Thursday, 25 January 2018

निष्क्रिय और निरंकुश तंत्र के शिकंजे में फंसता गण

चारों तरफ  मची उथलपुथल के बीच गणतंत्र दिवस फिर आ गया। संविधान की ये वर्षगांठ यूँ तो पूरे देश के लिए आत्मगौरव की अनुभूति का अवसर होता है लेकिन इस वर्ष यह ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया है क्योंकि संविधान और उसके अधीन चलने वाली व्यवस्था पर उठ रहे चाहे-अनचाहे सवाल हर समझदार भारतीय को झकझोर रहे हैं। बीते दिनों सर्वोच्च न्यायालय के चार न्यायाधीशों द्वारा मर्यादा की लक्ष्मण रेखा लांघने के बाद संविधान की महत्ता पर जो विमर्श चला उसका हश्र भी एक बुलबुले की तरह होता दिख रहा है और यही इस देश की त्रासदी है। जातिगत आरक्षण की मांग हो या बाबा राम रहीम जैसे स्वयंभू भगवानों के पर्दाफाश पर हुआ तमाशा, हर समय व्यवस्था जिस तरह लाचार होकर दम तोड़ देती है वह खतरनाक संकेत है जिसका ताजातरीन उदाहरण पद्मावत फिल्म के विरोध स्वरूप हो रही हिंसा है। गणतंत्र में गण और तंत्र दो अलग-अलग तत्व हैं। इन दोनों के बीच समन्वय और सन्तुलन से ही शासन व्यवस्था चला करती है लेकिन हमारे देश में गणतंत्र का सन्धि विच्छेद ही नहीं अपितु सम्बन्ध विच्छेद होने की स्थिति बन गई है जिसके तात्कालिक परिणाम तो जो हैं सो हैं ही किन्तु दूरगामी नतीजे बहुत ही भयावह होने के अंदेशे से इंकार नहीं किया जा सकता। उद्देश्य किसी एक या कुछ लोगों को दोष देने का नहीं वरन भविष्य में झांकने का प्रयास है जो ऐसे अवसरों की आवश्यकता होती है। 26 जनवरी 1950 को संविधान लागू होते ही भारत अपनी मर्जी से शासन के संचालन का अधिकारी बन गया था। 15 अगस्त 1947 को राजनीतिक तौर पर आज़ादी मिली थी लेकिन जिस दिन देश का संविधान लागू हुआ उस दिन सही मायनों में हम स्वतंत्र हुए और इस कारण से 15 अगस्त जहाँ हर्षोल्लास का दिन है वहीं गणतंत्र दिवस दायित्वबोध के पुनस्र्मरण का अवसर। मौजूदा संदर्भ में देखें तो सर्वाधिक संकट में यदि कुछ है तो जिम्मेदारी का वह भाव जिसे हर कोई दूसरे पर ढाल कर दूर हो जाना चाहता है। देश की संसद से शुरू होकर गांव की पंचायत तक एक सी स्थिति है। जिसे देखो बहस में उलझा है। खुद को सही मानकर बाकी सबको गलत मानने की प्रवृत्ति का चर्मोत्कर्ष पूरे ढांचे को भीतर से कमजोर कर रहा है। यही वजह है कि सम्पर्क, संवाद, समन्वय और सौजन्यता की जगह संदेह और षडयंत्र और संघर्ष समूचे परिवेश पर अतिक्रमण कर बैठ गया है। जिस न्यायपालिका पर देश की असंदिग्ध आस्था थी वह खुद ही अपनी पवित्रता पर उंगली उठाने पर आमादा हो गई है। कानून बनाने वाले स्वयं को कानून के ऊपर मानने की सामन्ती मानसिकता ओढ़कर बैठ गए हैं। शासक और शासित के बीच बैठी नौकरशाही जिसके कंधों पर पूरे तंत्र को गतिशील बनाये रखने का दायित्व है, के गतिरोधक की भूमिका में आ जाने से सब कुछ चलता हुआ दिखने के बाद भी यदि ठहराव बना हुआ है तब ये मानकर चला जा सकता है कि स्थिति ठीक नहीं है। निहित स्वार्थ और संकीर्ण सोच से ग्रसित छोटे-छोटे समूह जिस तरह पूरे तंत्र को तहस-नहस करने में सफल हो रहे हैं उसकी प्रतिक्रियास्वरूप उसी तरह के कुकुरमुत्ते यत्र-तत्र-सर्वत्र उगते जा रहे हैं जिससे अव्यवस्था और अराजकता देश की पहिचान बनने लगे हैं। ये शुभ संकेत नहीं हैं और इनकी लगाई आग के धुएं में तमाम उपलब्धियां और सम्भावनाएं दृष्टि से ओझल हो रही हैं। सही बात ये है कि तन्त्र या तो  निष्क्रिय है या निरंकुश। उसकी वजह से अराजक तत्व तो उस पर हावी होकर अपनी मर्जी चला लेते हैं किंतु संविधान के पालन हेतु प्रतिबद्ध व्यक्ति उपेक्षित, प्रताडि़त और अपमानित होने बाध्य कर दिया जाता है। मंगल और चन्द्रयान जैसी छलांगे, मिसाइलों का सफल परीक्षण, डिजिटल तकनीक का विस्तार भले ही, मेरा देश बदल रहा है, का संकेत हों किन्तु  सच कहें तो जमीन पर हालात पूरी तरह विपरीत और निराशाजनक हैं। संविधान की वर्षगांठ ऐसे समय हो रही है जब संविधान को ठेंगे पर रखने का दुस्साहस बच्चों के खेल जैसा हो रहा है और सर्वोच्च न्यायालय जैसी संस्था का लिहाज और सम्मान भी ढलान पर है। संसद के प्रति श्रद्धा घटने के साथ ही उच्च संवैधानिक पदों की गरिमा का भी अवमूल्यन होता जा रहा है। कुल मिलाकर स्थितियां दिन ब दिन बद से बदतर होते जाना संविधान की सत्ता और महत्ता दोनों के लिए अच्छा लक्षण नहीं है। राष्ट्रीय गौरव के जश्न के मौके पर निराशाजनक बातें करना बहुतों को अटपटा लग सकता है किंतु आज भी सच्चाई से मुंह चुराया जाए तो फिर आत्मावलोकन करने का अवसर ही कहाँ है? गणतंत्र दिवस के पावन पर्व पर हर जिम्मेदार भारतीय का फर्ज है कि वह संविधान और उससे संचालित व्यवस्था के मूल भाव को समझे। सबसे बड़ी विचारणीय बात ये है कि संविधान हमें संचालित करने हेतु अधिकृत है, हम उसे अपनी मर्जी से हांकने के अधिकारी नहीं। यह अवसर केवल झंडा वंदन, परेड देखने और सजावट का नहीं वरन चिंतन और मनन का है क्योंकि संविधान की प्रस्तावना में किसी पार्टी या नेता का नाम नहीं, हम भारत के लोग, लिखा हुआ है।
                  गणतंत्र दिवस पर हार्दिक शुभकामनाओं सहित,
                                      रवीन्द्र वाजपेयी
                                          

Wednesday, 24 January 2018

दावोस : अवसर को भुनाने की सार्थक पहल

स्विट्जरलैंड के दावोस शहर में वल्र्ड इकानॉमिक फोरम में लंबे अरसे बाद पहुंचे भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुरुवाती सत्र को 50 मिनिटों तक हिन्दी में सम्बोधित करते हुए भारत के बढ़ते आत्मविश्वास का जो प्रस्तुतिकरण किया उसकी दलीय सीमाओं से उठकर प्रशंसा होनी चाहिए। राहुल गांधी द्वारा आर्थिक विषमता पर किये कटाक्ष और सागरिका घोष सदृश ऐलानिया भाजपा विरोधी पत्रकार द्वारा दावोस में प्रधान मंत्री द्वारा की जा रही भारत की मार्केटिंग के साथ करणी सेना द्वारा किये जा रहे उपद्रव को सन्दर्भित करना घरेलू राजनीति के लिहाज से भले उचित हो किन्तु श्री मोदी  जिस अंदाज में बड़ा दल साथ लेकर गए हैं उससे लगता है वे इस महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का लाभ उठाने की पूरी तैयारी में हैं। गत दिवस दिए गए प्रभावशाली संबोधन से उन्होंने ये छाप एक बार फिर छोड़ दी कि विश्व के आर्थिक परिदृष्य में भारत महज एक दर्शक नहीं अपितु रंगमंच पर आकर मुख्य भूमिका निभाने के लिए संकल्पित है। दावोस का ये फोरम कूटनीतिक दांव पेंचों के समानांतर आर्थिक विकास और व्यवसायिक मसलों पर केंद्रित रहता है। प्रधान मंत्री के साथ गए भारी भरकम प्रतिनिधिमंडल में विभिन्न वर्गों के समावेश का भी सांकेतिक महत्व है। सम्मेलन ऐसे समय हो रहा है जब बीते दो वर्षों की उथल पुथल और अनिश्चितता के बाद भारत का आर्थिक माहौल एक बार फिर विश्वास पैदा करता दिख रहा है। लगभग सभी अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थान कह रहे हैं कि 2018-19 का कारोबारी साल भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए सफलता भरा होगा। आर्थिक विकास की सम्भावनाएँ जिस तरह चीन से खिसककर भारत की तरफ  आ रहीं हैं उनको देखते हुए दावोस में श्री मोदी का जाना पूरी तरह सार्थक और फायदेमंद होने की उम्मीद की जा सकती है। निवेश के लिए दुनिया भर में इस समय भारत को सबसे अनुकूल राष्ट्र माना जा रहा है। विदेशी पूंजी जिस तेजी से आ रही है वह कारोबार में आए ठहराव को दूर करने में मददगार तो होगी ही उससे रोजगार के रास्ते में आने वाले अवरोधों का भी खात्मा होने से इंकार नहीं किया जा सकता । वल्र्ड इकानॉमिक फोरम के जरिये आर्थिक विकास की नई सम्भावनाओं को भारत की तरफ  मोडऩे में सफलता मिल सकती है। दक्षिण एशिया में भारत की उपस्थिति दिन ब दिन प्रभावशाली होते जाने से महाशक्तियों को भी चीन की बजाय भारत में सम्भावनाएँ नजऱ आने लगी हैं। आतंकवाद को पालने-पोसने में पाकिस्तान की सक्रिय भूमिका और उसकी पीठ पर चीन का हाथ होने की बात से पूरा विश्व परिचित हो चुका है। प्रधानमंत्री श्री मोदी ने जापान, मलेशिया, सिंगापुर, विएतनाम और द.कोरिया सदृश चीन विरोधी देशों से प्रगाढ़ सम्बन्ध बनाने में जो सफलता हासिल की उसने पूरे महाद्वीप का संतुलन बदलते हुए चीन के इकतरफा दबदबे को खत्म कर दिया। डोकलाम विवाद पर जिस तरह का कड़ा रवैया भारत ने दिखाया उससे भी विश्व बिरादरी आश्वस्त हुई है। इन सबका असर ये हुआ कि अब अमेरिकी लॉबी के तमाम देश भी भारत की बात सुनने और समझने के साथ उसका समर्थन करते दिख रहे हैं। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने पाकिस्तान को लेकर जो रुख अख्तियार किया उसे भी भारत के प्रभाव में वृद्धि के तौर पर देखा जा रहा है। कुल मिलाकर अनुकूल परिस्थितियों का भरपूर लाभ उठाने में सिद्धहस्त श्री मोदी ने दावोस सम्मेलन के रूप में मिले अवसर को भुनाने की जो पहल की उसके समुचित परिणाम मिलने की उम्मीद करना गलत नहीं होगा। चूंकि 2018 और 19 दोनों राजनीतिक दृष्टि से श्री मोदी के लिए जीवन मरण का प्रश्न होंगे इसलिये उनके लिए भी जरूरी है कि वे उन उम्मीदों को पूरा करने की दिशा में परिणाममूलक कदम उठाएं जो उन्होंने 2014 के पहले जगाईं थीं। तमाम विरोधाभासों और विसंगतियों के बावजूद अभी भी देश में प्रधान मंत्री के प्रति भरोसा कायम है। घरेलू एवम अंतरराष्ट्रीय सर्वेक्षणों में ये बात साबित भी होती रहती है किंतु अब चीजों को ज़मीन पर उतारने का समय आ गया है। मोदी जी में क्षमता और उत्साह की कमी नहीं है। समय का नियोजन भी वे सही-सही करते हैं और विपरीत स्थितियों में बजाय धैर्य खोने के आगे आकर सामना करने की हिम्मत दिखाते हैं। नोटबन्दी और जीएसटी जैसे जटिल निर्णय क्रमश: उप्र और गुजरात चुनाव के पहले लेना उनके अंतर्निहित साहस का बेहतरीन उदाहरण है। उनके गैर राजनीतिक आलोचक भी मानते हैं कि फिलहाल देश में कोई दूसरा नेता विकल्प बनता नहीं दिख रहा वहीं वैश्विक स्तर पर भी विकासशील देशों का अन्य कोई राजप्रमुख श्री मोदी की तरह सक्रिय,मुखर और आगे बढ़कर अवसर को लपकने की कला में पारंगत नहीं है। गणतंत्र दिवस पर सभी आसियान देशों के राजप्रमुखों को एक साथ बतौर अतिथि बुलाना प्रधानमंत्री के कूटनीतिक कौशल का परिचायक है। उसके तुरन्त बाद बजट पेश होगा। उस लिहाज से दावोस में उनकी उपस्थिति किसी महत्वपूर्ण घटनाक्रम की शुरुवात हो सकती है। यूँ भी चौकाने में श्री मोदी काफी माहिर माने जाते हैं ।

-रवीन्द्र वाजपेयी

सम्बन्धों में दरार - सत्ता से प्यार

शिवसेना यदि ऐंठ न दिखाए तो ठाकरे परिवार को भोजन हजम नहीं होता। हिंदुत्व के नाम पर 1995 से भाजपा के साथ गठबंधन में शामिल स्व. बाल ठाकरे द्वारा स्थापित यह पार्टी महाराष्ट्र में भाजपा से पीछे होने का झटका सहन नहीं कर पा रही। पिछले विधान सभा और फिर मुंबई महानगर पालिका का चुनाव दोनों अलग अलग लड़े किन्तु सत्ता मिलकर बना ली। इसके बाद भी तकरार बनी रही। भाजपा तो खैर कुछ बोलती नहीं किन्तु शिवसेना उसे उकसाने का कोई अवसर नहीं छोड़ती। गत दिवस उसका निर्णय आ गया कि 2019 का लोकसभा चुनाव वह अलग से लड़ेगी लेकिन केंद्र और राज्य की सत्ता में भागीदारी छोडऩे फिलहाल वह तैयार नहीं है। यही रवैया उसकी नाराजगी की गम्भीरता खत्म कर देता है। यदि उद्धव ठाकरे वाकई भाजपा से अलगाव चाहते हैं उन्हें सत्ता का मोह छोडऩा पड़ेगा। वैसे शिवसेना की मुसीबत ये है कि कट्टर हिन्दुत्व की छवि के चलते उसके साथ खड़े होने अन्य कोई पार्टी शायद ही राजी हो भले ही उद्धव चाहे राहुल गांधी की प्रशंसा करें या ममता बैनर्जी से मुलाकात करें।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 23 January 2018

दौलत का असमान बंटवारा : अराजकता फैलने का खतरा

आजकल रोजाना नए-नए आंकड़ों की जानकारी आती रहती है। ये भी कह सकते हैं कि अच्छी हो या बुरी, हर बात का आकलन उससे जुड़े आंकड़ों के आधार पर करने का चलन सा बन गया है। इनमें से सभी सीधे आम जनता से जुड़े हों ये जरूरी नहीं किन्तु गत दिवस आए कुछ आंकड़ों ने एक बार फिर ये सोचने बाध्य कर दिया कि विकास के जिन दावों के आधार पर भारत को विश्व की आर्थिक महाशक्ति बनाने का ढोल पीटा  जाता है और 2018 में हम चीन को पीछे छोड़कर दुनिया की सबसे तेज बढ़ती अर्थव्यवस्था बन जाने को लेकर आत्ममुग्ध हैं, वे कितने व्यवहारिक हैं? जो जानकारी प्रसारित हुई उसके मुताबिक 2017 में  देश के भीतर सम्पत्ति की जो वृद्धि हुई उसका तकरीबन तीन चौथाई अर्थात 73ज् महज उन 1ज् धनकुबेरों के पास जा पहुंचा जिनकी तिजोरियां पहले से ही लबालब थीं। ये स्थिति केवल भारत की हो ऐसा नहीं है। पूरी दुनिया पर निगाह डालें तो हालात और भी बुरे हैं। एक तरफ जहां भौतिक प्रगति की तस्वीर दिन ब दिन रंगीन होती जा रही है वहीं दूसरी तरफ  आर्थिक विषमता में भी तेजी से वृद्धि देखने मिल रही है। अन्य देशों के लिहाज से देखें तो कुछ पूरी पृथ्वी की दौलत का बड़ा हिस्सा दबाए बैठे हैं और अपने स्वार्थों की पूर्ति के हिसाब से ही आर्थिक नीतियां बनाते-बिगाड़ते हैं। ताजा आंकड़ों ने एक बार फिर ये साफ  कर दिया कि चाहे भारतीय सन्दर्भ में हो या वैश्विक , विषमता रूपी अभिशाप पीछा नहीं छोड़ रहा। अपने देश का जहां तक प्रश्न है तो आज़ादी के पूर्व शोषण के चलते आर्थिक विषमता भारतीय समाज की पहिचान थी। अंग्रेजों ने भी ज़मींदारी और सामन्ती व्यवस्था को अपने लिए अनुकूल मानकर उसका पोषण किया। परिणामस्वरूप गरीबी यथावत रही। आज़ादी के बाद पहले ज़मीदारी खत्म हुई और फिर राजा-महाराजाओं को मिले अधिकार छीनकर समाजवाद का राग अलापा गया। सीलिंग कानून बनाकर बड़े भू स्वामियों से लेकर जमीनें भूमिहीनों को देने का अभियान भी चला। गरीब और वंचित वर्ग के सर्वतोमुखी उत्थान के लिए सभी राजनीतिक दलों ने सत्ता और विपक्ष में रहते हुए अपने-अपने ढंग से भूमिका का निर्वहन किया। अर्थव्यवस्था को लेकर जितने प्रयोग बीते 70 साल में किये गए उन सभी का उद्देश्य जन साधारण की बेहतरी ही बताया गया। समाजवाद से शुरू यात्रा उदारवाद के मौजूदा मुकाम पर आ पहुँची लेकिन जिस आम जनता के नाम पर सारे प्रपंच रचे गए वह आज भी खास बनने के लिए तरस रही है। पंक्ति के अंतिम छोर पर खड़े व्यक्ति के उत्थान के लिए हर शासक  प्रयासरत दिखाई देता है किंतु  वह जहां खड़ा है वहां से आगे नहीं बढ़ पा रहा तो इसकी वजह नीतियों के क्रियान्वयन में किया गया पाखंड रहा। गत दिवस जो आंकड़े आए उनमें समृद्धि का बखान तो है लेकिन उनका बंटवारा पूरी तरह अन्यायपूर्ण होने से उन पर गौरव नहीं किया जा सकता। दूसरे शब्दों में कहें तो पुराने ज़मींदारों और सामंतों की जगह नए धनकुबेरों ने ले ली। आंकड़ों की बम्पर फसल हर वर्ष देश की प्रगति का प्रमाण पेश करती है किंतु ये प्रमाणपत्र तब फर्जी लगने लगता है जब करोड़ों लोग रोटी, कपड़ा,  मकान, शिक्षा, स्वास्थ्य और यहां तक कि शौचालय जैसी मूलभूत सुविधाओं तक से वंचित हों। यदि 2017 में देश की कुल सम्पत्ति में हुई वृद्धि का 73ज् केवल 1ज् अरबपतियों के पास चला गया तब ये कहने में कोई बुराई नहीं है कि लोकतन्त्र आज भी सही मायनों में लागू नहीं हो सका। जनता के द्वारा , जनता के लिए और जनता के कहलाने वाले तंत्र की स्थापना के 70 वर्ष बाद भी यदि आर्थिक समृद्धि और संसाधनों के वितरण में ज़मीन और आसमान जैसा अंतर हो तब कुछ कहने के लिए ही नहीं बचता। राजनीतिक दलों का समूचा चिंतन चूंकि चुनाव जीतने पर केंद्रित होकर रह गया है इसलिए वे येन केन प्रकारेण मुकाबला जीतने के लिए कुछ भी करने में नहीं हिचकते किन्तु इससे वे सपने अधूरे ही रह जाते हैं जो 15 अगस्त 1947 से प्रतिदिन देखे और दिखाए जाते रहे हैं। आंकड़ों की इस नई फसल में पैदावार तो बहुत दिखती है लेकिन पूरा माल आधुनिक ज़मींदारों के गोदामों में जमा होना और शेष जनता के हिस्से छानन-बीनन आने की जो वास्तविकता है उसे केवल नीति आयोग की रिपोर्ट और बजट पूर्व की जाने वाली आर्थिक  समीक्षा तक सीमित रख़कर आगे बढ़ जाना देशहित में नहीं होगा। जिस तरह से विघटनकारी तत्व देश के हर हिस्से में सिर उठाते दिख रहे हैं उसका एक बड़ा कारण आर्थिक विषमता भी है। साम्यवाद नामक जिस व्यवस्था ने मालिक और मज़दूर का भेद मिटाने का दावा किया वह अपनी जन्मस्थली सोवियत संघ में ही अकाल मृत्यु का शिकार हो गई। उसकी दूसरी प्रयोगशाला बना चीन तो वह भी पूंजी के मायाजाल में उलझकर रह गया। क्यूबा में साम्यवाद ने व्यक्तिगत तानाशाही के बाद वंशवादी सत्ता का रूप ले लिया जिसका वीभत्स रूप उत्तर कोरिया में भी दिखाई दे रहा है। साम्यवाद से हटकर थोड़ा नरम रूप समाजवाद के तौर पर आया लेकिन वह भी भटकाव का शिकार हो गया। जिस वैश्वीकरण को आर्थिक उदारीकरण के नाम पर पेश किया गया वह शोषण का नया संस्करण बन गया। गत दिवस आए आंकड़ों से स्पष्ट हुआ कि पूरे विश्व के संदर्भ में देखें तो भारत की स्थिति कुछ बेहतर है लेकिन विश्व की आर्थिक महाशक्ति बनने की तरफ  बढ़ रहे देश में आर्थिक विषमता की वर्तमान स्थिति को यदि नहीं सुधारा गया तो इसका दूरगामी परिणाम अराजकता के रूप में सामने आना अवश्यम्भावी है। सबका साथ, सबका विकास को चुनावी नारे की बजाय वास्तविकता में तब्दील करना समय की सबसे बड़ी जरूरत है जिसे सियासती नफे-नुकसान से ऊपर उठकर देखना चाहिए वरना गांधी,लोहिया और दीनदयाल तीनों की आत्माएं स्वर्ग में भी चैन से नहीं रह पाएंगीं ।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 22 January 2018

मप्र : चुनाव के मद्देनजर अध्यापकों पर मेहरबानी

मप्र के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने पूरे प्रदेश के आंदोलनरत अध्यापकों को सरस्वती पूजा पर जो बहुप्रतीक्षित उपहार दिया उसे मज़बूरी में की गई मेहरबानी ही कहना सही होगा। पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह शिक्षकों को गुरुजी और शिक्षा कर्मी बनाकर इस पवित्र पेशे की जो दुर्दशा कर गए थे उसे शिवराज जी ने अध्यापक नाम देकर कुछ सुधारा जरूर लेकिन उनकी नियुक्ति शहरों में नगरीय प्रशासन और ग्रामीण क्षेत्रों में पंचायत विभाग के अंतर्गत होने से शासकीय शिक्षक और अध्यापक के बीच ज़मीन-आसमान का अंतर कर दिया गया। दोनों की सेवा शर्तें, वेतन एवं अन्य सुविधाओं में काफी अंतर होने से अध्यापक वर्ग लम्बे अरसे से मांग कर रहा था कि उसे भी दूसरे विभागों से हटाकर शिक्षा विभाग के अधीन रखा जावे जिससे वे भी सरकारी शिक्षकों के समकक्ष सभी सुविधाओं के हकदार बन सकें। अध्यापकों का आंदोलन जब धीरे - धीरे जोर पकडऩे लगा और मुख्यमंत्री को महसूस हुआ कि चुनावी वर्ष में भी यदि उन्हें खुश न किया गया तो प्रदेश भर में फैले लगभग 3 लाख अध्यापक भाजपा का खेल बिगाड़ सकते हैं तब उन्होंने संविलियन की पुरानी मांग मंजूर करते हुए सभी अध्यापकों को नगरीय प्रशासन और पंचायत विभाग से निकालकर शिक्षा विभाग का हिस्सा बना दिया जिसके परिणामस्वरूप उनके वेतन और सेवा शर्तों  सहित अन्य सुविधाएं भी वर्तमान सरकारी शिक्षकों जैसी हो जाएंगी। बीते दिनों भोपाल में आंदोलनरत अध्यापिकाओं द्वारा सिर मुड़वाने के चित्र प्रसारित होने से राज्य सरकार की काफी बदनामी हुई थी। आंदोलन तेज होने के अंदेशे ने भी मुख्यमंत्री सहित पूरी भाजपा के कान खड़े कर दिए। दो दिन पहले 20 स्थानीय निकायों के चुनाव परिणामों ने भी सत्तारूढ़ खेमे की चिंताएं बढ़ा दीं। इसीलिए मुख्यमंत्री ने समय गंवाए बिना अध्यापकों को बसन्त पंचमी पर मुंह मांगी मुराद दे दी। इस निर्णय से अब अध्यापक वर्ग को भी अन्य शासकीय शिक्षकों के समान  स्थानान्तरण, मातृत्व अवकाश, वेतन वृद्धि, बीमा, पेंशन, ग्रेच्युटी, चिकित्सा व्यय और अनुकम्पा नियुक्ति के अधिकार और सुविधाएं हासिल हो जाएंगी। पद की हैसियत और तदनुरूप वेतन में भी बढ़ोतरी का लाभ तत्काल मिलने से उनके मन का असन्तोष दूर हो सकेगा जिसका सकारात्मक असर शिक्षा की गुणवत्ता के तौर पर देखे जाने की उम्मीद करना गलत नहीं होगा। यद्यपि ये कहने में कुछ भी गलत नहीं होगा कि सरकारी शिक्षक जितना वेतन पाते हैं उसकी तुलना में उनका कार्य के प्रति समर्पण और पेशे के प्रति ईमानदारी नहीं दिखती लेकिन इसका एक कारण शासन द्वारा सरकारी विद्यालयों के रखरखाव की उपेक्षा भी है। शिक्षक को मात्र एक सरकारी वेतनभोगी मानकर उससे न जाने कहाँ - कहाँ की पल्लेदारी करवाई जाती है। इसका दुष्प्रभाव शिक्षा के स्तर पर पड़े बिना नहीं रहता। लोकसभा, विधानसभा, स्थानीय निकाय, पंचायत और  सहकारिता के चुनाव अलग-अलग होने से चाहे जब चुनाव ड्यूटी और नई मतदाता सूचियां बनाने जैसी बेगारी शिक्षकों को उनके मूल दायित्व से दूर कर देती है। ऊपर से उनके बीच का वर्गभेद भी असन्तोष और कुंठा का बड़ा कारण बनता गया। शिवराज सरकार ने भले ही शिक्षा कर्मी और संविदा शिक्षक का नाम बदलकर अध्यापक कर दिया किन्तु सरकारी शिक्षकों की तुलना में वे दोयम दर्जे के ही रहे। अब चूंकि शिक्षा विभाग के अधीन आने से उनकी हैसियत शासकीय शिक्षकों के बराबर हो गई है इसलिए सरकार के लिए भी उनका नियंत्रण सुलभ हो सकेगा। अध्यापकों के नेता ने मुख्यमंत्री के निर्णय पर खुशी व्यक्त करते हुए कहा है कि शिक्षक बनकर अब अध्यापक  शिक्षा की गुणवत्ता पर ध्यान दे सकेंगे। उम्मीद की जा सकती है उनका यह आश्वासन पूरा होगा। इसी के साथ सरकार का भी ये फजऱ् बनता है कि वेतन और सुविधाओं सम्बन्धी मांगें पूरी करने के अलावा उसे सरकारी शालाओं को निजी शिक्षण संस्थानों की टक्कर में खड़ा करने पर भी ध्यान देना चाहिए। निजी विद्यालयों की मुनाफाखोरी बढऩे के पीछे भी शासकीय विद्यालयों की दुर्दशा ही प्रमुख कारण है। कई विद्यालयों में तो 50-50 हज़ार वेतन पाने शिक्षक  मक्खी मारते बैठे रहते हैं। मध्यान्ह भोजन भी सरकारी विद्यालयों में विद्यार्थियों को खींचने में असमर्थ रहता है। सर्व शिक्षा अभियान का भी अपेक्षित परिणाम नहीं निकला। शिवराज सिंह चौहान ने मप्र को कृषि के क्षेत्र में तो काफी आगे बढ़ा दिया। औद्योगिक विकास के लिए भी वे देश-विदेश में हाथ पांव मारते रहते हैं किंतु तमाम नामी गिरामी संस्थानों के आने और निजी क्षेत्र द्वारा संचालित शिक्षा के शो रूमों के बावजूद मप्र का राष्ट्रीय स्तर पर शिक्षा के क्षेत्र में यदि बड़ा नाम नहीं है तो उसके लिए शालेय स्तर के अधिकांश सरकारी शिक्षण संस्थानों की दयनीय दशा ही जिम्मेदार है। चुनाव सिर पर आने के कारण भले ही मजबूरी में मुख्यमंत्री ने अध्यापकों पर कृपा कर दी किन्तु इसके बाद उन्हें सरकार द्वारा संचालित विद्यालयीन स्तर की शिक्षा का स्तर सुधारने को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी चाहिए क्योंकि आज के युग में बिना स्तरीय शिक्षा के प्रगति और विकास के आंकड़े अर्थहीन होकर रह जाते हैं ।

-रवीन्द्र वाजपेयी