Friday, 15 March 2024

पेट्रोल - डीजल के दामों में और कमी होनी चाहिए थी


गत सप्ताह महिला दिवस पर रसोई गैस सिलेंडर के दाम 100 रुपये घटाकर केंद्र सरकार ने महिला मतदाताओं को खुश करने का दांव चला। हालांकि  उसका कितना लाभ चुनाव में मिलेगा ये  अभी कह पाना कठिन है । उसके बाद बाद से ही ये माना जा रहा था   कि पेट्रोल - डीजल की कीमतों में भी कुछ न कुछ राहत मोदी सरकार प्रदान करेगी जिससे आम जनता के साथ ही उद्योग - व्यापार जगत को भी प्रसन्नता का अनुभव हो। गत दिवस वह उम्मीद पूरी हो गई जब पता चला कि केंद्र सरकार ने पेट्रोल - डीजल के दाम  2 रुपये प्रति लीटर घटा दिये हैं। गत दिवस चुनाव आयोग में दो आयुक्तों की नियुक्ति हो जाने के बाद लोकसभा चुनाव की घोषणा  किसी भी समय हो सकती है । उसके बाद आचार संहिता लग जाने के कारण सरकार इस तरह की किसी भी राहत की घोषणा नहीं कर सकेगी इसलिए उसने आनन - फानन में 2 रुपये प्रति लीटर दाम घटा दिये। यद्यपि अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि होने पर भी भारतीय तेल कंपनियां  मूल्यों को स्थिर रखे रहीं किंतु बीते काफी समय से वैश्विक बाजार में कीमतें कम होने के कारण उनको भरपूर लाभ हो रहा था। तभी से ये अपेक्षा थी कि आम उपभोक्ता को भी उसका लाभ मिलेगा । लेकिन सरकार और तेल कंपनियां इस बारे में मौन साधे बैठी रहीं। विपक्ष सहित आर्थिक विशेषज्ञ भी इसे लेकर सरकार की आलोचना करते रहे। ये आरोप भी लगता रहा कि निजी क्षेत्र की पेट्रोलियम कंपनियों को मुनाफाखोरी का मौका देने सरकार दाम नहीं घटा रही। बहरहाल, अब जब चुनाव की घोषणा होने को है तब जाकर केंद्र सरकार ने मेहरबानी की। इसे चुनावी दांव कहने में कुछ भी गलत नहीं है किंतु जो आंकड़े आ रहे थे उनके आधार पर कीमतें  कम से कम 10 रुपये प्रति लीटर कम होनी चाहिए थीं। हो सकता है सरकार ने वैश्विक हालातों का आकलन करते हुए मामूली कमी की किंतु जब पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतों को सीधे बाजार से जोड़ दिया गया तब सरकार को उसमें दखलन्दाजी बंद कर देना चाहिए।  हमारे देश में उदारवादी अर्थव्यवस्था लागू होने के बाद भी सरकार पेट्रोल -डीजल की कीमतों पर अपना नियंत्रण नहीं छोड़ना चाहती। प्रधानमंत्री को टीवी पर आकर कीमतें कम करने का ऐलान करना पड़े ये अटपटा लगता है। भले ही लम्बे समय तक कीमतें स्थिर रहीं किंतु इस दौरान पेट्रोलियम कंपनियों ने जितना मुनाफा कमाया उसे देखते हुए कीमतों में ज्यादा कटौती होनी चाहिए थी। पेट्रोल - डीजल और रसोई गैस जैसी चीजों के दामों को यदि राजनीतिक नफे - नुकसान से परे रखा जाए तो फिर उनमें बदलाव होते समय न तो चुनाव की चिंता रहेगी न ही जनता की नाराजगी अथवा खुशी की। वैसे भी इस तरह के फैसले बाजार द्वारा निर्धारित होने से चुनाव आचार संहिता से मुक्त होना चाहिए किंतु उसके लिए केंद्र और राज्य सरकारों को उससे अलग होना पड़ेगा। कीमतों के अलावा जो अन्य कर लगते हैं वे भी तदनुसार घटते - बढ़ते रहें तो फिर राजनीतिक श्रेय और आरोपों  का सिलसिला थम जायेगा। कुछ लोग ये तर्क भी देते हैं कि कीमतों को कम करने से खपत बढ़ती है जिससे कच्चे तेल का आयात करने पर विदेशी मुद्रा खर्च होती है । सरकार इसीलिए इलेक्ट्रानिक वाहनों को प्रोत्साहित कर रही है किंतु उनके पूरी तरह उपयोग में आने में समय लगेगा। तब तक पेट्रोल - डीजल से ही चूंकि गुजारा होना है इसलिये इनकी कीमतों को जनता की पहुँच में बनाये रखने के लिए सरकार अपने कर ढांचे में अपेक्षित सुधार करे ये जन अपेक्षा है। उस दृष्टि से गत दिवस कीमतों में जो कमी की गई वह बहुत कम है। इस बारे में सबसे कारगर उपाय तो पेट्रोल - डीजल को जीएसटी के दायरे में लाने का है जिससे उनकी कीमतों में  एकरूपता आयेगी और जनता के साथ ही उद्योग जगत भी राहत का अनुभव करेगा। चुनाव घोषणा पत्र में भाजपा इसका वायदा कर सकती है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 14 March 2024

एक देश एक चुनाव के मुद्दे पर इस लोकसभा चुनाव में भी बहस होना चाहिए


एक देश एक चुनाव के लिए पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता में गठित समिति ने आज राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को 18000 पृष्ठों  की अपनी रिपोर्ट सौंप दी। गत वर्ष सितंबर में बनाई इस समिति ने 191 दिनों के भीतर विभिन्न वर्गों से चर्चा उपरांत यह रिपोर्ट तैयार की। इसमें पूरे देश में लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ करवाने  का तरीका सुझाया गया है।  समिति में श्री कोविंद के अलावा गृहमंत्री अमित शाह, कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी , पूर्व केंद्रीय मंत्री गुलाम नबी आजाद राजनेता के तौर पर थे। उनके  अलावा वित्त आयोग के पूर्व अध्यक्ष एन. के. सिंह, लोकसभा के पूर्व महासचिव सुभाष काश्यप  और पूर्व मुख्य आयुक्त सतर्कता संजय कोठारी सदस्य थे। कानूनविद हरीश साल्वे ने विधि विशेषज्ञ के रूप में अपनी सेवा प्रदान की। यह रिपोर्ट लोकसभा चुनाव के बाद बनने वाली सरकार के सामने पेश होगी। यदि सब कुछ ठीक - ठाक रहा तब बात , संविधान संशोधन के जरिये इस  दिशा में आगे बढ़ेगी। वर्तमान में भाजपा , बीजद और अन्ना द्रमुक एक साथ चुनाव के पक्षधर हैं जबकि कांग्रेस, तृणमूल और द्रमुक विरोध में। जब यह रिपोर्ट अगली संसद में विचारार्थ पेश होगी तब बाकी पार्टियों की मंशा जाहिर होगी। इसलिए बेहतर होगा यदि भाजपा इस लोकसभा चुनाव में ही एक देश एक चुनाव को मुद्दा बनाये।  इस व्यवस्था का सबसे बड़ा लाभ यह होगा कि इससे न सिर्फ सरकार अपितु राजनीतिक दलों का भी खर्च बचेगा। चुनावी चंदे के नाम पर जो भ्रष्टाचार होता है उसे कम करने के लिए भी लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ करवाया जाना देश और लोकतंत्र दोनों के हित में होगा। इलेक्टोरल बॉण्ड को सर्वोच्च न्यायालय द्वारा प्रतिबंधित किये जाने के बाद से राजनीतिक दलों को मिलने वाले चंदे का मामला सुर्खियों में है। कांग्रेस इन दिनों अपनी खस्ता आर्थिक हालत का रोना रो रही है। अलग - अलग चुनाव होने के कारण पूरे पांच साल चुनाव का मौसम बना रहता है।  एक राज्य से फुर्सत मिले तो दूसरे का चुनाव आ धमकता है। लोकसभा चुनाव के कुछ माह बाद अनेक राज्यों के चुनाव होने वाले हैं। इसके कारण राष्ट्रीय राजनीति का क्षेत्रीयकरण हो गया है। मुफ्तखोरी को बढ़ावा देने वाली योजनाओं के बल पर चुनाव जीतने का फॉर्मूला अर्थतंत्र को तबाह किये दे रहा है। वोटों की मंडी सजी है। मतदाता ग्राहक बना दिया गया है। संघीय ढांचे के लिए भी हमेशा चलने वाले चुनाव नुक्सानदेह हो चले हैं। केंद्र में बैठी सरकार के लिए अलग - अलग होने वाले चुनाव नीतिगत गतिरोध का कारण बनता जा रहा है। कुल मिलाकर चुनाव की कभी न टूटने वाली श्रृंखला देश के विकास के साथ ही केंद्र - राज्य संबन्धों में दरार पैदा करने की वजह बन रही है। ऐसे में एक देश एक चुनाव के सुझाव का सभी राजनीतिक दलों द्वारा समर्थन किया जाना देश हित में होगा। भाजपा और उसके सहयोगी दलों को चाहिए 2024 के लोकसभा चुनाव में अपने चुनावी वायदे में 2029 के आम चुनाव में लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ  करवाने की बात शामिल करते हुए मतदाताओं को इसकी आवश्यकता बताएं। देश में एक बड़ा वर्ग है जो रोज - रोज की चुनाव चर्चा से ऊब चुका है। यदि इस मुद्दे को राष्ट्रीय बहस का विषय बनाएं तो समाज में सकारात्मक सोच रखने वाले लोग मुखर होकर अपनी राय व्यक्त करेंगे। वैसे भी चुनाव में इस तरह के विषय जनता में जागरूकता पैदा करने में कारगर होते हैं क्योंकि इनसे देश का भविष्य तय होता है? समिति द्वारा पेश की गई रिपोर्ट के बाद अब इस विषय पर सामाजिक स्तर पर भी विमर्श होना जरूरी है क्योंकि चुनाव पर होने वाले बेतहाशा खर्च का बोझ अंततः जनता पर ही पड़ता है। भ्रष्टाचार पर नकेल कसना हो तो चुनाव की मौजूदा व्यवस्था को बदलकर एक देश एक चुनाव को स्वीकार करना फायदेमंद होगा। इससे राष्ट्रीय एकता को बल मिलने के साथ ही राजनीति की दिशा और दशा दोनों में सुधार होगा।


 - रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 13 March 2024

सीएए का विरोध कर राम मन्दिर वाली गलती दोहरा बैठा विपक्ष

सीएए ( नागरिकता संशोधन अधिनियम) की अधिसूचना जारी होते ही राजनीतिक जगत में बवाल मच गया। हालांकि यह अधिनियम संसद द्वारा 11 दिसंबर 2019 पारित किये जाने के बाद अगले ही दिन राष्ट्रपति के हस्ताक्षर उपरांत कानून की शक्ल ले चुका था किंतु केंद्र सरकार  कतिपय कारणों से उसे लागू करने से बचती रही। शायद शुरुआत में हुए विरोध के  ठंडा पड़ने का इंतजार करना इसके पीछे की रणनीति रही होगी। ये भी कहा जा सकता है कि उसके बाद  कुछ राज्यों में भाजपा को मिली पराजय ने सरकार के बढ़ते कदम रोक दिये हों। एक कारण असम सहित कुछ पूर्वोत्तर राज्यों में इस कानून के प्रति लोगों की नाराजगी को भी माना जा सकता है जहाँ भाजपा का अच्छा खासा प्रभाव रहा है। लेकिन गत वर्ष उत्तर भारत के कुछ राज्यों में भाजपा को मिली जोरदार जीत के बाद से केंद्र सरकार का भय दूर हुआ। सनातन को लेकर लोगों में आई जागरूकता और फिर राम मंदिर में प्राण - प्रतिष्ठा के बाद से देश भर में हिंदुत्व का  अभूतपूर्व  वातावरण निर्मित होने से भी सरकार को महसूस हुआ कि सीएए को प्रभावशील करने का ये सबसे सही समय है।  इसमें पाकिस्तान, अफगनिस्तान और बांग्लादेश से आये गैर मुस्लिम शरणार्थियों को भारत की नागरिकता प्रदान करने के लिए सम्बन्धित कानून में कुछ रियायत दी गई। इसलिये मुसलमानों के बीच ये दुष्प्रचार किया जाने लगा कि यह उनको भारत से निकाल बाहर करने बनाया गया है। चूंकि मुस्लिमों के मन में मोदी सरकार को लेकर काफी ज़हर भर दिया गया है इसलिए वे भी बहकावे में  आ गए। सही बात तो ये है कि इस कानून के बारे  में जितनी भी भ्रांतियां मुसलमानों के मन में हैं उनके पीछे कट्टरपंथी मुस्लिम धर्मगुरुओं के साथ ही उन विपक्षी दलों का भी हाथ है जो मुसलमानों का वोट हासिल करने के लिए उन्हें मुख्य धारा से अलग - थलग रखने में लगे रहते हैं। जहाँ तक बात मुसलमानों को सीएए से बाहर रखे जाने की है तो उक्त तीनों  चूंकि इस्लामिक देश हैं इसलिए वहाँ से मुसलमानों का पलायन आपवादस्वरूप ही होता है। ऐसे शरणार्थियों को  भारत की नागरिकता दी भी गई है। विख्यात पाकिस्तानी गायक अदनान सामी इसका उदाहरण हैं जिन्होंने भारत की नागरिकता हेतु आवेदन किया और वह उन्हें प्रदान भी की गई। दूसरी तरफ जो हिन्दू उक्त देशों में रह रहे हैं , धार्मिक आधार पर उत्पीड़न होने से उनके पास और किसी देश की नागरिकता लेने का अवसर ही नहीं है।  उनके धर्मस्थल तोड़े जा रहे हैं, लड़कियों को जबरन मुस्लिम युवकों से निकाह हेतु बाध्य किया जाता है और धर्म परिवर्तन हेतु भी दबाव बनाया जाता है। यही कारण है कि वहाँ  उनकी जनसंख्या लगातार घटती जा  रही है। ये वर्ग अपनी अस्मिता के अलावा जान बचाने भारत तो आ गया किंतु बरसों से  शरणार्थियों के लिए बने शिविरों में बदहाली की ज़िंदगी जी रहा है। इनमें सिख, जैन, बौद्ध और ईसाई भी हैं  जिनकी स्थिति उन  देशों में धार्मिक अल्पसंख्यकों की है। इसके साथ ही उनकी जड़ें कहीं न कहीं अविभाजित भारत से जुड़ी रहीं। सीएए को लेकर ममता बैनर्जी जैसी नेता ये अफवाह  फैला रही हैं कि इसके लागू होते ही बांग्ला देश के जो घुसपैठिये अवैध रूप से भारत में रह रहे हैं उनको वापस भेजा जाएगा। एक भ्रम ये भी फैलाया जा रहा है कि सीएए के अंतर्गत जिन लोगों को नागरिकता मिलेगी उनको उन क्षेत्रों में बसाया जाएगा जहाँ भाजपा कमजोर है। प. बंगाल, तमिलनाडु और केरल के मुख्यमंत्री इसीलिए सीएए के विरोध में आसमान सिर पर उठाने आमादा हैं। आज दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद कीजरीवाल भी मैदान में कूद पड़े। कोई इस कानून को विभाजनकारी बता रहा है तो किसी को यह भाजपा का चुनावी दांव लग रहा है जिसके जरिये वह धार्मिक आधार पर मतदाताओं को गोलबंद करना चाह रही है। हालांकि सीएए के विरोधी भी जानते हैं कि उसकी अधिसूचना जारी होने के बाद भी हजारों लोगों को नागरिकता चुटकी बजाकर नहीं दी जा सकेगी क्योंकि प्रक्रिया बेहद जटिल है। और फिर केंद्र सरकार का पूरा अमला लोकसभा चुनाव की व्यवस्थाओं में व्यस्त है। ये देखते हुए विपक्ष एक बार फिर वही गलती दोहरा बैठा जो राम मन्दिर में प्राण -  प्रतिष्ठा के बहिष्कार के रूप में की थी। वह सीएए का विरोध न करता तब भी  भाजपा विरोधी दलों को मुस्लिम मत थोक में मिलना निश्चित था। लेकिन उनके जबरदस्त विरोध की प्रतिक्रिया  स्वरूप हिन्दू मतदाता और भी अधिक संख्या में भाजपा के साथ आ सकते हैं। हो सकता है भाजपा के रणनीतिकार भी यही चाहते हों। जो भी हो लेकिन सीएए का विरोध करने वालों ने हिन्दू  जनमानस को  भाजपा के और नजदीक करने का काम किया है। वरना यह एक साधारण कानून ही है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 12 March 2024

इलेक्टोरल बॉण्ड का ब्यौरा : छिपाने से संदेह और बढ़ेगा



 सर्वोच्च न्यायालय द्वारा भारतीय स्टेट बैंक को इलेक्टोरल बॉण्ड के विवरण का आज शाम तक खुलासा करने और उसके बाद उन्हें वेब साइट के जरिये सार्वजनिक करने संबंधी जो आदेश दिया गया वह  निश्चित तौर पर देश में स्वतंत्र और निष्पक्ष न्यायपालिका का प्रमाण है। उल्लेखनीय है 15 फरवरी को न्यायालय ने इलेक्टोरल बॉण्ड की बिक्री पर रोक लगाकर उसका विवरण गोपनीय रखे जाने को गलत बताते हुए कहा था कि लोकतंत्र में जनता को यह जानने का अधिकार है कि राजनीतिक  दलों को किन स्रोतों से चंदा प्राप्त होता है। यद्यपि उक्त फैसले पर एक प्रतिक्रिया ये भी आई कि सर्वोच्च न्यायालय ने इलेक्टोरल बॉण्ड की व्यवस्था तो रोक दी किंतु चुनाव आयोग और सरकार को इस बारे में सुझाव नहीं दिया कि राजनीतिक चंदे का पारदर्शी वैकल्पिक तरीका क्या होना चाहिए ? बहरहाल उस बारे में अलग से बहस की जा सकती है किंतु इलेक्टोरल बॉण्ड का विवरण देने के लिए भारतीय स्टेट बैंक द्वारा 30 जून तक का समय मांगा जाना ही अनेक संदेहों को जन्म देने वाला था। सामान्य स्थिति में तो संभवतः न्यायालय उसके अनुरोध को स्वीकार करते  कुछ महीनों बाद तक का समय प्रदान कर देता । लेकिन लोकसभा चुनाव करीब होने से उस पर भी मानसिक दबाव था क्योंकि जिस उद्देश्य से इलेक्टोरल बॉण्ड पर रोक लगाई गई  , बैंक को मोहलत देने से वह अधूरा रह जाता। विपक्ष का आरोप है कि  बॉण्ड व्यवस्था में चंदा देने वाले की पहचान गोपनीय रखे जाने का सबसे अधिक लाभ भाजपा ने उठाया जिसे कुल राशि का आधे से ज्यादा चंदा मिला। लेकिन उससे भी बड़ी जो बात विपक्ष उजागर करना चाह रहा है वह उन उद्योगपतियों के नाम हैं जिनके बारे में कहा जाता है कि उन्हें केंद्र में भाजपा की सरकार आने के बाद विशेष तौर पर उपकृत किया गया। हालांकि इलेक्टोरेल बॉण्ड के जरिये विभिन्न राजनीतिक दलों को मिले चन्दे का ब्यौरा उजागर होने से तृणमूल, द्रमुक और बीआरएस जैसे क्षेत्रीय दल भी सवालों के घेरे में आएंगे जिन्हें सीमित प्रभाव क्षेत्र के बाद भी  असाधारण रूप से बड़ी राशि प्राप्त हुई। यद्यपि  इस बारे में ये कहा जा सकता है कि जिसके पास सत्ता है उसे ज़ाहिर तौर पर दूसरों से अधिक धनराशि मिलती है। जिस प्रकार उद्योगपति केंद्र सरकार से व्यावसायिक लाभ उठाने के लिए सत्तारूढ़ दल को ज्यादा चंदा देते हैं वैसी ही रणनीति उनकी राज्य में होती है। राहुल गाँधी के निशाने पर रहने वाले उद्योगपति गौतम अडानी को छत्तीसगढ़ और राजस्थान की पिछली सरकारों ने भी दिल खोलकर ठेके दिये। ऐसे में उन्होंने वहाँ कांग्रेस को भी प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष तौर पर सहायता की होगी। ये देखते हुए स्टेट बैंक द्वारा बॉण्ड के माध्यम से आये चंदे का ब्यौरा देने से बचने का कोई अर्थ नहीं था। यदि उस पर ऐसा करने का सरकारी दबाव रहा तो उसे भी औचित्यहीन ही कहा जाएगा। अर्थात सर्वोच्च न्यायालय यदि स्टेट बैंक को 30 जून तक का समय दे भी देता तो उससे जो जानकारी आज आने वाली है वह चुनाव के बाद आयेगी। यदि उसमें कुछ अनुचित होगा तो जितना हल्ला आज मचेगा उतना ही उस वक्त होगा। इलेक्टोरल बॉण्ड लागू करने के पीछे जो कारण बताया गया वह राजनीतिक चन्दे में काले धन के उपयोग को रोकना था। चन्दा देने वाले की पहचान इस आधार पर जाहिर न करने का तर्क दिया जाता है कि जिन दलों को वह सहयोग नहीं देगा वे नाराज होकर उसके व्यवसायिक हितों पर चोट पहुंचायेंगे। ये आशंका निराधार भी नहीं है क्योंकि राजनेता अपनों पे करम, गैरों पे सितम की भावना से ऊपर नहीं हैं। लेकिन  लोकतंत्र को पारदर्शी बनाना है तो चन्दा सम्बन्धी विवरण को गोपनीय रखे जाने से बचना होगा। ये देखते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने गत दिवस जो फैसला दिया उसका राजनीतिक पार्टियों की छवि पर क्या असर होगा ये उतना महत्वपूर्ण नहीं जितना  यह कि इससे आये दिन उड़ने वाली आधारहीन खबरों पर  विराम लगने के साथ ही नेताओं और उद्योगपतियों की संगामित्ती का पता चल जायेगा। यदि चंदे का एहसान नियम विरुद्ध फायदा देकर चुकाया गया हो तो यह बात जनता के संज्ञान में आना जरूरी है। इस डर से कि यह चुनावी मुद्दा बन जायेगा किसी जानकारी पर परदा डालने से संदेह और बढ़ता है। सर्वोच्च न्यायालय ने स्टेट बैंक पर जो दबाव बनाया उससे यदि किसी राजनेता या पार्टी को  असहज स्थिति का सामना करना पड़े तो ये उसका सिर दर्द है।

-रवीन्द्र वाजपेयी


Monday, 11 March 2024

ममता की एकला चलो नीति गठबंधन की मजबूती के लिए नुकसानदेह



      आख़िरकार तृणमूल कांग्रेस ने प.बंगाल में एकला चलो की नीति को अपनाते हुए सभी 42 सीटों पर अपने उम्मीदवार की घोषणा कर ही दी। शुरुआती चर्चाओं के मुताबिक ममता बैनर्जी ने कांग्रेस को 2019 में अधीररंजन चौधरी द्वारा जीती सीट के अतिरिक्त एक सीट और देने का प्रस्ताव दिया था। जबकि कांग्रेस 6 सीटें मांग रही थी। ताकि एक - दो अपने सहयोगी वामपन्थियों को दे सके। लेकिन ममता चूंकि वामपंथी खेमे को सबसे बड़ा दुश्मन मानती हैं इसलिये उन्होंने कांग्रेस की मांग को ठुकरा दिया।  

     हालांकि राहुल गाँधी सहित अन्य कांग्रेस नेता ये दोहराते रहे कि सीट बंटवारे पर उनकी तृणमूल से चर्चा जारी है किंतु  कल एक साथ सभी 42 उमीदवारों की घोषणा करने के साथ सुश्री बैनर्जी ने कांग्रेस के आशावाद पर पानी फेर दिया। यद्यपि वे प. बंगाल में सीटों के बंटवारे के प्रति अपनी अनिच्छा अनेक मर्तबा व्यक्त कर चुकी थीं फिर भी इंडिया गठबंधन के लिहाज से एक - दो सीट की उम्मीद कांग्रेस को उनसे थी। लेकिन अधीर रंजन द्वारा छोड़े गए शब्दबाणों ने खेल खराब कर दिया। उल्लेखनीय है वे खुलकर आरोप लगाते रहे कि दीदी (ममता) और मोदी के बीच गुप्त समझौता है। आग में घी का काम किया संदेशखाली कांड पर श्री चौधरी द्वारा ममता सरकार पर किये गए हमलों ने। 

     वैसे कांग्रेस के प्रति तृणमूल अध्यक्ष की नाराजगी तब ही बढ़ गई थी जब प. बंगाल में  न्याय यात्रा के प्रवेश के पूर्व उनके द्वारा किये फोन का जवाब देने की सौजन्यता तक राहुल गाँधी ने नहीं दिखाई। जब उन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे से शिकायत की तब ईमेल से आमंत्रण आया। ममता को ये अपना अपमान लगा और वे उस यात्रा से दूर ही रहीं। राहुल ने भी उस बात को गम्भीरता से नहीँ लिया और न ही किसी कांग्रेस नेता ने भी उनका गुस्सा ठण्डा करने की कोशिश  की। 

इस तरह मतभेदों की खाई चौड़ी होती गई। ममता का हौसला तब और बुलन्द हो गया जब अरविंद केजरीवाल ने कांग्रेस को पंजाब में एक भी सीट देने से इंकार कर दिया। जबकि कांग्रेस से आम आदमी पार्टी ने दिल्ली की 4 , हरियाणा की  1 और गुजरात की 2 लोकसभा सीटें झटक लीं। इस तरह पंजाब के बाद प. बंगाल दूसरा राज्य बन गया जिसमें सत्तारूढ़ पार्टी ने इंडिया गठबंधन में शामिल रहते हुए कांग्रेस को एक भी सीट देने से इंकार कर दिया। और इसका जो कारण बताया वह ये कि कांग्रेस जीतने की स्थिति में नहीं है। उ.प्र में अखिलेश यादव ने केवल 20 फीसदी सीटें कांग्रेस को देकर 80 फीसदी अपने पास रखीं। बिहार में भी कांग्रेस , लालू प्रसाद यादव की राजद की मोहताज है। तमिलनाडु में भी कमोबेश यही हालात हैं। ऐसे में केवल महाराष्ट्र ही वह बड़ा राज्य है जहाँ कांग्रेस सहयोगी दलों से ज्यादा सीटें लड़ेगी। 

  कर्नाटक  , हिमाचल, तेलंगाना,म.प्र , राजस्थान, छत्तीसगढ़ , हरियाणा और गुजरात में कांग्रेस भाजपा की  प्रमुख प्रतिद्वंदी है लेकिन इन सभी में केवल कर्नाटक और तेलंगाना में ही पार्टी को अच्छी सीटें मिलने की आशा है। बाकी में भाजपा बहुत मजबूत स्थिति में है। ये स्थिति  कांग्रेस के लिए चिंता का विषय होना चाहिए क्योंकि इंडिया का सबसे प्रमुख सदस्य होने के बावजूद क्षेत्रीय दल उसे बड़ा भाई मानने को राजी नहीं हैं। पहले आम आदमी पार्टी और अब तृणमूल कांग्रेस ने कांग्रेस के साथ जो व्यवहार किया वह गठबंधन की मूल भावना के विरुद्ध है। 

ममता और अरविंद उन नेताओं में से हैं जो राहुल गाँधी को प्रधानमन्त्री बनाये जाने का खुलकर विरोध करते आये हैं। लेकिन कांग्रेस को पूरी तरह कमजोर करने की उनकी नीति गठबंधन के भविष्य के लिए खतरे का संकेत है। अब तक प्रधानमन्त्री का चेहरा सामने नहीं ला पाने के कारण वैसे भी इंडिया को अपेक्षित प्रतिसाद नहीं मिल पा रहा। ऐसे में यदि सहयोगी दल एक दूसरे को निपटाने में जुट गए तो फिर चुनाव आते - आते गठबंधन में विश्वास का संकट और गहरा होता जाएगा।

- रवीन्द्र वाजपेयी

Sunday, 10 March 2024

कांग्रेस : जात पर न पाँत पर से जातिगत जनगणना तक



गत दिवस म.प्र के वरिष्ट कांग्रेस नेता सुरेश पचौरी ने भाजपा में प्रवेश करते समय जो बातें कहीं उनमें से एक ये भी थी कि जो कांग्रेस पहले जात पर न पांत पर का नारा लगाती थी , वही अब जाति का मसला उठा रही है जिससे जातीय तनाव में वृद्धि हो रही है। उनका इशारा राहुल गाँधी द्वारा राष्ट्रीय स्तर पर जातिगत जनगणना करवाए जाने के वायदे की तरफ था। उल्लेखनीय है गत वर्ष नवम्बर में जिन पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव हुए उनमें भी  राहुल ने उक्त वायदा पार्टी के घोषणापत्र में रखवाया था किंतु उसका विशेष लाभ उसे नहीं मिल सका। तेलंगाना में मिली जीत का कारण भी चंद्रशेखर राव सरकार के विरोध में बने माहौल के अलावा भाजपा द्वारा त्रिकोणीय संघर्ष की स्थिति बना देना रहा।

     बिहार में जिन नीतीश कुमार ने जातिगत जनगणना करवाई वे खुद भाजपा के साथ आ गए। हालांकि इंडिया गठबंधन के अनेक सदस्य इसके समर्थक हैं। लेकिन ममता बैनर्जी ने अपने राज्य में जातिगत जनगणना करवाने से साफ इंकार कर दिया। श्री पचौरी जैसी सोच रखने वाले काफी लोग कांग्रेस में हैं किंतु उनमें श्री गाँधी का विरोध करने की हिम्मत नहीं है। एक जमाना था जब दलितों और अल्पसंख्यकों के साथ ही उच्च जातियों के मत भी कांग्रेस को थोक के भाव मिला करते थे। लेकिन नीतिगत अस्पष्टता के कारण वे बिखरते चले गए। सवर्णों में भाजपा की पैठ बढ़ी तो अन्य पिछड़ी जातियाँ मंडलवादी पार्टियों के साथ चली गईं। बाबरी ढांचा गिरने के बाद मुसलमान भी लालू, मुलायम जैसे नेताओं के पक्ष में लामबंद हो गए। सोशल इंजीनियरिंग का बेहतर उपयोग करते हुए भाजपा ने अति पिछड़ी जातियों में सेंध लगा दी। कुल मिलाकर कांग्रेस का जातिगत जनाधार बुरी तरह डगमगा गया। धार्मिक ध्रुवीकरण भी उसके विपरीत जाने लगा। परिणामस्वरूप कुछ राज्यों को छोड़कर वह बाकी में क्षेत्रीय दलों की पिछलग्गू  बनने मजबूर हो चुकी है।

     ऐसे में अचानक श्री गाँधी को लगा कि जाति की राजनीति कांग्रेस को इस दुरावस्था से उबार लेगी।  इसलिए वे जाति के आधार पर अधिकारियों की संख्या और उनके विभागों के बजट जैसे मुद्दे उठाने लगे। उसी के साथ ही उन्होंने जातिगत जनगणना का राग छेड़ दिया। लेकिन वे भूल जाते हैं कि ऐसा करने से कांग्रेस का रहा - सहा आधार भी खिसक जायेगा। जिन राज्यों में आज भी वह मुख्य मुकाबले में है वहाँ उच्च जातियों का अच्छा- खासा वोट बैंक उसके साथ खड़ा नजर आता है। लेकिन वे जबसे जातिगत जनगणना का राग अलापने लगे हैं तभी से यह वर्ग भी उससे छिटकने लगा। विशेष रूप से राम मन्दिर में प्राण - प्रतिष्ठा के समारोह का बहिष्कार करने के बाद से उच्च और मध्यम वर्ग के हिन्दू मतदाताओं की बड़ी संख्या कांग्रेस से विमुख हो गई है। हाल ही में कांग्रेस छोड़ने वाले ज्यादातर नेताओं ने राम मन्दिर मुद्दे पर पार्टी के रवैये से नाराज होने की बात स्वीकार की। हाल ही में जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने भी बिना राहुल का नाम लिए टिप्पणी की कि अम्बानी  , अडानी, चौकीदार चोर है जैसे मुद्दे असरहीन हो चुके हैं। उन्होंनें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर किये जाने वाले व्यक्तिगत हमलों को भी आत्मघाती बताते हुए कहा कि इनसे विपक्ष का नुकसान होता है।

     लेकिन राहुल ऐसी सलाहों पर कोई ध्यान देते होते तो कांग्रेस बीते पांच साल में उबर सकती थी किंतु वह कमजोर होती जा रही है। 2019  के चुनाव में श्री गाँधी ने चौकीदार चोर और अंबानी का मुद्दा जोरशोर से उठाया था किंतु जनता ने उन्हें भाव नहीं दिया। लेकिन उसके बाद भी वे श्री मोदी और अंबानी पर निजी हमले करने से बाज नहीं आये और अब जाति के जाल में उलझकर कांग्रेस के मूल सिद्धांत को तिलांजलि देने में जुटे हुए हैं।

     उन्हें इस बात की चिंता करनी चाहिए कि न्याय यात्रा जिस राज्य से गुजरी है उसमें या तो काँग्रेस के कुछ नेताओं ने पार्टी छोड़ दी या इंडिया गठबंधन के साथियों ने उनसे दूरी बना ली। यदि अभी भी श्री गाँधी ने अपना रवैया नहीं बदला और तात्कालिक फायदे के लिए कांग्रेस के मूल चरित्र को नष्ट करने में जुटे रहे तो पार्टी की स्थिति में सुधार होने की उम्मीद छोड़ देनी चाहिए। 


-रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 9 March 2024

चुनाव पूर्व ही विपक्ष के हौसले पस्त करने की रणनीति पर चल रही भाजपा


प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी राजनीति के बेहद चतुर खिलाड़ी हैं। रास्वसंघ के प्रचारक के बाद भाजपा में संगठन का काम करते हुए वे जब गुजरात के मुख्यमंत्री बने तब वे विधायक तक नहीं थे। इसलिए सत्ता  संचालन की उनकी क्षमता को लेकर सवाल उठते रहे। लेकिन जल्द ही उन्होंने साबित कर दिखाया कि वे कुशल प्रशासक भी हैं। मुख्यमंत्री रहते हुए ही वे अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर आकर्षण का केंद्र बन गए थे। इसीलिए जब भाजपा ने उन्हें प्रधानमंत्री का उम्मीदवार बनाया तब जनता में उसकी अनुकूल प्रतिक्रिया हुई जिसका प्रमाण 2014 के लोकसभा चुनाव में मिला। प्रधानमंत्री के तौर पर उनकी कार्यशैली ने देश और दुनिया को प्रभावित किया और वे 2019 में और भी ज्यादा बहुमत के साथ सत्ता में लौटे। बीते पांच वर्ष में उन्होंने अनेक ऐसे काम कर डाले जिनकी वजह से वे एक मजबूत नेता के तौर पर छाए हुए हैं। ये कहना कतई गलत न होगा कि वे  समकालीन विश्व के सबसे लोकप्रिय और प्रभावशाली नेताओं में से हैं। ऐसे में 2024 के लोकसभा चुनाव में उनकी जीत में  किसी को संदेह नहीं है। अब तक  सभी चुनाव पूर्व सर्वेक्षण सत्ता में उनकी वापसी की  संभावना व्यक्त कर रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों के बीच भी बहस का मुद्दा  यह है कि भाजपा को 370 और एनडीए को 400 सीटें मिलेंगी अथवा नहीं ? स्मरणीय है खुद प्रधानमंत्री ने इस आंकड़े को सार्वजनिक विमर्श का विषय बनवा दिया। लेकिन ये सवाल भी पूछा जा रहा है कि जब प्रधानमंत्री 370 और 400 पार का नारा बुलंद करते हुए आत्मविश्वास से भरे हुए हैं तब भाजपा दूसरे दलों के नेताओं को क्यों शामिल कर रही है? और  छोटे - छोटे दलों से गठबंधन की उसे क्या जरूरत है ? उल्लेखनीय है नीतीश कुमार के साथ ही भाजपा ने जयंत चौधरी को भी एनडीए में  शामिल कर  इंडिया गठबंधन को जबरदस्त धक्का दिया। उसके बाद भी भाजपा  सहयोगियों की संख्या बढ़ाने में जुटी हुई है । ओडीसा में बीजद और आंध्र प्रदेश में तेलुगु देशम से बातचीत इसका प्रमाण है। तमिलनाडु में अन्ना द्रमुक को दोबारा साथ लाने के प्रयास भी चल रहे हैं। ऐसे ही पंजाब में अकालियों से गठजोड़ की बिसात बिछ गई है।  दूसरे दलों से नेताओं को भी भाजपा में लाने का अभियान चल रहा है। आज म.प्र में पूर्व केंद्रीय मंत्री सुरेश पचौरी, पूर्व विधायक संजय शुक्ला और पूर्व सांसद गजेंद्र सिंह राजूखेड़ी सहित अनेक छोटे बड़े नेताओं ने भाजपा की सदस्यता ले ली। ऐसी ही खबरें अन्य राज्यों से भी लगातार आ रही हैं। ये तंज भी सुनने में आ रहा है कि कांग्रेस मुक्त भारत का नारा लगाते - लगाते पार्टी कांग्रेस युक्त भाजपा हुई जा रही है। लेकिन क्या अन्य पार्टियां अपने यहां आने वाले को अपनी सदस्यता देने से इंकार कर रही  रही हैं ? कर्नाटक विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा से पूर्व मुख्यमंत्री जगदीश शेट्टार कांग्रेस में आ गए जिन्हें टिकिट भी मिला। हाल ही में वे भाजपा में लौट आये। म.प्र में भी भाजपा के सस्थापक सदस्य पूर्व मुख्यमंत्री कैलाश जोशी के पुत्र दीपक  कांग्रेस में आकर चुनाव लड़े। कहने का आशय ये कि विचारधारा तो कोई मुद्दा रहा नहीं।  आजादी के बाद नेहरु जी ने भी प्रजा समाजवादी पार्टी सहित अन्य विपक्षी दलों के नेताओं को कांग्रेस में शामिल करने का अभियान चलाया था। प्रधानमंत्री चूंकि चुनावी लड़ाई के सिद्धहस्त खिलाड़ी हैं इसलिये  वे कांग्रेस सहित अन्य विपक्षियों का मनोबल कमजोर करने की नीति पर चल रहे हैं। इसी के अंतर्गत शिवसेना और एनसीपी में विभाजन हुआ। इंडिया गठबंधन में भी कांग्रेस  आम आदमी पार्टी जैसे दल के साथ है जो दिल्ली और पंजाब में उसकी बर्बादी का कारण बनी। महाराष्ट्र में भी घोर हिंदूवादी नेता उद्धव ठाकरे को उसने साथ रखा है। इसी तरह श्री ठाकरे उस कांग्रेस की गोद में बैठे हुए हैं जो वीर सावरकर की देशभक्ति  पर सवाल उठाती है। अरविंद केजरीवाल से जब एक पत्रकार ने सवाल किया कि देश के जिन भ्रष्टतम नेताओं की सूची उनके द्वारा जारी की गई थी उनमें से अनेक इंडिया गठबंधन में उनके साथ हैं। तब वे बोले कि मोदी और शाह को सत्ता से हटाने ऐसा करना आवश्यक है। उनका यह उत्तर वर्तमान राजनीतिक शैली और संस्कृति का सही चित्र है। सही बात ये है कि इंडिया गठबंधन का मकसद केवल केंद्र की सत्ता से भाजपा को बेदखल करना है। शुरुआती दौर में वह भाजपा पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने में सफल भी दिखाई दिया। मोदी विरोधी मीडिया को भी उसकी जीत सुनिश्चित लगने लगी किंतु भाजपा ने उस संभावना को कमजोर करते हुए उल्टा दबाव बना दिया। एनडीए का कुनबा  बढ़ाकर और कांग्रेस में लगातार सेंध लगाकर वह विपक्ष के हौसले पस्त करने में जुटी हुई है। और उसका प्रयास कामयाब होता भी दिख रहा है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी