Monday, 28 August 2017

भगवानों का पर्दाफाश जरूरी

आज बाबा राम रहीम की सजा तय होगी। बीते शुकवार पंचकूला से उठा उपद्रव का ज्वार जिस तरह फैला उससे सतर्क हरियाणा सरकार ने रोहतक जेल में बाबा को रखते हुए ही अदालती कार्रवाई का फैसला ले लिया। हरियाणा-पंजाब में सुरक्षा व्यवस्था भी बेहद कड़ी रखी गई है। बीते दो-तीन दिन में डेरा सच्चा सौदा के दर्जनों केन्द्रों को सील कर दिया गया। सिरसा स्थित मुख्यालय पर भी शासन-प्रशासन ने शिकंजा कस दिया है। जैसा दिख रहा है उसके अनुसार राम-रहीम का साम्राज्य तो तहस-नहस हो ही गया है। उनके साथ जुड़े लोगों में शायद ही कोई ऐसा हो जो टूटे हुए टुकड़े को जोड़ सके। जो बातें निकलकर आ रही हैं उनसे ये कहा जा सकता है कि बाबा पर सरकार और उसका अमला बेहद मेहरबान रहा। राम रहीम की चमक-दमक भरी दुनिया के भीतर कितनी गंदगी थी  या तो पता नहीं किया गया या फिर जानकर भी उसे नजरंदाज किया गया जिसके लिये हरियाणा-पंजाब की राजनीतिक पार्टियां और उनके बड़े नेता पूरी तरह कसूरवार हैं। बहरहाल पहले रामपाल और अब राम रहीम के गिरफ्त में आने के बाद पंजाब-हरियाणा समेत पूरे देश में कार्यरत डेरों और आश्रमों की गहन जांच की जानी चाहिए। इनके संचालकों की गतिविधियों तथा आय के स्रोतों पर भी नजर रखना जरूरी हो गया है। होता यूं है कि धार्मिक मामलों की संवेदनशीलता देखते हुए प्रशासन भी अक्सर लचीला रूख अपनाता है जिससे प्रोत्साहित होकर राम रहीम जैसे लोग ताकतवर होते जाते हैं। भिंडरावाला कांड से सबक न लेने के कारण ही ये स्थिति देखनी पड़ रही है। बेहतर हो सियासत को ताक पर रखकर देशहित में धर्म की आड़ में पनप रहे नकली भगवानों की असलियत उजागर की जावे जिनके कारण धर्म भी बदनाम हो रहा है। राजनीतिक नेताओं को भी वोटों की लालच में ऐसे लोगों से दूर रहना चाहिए जो अपने आपको भगवान से भी बड़ा मानकर इतराते हैं।

- रवींद्र वाजपेयी

रैली विपक्षी एकता की गारंटी नहीं

गत दिवस पटना के ऐतिहासिक गांधी मैदान में 'देश बचाओ-भाजपा भगाओ'रैली के जरिये लालू प्रसाद यादव ने जो शक्ति प्रदर्शन किया उसमें काफी भीड़ थी और उसे फ्लॉप कह देना सच से आँखें फेर लेने समान होगा। ये रैली तो लालू-नीतिश के बीच दरार उत्पन्न होने के पहले से ही प्रस्तावित थी। महागठबंधन से नीतिश कुमार के अलग हो जाने के बाद लगा था कि लालू शायद उसे स्थगित कर देंगे किंतु शरद यादव के साथ आने से उनकी टूटती उम्मीदों को सहारा मिल गया। यद्यपि सोनिया गांधी, राहुल गांधी, मायावती और मुलायम सिंह के नहीं आने से मंच काफी सूना सा लगा फिर भी ये कहना गलत नहीं होगा कि लालू ने अपने पुत्र तेजस्वी को अपना उत्तराधिकारी घोषित करने का उद्देश्य इस रैली से पूरा कर लिया। बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी की शिरकत ने पूरे आयोजन का महत्व जरूर बढ़ाया किन्तु 20 दलों के जिस महागठबंधन की रचना कर भाजपा को 2019 में हराने की महत्वाकांक्षा लालू और उनके साथ जमा हुए नेता संजो रहे हैं उसमें एक नहीं कई पेंच हैं। मंच पर ममता के साथ वामपंथी भी मौजूद थे। बंगाल में इन दोनों का साथ आना करीब-करीब असंभव है। इसी तरह उ.प्र. में मायावती और अखिलेश की सियासी दोस्ती होना बेहद कठिन है। जहां तक कांग्रेस का प्रश्न है तो उ.प्र., बिहार, बंगाल जैसे राज्यों में वह चौथे स्थान पर लुढ़क गई है । वैसे सच्चाई ये है कि लालू ने ये शक्ति प्रदर्शन बिहार में अपनी राजनीतिक जमीन बचाए रखने के लिये किया था। उन्हें ये अंदाज कतई नहीं था कि नीतिश इतनी जल्दी झटका देकर चलते बनेंगे। रही बात शरद यादव की तो वे तो लालू से भी कमजोर स्थिति में हैं। नीतिश ने जिस तरह पहले जद(यू) अध्यक्ष पद से उन्हें हटाया उसके बाद ही वे सशंकित हो गये थे। अब जब उन्होंने पूरी तरह भाजपा का दामन थामकर नरेन्द्र मोदी को अपना नेता मान लिया तब शरद को हॉशिये पर चले जाने का डर सताने लगा। लालू के साथ जुडऩा एक तरह से उनकी मजबूरी बन गई थी क्योंकि शरद जिस तरह की जुगाड़ तकनीक में माहिर हैं उसके लिये वे भाजपा के वर्तमान नेतृत्व के साथ काम नहीं कर सकते थे। लालू के पास भी वर्तमान में दिल्ली की राजनीति करने हेतु कोई दमदार शख्सियत नहीं है सो उन्होंने भी बेहिचक शरद को महत्व देना शुरू कर दिया। कल की रैली के बाद विपक्ष का महागठबंधन बनेगा ये उम्मीद करना जल्दबाजी होगी किन्तु लालू प्रसाद ने तेजस्वी को बतौर विकल्प बिहार में स्थापित करने में कामयाबी जरूर हासिल कर ली। उन्हें एक बात समझ में आ चुकी है कि चारा सहित अन्य घोटालों में उनके जेल जाने की आशंका बढ़ गई है। आय से ज्यादा संपत्ति के मामले में भी उनके पूरे परिवार पर तलवार लटक रही है। ऐसे में यदि वे शान्त रहेंगे तब उनके लिये बचाव करना कठिन होगा। रैली के पहले पटना में लगे सैकड़ों होर्डिंग पर तेजस्वी को बाहुबली और उनकी बहिन मीसा को झाँसी की रानी के तौर पर पेश किया गया। रैली को सर्वदलीय रूप देने के बाद भी पूरी प्रचार सामग्री पर लालू एवं उनके कुनबे की तस्वीर ही थीं। अन्य पार्टियों और नेताओं को इस पर एतराज भी नहीं हुआ क्योंकि रैली को सफल बनाने हेतु तन, मन, धन सबमें लालू एवं उनके परिवार ने ही योगदान दिया। शरद यादव ने जद (यू) की चेतावनी को नजरंदाज कर रैली में शरीक होकर नीतिश से विरोध को बगावत में बदल दिया। अब जद (यू) उनकी राज्यसभा सदस्यता खत्म करने की रणनीति बना रहा है। राज्यसभा के सभापति पद पर वेंकैया नायडू के आ जाने से नीतिश कुमार शरद को संसद से बाहर करने में सफल भी हो सकते हैं। सांसदी चले जाने के बाद वे लालू के लिये उपयोगी बनेंगे या बोझ ये काफी बड़ा सवाल है क्योंकि जैसी कि खबरें उड़ रही थीं उनके अनुसार जद(यू) के  20 विधायक टूटकर शरद के साथ आना थे किन्तु रैली में ऐसा नहीं दिखाई दिया। जद (यू) पर कब्जा करने की कोशिश भी शरद की शायद ही कामयाब हो। 2019 के लोकसभा चुनाव के पूर्व जिन राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं उनमें लालू, शरद, ममता, अखिलेश  और वामपंथी सभी महत्वहीन हैं। यहां तक कि दलितों की नेता मायावती भी कुछ खास नहीं कर सकेंगी। उस लिहाज से 'देश बचाओ-भाजपा भगाओÓ परिवार की राजनीति को बिहार में जिंदा रखने के लिये लालू हाथ-पाँव मारते रहेंगे किन्तु उनकी सफलता भी इस बात पर निर्भर करेगी कि चारा घोटाला एवं अन्य आरोपों में चल रही जांच और उसके बाद होने वाली कार्रवाई किस अंजाम तक पहुंचती हैं। ये कहने में कुछ भी बेजा नहीं होगा कि लालू को यदि दोबारा जेल जाना पड़ गया तब उनके परिवार की सियासत का हश्र भी बाबा राम-रहीम के डेरे की तरह होने में देर नहीं लगेगी। मुलायम सिंह ने 2012 में जो गलती अखिलेश को अपना उत्तराधिकारी बनाकर की थी वही लालू कर बैठे हैं। तेजस्वी फिलहाल तो काफी तेजी में हैं किन्तु उनका समूचा परिवार जिस तरह थोक के भाव सामने आया है उसके चलते उ.प्र. जैसे यादवी संघर्ष की पुनरावृत्ति की संभावना से इंकार नहंी किया जा सकता और फिर मुलायम सिंह का विपक्षी महागठबंधन से इंकार कर देना भी मायने रखता है। इसमें कोई शक नहीं कि कल की रैली शक्ति प्रदर्शन की दृष्टि से प्रभावशाली थी किन्तु इसके प्रभावस्वरूप लालू राष्ट्रीय स्तर पर विपक्ष को लामबंद करने में कामयाब हो जायेंगे ये उम्मीद फिलहाल तो हवा-हवाई ही है। लालू फिलहाल आक्रमण ही सर्वोत्तम सुरक्षा की नीति पर चल रहे हैं।

- रवींद्र वाजपेयी

Saturday, 26 August 2017

लेकिन निजता का स्वरूप तो समाज को ही तय करना है

निजता (प्रायवेसी) संबंधी सर्वोच्च न्यायालय की 9 सदस्यीय संविधान पीठ द्वारा गत दिवस दिये गये फैसले को कुछ लोग इस तरह पेश कर रहे हों मानो इसकी वजह से कैद में बंद लोगों की रिहाई का रास्ता खुल गया हो। जिस सर्वोच्च न्यायालय ने अतीत में दो बार स्वयं होकर इसे नहीं माना था उसी ने इस बार ये कह दिया कि निजता भी अन्य मौलिक अधिकारों जैसी ही है। ये मामला आधार कार्ड में मांगी जाने वाली जानकारी को लेकर उठा था। यद्यपि अभी आधार कार्ड का भविष्य पांच सदस्यों वाली दूसरी पीठ के समक्ष विचाराधीन है किन्तु निजता को मौलिक अधिकार के तौर पर मान्यता मिलने के बाद अब आधार कार्ड के भविष्य पर भी अनिश्चितता के बादल फिलहाल मंडराने लगे हैं। यद्यपि सर्वोच्च न्यायालय ने अपने फैसले में साफ तौर पर ये भी कह दिया कि निजता के मामले में भी तर्कपूर्ण प्रतिबंध लागू होते रहेंगे क्योंकि कोई भी मौलिक अधिकार असीमित नहीं हैं। इस स्पष्टीकरण के बाद उन लोगों की खुशी पर भी प्रश्नचिन्ह लगे गये हैं जो ये मानकर चलने लगे थे कि किसी प्रकार की निजी जानकारी सरकार द्वारा मांगी जाने पर वे अब उसे देने से इंकार कर सकते हैं। इस फैसले का तात्कालिक तथा दूरगामी असर क्या होगा ये तो उसके व्यवहार में आने के उपरांत ही स्पष्ट हो सकेगा किन्तु तमाम विरोधाभासों के बाद भी आधार कार्ड में प्रदत्त जानकारी ने कई विकृतियों पर विराम लगाया है। मसलन एक ही व्यक्ति के पास अनेक रसोई गैस कनेक्शन, राशन तथा पेन कार्ड जैसी अनियमितताएं रुक गईं जिससे सरकार द्वारा दी जा रही सब्सिडी की लूटपाट रुकी। आधार कार्ड की अनिवार्यता के कारण व्यक्ति अपनी पहचान छिपाने में सफल नहीं हो सकता जिससे कि अपराधों की रोकथाम में मदद मिल रही है। राशन कार्ड हेतु आधार की अनिवार्यता होते ही बड़ी संख्या में बोगस कार्ड बेकार हो गये। कुल मिलाकर आधार कार्ड में प्रदत्त जानकारियों से सरकार के पास देश के नागरिकों संबंधी जानकारी का पूरा रिकार्ड उपलब्ध होने लगा परन्तु इसी के साथ विवाद उठा निजी जानकारी (डाटा) बेचे जाने का। बैंक सहित अन्य संस्थानों में दी जाने वाली निजी जानकारी आवांछित लोगों तक जिस तरह पहुंच जाती है उस पर जो एतराज किया गया वह जायज है। किसी सरकारी या अर्ध सरकारी विभाग के साथ बांटी गई निजी बातें सार्वजनिक हो जाएं तथा ऐसे लोगों तक पहुंच जाएं जिनसे व्यक्ति का सीधा वास्ता न पड़ा हो तो वह आपत्तिजनक तो है ही, अपराध भी है। कई सरकारी कामकाज जिनमें पासपोर्ट भी शामिल हैं, निजी कंपनियां कर रही है जिसमें अधिकतम निजी जानकारी आवेदन के साथ देनी होती है। सूचना क्रांति के दौर में व्यक्तिगत जानकारी के आंकड़े भी बाजार के हत्थे चढ़ चुके हैं जिनकी वजह से  की निजता घटने के अलावा अनावश्यक असुविधाएं बढ़ चली हैं। उस दृष्टि से सर्वोच्च न्यायालय द्वारा गत दिवस दिये गये फैसले को महज सैद्धांतिक व्याख्या के तौर पर देखा जाना सही रहेगा। संविधान पीठ ने ही जब कह दिया कि अन्य मौलिक अधिकारों की तरह निजता भी असीमित नहीं हो सकती तथा सरकार के पास उसमें तर्कपूर्ण हस्तक्षेप का अधिकार है तब ये मानकर खुश होना बचपना है कि निजी जानकारी देने के मामले में व्यक्ति पूरी तरह से अपनी मर्जी का मालिक बन जाएगा। देखनेे वाली बात ये जरूर होगी कि आधार कार्ड की वैधानिकता तथा अनिवार्यता पर सर्वोच्च न्यायालय की अन्य पीठ क्या व्यवस्था देगी? इस बारे में आश्चर्य की बात ये है कि जो भाजपा विपक्ष में रहते हुए आधार कार्ड को अनावश्यक एवं अवांछित मानकर उसका विरोध करती थी वही सरकार में आने के उपरांत आधार कार्ड को लाख दुखों की एक दवा के रूप में प्रचारित करने में जुटी है। इसी तरह जिस कांग्रेस ने इसे लागू करवाने के लिये सत्ता में रहते काफी पापड़ बेले वह कभी निजता तो कभी किसी और कारण से उसकी अनिवार्यता पर सवाल उठाने में आगे-आगे है। वैसे आधार कार्ड को लेकर की जा रही उम्मीदें न तो पूरी तरह सही हैं और न ही गलत। उसमें चाही गई निजी जानकारी कानूनी तौर पर सही है या नहीं ये भी निश्चित तौर पर कह पाना कठिन है क्योंकि भारत में आर्थिक, शैक्षणिक और सामाजिक विषमता इतनी ज्यादा है कि कोई भी व्यवस्था सभी लोगों पर एक समान लागू कर पाना बेहद कठिन हो जाता है। निजता संबंधी सर्वोच्च न्यायालय का नया फैसला महज कानूनी बहस तक सीमित बना रहेगा या इसका साधारण जन-जीवन पर भी असर पड़ेगा, ये फिलहाल कहना कठिन है क्योंकि संदर्भित निर्णय का गहन अध्ययन करने पर कई ऐसी बातें उजागर होंगी जिन पर अभी तक न ध्यान गया और न ही नजर पड़ी। सर्वोच्च न्यायालय ने निजता को मौलिक अधिकार की श्रेणी में रखकर कोई अनोखा काम नहीं किया सिवाय इसके कि वह पहले दो बार ऐसा करने से इंकार कर चुका है किन्तु तेजी से बदलते सामाजिक वातावरण में निजता की परिभाषा और सीमाएं क्या होंगी ये तय करना न्यायालय के लिये संभव नहीं होगा। ये निर्णय करना तो समाज का ही अधिकार है और कर्तव्य भी।

-रवींद्र वाजपेयी

पंचकूला:खट्टर सरकार की दूसरी नाकामी

डेरा सच्चा सौदा के प्रमुख गुरमीत सिंह उर्फ राम-रहीम को 15 वर्ष पूर्व अपने डेरे से जुड़ी साध्वियों के यौन शोषण का दोषी माने जाने का निर्णय आने के बाद हरियाणा के पंचकूला में जो उपद्रव शुरू हुआ उसकी आग देखते-देखते पूरे राज्य में तो फैली ही पड़ोसी पंजाब, उ.प्र., राजस्थान और दिल्ली में भी इसका प्रभाव देखा गया। टीवी चैनलों में समूचे घटनाक्रम का सीधा प्रसारण देखने के बाद साधारण बुद्धि वाला व्यक्ति भी कह देगा कि ये हरियाणा सरकार की प्रशासनिक नाकामी का दुष्परिणाम था। रामरहीम के बारे में अदालती फैसला आने के एक दिन पहले ही पंचकूला में एक लाख से ज्यादा उनके समर्थक सड़कों पर डेरा जमाकर बैठ गये थे। हजारों लोगों के हाथ में लाठियां थीं। कई ने तो टीवी कैमरों पर खुलकर कहा कि फैसला बाबा के खिलाफ जाने पर वे ईंट से ईंट बजा देंगे। उधर उच्च न्यायालय ने राज्य के डीजीपी को इस बात पर लताड़ लगाई कि जब धारा 144 लगा दी गई तब पंचकूला में इतनी बड़ी संख्या में बाबा समर्थकों को जमा ही क्यों होने दिया गया? शायद मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर को लग रहा होगा कि 15 साल पुराने इस प्रकरण में बाबा बरी हो जाएगा और उसके बाद वहां एकत्रित जनसमूह जय-जयकार करते हुए लौट जाएगा परन्तु हुआ ठीक विपरीत। फैसला बाबा के विरुद्ध आते ही समर्थकों ने वही सब किया किया जिसकी आशंका सबको थी, सिवाय मुख्यमंत्री के। जो हुआ और जैसे हुआ वह दोहराने की जरूरत नहीं है क्योंकि पूरे देश और दुनिया ने सारा मामला टीवी पर देखा। जाट आन्दोलन में अपनी प्रशासनिक अक्षमता से हरियाणा को जलवा चुके मुख्यमंत्री खट्टर को उच्च न्यायालय के अलावा आईबी और केंद्र सरकार दोनों संभावित उपद्रवियों के प्रति आगाह करते रहे किन्तु वे न जाने किस आशावाद में बैठे थे। पुलिस तथा अर्धसैनिक बल तैनात भी किये तो वे इतने कम थे कि उपद्रवी उन्हें उल्टे पांव दौडऩे मजबूर कर देते थे। कई घंटों तक ऐसा लगता रहा मानो पंचकूला में सरकार नाम की कोई चीज ही नहीं है। सबसे बड़ी बात ये रही कि खट्टर सरकार के एक भी मंत्री या भाजपा के विधायक ने पंचकूला में जमा हो चुके बाबा समर्थकों से संवाद कर उन्हें लौट जाने अथवा शांत रहने के लिये समझााईश नहीं दी और यदि दी भी हो तो उसका कोई प्रभाव नहीं पड़ा वरना हालात इस तरह बेकाबू नहीं होते। समूचे घटनाक्रम में टीवी चैनलों की भूमिका भी विवादों में घिर गई। परसों जामावड़े का सीधा प्रसारण करते हुए लोगों के साक्षत्कार दिखाना बुद्धिमत्ता नहीं थी। उसी तरह रामरहीम के सिरसा से पंचकूला तक के सफर को टीवी चैनलों ने जिस तरह कवरेज दिया वह भी चौंकाने वाला रहा क्योंकि उससे बाबा का महिमा मंडन ही हुआ तथा उनके समर्थकों का हौसला बुलंद होता गया। इसी तरह उपद्रव के बाद सारे चैनल अपने को सबसे तेज साबित करने के फेर में पूरे फसाद का सीधा प्रसारण करने में जुट गए जिसकी वजह से हरियाणा और पंजाब के बाकी शहरों तक में हिंसा भड़क उठी। बलवे के बाद नाराज उच्च न्यायालय ने अभूतपूर्व कदम उठाते हुए डेेरा सच्चा सौदा की पूरी संपत्ति जब्त कर उसकी बिक्री से कल हुए नुकसान की भरपाई करने का जो आदेश दिया वह एकदम सही एवं समयानुकूल था। यदि ये काम खट्टर सरकार ने किया होता तब वह अपने दामन पर लगे दागों को कुछ हल्का कर सकती थी किन्तु जैसा आरोप लग रहा है चुनावी समर्थन के बदले राम रहीम के प्रति नरम रवैया दिखाने के फेर में खट्टर सरकार और उनके साथ भाजपा ने जाट आन्दोलन के बाद एक बार फिर हरियाणा को ज्वालामुखी में धकेल दिया। मनोहर लाल खट्टर राजनीति के खिलाड़ी नहीं रहे। वे पृष्ठभूमि में रहकर संगठन का काम करते थे। हरियाणा में बहुमत आते ही जाट बहुल राज्य में उन्हें जब गद्दी पर बैठाया गया तभी ये आशंका व्यक्त की गई थी कि वे सफल नहीं हो पायेंगे। ये कहना भी गलत नहीं है कि खुद भाजपा के भीतर भी श्री खट्टर को सर्वमान्य नेता नहीं माना जाता। एक दो वरिष्ठ मंत्री तो सार्वजनिक रूप से उनके प्रति अपनी खुन्नस निकाल चुके हैं। ऐसे में मात्र रास्वसंघ से सीधा जुड़ाव और ईमानदारी के कारण उन्हें सिर पर लादे रहना कितना महंगा पड़ गया ये बताने की जरूरत नहीं रही। रामरहीम के पास चुनावी समर्थन मांगने कांग्रेस  भी जाती रही है। यही वजह है कि कल भी पार्टी की तरफ से बाबा के विरोध में कुछ नहीं कहा गया। पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टेन अमरिंदर सिंह ने तो एक टीवी चैनल की एंकर पर मामले को अनावश्यक महत्व दिये जाने पर खरी-खरी सुनाते हुए फोन तक बंद कर दिया लेकिन जितना भी गड़बड हुआ वह सीधे-सीधे भाजपा के खाते में चला गया। खास तौर से मनोहर लाल खट्टर की हिचकोले खाती हुई चल रही गाड़ी पूरी तरह खटारा साबित हो गई। बची-खुची कसर साक्षी महाराज सरीखे बड़बोले सांसद ने पूरी कर दी जो अदालती फैसले के विरुद्ध दुष्कर्मी रामरहीम से सहानुभूति व्यक्त कर बैठे। रामरहीम की गतिविधियों को लेकर कोई पहली मर्बबा बवाल नहीं मचा। साध्वियों के यौन शोषण के अलावा हत्या के दो मामलों में भी वे आरोपी हैं। जिनमें एक पत्रकार की थी। उनकी शाही जीवन शैली, बेशुमार धन-संपत्ति तथा खुद को अलौकिक शख्सियत के तौर पर पेश करने जैसी हरकतों को भाजपा की राज्य सरकार ने अब तक नजरंदाज क्यों किया ये प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठ खड़ा हुआ है। हाल ही में राज्य के एक वरिष्ठ मंत्री ने बाबा को किसी आयोजन हेतु मोटी राशि बतौर सहायता दी थी। खैर, भाजपा ये सफाई दे सकती है कि अदालत द्वारा दोषी ठहराए जाने के पहले किसी को अपराधी नहीं माना जा सकता परन्तु इस तोहमत से तो वह स्वयं को नहीं बचा सकती कि चुनाव जीतने के लिये वह अच्छे-बुरे का भेद नहीं करती। कहते हैं हरियाणा-पंजाब के कई जिलों में समाज के निचले वर्ग में डेरा सच्चा सौदा का काफी प्रभाव होने से राजनीतिक पार्टियां चुनाव जीतने के लिये बाबा के दरवाजे पर खड़ी रहती थीं। वे भी अपनी सुविधानुसार कभी इसको तो कभी उसको उपकृत करते रहते थे। कहा जा रहा है पिछले कुछ समय से वे भाजपा पर मेहरबान थे इसलिये कल जो कुछ भी हुआ उसका भांडा भाजपा पर ही फूटा जो स्वाभाविक था। सोमवार को बाबा की सजा तय होगी। उस दिन उसे अदालत लाने की बजाय वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिये अदालती कार्रवाई होगी। ऐसी ही बुद्धिमत्ता गत दिवस हरियाणा सरकार और प्रशासन दिखा देता तब पंचकूला में लाखों लोग एकत्र नहीं हुए होते। खट्टर मुख्यमंत्री रहेंगे या नहीं ये तो भाजपा हायकमान को तय करना है परन्तु वोटों के ठेकेदार बने बैठे स्वयंभू भगवान, माफिया सरगना तथा जाति के मुखिया को सिर पर बिठाने की संस्कृति को त्यागने के बारे में सभी पार्टियों को सामने आना चाहिए क्योंकि धर्म, समुदाय, गिरोह और जाति के वोटों पर कुंडली मारकर बैठे रामरहीम नुमा लोग एक दिन में ताकतवर नहीं होते। देश भर में सैकड़ों ऐसे फर्जी लोग हैं जो जनता, प्रशासन और शासन सभी को ठेंगे पर रखते हैं। पंचकूला की घटना के बाद भी यदि हमारे राजनेताओं को अक्ल नहीं आती तब ये मान लेना चाहिए कि वे वोटों की वासना में बुद्धि-विवेक दोनों गवां चुके हैं। रही बात भाजपा की तो उसे ये बात अच्छी तरह समझ लेनी चाहिए कि सरकार बनाना ही काफी नहीं होता उसे चलाने के गुर भी आने चाहिए और ये भी कि किसी ना योग्य और ईमानदार सिपाही को सीधे उठाकर सेनापति बना देने से कितना नुकसान होता है ये हरियाणा में दो बार साबित हो चुका है।

-रवींद्र वाजपेयी

Thursday, 24 August 2017

वोट रूपी फसल जाति नामक जमीन पर लहलहाती है

आरक्षण के पीछे जो मूल भावना थी आजादी के बाद वह कभी की लुप्त हो चुकी। धीरे-धीरे ये वोट बैंक की राजनीति में उलझकर रह गया। अनु. जाति/जनजाति से शुरू होते-होते बात ओबीसी (अन्य पिछड़ा वर्ग) तक जा पहुंची किन्तु अब उसमें भी और पिछड़ों की तलाश कर कोटे के भीतर कोटे की बात चल पड़ी है जिस हेतु आयोग बैठेगा जो 12 सप्ताह में रिपोर्ट सौंपेगा। उसके लिये सर्वोच्च न्यायालय के एक पुराने फैसले को आधार माना गया है। पिछड़ों में भी और पिछड़ों की खोज के पीछे मकसद वही सामाजिक विषमता है जिसे दूर करने के लिये राष्ट्र निर्माताओं ने आरक्षण नामक राम बाण औषधि ढूंढकर निकाली थी किन्तु एक तरफ तो ओबीसी के बीच भी नये वंचित वर्ग की तलाश हेतु हाथ-पांव मारे जा रहे हैं वहीं दूसरी तरफ क्रीमी लेयर की सीमा 6 से 8 लाख कर दी गई जो अपने आप में विरोधाभास है। केन्द्र सरकार द्वारा गत दिवस लिये गये फैसले उन पिछड़ी जातियों के लिये तो खुशखबरी हंै जिन्हें मंडल आयोग की सिफारिशें लागू होने का समुचित लाभ अब तक नहीं मिल सका किन्तु मुलायम, लालू और शरद यादव सहित उन नेताओं के लिये ये एक खतरे की घंटी भी है जिन्होंने मंडल की समूची खैरात अपने कुनबे में समेट ली थी। मोदी सरकार को अगला लोकसभा चुनाव लडऩे के लिये तकरीबन पौने दो साल का समय बचा है। 2014 में मिली ऐतिहासिक विजय में गैर यादव पिछड़ी जातियों का जबर्दस्त योगदान भाजपा भूली नहीं है। उ.प्र. के पिछले चुनाव में उसने न सिर्फ गैर यादव पिछड़ी जातियों किन्तु दलितों के बीच भी अपनी पैठ बनाई। उसे और मजबूत करने के लिए पार्टी के नेतृत्व ने जो रणनीति बनाई है उसके तहत ओबीसी श्रेणी में शामिल जातियों में भी ऊंच-नीच का भेद कर यादव एवं उस जैसी अन्य पिछड़ी जातियों के वर्चस्व को तोडऩा ही लक्ष्य है। बिहार में नीतिश कुमार के साथ जुड़ जाने से अन्य पिछड़ी जातियों के बीच भाजपा के घुसने की गुंजाईश बढ़ गई है। यही वजह है कि ओबीसी कोटे के भीतर कोटे की व्यवस्था पर 12 हफ्ते के भीतर फैसला करवाने की जल्दबाजी की जा रही है। हरियाणा, गुजरात, राजस्थान, महाराष्ट्र तथा आंन्ध्र सहित कुछ अन्य राज्यों में कुछ प्रभावशाली जातियां ओबीसी आरक्षण हेतु जिस तरह से दबाव बनाए हुए हैं उसको देखते हुए प्रधानमंत्री और भाजपा दोनों अब कांटे से कांटा निकालने की नीति पर बढ़ चले हैं। इस काम में रास्वसंघ भी परदे के पीछे से पूरी मदद कर रहा है जिसने सामाजिक समरसता के अभियान के अन्तर्गत दलित वर्ग में योजनाबद्ध घुसपैठ करते हुए बसपा के एकाधिकार को काफी हद तक कम कर दिया है। अब तक जिस भाजपा को ब्राम्हण, बनिया और राजपूतों की पार्टी  माना जाता रहा उसने भी ये समझ लिया कि बिना ओबीसी और दलितों को साथ लिये सत्ता में स्थायी रूप से बने रहना मुमकिन नहीं होगा। संयोगवश प्रधानमंत्री स्वयं पिछड़ी जाति के हैं और वे आरक्षण के लिए जान  देने की हद तक जाने की बात भी कह चुके हैं। केंद्र सरकार द्वारा ओबीसी की क्रीमीलेयर बढ़ाकर 8 लाख कर देने तथा कोटे के भीतर कोटे की मुहिम को तेज करने का फैसला बहुत सोच-समझकर लिया गया है। इसमें एक तरफ तो पिछड़ी जातियों में भी पिछड़ी मानी जाने वाली जातियों को आरक्षण का समुचित लाभ दिलाने की मंशा है वहीं दूसरी तरफ मुलायम-लालू और अब उनके वारिस बने अखिलेश और तेजस्वी को पिछड़ी जातियों का एक छत्र नेता बनाने से रोकने का दांव है। ओबीसी जातियों की एकता भी कोटे के भीतर कोटे की व्यवस्था से कमजोर होंगी लेकिन इन सबसे हटकर यक्ष प्रश्न ये है कि आजादी के 70 बरस बाद भी भारत में जाति मिटाना तो दूर रहा उपजातियों के रूप में नये-नये दबाव समूह उत्पन्न किये जा रहे हैं। अनु. जाति/जनजाति को तो संविधान बनते ही आरक्षण मिल गया था वहीं ओबीसी को इसकी सुविधा मिले हुए भी एक चौथाई सदी बीत गई। इस दौरान इन जातियों का सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक उत्थान तनिक भी नहीं हुआ, ये कहना तो सच्चाई से आंखें चुराना है परन्तु इसके नेताओं ने तो अपनी कई पीढिय़ों का इंतजाम कर लिया, ये कहना रत्ती भर भी गलत नहीं है। शायद यही वजह है कि जाति के भीतर से उपजाति के तौर व कोटे के भीतर कोटे की खोज की जा रही है। आरक्षण नामक व्यवस्था का भी चतुर चालाक लोगों ने कैसा लाभ उठाया उसका उदाहरण छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी की जाति संबंधी विवाद है। केंद्र सरकार ने गत दिवस क्रीमीलेयर तथा कोटे में कोटे संबंधी जो निर्णय लिये उनका उद्देश्य पिछड़ी जातियों का कल्याण कम और चुनावी फायदा उठाना ज्यादा है। मोदी सरकार की नीतियों से देश भर का व्यापारी वर्ग काफी नाराज है जिसे भाजपा का परंपरागत मतदाता माना जाता रहा है परन्तु उ.प्र. विधानसभा चुनाव में नोटबंदी के विरूद्ध किया गया प्रचार जिस तरह से फुस्स हुआ उसके बाद भाजपा को भी ये समझ में आ गया है कि वोट रूपी फसल जाति नामक जमीन पर ही लहलहाती है। प्रधानमंत्री अपनी सरकार के इस कदम को सबका साथ-सबका विकास नारे से जोड़कर सही ठहरा सकते हैं किन्तु इससे इतना साफ हो गया कि आरक्षण नामक व्यवस्था को खत्म करना तो दूर कम करने तक का साहस कोई राजनीतिक नेता या पार्टी नहीं उठा सकती। अन्य पार्टियां प्रधानमंत्री और भाजपा पर जाति की राजनीति करने का आरोप चाहकर भी नहीं लगा पायेंगी क्योंकि वे सब भी इसी के सहारे जिंदा हैं। तीन तलाक के मुद्दे पर मुस्लिम महिलाओं की सहानुभूति और समर्थन हासिल करने के बाद पिछड़ी जातियों में अपनी पकड़ और मजबूत करने के लिये भाजपा ने जो चक्रव्यूह बनाया है उसे तोडऩे वाला कोई योद्धा विपक्ष में फिलहाल तो नजर नहीं आ रहा। लालू यादव की 27 अगस्त की रैली से मायावती और मुलायम सिंह के किनारा करने की खबरों ने विपक्षी एकता के गुब्बारे को फूलने से पहले ही पिचका दिया है वहीं कांग्रेस का भविष्य कहे जाने वाले राहुल गांधी भी उम्मीदों पर खरे नहीं उतर रहे। भाजपा का शीर्ष नेतृत्व स्थिति को समझते हुए जिस चतुराई से पाँसे फेंक रहा है उसका विपक्ष के पास कोई जवाब नहीं है और इसके लिये वह स्वयं उत्तरदायी है क्योंकि भाजपा अब जिन राजनीतिक हथियारों का खुलकर उपयोग कर रही है वे विपक्षी दलों के शस्त्रागार से ही उसे प्राप्त हुए हैं।

-वींद्र वाजपेयी