Friday, 22 March 2024

लॉटरी किंग द्वारा द्रमुक और तृणमूल को दिये बड़े चंदे को क्या नाम देंगे राहुल


सर्वोच्च न्यायालय की सख्ती के बाद आखिरकार स्टेट बैंक ने इलेक्टोरल बॉण्ड के वे सभी विवरण सार्वजनिक कर दिये जिनसे ये पता चल सकेगा कि बॉण्ड  किसने खरीदा और किस पार्टी ने उसे भुनाया। जो मोटी - मोटी जानकारी आई है उसके अनुसार लॉटरी का व्यवसाय करने वाली फ्यूचर गेमिंग नामक कंपनी ने सबसे अधिक 1300 करोड़ के बॉण्ड खरीदे थे। जब यह बात उजागर हुई तभी से राजनीतिक क्षेत्रों में बवाल मचा हुआ है। इसका कारण उस कंपनी के कारोबार और  मुनाफे को देखते हुए चंदे की राशि का गैर अनुपातिक होना है। उस पर छापे और संपत्ति जप्ती की कार्रवाई भी हो चुकी थी। ऐसे में भाजपा सबसे ज्यादा निशाने पर थी। चूंकि उसे बॉण्ड के जरिये सबसे अधिक चंदा हासिल हुआ इसलिए माना जा रहा था कि उक्त लॉटरी कंपनी ने भाजपा को ही सबसे अधिक उपकृत किया होगा। लेकिन जब द्रमुक ने उसे मिले बॉण्ड का विवरण जारी किया तब ये बात सामने आई कि उसे मिले कुल 656 करोड़ के बॉण्ड में 503 करोड़ के बॉण्ड फ्यूचर गेमिंग द्वारा दिये गए। वहीं तृणमूल कांग्रेस को उसने 542 करोड़ रु. के बॉण्ड देकर उपकृत किया। भाजपा को उससे 100 करोड़ मिले तो कांग्रेस को भी लॉटरी कंपनी ने 50 करोड़ की मदद दी। दूसरे सबसे बड़े दानदाता मेघा समूह ने 1192 करोड़ के बॉण्ड खरीदे जिनमें 584 करोड़ भाजपा और 110 करोड़ कांग्रेस के खाते में गए। इन आंकड़ों के अलावा अन्य जिन कंपनियों ने इलेक्टोरल बॉण्ड खरीदे उनमें ज्यादातर ने बड़ा हिस्सा भाजपा को देने के साथ ही कुछ न कुछ कांग्रेस को भी दिया। फ्यूचर गेमिंग और मेघा समूह द्वारा दिये चंदे को लेकर सबसे अधिक सवाल उठ रहे थे। एक छापे के बाद बॉण्ड खरीदने तो दूसरा उसे मिले बड़े ठेकों के कारण चर्चा में आया। कांग्रेस नेता राहुल गाँधी बॉण्ड से मिले चंदे को मोदी सरकार द्वारा की गई हफ्ता वसूली बताते फिर रहे हैं। इसे उन्होंने आजादी के बाद का सबसे बड़ा घोटाला भी बताया। चूंकि भाजपा को कुल खरीदे गए बॉण्ड का सबसे अधिक हिस्सा मिला इसलिए उसको कठघरे में खड़ा किया जाना सबसे आसान था। ये आशंका भी राजनीतिक जगत में जताई जाने लगी थी कि जैसे ही स्टेट बैंक बॉण्ड के नंबरों के साथ लाभार्थी का नाम उजागर करेगा त्योंही मोदी सरकार पर आसमान टूट पड़ेगा। और लोकसभा चुनाव में यह मुद्दा भाजपा के साथ वैसे ही चिपक जायेगा जैसा 1989 में बोफोर्स स्व. राजीव गाँधी के साथ जुड़ गया था। लेकिन गत दिवस पूरी जानकारी आने के बाद अब श्री गाँधी हफ्ता वसूली के आरोप को किस मुँह से दोहराएंगे क्योंकि चाहे फ्यूचर गेमिंग हो या मेघा समूह, दोनों ने कांग्रेस को भी बॉण्ड के जरिये चन्दा तो दिया ही। रही बात कम ज्यादा की तो जाहिर है पार्टी को जब भरपूर  वोट  मिलते  थे तब उस पर नोटों की भी जमकर बरसात होती थी। लेकिन जैसे - जैसे उसे मिलने वाले वोट घटते गए वैसे - वैसे चंदा बाजार में भी उसका भाव गिरता गया। राहुल यदि इस मामले में निष्पक्ष हैं तब उनको इंडिया समूह के सबसे ताकतवर घटकों क्रमशः द्रमुक और तृणमूल को फ्यूचर गेमिंग से मिले  भारी - भरकम चंदे पर भी सवाल उठाना चाहिए। जिसने कुल 1300 करोड़ के बॉण्ड का तीन चौथाई हिस्सा उक्त दोनों पार्टियों को देने के साथ ही कांग्रेस को भी 50 करोड़ से नवाजा। लॉटरी का व्यवसाय करने वाली कंपनी द्वारा द्रमुक और तृणमूल को किस दबाव में तकरीबन 1000 करोड़ दिये ये सवाल कांग्रेस को अपने सहयोगियों से पूछना चाहिए। राहुल गाँधी विपक्ष के सबसे प्रमुख नेता हैं। सरकार को कठघरे में खड़ा करना उनका मुख्य कार्य है किंतु   आरोप लगाने के पहले उनको ये देखना चाहिए कि वे कहीं उन्हीं के गले न पड़ जाएं। इस मामले में  जल्दबाजी में वे भूल गए कि उनकी पार्टी भी चंदे के खेल में शामिल रही जिसे वे हफ्ता वसूली बताते रहे। जानकार लोग पहले से ही ये मानकर चल रहे थे कि बॉण्ड विवाद का अंत हवाला कांड जैसा होगा। चूंकि कांग्रेस सहित अनेक विपक्षी पार्टियों ने भी बॉण्ड से चंदा लिया इसलिए वे किसी और पर आरोप लगाने का अधिकार खो चुकी हैं। द्रमुक और तृणमूल को लॉटरी किंग से मिली बड़ी रकम भी विपक्ष को संदेह के घेरे में लाती है। देखना ये है कि श्री गाँधी अपने सहयोगी दलों को मिले बड़े  चंदे को क्या नाम देते हैं? 


-रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 21 March 2024

म.प्र कांग्रेस में ऐसी भगदड़ पहले कभी नहीं दिखी

म.प्र देश के उन राज्यों में है जहाँ की राजनीति पूरी दो ध्रुवीय हो चुकी है। एक जमाना था जब समाजवादी आंदोलन का जबरदस्त प्रभाव  इस राज्य में  था। लेकिन 70 के दशक से जनसंघ ने उसे पीछे छोड़कर मुख्य विपक्षी दल के रूप में अपना स्थान बना लिया। बावजूद उसके समाजवादी और वामपंथी कुछ क्षेत्रों में अपना अस्तित्व बनाये रख सके। लेकिन जनता पार्टी के विघटन के बाद ज्योंही भाजपा का उदय हुआ इस प्रदेश में वह कांग्रेस के लिए एकमात्र  चुनौती बनती गई। 1989 में उठी रामलहर के बाद तो बाकी गैर कांग्रेसी दल धीरे - धीरे अप्रासंगिक होते गए। सपा - बसपा के कुछ विधायक जीते किंतु वे भी दलबदल के खेल में लिप्त होने  के कारण जनता की निगाहों से गिरते गए। 2003 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 10 साल चली दिग्विजय सिंह सरकार को पराजित कर म.प्र में भारी बहुमत से जो सरकार बनाई वह 2018 तक अपराजेय चलती रही। शुरुआती दौर में उमाश्री भारती और बाबूलाल गौर के रूप में जल्दी - जल्दी मुख्यमंत्री बदलने से पार्टी की क्षमता पर सवाल उठे लेकिन शिवराज सिंह चौहान के गद्दी संभालने के बाद म.प्र भी गुजरात जैसा भाजपा का मजबूत गढ़ बन गया। हालांकि 2018 में वह गच्चा खा गई और कुछ सीटों की कमी से सत्ता उसके हाथ से खिसक गई किंतु मात्र 15 महीने बाद ही ज्योतिरादित्य सिंधिया की बगावत के सहारे शिवराज फिर मुख्यमंत्री बन बैठे। कांग्रेस ने उसके बाद के समय में काफी जोर लगाया। मुख्यमंत्री पद गंवाने के बाद कमलनाथ घायल शेर की तरह बेहद आक्रामक रहे और 2023 के चुनाव में वापसी का आत्मविश्वास कांग्रेस कार्यकर्ताओं में भरने  में  काफी हद तक सफल रहे। अधिकांश सर्वेक्षण म.प्र में नजदीकी मुकाबला बता रहे थे। लेकिन शिवराज ने लाड़ली बहना योजना लाकर बाजी उलट दी। पार्टी के आला नेतृत्व ने 2018 के कटु अनुभव से सबक लेते हुए जबरदस्त मोर्चेबंदी की और कांग्रेस की उम्मीदों पर पानी फेर दिया। जो कमलनाथ सत्ता में आने का ख्वाब देख रहे थे उनकी स्थिति भी 2003 वाले

दिग्विजय जैसी हो गई। चूंकि टिकिट वितरण से व्यूहरचना तक पूरा अभियान उनके नियंत्रण में रहा इसलिए वही हार के लिए दोषी माने गए। स्थिति यहाँ तक बिगड़ी कि कांग्रेस हाईकमान ने उन्हें  बिना कुछ कहे सुने प्रदेश अध्यक्ष के साथ ही नेता प्रतिपक्ष  पद पर नये चेहरे बिठा दिये। ये निश्चित रूप से प्रदेश कांग्रेस से  कमलनाथ युग की समाप्ति कही जा सकती है। दिग्विजय को तो श्री नाथ  ही हाशिये पर धकेल चुके थे। हर पार्टी में ऐसा दौर दस - बीस सालों में आता है। लेकिन कांग्रेस विधानसभा चुनाव की पराजय के बाद जिस तरह से हतोत्साहित हुई उसके कारण उसका पूरा ढांचा चरमराने की स्थिति निर्मित हो गई है। लोकसभा चुनाव में मजबूती से उतरने की बजाय वह पराजयबोध का शिकार है। बड़े नेता चुनाव लड़ने से इंकार कर रहे हैं। वहीं नई पीढी़ के नेता सुनिश्चित हार के कारण मुँह चुराते देखे जा सकते हैं। बड़े नेताओं के साथ दूसरी पंक्ति के नेता - कार्यकर्ता बड़ी संख्या में पार्टी छोड़ते जा रहे हैं। कमलनाथ और उनके सांसद बेटे नकुल नाथ के भाजपा में जाने की बिसात भी लगभग बिछ चुकी थी किंतु 1984 के सिख विरोधी दंगों में श्री नाथ की भागीदारी आड़े आ गई। लेकिन दो - तीन दिन उनकी तरफ से बनाये गए रहस्य के कारण कांग्रेस के भीतर  उनकी रही - सही साख और धाक भी मिट्टी में मिल गई। जबलपुर के महापौर जगत बहादुर सिंह अन्नू और सुरेश पचौरी भाजपा में आ गए।  विधानसभा चुनाव हारे कुछ कांग्रेस प्रत्याशी भी कांग्रेस को छोड़ चुके हैं। श्री नाथ के अपने गढ़ से कांग्रेस के लोगों का भाजपा में आने का सिलसिला जारी है। इस सबसे लगता है प्रदेश में काँग्रेस दुर्दशा के कगार पर आ गई है। ऐसी भगदड़ तो उसमें 1977 , 1989 और 2003 के बाद भी नहीं दिखाई दी थी। इससे साफ हो जाता है कि म.प्र में उसके पास ऐसा कोई वरिष्ट नेता नहीं है जो कार्यकर्ताओं की नाराजगी और निराशा दूर कर सके। इसी तरह से युवा नेताओं में एक भी इस लायक नहीं है जो हारी हुई सेना में उत्साह का संचार कर उसे नई लड़ाई के लिए तैयार कर सके। ऐसा लगता है भाजपा ने सुनियोजित तरीके से कांग्रेसियों की भर्ती का जो अभियान चला रखा है उसका उद्देश्य उसके मनोबल को पूरी तरह तोड़ना ही है।  पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व म.प्र को लेकर जिस तरह से उदासीन है वह भी चौंकाने वाला है। राहुल गाँधी की न्याय यात्रा भी प्रदेश के काँग्रेसजनों में जोश नहीं भर सकी। यही कारण है कि भाजपा इस  बार  छिंदवाड़ा सहित सभी 29 लोकसभा सीटें जीतने का दावा कर रही है। नकुल नाथ के क्षेत्र में जिस तरह का पलायन कांग्रेस से हो रहा है उसे देखकर यह उम्मीद सही हो जाए तो आश्चर्य नहीं होगा। सही बात तो ये है कि दिग्विजय सिंह और कमलनाथ ने अपने पुत्र प्रेम के चलते कांग्रेस  में नई पीढी़ का नेतृत्व पनपने ही नहीं दिया। अब तो आम कांग्रेसी भी कहने लगे हैं कि क्या पता इन दोनों के परिवारजन भी जल्द ही भाजपा में नजर आएं। याद रहे दिग्विजय के भाई लक्ष्मण सिंह 2003 की हार के बाद भाजपा में जाकर सांसद बन गए थे। 


-रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 20 March 2024

शुद्ध हवा की गारंटी भी चुनावी मुद्दा होना चाहिए

लोकसभा चुनाव का शंखनाद हो चुका है। राजनीतिक दलों द्वारा वायदों की झड़ी लगाई जा रही है। आजकल इनको गारंटियां कहा जाने लगा है। हर नेता अपनी गारंटी पूरी होने की गारंटी देता फिर रहा है। कोई नगद बांटने की बात कह रहा है तो कोई नौकरी का आश्वासन देकर मतदाताओं को लुभाने में जुटा है। जो माँगोगे उससे ज्यादा मिलेगा वाला माहौल है। ऐसे में मतदाता उसी तरह भ्रमित हैं जैसे किसी शापिंग मॉल में चारों तरफ लगे डिस्काउंट सेल के इश्तहार देखकर होता है। लेकिन आसमान से तारे तोड़कर लाने के वायदों के इस मौसम में आई एक खबर ने हर उस व्यक्ति को परेशान कर दिया जिसे अपने साथ -साथ अपनी संतानों के भविष्य की भी चिंता है। दुनिया की पांचवी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने के बाद अब ये दावा किया जा रहा है कि भारत जल्द ही तीसरे क्रमांक पर आने वाला है। इसके संकेत भी मिलने लगे हैं किंतु यह गौरव हासिल होने के पहले भारत को दुनिया का तीसरे सबसे प्रदूषित देश घोषित हो गया  । विश्व के सबसे प्रदूषित 50 शहरों में से 42 हमारे यहाँ के हैं । सबसे अधिक शर्मिंदगी की बात ये है कि जी -20 जैसे प्रतिष्ठित अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन की मेजबानी करने वाली दिल्ली सबसे प्रदूषित राजधानी घोषित हुई है। हालांकि प्रदूषण के मापदंडों पर पाकिस्तान  पहले और बांग्लादेश दूसरे स्थान पर है।  सबसे दुखदायी आंकड़ा ये है कि भारत की 96 फीसदी आबादी की साँसों में प्रदूषित हवा प्रवाहित हो रही है। प्रधानमंत्री बनने के बाद ही नरेंद्र मोदी ने राष्ट्रीय स्वच्छता अभियान का शुभारंभ किया था।। इसके अंतर्गत शहरों के बीच स्वच्छता प्रतिस्पर्धा रखी जाने लगी। प्रतिवर्ष  सर्वेक्षण के उपरांत परिणाम घोषित किये जाते हैं। शुरुआत में इस अभियान को लेकर प्रधानमंत्री का उपहास भी उड़ाया गया। राहुल गाँधी ने तो यहाँ तक कहा कि जिन युवाओं के हाथों को काम देना था उनको प्रधानमंत्री ने झाड़ू पकड़ा दी। यद्यपि उस अभियान से जन - जागरूकता बढ़ी है किंतु ये कहना भी गलत नहीं होगा कि स्वच्छता और पर्यावरण संरक्षण के प्रति अपेक्षित गंभीरता का अभाव है। ऐसे में ये प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि ऐसे मुद्दे राजनीतिक विमर्श में शामिल क्यों नहीं होते ? पंजाब के किसान जो पराली जलाते हैं उसकी वजह से दिल्ली सहित समीपवर्ती बड़े इलाके पर धुएं की चादर बिछ जाती है। सर्वोच्च न्यायालय तक इस मामले में सख्ती दिखा चुका है। आम  आदमी पार्टी जब दिल्ली की सत्ता में आई तब वह पराली के लिए पंजाब को कसूरवार ठहराया करती थी किंतु जैसे ही वहाँ सरकार बनी उसकी शिकायत खत्म हो गई। आजकल चुनाव में सभी पार्टियां मुफ्त बिजली, पानी , इलाज़ जैसे वायदे करती हैं। इनके बल पर चुनाव जीते भी जाते हैं। लेकिन कोई भी पार्टी प्रदूषण को पूरी तरह समाप्त करने की गारंटी नहीं देती जबकि यह भी विकास का पैमाना होना चाहिए। दरअसल शुद्ध हवा और शुद्ध पानी जैसे विषय चुनाव घोषणापत्र में इसलिए शामिल नहीं होते क्योंकि जनता इन्हें लेकर उदासीन है। इसी के चलते प्रतिदिन अरबों रुपयों का बोतल बंद पानी बिकता है। इसके अलावा पानी के पाउच एवं जार का कारोबार भी आसमान छू रहा है। हालांकि इस पानी की गुणवत्ता भी संदिग्ध रहती है। प्रदूषण दूर करने के लिए सरकार अपने स्तर पर कुछ - कुछ करती  है। न्यायपालिका भी समय - समय पर सख्ती दिखाया करती है किंतु जब तक आम जनता  जागरूक नहीं होगी , हालात सुधरने की उम्मीद करना व्यर्थ है। आदर्श स्थिति तो वह होगी जब जनता की तरफ से शुद्ध हवा की मांग उठे, साथ ही  इस दिशा में जो भी नियम - कानून बनें उनका पालन करने की स्वप्रेरित इच्छा समाज में जाग्रत हो। आर्थिक विकास के साथ औद्योगिकीकरण भी आता  है जो प्रदूषण का सबसे बड़ा स्रोत है। इसी तरह अधो - संरचना के कार्यों में पर्यावरण को क्षति पहुंचाई जाती है। समय की मांग है इस बारे में नई सोच विकसित की जाए ताकि दुनिया के विकसित देशों की कतार में शामिल होने के साथ ही भारत एक स्वच्छ और प्रदूषण रहित देश के रूप में भी जाना जाए। जिस तरह विकास दर के मामले में हम चीन को अपना प्रतिद्वंदी मानते हैं वैसी ही प्रतिस्पर्धा प्रदूषण मुक्त होने के लिए न्यूजीलैंड और फिनलैंड जैसे देशों से की जानी चाहिए। देखना ये है कि कोई पार्टी इसे अपने घोषणापत्र या गारंटी में शामिल करती है या नहीं? 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 19 March 2024

राजनीतिक चंदे को पारदर्शी बनाना भ्रष्टाचार मिटाने जैसा ही असंभव कार्य

र्वोच्च न्यायालय की सख्ती के कारण इलेक्टोरल बॉण्ड संबंधी जानकारी धीरे - धीरे  सामने आ रही है। 21 मार्च तक स्टेट बैंक को बॉन्ड के नम्बर बताने  के साथ ही ये शपथ पत्र देने कहा गया है कि  कोई भी जानकारी छिपाई नहीं गई। इस मामले में रोचक मोड़ तब आ गया जब उद्योग-  व्यापार जगत की शीर्ष संस्था एसोचेम और फिक्की की ओर से बॉण्ड के नम्बरों को उजागर करने के आदेश को रद्द करने का आवेदन दिया गया। हालांकि अदालत ने उसे तत्काल नहीं सुना किंतु उनका कहना है कि जिस कानून के अंतर्गत  बॉण्ड खरीदकर चंदा दिया गया उसमें  नाम गोपनीय रखने का प्रावधान था। बॉण्ड शुरू करते समय स्व. अरुण जेटली ने संसद में उसका उद्देश्य राजनीतिक चन्दे में काले धन की भूमिका को कम करना बताया था। जिस मात्रा में बॉण्ड के जरिये चंदा मिला उससे उनकी बात सही साबित हो गई। इसके पहले राजनीतिक दलों को सफेद धन से इतना चंदा कभी नहीं मिला। ये बात तो सर्वविदित है कि पहले आम चुनाव से ही उद्योग - व्यापार जगत राजनीतिक दलों को चंदा देता आया है। चूँकि उसका हिसाब - किताब सार्वजनिक करना जरूरी नहीं था इसलिए काले धन से आये चंदे पर पर्दा पड़ा रहता था। ये भी जगजाहिर है कि उसके बदले उद्योगपतियों को व्यावसायिक लाभ पहुंचाया जाता था। लाइसेंस प्रणाली इसका सबसे बड़ा उदाहरण था जिसके जरिये उन्हें एकाधिकार मिला हुआ था। कार  ट्रक और स्कूटर के गिने चुने ब्रांड होने से उनकी कालाबाजारी होती थी। सीमेंट, इस्पात, दवाइयाँ सभी कुछ चंद उद्योगपतियों के नियंत्रण में था।  बॉण्ड के बदले उपकृत किये जाने पर सवाल उठाने वाले उस दौर को भूल जाते हैं जब किस राजनीतिक दल को कितना धन मिला ये पूछने - बताने की कोई जरूरत ही नहीं थी। इलेक्टोरल बॉण्ड उस दृष्टि से एक अच्छा प्रयोग था किंतु सर्वोच्च न्यायालय ने जिस आधार पर उसे रद्द कर दिया उसे भी नजरंदाज नहीं किया जा सकता । इस प्रणाली में फर्जी कंपनियों के जरिये चंदा दिये जाने का अंदेशा  कुछ हद तक सही साबित हो गया जब नाममात्र का मुनाफा दिखाने वाली कंपनी द्वारा करोड़ों के बॉण्ड खरीदकर बांटने की जानकारी मिली। कुछ राजनीतिक दलों द्वारा सफाई दी गई कि कोई अनजान उनके दफ़्तर में करोड़ों के बॉण्ड बंद लिफ़ाफ़े में फेंककर चला गया। किसी ने डाक से प्राप्ति की बात कही। जहाँ तक बात उपकृत करने की है तो वह स्वाभाविक है। ज्यादातर लोकतांत्रिक देशों में चंदा देने वालों को लाभ पहुंचाने का चलन है। लेकिन इस मामले में सत्ताधारी दल भाजपा पर जाँच एजेंसियों का दुरूपयोग करने का आरोप भी लग रहा है। छापे पड़ने के बाद बॉण्ड खरीदे जाने पर भी सवाल उठ रहे हैं। फ्यूचर गेमिंग नामक एक कंपनी इस बारे में सबसे ज्यादा चर्चा में आई किंतु उसके द्वारा तमिलनाडु की सत्ताधारी पार्टी द्रमुक को 509 करोड़ के बॉण्ड दिये जाने की बात खुद द्रमुक द्वारा सार्वजनिक किये जाने के बाद अब विपक्ष भी घेरे में आ गया है। चंदा देने वालों को ठेके दिये जाने का मुद्दा भी उछल रहा है। इस बारे में तृणमूल कांग्रेस, द्रमुक, बीजद  और बीआरएस जैसे क्षेत्रीय दलों को अरबों के बॉण्ड मिलना उक्त आशंका की पुष्टि कर रहा है। भाजपा उसे मिले भारी - भरकम चंदे को अपने सांसदों और विधायकों की संख्या से जोड़ रही है। लेकिन व्यवहारिक दृष्टि से देखें तो उद्योग - व्यवसाय चलाने वाले ज्यादातर लोग चूंकि किसी  राजनीतिक पार्टी से बुराई नहीं लेना चाहते इसलिए वे चंदे की गोपनीयता बनाये रखना चाहेंगे और उसके लिए घूम -  फिरकर बात फिर काले धन तक पहुँच जाती है। राजनीतिक दलों के  लिए अपना  खर्च चलाने को चंदा ही रास्ता होता है। बसपा जैसी पार्टी अपने कार्यकर्ताओं  से प्राप्त छोटे - छोटे चंदे को आय का स्रोत बताती है जो  गले नहीं उतरता। वामपंथी दलों ने इलेक्टोरल बॉण्ड से चंदा नहीं लेने की जानकारी दी किंतु उनका काम किस प्रकार चलता है ये जिज्ञासा भी उत्पन्न होती है।    ऐन लोकसभा चुनाव के समय इलेक्टोरल बॉण्ड पर रोक लगने के साथ ही उन्हें  खरीदने और प्राप्त करने वालों की जानकारी सार्वजनिक हो जाने के बाद भी यह चुनावी मुद्दा नहीं बन सकेगा क्योंकि कुछ को छोड़  सभी  पार्टियों ने उनको मिले बॉण्ड भुनाए हैं। उनके बदले यदि केंद्र की भाजपा सरकार ने चंदा दाताओं को उपकृत किया तो दूसरे दलों की राज्य सरकारें भी इस आरोप से बच नहीं सकेंगी। उद्योग जगत के अनेक दिग्गजों का इसीलिए कहना है कि सर्वोच्च न्यायालय को बॉण्ड व्यवस्था पर रोक लगाने के बावजूद उसके साथ जुड़े गोपनीयता प्रावधान को मान्य करना था जिससे चंदा देने वाले को राजनीतिक प्रतिशोध का सामना नहीं करना पड़े। एसोचेम और फिक्की का पक्ष न्यायालय सुने या नहीं ये उसकी मर्जी पर निर्भर है किंतु राजनीतिक चंदे को पूरी तरह पारदर्शी बनाना उसी तरह असंभव है जैसे न्यायपालिका सहित सरकारी तंत्र को भ्रष्टाचार मुक्त करना। 

-रवीन्द्र वाजपेयी


Monday, 18 March 2024

प्रधानमंत्री का चेहरा घोषित करने का अवसर गँवा दिया विपक्ष ने


कांग्रेस नेता राहुल गाँधी की न्याय यात्रा कल मुंबई में  समाप्त हो गई। इस अवसर पर आयोजित रैली में इंडिया गठजोड़ के अनेक नेताओं ने मंच साझा किया। जिनमें शरद पवार, उद्धव ठाकरे, स्टालिन , तेजस्वी यादव, फारुख अब्दुल्ला , महबूबा मुफ्ती, चंपाई सोरेन प्रमुख रहे। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और प्रियंका वाड्रा की मौजूदगी तो रहना ही थी। इस रैली में समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव, तृणमूल प्रमुख ममता बैनर्जी और आम आदमी पार्टी संयोजक अरविंद केजरीवाल ने  अपने किसी अन्य नेता को भेज दिया। रैली में काफी बड़ी संख्या में श्रोता उपस्थित थे जिसका श्रेय मुख्य रूप से उद्धव ठाकरे की पार्टी को जाता है। इंडिया बनने के बाद उसकी एक भी रैली अब तक नहीं होना राजनीतिक विश्लेषकों में चर्चा का विषय रहा है। हाल ही में तेजस्वी यादव द्वारा बिहार में आयोजित रैली में भी गठबंधन के काफी नेता मौजूद थे। लेकिन वह राजद  और  कल की रैली कांग्रेस द्वारा आयोजित थी। शायद इसीलिए ममता और श्री केजरीवाल इन रैलियों से दूर रहे। मंचासीन नेताओं ने अपनी - अपनी तरह से भाजपा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर हमला किया किंतु मुख्य आकर्षण का केंद्र थे श्री गाँधी। लोकसभा चुनाव  घोषित होने के बाद विपक्ष का यह पहला मैदानी प्रदर्शन था। भले ही उसमें ढेर सारे नेताओं ने भाषण भी दिये किंतु क्षेत्रीय  होने के कारण वे राष्ट्रीय स्तर पर प्रभाव नहीं छोड़ पाते। आम आदमी पार्टी कहने को तो राष्ट्रीय पार्टी है किंतु उसका प्रभाव क्षेत्र दिल्ली और पंजाब तक ही है। ऐसे में  राहुल पर ही सभी की निगाहें लगी थीं। लेकिन न्याय यात्रा के दौरान लोगों से संवाद करते हुए वे जो कुछ बोलते रहे वही उन्होंने कल दोहरा दिया। नरेंद्र मोदी उनसे डरते हैं क्योंकि उनको पता है कि राहुल गाँधी उनको हरा सकता है, जैसी बातें कहकर उन्होंने जता दिया कि वे गलतियों से सीखने के बजाय उनको दोहराने में विश्वास रखते हैं। राजनीतिक विश्लेषक ये कहते रहे हैं कि न्याय यात्रा यदि कांग्रेस की बजाय इंडिया की होती तब  उसे उन राज्यों में भी भरपूर तवज्जो मिलती जिनमें क्षेत्रीय पार्टियां भाजपा का मुकाबला कर रही हैं। ये भी कहा गया कि कांग्रेस , इस यात्रा के बहाने राहुल को प्रधानमंत्री के चेहरे के तौर पेश करना चाह रही है। यही वजह रही कि ममता बैनर्जी यात्रा से पूरी तरह दूर रहीं। वहीं अखिलेश ने आगरा में उपस्थित होकर रस्म अदायगी मात्र कर दी।  रैली में होना तो ये चाहिए था कि लोकसभा चुनाव के मद्देनजर गठबंधन की ओर से बड़ी नीतिगत घोषणाएं की जातीं जिनसे उसकी दिशा स्पष्ट होती। लेकिन श्री गांधी के अतिरिक्त भी जिन नेताओं ने भाषण दिया वे सब मोदी विरोध का राग अलापते रहे। कांग्रेस और गठबंधन के उसके साथियों को  समझना चाहिए  कि एनडीए की ओर से श्री मोदी को निर्विवाद रूप से प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार स्वीकार कर लिया गया है। वहीं इंडिया की समस्या ये है कि कांग्रेस भले उसका नेतृत्व करती हो किंतु उसके लिये अपनी 50 सीटें बचाना ही मुश्किल हो रहा है। उ.प्र और बिहार में उसे क्रमशः 17 और 8 सीटें सहयोगी दल दे रहे हैं। तमिलनाडु में मात्र 6 सीटें  मिलेंगी। केरल में वामपंथियों ने ठेंगा दिखा दिया। यहाँ तक कि वायनाड तक पर उम्मीदवार अड़ा दिया। 2019 में इस राज्य में उसे अच्छी सीटें मिल गई थीं किंतु त्रिपुरा और प. बंगाल से साफ हो जाने के बाद वामपंथी अपने आखिरी किले को बचाने में जुटे हुए हैं जिसकी वजह से कांग्रेस की राह मुश्किल हो गई है। ले - देकर उसके पास तेलंगाना ही उम्मीद की किरण है क्योंकि कर्नाटक में भाजपा उसे ज्यादा कुछ नहीं मिलने देगी। उत्तर और पश्चिमी राज्यों में भी कांग्रेस को इतनी सीटें मिलने की स्थिति नहीं है कि वह केंद्र में सत्ता बनाने की सोच सके। ऐसे में इंडिया के बाकी घटक दल उसका उपयोग तो कर रहे हैं किंतु उसकी सर्वोच्चता को स्वीकार करने राजी नहीं हैं। लालू प्रसाद यादव को छोड़कर अन्य किसी  ने भी श्री गाँधी को प्रधानमंत्री का चेहरा नहीं बताया। मुंबई रैली एक अवसर था किंतु राहुल द्वारा खुद को महिमामंडित किये जाने के बाद भी गठबंधन इस बारे में अनिश्चितता का शिकार नजर आया। कांग्रेस और उसके साथियों को ये समझना चाहिए कि भाजपा 2004 वाले अति आत्मविश्वास से बचते हुए चल रही है। ये भी सर्वविदित है कि उसने चुनाव को पार्टी से ऊपर व्यक्ति केंद्रित कर दिया है और प्रधानमंत्री की छवि और व्यक्तित्व उस दृष्टि से सब पर भारी है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Sunday, 17 March 2024

इंडिया , सारथी विहीन रथ बनकर रह गया




     आखिरकार चुनाव की तिथियाँ घोषित हो गईं। सात चरणों में लोकसभा के साथ ही कुछ राज्यों के  विधानसभा चुनाव और उपचुनाव करवाने का कार्यक्रम भी चुनाव आयोग ने घोषित कर दिया। 19 अप्रैल को पहले और 1 जून को आखिरी चरण के मत पड़ेंगे। मतगणना 4 जून को होगी। इस प्रकार नई सरकार के लिए ढाई महीने से भी अधिक प्रतीक्षा करनी होगी। 

     यह चुनाव कई मायनों में रोचक हो गया है। यदि वर्तमान सरकार वापस आती है तब पंडित नेहरू के बाद नरेंद्र मोदी पहले ऐसे प्रधानमंत्री होंगे जो लगातार तीन चुनाव जीते हों। उससे भी बड़ी बात होगी विशुद्ध गैर कांग्रेसी व्यक्ति को इस पद पर लगातार तीसरे कार्यकाल के लिए जनादेश हासिल होना। भाजपा को 370 और एनडीए को 400 से ज्यादा सीटें मिलने के नारे को प्रधानमंत्री ने जिस कुशलता से राष्ट्रीय विमर्श का विषय बनाया उसकी वजह से विपक्ष पर  मनोवैज्ञानिक दबाव बन गया। आम जनता के मन में भी भाजपा यह बात बिठाने में जुटी है कि उसकी विजय सुनिश्चित है। किसी भी बड़ी लड़ाई में जीत के लिए अपनी सेना में आत्मविश्वास के साथ प्रतिद्वंदी पर मानसिक दबाव बनाना कारगर साबित होता है। प्रधानमंत्री  और भाजपा के रणनीतिकार इसी तरीके का इस्तेमाल कर रहे हैं। 

     दूसरी तरफ काँग्रेस के नेतृत्व में गठित इंडिया नामक गठजोड़ में अभी तक सामंजस्य नहीं बन सका। नीतीश कुमार ने भाजपा का साथ पकड़ लिया। अखिलेश यादव ने भी इकतरफा फैसला करते हुए काँग्रेस को मात्र 17 सीटें दे दीं। प. बंगाल में ममता बैनर्जी ने तो काँग्रेस के साथ निर्मम व्यवहार करते हुए उसे एक भी सीट नहीं दी। वहीं केरल में कांग्रेस के साथ यही व्यवहार वामपंथियों ने किया और राहुल गाँधी तक के विरुद्ध प्रत्याशी उतार दिया। उधर आम आदमी पार्टी ने कांग्रेस को पंजाब में ठेंगा दिखा दिया। अन्य राज्यों से भी जो खबरें मिल रही हैं उनसे ये स्पष्ट हो रहा है कि जिस उत्साह के साथ इंडिया गठबंधन बना था वह कायम नहीं रह सका। 

         मोदी सरकार की वापसी को रोकने के लिए विपक्षी पार्टियां साझा उम्मीदवार खड़ा करने की तैयारी से साथ आई थीं। शुरुआत में ऐसा लगा भी कि उनकी रणनीति काम कर जायेगी। लेकिन विश्वास का संकट यथावत रहा जिसके चलते एकता के ढोल में पोल साफ नजर आ रही है। इसका सबसे बड़ा प्रमाण विपक्ष की ओर से प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित नहीं किये जाने से मिला। एनडीए के खेमे में इस मामले में कोई मतभेद नहीं है। श्री मोदी के नेतृत्व को नीतीश कुमार तक ने स्वीकार कर लिया। भाजपा में तो इस विषय पर किसी भी प्रकार की अनिश्चितता न पहले थी और न ही आगे होने की गुंजाइश है। ऐसे में मुकाबला मोदी विरुद्ध अनिश्चितता का हो गया है। 

       विपक्ष में व्याप्त अंतर्द्वंद के बीच प्रधानमंत्री तो अपनी दस वर्षीय उपलब्धियां जनता के सामने पेश कर रहे हैं किंतु विपक्ष में  कोई ऐसा नहीं है जो पूरे आत्मविश्वास के साथ कह सके कि प्रधानमंत्री बनने के बाद वह कौन से कार्य करेगा। और यही शून्यता विपक्ष की सबसे बड़ी कमजोरी बनकर सामने आई है। राहुल गाँधी की न्याय यात्रा में व्यस्त कांग्रेस नेतृत्व पार्टी में धधक रहे असंतोष के ज्वालामुखी को शांत करने में जिस तरह नाकामयाब रहा उसका दुष्परिणाम देश भर से उसके नेताओं और पदाधिकारियों के पार्टी छोड़ने से मिल रहा है। 
      इंडिया गठबंधन के घटक दलों के मन में ये बात घर कर चुकी है कि कांग्रेस के भरोसे उनकी नैया पार नहीं हो सकेगी। इसीलिए वे अब अपनी अलग रणनीति बना रहे हैं जिसका प्रमाण प. बंगाल, केरल और पंजाब में नजर आ रहा है। सात चरणों के इस चुनाव में भाजपा जहाँ पूरे आत्मविश्वास और पेशेवर प्रबंधन के साथ उतर चुकी है वहीं विपक्षी रथ के घोड़े सारथी के अभाव में बिदकने लगे हैं। 

हालांकि परिणाम को लेकर दावा करना उचित नहीं होगा किंतु अभी तक के हालात में एनडीए का पलड़ा भारी है। 370 और  400 पार के उसके नारे के शोर में विपक्ष की वह आवाज कहीं गुम होकर रह गई है कि वह भाजपा को 272 से नीचे रोककर नरेंद्र मोदी को सत्ता में आने से रोक देगा। 

    
- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 16 March 2024

इलेक्टोरल बॉण्ड पर रोक के बाद राजनीतिक चंदे में काले धन की मात्रा बढ़ेगी


किसने कितने मूल्य के  इलेक्टोरल बॉण्ड खरीदे और किस राजनीतिक दल को उनमें से कितने का चंदा मिला ये तो सामने आ गया। हालांकि , समूचा लेन - देन सफेद धन से हुआ इसलिए देने और लेने वाले ने उसे अपने आय - व्ययक में दर्शाया भी। चुनाव आयोग को राजनीतिक दलों से मिली अधिकृत जानकारी में उनको मिलने वाले चन्दे के साथ ही उसका जरिया अर्थात बॉण्ड ,  चेक या नगद का भी उल्लेख होता है। इसी तरह जो भी व्यक्ति, संस्था , व्यवसायिक या औद्योगिक प्रतिष्ठान राजनीतिक दल को सफेद धन से चंदा देते हैं , वे उसे खाते - बही में बाकायदा दर्ज करते हैं। टाटा समूह  चंदा देने का काम एक न्यास के जरिये करता है। जब इलेक्टोरल बॉण्ड का मसला उठा तब एक बात तो तय थी कि दिये और लिये गए चन्दे का हिसाब - किताब दोनों पक्षों द्वारा रखा गया है। जिस भारतीय स्टेट बैंक को इलेक्टोरल बॉण्ड बेचने अधिकृत किया गया उसने भी बॉण्ड खरीदने वाले की पहिचान के दस्तावेज हासिल करने के बाद ही उनको जारी किया। इसके बाद हुए लेन - देन में दोनों पक्षों की पहचान उजागर नहीं हुई और यही विवाद का कारण है। सर्वोच्च न्यायालय ने भी इसी आधार पर बॉण्ड को असंवैधानिक निरूपित करते हुए रद्द किया कि चंदा देने वाले का नाम गोपनीय रखना लोकतंत्र को कमजोर करना है।  सर्वोच्च न्यायालय के दबाव के बाद स्टेट बैंक ने ये तो बता दिया कि  किसने, कितने बॉण्ड खरीदे। ये जानकारी भी आ गई कि किस राजनीतिक दल को  कितना चंदा प्राप्त हुआ किंतु यह जानकारी बैंक ने नहीं दी कि बॉण्ड खरीदने वाले ने किस राजनीतिक दल को कितना चंदा दिया ? विपक्ष का आरोप है कि केंद्र सरकार ने सीबीआई और ईडी का डर दिखाकर भाजपा को खूब चंदा दिलवाया। बॉण्ड खरीदने  और उक्त एजेंसियों द्वारा छापे  की तारीख के आधार पर उक्त आरोप प्रथम दृष्ट्या सही भी लगता है किंतु जब तक बैंक द्वारा ये नहीं बताया जायेगा कि कौन सा बॉण्ड किसके हिस्से में आया, तब तक कयासों का दौर चलता रहेगा। समूचे विवाद की असली वजह कुल खरीदे गए बॉण्ड से अधिकतर चंदा भाजपा को मिलना है। कांग्रेस दूसरी सबसे बड़ी पार्टी है किंतु उसको तृणमूल कांग्रेस से कम चंदा मिलना भी चर्चा का विषय बना हुआ है। बॉण्ड का समूचा विवरण सार्वजनिक किये  जाने के बाद कौतूहल का विषय ये रह जायेगा कि जिस राजनीतिक दल को बॉण्ड के माध्यम से करोड़ों रुपये मिले, उसने या उसकी सरकार ने चन्दा देने वाले को किस प्रकार से लाभ पहुंचाया? बॉण्ड खरीदने के फौरन बाद कुछ लोगों को मिले ठेके एवं अन्य फायदों से इस तरह के अनेकानेक सवाल उठ खड़े हुए हैं जिनका समुचित और सही उत्तर मिलना जरूरी है। जहाँ तक  भाजपा को बॉण्ड के जरिये मिले चंदे का सवाल है तो उसमें हैरत की बात नहीं है। जब तृणमूल, बीजद, द्रमुक और बीआरएस जैसे क्षेत्रीय दलों को अरबों रुपये मिले तब केंद्र के साथ ही देश के अनेक राज्यों में सत्तारूढ़ होने से भाजपा को बड़ा हिस्सा मिलना अस्वाभाविक नहीं कहा जा सकता । वैसे भी  बॉण्ड  से चंदा देने वाले ने या तो फायदे के लिए वैसा किया होगा अथवा नुकसान से बचने। स्टेट बैंक से समूचा ब्यौरा मिलने के बाद ही सभी पार्टियों की स्थिति स्पष्ट होगी और देने वाले की मंशा भी। लेकिन एक बात तो तय है कि  चन्दे का धन्धा कभी रुकने वाला नहीं है।  हवाला कांड में आरोपी बनने के बाद स्व. शरद यादव ने खुलकर कहा था कि उन्होंने पार्टी के लिए पैसे लिए थे और आगे भी कोई देगा तो निःसंकोच लेंगे। उनकी वह स्वीकारोक्ति भारतीय राजनीति का वह सच है जिससे जानते तो सब हैं किंतु स्वीकार करने का साहस नहीं बटोर पाते। चूंकि इलेक्टोरल बॉण्ड के मुद्दे से आम जनता को कुछ भी लेना - देना नहीं है इसलिए कुछ समय बाद ये हवाला कांड की तरह हवा - हवाई होकर रह जाए तो आश्चर्य नहीं होगा क्योंकि जैसे ही स्टेट बैंक बची हुई जानकारी देगा त्योंही चन्दा लेने वाली सभी पार्टियां कठघरे में नजर आयेंगी। बॉण्ड खरीदने वाली कुछ कंपनियों के नाम अवश्य चौंकाने वाले हैं जिन्होंने अपने कारोबार के आकार और मुनाफे से कई गुना ज्यादा के बॉण्ड खरीदकर चन्दे में दिये। ये भी कहा जा रहा है कि काले धन को वैध बनाने के लिए फर्जी कंपनियां बनाकर बॉण्ड खरीदे गए। यद्यपि स्टेट बैंक से बाकी जानकारी मिलने के बाद भी पूरा सच सामने आयेगा ये कहना मुश्किल है क्योंकि बॉण्ड का विरोध करने वाली किसी भी पार्टी ने उससे मिला चंदा स्वीकार करने से इंकार नहीं किया। चिंता का विषय तो ये भी है कि अब जो भी चंदा आयेगा उसमें काले धन की हिस्सेदारी सबसे अधिक रहेगी और उसे न चुनाव आयोग रोक सकेगा और न ही सर्वोच्च न्यायालय। 

- रवीन्द्र वाजपेयी