Tuesday, 26 December 2017

बुला लेते तो क्या चला जाता

गत दिवस नोएडा से दिल्ली जाने वाली एक मेट्रो ट्रेन के शुभारंभ पर दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को न बुलाने पर उठा विवाद अपनी जगह ठीक है। भले की समारोह स्थल जिस जगह हुआ वह तकनीकी तौर पर उप्र में है लेकिन एनसीआर नामक जो व्यवस्था है उसमें व्यवहारिक दृष्टि से नोएडा, गाजिय़ाबाद और गुडग़ांव दिल्ली के उपनगरीय क्षेत्र ही हो गए हैं। और फिर मेट्रो परियोजना का नाम ही दिल्ली मेट्रो है जिसमें दिल्ली सरकार की वित्तीय हिस्सेदारी भी है। दिल्ली के उप मुख्यमंत्री मनीष सिसौदिया का ये कहना मायने रखता है कि श्री केजरीवाल को इसलिए नहीं बुलाया क्योंकि वे मेट्रो किराया घटाने की मांग कर प्रधानमंत्री को मुसीबत में डाल देते। वजह जो भी हो लेकिन यदि उन्हें भी बुला लिया गया होता तो आसमान नहीं टूट पड़ता। नोएडा और दिल्ली के बीच जो रिश्ता है उसे देखते हुए श्री केजरीवाल की वहां उपस्थिति किसी भी दृष्टि से अनुचित नहीं होती। यद्यपि दूसरे राज्य के मुख्यमंत्री को बुलाने की परंपरा नहीं है लेकिन उपरोक्त आयोजन कुछ अलग हटकर था। बेहतर हो ऐसे अवसरों पर बजाय प्रतिद्वंदिता के सौजन्य का प्रदर्शन किया जाना चाहिए। श्री केजरीवाल भाजपा और श्री मोदी के निकटतम आलोचक भले हों किन्तु उक्त मंच पर अगर वे वैसा कुछ करते तो उनकी जगहंसाई होती। फिलहाल तो वे सहानुभूति के पात्र बन गये हैं।

-रवीन्द्र वाजपेयी

कुलभूषण : फिलहाल प्राणरक्षा ही सर्वोच्च प्राथमिकता


कुलभूषण जादव से उनकी माँ और पत्नी की भेंट करवाकर पाकिस्तान ने अपनी जिस मानवतावादी छवि को वैश्विक स्तर पर प्रचारित करना चाहा वह और खराब हो गई। कांच की दीवार के पीछे बैठे  कुलभूषण का फोन के जरिये माँ और पत्नी से बात करना एक तरह से इंटरनेट पर विदेश में बैठे किसी परिजन से होने वाली बातचीत जैसी ही है जिसमें एक दूसरे को देखा सुना तो जा सकता है किंतु छूना सम्भव नहीं हो पाता। जरा सोचिए उस माँ और पत्नी के दिल पर क्या गुजर रही होगी जो दुश्मन के कब्जे में फंसे अपने बेटे और पति से चंद इंचों के फासले पर होकर भी न उससे अंतरंग बातचीत कर सकीं और न ही उसे छूकर जान सकीं कि उसकी शारीरिक स्थिति कैसी थी ? पाकिस्तान ने अपने संस्थापक मो.अली जिन्ना की जयंती पर कुलभूषण के परिवारजनों को उससे मिलवाने की जो व्यवस्था की वह अपने आप में एक विवाद का विषय बन गई। ऐसी अवस्था में जब हमारी विदेश मंत्री सुषमा स्वराज आए दिन किसी पाकिस्तानी को भारत में इलाज हेतु वीज़ा जारी करने की उदारता दिखाया करती हैं तब पड़ोसी मुल्क का ये व्यवहार न सिर्फ  कचोटने वाला अपितु अपमानजनक भी है। इस बारे में भारत सरकार की मजबूरी ये है कि वह कुलभूषण की खैरियत की चिंता में उस स्तर पर जाकर कूटनीतिक दबाव नहीं बना पा रही जो अपेक्षित है। अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय से कुलभूषण की फांसी रुकवाकर भले ही भारत ने बड़ी कामयाबी हासिल कर ली हो लेकिन उससे उसकी प्राणरक्षा पूरी तरह सुनिश्चित नहीं मानी जा सकती। पाकिस्तान ने इस मामले को इतना पेचीदा बना दिया है कि  कुलभूषण की रिहाई बहुत मुश्किल होगी क्योंकि ऐसा होने पर उसके झूठ का पुलिंदा पूरी दुनिया के सामने खुल जायेगा। भारत सरकार के हाथ इस प्रकरण में काफी बंधे हुए हैं। वह ज्यादा से ज्यादा इतना कर सकती है। कि कुलभूषण की फांसी को लम्बे  कारावास में बदलवा ले। बावजूद उसके कुलभूषण 10-20 साल जि़ंदा रहेगा ये गारंटी नहीं दी है सकती। किसी शत्रु राष्ट्र के व्यक्ति को जासूस बताकर पकडऩे के बाद कोई देश आसानी से नहीं छोड़ता, फिर पाकिस्तान का रिकार्ड ऐसे मामलों में बहुत ही दागदार रहा है। उसे देखते हुए गत दिवस कुलभूषण की माँ और पत्नी से मुलाकात में जो घटिया हरकत उसने की वह आपत्तिजनक जरूर थी किन्तु अनपेक्षित कदापि नहीं। अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय में भारत ने जिस तरह का दबाव बनाया उससे पाकिस्तान काफी भन्नाया हुआ है। उसके बाद यद्यपि उसे कुलभूषण की फांसी तो रोकनी पड़ी किन्तु ये मान लेना कि वह अपने रुख में नरमी लाएगा , गलत है। उसे अपनी छवि सुधारने की भी बहुत ज्यादा फिक्र नहीं रहती वरना वैश्विक दबाव और आलोचना के बाद भी वह हाफिज सईद सरीखे घोषित आतंकवादी को इस तरह छुट्टा न छोड़ता। गत दिवस जो कुछ भी हुआ उससे पूरे भारत में गुस्सा है लेकिन ऐसे मामलों में केवल भावनात्मक ज्वार काम नहीं करता क्योंकि जरा सी असावधानी  में हमारे एक बेकसूर नागरिक की जान जा सकती है। पाकिस्तान भले ही विश्व बिरादरी का सदस्य हो लेकिन उसका आचरण किसी सभ्य देश के अनुरूप नहीं होने से वह किसी भी मामले में न तो विश्वसनीय है और न ही ईमानदार। कुलभूषण की रिहाई तो दूर की कौड़ी है क्योंकि जब तक कोई असाधारण अंतराष्ट्रीय दबाव न आए या कुलभूषण के बदले भारत भी किसी पाकिस्तानी कैदी को रिहा न करे तब तक उसकी सुरक्षित वापसी की उम्मीद नहीं की जा सकेगी। फिलहाल तो भारत सरकार के सारे प्रयास कुलभूषण को किसी तरह जीवित रखने पर केंद्रित होने चाहिए क्योंकि पाकिस्तान जरा सी मोहलत मिलते ही उसे सूली पर लटकाने में नहीं हिचकेगा। गत दिवस उसने जिस तरह का हल्कापन या उससे भी बढ़कर कहें तो टुच्चापन दिखाया उसके बाद किसी सदाशयता की उम्मीद करना व्यर्थ है। 1947 में जिस नफरत के आधार पर पाकिस्तान का जन्म हुआ वह कम होने की बजाय बढ़ती ही जा रही है। कुलभूषण प्रकरण से उसके मन में भरा ज़हर एक बार फिर बाहर आ गया ।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 25 December 2017

उपचुनाव : कांग्रेस का खाली हाथ

गत दिवस विभिन्न राज्यों में सम्पन्न हुए विधानसभा उपचुनावों के जो नतीजे आये उनके अनुसार सत्तारूढ़ पार्टियों का दबदबा बना हुआ है। यद्यपि तमिलनाडु की आरके नगर सीट पर अन्ना द्रमुक के बागी और पूर्व मुख्यमंत्री के भतीजे दिनाकरन ने सत्तारूढ़ पार्टी के नए विभाजन के संकेत दे दिए किन्तु विपक्षी द्रमुक का काफी पीछे रह जाना साबित करता है कि अन्नाद्रमुक ही तमिलनाडु की राजनीति में फिलहाल बड़ी ताकत है। दिनाकरन की जीत का सांकेतिक महत्व केवल इतना है कि उन्होंने जयललिता की मौत से खाली हुई सीट को निर्दलीय जीतकर अम्मा की विरासत पर दावा पुख्ता किया लेकिन शशिकला के जेल में  रहने की वजह से दिनाकरन कितना हाथ पांव मारेंगे और अन्ना द्रमुक में आगे बिखराव होगा ये फिलहाल सोचना जल्दबाजी होगी। तमिलनाडु में पांव जमाने के लिए प्रयासरत भाजपा के प्रत्याशी को नोटा से भी कम मत मिलना काफी कुछ कह देता है। द्रमुक अध्यक्ष करुणानिधि की शारीरिक असमर्थता और परिवार में उत्तराधिकारी को लेकर चल रही अन्तर्कलह के कारण ही 2 जी घोटाले में ए राजा और कनिमोझी के बरी होने का कोई लाभ उपचुनाव में पार्टी नहीं उठा सकी। अन्ना द्रमुक भी जयललिता के बाद की  स्थितियों को सम्भालने में जुटी हुई है। कांग्रेस और द्रमुक के गठबंधन में दरार डालने भाजपा भी प्रयत्नशील है लेकिन फिलहाल तमिलनाडु में राष्ट्रीय पार्टियों के उभार की कोई संभावना नजऱ नहीं आ रही। उधर बंगाल में हुए उपचुनाव में तृणमूल कांग्रेस ने 64 हज़ार से वामपंथी उम्मीदवार को पटककर ममता बनर्जी के अपराजेय बने रहने की अवधारणा प्रमाणित कर दी लेकिन चौकाने वाली बात ये रही कि वामपंथी प्रत्याशी से मात्र 2ज् मत कम प्राप्त कर भाजपा तीसरे स्थान पर आ गई वहीं अपने विधायक के दलबदल से रिक्त हुई सीट पर कांग्रेस की जमानत जप्त हो गई। इससे सिद्ध हो गया कि  भाजपा बंगाल में तेजी से आगे बढ़ती जा रही है। जिस तरह वामपंथी अप्रासंगिक होने लगे हैं उससे लगता है आगामी चुनाव में बड़ी बात नहीं भाजपा प्रमुख विपक्षी दल के तौर पर स्थापित हो जाए। कांग्रेस की अपनी सीट पर जमानत ही डूब जाना उसकी चिंताजनक स्थिति का प्रगटीकरण है। यूँ भी बंगाल में पार्टी का ऐसा कोई चेहरा नहीं है जो जनता के बीच लोकप्रिय हो। तृणमूल ही अब वहां कांग्रेस का पर्याय बन गई है। कांग्रेस को एक और धक्का लगा अरुणाचल में जहां उसकी एक सीट भाजपा ने छीनते हुए उसे और कमजोर कर दिया। दोनों उपचुनाव जीतकर भाजपा ने इस सीमावर्ती संवेदनशील राज्य में जहां अपनी स्थिति और सुदृढ़ कर ली वहीं कांग्रेस के पूर्व मुख्यमंत्री की हार उसकी चिंताएं बढ़ाने वाली रही। उप्र की सिकंदरा सीट पर भाजपा प्रत्याशी की जीत भी मायने रखती है क्योंकि मतों का बंटवारा रोककर उसे हराने की गरज से मायावती ने अपना उम्मीदवार ही नहीं लड़ाया। बावजूद उसके भाजपा ने सीट जीतकर दिखा दिया कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अभी भी लोकप्रिय हैं और पिछली फरवरी में हुए सत्ता परिवर्तन के बाद से विपक्ष अब तक सम्भल नहीं सका। पिछले दिनों स्थानीय निकायों के चुनावों में भाजपा  को मिली सफलता का असर भी कायम है। हालांकि इन उपचुनावों के नतीजों को देश का मिजाज मान लेना जल्दबाजी होगी क्योंकि हर राज्य के अपने समीकरण होते हैं लेकिन कांग्रेस का प्रदर्शन जितना दयनीय रहा उससे ये लगने लगा है कि पार्टी के पास दमदार स्थानीय  नेताओं का अभाव हो चला है। निकट भविष्य में विभिन्न राज्यों के लोकसभा उपचुनाव होने वाले हैं। उनमें उप्र और राजस्थान भी हैं। गुजरात में मिली सफलता से भले ही कांग्रेस के प्रति जनरुचि बढ़ी है लेकिन पार्टी का संगठन अभी भी बेहद कमजोर है। गुजरात में यही कमजोरी उसके आड़े आ गई वरना वहां भाजपा उखड़ जाती। त्रिपुरा और मेघालय जैसे पूर्वोत्तर राज्यों में भी विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। भाजपा ने असम और मणिपुर जीतकर और अरुणाचल में जोड़ तोड़ से अपनी सरकार बनाकर इरादे साफ कर दिए थे। ऐसे में धीरे-धीरे कांग्रेस का सिमटते जाना नरेंद्र मोदी के कांग्रेस मुक्त भारत के नारे को वास्तविकता में  बदलता जा रहा है। धोखे न धड़ी कांग्रेस कहीं कर्नाटक भी गंवा बैठी तब उसका रसातल तक चला जाना अवश्यम्भावी हो जाएगा। गुजरात के धमाकेदार प्रदर्शन से भले ही राहुल गाँधी की छवि में थोड़ा सुधार हुआ होगा किन्तु हिमाचल की हार ने मजा बिगाड़ दिया। पार्टी को चाहिए कि वह अपनी संगठनात्मक ताकत तो बढ़ाए ही, नीतिगत अस्पष्टता को भी दूर करे। एक राष्ट्रीय पार्टी का नीचे लुढ़कते-लुढ़कते क्षेत्रीय दलों से भी बदतर स्थिति में आ जाना देश के लिए अच्छा नहीं है। गुजरात में कांग्रेस के अच्छे प्रदर्शन का श्रेय तो तीन लड़के लूट ले गए क्योंकि पार्टी के मुख्यमंत्री पद के सभी दावेदार विधायक तक नहीं बन सके। यही हाल रहा तो 2018 के अंत में तीन राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनाव में भी कांग्रेस को सफलता मिलना कठिन हो जायेगा। अनुकूल परिस्थितियों के बाद भी जीत से दूर रहने के कारण कांग्रेस का जनाधार और सिमटने का खतरा बढ़ता जा रहा है। कल जिन उपचुनावों के नतीजे आए उनमें कांग्रेस के हाथ कुछ न लगना उतनी बड़ी बात नहीं जितनी अपनी दो सीटें गंवा देना है ।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 23 December 2017

हिंदुत्व के रास्ते पर कांग्रेस : स्वागतयोग्य कदम


राहुल गांधी आज गुजरात में धन्यवाद यात्रा पर सबसे पहले कन्धे पर पूजा की थाली लेकर सोमनाथ मन्दिर गए और विधि-विधान से भगवान शंकर की पूजा अर्चना की । चुनाव के दौरान उन्हें जनेऊ धारी  ब्राह्मण बताए जाने पर काफी मज़ाक़बाज़ी हुई तथा ये माना गया कि भाजपा के कट्टर हिंदुत्व के जवाब में राहुल नर्म हिन्दुत्व के फार्मूले को आजमा रहे हैं । यद्यपि इसका क्या लाभ हुआ ये कहना कठिन है किंतु जनेऊ धारी कहलाकर उपहास का पात्र बने राहुल को समझ गये हैं कि अल्पसंख्यकों के तुष्टीकरण से परहेज करने का समय आ चुका है । भाजपा को भले ही कांग्रेस अध्यक्ष का मंदिर भ्रमण दिखावा लगे लेकिन देश की दूसरी सबसे बड़ी राष्ट्रीय पार्टी बहुसंख्यक हिंदुओं के महत्व को स्वीकार करने की मानसिकता में आ रही है तब उसका स्वागत ही होना चाहिये। हो सकता है राहुल 2018 में होने जा रहे हिन्दू बहुल राज्यों के चुनाव को ध्यान में रखते हुए मन्दिर जाने का नाटक कर रहे हों लेकिन यदि इससे तुष्टीकरण की राजनीति पर विराम लगता है तो बुरा क्या है? कांग्रेस की देखा सीखी अन्य पार्टियां भी मुस्लिम तुष्टीकरण को चुनाव जिताऊ फार्मूला मानकर छद्म धर्मनिरपेक्षता का चोला धारण कर घूमने लगी थीं। मुस्लिम समाज में व्याप्त कट्टरपन को बढ़ावा देने के लिए ये पार्टियां ही उत्तरदायी हैं। अब यदि राहुल मन्दिर दर्शन के बहाने कांग्रेस को हिंदुओं का हितचिंतक सिद्ध करने की कोशिश कर रहे हैं तो ये देश हित में ही है। कम से कम इससे धार्मिक आधार पर वोटों का धु्रवीकरण रोका जा सकेगा। यदि यही काम कांग्रेस पहले कर लेती तो उसकी ये दशा न होती।

-रवीन्द्र वाजपेयी

चव्हाण : मुकदमे से बच सकते हैं अपयश से नहीं


मुंबई में पूर्व सैनिकों के लिए बनाई गई आदर्श सोसायटी में गैर सैनिकों को गलत तरीके से फ्लैट आवंटित किए जाने पर महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण को कांग्रेस सरकार के दौरान गठित जांच आयोग ने दोषी पाया था। उनके स्तीफ़े  के बाद जांच एजेंसी सीबीआई  द्वारा राज्य के तत्कालीन राज्यपाल  शंकरनारायणन से श्री चव्हाण के विरुद्ध प्रकरण चलाने की अनुमति मांगी गई  किन्तु उन्होंने सीबीआई को निराश कर दिया। उक्त महामहिम कांग्रेस के नेता थे और केरल की एंटोनी सरकार में मंत्री भी रह चुके थे। मोदी सरकार बनने पर नियुक्त नए राज्यपाल विद्यासागर राव के समक्ष सीबीआई ने नए सिरे से अर्जी लगाई जिन्होंने श्री चव्हाण पर मुकदमा चलाने की अनुमति दे दी। श्री चव्हाण ने दरअसल नए राज्यपाल के निर्णय को चुनौती दी जिस पर उच्च न्यायालय ने सिर्फ  इतना कहा कि एक राज्यपाल द्वारा मुकदमे की अनुमति नहीं दिए जाने के निर्णय को दूसरे राज्यपाल द्वारा बदला जाना गलत था क्योंकि जांच एजेंसी ने कोई नए साक्ष्य महामहिम के विचारार्थ प्रस्तुत नहीं किये थे। उच्च न्यायालय ने श्री राव द्वारा पिछले राज्यपाल के निर्णय को दरकिनार रखते हुए सीबीआई को दी गई अनुमति को गलत मानते हुए कहा कि यह एक स्वतंत्र एजेंसी के क्षेत्राधिकार का उल्लंघन है। इस तरह श्री चव्हाण पर मुकदमा चलाने की अनुमति निरस्त हुई न कि आदर्श घोटाले के दाग उनके दामन से मिटे हैं। उनके अपने शासनकाल में बने आयोग ने जब उन पर आरोप लगाए तभी उन्हें मुख्यमंत्री पद छोडऩा पड़ा जो एक तरह की परंपरा रही है। यदि श्री चव्हाण बेकसूर हैं तब उन्हें मुकदमे से डर क्यों लग रहा था?  वे और उनके साथ पूरी कांग्रेस पार्टी इस बारे में ऐसे पेश आ रही है जैसे श्री चव्हाण को अदालत ने आदर्श घोटाले में आयोग की रिपोर्ट के बाद भी दोषमुक्त कर दिया हो। दूरसंचार घोटाले में ए.राजा के बरी होने के बाद लोगों को ये लग रहा है कि श्री चव्हाण को गलत फंसाया गया था। यद्यपि इस तरह के प्रचार से लोग कुछ देर तक तो भ्रमित हो सकते हैं लेकिन देर सवेर ही सही ऐसी बातें छुपी नहीं रह सकतीं। अशोक चव्हाण संवैधानिक पद से जुड़ी कानूनी ढाल के कारण भले ही आरोपियों की सूची से बाहर हो गये हों लेकिन मुंबई के शानदार इलाके में सैनिक परिवारों के लिए बनी आदर्श सोसायटी के आवंटन में हुए घोटाले के अपयश से वे नहीं बच सकेंगे। उनके पास इस बात का क्या उत्तर है कि उनकी अपनी सरकार के दौरान बने जांच आयोग ने ही जब उन्हें आदर्श सोसायटी के फ्लैटों में हुए बंदरबांट का दोषी माना तब वे विपक्ष को इसके लिए दोषी कैसे ठहरा रहे हैं? कांग्रेस पार्टी भी ऐसी प्रतिक्रिया दे रही है जैसे अदालत ने श्री चव्हाण को सभी आरोपों से मुक्त कर दिया हो। गनीमत है श्री चव्हाण ने उस जांच आयोग की रिपोर्ट को विपक्ष द्वारा प्रायोजित नहीं बताया जिसने पूर्व सैनिकों के लिए बने फ़्लैट्स नेताओं और नौकरशाहों के बीच बांटने को घोर आपराधिक कृत्य माना था। स्मरणीय है उक्त घोटाले में तमाम वरिष्ठ सैन्य अधिकारी भी लपेटे में हैं  जिनमें एक वे भी बताए गए हैं जो कांग्रेस नेता मणिशंकर अय्यर के घर पाकिस्तानी राजनयिकों के सम्मान में दी गई दावत में भी शामिल थे। बेहतर हो जांच एजेंसी उच्च न्यायालय के फैसले के विरुद्ध सर्वोच्च न्यायालय जाए या फिर राज्यपाल के समक्ष समुचित प्रमाण दोबारा पेश करे क्योंकि यदि बड़े पदों पर बैठे लोग भ्रष्टाचार करने के बाद भी अपनी विशिष्ट स्थिति का लाभ लेकर महज तकनीकी कारणों से बचते रहे तब न्याय प्रणाली और लोकतन्त्र दोनों के प्रति अविश्वास बढ़ता चला जायेगा।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 22 December 2017

अब सीबीआई कठघरे में

देश के सबसे बड़े घोटाले के  सभी आरोपी छूट गए क्योंकि सीबीआई किसी के विरुद्ध आरोप प्रमाणित नहीं कर पाई। 1 लाख 76 हज़ार करोड़ के दूरसंचार घपले के इस अंत से देश का हर जि़म्मेदार नागरिक चिंतित है क्योंकि राजनेताओं और नौकरशाहों के भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने की सारी मुहिम आखिर-आखिर  में दम तोड़ देती है। सीबीआई को लाख दु:खों की एक दवा मानकर आजमाया जाता है किन्तु वह वीआईपी मामलों में कितनी सफल हुई ये भी जांच का विषय बनता जा रहा है। दूरसंचार घोटाले की शुरुवात उस सीएजी रिपोर्ट के कुछ अंश लीक होने से हुई जो संसद में पेश होनी थी। उसमें 2 जी स्पेक्ट्रम की नीलामी की बजाय आवंटन करने की प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए माना गया कि उससे सरकार को 1लाख 76 हज़ार करोड़ की चपत पड़ी।  संसद से सड़क तक कोहराम मच गया। संसद का पूरा शीतकालीन सत्र उस वक्त के दूरसंचार मंत्री ए. राजा की बर्खास्तगी की मांग को लेकर  बेकार चला गया। बाद में बजट सत्र को बचाने के लिए राजा हटाए गए और फिर गिरफ्तार भी हुए। द्रमुक सांसद कनिमोझी और तमाम अधिकारी एवं लाभान्वित हुए कारोबारियों पर भी गाज गिरी। मामला सीबीआई को सौंप दिया गया। सर्वोच्च न्यायालय ने सभी आवंटन रद्द कर उनकी नीलामी का निर्देश दे दिया। इस घटनाक्रम ने ईमानदारी के पुतले कहे जाने वाले डा. मनमोहन सिंह की छवि भी एक ऐसे लाचार प्रधानमंत्री की बना दी जिस पर दबाव डालकर उल्टे सीधे काम करा लिए जाते थे। भाजपा ने मौके का फायदा उठाते हुए दूरसंचार घोटाले को लोकसभा चुनाव में जमकर भुनाया। लेकिन गत दिवस सीबीआई अदालत ने जिस तरह से पूरे आरोप पत्र को रद्दी की टोकरी में फेंकते हुए घोटाले को कपोल कल्पित बताते हुए सभी कसूरवारों को ससम्मान बरी कर दिया उससे भाजपा सरकार में रहते हुए भी बंगलें झांकने मजबूर हो गई। उसके पास उच्च न्यायालय में अपील करने की बात कहने के सिवाय कोई समुचित जवाब ही नहीं बचा क्योंकि अदालत ने जिस तरह सीबीआई को आरोप प्रमाणित न कर पाने के लिए लताड़ा उसकी वजह से प्रथम दृष्ट्या हर कोई ये सोचने को बाध्य हो गया कि क्या वाकई घोटाले की पूरी कहानी मनगढं़त थी और धजी का सांप बनाया गया। लेकिन तस्वीर का दूसरा पहलू ये भी है कि घोटाले की जांच से लेकर आरोपपत्र दाखिल होने तक केंद्र में वही मनमोहन सरकार थी जिसे कठघरे में खड़ा किया गया था। राजा और कनिमोझी सहित अन्य आरोपियों की गिरफ्तारी भी उसी सरकार के दौरान हुई। इस आधार पर ये कहना गलत होगा कि जांच और आरोपपत्र की कार्रवाई उस समय के विपक्ष या समाचार माध्यमों के दबाव में की गई थी। राजा और कनिमोझी के विरुद्ध आयकर चोरी के प्रकरण भी यूपीए सरकार ने ही दायर किये। यदि कुछ हुआ ही नहीं तो सीबीआई को उसी समय जाँच बन्द करते हुए आरोपियों को क्लीन चिट दे देनी थी। लेकिन उसने जांच करने के उपरांत एफआईआर दर्ज की, दोषियों को पकड़ा और फिर मामला दायर किया। 2014 में सत्ता परिवर्तन के पूर्व प्रकरण अदालत के समक्ष जा चुका था। वर्तमान मोदी सरकार ने पुराने आरोप पत्र में कोई छेड़छाड़ या रद्दोबदल किया हो ये बात भी कभी नहीं उठी। इससे ये तो स्पष्ट हो जाता है कि सीबीआई द्वारा पेश आरोप पत्र पूरी तरह पोचा था तथा जैसा न्यायाधीश ने निर्णय में लिखा कि कतिपय तकनीकी बिंदुओं को सीबीआई ही नहीं दूरसंचार विभाग के अधिकारी तक स्पष्ट नहीं कर सके। घोटाला हुआ ही नहीं क्योंकि सीबीआई उसे साबित नहीं कर सकी जैसी बात सर्वोच्च न्यायालय द्वारा इस सम्बंध में की गई पूर्व कार्रवाई का मजाक उड़ाने जैसा होगा। राजा के बाद दूरसंचार विभाग के मंत्री बनाए गए कपिल सिब्बल ने उस समय शून्य नुकसान की बात कहकर अपनी खूब भद्द पिटवाई थी। कल वे काफी चहक रहे थे क्योंकि अदालती निर्णय उनके दावे की पुष्टि करता है किन्तु मामला था ही नहीं तो यूपीए सरकार के ज़माने में सीबीआई द्वारा जो भी उठापटक की गई उसके पीछे कौन था? गुलाम नबी आजाद की ये पीड़ा समझी जा सकती है कि उक्त घोटाले के कारण कांग्रेस विपक्ष में आ गई लेकिन  सीएजी की रिपोर्ट और सीबीआई द्वारा की गई जांच और अदालत में पेश आरोपपत्र में तो तत्कालीन विपक्ष की कोई भूमिका नहीं थी। वर्तमान सरकार ने सीबीआई की कार्रवाई में कोई दखलन्दाजी नहीं की ये बात भी अदालत के फैसले से साफ हो गई। अब सवाल ये उठता है कि प्रकरण में  कोई दम नहीं था तो सीबीआई ने लंबा चौड़ा आरोपपत्र किसके कहने से बनाया? जिस तरह के हल्के फुल्के दस्तावेजी प्रमाण और गवाह पेश किए गए वे अदालत में टिक नहीं सके तो इसके लिए सीबीआई ही पूरी तरह से कसूरवार है जिसने या तो फर्जी मामला बनाया या फिर वह अपने आरोपपत्र को सही साबित करने में असफल हुई जो कि उसकी पहिचान बनती जा रही है। फैसला आते ही कांग्रेस का सरकार पर चढ़ बैठना स्वाभाविक था क्योंकि दूरसंचार घोटाले की वजह से उसे काफी शर्मिंदगी झेलनी पड़ी थी। अब ये मामला मोदी सरकार के गले में हड्डी की तरह फंस गया है। वित्त मंत्री अरुण जेटली ने गत दिवस कांग्रेस को नसीहत दी कि वह अदालती फैसले को अपनी ईमानदारी का प्रमाणपत्र न समझे। उनकी बात सही तभी मानी जाएगी जब उनकी सरकार उच्च न्यायालय में उक्त घोटाले को साबित करते हुए दोषियों को दंडित करवाए वरना जिस तरह 2014 में भाजपा ने उसका राजनीतिक लाभ उठाया वैसा ही भविष्य में कांग्रेस को मिल सकता है। यद्यपि अदालत ने जिस तरह से पूरे आरोपपत्र को खारिज किया वह भी चौंकाने वाला है क्योंकि उससे अभियोजन पक्ष की भूमिका पर संदेह होना स्वाभाविक  है। न्याय प्रक्रिया सबूतों और गवाहों पर निर्भर होती है। न्यायाधीश अखबार की खबर या जनमत पर निर्णय नहीं देते। उस दृष्टि से फिलहाल तो सीबीआई ही कठघरे में है जिसने इतने बड़े मामले को बेहद हल्के में लिया। यदि घोटाला हुआ ही नहीं तो जांच, गिरफ्तारियाँ और  आरोपपत्र की क्या जरूरत थी ? और यदि हुआ तो आरोपी छूट कैसे गए, ये दोनों सवाल उत्तर मांगते हैं। फैसले के बाद तत्कालीन सीएजी विनोद रॉय पर भी कांग्रेस ने तीर छोड़े। इसलिए जरूरी है मोदी सरकार बिना समय गंवाए असलियत देश के सामने लाए क्योंकि ऐसा न होने पर विश्वास का संकट और गहरा जाएगा। सीएजी एक संवैधानिक संस्था है जो सार्वजनिक धन की बर्बादी और चोरी रोकने का काम करती है। यदि वह भी संदेह के घेरे में आ गई तब समूची व्यवस्था पर मंडराते संदेह के बादल और गहरे हो जाएंगे। दूरसंचार घोटाले के आरोपियों के बरी होने का राजनीतिक परिणाम चाहे जो निकले किन्तु इससे समाज का ईमानदार वर्ग बेहद चिन्तित है क्योंकि इसके चलते भ्रष्टाचार के विरुद्ध बोलने वाले मज़ाक का पात्र बनकर रह जाएंगे।

-रवीन्द्र वाजपेयी