Saturday, 9 March 2024

चुनाव पूर्व ही विपक्ष के हौसले पस्त करने की रणनीति पर चल रही भाजपा


प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी राजनीति के बेहद चतुर खिलाड़ी हैं। रास्वसंघ के प्रचारक के बाद भाजपा में संगठन का काम करते हुए वे जब गुजरात के मुख्यमंत्री बने तब वे विधायक तक नहीं थे। इसलिए सत्ता  संचालन की उनकी क्षमता को लेकर सवाल उठते रहे। लेकिन जल्द ही उन्होंने साबित कर दिखाया कि वे कुशल प्रशासक भी हैं। मुख्यमंत्री रहते हुए ही वे अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर आकर्षण का केंद्र बन गए थे। इसीलिए जब भाजपा ने उन्हें प्रधानमंत्री का उम्मीदवार बनाया तब जनता में उसकी अनुकूल प्रतिक्रिया हुई जिसका प्रमाण 2014 के लोकसभा चुनाव में मिला। प्रधानमंत्री के तौर पर उनकी कार्यशैली ने देश और दुनिया को प्रभावित किया और वे 2019 में और भी ज्यादा बहुमत के साथ सत्ता में लौटे। बीते पांच वर्ष में उन्होंने अनेक ऐसे काम कर डाले जिनकी वजह से वे एक मजबूत नेता के तौर पर छाए हुए हैं। ये कहना कतई गलत न होगा कि वे  समकालीन विश्व के सबसे लोकप्रिय और प्रभावशाली नेताओं में से हैं। ऐसे में 2024 के लोकसभा चुनाव में उनकी जीत में  किसी को संदेह नहीं है। अब तक  सभी चुनाव पूर्व सर्वेक्षण सत्ता में उनकी वापसी की  संभावना व्यक्त कर रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों के बीच भी बहस का मुद्दा  यह है कि भाजपा को 370 और एनडीए को 400 सीटें मिलेंगी अथवा नहीं ? स्मरणीय है खुद प्रधानमंत्री ने इस आंकड़े को सार्वजनिक विमर्श का विषय बनवा दिया। लेकिन ये सवाल भी पूछा जा रहा है कि जब प्रधानमंत्री 370 और 400 पार का नारा बुलंद करते हुए आत्मविश्वास से भरे हुए हैं तब भाजपा दूसरे दलों के नेताओं को क्यों शामिल कर रही है? और  छोटे - छोटे दलों से गठबंधन की उसे क्या जरूरत है ? उल्लेखनीय है नीतीश कुमार के साथ ही भाजपा ने जयंत चौधरी को भी एनडीए में  शामिल कर  इंडिया गठबंधन को जबरदस्त धक्का दिया। उसके बाद भी भाजपा  सहयोगियों की संख्या बढ़ाने में जुटी हुई है । ओडीसा में बीजद और आंध्र प्रदेश में तेलुगु देशम से बातचीत इसका प्रमाण है। तमिलनाडु में अन्ना द्रमुक को दोबारा साथ लाने के प्रयास भी चल रहे हैं। ऐसे ही पंजाब में अकालियों से गठजोड़ की बिसात बिछ गई है।  दूसरे दलों से नेताओं को भी भाजपा में लाने का अभियान चल रहा है। आज म.प्र में पूर्व केंद्रीय मंत्री सुरेश पचौरी, पूर्व विधायक संजय शुक्ला और पूर्व सांसद गजेंद्र सिंह राजूखेड़ी सहित अनेक छोटे बड़े नेताओं ने भाजपा की सदस्यता ले ली। ऐसी ही खबरें अन्य राज्यों से भी लगातार आ रही हैं। ये तंज भी सुनने में आ रहा है कि कांग्रेस मुक्त भारत का नारा लगाते - लगाते पार्टी कांग्रेस युक्त भाजपा हुई जा रही है। लेकिन क्या अन्य पार्टियां अपने यहां आने वाले को अपनी सदस्यता देने से इंकार कर रही  रही हैं ? कर्नाटक विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा से पूर्व मुख्यमंत्री जगदीश शेट्टार कांग्रेस में आ गए जिन्हें टिकिट भी मिला। हाल ही में वे भाजपा में लौट आये। म.प्र में भी भाजपा के सस्थापक सदस्य पूर्व मुख्यमंत्री कैलाश जोशी के पुत्र दीपक  कांग्रेस में आकर चुनाव लड़े। कहने का आशय ये कि विचारधारा तो कोई मुद्दा रहा नहीं।  आजादी के बाद नेहरु जी ने भी प्रजा समाजवादी पार्टी सहित अन्य विपक्षी दलों के नेताओं को कांग्रेस में शामिल करने का अभियान चलाया था। प्रधानमंत्री चूंकि चुनावी लड़ाई के सिद्धहस्त खिलाड़ी हैं इसलिये  वे कांग्रेस सहित अन्य विपक्षियों का मनोबल कमजोर करने की नीति पर चल रहे हैं। इसी के अंतर्गत शिवसेना और एनसीपी में विभाजन हुआ। इंडिया गठबंधन में भी कांग्रेस  आम आदमी पार्टी जैसे दल के साथ है जो दिल्ली और पंजाब में उसकी बर्बादी का कारण बनी। महाराष्ट्र में भी घोर हिंदूवादी नेता उद्धव ठाकरे को उसने साथ रखा है। इसी तरह श्री ठाकरे उस कांग्रेस की गोद में बैठे हुए हैं जो वीर सावरकर की देशभक्ति  पर सवाल उठाती है। अरविंद केजरीवाल से जब एक पत्रकार ने सवाल किया कि देश के जिन भ्रष्टतम नेताओं की सूची उनके द्वारा जारी की गई थी उनमें से अनेक इंडिया गठबंधन में उनके साथ हैं। तब वे बोले कि मोदी और शाह को सत्ता से हटाने ऐसा करना आवश्यक है। उनका यह उत्तर वर्तमान राजनीतिक शैली और संस्कृति का सही चित्र है। सही बात ये है कि इंडिया गठबंधन का मकसद केवल केंद्र की सत्ता से भाजपा को बेदखल करना है। शुरुआती दौर में वह भाजपा पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने में सफल भी दिखाई दिया। मोदी विरोधी मीडिया को भी उसकी जीत सुनिश्चित लगने लगी किंतु भाजपा ने उस संभावना को कमजोर करते हुए उल्टा दबाव बना दिया। एनडीए का कुनबा  बढ़ाकर और कांग्रेस में लगातार सेंध लगाकर वह विपक्ष के हौसले पस्त करने में जुटी हुई है। और उसका प्रयास कामयाब होता भी दिख रहा है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 8 March 2024

श्रीनगर की सभा में डा.मुखर्जी का उल्लेख 370 के बाद हुए बदलाव का प्रमाण


प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पहले भी कश्मीर घाटी की यात्रा कर चुके हैं किंतु गत दिवस उनका श्रीनगर प्रवास विशेष था । श्रीनगर के बख्शी स्टेडियम में  उनकी जनसभा में लोगों की उपस्थिति  पिछली रैली के मुकाबले कई गुना ज्यादा थी। जिससे लगा कि घाटी में उनका आकर्षण बढ़ा है ।  सभा के दौरान आतंकवादी घटना की आशंका के बावजूद बड़ी संख्या में श्रोता आए । 370 समर्थक पार्टियों ने भी बंद या हड़ताल जैसा कोई प्रयास नहीं किया जो  घाटी के बदले  हुए माहौल का  प्रमाण है जहां कुछ साल पहले तक जुमे की नमाज के बाद मस्जिदों से निकलती भीड़ पाकिस्तान के झंडे लहराती थी ।सुरक्षा बलों पर पत्थर फेंकने वालों में लड़कों के साथ लड़कियां भी नजर आती थीं। किसी आतंकवादी को भागने में मदद करने के लिए लोगों की भीड़ सुरक्षा बलों के विरोध में खड़ी होना आम बात थी। जनजीवन बुरी तरह अस्त - व्यस्त था। पर्यटन  व्यवसाय चौपट था। शैक्षणिक संस्थानों में ताले पड़े थे। ऐसा लगने लगा था कि घाटी पूरी तरह भारत से अलग होने की ओर बढ़ रही है। हालांकि धारा 370 हटाए जाने के बाद भी लंबे समय तक  स्थितियां सामान्य नहीं थीं। सुरक्षा बलों पर हमलों के अलावा निर्दोष नागरिकों की  हत्या कर आतंक फैलाने का प्रयास होता रहा। पुलिस और सेना में कार्यरत अनेक नौजवानों की  हत्या से दहशत फैलाई जाती रही। लेकिन केंद्र सरकार की दृढ़ता और सुरक्षा बलों की मुस्तैदी के कारण  स्थितियां सुधरने लगीं। अलगाववादी नेताओं की गिरफ्तारी और नजरबंदी के भी सकारात्मक परिणाम दिखे। शिक्षण संस्थानों और खेल के मैदानों में चहल - पहल लौटी। पुलिस जैसी सरकारी नौकरियों में भर्ती के लिए  घाटी के नौजवानों ने जिस उत्साह का प्रदर्शन किया उससे अलगाववाद के शिकंजे में फंसे इस  राज्य में सामान्य स्थिति लौटने के संकेत मिलने लगे। सबसे बड़ा लाभ ये हुआ कि  अर्थव्यवस्था की रीढ़ पर्यटन उद्योग ने सारे कीर्तिमान ध्वस्त कर दिए। हालांकि अमरनाथ यात्रा सुरक्षा बलों के संरक्षण में आतंकवाद के दौर में भी होती रही किंतु 370 हटने के बाद  यात्री अन्य दर्शनीय स्थलों पर भी जाने लगे।  डल झील में खड़ी हाउस बोटों में बरसों बाद रौनक लौट आई। गुलमर्ग के शीतकालीन खेलों में भाग लेने वालों में भी आशातीत वृद्धि हुई। हालांकि 1990 में  जान बचाकर भागे कश्मीरी पंडितों की वापसी का सपना अभी भी अधूरा है । लेकिन उनके साथ हुए अमानवीय व्यवहार की दास्तां से पूरी दुनिया अवगत होने लगी। हुर्रियत जैसे संगठनों की कमर टूट गई। आतंकवादियों को मिलने वाली विदेशी सहायता पर रोक लगने के साथ ही सीमा पार से होने वाली घुसपैठ भी कम हुई। कुल मिलाकर जिस कुशलता के साथ मोदी सरकार ने जम्मू कश्मीर में अलगाववाद को प्रश्रय देने वाली धारा 370 को हटाया उसने पहली बार कश्मीर घाटी के मुख्य धारा में शामिल होने का एहसास करवाया। गत दिवस श्री मोदी ने जनसभा में जनसंघ के संस्थापक डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का उल्लेख करते हुए घाटी को अपनी जागीर समझने वाले अब्दुल्ला और मुफ्ती परिवार को साफ शब्दों में संकेत दे दिया कि  वहां राष्ट्रवादी राजनीति का पदार्पण हो चुका है। प्राप्त संकेतों  के अनुसार घाटी के युवाओं में ये भावना तेजी से स्थापित हो रही है कि उनका भविष्य भारत के साथ ही जुड़ा हुआ है। आगामी लोकसभा चुनाव में घाटी की सीटों पर भाजपा जीत दर्ज करेगी ये कहना तो जल्दबाजी होगी किंतु 370 हटने के बाद अलगाववादी मानसिकता का एकाधिकार  कम होता जा रहा है। विधानसभा सीटों के परिसीमन के बाद वैसे भी अब जम्मू की राजनीतिक वजनदारी घाटी के बराबर हो गई है। प्रधानमंत्री की कश्मीर यात्रा का समय इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि पाकिस्तान की सत्ता  दोबारा संभालने के बाद नेशनल असेंबली में प्रधानमंत्री शाहबाज शरीफ ने कश्मीर की तुलना फिलीस्तीन और गाजा से करते हुए भारत विरोधी रवैया दिखाया। दूसरी ओर पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में हाल ही में इस्लामाबाद के विरोध में जबर्दस्त प्रदर्शन हुए।प्रधानमंत्री ने अपनी श्रीनगर यात्रा से पाकिस्तान और उसके द्वारा पाले जाने वाले अलगाववादियों को संकेत दे दिया है कि कश्मीर घाटी में उनके लिए कोई गुंजाइश नहीं है। ये भी उल्लेखनीय है कि श्री मोदी , सर्वोच्च न्यायालय द्वारा धारा 370 को  हटाए जाने के निर्णय को सही ठहराए जाने के बाद ही घाटी की यात्रा पर गए जिसका आशय ये है कि उस धारा की वापसी अब संभव नहीं। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 7 March 2024

शाहजहां को बचाने के फेर में अपना नुकसान कर बैठीं ममता


प.बंगाल का संदेशखाली बीते कुछ समय से राष्ट्रीय स्तर चर्चाओं में बना हुआ है। 24 परगना जिले में स्थित उक्त कस्बे में शाहजहां शेख नामक नेता के यहां राशन घोटाले को लेकर जनवरी माह में ईडी की जिस टीम ने छापा मारा उस पर घातक हमला किया गया। और उसी बीच वह फरार हो गया। बाद में स्थानीय महिलाओं ने शेख़ और उसके साथियों द्वारा उनका यौन शोषण किए जाने की जानकारी सार्वजनिक की  । लोगों की जमीनें जबरन कब्जाने की शिकायतें भी आईं। जब विरोधी दलों ने ममता सरकार को कठघरे में खड़ा किया तो कुछ लोगों की गिरफ्तारी तो कर ली गई लेकिन शाहजहां फरार ही रहा। अंततः जब उच्च न्यायालय ने 7 दिनों में उसे पकड़कर पेश करने कहा तब  बड़ी ही आसानी से पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया।  ये भी सुनने में आया कि राज्य  सरकार को इस बात का डर था कि वह ईडी या सीबीआई की पकड़ में न आ जाए ।उच्च न्यायालय की फटकार के बाद जिस आसानी से शाहजहां  को गिरफ्तार किया गया उस पर  सामान्य प्रतिक्रिया यही रही कि 55 दिनों तक वह कहां रहा इसकी जानकारी पुलिस को थी। मामले में रोचक मोड़ तब आया जब दो दिन पूर्व उच्च न्यायालय ने उसे सीबीआई को सौंपने के साथ उसके विरुद्ध दर्ज  सभी 42 मामलों के दस्तावेज भी जांच एजेंसी के हवाले करने का आदेश दिया। लेकिन प.बंगाल सरकार ने आदेश का पालन करने के बजाय सर्वोच्च न्यायालय में अपील कर दी । लेकिन वहां भी तुरंत सुनवाई नहीं हुई । और जब ममता सरकार के पास कोई विकल्प नहीं बचा तो मजबूरन  शाहजहां को सीबीआई के हवाले किया।  सर्वोच्च न्यायालय राज्य सरकार की अपील पर क्या फैसला लेता है ये अभी तय नहीं है किंतु उच्च न्यायालय ने  शाहजहां की गिरफ्तारी के लिए राज्य की पुलिस के अलावा ईडी और सीबीआई को भी अधिकार दिया था । समूचे घटनाक्रम में जो सबसे बड़ा मुद्दा उठ खड़ा हुआ वह है प.बंगाल सरकार द्वारा शाहजहां को सीबीआई के सुपुर्द करने में की गई अड़ंगेबाजी । उच्च न्यायालय के स्पष्ट आदेश के बावजूद शाहजहां को केंद्रीय जांच एजेंसी के हवाले करने में ममता बैनर्जी को संभवतः यही डर होगा कि वह उसे प्राप्त संरक्षण का भंडाफोड़ न कर दे । यद्यपि तृणमूल कांग्रेस ने उसकी सदस्यता निलंबित कर दी परंतु उसे सीबीआई को सौंपने के  आदेश के विरुद्ध सर्वोच्च न्यायालय में अर्जी लगाने से ये बात उजागर हो गई है कि उसे बचाने के लिए राज्य सरकार कोई कसर नहीं छोड़ रही। बड़ी संख्या में मामले दर्ज होने के बाद भी वह कानून की पकड़ से बाहर रहकर काले - कारनामों को अंजाम देता रहा जिससे  उसकी राजनीतिक पहुंच स्पष्ट हो जाती है। इस प्रकरण से ममता बैनर्जी की छवि को जबर्दस्त नुकसान हुआ है। हालांकि उनकी तरफ से  ये भी कहा जा रहा है कि भाजपा , शाहजहां के मुस्लिम होने के कारण मामले को तूल दे रही है किंतु संदेशखाली की महिलाओं ने जिस साहस के साथ उन पर हुए अत्याचार के लिए शाहजहां और उसके साथियों पर आरोप लगाए उसके बाद ममता को चाहिए था कि वे खुद उन पीड़ित महिलाओं और अन्य लोगों से मिलकर उनके घावों पर मरहम लगातीं किंतु उसके उलट वे शाहजहां को बचाने के लिए पूरी ताकत लगाती रहीं। यदि न्यायपालिका ने सख्ती न दिखाई होती तो उक्त आरोपी अब तक फरार ही रहता। लोकसभा चुनाव के पहले उठा ये मामला तृणमूल के गले की हड्डी बन गया है।  राजनीतिक विश्लेषक भी ये कहने लगे हैं कि जिस तरह वामपंथी सरकार के लिए नंदीग्राम और सिंगुर प्रकरण नुकसानदेह साबित हुए थे ठीक वैसे ही संदेशखाली में शाहजहां शेख और उसके गुर्गों के जंगलराज को ममता सरकार का संरक्षण तृणमूल की जड़ें उखाड़ने का कारण बन सकता है। 2021 का विधानसभा चुनाव जीतने के बाद अपने विरोधियों पर जबरदस्त तरीके से हावी हुई ममता पहली बार दबाव में  हैं। इंडिया गठबंधन के किसी भी घटक के उनके बचाव में नहीं आने से वे अकेली नजर आ रही हैं। कांग्रेस और वामपंथी दोनों संदेशखाली कांड में तृणमूल सरकार का विरोध कर चुके हैं। अब चूंकि शाहजहां केंद्रीय एजेंसी के सुपुर्द हो चुका है इसलिए अब ये उम्मीद की जा सकती है कि उसके अपराधों की सजा उसे मिलकर रहेगी। ममता को यही भय सता रहा है।


-रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 6 March 2024

द्रमुक नेताओं के बयान तमिलनाडु में अलगाववाद के उदय का संकेत


द्रमुक सांसद ए. राजा ने एक बार फिर सनातन और देश विरोधी बयान दिया है। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री स्टालिन के जन्मदिवस पर  आयोजित समारोह में बोलते हुए उन्होंने भारत को देश मानने से इंकार करते हुए कहा कि वह एक उपमहाद्वीप है। उनके अनुसार देश की एक भाषा और एक संस्कृति होती है। उस लिहाज से तमिलनाडु , केरल , उड़ीसा आदि देश हैं और ऐसे ही  अनेक देशों से भारत बना है। इसके साथ ही  उन्होंने  भारत माता की जय और जय श्री राम के नारे का विरोध करते हुए कहा कि वे इन्हें ईश्वर नहीं मानते तथा राम और रामायण के भी  विरोधी हैं । उन्होंने हनुमान जी की तुलना वानर से करते हुए जय श्री राम नारे को घृणित बताया। पूर्व केंद्रीय मंत्री श्री राजा की गणना द्रमुक के वरिष्ट नेताओं में होती है। गत वर्ष हिन्दी का विरोध करते हुए उन्होंने कहा था कि यदि उसे थोपा गया तो तमिलनाडु अलग देश बन जाएगा। उल्लेखनीय है अलग तमिल राष्ट्र द्रमुक की वह इच्छा है जो समय - समय पर प्रकट होती रही है। स्वर्गीय करुणानिधि ने उत्तरी श्रीलंका के तमिल बहुल क्षेत्रों को मिलाकर  पृथक  तमिल देश बनाने की बात कई मर्तबा कही भी थी। लिट्टे नामक उग्रवादी संगठन के प्रति भी उनकी सहानुभूति रही। उसी वजह से राजीव गांधी की हत्या के बाद उनकी सरकार बर्खास्त की गई थी। यद्यपि बाद में द्रमुक का केंद्र की विभिन्न सरकारों के साथ गठजोड़ रहा । डा.मनमोहन सिंह की सरकार में श्री राजा भी मंत्री थे। इंडिया गठबंधन की द्रमुक प्रमुख सदस्य है। कुछ महीनों पहले मुख्यमंत्री स्टालिन के बेटे उदयनिधि ने जो उनकी सरकार में ही मंत्री भी हैं, सनातन को लेकर बेहद आपत्तिजनक बयान देते हुए उसे समाप्त करने की बात तक कह डाली। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के पुत्र ने भी  उस बयान का समर्थन किया था। अनेक स्थानों पर उदयनिधि के विरुद्ध प्रकरण दर्ज हुए। हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने भी उस बयान को लेकर उनको लताड़ लगाई । लेकिन वह विवाद ठंडा हो पाता उसके पहले ही श्री राजा ने भारत माता , भगवान राम और रामायण को लेकर जहर उगल दिया। संसद  सदस्य और  केंद्रीय मंत्री के रूप में उन्होंने भारत की एकता और अखंडता बनाए रखने की शपथ ली थी। ऐसे में उनके द्वारा राज्यों को देश  बताना उस शपथ का उल्लंघन तो है ही , देश और सनातन के अनुयायियों की धार्मिक भावनाओं को आहत करने वाला भी है। कांग्रेस ने उनके बयान से असहमति व्यक्त करते हुए उसकी निंदा तो की किंतु उसे द्रमुक को चेतावनी भी देनी चाहिए कि यदि उसके नेताओं द्वारा सनातन और भारत माता के विरुद्ध आपत्तिजनक बयान दिए जाते रहे तब उसके साथ रहना नामुमकिन हो जाएगा। इंडिया गठबंधन के अन्य सदस्यों को भी स्टालिन को समझाना चाहिए कि भारत की एकता और अखंडता पर इस तरह की टिप्पणी असहनीय है। गत वर्ष हुए  म.प्र , छत्तीसगढ़ और राजस्थान विधानसभा के चुनाव में सनातन का मुद्दा गर्म होने का कारण उदयनिधि का बयान ही बना था। राम मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा के समय भी पूरे देश में जो वातावरण नजर आया वह उन बयानों की ही प्रतिक्रिया थी । ऐसे में श्री राजा का  संदर्भित बयान आगामी लोकसभा चुनाव में  इंडिया गठबंधन के विरुद्ध मुद्दा बने तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए । भारत को उपमहाद्वीप और विभिन्न प्रांतों को देश मानने की जो बात द्रमुक सांसद ने कही वह तमिलनाडु की मौजूदा सरकार के संरक्षण में पनप रही अलगाववादी भावना का परिचायक है। स्मरणीय है आजादी के बाद से ही कश्मीर घाटी में  शेख अब्दुल्ला के नेतृत्व में  अलगाववादी भावनाओं की जो अभिव्यक्ति होती रही उसे हल्के में लिए जाने का दुष्परिणाम  कालांतर में आतंकवाद के रूप में सामने आया । ऐसा ही  पंजाब में हुआ जहां पंजाबी सूबे की मांग के पीछे  खालिस्तान की योजना फलती - फूलती रही। ऐसा लगता है तमिलनाडु अलगाववाद के नए केंद्र के रूप में विकसित होने की राह पर है। आजादी के पहले से ही रामास्वामी पेरियार के नेतृत्व में प्रारंभ हुआ आंदोलन सनातन और उत्तर भारत के प्रति घृणा के तौर पर सामने आया जिसे बाद में  हिन्दी विरोध की शक्ल दी गई।  तमिलनाडु की मौजूदा राजनीति में चुनौतीविहीन होने से द्रमुक  , खुलकर भारत से अलग होने के  सपने को साकार करने आगे बढ़ रही है। बीते कुछ महीनों में आए बयानों से उसकी देश विरोधी मानसिकता का खुलासा हो रहा है। ऐसे में  राष्ट्रीय पार्टियों को एकजुट होकर आगे आना चाहिए।  द्रमुक नेताओं के देश विरोधी बयानों को अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर नजरंदाज किया जाता रहा तो देश के दक्षिणी छोर पर नए  आतंकवाद का उदय होना निश्चित है जिसे  तटवर्ती राज्य होने से विदेशी सहायता की आशंका से भी इंकार नहीं किया जा सकता। जहां देश की अखंडता  खतरे में हो वहां राजनीतिक नफे - नुकसान की सोच को किनारे रखना ज्यादा जरूरी है।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 5 March 2024

छोटे - छोटे दलों के सामने राष्ट्रीय पार्टियों का झुकना अच्छा संकेत नहीं


लोकसभा चुनाव के कार्यक्रम की घोषणा आगामी सप्ताह होने की उम्मीद है। भाजपा सहित कुछ पार्टियों द्वारा उम्मीदवारों का ऐलान भी किया जाने लगा है। राष्ट्रीय और क्षेत्रीय स्तर पर गठबंधन बनाने का सिलसिला जारी है। एक - दूसरे के प्रबल प्रतिद्वंदी नेता गलबहियां करते देखे जा रहे हैं।  दल बदलने का क्रम भी अनवरत जारी है। लेकिन इस समूचे परिदृश्य में जो बात देखने मिल रही है वह है क्षेत्रीय के साथ अति छोटे दलों का दबाव।  दक्षिण भारत के  आंध्र प्रदेश में  वाय.एस.आर कांग्रेस और तेलुगु देशम पार्टी ही प्रमुख हैं। चूंकि दोनों की तासीर कांग्रेस विरोधी होने से भाजपा उनके साथ तालमेल बिठाना चाहती है । तमिलनाडु में कांग्रेस और द्रमुक दोनों इंडिया गठबंधन में शामिल हैं। लेकिन कांग्रेस द्रमुक के रहमो - करम पर निर्भर है। यही हाल भाजपा का है जिसके तेजतर्रार प्रदेश अध्यक्ष अन्ना मलाई की पदयात्रा ने पार्टी की पहिचान  को तमिलनाडु के सुदूर इलाकों तक तो पहुंचा दिया  किंतु इसके बाद भी वह अन्ना द्रमुक पार्टी से अपने गठबंधन को पुनर्जीवित करना चाह रही है। केरल में कांग्रेस , मुस्लिम लीग सहित अनेक स्थानीय दलों के साथ स्थायी तौर पर गठबंधन में है। कर्नाटक में  विधानसभा चुनाव हारने के बाद भाजपा ने पार्टी जनता दल ( सेकुलर ) से हाथ मिलाया। वहीं महाराष्ट्र में शिवसेना और एनसीपी से टूटकर आए धड़े को साथ लेकर चलना उसकी मजबूरी है। जबकि कांग्रेस , उद्धव ठाकरे और शरद पवार के साथ चलने बाध्य है। उ.प्र में भाजपा  सभी 80  सीटें जीतने का विश्वास जता रही है किंतु जाट मतों को आकर्षित करने के लिए उसने  जयंत चौधरी को तोड़ा । इसी तरह  ओमप्रकाश राजभर , संजय निषाद और अनुप्रिया पटेल जैसे एक दो जिलों के नेताओं  के साथ सीटों का बंटवारा करना उसकी मजबूरी है । यही हाल कांग्रेस का है जिसने सपा द्वारा दी गईं 17 सीटों  पर संतोष कर लिया। बिहार में भाजपा ने नीतीश कुमार को अपने पाले में खींचकर भले ही इंडिया गठबंधन को झटका दे दिया लेकिन उपेंद्र कुशवाहा , जीतनराम मांझी और चिराग पासवान उसके लिए सिरदर्द बने हुए हैं। यही हाल कांग्रेस का है जो पूरी तरह तेजस्वी यादव के इशारों पर चलने बाध्य है। इसका उदाहरण तीन दिन पूर्व पटना में हुई रैली थी जिसमें शरीक होने राहुल गांधी ग्वालियर में अपनी न्याय यात्रा  छोड़कर दौड़े - दौड़े गए। प. बंगाल में ममता बैनर्जी किसी को भी उपकृत करने राजी नहीं हैं। उत्तर पूर्वी राज्यों की  राजनीति में तो  क्षेत्रीय दलों का ही वर्चस्व है। हरियाणा में भाजपा की सरकार दुष्यंत चौटाला के सहारे है। वहीं पंजाब में भाजपा और कांग्रेस दोनों का स्वतंत्र अस्तित्व नहीं हैं। जम्मू कश्मीर में भी क्षेत्रीय दल कांग्रेस पर हावी हैं।  दिल्ली में कभी कांग्रेस और भाजपा प्रमुख  प्रतिद्वंदी हुआ करती थीं किंतु आम आदमी पार्टी ने कांग्रेस का सूपड़ा साफ कर दिया। बावजूद उसके वह उसके द्वारा दी गई लोकसभा की 7 में से तीन सीटें लड़ने पर चुपचाप राजी हो गई जबकि पंजाब में  उसने कांग्रेस को ठेंगा दिखा दिया। बारीकी से देखें तो देश के ज्यादातर राज्यों में क्षेत्रीय दल और उनके नेता राष्ट्रीय पार्टियों पर दबाव बनाने की स्थिति में हैं । उनमें से कुछ तो एक - दो सीटों से ज्यादा प्रभाव नहीं रखते। लेकिन उनके नखरे सहना भाजपा और कांग्रेस की मजबूरी हो गई है। भाषायी और सांस्कृतिक विविधता के कारण हमारे देश में इस तरह का राजनीतिक ढांचा चौंकाता तो नहीं है लेकिन इन छोटे दलों का दृष्टिकोण  बहुत ही सीमित और निहित स्वार्थों पर केंद्रित होने से  इनके अनुचित दबाव भी बड़ी पार्टियों को सहन करने पड़ते हैं। हालांकि गठबंधन राजनीति कोई नई बात नहीं है। 1967 के आम चुनाव के बाद संविद सरकारों के रूप में इसकी शुरुआत हुई थी। उसके बाद से राष्ट्रीय और प्रादेशिक स्तर पर गठबंधन बनते बिगड़ते रहे और नब्बे के दशक से इन्होंने स्थायी रूप ले लिया। दूसरी तरफ  क्षेत्रीय दलों से  अलग हुए नेताओं ने जाति आधारित अति छोटे दल बना डाले । जातिवादी राजनीति के उदय के बाद जबसे सोशल इंजीनियरिंग चुनावी व्यूह रचना का हिस्सा बनी तबसे इन अति छोटे दलों के नेताओं की सौदेबाजी और बढ़ने लगी है। इनके दबाव के सामने राष्ट्रीय पार्टियों का झुक जाना चिंतित करने वाला है क्योंकि कोई ईमान - धर्म न होने के कारण ये नेता अपनी स्वार्थपूर्ति के लिए भी किसी भी स्तर तक गिर जाते हैं। उ.प्र में स्वामीप्रसाद मौर्य इसके नवीनतम उदाहरण हैं। यद्यपि गठबंधन राजनीति देश को एकसूत्र में बांधकर रखने में बेहद उपयोगी है किंतु सीमित प्रभाव वाले गैर जिम्मेदार नेताओं के सामने राष्ट्रीय दलों का झुक जाना अच्छा संकेत नहीं है।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 4 March 2024

सांसदों - विधायकों की घूसखोरी रोकने सर्वोच्च न्यायालय का साहसिक फैसला


सर्वोच्च न्यायालय ने आज ऐतिहासिक निर्णय सुनाते हुए सांसदों और विधायकों को पैसा लेकर सवाल पूछने और मत देने पर अपराधिक प्रकरण से छूट दिए जाने के 1998 के सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय को पलटते हुए स्पष्ट कर दिया कि सांसद या विधायक द्वारा सदन में किए गए किसी भी कार्य के लिए ली गई घूस को अभियोजन से मुक्त रखने का फैसला गलत था क्योंकि यह  सार्वजनिक जीवन में  ईमानदारी को नष्ट कर देता है। मुख्य न्यायाधीश डी. वाय. चंद्रचूड़ की अध्यक्षता  वाली 7 सदस्यों की संविधान पीठ ने 1998 में न्यायमूर्ति  पी. वी. नरसिम्हा राव वाली 5 सदस्यों की संविधान सभा द्वारा 3 : 2 से दिए उस फैसले को पलट दिया जिसके अनुसार सांसदों और विधायकों को सदन में भाषण देने , प्रश्न पूछने अथवा मत देने के लिए मिली घूस अपराध की श्रेणी में नहीं आती। श्री चंद्रचूड़ ने स्पष्ट तौर पर कहा कि ऐसा कृत्य जनप्रिधिनिधियों को मिले विशेषाधिकार की श्रेणी में नहीं आता और उस पर मुकदमा चलाया जा सकता है। सांसदों और विधायकों को सदन के भीतर  किसी कृत्य या कथन के लिए अपराधिक प्रकरण से मिली छूट उनके विशिष्ट कर्तव्यों की दृष्टि से उचित थी। आजादी के बाद के कुछ दशकों तक जनप्रतिनिधि अपने विशेषाधिकार के साथ जुड़े सम्मान के प्रति जिम्मेदार रहे । इस कारण इस बारे में कभी कोई समस्या उत्पन्न नहीं हई। लेकिन सत्तर और अस्सी के दशक से जनप्रतिनिधियों के आचरण में अनेक प्रकार की विकृति दिखाई देने लगी। दलबदल नामक  बीमारी का प्रकोप जैसे - जैसे बढ़ता गया वैसे - वैसे पैसे का प्रवाह संसदीय प्रणाली में तेज होने लगा। राज्यसभा में मतदान के समय निर्दलीय विधायकों की खरीद - फरोख्त आम हो चली। सदन में मत देने , प्रश्न पूछने और किसी निहित उद्देश्य से  भाषण देने के लिए जनप्रतिनिधियों के घूस दिए जाने की घटनाएं भी चर्चा का विषय बनने लगीं। स्व.नरसिम्हा राव की सरकार के बहुमत को साबित करने के लिए झारखंड मुक्ति मोर्चे के सांसदों को दी गई घूस  प्रकरण से जबरदस्त राजनीतिक बवाल पैदा हुआ था। 1998 में   सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए  निर्णय में झारखंड से उक्त पार्टी की विधायक सीता सोरेन द्वारा राज्यसभा चुनाव हेतु मिली घूस को अपराध योग्य नहीं माना गया था। आज सुनाए गए फैसले ने उसे निरस्त करते हुए जो व्यवस्था दी वह संसदीय जीवन में आई विकृतियों को कितना दूर कर पाएगी ये तत्काल कह पाना तो कठिन है किंतु जब विशेषधिकारों के गलत उपयोग को मिले कानूनी संरक्षण को समाप्त करने की शुरुआत हो ही गई है तब जनप्रतिनिधियों को मिलने वाली सामंती सुविधाओं पर उठने वाले सवालों पर भी विमर्श होना चाहिए। बेहतर हो सर्वोच्च न्यायालय इन मामलों में स्वतः संज्ञान लेकर अपना अभिमत सार्वजनिक करे। ऐसे अनेक विषयों पर वह अक्सर वह  कहकर पल्ला झाड़ लेता है कि ये काम संसद अथवा चुनाव आयोग का है। प्रजातंत्र सुचारू रूप से चले उसके लिए जिस नियंत्रण और संतुलन की बात सोची जाती है उसमें न्यायपालिका की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। उसके ऊपर न तो राजनीतिक दबाव होता है और न ही नौकरशाही का । संविधान संबंधी किसी भी पेचीदगी के समय राष्ट्रपति तक सर्वोच्च न्यायालय की सलाह लेते हैं। यद्यपि कार्यपालिका , विधायिका और न्यायपालिका तीनों अपने - अपने स्तर पर स्वायत्त हैं किंतु किसी भी विवाद का अंतिम हल करने का अधिकार न्यायपालिका का ही है। और ऐसे में यदि उसे लगता है कि शेष दोनों स्तंभ उन्हें प्राप्त विशेषाधिकारों का अनुचित लाभ ले रहे हैं तब सलाह या नाराजगी के तौर पर बिना निर्णय सुनाए भी न्यायपालिका अपनी मंशा जाहिर कर सकती है । अनेक मामलों में उसने ऐसा किया भी । हालांकि विधायिका को ये लगता है कि जरूरत से ज्यादा न्यायिक सक्रियता उसके क्षेत्राधिकार में हस्तक्षेप है और इसीलिए दोनों पक्ष इस बारे में तीखी टिप्पणियां करते रहते हैं। लेकिन  न्यायपालिका निर्विकार भाव से लोकतांत्रिक व्यवस्था की बेहतरी के लिए सुझाव दे तो उन्हें सकारात्मक भाव से लिया जाना चाहिए। हो सकता है आज का फैसला भी सांसदों - विधायकों को नागवार गुजरे और जवाबी तौर पर वे भी न्यायाधीशों को मिले  विशेषाधिकारों पर उंगली उठाएं किंतु इस बात को भला कौन सही मानेगा कि संसद और विधानसभा में सवाल पूछने या मत देने के लिए ली गई घूस अपराध की श्रेणी में न मानी  जाए। श्री चंद्रचूड़ और उनके साथ पीठ में शामिल अन्य न्यायाधीश बधाई के पात्र हैं जो उन्होंने 26 वर्ष  हुए फैसले को गलत ठहराने का साहस दिखाया। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 2 March 2024

पेट्रोल ,डीजल और रसोई गैस तो सस्ते किए ही जा सकते हैं


2023 की आखिरी तिमाही में भारत की जीडीपी द्वारा 8 फीसदी का आंकड़ा पार करने की खबर आते ही शेयर बाजार ने सर्वकालिक उच्च स्तर को छू लिया । उसी के साथ ये जानकारी भी सार्वजनिक हुई कि फरवरी में जीएसटी से 1.68 लाख करोड़ रु. की प्राप्ति हुई। जो अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय एजेंसियां भारत की विकास दर को लेकर संशय में थीं वे भी अनुमान बदलने मजबूर हो रही हैं । आर्थिक जगत में चल पड़ी चर्चाओं से पता चलता है कि इस वित्तीय वर्ष में भारत की जीडीपी वृद्धि 8 फीसदी तक होने की संभावना है जो बड़ी सफलता कही जाएगी । ऐसे समय जब दुनिया रूस - यूक्रेन और इजरायल - हमास युद्ध की विभीषिका से गुजर रही हो तथा अनेक विकसित देशों का अर्थतंत्र लड़खड़ाने की स्थिति में आ गया तब भारतीय अर्थव्यवस्था की ऊंची छलांग निश्चित तौर पर सुखद है। चीन की प्रगति में गिरावट आने से भारत को लेकर भी आशंकाएं व्यक्त की जाने लगी थीं। सबसे चौंकाने वाली बात ये है कि जापान जैसी ठोस अर्थव्यवस्था तक डगमगाने लगी है। ब्रिटेन , जर्मनी , फ्रांस सभी संकट से गुज़र रहे हैं। ऐसे में भारत का आर्थिक मोर्चे पर शानदार प्रदर्शन आशान्वित कर रहा है। अर्थव्यवस्था के जो स्थापित मानदंड हैं वे सभी बेहतर भविष्य का इशारा कर रहे हैं। उपभोक्ता बाजार में अच्छी मांग से उत्पादन इकाइयों का उत्साह बढ़ा है। निर्यात में भी निरंतर सफलता मिल रही है। गृह निर्माण के अलावा , सड़कों और फ्लायओवर का काम तेजी से चलने के कारण उद्योग - व्यवसाय को सहारा मिलने के साथ ही श्रमिकों को काम भी मिल रहा है। सड़क , रेल और वायु मार्ग से परिवहन वृद्धि की ओर है। घरेलू पर्यटन में आशातीत परिणाम बेहद सुखद संकेत हैं। प्रत्यक्ष करों का संग्रह बढ़ना आर्थिक स्थिति के ठोस होने का प्रमाण है। इसीलिए सरकार जनहित की योजनाओं पर मुक्तहस्त से खर्च करने की स्थिति में है। मुफ्त अनाज योजना को पांच साल तक के लिए बढ़ा देना ये साबित करता है कि कृषि क्षेत्र अपने निर्धारित लक्ष्य को हासिल करने में सक्षम है। इसी माहौल के कारण भारत दुनिया भर के निवेशकों के लिए आकर्षण का केंद्र बन गया है और दिग्गज बहुराष्ट्रीय कंपनियां भारत में इकाई लगाने तत्पर हैं। आर्थिक सुधारों ने उद्योगों के लिए जो अनुकूल वातावरण बनाया उसके सुपरिणाम सामने हैं। वहीं कच्चे तेल के आयात से अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले बोझ को कम करने की दिशा में किए गए प्रयास फलीभूत होने लगे हैं। बैटरी चलित वाहनों की बढ़ती बिक्री इसका सबूत है। वैकल्पिक ऊर्जा के तौर पर सौर ऊर्जा का बढ़ता उत्पादन अर्थव्यवस्था के लिए संजीवनी का काम करेगा। इतनी सारी उपलब्धियां देखकर प्रत्येक नागरिक को गौरव की अनुभूति होती है। इसकी वजह से वैश्विक स्तर पर भी भारत की प्रतिष्ठा और विश्वसनीयता बढ़ी है। लेकिन इसके बावजूद आम जनता के बड़े वर्ग के चेहरे पर मुस्कान नहीं दिखाई दे रही क्योंकि उत्साहवर्धक आंकड़ों के बावजूद उसकी जेब खाली है। जीएसटी का मासिक आंकड़ा बीते साल भर से 1.5 लाख करोड़ से ऊपर बना हुआ है। इसी तरह प्रत्यक्ष करों की आय भी उम्मीद से ज्यादा है ।लेकिन जीएसटी की दरों के साथ ही पेट्रोल - डीजल और रसोई गैस की ऊंची कीमतें विरोधाभासी तस्वीर पेश करती हैं। सरकार में बैठे लोगों का कहना है कि गरीब कल्याण की योजनाएं और कार्यक्रमों तो पर वह दिल खोलकर खर्च कर रही है। उसकी इस नीति पर किसी को एतराज नहीं है किंतु अर्थव्यवस्था को गति प्रदान करने वाले नौकरपेशा, मध्यम श्रेणी व्यापारी , लघु उद्योग संचालक और स्वरोजगार से आजीविका चलाने वालों की अपेक्षाओं और आवश्यकताओं का भी ध्यान रखा जाना चाहिए। यदि अर्थव्यवस्था की स्थिति मजबूत है तब जीएसटी की दरों को कम करने के साथ ही उसके केवल दो स्तर अर्थात 5 और 12 प्रतिशत ही रखे जाएं। रही बात पेट्रोल - डीजल की तो इनकी कीमतें बेशक वैश्विक स्तर पर तय होती हैं । लेकिन पेट्रोलियम कंपनियों द्वारा बीते कुछ समय से अनाप - शनाप मुनाफा अर्जित किए जाने के बाद भी दाम नहीं घटाए जाने से आम जनता नाखुश है। यद्यपि लोकसभा चुनाव नजदीक होने के कारण केंद्र सरकार जीएसटी संबंधी नीतिगत फैसले नहीं ले सकती क्योंकि उसकी कौंसिल में राज्य भी हैं जो अपनी आय का हवाला देते हुए न तो दरें कम करने राजी होते हैं और न ही पेट्रोलियम पदार्थों को उसके अंतर्गत लाने पर सहमति देते हैं । फिर भी पेट्रोल - डीजल और रसोई गैस सस्ते करना तो सरकार के अधिकार क्षेत्र में ही है। और लोकसभा चुनाव की आचार संहिता लागू होने के पहले तो ऐसा किया ही जा सकता है। 

 -रवीन्द्र वाजपेयी