Tuesday, 16 April 2024

ईरान - इसराइल विवाद में मुस्लिम राष्ट्रों की फूट भारत के लिए शुभ संकेत

जराइल और हमास के बीच कई महीनों से जारी युद्ध की समाप्ति की कोई संभावना नजर नहीं आने से पूरी दुनिया चिंतित है। गाज़ा पट्टी नामक फिलिस्तीनी इलाके में इजराइली हमलों का कहर जारी है। सर्वत्र बर्बादी का मंजर है। संरासंघ युद्ध रुकवाने में पूरी तरह विफल रहा है। इजराइल इस हद तक आक्रामक है कि  अमेरिका तक की बात नहीं सुन रहा। हालांकि इस देश को जन्म लेते ही युद्ध से जूझना पड़ा इसलिये इसके नागरिक उससे डरते नहीं। लेकिन अब तक जितने भी युद्ध हुए वे कुछ दिन ही चले जबकि यह जंग रुकने का नाम नहीं ले रही। हालांकि इसके पीछे पश्चिमी देशों की भूमिका भी है जो अरब जगत में में शांति कायम नहीं होने देते। लेकिन गत 1 अप्रैल को सीरिया स्थित ईरानी दूतावास पर हुए हमले में 13 लोगों के मारे जाने का दोष ईरान सरकार ने इजराइल पर मढ़ दिया। हालांकि उसने इसका खंडन किया किंतु हमास का साथ दे रहे ईरान ने गुस्से में  सैकड़ों ड्रोन मिसाइलें इजराइल पर दाग दीं । लेकिन आश्चर्यजनक ढंग से  पड़ोसी देशों में तैनात  अमेरिकी वायु सेना के दस्तों की मदद से एक - दो को छोड़कर सभी मिसाइलों को हवा में ही नष्ट कर दिया गया । उसके बाद  इजराइल ने पलटवार की धमकी देकर एक नये मोर्चे पर जंग छेड़ने का ऐलान कर दिया जिससे पूरी दुनिया तनाव में आ गई। इसी बीच ईरान के एक इस्लामिक संगठन द्वारा इसराइल के जलपोत का अपहरण कर लिया गया जिस पर भारत के भी 22 लोग सवार थे जिसके बाद तनाव और बढ़ा।उधर इसराइल सरकार की  आपात्कालीन बैठक में ईरान से बदला लेने का निर्णय होने से वैश्विक स्तर पर हलचल मचने लगी। अमेरिका सहित तमाम पश्चिमी देशों के साथ ईरान के रिश्ते शत्रुतापूर्ण हैं। उस पर आर्थिक प्रतिबंधों का जबरदस्त घेरा है। रोचक बात ये है कि इसराइल के विरुद्ध हमलावर होने पर ईरान को सऊदी अरब और जार्डन  तक का समर्थन नहीं मिला। जिन अमेरिकी वायु दस्तों की सहायता से ईरानी मिसाइलों को नष्ट किया गया वे उक्त दोनों देशों के अलावा कुवैत, सं अरब अमीरात और कतर में तैनात हैं। ईरान ने पहली बार इसराइल पर सीधा हमला किया था। उसके पास परमाणु बम होने के आरोप में ही अमेरिका उसकी घेराबंदी करने का कोई अवसर नहीं छोड़ता।यहां तक कि उससे कच्चा तेल नहीं खरीदने के लिए भी दूसरे देशों पर दबाव बनाता है। इसकी वजह से ये आशंका प्रबल होने लगी कि इसराइल और ईरान के बीच  जंग की शुरुआत हुई तो पूरा अरब जगत उसमें उलझ जाएगा। लेकिन लगभग आधा दर्जन प्रमुख मुस्लिम देशों द्वारा ईरानी हमलों से बचाव में इसराइल का साथ देने से समीकरण उलट गए जिससे ईरान भी थोड़ा ठंडा पड़ा। अमेरिका में चूंकि इस साल राष्ट्रपति चुनाव होने वाले हैं इसलिए राष्ट्रपति बाइडेन भी ज्यादा उलझने से बचना चाह रहे हैं। उल्लेखनीय है यूक्रेन - रूस युद्ध में अमेरिका और उसके मित्र देश यूक्रेन को आर्थिक और सामरिक मदद देते आ रहे हैं। वरना रूस उस पर कब्जा जमा चुका होता। इसराइल और हमास के बीच हो रही लड़ाई का अप्रत्यक्ष भार भी अमेरिका पर पड़ रहा है। हालांकि फंसा ईरान भी है किंतु उसके इस्लामिक शासक अंध अमेरिकी विरोध के कारण इसराइल का अस्तित्व मिटाने की डींगें हाँका करते हैं। दूसरी तरफ सऊदी अरब, सं अरब अमीरात , मिस्र, जार्डन जैसे प्रमुख देश इसराइल से कारोबारी रिश्ते कायम करने लगे हैं। हालांकि रूस अभी भी सीरिया और ईरान के सिर पर हाथ रखे हुए है किंतु इसराइल पर हमले के बाद मुस्लिम देशों से अपेक्षित समर्थन न मिलने से ईरान का हौसला कमजोर हुआ है और वह भी सम्मानजनक तरीके से इस संकट से निकलना चाह रहा है। लेकिन बात इतने से ही समाप्त नहीं हो जाती क्योंकि इसराइल भले ही अभी चुप होकर बैठ जाए लेकिन ईरान द्वारा किये गए हमले का जवाब वह मौका पाते ही देगा ये सभी मानते हैं। उसके लिए सबसे उत्साहवर्धक है मुस्लिम देशों का दो फाड़ हो जाना। 1949 में अस्तित्व में आते ही उस पर जिन देशों ने हमला कर दिया उनके साथ उसकी दुश्मनी लंबी चली किंतु 20 वीं सदी खत्म होते - होते पश्चिमी एशिया के अनेक मुस्लिम देश समझ गये कि इसराइल एक वास्तविकता है जिसे चाहे- अनचाहे स्वीकार करना ही पड़ेगा। लिहाजा हालात बदलने लगे , वरना अब तक इसराइल पर चौतरफा आक्रमण होने लगते। मौजूदा स्थिति भारत के लिए भी चिंता का कारण है क्योंकि इसराइल के अलावा अनेक अरब देशों में हमारे नागरिक कार्यरत हैं। ईरान के कब्जे में जो जलपोत है उस पर भी भारतीय दल था। ऐसे में भारत के लिए भी कूटनीतिक संतुलन बनाये रखना जरूरी है क्योंकि इसराइल जहाँ हमारा भरोसेमंद सहयोगी है वहीं ईरान से मिलने वाले सस्ते कच्चे तेल के कारण हमारी अर्थव्यवस्था को बहुत सहारा मिला। हालांकि  इसराइल को लेकर इस्लामिक देशों की एकता जिस तरह खंडित हो रही है वह भारत के लिए अच्छा संकेत है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 15 April 2024

प्रधानमंत्री की छवि पर केंद्रित है भाजपा का संकल्प पत्र

लोकसभा चुनाव के लिए भाजपा ने अपना संकल्प पत्र  मोदी की गारंटी नामक आवरण में लपेटकर जारी कर दिया। चुनावी वायदों  की पैकिंग बहुत ही आकर्षक होती है । और भाजपा के संकल्प पत्र में भी उसका भरपूर ध्यान रखा गया है।  एक फर्क अवश्य है कि कांग्रेस चूंकि 10 साल से सत्ता से बाहर है इसलिए उसके वायदों के पूरा होने पर मतदाताओं के मन में शंका हो सकती है। वहीं नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री के तौर पर जनता का भरोसा काफी हद तक जीता इसीलिए 2019 में उन्हें पहले से अधिक जनादेश प्राप्त हुआ।  यद्यपि एक वर्ग मानता है कि उसके पीछे पुलवामा हादसा रहा । उस लिहाज से यह चुनाव सही मायने में उनकी अग्नि परीक्षा है। दूसरे कार्यकाल में उन्होंने जम्मू कश्मीर से  धारा 370 हटवाने का वह कारनामा कर दिखाया जिसकी हिम्मत उनके पूर्व किसी भी प्रधानमंत्री ने नहीं दिखाई। राम मंदिर मुद्दे का हल  वैसे तो सर्वोच्च न्यायालय के खाते में गया परंतु  लेकिन एक निश्चित समय सीमा के भीतर भव्य मंंदिर  निर्माण के साथ ही अयोध्या को एक सुविकसित स्वरूप प्रदान करते हुए प्राण प्रतिष्ठा के आयोजन को वैश्विक स्तर पर प्रचारित करने का जो कार्य मोदी सरकार ने किया वह हर दृष्टि से अभूतपूर्व  था। हालांकि उसका राजनीतिक लाभ भाजपा को मिलना ही था किंतु कांग्रेस सहित विपक्ष के अन्य दलों की अदूरदर्शी सोच के कारण उसमें और वृद्धि हो गई। गत दिवस पेश किये संकल्प पत्र में भाजपा ने समान नागरिक संहिता लागू करने और एक देश एक चुनाव प्रणाली से ज्यादा जोर उन मुद्दों पर दिया जो जनता को सीधे लाभान्वित करते हैं। मसलन 70 साल से ऊपर के सभी बुजुर्गों को 5 लाख तक के मुफ्त और  बिना भुगतान किये (कैश लैस) इलाज की सुविधा  , गरीबों को 3 करोड़ आवास, ग्रामीण क्षेत्रों में 50 हजार तक कर्ज की व्यवस्था, मुद्रा लोन की सीमा 20 लाख, घरों की छत पर सोलर प्लांट लगाकर मुफ्त बिजली , पाइप लाइन से रसोई गैस घर - घर पहुंचाकर उसकी लागत कम करने जैसे वायदे हैं। मुफ्त अनाज और किसान कल्याण निधि के अलावा अन्य जो भी जन कल्याणकारी कार्यक्रम चल रहे हैं उनको जारी रखने का संकल्प भी दोहराया गया है।  वायदे निभाने के मामले में भाजपा का रिकार्ड तुलनात्मक दृष्टि से बेहतर है इसलिए मोदी की गारंटी हाल के चुनावों में मतदाताओं को आकर्षित करने में सफल रही। विगत 10 सालों में मोदी सरकार ने  बड़े निर्णय लेकर उन्हें कार्य रूप में परिवर्तित किया लिहाजा उससे पूरी तरह संतुष्ट नहीं रहने वाले  मतदाता भी ये मानते हैं कि प्रधानमंत्री में निर्णय क्षमता तो है। उनकी सभी नीतियाँ और निर्णय सफल हुए हों ये कहना तो सही नहीं होगा किंतु  उनके पूर्ववर्ती डा. मनमोहन सिंह की सरकार असफलता के डर से  फैसले करने से बचती रही इसलिए इस सरकार की छवि उस मामले में बहुत बेहतर बन गई। डा. सिंह के विपरीत  श्री मोदी की सत्ता और पार्टी संगठन दोनों पर अच्छी पकड़ है। इसीलिए संकल्प पत्र से भी मोदी की गारंटी नाम जुड़ा हुआ है। लेकिन कुछ मूलभूत मुद्दे हैं जिन पर आगे  प्रधानमंत्री को तेजी से ध्यान देना होगा। सभी शिक्षित युवाओं को सरकारी नौकरी देना तो किसी के लिए संभव नहीं है किंतु रोजगार के वैकल्पिक स्रोत उत्पन्न करते हुए बेरोजगारी दूर करने युद्धस्तरीय प्रयास समय की मांग है। इसी तरह न्यूनतम समर्थन मूल्य के विवाद का सार्थक हल तलाशना भी तीसरी पारी में बड़ी चुनौती होगी।  भाजपा को मध्यमवर्गीय लोगों का समर्थन प्रारंभ से मिलता आया है। लेकिन इस वर्ग के नौकरपेशा और व्यापारी दोनों में नाराजगी है, जिसे दूर नहीं किया गया तो कालांतर में उसको नुकसान झेलना पड़ सकता है। हालांकि संकट की स्थितियों में समुचित निर्णय लेने के लिए मोदी सरकार ने जनता के मन में जगह बनाई है किंतु मणिपुर जैसे मामलों में प्रभावशाली कदम नहीं उठाने के लिए उसे आलोचना भी झेलनी पड़ी है। धारा 370 हटने के बाद जम्मू कश्मीर में विधानसभा चुनाव करवाने जैसी चुनौतियाँ तीसरे कार्यकाल में श्री मोदी का इंतजार कर रही हैं। विदेश नीति और अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में प्रधानमंत्री ने निश्चित रूप से असर छोड़ा है। अधो संरचना के कार्य भी जनता की पसंद का विषय हैं। भ्रष्टाचार के विरुद्ध वैसे तो इस सरकार ने बहुत ही दबंगी दिखाई है किंतु उसे इस आरोप से बाहर निकलना होगा कि ईडी और सीबीआई की समूची सक्रियता केवल भ्रष्ट विपक्षी नेताओं तक सीमित है और भाजपा में आते ही उनके दामन उजले हो जाते हैं। कुल मिलाकर मोदी सरकार का अब तक का कार्यकाल उस दृष्टि से सफल कहा जा सकता है कि उसने विकास के पहिये को थमने नहीं दिया। कोरोना संकट के बाद अर्थव्यवस्था का तेजी से दौड़ना बड़ी सफलता है। जिससे देश का आत्मविश्वास बढ़ा है। और इसीलिए इस संकल्प पत्र के जारी होने के पहले से ही प्रधानमंत्री ने तीसरी पारी के शुरुआती 100 दिन की कार्य योजना तैयार होने की चर्चा छेड़ दी। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 13 April 2024

दिल्ली राष्ट्रपति शासन की ओर बढ़ रही


दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल तिहाड़ जेल में हैं। उनकी रिहाई सर्वोच्च न्यायालय में प्रस्तुत उनकी याचिका पर होने वाले फैसले पर निर्भर करेगी जिसमें उन्होंने ईडी द्वारा उनको गिरफ्तार किये जाने की कारवाई को ही चुनौती दी है। इस मामले में पहले से गिरफ्तार अन्य नेताओं की जमानत  अर्जियाँ जिस तरह निरस्त होती आ रही हैं उसके कारण श्री केजरीवाल की जल्द रिहाई को लेकर कानून के जानकार आश्वस्त नहीं हैं। दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा उनकी गिरफ्तारी को विधि सम्मत बताते हुए जिस प्रकार की कड़ी टिप्पणियां की गईं यदि सर्वोच्च न्यायालय भी उनसे सहमत हो गया तब तो उनको भी पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसौदिया की तरह लंबे समय तक तिहाड़ जेल में रहना पड़ सकता है। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा ये है कि जेल जाने के बाद भी उपमुख्यमंत्री पद से त्यागपत्र नहीं देने की ज़िद पर अड़े श्री केजरीवाल को यदि सर्वोच्व न्यायालय ने भी तत्काल रिहा करने से इंकार कर दिया तब दिल्ली सरकार का कामकाज कैसे चलेगा ? हालांकि उन्हें पद से हटाये जाने की अर्जियाँ न्यायालय ने स्वीकार नहीं  कीं क्योंकि संविधान इस बारे में मौन है किंतु जो जानकारी आ रही है उसके अनुसार मुख्यमंत्री द्वारा जेल में बैठकर सरकार चलाने का फैसला भले ही संविधान के लिहाज से गलत न हो किंतु व्यवहारिक दृष्टि से वह ज्यादा समय तक कारगर साबित नहीं हो सकता। जेल जाने के बाद वे अपनी पत्नी के जरिये निर्देश जारी कर रहे थे जिनकी कोई वैधानिक स्थिति नहीं है। उनकी अनुपस्थिति में चूंकि कैबिनेट मीटिंग  नहीं हो पा रही इसलिए नीतिगत फैसले नहीं हो पा रहे। इसके अलावा बड़ी संख्या में फाइलों के ढेर लगते चले जा रहे हैं। इसी सबके कारण ये अटकलें लगना शुरू हो गई हैं कि दिल्ली में राष्ट्रपति शासन की परिस्थितियाँ बन रही हैं। गत दिवस सरकार की मंत्री आतिशी मार्लेना ने पत्रकार वार्ता में खुलकर आरोप लगाया कि उपराज्यपाल केजरीवाल सरकार को अपदस्थ करने की तैयारी कर रहे हैं। लेकिन ये आम आदमी पार्टी की कार्यशैली है जिसमें वह किसी भी विपरीत परिस्थिति का पूर्वानुमान लगाकर पहले से अपने लिए सहानुभूति अर्जित करने का खेल खेलती है। खुद केजरीवाल अपनी गिरफ्तारी का शिगूफा लंबे समय से छोड़ रहे थे। इस बारे में विचारणीय बात ये है कि  मुख्यमंत्री सहित पूरी पार्टी ईडी की संभावित कारवाई से अवगत थी। जो दिग्गज वकील आज जमानत के लिए खड़े हैं उनसे भी सलाह ली गई होगी। ईडी द्वारा भेजे गए 9 समन  श्री केजरीवाल द्वारा उपेक्षित किये जाने के पीछे भी गिरफ्तारी से बचने का दांव ही था। जरूरत से ज्यादा होशियारी व्यक्ति को कितनी महंगी पड़ जाती है ये इस उदाहरण से स्पष्ट है। जेल जाते ही मुख्यमंत्री त्यागपत्र दे देते तब वे नैतिकता का ढोल पीटने के अधिकारी होते किंतु अब वे जो अकड़ दिखा रहे हैं वह सत्ता में येन केन प्रकारेण बने रहने की छटपटाहट का परिणाम है। दरअसल उन्हें ये डर है कि  एक बार मुख्यमंत्री पद छोड़ने के बाद दोबारा उसे हासिल करना मुश्किल होगा। वे अपनी पत्नी को यदि उत्तराधिकार सौंपते तो अव्वल तो पार्टी में नेताओं का अभाव सामने आता और दूसरा भाजपा परिवारवाद के आरोप में आम आदमी पार्टी को कटघरे में खड़ा करती। श्री केजरीवाल जानते हैं कि उनके हटते ही पार्टी में नये शक्ति केंद्र सिर उठाने लगेंगे और बड़ी बात नहीं कि कोई एकनाथ शिंदे और अजीत पवार जैसा खेल रचते हुए पार्टी को दो फाड़ कर डाले। भाजपा भी मौके की तलाश में है।  सर्वोच्च न्यायालय में श्री केजरीवाल की याचिका का क्या हश्र होता है  उस पर सबकी निगाह लगी है। यदि वहाँ से मुख्यमंत्री को राहत नहीं मिली तब दिल्ली में राष्ट्रपति शासन लगने के आसार और मजबूत हो जायेंगे। लेकिन इस सबके कारण आम आदमी पार्टी और श्री केजरीवाल दोनों की चुनावी व्यूहरचना अस्त व्यस्त होकर रह गई है। सबसे बड़ा नुकसान ये हुआ कि जिस समय श्री केजरीवाल को भाजपा और प्रधानमंत्री पर सबसे अधिक हमलावर होना था उस समय वे अपना बचाव करने मजबूर हैं। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 12 April 2024

चुनाव को आंकड़ों पर केंद्रित कर अपना माहौल बनाने में सफल हो रहे मोदी

शांत किशोर भले ही राजनीतिक नेता न हों किंतु राजनीति में रुचि रखने वालों के बीच वे एक जाना - पहचाना नाम हैं। 2014 में नरेंद्र मोदी के चुनाव अभियान के दिशा निर्देशक रहे प्रशांत  रातों - रात चर्चित व्यक्तित्व बन गए। मोदी सरकार के बनने में पोउनकी रणनीति काफी कारगर मानी गई थी। लेकिन बाद में वे भाजपा से दूर हो गए। नीतीश कुमार और ममता बैनर्जी के अलावा जगन मोहन रेड्डी की चुनावी सफलता में भी उनका योगदान रहा। नीतीश ने उनको जनता दल (यू) में पद भी दिया किंतु फिलहाल वे जन सुराज नामक संगठन बनाकर बिहार के चप्पे - चप्पे में घूमकर लोगों को जागरूक करने में जुटे हुए हैं। भविष्य में इसी बैनर तले बिहार में चुनाव लड़ने का इरादा भी जता चुके हैं। संरासंघ जैसी संस्था में  काम कर चुके प्रशांत इन दिनों टीवी चैनलों पर अपने साक्षात्कार के लिए चर्चाओं में हैं। इस दौरान वे लोकसभा चुनाव को लेकर अपना आकलन भी पेश कर रहे हैं। उल्लेखनीय है 2014 के बाद उनकी श्री मोदी और भाजपा दोनों से दूरी काफी ज्यादा हो गई। प्रधानमंत्री की आलोचना करने का कोई अवसर वे नहीं चूकते थे। उनके कांग्रेस से जुड़ने की खबरें भी खूब चलीं किंतु राहुल गाँधी से पटरी न बैठने से बात आगे नहीं बढ़ी। उसके बाद वे बिहार में जनता से सीधे संवाद के जरिये अपनी राजनीतिक जमीन तैयार करने में जुट गए किंतु प्रादेशिक के साथ ही राष्ट्रीय राजनीति और नेताओं पर उनकी टिप्पणियां लोगों का ध्यान आकर्षित करती रहती हैं।  इसीलिए विभिन्न समाचार माध्यम लगातार उनके साथ  बातचीत प्रसारित कर रहे हैं। चूँकि वे किसी दल या चैनल के लिए सर्वेक्षण का  काम नहीं कर रहे   इसलिए उनका आकलन काफी मायने रखता है। शुरुआती दौर में तो वे ज्यादा नहीं बोल रहे थे किंतु कुछ दिनों से खुलकर ये कहने लगे हैं कि पंडित जवाहर लाल नेहरू के बाद  नरेंद्र मोदी लगातार तीन चुनाव जीतने का करिश्मा दोहराने जा रहे हैं। यद्यपि भाजपा को 370 और एनडीए के 400 पार के दावे से वे सहमत नहीं हैं लेकिन उनका स्पष्ट रूप से कहना है कि भाजपा 2019 की अपनी संख्या में वृद्धि करने के साथ ही पूर्वी और दक्षिणी राज्यों में अब तक के सबसे ज्यादा मत हासिल करेगी।  प. बंगाल, उड़ीसा, तेलंगाना आदि में उसके चमत्कारिक प्रदर्शन की उम्मीद भी श्री किशोर जता रहे हैं। हालांकि इस कारण से कांग्रेस सहित अन्य विपक्षी पार्टियाँ उनकी आलोचना करते हुए आरोप लगा रही हैं कि वे भाजपा के पक्ष में माहौल बना रहे हैं लेकिन जिस आधार पर उन्होंने मोदी सरकार की वापसी की उम्मीद व्यक्त की है उसे समझने के उपरांत उनकी बात सही प्रतीत होने लगती है। उदाहरण के लिए इंडिया गठबंधन  बन जाने जाने के महीनों बाद तक उसका कोई मैदानी शक्ति प्रदर्शन नहीं हो सका। मुंबई, बिहार और दिल्ली में आयोजित रैलियां क्रमशः कांग्रेस, राजद और आम आदमी पार्टी द्वारा प्रायोजित थीं। दूसरी बात ये कि अब तक सिवाय मोदी को हटाने के इस गठबंधन का अन्य कोई साझा कार्यक्रम लोगों को समझ नहीं आया। राहुल गाँधी की नेतृत्व क्षमता पर भी वे सवाल उठाते रहे हैं। वैसे श्री किशोर तो अपनी राय पूरे देश के राजनीतिक हालात का अवलोकन करने के बाद व्यक्त कर रहे हैं किंतु जिन पेशेवर एजेंसियों द्वारा  चुनाव पूर्व सर्वेक्षण किया जा रहा है वे भी  जो अनुमान प्रस्तुत कर रही हैं उनके अनुसार दक्षिण भारत छोड़कर बाकी के राज्यों में भाजपा और एनडीए बढ़त पर हैं। महाराष्ट्र, प. बंगाल और बिहार ही वे राज्य हैं जहाँ एनडीए को कड़ी टक्कर मिलती बताई जा रही है किंतु वहाँ भी   किसी बड़े नुकसान की संभावना कम है। प्रशांत किशोर का भी  मानना है कि प्रधानमंत्री ने भाजपा की 370 और एनडीए की 400 से अधिक सीटें आने का जो नारा देकर  पूरे विमर्श की उसी पर केंद्रित कर दिया। और उसके बाद उन्होंने  तीसरे कार्यकाल में बड़े और कड़े निर्णय करने के साथ ही पहले 100 दिन की कार्य योजना तैयार होने जैसी बात कहकर जिस आत्मविश्वास का प्रदर्शन किया उस वजह से ये अवधारणा और मजबूत हुई कि मतदाता इस सरकार को तीसरा अवसर देने जा रहे हैं। अब तक मिले मैदानी संकेत  और तमाम सर्वेक्षण एजेंसियों के आकलन से वे राजनीतिक विश्लेषक भी अब मोदी सरकार के लौटने की संभावना से सहमत होने लगे हैं जो ऐलनिया भाजपा विरोधी कहे जाते हैं। गत वर्ष संपन्न विधानसभा चुनावों के बाद से राष्ट्रीय राजनीति में विपक्षी खेमे में जो बिखराव और शून्यता नजर आने लगी उससे भाजपा को और आक्रामक होने का अवसर मिल गया। सत्ता विरोधी रुझान पूरी तरह लुप्त हो गया ये मान लेना गलत होगा किंतु प्रधानमंत्री पद को लेकर विपक्ष में व्याप्त अनिश्चितता और अविश्वास ने नरेंद्र मोदी को और मजबूती दे दी। प्रशांत किशोर का आकलन उसी का परिणाम है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी


Thursday, 11 April 2024

चुनावी वायदों में महानगरों की बढ़ती प्यास और रुकती सांस की चिंता क्यों नहीं की जाती

चुनाव के मौसम में वायदों की बरसात हो रही है। कोई नौकरियां बांटने का आश्वासन बांट रहा है तो किसी के झोले में आपको लखपति बनाने का नुस्खा है। मुफ्त बिजली और अन्न के वायदे भी  उछल रहे हैं। जाति के नाम पर लोगों को अलग पाँत में खड़ा करने का झुनझुना भी बजाया जा रहा है। संपत्ति के समान बँटवारे की सुरसुरी भी छोड़ दी गई है। लाखों रुपये का इलाज मुफ्त करवाने का भरोसा  दिये जाने के साथ ही महिलाओं को आकर्षित करने सभी राजनीतिक दल स्पेशल इलेक्शन पैकेज लेकर घर - घर जा रहे हैं। बुजुर्गों और युवाओं को भी तरह - तरह के सपने दिखाकर आकर्षित किया जा रहा है। वैसे इसमें नया कुछ भी नहीं है। कृषि प्रधान से चुनाव प्रधान देश बन जाने के कारण भारत में वायदों के बीज बोये जाने लगे हैं। लेकिन दुर्भाग्य ये है कि उनमें से बहुत कम ही अंकुरित हो पाते हैं। यदि चुनावी वायदों में आधे भी वास्तविकता में बदले होते तो  देश दुनिया के विकसित देशों की कतार में आगे खड़ा नजर आता। हालांकि ये कहना तो गलत होगा कि कुछ नहीं हुआ किंतु जितना कहा गया वह नहीं होने से आज भी तमाम ऐसी समस्याएं मौजूद हैं जो आज़ादी के समय भी थीं। इसका कारण राजनीतिक नेताओं में प्रतिबद्धता और दायित्वबोध का अभाव ही है वरना सात दशक के कालखण्ड में जापान राख के ढेर से निकलकर बड़ी आर्थिक शक्ति बन बैठा। वहीं अफीमचियों के देश के तौर पर कुख्यात चीन दुनिया की आर्थिक और सामरिक महाशक्ति बनकर अमेरिका तक को चुनौती देने की हिमाकत करने से नहीं चूकता। कहने का आशय ये है कि जिस लोक कल्याणकारी राज्य की स्थापना हेतु लोकतंत्र को हमने अपनाया वह निजी स्वार्थों की पूर्ति का साधन बनकर रह गया। विकास तो हुआ किंतु जिन मूलभूत समस्याओं पर ध्यान देते हुए भविष्य में उत्पन्न होने वाली समस्याओं  से बचा जा सकता था उनकी अनदेखी की गई। जिसका दुष्परिणाम नई पीढ़ी के सपनों को साकार करने वाले महानगरों की चरमराती व्यवस्थाओं के रूप में देखने मिल रहा है। कुछ दिनों पहले देश के आई.टी हब और सिलीकान वैली कहलाने वाले बेंगलुरू महानगर में उत्पन्न जलसंकट की खबर आई थी। और अब दक्षिण भारत के एक और महानगर चेन्नई में पानी की किल्लत का समाचार आ गया। इस महानगर में पेयजल आपूर्ति के स्रोत के तौर पर प्रसिद्ध झील में पानी समाप्त हो गया जबकि अभी तो पूरी गर्मियां पड़ी हैं। वीरानम नामक इस झील से 43 फीसदी चेन्नई को पानी मिलता है । समुद्र के किनारे बसी तमिलनाडु की इस राजधानी के बाकी तालाब भी जवाब दे चुके हैं। यहां समुद्र के खारे पानी को पीने योग्य बनाने का संयंत्र भी लगाया गया है किंतु उसकी क्षमता आबादी के अनुपात में बेहद कम है। एक समय था जब बेंगलुरू अपने खुशनुमा मौसम के लिए प्रसिद्ध था। इसीलिए इसे मैसूर रियासत की ग्रीष्मकालीन राजधानी भी बनाया गया था। यहाँ के बाग - बगीचे पर्यटकों को आकर्षित करते थे। उधर चेन्नई देश के चार महानगरों में शुमार किया जाता रहा है। अंग्रेजों के जमाने से ही चेन्नई ( पूर्व नाम मद्रास) एक प्रमुख शहर रहा। पहले तो तमिलनाडु राज्य  का नाम ही मद्रास हुआ करता था। आजादी के बाद से ही बेंगलुरू और चेन्नई का विकास और विस्तार होता गया जिसके कारण  आबादी बेतहाशा बढ़ी। परिणाम स्वरूप अव्यस्थाओं ने पनपना शुरू किया। यातायात समस्या, प्रदूषण और  अतिक्रमण यहाँ की पहचान बनते चले गए। देश के अन्य महानगर मसलन कोलकाता, मुंबई भी इन्हीं का शिकार हैं। देश की राजधानी दिल्ली तो दुनिया की सबसे प्रदूषित राजधानी बन चुकी है। ऐसे में प्रश्न ये है कि चुनावी वायदों में उक्त समस्या के निदान को कितना महत्व दिया जाता है। सड़कें, पुल, फ्लायोवर निश्चित रूप से बने हैं।  अंतर्राष्ट्रीय स्तर के राजमार्गों के निर्माण की वजह से सड़क यातायात में दिन ब दिन वृद्धि हो रही है। प्रधानमंत्री ने देश में 100 स्मार्ट सिटी बनाने की योजना शुरू की। स्वच्छता मिशन की वजह से साफ - सफाई भी एक महत्वपूर्ण विषय बन गया। लेकिन ये स्वीकार करने में कुछ भी गलत नहीं है कि शासन में बैठे रहनुमा बढ़ते शहरीकरण के खतरों को भांपने में चूक गए। आबादी का केंद्रीकरण बड़े शहरों में एकाएक तो हुआ नहीं। ऐसे में  सरकार चलाने वाले चाहे वे किसी भी दल के क्यों न रहे हों यदि सतर्क रहते तब शायद महानगरों की कमर इस तरह न टूटती। समय आ गया है जब इस बारे में गंभीर चिंता की जाए। शहरों पर आबादी के बढ़ते बोझ को नहीं रोका गया तो फिर वह वह दिन दूर नहीं जब बेंगुलुरू और चेन्नई जैसी पानी की किल्लत और दिल्ली जैसी सांस लेने की दिक्कत मझोले स्तर के शहरों में भी देखने मिलेगी। बेहतर होता यदि चुनाव में ऐसे मुद्दे भी राजनीतिक दलों की प्राथमिकताओं में नजर आते। लेकिन कुछ कसूर तो मतदाताओं का भी है जो क्षणिक लाभ के बदले  बदहाली की ज़िंदगी जीने तैयार हो जाते हैं। 


-रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 10 April 2024

केजरीवाल द्वारा जगाई उम्मीदें यमुना के प्रदूषित जल में डूब गईं


दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल द्वारा उनकी गिरफ्तारी को दी गई चुनौती याचिका उच्च न्यायालय ने न सिर्फ खारिज कर दी बल्कि उनके द्वारा उठाये गए मुद्दों पर तीखी टिप्पणियां भी कर डालीं। चुनाव के समय  गिरफ्तारी पर आपत्ति को अदालत ने ये कहते हुए ठुकरा दिया कि उसे राजनीतिक  नहीं, संवैधानिक नैतिकता की ज्यादा फिक्र है। सरकारी गवाहों के बयानों  के आधार पर  आरोपी बनाए जाने के ऐतराज पर  न्यायालय ने ये कहते लताड़ भी लगाई कि मजिस्ट्रेट के सामने रिकार्ड किये गए बयानों की प्रामाणिकता पर सवाल उठाना न्याय प्रक्रिया का अपमान है। उक्त आधार पर न्यायाधीश ने उनकी गिरफ्तारी को सही बताते हुए स्पष्ट किया कि  शराब घोटाले में श्री केजरीवाल के लिप्त होने के पुख्ता प्रमाण हैं । उन्होंने उक्त फैसले के विरुद्ध सर्वोच्च न्यायालय में अपील कर दी है क्योंकि यदि वे जेल में रहते हुए इंतजार करते रहेंगे तो फिर आम जनता में ये संदेश जायेगा कि उन्होंने हथियार डाल दिये। पहले भी अदालत ने उनकी गिरफ्तारी के लिए पर्याप्त सबूत होने की पुष्टि की जिसके बाद ईडी ने उनको गिरफ्तार किया।  यद्यपि सर्वोच्च न्यायालय उच्च न्यायालय के निष्कर्षों से पूरी तरह सहमत होगा यह मान लेना जल्दबाजी होगी किंतु  मनीष सिसौदिया की जमानत याचिकाएं लगातार निरस्त होने से लगता है कि श्री केजरीवाल आसानी से बाहर नहीं आ सकेंगे। अपनी टिप्पणियों में उच्च न्यायालय ने ऐसे मामलों में आम जनता और मुख्यमंत्री के बीच अंतर करने से मना कर दिया। यही कारण है आज उनकी वह अर्जी अदालत ने नामंजूर कर दी जिसमें उन्होंने अपने वकील से सप्ताह में पांच बार मिलने की सुविधा चाही थी ।  चूंकि सर्वोच्च न्यायालय में अपील दाखिल कर दी गई है इसलिए कानूनी पक्ष पर कुछ कहना उचित नहीं है लेकिन श्री केजरीवाल और उनकी पार्टी ने बीते 12 सालों में जो धाक बनाई थी, उसे जबरदस्त धक्का पहुंचा है। ये कहने में कुछ भी गलत नहीं है कि  अन्ना हजारे के नेतृत्व में हुए आंदोलन के गर्भ से जन्मी आम आदमी पार्टी दिल्ली की तत्कालीन शीला दीक्षित सरकार के भ्रष्टाचार को मुद्दा बनाकर सत्ता में आई थी। दरअसल उसका सैद्धांतिक पलायन तो उसी दिन शुरू हो गया था जब  2014 में सबसे बड़ी पार्टी होने पर भी भाजपा द्वारा सरकार बनाने में असमर्थता व्यक्त किये जाने पर श्री केजरीवाल ने बिना संकोच किये उस कांग्रेस के समर्थन से सरकार बना ली जो उनकी नजर में भ्रष्टाचार की प्रतिमूर्ति थी। हालांकि वह सरकार जल्द गिर गई और नया चुनाव होने पर आम आदमी पार्टी प्रचंड बहुमत से सत्ता में लौटी। स्मरणीय है श्री  केजरीवाल ने 2014 में देश के भ्रष्ट नेताओं की जो  सूची जारी की थी उसमें राहुल गाँधी तो थे , लेकिन नरेंद्र मोदी नहीं, जो आज उनके सबसे बड़े दुश्मन हैं। उस सूची में नितिन गडकरी का भी नाम था जिनसे बाद में उन्होंने घर जाकर लिखित माफी मांगी। ऐसा ही माफीनामा  बाद  में उनको विक्रमजीत सिंह मजीठिया, कपिल सिब्बल और स्व. अरुण जेटली के सामने भी प्रस्तुत करना पड़ा। भले ही मुफ्त बिजली -  पानी के लालच में दिल्ली की जनता ने श्री केजरीवाल को जबरदस्त बहुमत दिया किंतु उनकी कार्य शैली से नाराज होकर आम आदमी पार्टी के संस्थापकों में से कुछ ने जब अपना विरोध जताया तो उन्हें बाहर का रास्ता दिखा  दिया गया। जिन अन्ना हजारे के सहारे श्री केजरीवाल नेता बने उन्हें भी किनारे करने में संकोच नहीं किया। इस तरह आम आदमी पार्टी एक खास व्यक्ति की निजी जागीर होकर रह गई। शराब घोटाले में चोर की दाढ़ी में तिनका की कहावत तो तभी सत्य साबित हो गई थी जब चौतरफा विरोध के बाद वह नीति वापस ले ली गई । सही बात तो ये है कि  श्री केजरीवाल जिस नई और साफ सुथरी राजनीति के ध्वजावाहक बनकर उभरे थे वह तो  तभी हवा- हवाई होकर रह गई जब  वे उन दलों के साथ गठबंधन में शामिल हो गए  जिनके नेता उनकी नजर में भ्रष्ट थे। जिन सोनिया गाँधी को गिरफ़्तार नहीं किये जाने के लिए श्री केजरीवाल, नरेंद्र मोदी को कठघरे में खड़ा करते हुए सब एक हैं जी जैसा तंज कसते थे , उन्हीं की शरण में खड़े होने में उनको शर्म नहीं आई। सबसे जल्दी राष्ट्रीय  पार्टी बनने का कीर्तिमान बनाने वाली आम आदमी पार्टी सबसे जल्दी नैतिक पतन का रिकार्ड भी बना बैठी। शराब घोटाले का अंत क्या होगा ये तो अदालत तय करेगी किंतु  जो तथ्य सामने आ रहे हैं उनको देखकर  कहा जा सकता है कि आम आदमी पार्टी ने जो उम्मीदें जगाई थीं वे दिल्ली में यमुना नदी के प्रदूषित जल में डूबकर रह गईं । और इसके लिए श्री केजरीवाल की महत्वाकांक्षाएं और बड़बोलापन  ही सबसे ज्यादा जिम्मेदार हैं। 

- रवीन्द्र वाजपेयी


Tuesday, 9 April 2024

निवेशकों का उत्साह मोदी सरकार की वापसी का संकेत

लांकि शेयर बाजार के उतार - चढ़ाव को  चुनाव परिणामों का संकेत समझ लेना पूरी तरह सही तो नहीं कहा जा सकता किंतु देश में उदारीकरण आने के बाद  विदेशी निवेशक भी भारतीय बाजारों में पूंजी निवेश करने लगे हैं। इसका कारण भारत का बड़े उपभोक्ता बाजार की स्थिति से निकलकर निर्यातक की भूमिका में आना है। पहले केवल सॉफ्टवेयर निर्यात में भारत का दबदबा था किंतु अब मोबाइल  और दवाओं के अलावा  खाद्यान्न तथा रक्षा सामग्री का बड़े पैमाने पर निर्यात होने से वैश्विक  अर्थव्यवस्था में भारत एक महत्वपूर्ण  हिस्सेदार के तौर पर उभरा है। कोविड काल में जब दुनिया के ज्यादातर  संपन्न और शक्तिशाली देश आर्थिक मोर्चे पर मुसीबतों का सामना कर रहे थे तब भारत में रिकार्ड मात्रा में विदेशी पूंजी का आना इस बात को प्रमाणित करने पर्याप्त है कि वह न सिर्फ राजनीतिक स्थिरता अपितु आर्थिक दृष्टि से भी सुदृढ़ होने की ओर अग्रसर है। कोविड की विदाई होते - होते दुनिया रूस - यूक्रेन युद्ध के कारण नई परेशानी में फंस गई। और फिलहाल इजराइल और फिलिस्तीनियों के बीच गाज़ा पट्टी में जारी युद्ध समस्या बना हुआ है। भारत इन सभी संकटों से खुद को बचाकर जिस तरह आर्थिक तौर पर दुनिया भर के निवेशकों को आकर्षित कर रहा है उससे इतना तो स्पष्ट है उन्हें इस बात का विश्वास हो चला है कि लोकसभा चुनाव में मोदी सरकार की वापसी सुनिश्चित है।  राजनीति की नब्ज पर हाथ रखने वाले भी अब दबी जुबान ही सही किंतु ये कहने लग गए हैं कि भले ही भाजपा को 370 और एनडीए को 400 सीटें मिलने का दावा यथार्थ में न बदले किंतु विपक्ष को सत्ता मिलने की संभावना  लगातार क्षीण होती जा रही है। इसका सबसे बड़ा कारण आपसी समझ का अभाव है। कहने को इंडिया नामक गठबंधन अस्तित्व में जरूर आ गया किंतु  उसमें शामिल पार्टियां अपने निजी हितों को लेकर जिस प्रकार से अड़ियल रवैया दिखाती आईं हैं उसकी वजह से भले ही राज्य विशेष में गठबंधन का कोई घटक भाजपा का मुकाबला कर रहा हो किंतु उसे संयुक्त विपक्ष का स्वरूप नहीं मिल पा रहा। भाजपा के विरुद्ध एक साझा उम्मीदवार खड़ा करने की मुहिम भी उतनी असरकारक नजर नहीं आ रही।  इस वजह से एक विपक्षी दल के वोट दूसरे को स्थानांतरित होना मुश्किल लगता है। और फिर नीतिगत मुद्दों पर भी एक स्वर नहीं सुनाई देने से  दिशाहीनता उजागर होने लगी है। कांग्रेस द्वारा जारी न्यायपत्र की भाजपा द्वारा की गई आलोचना तो समझ में आती है किंतु इंडिया के घटक दल सीपीएम के नेता केरल के मुख्यमंत्री विजयन ने भी उस पर तीखी टिप्पणियां कर डालीं । इसी तरह राहुल गाँधी अपनी सभाओं में जिन वायदों और गारंटियों का जिक्र कर रहे हैं उनको गठबंधन के सदस्यों की ओर से समर्थन नहीं मिलना भी सवाल खड़े कर रहा है। यही वजह है कि प्रसिद्ध  स्तंभकार और चुनाव विश्लेषक भी अब इस बात की संभावना व्यक्त करने लगे हैं कि आएंगे तो मोदी ही। प्रसिद्ध चुनाव विश्लेषक प्रशांत किशोर ने भी कहना शुरू कर दिया है कि भाजपा 300 से अधिक सीटें लेकर सत्ता में लौटेगी। उन्होंने श्री गाँधी पर जिस प्रकार की व्यंग्यात्मक टिप्पणियां कीं उससे ये लगने लगा है कि वे एक बार फिर असफल साबित होने जा रहे हैं। 1977 के बाद जब नई - नवेली जनता पार्टी मैदान में उतरी तब उसका कोई संगठनात्मक ढांचा तक न था। लेकिन राष्ट्रीय स्तर के नेताओं की लंबी कतार जरूर थी। कहने को इंडिया के मंच पर भी विभिन्न पार्टियों के नेता नजर आते हैं किंतु उनमें न भावनात्मक एकजुटता है और न ही सैद्धांतिक। इस वजह से गठबंधन जिस मजबूत स्थिति में दिखना चाहिए था वह न हो सका। कांग्रेस को सबसे बड़े दल के नेता के तौर पर गठबंधन में कसावट लानी चाहिए थी किंतु वह चूक गई। यही वजह है कि श्री गाँधी विपक्ष की ओर से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार घोषित नहीं किये जा सके। कांग्रेस  के बारे में वैसे भी ये बात सामने आ चुकी है कि वह बहुमत तो दूर की बात है अपनी वर्तमान स्थिति में सुधार कर ले तो वह बड़ी उपलब्धि होगी। यह  अवधारणा जितनी व्यापक होगी विपक्ष का उतना नुकसान होगा। कुल मिलाकर श्री गाँधी दो - दो बड़ी यात्राएं करने के बावजूद श्री मोदी की तुलना में बहुत कमजोर साबित हो रहे हैं। कांग्रेस से नेताओं का लगातार पलायन उसी वजह से हो रहा है। चुनाव 7 चरणों में होने से प्रचार अभियान लम्बा चलेगा जो विपक्ष के लिए समस्या बन गया है। भाजपा दक्षिण के जिन राज्यों में कमजोर है, वहाँ भी पूरी ताकत झोंक रही है जबकि भाजपा के प्रभाव वाले राज्यों में  कांग्रेस आधे - अधूरे मन से लड़ती दिख रही है। सोनिया गाँधी की अस्वस्थता भी उसके लिए नुक्सानदायक है। अमेठी और रायबरेली जैसी सीटों पर उम्मीदवार चुनने में उदासीनता अच्छा संकेत नहीं है। 

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 रवीन्द्र वाजपेयी