आंदोलन को वैसा समर्थन नहीं मिल रहा क्योंकि 26 जनवरी 2021 को लाल किले पर किए गए उत्पात की याद जनमानस में सजीव है।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 21 February 2024

सीधे आने वाले मामलों में सर्वोच्च न्यायालय अपनी राय स्पष्ट करे


सर्वोच्च न्यायालय ने चंडीगढ़ के महापौर चुनाव में हुई गड़बड़ी पर सख्त रवैया अपनाते हुए जिस तरह आम आदमी पार्टी और कांग्रेस के संयुक्त उम्मीदवार को निर्वाचित घोषित किया उसकी सर्वत्र प्रशंसा हो रही है । न्यायपालिका की यही निडरता देश में लोकतंत्र की जड़ें मजबूत करने में सहायक है । यद्यपि राजनेताओं को ये अच्छा नहीं लगता और अनेक मर्तबा इस बात को लेकर बहस भी चली कि न्यायाधीश अपने अधिकार क्षेत्र के बाहर निकलकर कार्यपालिका और विधायिका के दैनंदिन कार्यों में भी हस्तक्षेप करते हैं। हमारे देश में न्यायपालिका की रचनात्मक आलोचना का अधिकार होने के बावजूद सभी उसके फैसलों का सम्मान करते हैं। हालांकि अपवादस्वरूप अनेक मामलों में उसके निर्णयों को संसद ने पलटा भी है किंतु आम तौर पर नापसंद होते हुए भी उनको स्वीकार करने की परंपरा कायम है। संसद द्वारा पारित अनेक कानूनों को सर्वोच्च न्यायालय ने असंवैधानिक करार दिया है। ताजा उदाहरण इलेक्टोरल बॉन्ड का है जिस पर सर्वोच्च न्यायालय ने  रोक लगा दी है। लेकिन न्यायपालिका की सक्रियता उसकी इच्छा पर निर्भर करती है , जिसके कारण उसे आलोचना का शिकार होना पड़ता है। कुछ दिनों पहले झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की गिरफ्तारी के विरुद्ध प्रस्तुत याचिका को सुनने से इंकार करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने जब उच्च न्यायालय जाने की सलाह दी तो  अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने इस पर नाराजगी व्यक्त करते हुए कहा कि सर्वोच्च न्यायालय तय करे कि कौन से मामले सीधे सुनेगा , कौन से नहीं ? श्री सिब्बल जैसी शिकायत अनेक लोगों को है। अनेक प्रकरणों में लंबी सुनवाई करने के बाद सर्वोच्च न्यायालय निचली अदालत जाने के निर्देश देता है। इसी तरह अनेक प्रकरणों में पूरी बहस के बाद कह देता है कि इस बारे में संसद कानून बनाए अथवा  सक्षम व्यक्ति या संस्था व्यवस्था करे। इलेक्टोरल बॉन्ड मामले में भी ये कहा जा रहा है कि सर्वोच्च न्यायालय ने उसके जरिए राजनीतिक दलों को मिलने वाले चंदे पर तो रोक लगा दी किंतु लोकसभा चुनाव के कुछ माह पहले नई व्यवस्था क्या हो ये नहीं बताया। संसद का विदाई सत्र हो चुका और सभी पार्टियां चुनाव की तैयारियों में जुट गईं हैं। ऐसे में नया कानून बनाना भी आसान नहीं होगा। दो दिन पहले सर्वोच्च न्यायालय ने प.बंगाल के संदेशखाली कस्बे में महिलाओं के साथ हुई बर्बरता के मामले में  याचिकाकर्ता को फटकारते हुए उच्च न्यायालय जाने की समझाइश दी। साथ ही ये टिप्पणी भी कर डाली कि इसमें और मणिपुर में अंतर है। इस फैसले को लेकर भी काफी तीखी टिप्पणियां हो रही हैं। लोग पूछ रहे हैं कि एक शहर के महापौर के चुनाव में हुई धांधली पर सर्वोच्च न्यायालय ने जैसी तत्परता दिखाई वैसी संदेशखाली के मामले में दिखाने पर वह राज़ी क्यों नहीं हुआ ? सोशल मीडिया में इसे लेकर न्यायाधीशों पर जो लिखा जा रहा है वह शोभनीय नहीं है किंतु  देश के मुख्य न्यायाधीश डी.वाय.चंद्रचूड़ को इस बारे में पारदर्शी व्यवस्था बनानी चाहिए कि किस तरह के मामले में सबसे ऊंची अदालत सीधे सुनवाई करेगी और किसमें नहीं। विचारणीय बात ये है कि निचली अदालतों में समय  की बरबादी से  बचने त्वरित न्याय की उम्मीद लिए लोग सर्वोच्च न्यायालय जाते हैं जिसकी  कार्यप्रणाली काफी चुस्त है और उसकी बात का प्रभाव भी पड़ता है। ये देखते हुए उसे स्पष्ट कह देना चाहिए कि सीधे आने वाले किसी भी मामले में वह सुनवाई नहीं करेगा। वैसे  न्यायिक व्यवस्था के अनुसार होना तो यही चाहिए कि जब तक निचली अदालत का विकल्प है तब तक ऊपरी अदालत प्रकरण की सुनवाई नहीं करेगी।  लेकिन  कुछ विशेष मामले होते हैं जिनको सीधे उच्च या सर्वोच्च न्यायालय में ले जाना आवश्यक होता है। उस दृष्टि से ये बात अटपटी लगती है कि सर्वोच्च न्यायालय मुख्यमंत्री की गिरफ्तारी का प्रकरण न सुने किंतु महापौर चुनाव में अतिरिक्त तेजी दिखाते हुए फैसला करे। इसी तरह किसी जगह हिंसा होने पर तो वह स्वतः संज्ञान ले किंतु संदेशखाली में महिलाओं के बड़े पैमाने पर हुए उत्पीड़न को  सुनवाई योग्य न माने । न्यायपालिका और सरकार ही नहीं बल्कि न्यायाधीशों और अधिवक्ताओं के बीच भी इसीलिए कहा सुनी की घटनाएं बढ़ती जा रही हैं। बेहतर हो श्री चंद्रचूड़ इस दिशा में समुचित कदम उठाएं जिससे न्याय व्यवस्था के प्रति सम्मान न सिर्फ बना रहे बल्कि उसमें और भी वृद्धि हो। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 20 February 2024

अन्य दलों के दूर रहने से न्याय यात्रा असर नहीं छोड़ पा रही


कांग्रेस नेता राहुल गांधी की न्याय यात्रा उ.प्र में है। बीते दो दिनों से वे अपने पुश्तैनी गढ़ रहे अमेठी , सुल्तानपुर और रायबरेली के इलाके में मौजूद हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के निर्वाचन क्षेत्र से भी यात्रा गुजर चुकी है। हालांकि यात्रा मार्ग में भीड़ तो नजर आती है किंतु भारत जोड़ो का प्रबंधन जितना अच्छा था और कांग्रेस के तमाम नेतागण उसमें उपस्थिति दर्ज करवाते देखे गए , वैसा इस बार देखने नहीं मिल रहा। संभवतः इसका कारण म.प्र, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की करारी हार के साथ ही लोकसभा चुनाव नजदीक होना  है। लेकिन यात्रा को लेकर पहले जैसा उत्साह नहीं होने की वजह इंडिया में शामिल दलों के नेताओं की उससे दूरी भी  है। उ.प्र. को ही लें तो वहां सपा विपक्षी गठबंधन की सबसे मजबूत सदस्य है। लेकिन सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने ऐलान कर दिया कि जब तक सीटों के बंटवारे का मुद्दा उलझा रहेगा तब तक वे राहुल के साथ यात्रा नहीं करेंगे । इसी के साथ कांग्रेस को 17 सीटें देने का प्रस्ताव भी दे डाला। स्मरणीय है कुछ दिन पहले उन्होंने कांग्रेस को 11 सीटें देने की बात कही थी । उसके बाद जयंत चौधरी अपनी पार्टी रालोद को लेकर एनडीए में शामिल हो गए। इसीलिए रालोद को दी जा रही आधा दर्जन सीटें अखिलेश ने कांग्रेस को देने का दांव चला। हालांकि कांग्रेस ने अब तक इस प्रस्ताव पर सहमति नहीं दिखाई और वह 21 - 22 सीटों पर अड़ी हुई है। इस खींचातानी की वजह बसपा भी है क्योंकि कांग्रेस ने अखिलेश के दबाव को कम करने के लिए बसपा को भी इंडिया गठबंधन में शरीक होने का निमंत्रण दे दिया। क्षेत्रीय पार्टियां जिस तरह कांग्रेस पर हावी होकर ज्यादा से ज्यादा सीटों पर लड़ने की बात कर रही हैं उसका कारण कांग्रेस में निर्णय क्षमता का अभाव ही है। लोकसभा चुनाव पार्टी के लिए जीवन - मरण का प्रश्न है। 2014 और 19 के लोकसभा चुनाव में मिली जबर्दस्त  पराजय के बाद उसके हाथ से ज्यादातर राज्य निकलते चले गए। हिमाचल , कर्नाटक और तेलंगाना में जीत से  जो मनोबल बढ़ा वह म.प्र, राजस्थान और छत्तीसगढ़ की हार से धरातल पर आ गया। ऐसे में जरूरत थी कि वह विपक्षी पार्टियों के बीच  सामंजस्य बनाकर भाजपा के समक्ष कड़ी चुनौती पेश करने के लिए सीटों के बंटवारे का तरीका खोजकर जल्द से जल्द विपक्ष के संयुक्त उम्मीदवारों की घोषणा करवाती । लेकिन  पांच राज्यों के  विधानसभा चुनाव और उसके बाद न्याय यात्रा की तैयारियों के कारण कांग्रेस नेतृत्व इस कार्य के लिए समय ही नहीं निकाल सका , जिससे संवाद हीनता की स्थिति बनती चली गई। न्याय यात्रा से अन्य दलों के नेताओं द्वारा दूरी बना लेने का कारण उनको सही समय और सही तरीके से निमंत्रित नहीं किया जाना ही है। उ.प्र में यात्रा के आने पर अखिलेश से उसमें शामिल होने के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा , बुलाया ही नहीं गया। उनकी उस टिप्पणी के बाद ही न्यौता भेजा गया। दूसरी बात ये भी है कि उ.प्र कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अजय रॉय से सपा प्रमुख का छत्तीस का आंकड़ा है । म.प्र विधानसभा चुनाव के समय कमलनाथ और अखिलेश के बीच हुए बयान युद्ध के दौरान श्री रॉय द्वारा किए गए कटाक्ष पर श्री यादव ने उनको चिरकुट बताते हुए कांग्रेस को खरी - खोटी सुनाई थी। भले ही कांग्रेस राष्ट्रीय पार्टी है किंतु उ.प्र में उसकी स्थिति दयनीय से भी बुरी है। ऐसे में बुद्धिमत्ता इसी में थी कि खुद श्री गांधी सपा प्रमुख को शुरू में ही यात्रा का निमंत्रण देते । लेकिन यात्रा के संयोजक जयराम रमेश एवं अन्य प्रबंधकों को इन सब बातों का ध्यान नहीं है । इसीलिए यात्रा को न पहले जैसा प्रचार मिल रहा है और न ही वह पार्टी में उत्साह जगाने में कामयाब लगती है। विपक्षी गठबंधन के अनेक नेता खुलकर कह चुके हैं कि इस यात्रा का गठबंधन से कोई संबंध नहीं है।  संवाद हीनता के साथ ही श्री गांधी की आत्ममुग्धता के कारण नीतीश कुमार ने एनडीए का पल्ला पकड़कर विपक्षी एकता में सेंध लगा दी। पूरे देश से कांग्रेस नेताओं द्वारा पार्टी छोड़ने की खबरें आ रही हैं । ऐसे में  न्याय यात्रा आगे पाट,  पीछे सपाट की उक्ति को चरितार्थ कर रही है। हालांकि अब उसे बंद कर देना तो उचित नहीं होगा । लेकिन पार्टी को गठबंधन के दलों को ये विश्वास दिलाना चाहिए कि कांग्रेस उनके महत्व और प्रभुत्व को कम करने की मंशा नहीं रखती। दरअसल क्षेत्रीय दल इस बात से आशंकित हैं कि कांग्रेस उनके प्रभावक्षेत्र को नुकसान पहुंचाना चाह रही है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 19 February 2024

संदेशखाली में मध्ययुगीन बर्बरता का नंगा नाच


हालांकि ऐसे मामलों में राजनीति नहीं होना चाहिए किंतु जब आरोपी राजनीतिक व्यक्ति हो और उसकी पार्टी बजाय  दंडित करने के उसे संरक्षण दे तब राजनीतिक विवाद उत्पन्न होना स्वाभाविक है। प.बंगाल के 24 परगना जिले का संदेशखाली नामक स्थान बीते कुछ दिनों से चर्चा का कारण बना हुआ है। सर्वोच्च न्यायालय तक में उसकी सुनवाई हो रही है। राष्ट्रीय स्तर पर अकेली भाजपा  इस प्रकरण पर मुखर है इसलिए ममता सरकार उसे  राजनीतिक वैमनस्य कहकर हवा में उड़ा रही है। वैसे कांग्रेस की राज्य इकाई भी संदेशखाली में महिलाओं पर हुए अमानुषिक अत्याचारों को लेकर मैदान में है । 5 जनवरी को संदेशखाली में ईडी की टीम तृणमूल कांग्रेस नेता शाहजहां शेख के यहां छापा मारने पहुंची थी। लेकिन उसके गुर्गे ईडी के लोगों के साथ मारपीट करते हुए उन्हें तब तक रोके रहे जब तक शाहजहां फरार नहीं हो गया। तदुपरांत वहां की महिलाएं खुलकर सामने आईं और उन्होंने शेख के बारे में जो कुछ बताना शुरू किया उसके बाद ममता सरकार के राज में हो रहे महिला उत्पीड़न की दर्दनाक स्थिति सामने आई। जो कुछ भी उनके द्वारा बताया गया , वह 21 वीं सदी में अकल्पनीय है। शाहजहां शेख और उसके गुर्गे महिलाओं को अपनी निजी संपत्ति मानकर उठा ले जाते रहे और तृणमूल कार्यालय में रखकर उनका यौन शोषण कर छोड़ देते थे । विवाहित महिला के पति को भी ये कहा जाता कि उसकी पत्नी पर पहला अधिकार शेख का है। किसी भी सुंदर महिला को जबरन उठाकर ले जाना और उसका यौन शोषण करना संदेशखाली में आम बात थी। जब महिलाओं से पूछा गया कि वे इस अत्याचार के विरुद्ध अब तक खामोश क्यों रहीं तो उनका उत्तर था कि शाहजहां  जब ईडी के डर से फरार हुआ तब जाकर उनमें साहस आया। वह लोगों की जमीनों पर जबरन कब्जा करने और उनकी मजदूरी छीनकर आतंकित करने का काम करता रहा किंतु तृणमूल कांग्रेस से जुड़ा होने  की वजह से उसका हौसला बुलंद था।  ईडी की छापेमारी के बाद संदेशखाली महिला  सशक्तीकरण का जीवंत उदाहरण बन गया है। लेकिन महिला होने के बावजूद ममता बैनर्जी अभी तक अपनी पार्टी के कुख्यात नेता पर लग रहे आरोपों पर ध्यान देने के बजाय ये शिगूफा छोड़ रही हैं कि संदेशखाली रास्वसंघ का प्रभावक्षेत्र है। महिलाओं पर उनके साथ हुए बलात्कार को साबित करने का दबाव भी बनाया जा रहा है। दिखावे के लिए कुछ छुटभैये किस्म के तृणमूल नेताओं को पुलिस ने जरूर पकड़ा है किंतु जो लोग संदेशखाली के हालात का जायजा लेने जा रहे हैं उनको भी रोकने की करवाई पुलिस और प्रशासन द्वारा किए जाने से साफ है कि ममता सरकार को महिलाओं के मान - सम्मान से अधिक अपनी पार्टी के नेताओं की चिंता है। जो जानकारी आई उसके आधार पर ये कहा जा सकता है कि संदेशखाली में मध्ययुगीन गुलाम प्रथा जिंदा है। भारतीय फिल्मों में पुराने जमींदारों की क्रूरता के जो दृश्य दिखाए जाते हैं वे भी इस कांड के सामने हल्के लगते हैं। वस्तुस्थिति ये है कि वामपंथी सरकार के राज में जो गुंडे आतंक का पर्याय थे वे सभी सत्ता परिवर्तित होते ही तृणमूल कांग्रेस में आ गए। परिणामस्वरूप प.बंगाल की स्थिति आसमान से टपके खजूर पर अटके वाली होकर रह गई। पहले जो लूटपाट वामपंथी पार्टी का कैडर करता था , वही अब तृणमूल कार्यकर्ता बन चुके असामाजिक तत्व धड़ल्ले से करते हैं। चूंकि पुलिस उनके क्रियाकलापों  पर रोक नहीं लगाती लिहाजा जनता भी भयग्रस्त है।   संदेशखाली की घटना पहली नहीं है। बीते कुछ सालों में यह राज्य अराजकता के शिकंजे में फंस गया है। चूंकि कांग्रेस और वामपंथी पूरे तौर पर हाशिए पर आ चुके हैं इसलिए भाजपा ही प.बंगाल में विकल्प के रूप में उभर रही है। संदेशखाली की लड़ाई में भी वही पीड़ित महिलाओं के साथ खड़ी हुई है। हालांकि लोकसभा में कांग्रेस दल के नेता अधीर रंजन चौधरी  ममता सरकार के विरुद्ध आवाज उठाया करते हैं किंतु जिस इंडिया गठबंधन में तृणमूल भी शामिल है उसकी ओर से संदेशखाली में हुए अत्याचार के विरुद्ध कुछ न कहा जाना चौंकाता है। सोनिया गांधी और राहुल गांधी की तरफ से भी ममता बैनर्जी की सरकार का वैसा विरोध नहीं हुआ जैसा अपेक्षित था । सर्वोच्च न्यायालय इस बारे में क्या करता है इस पर सबकी नजर है क्योंकि उसके निर्णय को राजनीति से परे माना जायेगा। लेकिन ममता बैनर्जी ने इस कांड पर अब तक जिस प्रकार का गैर जिम्मेदाराना रवैया दिखाया वह शर्मनाक है। जब किसी स्थान की दर्जनों महिलाएं उन पर हुए अमानुषिक अत्याचार की जानकारी सार्वजनिक रूप से दे रही हों तब तो मुख्यमंत्री को खुद उनसे मिलकर अपराधियों को सजा दिलवाने की पहल करनी चाहिए थी । लेकिन इसके विपरीत वे इसे राजनीतिक मोड़ देकर अपनी पार्टी के साथ जुड़े समाज विरोधी तत्वों को बचाने में जुटी हुई हैं। बेहतर तो ये होता कि कांग्रेस सहित विपक्षी गठबंधन में शामिल अन्य दलों का संयुक्त प्रतिधिमंडल संदेशखाली में पीड़ित महिलाओं की बात सुनकर ममता बैनर्जी को कठघरे में खड़ा करता किंतु वोटों की राजनीति के कारण महिलाओं के अपमान पर भी अधिकतर पार्टियां मौन साधे बैठी हैं। ऐसे में अब सर्वोच्च न्यायालय से ही उम्मीद है न्याय की। चूंकि लोकसभा चुनाव नजदीक हैं इसलिए देखना ये होगा कि इतना गंभीर मुद्दा कहीं राजनीतिक आरोप - प्रत्यारोप में दबकर न रह जाए।


- रवीन्द्र वाजपेयी