Monday, 25 September 2017

बीएचयू: मामला छेड़छाड़ तक सीमित नहीं रहा

बीएचयू (बनारस हिन्दू यूनीवर्सिटी) किसी परिचय की मोहताज नहीं है। भारतरत्न महामना पं. मदनमोहन मालवीय द्वारा स्थापित ये संस्थान भारत में ऑक्सफोर्ड और केम्ब्रिज विवि को टक्कर देने के उद्देश्य से खोला गया था। इसके स्तर का पता केवल इतने से ही चल जाता है कि पूर्व राष्ट्रपति सर्वपल्ली राधाकृष्णन तथा रास्वसंघ के द्वितीय सर संघचालक एम.एस. गोलवलकर यहां अध्यापन कर चुके थे। लेकिन विगत दो-तीन दिनों से बीएचयू किसी दूसरे कारण से चर्चा में है। गत सप्ताह एक छात्रा के साथ रात्रि के समय हुई छेड़छाड़ के विरोध में छात्राएं भड़क उठीं तथा उन्होंने सुरक्षा की मांग लेकर आंदोलन शुरू कर दिया। कुलपति को बुलाने की उनकी जिद पूरी नहीं हुई तो वे जुलूस लेकर उनके आवास की तरफ बढ़ीं किन्तु वहाँ मौजूद सुरक्षा कर्मियों ने लाठीचार्ज कर दिया। उसके बाद जैसा होता है वह सब हो गया। आगजनी, पेट्रोल बम जैसे प्रचलित तरीकों से माहौल गरमा गया। मामला छात्रों की पिटाई का होता तब शायद उस पर ज्यादा ध्यान न जाता परन्तु रात के समय छात्राओं पर डंडे बरसाए जाने का कोई भी समझदार व्यक्ति समर्थन नहीं करेगा। उस लिहाज से छात्राओं पर किया गया बल प्रयोग अनुचित एवं अनावश्यक ही कहा जाना चाहिए। छेड़छाड़ की घटना पर आक्रोशित छात्राएं जब कुलपति को बुलाने पर अड़ी थीं तब उन्हें वहां आकर छात्राओं के गुस्से को ठंडा करना चाहिये था। विवि के अन्य जिम्मेदार अधिकारी एवं अध्यापकों का उपयोग भी ऐसे अवसरों पर किया जाना उपयोगी होता है। कुलपति क्यों नहीं आए ये तो वही बता सकेंगे। हो सकता है पुलिस और विवि के सुरक्षा स्टॉफ ने सुरक्षा की दृष्टि से उन्हें रोक दिया हो किन्तु छात्राओं पर बल प्रयोग ने मामले को दूसरी तरफ घुमा दिया। यदि इसे लेकर राजनीति हो रही है तो उसे गलत नहीं कहा जा सकता क्योंकि विपक्ष में रहने पर भाजपा भी यही करती। उ.प्र. के मुख्यमंत्री ने तत्काल जाँच करवाने के आदेश दे दिये। तनाव को देखते हुए दशहरा अवकाश पहले ही घोषित कर छात्रावास खाली करवा लिये गये। मामला शुरू हुआ प्रधानमंत्री की वाराणसी यात्रा से। नरेन्द्र मोदी का काफिला जिस मार्ग से गुजरना था उसी पर छात्राएं उन्हें रोककर अपनी सुरक्षा संंबंधी मांग रखना चाह रही थीं परन्तु प्रशासन ने प्रधानमंत्री को दूसरे रास्ते से तो जाने की व्यवस्था कर दी। उसके बाद घटित घटनाक्रम ने न केवल राज्य अपितु केन्द्र सरकार को भी रक्षात्मक  कर दिया। उधर कुलपति ने चुप्पी तोड़ते हुए बाहरी तत्वों की भूमिका की बात कह डाली। छात्राओं के आंदोलन में वाहनों को जलाने तथा पेट्रोल बम आदि के इस्तेमाल  को लेकर भी सवाल उठने लगे। समूचे मामले का निष्पक्ष विश्लेषण करें तो साफ हो जाता है कि प्रथम दृष्ट्या तो कुलपति एवं विवि प्रशासन स्थिति का जायजा लेने तथा तदनुसार तात्कालिक निर्णय लेने में चूक गया। दूसरी गलती छात्राओं पर किया गया लाठीचार्ज था। इसके औचित्य को साबित करने के लिये दिया गया कोई भी तर्क जनमानस को स्वीकार नहीं होगा क्योंकि ऐसे किसी भी मामले में सहानुभूति सदैव महिलाओं के पक्ष में रहती है। तीसरी और सबसे बड़ी गलती बनारस के स्थानीय प्रशासन की भी रही जो ये पता कर पाने में विफल रहा कि छात्राओं के एक छोटे से आंदोलन को उग्र रूप देने के लिये कुछ तत्व सक्रिय थे। ये बाहरी थे या विवि के भीतर के ये तो जांच से ही पता चलेगा किन्तु ये कहना कतई गलत नहीं होगा कि छात्राएं चाहे कितनी भी दबंग और आधुनिक क्यों न हो जाएं पर वे आगजनी तथा बम जैसे तरीके का उपयोग नहीं कर सकती। जाहिर है छात्र आंदोलनों के दौरान हमारे देश में जो होता रहा है वही बीएचयू में भी हुआ लेकिन प्रधानमंत्री के वाराणसी दौरे के समय अचानक आंदोलन का भड़क जाना कई संदेह भी उत्पन्न कर रहा है। जेएनयू तथा हैदराबाद विवि की जो घटनाएं देश भर में चर्चित हुई उनमें जिन वामपंथी ताकतों का हाथ था उन्हीं की भूमिका भी बीएचयू में होने का अंदेशा व्यक्त किया जाने लगा है। जिस फुर्ती से एक वर्ग विशेष ने घटना को तूल दिया वह भी कम रहस्यमय नहीं है। ये भी कहा जा सकता है कि विवि प्रशासन खास तौर पर कुलपति द्वारा आंदोलनकारी छात्राओं के गुस्से को हल्के में लेने की वजह से बिगड़ी स्थिति का लाभ उठाते हुए उपद्रवी तत्वों ने आग में मिट्टी का तेल डालने जैसी हरकत कर डाली हो। वैसे छात्राओं के धरना-प्रदर्शन और नारेबाजी के जो फुटेज टीवी चैनलों पर दिखाई दिये उनसे ये तो लगता है कि अगुआई कर रही कुछ छात्राएं उस विचारधारा में प्रशिक्षित दिखीं जिसने जेएनयू में अपना आधिपत्य जमा रखा है। बीएचयू में छात्र राजनीति पहले सरीखी नहीं रही। अचानक भड़की इस आग को पूर्व नियोजित भले न कहा जाए किन्तु एक शान्तिपूर्ण आंदोलन को उग्ररूप देने के पीछे शातिर दिमाग हो सकते हैं। वरना रात में छात्राएं इतनी उत्तेजित शायद नहीं हुई होतीं। अब जो होना था सो हो चुका। विवि कई दिनों तक बंद रहेगा। शासन जाँच करवाएगा। दो-चार निलंबित हो जायेंगे। कुछ छात्र-छात्राएं भी दंडित किये जा सकते हैं किन्तु जिस मुद्दे पर विवाद शुरू हुआ उस पर ध्यान देना जरूरी है। रात के वक्त छात्राएं बाहर क्यों घूम रही थीं ये प्रश्न अस्वाभाविक नहीं है। रात में छात्राओं के बाहर जाने पर समय की पाबंदी भी विवाद के पीछे का एक कारण मानी जा रही है। बावजूद इसके अपने पवित्र वातावरण के लिये प्रतिष्ठित बीएचयू परिसर में रात के समय ही क्यों न सही किसी छात्रा के साथ अश्लील हरकत होना हर दृष्टि से निंदनीय और चिंतनीय है। उ.प्र. सरकार को चाहिए वह घटना की सूक्ष्म जाँच करवाए क्योंकि अब ये महज एक छेडख़ानी तक सीमित नहीं रही। अहिष्णुता का ढोल पीटने वाली विचारधारा जिस तरह अप्रासंगिक होकर मुख्यधारा से अलग हो रही है उससे उत्पन्न कुंठा इस तरह के घटनाक्रम को जहां मौका मिलता है दोहराने का काम कर रही है किन्तु दूसरी तरफ ये भी सही है कि राष्ट्रवादी सोच के लोग भी जिस आत्ममुग्धता तथा निश्चिंतता में जी रहे हैं उसकी वजह से भी इस तरह के हालात उत्पन्न होते रहते हैं। जेएनयू हैदराबाद, अलीगढ़ और अब बीएचयू की घटनाओं को टुकड़ों-टुकड़ों में देखने की बजाय यदि एक-दूसरे से जोड़कर देखें तो पता चल जाएगा कि माजरा क्या है?

-रवींद्र वाजपेयी

Friday, 22 September 2017

महिलाओं को उनका वाजिब हक मिलना चाहिये

लोकसभाध्यक्ष सुमित्रा महाजन ने 2017 के शुरू होते ही मांग की थी कि संसद और विधासनसभाओं में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण दिये जाने वाले विधेयक को पारित करवाए। 2010 के बजट सत्र में राज्यसभा ने इसे पारित कर दिया था परन्तु लोकसभा में इस विधेयक की कई मर्तबा फजीहत हो चुकी है। इसकी वजह मंडल समर्थक नेताओं की लॉबी है जो चाहती है कि 33 प्रतिशत आरक्षण में भी पिछड़ी जातियों का कोटा तय किया जावे। इसी को लेकर शरद यादव ने लोकसभा में  विधेयक मंत्री के हाथ से छीनकर फाड़ तक  दिया था। उन्होंने यहां तक कह दिया कि मौजूदा प्रारूप को पारित करने पर केवल परकटी (आधुनिक) महिलाएं लाभान्वित होंगी। उस बयान पर श्री यादव की काफी आलोचना भी हुई। समाजवादी नेता मधु दंडवते की पत्नी प्रमिला ने भी उन्हें खूब खरी-खोटी सुनाईं थीं। कांग्रेस के साथ वामपंथी दल भी महिला आरक्षण पर राज्यसभा द्वारा पारित विधेयक को ही पारित करवाने के पक्षधर रहे हैं किन्तु लोकसभा में बहुमत न होने से बात अटकी रही। लालू और मुलायम भी आरक्षण के भीतर आरक्षण को लेकर अड़े रहे। मायावती और रामविलास पासवान भी ऐसा ही चाहते रहे हैं। जहाँ तक बात भाजपा की है तो शुरू-शुरू में तो वह भी विधेयक को जस का तस पारित करवाने को राजी थी परन्तु बाद में उमाश्री भारती सहित ओबीसी वर्ग के अन्य नेताओं ने भी जब मंडल राग अलापना शुरू कर दिया, तब पार्टी ने बर्र के छत्ते में पत्थर मारने से परहेज कर लिया। पता चला है मोदी सरकार ने इस विधेयक को लोकसभा के आगामी सत्र में पारित करवाने का फैसला कर लिया है। इस बारे में अरूण जेटली ने कांग्रेस के कतिपय नेताओं से बात भी कर ली। इस पहल का उद्देश्य देश भर की महिला मतदाताओं को आकर्षित करना ही हो सकता है। गुजरात चुनाव में भाजपा इसे भुनाने की कोशिश भी करेगी। उ.प्र. विधानसभा चुनाव के दौरान तीन तलाक का मुद्दा छेडऩे का जबर्दस्त लाभ मिलने से भाजपा के रणनीतिकार काफी उत्साहित हैं। ज्योंही कांग्रेस को भनक लगी त्योंही वह भी श्रेय की होड़ में शामिल हो गई। पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर समर्थन का वायदा करते हुए ये याद भी दिला दिया कि लोकसभा में सरकार के पास चूंकि पर्याप्त बहुमत है अत: उसका लाभ उठा लिया जाए। अब यदि कांग्रेस भी साथ दे दे तथा भाजपा में ओबीसी लॉबी टांग न अड़ाये तब विधेयक का पारित होना संभव हो जायेगा। लेकिन ये इतना आसान भी नहीं है क्योंकि भाजपा पर भी अब सवर्ण जातियों का कब्जा नहीं रहा। स्वयं प्रधानमंत्री भी पिछड़ी जाति के हैं तथा जान देकर भी आरक्षण जारी रखने की बात कह चुके हैं। अमित शाह भी 2019 के मिशन में दलित, आदिवासी सहित उन जातियों के बीच पार्टी का आधार मजबूत करने के लिये जुटे हैं जो अन्य दलों का वोट बैंक मानी जाती हैं। एक बार मान लें कि भाजपा राज्यसभा द्वारा पारित विधेयक को ही पारित करवा लेगी तब ये प्रश्न उठेगा कि संसद में अचानक एक तिहाई सीटों से पुरुषों की विदाई कहीं निर्णय क्षमता को प्रभावित तो नहीं करेगी? इसके जवाब में एक बात ये भी सामने आई थी कि संभवत: लोकसभा में सीटें बढ़ाई जावेंगी या फिर कई मौजूदा सीटों पर पुरुषों के साथ ही महिला सांसद चुनने की भी व्यवस्था की जावेगी जिससे निर्वाचन क्षेत्र बढ़ाने की जरूरत न पड़े। जो भी होगा वह विधेयक के पारित होने पर ही सामने आयेगा किन्तु इतना जरूर है कि लोकसभा अध्यक्ष की अपेक्षानुसार केन्द्र सरकार के हरकत में आने और श्रीमती गांधी द्वारा समर्थन की चि_ी भेज देने के बाद अब इस बात पर भी बहस की जरूरत है कि क्या देश इस स्थिति में है जो एक तिहाई सांसद और विधायक महिलाओं को बना दिया जावेे। ग्राम पंचायत तथा अन्य स्थानीय निकायों में 33 प्रतिशत महिला आरक्षण बरसों पहले लागू हो चुका  है। उसकी वजह से महिलाओं की हिस्सेदारी शासन-प्रशासन में बढ़ी भी है। कुछ महिलाएं तो बहुत ही अच्छा कार्य कर रही हंै किन्तु अधिकांश या यूं कहें कि 75 प्रतिशत का प्रदर्शन निराशाजनक रहा है। यहां तक कि विधायक और सांसद बन जाने वाली महिलाएं भी पुरुषों के समकक्ष नतीजे नहीं दे पातीं। यद्यपि सुमित्रा महाजन, सुषमा स्वराज और सोनिया गांधी जैसे कई नाम हैं जिन्होंने महिलाओं की नेतृत्व क्षमता को जोरदार तरीके से प्रमाणित किया है लेकिन एक तिहाई विधायक-सांसदों की सीटों पर योग्य और सक्षम महिलाओं का चयन राजनीतिक दलों के लिये भी बड़ा सिर दर्द बन जायेगा। हॉलांकि सभी पार्टियों में महिलाओं के प्रकोष्ठ बन चुके हैं तथा न केवल उच्चशिक्षित तथा संपन्न परिवारों की अपितु गरीब एवं मध्यम वर्ग से भी महिलाएं राजनीति के क्षेत्र में नजर आने लगी हैं। उनमें महत्वाकांक्षा भी बढ़ी है। शिक्षा के प्रसार ने भी अनेक युवतियों को राजनीति में आकर अपनी क्षमता दिखाने हेतु प्रेरित-प्रोत्साहित किया हंै। अनेक राज्यों में महिला मुख्यमंत्री पुरुषों के बराबर ताकतवर रही हैं। ममता बैनर्जी और उनके पूर्व स्व. जयललिता एवं शीला दीक्षित इसकी उदाहरण हैं। बावजूद इसके विधान और लोकसभा में एक तिहाई महिला सदस्य ढूंढ़ पाना आसान नहीं होगा। ये मानकर चलना चाहिए कि विधेयक जस का तस पारित हो या संशोधनों के साथ परन्तु प्रारंभिक दौर में तो अपेक्षाकृत कम योग्य एवं क्षमता वाली महिला सदस्यों को चुनना देश की मजबूरी बन सकती है। दूसरी तरफ ये सोचना भी गलत नहीं होगा कि दस वर्ष के बाद महिलाओं के बीच से ही सक्षम-सुयोग्य नेतृत्व उभरेगा। अब ये दायित्व राजनीतिक दलों का होगा कि वे बिना पक्षापात एवं रागद्वेष के ऐसी महिलाओं को सक्रिय भूमिका में लाएं जो नेतृत्व के मामले में आत्म्निर्भर होकर काम कर सकें। अनु.जाति और जनजातियों को आरक्षण देने के बाद भी उनके बीच से चन्द अपवादों को छोड़कर ऐसा नेतृत्व नहीं उभर सका जो आश्वस्त कर सके। लेकिन इस कारण से महिला आरक्षण विधेयक को टांगकर रखे रहना भी उचित नहीं है। बेहतर होगा यदि राजनीतिक नफे-नुकसान से ऊपर उठकर संसद-विधानसभा में देश की आधी आबादी को उनका वाजिब प्रतिनिधित्व दिया जाए। मंडल समर्थक् सदस्यों को भी अपनी जिद छोड़कर विधेयक के मौजूदा प्रारूप को स्वीकार कर लेना चाहिए। विभिन्न क्षेत्रों में महिलाओं की बढ़ती उपस्थिति के मद्देनजर अब बतौर जनप्रतिनिधि भी उन्हें अवसर देना जरूरी हो गया है।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 21 September 2017

ममता द्वारा तुष्टीकरण से हो रहा ध्रुवीकरण

आजकल ममता बैनर्जी पर मुस्लिम परस्ती का जुनून सवार है। एक जमाने में मुलायम सिंह भी इसी के लिये कुख्यात हुए थे। रास्वसंघ प्रमुख डा. मोहन भागवत और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के कोलकाता में भाषण देने पर रोक लगाने वाली ममता सरकार के राज में परसों एक मुस्लिम नेता ने रोहिंग्या मुसलमानों को भारत में शरण नहीं देने की केन्द्र सरकार की नीति पर जो भड़काऊ तकरीर हजारों श्रोताओं के समक्ष दी उस पर बंगाल सरकार को कोई ऐतराज नहीं हुआ। उसकी इसी दोमुंही धर्मनिरपेक्षता पर कोलकाता उच्च न्यायालय ने गत दिवस तीखे सवाल किये। विजयादशमी बंगाल का सबसे बड़ा लोक महोत्सव है। देश के अन्य हिस्सों  में जो धूम दीपावली पर होती है वैसा ही नजारा बंगाल सहित पूर्वी भारत में पूजा (शारदेय नवरात्रि) के दौरान दिखाई देता है। इस वर्ष मोहर्रम, दशहरा के एक दिन बाद है। चूंकि दुर्गा प्रतिमाओं का विसर्जन दशहरे के बाद तक चलता है इसलिये ममता सरकार ने मोहर्रम के दिन उस पर रोक लगा दी जिससे ताजियों के जुलूस के कारण हिन्दू-मुस्लिम समुदायों में टकराव की आशंका नहीं रहे। इस आदेश से हिन्दू समुदाय आक्रोशित हो उठा। राजनीति भी शुरू हो गई। कांग्रेस और वामपंथियों के हॉशिये पर खिसकते जाने से उपजे खाली स्थान को भरने हेतु लालायित भाजपा के लिये ममता का ये निर्णय मुंह मांगी मुराद बन गया। उधर प्रकरण उच्च न्यायालय में भी पहुंच गया जिसने सरकार पर तीखा सवाल दागते हुए पूछ लिया कि एक तरफ वह राज्य में साम्प्रदायिक भाईचारे और सद्भाव का दावा करती है वहीं दूसरी तरफ दुर्गा प्रतिमाओं एवं ताजियों के एक साथ विसर्जन पर साम्प्रदायिक तनाव की आशंका भी व्यक्त करती है। दशहरा के दिन राज्य सरकार ने पहले शाम छह बजे तक दुर्गा प्रतिमाओं के विसर्जन का समय निर्धारित किया था जिसे बढ़ाकर रात्रि 10 बजे तक कर दिया। उनके बाद ताजियों का जुलूस निकालने की अनुमति दी गई। उच्च न्यायालय के कार्यकारी मुख्य न्यायाधीश राकेश तिवारी ने इस पर राज्य सरकार को लताड़ते हुए कहा कि वह अपनी प्रशासनिक अक्षमता को छिपाने के लिये इस तरह की आशंका जता रही है। ये भी पूछा गया कि यदि दशहरा और मोहर्रम एक ही दिन पड़ जाते तो सरकार क्या करती?  जो प्रश्न न्यायालय ने पूछे हैं यदि वे संघ, भाजपा और किसी अन्य संगठन द्वारा पूछे  जाते तब उसे साम्प्रदायिक रूप देकर राजनीति शुरू हो जाती। न्यायालय का ये पूछना कहीं से भी गलत नहीं है कि यदि बंगाल में हिन्दू-मुस्लिम समुदायों के बीच सौहाद्र्र है तब दोनों धर्मों के आयोजनों को लेकर इस तरह की प्रतिबंधात्मक कार्यवाही क्यों की गई? न्यायालय द्वारा उठाये गये अन्य सवालों के घेरे में भी राज्य सरकार फंसती दिखी। प्रकरण पर फैसला आज आयेगा लेकिन गत दिवस अदालत द्वारा राज्य सरकार पर जिस तरह प्रश्न दागे गये उससे ममता पर लग रहा मुस्लिम परस्ती का आरोप और पुख्ता हो गया। दशहरा और मोहर्रम गत वर्ष भी एक साथ पड़े थे। जबलपुर जैसे शहर में दशहरा और मोहर्रम दोनों काफी धूमधाम से मनाए जाते हैं। दुर्गा प्रतिमाओं एवं ताजिये तथा सवारियों के विसर्जन पर एक समान भीड़ उमड़ती है। लेकिन प्रशासन द्वारा सूझ-बूझ के साथ निर्णय लिये जाने से दोनों आयोजन शांति पूर्वक संपन्न होते रहे हैं। कोलकाता में भी गत वर्ष ऐसा हुआ होगा किन्तु बीते एक वर्ष में ममता मुसलमानों के प्रति कुछ ज्यादा ही सौजन्यता दिखा रही हैं। इसका कारण बताने की जरूरत नहीं है क्योंकि समय-समय पर सारी बातें सामने आ चुकी रही हैं। हिन्दू संगठनों के बढ़ते प्रभाव से वे बुरी तरह बौखला गई हैं जिसके चलते ऊल-जलूल फैसले लेती जा रही हैं। पूर्व में कई जगह हुए साम्प्रदायिक उपद्रवों के समय भी बंगाल सरकार का रवैया पूरी तरह हिंदू विरोधी रहा। इसकी वजह एकदम साफ है। ममता को पता है कि बांग्लादेश से अवैध रूप से आकर बस गए मुस्लिमों के कारण बंगाल का राजनीतिक संतुलन काफी कुछ उनकी तरफ झुक गया है। वामपंथी एवं कांग्रेस के बीच बंटते रहे मुस्लिम समुदाय के सामने वर्तमान स्थिति में सिवाय तृणमूल कांग्रेस के साथ जुडऩे के और कोई विकल्प नहीं है क्योंकि बंगाल सहित पूरे पूर्वोत्तर में भाजपा तेजी से पैर फैला रही है। असम, मणिपुर तथा अरूणाचल में वह सत्ता में आ गई है। बंगाल में हुए स्थानीय निकाय चुनावों में भले ही भाजपा को कहीं सफलता नहीं मिली किन्तु वह सीपीएम और कांग्रेस को धकेलकर दूसरे स्थान पर आ गई। उ.प्र., बिहार एवं अन्य राज्यों के जो लोग बंगाल में बसे हैं उन्हें भाजपा में अपना भविष्य नजर आने लगा है, ऐसे में ममता का खुलकर मुस्लिम समर्थक हो जाना छद्म निरपेक्ष राजनीति का ताजा उदाहरण है किन्तु वे भूल रही हैं कि जिन-जिन नेताओं ने हिन्दू विरोध का परचम उठाकर सत्ता पानी चाही वे कुछ समय तक तो सफल रहे लेकिन देर सबेर या तो सत्ता से बाहर हो गये या फिर घूम-फिरकर भाजपा की गोद में आ बैठे। मुलायम और लालू की स्थिति किसी से छिपी नहीं है वहीं रामविलास पासवान और नीतिश कुमार का वापिस एनडीए से जुडऩा काफी कुछ कह जाता है। इस लिहाज से सुश्री बैनर्जी जो भी कर रही हैं उससे उन्हें आज भले फायदा नजर आ रहा हो किन्तु भविष्य की दृष्टि से देखें तो वे भी हॉशिये में जगह बनाने मजबूर हो जायेंगी। कोलकाता उच्च न्यायालय का जो भी फैसला आए लेकिन इस विवाद ने राज्य की सीमा से बाहर निकलकर भी तुष्टीकरण के विरुद्ध माहौल बनाने में मदद की है। कोलकाता में बैठे कतिपय मुस्लिम धर्मगुरूओं को कुछ भी बोलने की आजादी मिली होने से भी ममता के विरुद्ध वातावरण पूरे देश में बन रहा है। यदि अब भी उन्हें समझ नहीं आई तब वे बंगाल में हिन्दू मतों के ध्रुवीकरण में ही मददगार बनेंगी।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 20 September 2017

अर्थव्यवस्था : अगले 15 दिन महत्वपूर्ण

रात को 12 बजे घंटा बजाकर जीएसटी नामक कर प्रणाली को लागू करने का श्रेय लेने के महज दो माह बाद ही यदि केन्द्र सरकार के माथे पर चिन्ता की लकीरें उभरने लगीं तो स्वाभाविक है परिणाम आशानुरूप नहीं रहे। जुलाई माह की जीएसटी विवणियों से आये लगभग 93 हजार करोड़ में से 65 हजार करोड़ बतौर इन पुट क्रेडिट व्यापारियों को वापिस करने की बात स्पष्ट होते ही मोदी सरकार के आर्थिक प्रबंधकों को पसीना आने लगा। गिरती विकास दर, कारोबार में सर्वत्र निराशाजनक माहौल की चर्चा, रोजगार सृजन में सुस्ती तथा पेट्रोल-डीजल की लगातार बढ़ रही कीमतों से एकाएक ये धारणा मजबूत होने लगी कि आर्थिक मोर्चे पर अच्छे दिन का वायदा पूरी तरह फुस्स हो गया और उसके ठीक उलट बुरे दिन आ गये और वह भी बैंड-बाजा-बारात के संग। गत दिवस वित्त मंत्री अरूण जेटली के साथ अनेक मंत्री और सलाहकार बैठे। प्रधानमंत्री के सामने स्थिति का विवरण पेश करने की कवायद भी शुरू हो गई है। पेट्रोलियम मंत्री दीपावली तक पेट्रोल-डीजल की कीमतें गिरने का आश्वासन दे रहे हैं। जीएसटी काउंसिल की बैठक में इन दोनों चीजों को भी जीएसटी के दायरे में लाने का दबाव केन्द्र की तरफ से डाला जावेगा। दरअसल केन्द्र सरकार की समझ में एक बात पूरी तरह से आ गई है कि अर्थ व्यवस्था से जुड़ी तकनीकी और गूढ़ बातों पर अब चंद दिमाग वालों का एकाधिकार नहीं रह गया। बढ़ती शिक्षा एवं सूचना तकनीक के विकास ने औसत दर्जे के शिक्षित व्यक्ति की समझ में भी ये बात डाल दी है कि पेट्रोल-डीजल पर भारी-भरकम करारोपण के जरिये न सिर्फ केन्द्र वरन् राज्य भी मुनाफाखोरी के कीर्तिमान स्थापित कर रहे हैं। व्यापारी को कालाबाजारी और मुनाफाखोरी के लिये प्रताडि़त करने वाली सरकार नामक व्यवस्था ने बीते कुछ वर्षों में पेट्रोल-डीजल से जो कमाई की भले ही उसको इन्फ्रास्ट्राक्चर एवं रक्षा सौदों पर खर्च किया हो परन्तु वह आम जनता को ये समझाने में सफल नहीं हो सकी कि उसकी नीयत साफ है। नोटबंदी और जीएसटी दोनों को लेकर जो उम्मीदें जगाई गईं थीं वे सैद्धांतिक तौर पर भले ही सरकार की उम्मीदों के मुताबिक रही हों परन्तु व्यवहार में देखें तो अब तक उनका नकारात्मक असर ही ज्यादा दिखाई दे रहा है। यद्यपि ये अच्छी बात है कि केन्द्र सरकार किसी घपले और घोटाले के आरोप में नहीं फंसी किन्तु जनता के नजरिये से देखें तो महज इतने से उसे संतुष्टि नहीं मिल रही। अब प्रश्न ये है कि मौजूदा स्थिति से देश बाहर कैसे आयेगा? दीपावली का मौसम भारत में व्यापार की दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण होता है जब माटी के दिये से लेकर करोड़ों रूपये के आभूषण तक बिक जाते हैं। ऐसी स्थिति में सरकार और व्यापार जगत दोनों उम्मीद लगाए बैठे हैं। नोटबंदी को साल बीतने जा रहा है। जीएसटी को लेकर व्याप्त अनिश्चिता अभी तक बनी हुई है क्योंकि उसे लागू करने में सरकार की अपनी व्यवस्था अपर्याप्त साबित हो रही है। वित्त मंत्री ने शुरू में ही ये संकेत दिये थे कि आगे जाकर जीएसटी की दरों में जरूरत पडऩे पर कमी की जाएगी वहीं बीतें कुछ दिनों से ये खबरें भी आ रही हैं कि चार की बजाय 12 और 18 प्रतिशत दो ही दरें रहेंगी। आयकर छूट सीमा के साथ ही उसकी दरों में कमी की अटकलें भी लग रही हैं। क्या होगा, क्या नहीं फिलहाल कह पाना कठिन है क्योंकि जीएसटी का नियमन जो काउंसिल करती हैं उसमें सभी राज्यों का प्रतिनिधित्व है, जिनमें अलग-अलग दलों का शासन है। उससे भी बढ़कर तो क्षेत्रीय दल भी प्रभावशाली हैं। ऐसी स्थिति में केन्द्र सरकार के सामने कई विचारणीय मुद्दे हंै। मसलन, बाजार में मांग बढ़ाना जिससे कारोबारी सुस्ती दूर हो क्योंक ऐसा नहीं होने पर कर वसूली भी अपेक्षानुरूप नहीं होगी जिसका खामियाजा विकास परियोजनाओं को पूरा करने में होने वाले विलंब के तौर पर सामने आयेगा। लेकिन यदि सरकार आर्थिक मोर्चे पर सफलता के साथ ही जनता का समर्थन और विश्वास बनाये रखना चाहती है तब उसे कर ढांचे को सहज और सरल बनाना होगा। काले धन के खिलाफ की जा रही सख्ती पर किसी को ऐतराज नहीं होना चाहिये किन्तु सब चोर हैं की धारणा भी बदलनी चाहिये। नोटबंदी की तकलीफें झेलने के बाद भी यदि उ.प्र. में भाजपा को ऐतिहासिक बहुमत मिला तो इसका आशय यही था कि जनमानस सरकार के कड़े कदमों का समर्थन करता है। जीएसटी को लेकर लगाई गई उम्मीदें भी अभी खत्म नहीं हुई हैं। बड़ा व्यापारी वर्ग उससे उत्पन्न व्यवहारिक परेशानियों के बाद भी इस बात को लेकर आशान्वित है कि व्यवस्था सुधर जाने के उपरांत उसके लिये काम करना आसान हो जाएगा। सितंबर का महीना खत्म होने के साथ ही जीएसटी को तीन माह पूरे हो जायेंगे। यद्यपि विवणियां भरने में आ रही दिक्कतों के मद्देनजर इस तिमाही के आंकड़े तो नवंबर के पहले तक शायद ही उपलब्ध हो पाएं किन्तु गुजरात चुनाव रूपी चुनौती के सामने होने की वजह से प्रधानमंत्री यथास्थिति से निकालकर अर्थव्यवस्था संबंधी कुछ न कुछ ऐसा जरूर करेंगे जिससे उनके अपने राज्य में भाजपा का कब्जा बरकरार रहे। नरेन्द्र मोदी के सामने डा. मनमोहन सिंह सरीखी कोई मजबूरी नहीं है जिनके ऊपर 10 जनपथ नामक समानांतर सत्ता हावी थी। ऐसे में ये उम्मीद करना गलत नहीं होगा कि दीपावली के पहले ही आर्थिक मोर्चे पर राहत का एहसास कराया जावेगा। केन्द्र सरकार के अगले बजट पर भी इसीलिये अभी से नजरें लग गई हैं क्योंकि 2019 के लोकसभा चुनाव के पहले मोदी सरकार के लिये कुछ ऐसे उपाय करने की मजबूरी तो है ही जिनसे आम जनता को सीधा-सीधा फायदा मिल सके। इस दृष्टि से आने वाले एक-दो पखबाड़े काफी महत्वपूर्ण होंगे क्योंकि केन्द्र सरकार की आर्थिक नीतियों को लेकर जो आशकाएं पूर्व प्रधानमंत्री डा. सिंह जता रहे हैं लगभग वहीं भाजपा के अपने सांसद और संघ परिवार के चहेते डा. सुब्रमण्यम स्वामी ने भी व्यक्त की हैं। उधर पेट्रोल-डीजल के बढ़ते दामों पर भाजपा के नए दोस्त जनता दल (यू) ने भी आगाह किया वहीं सबसे पुराने साथी शिवसेना ने भी तलाक की धमकी दे दी है।

-रवीन्द्र वाजपेयी