Monday, 8 April 2024

निजी कानूनों की आज़ादी का वायदा अलगाववाद को बढ़ावा देगा

काँग्रेस द्वारा  अपने न्याय पत्र में प्रत्येक नागरिक की तरह अल्पसंख्यकों को भी पोशाक, खान-पान, भाषा और निजी कानूनों की आजादी का जो वादा किया गया है वह बहुत ही खतरनाक है जिसका दुष्परिणाम अलगाववाद के रूप में सामने आये बिना नहीं रहेगा। कर्नाटक की पिछली भाजपा सरकार द्वारा शिक्षण संस्थानों में हिज़ाब पर प्रतिबंध लगाए जाने के बाद देश भर के मुस्लिम संगठन विरोध में उतर आये। कांग्रेस भी उनके साथ खड़ी हो गई। राज्य विधानसभा चुनाव में उसी वजह से मुस्लिम मतों का ध्रुवीकरण उसके पक्ष में हुआ वरना कई दशकों से वे जनता दल (सेकुलर) को मिलते आ रहे थे। धारा 370 , तीन तलाक़ और राम  मन्दिर जैसे मुद्दों पर अपने गलत रवैये के कारण हिन्दू मतदाताओं के बीच पकड़ खोती जा रही काँग्रेस के लिए मुस्लिम मत डूबते में तिनके का सहारा जैसे हैं। इसीलिए वह उनके तुष्टीकरण में जुटी है। भाजपा द्वारा समान नागरिक संहिता लागू करने की मुहिम शुरू करने के बाद से काँग्रेस का मुस्लिम प्रेम कुछ ज्यादा  ही बढ़ गया है। न्याय पत्र में अल्पसंख्यकों को खान पान , भाषा और पोशाक की आजादी का वायदा तो फिर भी ठीक है किंतु निजी कानूनों की आजादी का वायदा पूरे देश में अस्थिरता और अराजकता का माहौल उत्पन्न करने का आधार बन सकता है । ऐसे में जब पूरे देश में समान नागरिक संहिता लागू कर धार्मिक आधार पर भेदभाव खत्म करने पर विमर्श चल रहा हो और सर्वोच्च न्यायालय तक इस बात पर नाराजगी जता चुका हो कि संविधान के अनुच्छेद 44 की मंशा के अनुसार समान नागरिक संहिता लागू क्यों नहीं की गई तब काँग्रेस द्वारा इस तरह का वायदा करना उस संविधान का भी अपमान है जिसे उसी के नेताओं द्वारा बनाया गया था।  उल्लेखनीय है उक्त अनुच्छेद में स्पष्ट कहा गया था कि एक समान नागरिक संहिता विभिन्न व्यक्तिगत कानूनों के प्रति परस्पर विरोधी विचारधाराओं और निष्ठाओं को दूर करके राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा देगी।  आजादी के बाद हिंदुओं के विवाह और उत्तराधिकार कानूनों को तो सिरे से बदल दिया गया किंतु पंडित नेहरू जैसे आधुनिक सोच रखने वाले प्रधानमंत्री में इतना साहस नहीं हुआ कि वे मुस्लिम समाज को मुख्यधारा में शामिल करने के लिए उसके पर्सनल लॉ में समयानुकूल परिवर्तन करने की पहल करते। यदि उन्होंने उस दिशा में कदम उठाये होते तो आज हिंदुओं और मुसलमानों के बीच जो खाई है वह शायद इतनी चौड़ी न  होती। दशकों बाद नेहरू जी के नाती राजीव गाँधी के शासनकाल  में सर्वोच्च न्यायालय ने शाह बानो के गुजारा भत्ते  पर ऐतिहासिक फैसला देकर मुस्लिम समाज में सुधार  की शुरुआत की थी। लेकिन विदेशों में पढ़े और बेहद प्रगतिशील ख्यालों के लिए लोकप्रिय राजीव ने मुस्लिम मतों के लालच में उस निर्णय को संसद में  अपने बहुमत के बल पर उलट दिया। ये कहना गलत नहीं होगा कि उस गलती का खामियाजा आज तक कांग्रेस भुगत रही है। आज देश में हिंदुत्व का जो उभार दिखाई देता है उसके लिए भी मुस्लिम तुष्टीकरण की नीतियाँ ही जिम्मेदार हैं। हालांकि धीरे - धीरे भाजपा और शिवसेना (अविभाजित ) को छोड़कर लगभग सभी पार्टियां मुस्लिम वोट बैंक के मोहपाश में फंसती गईं। आज के परिदृश्य पर नजर डालें तो ममता बैनर्जी, लालू प्रसाद यादव, अखिलेश यादव  की राजनीति तो मुस्लिम मतदाताओं की दम पर ही जीवित है। कांग्रेस नये सिरे से उनकी मिजाजपुर्सी में जुटी है, लेकिन कुछ  क्षेत्रीय दल इस मामले में उससे भी आगे हैं । ये देखते हुए कांग्रेस को चाहिए वह खुद को मुख्यधारा की राजनीति से जोड़ने के लिए प्रयास करे किंतु उसमें ईमानदारी होनी चाहिए। राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा समारोह का बहिष्कार कर कांग्रेस पहले ही अपने पाँवों में कुल्हाड़ी मार चुकी थी। उस गलती को सुधारने के बजाय उसने अपने न्याय पत्र में अल्पसंख्यकों को निजी कानूनों की आजादी देने का वायदा कर बर्र के छत्ते में पत्थर मारने की मूर्खता कर डाली। एक तरफ तो उसके सहयोगी द्रमुक के नेता सनातन को नष्ट करने की डींग हांकते हैं जिसका समर्थन करने वाले कांग्रेस अध्यक्ष के बेटे पर कोई कारवाई नहीं होती। दूसरी ओर पार्टी अपने चुनावी वायदे में सांकेतिक शैली में मुस्लिम पर्सनल लॉ को बनाये रखने का वायदा करती है। उसके नेता चुनाव जीतने के लिए जो कुचक्र रच रहे हैं वह बहुत बड़ी समस्या को जन्म देने का कारण बने बिना नहीं रहेगा। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 6 April 2024

विपक्ष का साझा घोषणापत्र ज्यादा असरकारक होता


कांग्रेस ने अपने घोषणापत्र को न्याय पत्र नाम देकर जारी कर दिया। जिन मतदाताओं के लिए वह प्रस्तुत किया गया उनको कुछ समझ में आता उसके पहले ही भाजपा ने उसे झूठ का पुलिंदा कहते हुए उसका मजाक उड़ाया। हालांकि जब भाजपा का संकल्प पत्र आयेगा तब ऐसी ही प्रतिक्रिया कांग्रेस से भी आना तय है। सही बात तो ये है कि अब घोषणापत्र, संकल्प पत्र, न्याय पत्र या वचन पत्र भी चुनावी कर्मकांड का रूप ले चुके हैं। कांग्रेस द्वारा गत दिवस किये गए वायदों में कुछ गत वर्ष हुए विधान सभा चुनावों में भी किये गए थे। लेकिन मतदाताओं ने उन पर भरोसा नहीं किया। हाल ही में  कांग्रेस का एक विज्ञापन भी जारी हुआ जिसमें मोदी सरकार के उन वायदों का उल्लेख  है जो आज तक पूरे नहीं हो सके। भाजपा इसके उत्तर में कांग्रेस को ये कहते हुए कठघरे में खड़ा करती है कि आधी सदी  तक राज करने के बाद भी वह गरीबी और  बेरोजगारी दूर नहीं कर सकी। सड़क, बिजली और पीने के पानी जैसी मूलभूत सुविधाओं से भी देश का बड़ा इलाका उसके सत्ता में रहते वंचित रहा। ज़ाहिर है कांग्रेस उस सबकी चर्चा करने के बजाय भाजपा से बीते 10 साल के शासन काल में पूरे नहीं हुए वायदों का हिसाब पूछ रही है। दोनों के आरोप और तर्क अपनी - अपनी जगह सही हैं। कांग्रेस ने दशकों तक केंद्र के साथ ही ज्यादातर प्रदेशों में सरकार चलाई थी। भाजपा 2014 के बाद से राष्ट्रीय स्तर पर एक बड़ी शक्ति के रूप में उभरी। केंद्रीय सत्ता में तो वह 1999 से 2004 तक भी रही किंतु  स्व. अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली उस सरकार में सबसे बड़ी पार्टी होने के बाद भी उसके पास स्पष्ट बहुमत नहीं था। लिहाजा घटक दलों के दबाव की वजह से धारा 370 , राम मन्दिर, समान नागरिक संहिता, तीन तलाक़ जैसे मुद्दों पर वह एक भी कदम आगे नहीं बढ़ सकी। लेकिन नरेंद्र मोदी उस दृष्टि से भाग्यशाली रहे जिनके नेतृत्व में भाजपा को पहली बार में ही स्पष्ट बहुमत मिल गया।  2019 में तो वह 300 का आंकड़ा पार कर गई। इसीलिए उन्हें भाजपा के मुख्य नीतिगत मुद्दों को लागू करने का अवसर मिल गया। यद्यपि राज्यसभा में बहुमत नहीं होने के बावजूद वैसा करना  नेतृत्व की कुशलता का प्रमाण था। और इसी  कारण श्री  मोदी की गणना एक मजबूत प्रधानमंत्री के तौर पर की जाने लगी। आज भाजपा में तीसरी बार सरकार बनाने के प्रति जो आत्मविश्वास नजर आ रहा है उसका कारण मोदी सरकार द्वारा लिए गए साहसिक निर्णय ही हैं। आम जनता के मन में यह बात बैठ चुकी है कि विषम परिस्थितियों में भी प्रधानमंत्री जोखिम भरे फैसले लेने में नहीं चूकते। इसीलिए भाजपा मोदी की गारंटी  नारे पर अपने प्रचार को केंद्रित रखे हुए है। कांग्रेस की समस्या ये है कि अव्वल तो वह ये विश्वास उत्पन्न करने में विफल है कि उसे 100 सीटें भी मिल जाएंगी क्योंकि  उ.प्र , बिहार, प. बंगाल, जैसे बड़े राज्यों में उसे कुल 10 सीटें मिलना भी मुश्किल हैं। महाराष्ट्र, कर्नाटक, तेलंगाना और केरल ही वे राज्य हैं जहाँ से उसे कुछ उम्मीदें हैं। ऐसे में वह लोकसभा में  अपनी मौजूदा संख्या को बरकरार रख पाएगी ये भी पक्के तौर पर कह पाना सम्भव नहीं है। यदि काँग्रेस को 100 सीटों का भी भरोसा होता तो वह राहुल गाँधी को प्रधानमंत्री का चेहरा बना देती। लेकिन न्याय पत्र जारी करते हुए उन्होंने भी यही कहा कि विपक्षी गठबंधन को बहुमत मिलने पर नेता का नाम तय किया जाएगा। ये सवाल भी उठ खड़ा हुआ है कि कांग्रेस जब  गठबंधन के साथ चुनाव मैदान में है तब उसने अपना पृथक न्याय पत्र (घोषणापत्र) क्यों जारी कर दिया ? इससे ये संदेश मतदाताओं में जा सकता है कि गठबंधन में शामिल  दल नीतिगत मामलों में एकमत नहीं हैं। यदि  गठबंधन के सभी नेता सामूहिक तौर पर साझा घोषणापत्र जारी करते तो उनकी एकजुटता प्रकट होती और जनता में भी सकारात्मक संदेश जाता। रही बात एनडीए की तो चूंकि भाजपा के पास  अपना बहुमत है इसलिए उसके सहयोगी दल भी उस पर हावी नहीं हो पाएंगे। नीतीश कुमार ही कुछ मुद्दों पर असहमत रहे हैं किंतु अब वे दबाव बनाने की हैसियत में नहीं हैं। दूसरी तरफ कांग्रेस को ममता बैनर्जी ने प.बंगाल में जहाँ एक भी सीट नहीं दी वहीं अरविंद केजरीवाल ने भी  पंजाब में उपकृत करने से इंकार कर दिया। केरल में वामपंथी मोर्चा कांग्रेस से बेहद नाराज है। शायद इसीलिए गठबंधन का साझा घोषणापत्र जारी करने की स्थिति  नहीं बन सकी। कांग्रेस द्वारा 100 सीटों का आंकड़ा छू पाने में भी चूंकि संदेह हैं  , इसलिए उसके वायदे जनमानस को प्रभावित कर सकेंगे इसमें संदेह है।


 -रवीन्द्र वाजपेयी
   

Friday, 5 April 2024

जो आए वो ईमानदार और जो जाए वो गद्दार


कांग्रेस के राष्ट्रीय प्रवक्ता सुरेंद्र राजपूत से एक टीवी चैनल पर जब पार्टी में मची भगदड़ पर सवाल दागा गया तब उन्होंने पहले तो ये कहा कि जो नेता पार्टी छोड़कर जा रहे हैं वे बिना संघर्ष किये ही बहुत कुछ पा गए थे। इसलिए उनकी निष्ठा में परिपूर्णता नहीं थी। लेकिन जब उनको पार्टी छोड़ने वाले कुछ ऐसे नेताओं का नाम बताया गया जिनकी जड़ें कांग्रेस में ही पनपीं तब वे असहज होकर कहने लगे कि आज कांग्रेस के पास न तो किसी को देने के लिए सत्ता से जुड़ा पद है और न ही ईडी और सीबीआई जैसा डराने का जरिया । इसलिए पदलोलुप नेताओं के अलावा वे लोग पार्टी छोड़कर भाजपा में जा रहे हैं जिनको जेल जाने का डर सता रहा था।  लेकिन इसके साथ ही उन्होंने ऐसे दर्जन भर भाजपाइयों के नाम गिनवा दिये जो सांसद - विधायक होते हुए भी पार्टी छोड़ बैठे और उनमें से कुछ कांग्रेस में  शामिल होकर टिकिट पा गए। श्री राजपूत के मुताबिक कांग्रेस छोड़ने वालों की चर्चा ज्यादा होती है जबकि भाजपा से निकलने वालों की खबर दबकर रह जाती है। उनके कहने का आशय ये था कि कांग्रेस की स्थिति उतनी दयनीय नहीं है जितनी प्रचारित की जा रही है । उक्त जानकारी चूंकि टीवी चैनल पर दी गई इसलिए उसको लेकर किसी भी प्रकार का संदेह नहीं किया जा सकता किंतु उससे ये तो साबित हो ही गया कि जिस तरह भाजपा को अन्य दलों से आ रहे नेताओं को शामिल करने में परहेज नहीं है उसी तरह कांग्रेस को भी भाजपाइयों की भर्ती में कोई संकोच नहीं है। रोचक बात ये है कि पार्टी छोड़कर जाने वाले नेताओं के लिए  कांग्रेस  अवसरवादी, डरपोक, गद्दार और कचरा जैसे शब्दों का उपयोग करती है किंतु जो लोग भाजपा छोड़कर उसका दामन थाम रहे हैं उनकी प्रशंसा के पुल बांधने में कोई कंजूसी नहीं की जाती। हालांकि यही रवैया भाजपा का भी है जो पार्टी में आने वाले और जाने वाले नेताओं के बारे में अलग -अलग रवैया प्रदर्शित करती है। दरअसल कांग्रेस के राष्ट्रीय प्रवक्ता गौरव वल्लभ और मुंबई कांग्रेस के तेज तर्रार नेता संजय निरुपम के पार्टी छोड़ने को कांग्रेस के लिए बड़ा धक्का माना गया। लोकसभा चुनाव के मतदान के पहले चरण के एक पखवाड़े पहले तक कांग्रेस छोड़ने का क्रम जिस तरह जारी है उसे दूबरे में दो असाढ़ वाली कहावत का चरितार्थ होना कहा जा रहा है। हालांकि आज इस दौर से लगभग सभी दलों को गुजरना पड़ रहा है किंतु चर्चा सबसे ज्यादा कांग्रेस की इसलिए होती है क्योंकि बतौर राष्ट्रीय पार्टी भाजपा का विकल्प बनने के लिए घूम फिरकर नजरें उसी पर टिकती हैं। ये बात पूरी तरह सच है कि भाजपा से भी अनेक नेता पलायन कर चुके हैं किंतु उनमें से ज्यादातर वही लोग हैं जिनको पार्टी टिकिट से वंचित कर दिया गया। जबकि कांग्रेस से जाने वाले अधिकांश  नेताओं के मन में टिकिट कटने से उत्पन्न नाराजगी से ज्यादा ये भय बैठ चुका था कि उसकी टिकिट पर जीत पाना असंभव होगा। और भी दलों से नेताओं का भाजपा प्रवेश हुआ है जिनमें भ्रष्टाचार के आरोपी भी हैं किंतु कांग्रेस में जिस बड़े पैमाने पर भगदड़ मची उसके लिए वह साधारण बहाने बनाकर नहीं बच सकती। रही बात पद लोलुपता  की तो राजनीति का मुख्य आकर्षण ही कुर्सी है। और जो भ्रष्टाचार के आरोपों में फंसे हुए हैं उनको पार्टी छोड़ने के पहले तक कांग्रेस ने कभी भ्रष्ट नहीं माना। यही विरोधाभास आज उसकी समस्या बन गया है। उसके शीर्ष नेतृत्व को यदि उन नेताओं के भ्रष्ट होने की जानकारी थी तो उनको निकाल बाहर करना था। उस स्थिति में वे कहीं के न रहते। सही बात तो ये है कि भ्रष्ट होना अब राजनीति में अयोग्यता नहीं रहा। कोई भी पार्टी भ्रष्टाचार से परहेज करने का दावा नहीं कर सकती। किसी नेता के बारे में अवधारणा बनाने का आधार ये होता है कि वह हमारे पाले में है या दूसरे दल के साथ ? ऐसे में भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ने के दावे अर्थहीन होकर रह गए । कोई नेता अपनी पार्टी छोड़ते समय उसकी बुराइयों का ढेर लगा देता है। वहीं जिस पार्टी में वह प्रवेश करता है वह उसे गुणों की खान नजर आती है। ये कहने में कुछ भी गलत नहीं है कि आज की भारतीय राजनीति में वैचारिक शून्यता अपने चरमोत्कर्ष पर है। दल छोड़कर दूसरे में शामिल होना  कोई नई बात नहीं है। देश आजाद होने के बाद से ही  इसका सिलसिला शुरू हो चुका था। पंडित नेहरू जैसे कद्दावर नेता का विरोध करते हुए अनेक नेताओं ने पार्टी  छोड़ी। बाद में उनमें से कुछ वापस भी लौटे। लेकिन सत्तर के दशक में आयाराम - गयाराम का जो  खेल शुरू हुआ उसने राजनीति को मजाक बना दिया। धीरे - धीरे हालात बदतर होते - होते मौजूदा विकृति तक आ पहुंचे। इसके लिए किसी एक पार्टी को दोष देना अन्याय होगा क्योंकि दावा कितना भी करें किंतु सैद्धांतिक प्रतिबद्धता के प्रति पहले जैसी ईमानदारी कल्पनातीत हो गई है।


- रवीन्द्र वाजपेयी


Thursday, 4 April 2024

भ्रष्टाचार विरोधी शिकंजा अपनों पर भी कसा जाना चाहिए



प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने भाषणों में भ्रष्टाचार को  चुनाव का मुख्य मुद्दा बना रहे हैं। ईडी और सीबीआई की गिरफ्त में आये राजनेताओं के कारण वैसे भी यह चुनाव काफी खींचतान भरा हो चुका है। झारखंड और दिल्ली के मुख्यमंत्री को ईडी द्वारा जेल भेजे जाने से विपक्ष आग बबूला है। 31 मार्च को दिल्ली में हुई रैली में सभी वक्ताओं ने आरोप लगाए कि मोदी सरकार विपक्ष के नेताओं को फर्जी मामलों में फंसाकर चुनाव को इकतरफा बनाने  का षडयंत्र रच रही है। एक नेता के अनुसार यह पिच खोदने के बाद बल्लेबाजी करने का अवसर देने जैसा ही है। संवैधानिक जाँच एजेंसियों का दुरूपयोग विपक्ष के चुनाव प्रचार का मुख्य मुद्दा बन गया है। उसका एतराज इस बात को लेकर भी है कि  भाजपा ईडी और सीबीआई का भय दिखाकर विपक्षी नेताओं को अपने पाले में खींच रही है। चूंकि भाजपा में शामिल होने के बाद या तो भ्रष्टाचार का प्रकरण समाप्त कर दिया जाता है अथवा जाँच धीमी कर दी जाती है, लिहाजा विभिन्न मामलों में फंसे विपक्षी नेता भाजपा में घुसकर खुद को निर्दोष साबित करने में जुटे हुए हैं। विपक्ष द्वारा उन भाजपा  नेताओं को भी निशाना बनाया जा रहा है जो भ्रष्टाचार के आरोपों के बावजूद जेल से बाहर हैं और उनके विरुद्ध चल रही जाँच भी डिब्बे में बंद है। दूसरी तरफ प्रधानमंत्री सहित भाजपा के तमाम नेता इस बात को जोरदारी से उठा रहे हैं कि विपक्ष के अनेक नेता भ्रष्टाचार के मामले में या तो बेल (जमानत) पर हैं या फिर जेल में। श्री केजरीवाल सहित आम आदमी  पार्टी के कुछ बड़े नेताओं के जेल में होने से विपक्ष का डर और गुस्सा दोनों बढ़ गया है। हालांकि चौंकाने वाली बात ये है कि मनीष सिसौदिया की गिरफ्तारी पर न तो आम आदमी पार्टी और न ही विपक्ष के बाकी दलों ने आसमान सिर पर उठाया था। उल्टे कांग्रेस ने तो मनीष के जेल जाने पर खुशियाँ मनाते हुए ये कहकर खुद ही अपनी पीठ ठोकी कि जिस शराब नीति को लेकर आम आदमी पार्टी के नेताओं पर शिकंजा कसा गया उसमें भ्रष्टाचार का खुलासा उसी के द्वारा किया गया था। इसी मामले में तेलंगाना के पूर्व मुख्यमंत्री के. सी. राव की बेटी भी तिहाड़ जेल में है। महाराष्ट्र के अलावा प. बंगाल और  झारखंड के अनेक नेता ईडी या सीबीआई द्वारा पकड़े जा चुके हैं। ऐसे में प्रधानमंत्री  का ये दावा स्वागतयोग्य है कि भ्रष्टाचार के विरुद्ध निर्णायक लडाई में किसी भी प्रकार का लिहाज नहीं किया जायेगा। श्री मोदी का ये भी कहना है कि तीसरे कार्यकाल में वे और भी कड़े निर्णय लेंगे। निश्चित रूप से इस समय विपक्ष में घबराहट है। एक समय था जब श्री केजरीवाल चीख- चीखकर कहते थे कि सोनिया गाँधी को गिरफ्तार कर पूछताछ करें तो भ्रष्टाचार के बड़े -बड़े मामलों का खुलासा हो जायेगा। वे ये भी कहते थे कि ऐसा न कर पाने पर ईडी और सीबीआई भंग कर दी जानी चाहिए। लेकिन जब वे खुद जेल जा पहुंचे तब ईडी को ही कठघरे में खड़ा कर रहे हैं। हालांकि  विपक्ष के भ्रष्ट नेता ये कहने से पवित्र नहीं हो जाते कि भाजपा में बैठे भ्रष्ट लोगों की गर्दन में फंदा क्यों नहीं डाला जाता? लेकिन भाजपा पर भी ये जवाबदेही तो है ही कि क्या उसका कोई नेता भ्रष्ट नहीं है और दूसरी पार्टी से आये भ्रष्टाचार के आरोपी  उसका दामन थामते ही साफ - सुथरे कैसे हो जाते हैं? यद्यपि ऐसा आरोप लगाने वाले विपक्षी दलों को भी भ्रष्ट नेताओं से कोई परहेज नहीं है इसलिए उनकी बात पर जनता ध्यान नहीं देती। यही कारण है कि  देश की सबसे बड़ी समस्या होने के बावजूद भ्रष्टाचार चुनाव का मुद्दा नहीं बन पा रहा। 2014 के चुनाव में यूपीए सरकार के राज में हुए घोटाले खूब चर्चित हुए थे किंतु मोदी सरकार आने के बाद भी किसी को सजा नहीं हो सकी। 2019 के चुनाव में राहुल गाँधी राफेल विमान खरीदी पर चौकीदार चोर का नारा लगाते रहे किंतु इस बार उसकी चर्चा तक नहीं है। सोनिया गाँधी और राहुल दोनों नेशनल हेराल्ड प्रकरण में लंबे समय से जमानत पर हैं किंतु उसका अंजाम भी अज्ञात है। यदि ईडी ताबड़तोड़ छापेमारी और गिरफ़्तारियां नहीं करती तब न लोकतंत्र खतरे में पड़ता और न ही विपक्ष भी एकजुट होता। उस दृष्टि से श्री मोदी को उस बात का श्रेय मिलना चाहिए कि उनकी सरकार ने भ्रष्ट नेताओं पर शिकंजा कसने का साहस दिखाया किंतु ये मुहिम तभी निष्पक्ष कही जायेगी जब इसमें भाजपा के दागदार लोगों पर भी प्रहार किया जाए। हमारे देश में भ्रष्ट नेता भी लोकप्रिय होते हैं। जयललिता और लालू यादव इसके उदाहरण हैं।  ओमप्रकाश चौटाला जैसों को तो बाकायदा सजा हुई। यदि श्री मोदी भ्रष्टाचार के विरुद्ध चल रही कारवाई में अपने पराये का भेद मिटा सकें तो देश की उससे बड़ी सेवा नहीं हो सकती।

- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 3 April 2024

केरल के मुख्यमंत्री का गंभीर आरोप : काँग्रेस के जवाब का इंतजार



विपक्षी गठबंधन को इंडिया नाम देकर राहुल गाँधी ने  सोचा था कि उसके सहारे वे प्रधानमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा पूरी कर सकेंगे। लेकिन ऐसा लगता है कांग्रेस इस गठबंधन का सही तरीके से नेतृत्व नहीं कर सकी। इसका बड़ा कारण गठबंधन के आकार लेते ही श्री गाँधी की भारत जोड़ो यात्रा प्रारंभ होना  रहा। पार्टी को उम्मीद थी कि उसके जरिये राहुल का कद बाकी विपक्षी नेताओं की तुलना में ऊंचा हो जायेगा। कर्नाटक में  शानदार जीत के बाद तो पार्टी का हौसला और बुलंद हो गया । उसे लगने लगा कि श्री गाँधी ने अकेले दम पर नरेंद्र मोदी को चुनौती देने की क्षमता अर्जित कर ली है। इसी आत्मविश्वास के बल पर कांग्रेस ने उसके बाद हुए पाँच राज्यों के विधानसभा चुनाव में अन्य विपक्षी दलों से गठजोड़  से परहेज कर लिया। इसके साथ ही उसने इंडिया की खोजखबर लेनी बंद कर दी। दरअसल कांग्रेस की रणनीति ये थी कि उक्त राज्यों में  जीत दर्ज करने के बाद वह गठबंधन पर हावी होने की हैसियत में आ जाएगी। लेकिन  म.प्र , राजस्थान और छत्तीसगढ़ में वह जिस बुरी तरह से हारी उसके बाद उसका रुतबा घटने लगा। नीतीश कुमार तो गठबंधन छोड़कर ही चले गए।  विभिन्न घटक दलों की भी  जो प्रतिक्रियाएं। आईं  उनसे ये ज़ाहिर हो गया कि कांग्रेस के भरोसे चुनाव जीतने की उनकी उम्मीद टूट गई है।   बावजूद उसके गठबंधन की एकमात्र राष्ट्रीय पार्टी होने के नाते कांग्रेस को उसमें कसावट लाने का प्रयास करना चाहिए था किंतु श्री गाँधी ने न्याय यात्रा शुरू कर दी। कांग्रेस समर्थक कहे जाने वाले राजनीतिक विश्लेषक भी लोकसभा चुनाव की तैयारियां छोड़कर राहुल के यात्रा पर निकल जाने को गलत फैसला बताने से नहीं चूके। उनका आकलन सही साबित हुआ। यात्रा को पहले जैसा प्रतिसाद नहीं मिलने से पार्टी में भी निराशा आई। विभिन्न राज्यों में उसके नेता और कार्यकर्ता पार्टी छोड़ते जा रहे हैं। ऐसे समय श्री गाँधी को पार्टी के साथ ही  गठबंधन की मजबूती के लिए भी समय और ध्यान देना चाहिए था। उनकी अनदेखी का ही नतीजा है कि देश के सभी बड़े राज्यों में सहयोगी दलों ने कांग्रेस को हाशिये पर धकेलने का दुस्साहस कर डाला। सीटों के बंटवारे वाले राज्यों में केवल महाराष्ट्र में ही वह बड़े भाई की भूमिका में बची है। बाकी जगह गठबंधन के साथियों ने उसकी कमजोरी का भरपूर लाभ उठाया। आपातकाल के बाद 1977 में हुए लोकसभा चुनाव के पूर्व बाबू जगजीवन राम, हेमवती नंदन बहुगुणा और नंदिनी सत्पथी आदि ने जब कांग्रेस कांग्रेस छोड़ी तो पूरा परिदृश्य बदल गया था। बावजूद उसके पार्टी में उतनी हताशा और दिशाहीनता नहीं थी जितनी आज नजर आ रही है। जिन राज्यों में भाजपा से सीधा मुकाबला है उनको छोड़कर शेष में कांग्रेस की जो दयनीय स्थिति है उसके लिए गांधी परिवार तो जिम्मेदार है ही किंतु उसमें भी राहुल सबसे ज्यादा दोषी हैं । ममता, लालू , अखिलेश कोई भी उनको महत्व नहीं दे रहा। लेकिन सबसे बड़ी चोट की केरल के मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन ने। दिल्ली में आयोजित लोकतंत्र बचाओ रैली के अगले दिन ही उन्होंने राहुल और कांग्रेस को नसीहत दे डाली कि कुछ भी करने से पहले उसको दूरगामी परिणामों के बारे में सोचना चाहिए। उल्लेखनीय है उक्त रेली में श्री विजयन की पार्टी सीपीएम के पूर्व महासचिव सीताराम येचुरी भी मंचासीन थे। उसके बाद भी उन्होंने दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के जेल जाने के लिए कांग्रेस को जिम्मेदार ठहराते हुए  कहा कि दिल्ली सरकार की विवादित शराब नीति में भ्रष्टाचार की सबसे पहली शिकायत उसके द्वारा ही की गई थी। श्री विजयन यहीं नहीं रुके अपितु उन्होंने श्री गाँधी की केरल की वायनाड सीट से दोबारा लड़ने के लिए तीखी आलोचना करते हुए कहा कि वे सीपीआई प्रत्याशी के विरुद्ध लड़ रहे हैं। हालांकि वामपंथी पार्टियों का प. बंगाल में कांग्रेस से गठबंधन होने के बावजूद केरल में दोनों अलग - अलग गठबंधन में हैं। और राज्य की जनता बारी - बारी से दोनों को अवसर देती रही। लेकिन पिछले विधानसभा चुनाव में वाम मोर्चा ने लगातार दूसरी बार सरकार बनाकर वह परिपाटी तोड़ दी। सीपीएम  की भीतरी राजनीति में श्री येचुरी जहाँ कांग्रेस के पक्षधर रहे हैं वहीं श्री विजयन और प्रकाश कारत इंडिया गठबंधन में रहकर भी कांग्रेस को ज्यादा छूट देने के समर्थक नहीं हैं। 2019 में राहुल अमेठी और  वायनाड दोनों से लड़े। लेकिन जीते वायनाड से। वामपंथी सोचते थे राहुल  इस बार उत्तर भारत लौट जायेंगे किंतु वैसा न होने पर उनकी नाराजगी जाहिर होने लगी। सीपीआई महासचिव डी. राजा भी इस बारे में श्री गाँधी की खिचाई कर चुके थे जिनकी पत्नी वायनाड से प्रत्याशी हैं। लेकिन  श्री विजयन का ये आरोप इंडिया को नुकसान पहुंचा सकता है कि कांग्रेस के कारण ही श्री केजरीवाल जेल गए । देखना ये है कि कांग्रेस , विशेष रूप से श्री गाँधी उनके आरोप का क्या जवाब देते हैं? और ये भी कि आम आदमी पार्टी इस पर क्या प्रतिक्रिया व्यक्त करती है? 

- रवीन्द्र वाजपेयी


Tuesday, 2 April 2024

एक सुंदर सपना टूट गया : अब कहने को बचा ही क्या है

छ दशक पूर्व भारतीय फिल्मों में  एक ऐसे नायक का उदय हुआ जो व्यवस्था से विद्रोह करता हुआ धारा के विरुद्ध तैरने का दुस्साहस कर बैठता है। उसके क्रिया - कलापों में स्थापित मान्यताओं को तोड़ने की प्रवृत्ति होने के बावजूद दर्शक उसे भरपूर प्यार देते हैं और फिल्म समीक्षक उसे एंग्री यंग मैन नामक संबोधन देकर ये साबित करने का प्रयास करते हैं कि वह समाज के उस वर्ग की आवाज है जिसे उपेक्षित और शोषित समझा जाता था। वह एंग्री यंग मैन अपने साथ हुए अन्याय का बदला लेने के लिए कुछ भी कर गुजरने पर आमादा था। इसलिए समाज के एक बड़े वर्ग में उसकी स्वीकार्यता कायम हुई। जावेद - अख्तर की पटकथाओं से जन्मा वह नायक एक काल्पनिक वास्तविकता बन गया। दरअसल वह हिन्दी फिल्मों के उस भोले - भाले नायक का आधुनिक संस्करण था जो व्यवस्था की बुराइयों को देखता भी था और झेलता भी।  वह धक्का देने की बजाय धक्के खाकर समाज को झकझोरता था किंतु एंग्री यंग मैन पिटने की जगह पीटने वाला बन गया। उसके कंधे पर टंगे झोले को कोई छीनकर भागे तो वह उसके लिए कानून की शरण नहीं लेता बल्कि खुद का कानून लागू कर सुर्खियां बटोर लेता । भारतीय राजनीति में भी 13 साल पहले  आंदोलन की कोख से एक एंग्री यंग मैन का जन्म हुआ जो व्यवस्था बदलने की राह छोड़कर सत्ता के खेल का हिस्सा बन गया। उसके कंधो पर आदर्शों के झोले टंगे थे। वह धारा के विपरीत तैरने के जुनून से भरा हुआ था। कानून तोड़ने में उसे संकोच न था। वह जनता के लिए लड़ने के लिए विख्यात हो गया। जल्द ही उसका अंदाज लोगों के सिर पर चढ़कर बोलने लगा। उसे गरीबों के नये मसीहा के तौर पर पहिचान मिली और अपार जनसमर्थन भी। देश की राजधानी में भारी बहुमत के साथ उसकी सरकार बन गई।  लोगों को मुफ्त बिजली - पानी का उसका वायदा रास आ गया। सरकारी शालाओं के साथ मोहल्ला क्लीनिक जैसी सुविधा देकर वह जनता का लाड़ला बन बैठा। सफलता का कारनामा उसने दूसरी मर्तबा भी दोहराया किंतु इसके कारण उसके मन में पहले महत्वाकांक्षा और फिर अभिमान जागा। उसे लगने लगा वह सर्वशक्तिमान है । बस यहीं से उसके पैर फिसलन भरे रास्ते पर मुड़ गए और अंततः गत दिवस वह उसी तिहाड़ जेल में जा पहुंचा जहाँ देश के तमाम नेताओं को भ्रष्टाचार के आरोप में वह भेजना चाहता था। जी हाँ, वह अरविंद केजरीवाल ही हैं। उनकी सरकार की शराब नीति में हुए कथित घोटाले में आम आदमी पार्टी के कुछ नेताओं के जेल में बन्द होने के बाद अंततः उन्हें भी वहीं जाना पड़ा। इसे विडंबना ही कहेंगे कि जिन लोगों को वह भ्रष्टाचार का सरगना बताते नहीं  थकता था , कुछ दिनों से उन्हीं से समर्थन मांग रहा है। आंदोलन से निकली नई राजनीति, ढर्रे का शिकार होकर रह गई।  तमाम बुराइयाँ जिनसे लड़ने वह मैदान में उतरा था आज उसके चारों तरफ मंडरा रही हैं। इस शख्ख का भविष्य तो अदालत ही तय करेगी किंतु जिन उम्मीदों के साथ अन्ना का यह शिष्य राजनीति में आया था वे सब निराशा के अंधे कुए  में खोकर रह गई हैं। सत्ता से दूर रहने की कसम खाने वाले इस भूतपूर्व एंग्री यंग मैन को सत्ता छोड़ने में डर लग रहा है। देश को साफ - सुथरी राजनीति का स्वाद चखाने वाले इस व्यक्ति ने अपने चाहने वालों के मुँह में कड़वाहट भर दी है। उसका जेल जाना किसी की जय - पराजय न होकर एक सुंदर सपने के टूटने जैसा है। वह खुद को निर्दोष मानते हुए दावा करता है कि विवाद का जड़ बनी शराब नीति सही और लाभदायक थी। लेकिन अपने हर फैसले पर डटे रहने वाले इस नेता के पास इस सवाल का कोई उत्तर नहीं कि यदि सब सही था तो वह नीति वापस क्यों ली गई ? सवाल ये भी है कि जिन नेताओं को वह भ्रष्टाचार की प्रतिमूर्ति बताते नहीं थकता था, आज उन्हीं से ईमानदारी का प्रमाण पत्र मांगने में उसे तनिक भी शर्म क्यों नहीं आ रही ? उसके जेल जाने से उसके समर्थक और अनुयायी तो दुखी हैं ही किंतु उनसे ज्यादा झटका उन लोगों को लगा जिन्हें केजरीवाल में एक मसीहा नजर आता था। भ्रष्टाचार के विरुद्ध आंदोलन से उत्पन्न पार्टी का सर्वोच्च नेता जब खुद ही कठघरे में खड़ा हो गया तो अब कहने को बचता ही क्या है? 

-रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 1 April 2024

आक्रामक तेवर के बजाय लाचारी का प्रदर्शन विपक्ष के लिए नुकसानदेह होगा


गत दिवस दिल्ली  में इंडिया गठबंधन की जो रैली हुई उसका आयोजन आम आदमी पार्टी द्वारा अरविंद केजरीवाल की गिरफ्तारी  के विरोध में किया गया था। चूंकि पार्टी अपने बल पर इतना बड़ा जमावड़ा नहीं कर सकती थी इसलिए    उसने इसे सर्वदलीय रूप दे दिया। संयोगवश कांग्रेस पर भी आयकर विभाग का शिकंजा कस गया। इसलिए उसने भी इसके प्रति रजामंदी दे दी। लेकिन दोनों मिलकर भी यदि रैली करते तो  उसका प्रभाव दिल्ली तक सीमित होकर रह जाता। इसलिए गठबंधन के सभी नेताओं को बुलाया गया। लोकसभा चुनाव के पहले चरण का मतदान 19 अप्रैल को होने वाला है। उस दृष्टि से यह रैली विपक्ष के लिए काफी उपयोगी हो सकती थी लेकिन वह श्री केजरीवाल और हेमंत सोरेन की गिरफ्तारी के अलावा कांग्रेस को आयकर विभाग द्वारा दिये वसूली नोटिस तक सिमटकर रह गई। यदि रैली में ऐसी कुछ घोषणाएं की जातीं  जिनसे आम जनता में उत्साह जाग्रत होता तब वह अपने उद्देश्य में सफल मानी जाती। कुल मिलाकर विभिन्न दलों के नेताओं ने वही सब बातें दोहराईं जो मुंबई रैली में सुनने मिलीं। दूसरी तरफ कल ही एनडीए ने भी मेरठ में रैली की जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भ्रष्टाचार को लेकर विपक्ष पर हमला किया। इस रैली में लोकदल सहित उप्र में भाजपा के सहयोगी दलों के नेता शामिल हुए। एनडीए में तो चूंकि श्री मोदी का नेतृत्व सर्वमान्य है प्रधानमंत्री को लेकर कोई अनिश्चितता नहीं है। एक जमाने में कांग्रेस भी इसी सुविधाजनक स्थिति में हुआ करती थी और तब उसके नेता विपक्ष को प्रधानमंत्री का चेहरा बताने की चुनौती देने से नहीं चूकते थे। लेकिन आज स्थिति पूरी तरह बदल चुकी है। विपक्ष वैचारिक तौर पर एकजुट होने की बजाय केवल श्री मोदी को सत्ता से हटाये जाने के लिए एकजुट हुआ है। कल दिल्ली की रैली में आम आदमी पार्टी की ओर से श्री केजरीवाल की धर्मपत्नी सुनीता केजरीवाल ने मंच पर बैठ कर अपने पति का संदेश पढ़ा। अन्य जो नेता उपस्थित हुए वे सब परिवार द्वारा संचालित दल का प्रतिनिधित्व कर रहे थे। केवल सीपीएम के सीताराम येचुरी ही अपवाद कहे जाएंगे। लेकिन आश्चर्य तब हुआ जब  नई राजनीति का दावा करने वाली आम आदमी पार्टी ने श्री केजरीवाल की अनुपस्थिति में बजाय किसी और नेता के श्रीमती केजरीवाल को भेज दिया। हालांकि पति के गिरफ्तार होने के बाद से वे ही उनके संदेश प्रसारित करते हुए सार्वजनिक तौर पर सक्रिय हुईं जिससे ये अवधारणा मजबूत होने लगी कि यदि श्री केजरीवाल ने मुख्यमंत्री पद छोड़ा तब वे अपनी पत्नी को ही उत्तराधिकारी बनाएंगे। यद्यपि आम आदमी पार्टी की सरकार में गोपाल रॉय, सौरभ भरद्वाज और आतिशी जैसे मंत्री  हैं जिन्हें श्री केजरीवाल का विश्वासपात्र माना जाता है किंतु उनमें से किसी के भी नाम की चर्चा नहीं होने से इस संभावना को बल मिलने लगा कि श्रीमती केजरीवाल ही अगली मुख्यमंत्री बनेंगी। कल हुई सभा में उनके मंचासीन होने से राजनीतिक  विश्लेषक भी ये मानने लगे हैं कि आम आदमी पार्टी भी अब परिवारवाद के शिकंजे में फंसने लगी है। सही बात ये है इस पार्टी के जो आधारस्तंभ थे उनमें से ज्यादातर को श्री केजरीवाल ने  धकिया कर बाहर निकाल दिया। और उनके स्थान पर जी हुजूरी करने वाले जनाधारविहीन लोगों को भर लिया। मनीष सिसौदिया जरूर श्री केजरीवाल के बाद दूसरे स्थान पर थे किंतु उनके जेल जाने के उपरांत कोई ऐसा चेहरा नजर नहीं आ रहा जो उनकी अनुपस्थिति में पार्टी और सरकार की बागडोर संभाल सके। हालांकि इस स्थिति तक पार्टी को पहुंचाने के लिए श्री केजरीवाल ही जिम्मेदार कहे जाएंगे जिन्होंने दूसरी पंक्ति का नेतृत्व पनपने ही नहीं दिया। चूंकि इंडिया समूह की लगभग सभी पार्टियां परिवारवाद की पोषक हैं लिहाजा किसी को भी मंच पर श्रीमती केजरीवाल की मौजूदगी असहज नहीं लगी। इंडिया की सबसे बड़ी कमजोरी यही परिवारवाद बनती जा रही है। वामपंथियों को छोड़ भी दें किंतु उसके पास भी ऐसा कोई चेहरा नहीं है जिसकी राष्ट्रीय स्तर पर अपील हो। इस तरह के अनेक  बेमेल गठबंधन कांग्रेस के विरुद्ध अतीत में भी बने किंतु उनमें कुछ नेता ऐसे होते थे जिनकी राष्ट्रीय पहिचान हुआ करती थी। दुर्भाग्य से इंडिया समूह में  सोनिया गाँधी और राहुल को छोड़कर किसी की भी राष्ट्रीय स्तर पर मौजूदगी नहीं है  । श्रीमती गाँधी की अस्वस्थता से उनकी सक्रियता घटती जा रही है। कल भी उनका भाषण नहीं हुआ। बचे राहुल तो चूंकि गठबंधन में ही उनके नेतृत्व को लेकर उत्साह नहीं है इसलिए वे जम नहीं पा रहे। यही वजह रही की कल की बहुप्रचारित रैली  आक्रामक तेवर दिखाने के बजाय अपनी लाचारी का  ढोल पीटती रही। यदि आने वाले कुछ दिनों में  यह गठबंधन धुंआधार तरीके से नहीं खेला तब बाजी उसके हाथ से खिसकती चली जायेगी। उसे यह नहीं भूलना चाहिए कि भ्रष्टाचार के आरोप में बंद नेताओं को अदालत से जमानत नहीं मिलने से वह सहानुभूति नहीं मिलेगी जिसकी वे उम्मीद लगाए हुए थे। 


- रवीन्द्र वाजपेयी