Friday, 23 February 2018

भ्रष्टाचार : शर्मनाक स्थिति


भ्रष्टाचार की तालिका में भारत का दो पायदान लुढ़ककर 81 वें स्थान पर  आना आश्चर्यचकित तो नहीं करता लेकिन शर्मिंदा अवश्य कर रहा है। बीते एक वर्ष में बजाय सुधरने के यदि स्थिति और बदतर हुई तो इससे न खाऊंगा का प्रधानमंत्री का दावा भले ही अपनी जगह हो लेकिन न खाने दूंगा वाली हुंकार हवा में उड़कर रह गई है। ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल के सर्वेक्षण का जो भी आधार रहा हो लेकिन उसे झुठलाने का नैतिक साहस इस देश में कोई भी नहीं कर सकता और यही सबसे बड़ी विडंबना है। उच्चस्तर पर विशेष रूप से केंद्र सरकार के मन्त्रियों पर अभी तक कोई दाग भले न लगा हो लेकिन राष्ट्रीय राजधानी से ग्राम पंचायत तक भ्रष्टाचार का गंदा नाला पूरे जोर से बह रहा है। भाजपा भले राम-राम जपती फिरे लेकिन उसके शासन वाले राज्यों में भी भ्रष्टाचार का नंगा-नाच देखा जा सकता है। हालिया कुछ घोटालों के कारण भी स्थिति और बिगड़ गई है। नरेंद्र मोदी ने जिस तरह शुरूवात की उससे देश को काफी उम्मीदें बंधीं थीं। उनकी सरकार ने कुछ साहसिक कदम उठाए भी किन्तु परिणाम अपेक्षानुसार नहीं आ सके। यद्यपि अभी भी लोगों को श्री मोदी की नीयत और प्रतिबद्धता पर भरोसा है लेकिन ये स्थिति हमेशा बनी रहे ये जरूरी नहीं। कुछ बड़े कर्जदारों के आसानी से देश छोड़कर भाग जाने से भी सरकार की छवि खराब हुई है। लोकसभा चुनाव के पहले तक प्रधानमंत्री कोई बड़ा चमत्कार कर देंगे ये तो नहीं लगता लेकिन भ्रष्ट लोगों को सजा दिलाने की प्रक्रिया ही यदि तेज हो जाये तो लोगों को संतोष हो जाएगा। फिलहाल तो स्थिति अच्छी नहीं है।

-रवीन्द्र वाजपेयी

न्यायपालिका में टकराव लोकतंत्र के लिए बड़ा खतरा

दूसरों का विवाद निबटाने वाले जब खुद ही विवादों को जन्म देने लगें तब स्थिति विचारणीय के साथ चिंताजनक भी हो जाती है। सर्वोच्च न्यायालय में प्रधान न्यायाधीश के विरुद्ध चार न्यायाधीशों द्वारा खुलकर मैदान में आने के बाद काफी दिनों तक न्यायपालिका के भीतर की अव्यवस्थाओं और विसंगतियों पर देश भर में बौद्धिक चर्चा चली। प्रधान न्यायाधीश की कार्यप्रणाली पर उनके सहयोगी न्यायाधीशों द्वारा जिस तरह उंगलियां उठाई गईं वह अभूतपूर्व घटना थी। चूँकि न्यायाधीशों पर आम सरकारी मुलाजिम की तरह अनुशासनात्मक कार्रवाई नहीं की जा सकती इसीलिये अपने से वरिष्ठ प्रधान न्यायाधीश के खिलाफ  सार्वजनिक रूप से जुबान चलाने वाले न्यायाधीश अपने पद पर बने हुए हैं। अतीत में जब-जब भी न्यायपालिका के उच्च स्तर कोई विवाद या असहमति जैसी बात हुई तो नाराज न्यायाधीश स्तीफा देकर अलग हो गए किन्तु चार वरिष्ठ न्यायाधीशों ने वैसा नहीं किया। मेल-मुलाकात और मध्यस्थता के बाद ऐसा लगा मानो बात आई गई होकर रह गई किन्तु काफी दिनों की शांति के बाद गत दिवस फिर एक वाकया हो गया जिसने न्याय की सर्वोच्च संस्था के भीतर की खींचातानी और तनाव को सतह पर ला दिया। भूमि अधिग्रहण सम्बन्धी तीन न्यायाधीशों की पीठ द्वारा दिये गए निर्णय को तीन न्यायाधीशों की दूसरी पीठ ने पलटकर बड़ी पीठ को भेजने का आदेश सुना दिया तो पहले वाली पीठ के कुछ न्यायाधीशों को ये नागवार गुजरा और उन्होंने खुद को उस मामले से अलग करने हेतु प्रधान न्यायाधीश को अर्जी भेज दी। जिस पीठ ने पहले वाली पीठ के फैसले पर पानी फेरा उसके दो न्यायाधीश वे ही हैं जिन्होंने प्रधान न्यायाधीश के विरुद्ध बगावत का बिगुल फंंूका था। ज़ाहिर है दोनों पीठों में शामिल न्यायाधीश भी पिछले झगड़े से सीधे अथवा अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े रहे थे। इस ताजा विवाद से स्पष्ट है कि न्यायपालिका के भीतर भी अहं, वर्चस्व और प्रतिष्ठा की वैसी ही लड़ाई चल पड़ी है जो सामाजिक जीवन के प्रत्येक क्षेत्र की स्थायी पहिचान बन गई है। लेकिन न्यायपालिका कोई साधारण सरकारी महकमा नहीं है जहां इस तरह की रस्साखींच को नजरअंदाज किया जाता रहे। न्यायाधीशगण उनके समक्ष विचारार्थ आए मसलों पर  अपनी बात खुलकर कहते हैं। यहां तक कि वे सरकार की आलोचना करने से भी बाज नहीं आते। विगत दिवस मुंबई उच्च न्यायालय के एक न्यायाधीश ने टिप्पणी कर डाली कि नेता कोई भगवान नहीं हैं। नौकरशाहों की नाक में भी नकेल डालने में न्यायाधीश नहीं हिचकते। आम जनता को ये देखकर अच्छा भी लगता है। व्यवस्था को पटरी पर लाने के न्यायपालिका के प्रयासों को देश के जनमानस का भी समर्थन हासिल है। यद्यपि कुछ मामलों में अत्यधिक न्यायिक सक्रियता अनधिकार चेष्टा भी लगती है। विधायिका और कार्यपालिका के साथ उसके टकराव की स्थिति भी कई मर्तबा बनी लेकिन इस सबके बाद भी न्यायपलिका की श्रेष्ठता और सर्वोच्चता पर लोगों का विश्वास और श्रद्धा बनी रही किन्तु हालिया घटनाओं के बाद स्थिति में बदलाव आया है। न्यायपालिका में भ्रष्टाचार और आपसी खींचातानी के कई प्रकरण देश के सामने आ चुके हैं। फिर भी न्याय की आसंदी की छवि बरकरार रही पर अब ऐसा नहीं है क्योंकि न्यायपालिका के दामन पर कीचड़ उछालने का दुस्साहस वे लोग ही कर रहे हैं जिनके कंधों पर उसकी पवित्रता को बनाए रखने का दायित्व है। सर्वोच्च न्यायालय के जो न्यायाधीश मौजूदा विवाद में शामिल अथवा उसके कारण हैं वे सभी न तो सही हैं और न ही गलत किन्तु इस स्थिति को हमेशा तो जारी नहीं रखा जा सकता। वरना सर्वोच्च न्यायालय की गरिमा तार-तार होते देर नहीं लगेगी। प्रतिबद्ध न्यायपालिका की बात भी इंदिरा जी के समय उठी थी लेकिन देश ने उसे सिरे से नकार दिया किन्तु अब तो उच्छश्रृंखल न्यायपालिका की स्थितियां निर्मित होती दिख रही हैं जो देश में नई तरह की अराजकता का आधार बन सकती हैं। समय रहते इसे न संभाला गया तो आने वाले समय में स्थिति और बिगड़ेगी। बेहतर हो उसके पहले राष्ट्रपति और हो सके तो संसद इस बारे में समुचित कदम उठाए वरना लोकतंत्र का यह महत्वपूर्ण स्तम्भ पूरी इमारत को धराशायी करने की वजह बन जायेगा ।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 22 February 2018

दो उपचुनाव:मप्र की भावी सियासत तय करेंगे


मप्र की मुंगावली और कोलारस विधानसभा सीटों पर उपचुनाव हेतु प्रचार आज बन्द हो जाएगा। 24 फरवरी को मतदान होना है। कांग्रेस विधायकों की मृत्यु के कारण हो रहे उपचुनाव में जीतने के लिए एक तरफ  तो कांग्रेस के क्षेत्रीय सांसद ज्योतिरादित्य सिन्धिया मोर्चा संभाले हुए हैं वहीं भाजपा की कमान मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के हाथ में है। विधानसभा चुनाव के आठ माह पूर्व हो रहे ये चुनाव हांडी के चावल माने जा रहे हैं। इसलिए दोनों प्रमुख दल किसी भी सूरत में इन्हें जीतना चाहते हैं। कांग्रेस की सीटें होने से श्री सिंधिया इन्हें जीतने के लिए दिन-रात एक करने में जुटे हैं वहीं श्री चौहान की कोशिश है कि कम से कम एक सीट छीनकर वे कांग्रेस पर मनोवैज्ञानिक दबाव बना पाए तो वर्ष के अंत में होने वाले विधानसभा चुनाव में उनकी राह आसान होगी। ज्योतिरादित्य के लिए भी मुंगावली और कोलारस जीतना जरूरी हो गया है क्योंकि एक भी हारे तो मुख्यमंत्री उम्मीदवार की दावेदारी में वे पिछड़ जाएंगें। राज्य में हुए पिछले सभी उपचुनावों में एक-दो को छोड़कर शेष भाजपा ने जीते जिसका श्रेय शिवराज सिंह के खाते में आया किन्तु वर्तमान माहौल मुख्यमंत्री और भाजपा दोनों के लिए पहले समान अनुकूल न होने से मुकाबला बेहद कड़ा हो गया है। प्राप्त संकेतों के मुताबिक तो कांग्रेस 2013 के चुनाव में लम्बे अंतर से मिली जीत के कारण सफलता के प्रति आश्वस्त है वहीं भाजपा पूरी तरह मुख्यमंत्री पर निर्भर होकर रह गई है। महाराज और मुख्यमंत्री के बीच सिमटे इस मुकाबले के परिणाम से  राज्य की भावी राजनीति की तस्वीर काफी कुछ समझ में आ जाएगी।

-रवीन्द्र वाजपेयी

माहौल सही हो तो निवेशक खुद आ जाएंगे

उप्र में हुए निवेशक सम्मेलन में उपस्थित उद्योगपतियों द्वारा की गईं घोषणाओं को सुनकर ऐसा लग रहा है मानों उन सबके लिए उद्योग-धंधे के लिए इससे बेहतर प्रदेश कोई दूसरा नहीं होगा। कई लाख करोड़ के निवेश के ऐलान से उप्र के आर्थिक कायाकल्प का जो सपना दिखाया जा रहा है यदि वह साकार हो सके तो सबसे अधिक आबादी वाले इस प्रदेश की किस्मत का दरवाजा खुलते देर नहीं लगेगी। उद्योगपतियों ने योगी सरकार के निमंत्रण पर जो दरियादिली दिखाई उसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी अपना योगदान देते हुए बुन्देलखण्ड में रक्षा उत्पादन गलियारा बनाने हेतु 20 हजार करोड़ की सौगात दे डाली। औद्योगिक दृष्टि से पिछड़ चुके उप्र को विकसित राज्यों की कतार में लाकर खड़ा करने के लिए मुख्यमंत्री योगी का महत्वाकांक्षी प्रयास उनके उत्साह का परिचायक है किन्तु निवेशक सम्मेलनों को लेकर जितने ढोल पीटे जाते हैं उतना होता नहीं है। वही उद्योगपति विभिन्न राज्य सरकारों के निमंत्रण पर पहुंचकर अतिथि धर्म का निर्वहन करते हुए मंच से घोषणाओं के अम्बार लगा देते हैं, जिससे उनकी आवभगत में लगी सरकार गदगद हो जाती है और जनता भी जागती आंखों से विकास के ख्वाब देखने में मगन हो उठती है। प्रधानमंत्री श्री मोदी जब गुजरात के मुख्यमंत्री थे तब वे तो वैश्विक स्तर के निवेशक सम्मेलन आयोजित कर वाइब्रेंट गुजरात का नारा गुंजाया करते थे। उनकी कोशिशों से गुजरात का औद्योगिक उत्थान भी खूब हुआ लेकिन अन्य राज्य निवेशक सम्मेलनों से उतना लाभ नहीं ले सके तो उसकी वजह वहां की निकम्मी प्रशासनिक व्यवस्था है जो निवेशकों को खून के आंसू रुला देती है। उदाहरण के लिए मप्र को ही लें तो मुख्यमन्त्री  शिवराज सिंह चौहान द्वारा आयोजित निवेशक सम्मेलनों में जितनी ताबड़तोड़ घोषणाएं हुईं उनकी 25 प्रतिशत भी अगर कार्यरूप में परिणित होतीं तब मप्र औद्योगिक प्रगति की राह पर अग्रणी हो गया होता। सही बात तो ये है कि निवेशक सम्मेलन में आने वाले उद्योगपति मुख्यमंत्री के निजी निमन्त्रण का मान रखते हुए आ तो जाते हैं और मेज़बान को खुश करते हुए धड़ाधड़ उद्योग लगाने का ऐलान भी कर देते हैं किंतु उसके बाद जब असल काम शुरू होता है तब सारे आश्वासन टाँय-टाँय फिस्स होकर रह जाते हैं। उदाहरण के लिए शिवराज सरकार के पिछले कार्यकाल के दौरान जबलपुर में निवेशक सम्मेलन आयोजित हुआ था। प्राप्त जानकारी के मुताबिक उस पर तकरीबन 20 करोड़ रु. खर्च हुए। कुमार मंगलम बिरला सदृश उद्योगपति उसमें शरीक हुए थे। करोड़ों-अरबों की घोषणाएँ हुईं। ऐसा लगा मानों औद्योगिक तौर पर पिछड़े इस इलाके का भाग्योदय हो जाएगा। लेकिन लगभग एक दशक बीत जाने के बाद भी स्थिति ये है कि जितना खर्च उस आयोजन पर हुआ उतने का भी निवेश यहां नहीं आया। इंदौर - देवास के आसपास तो औद्योगिक विकास का माहौल पहले से ही था इसलिए वहां तो काफी निवेश आया भी और कुछ लाभ राजधानी होने से भोपाल के हिस्से में भी चला गया किन्तु प्रदेश के अन्य हिस्से आज तक निवेश के लिये तरस ही रहे हैं। केवल मप्र के साथ ऐसा नहीं हुआ अपितु अन्य राज्यों में सम्पन्न निवेशक सम्मेलनों से भी विशेष उपलब्धि देखने नहीं मिली। इसकी वजह वहाँ औद्योगिक विकास का वातावरण नहीं होना रहा। निवेशकों  को बुलाकर पूंजी निवेश हेतु प्रेरित करना बुरा नहीं है किंतु उद्योगों को बढावा देने हेतु यदि पारदर्शी नीति, मूलभूत सुविधाएं, न्यूनतम सरकारी औपचारिकताएं और ईमानदार नौकरशाही रहे तब घूम-घूमकर उद्योगपतियों को न्यौता देने की जरूरत नहीं पड़ेगी। जिन राज्यों में उक्त सभी बातों पर ध्यान दिया गया उनमें स्वाभाविक रूप से निवेश हुआ। कई क्षेत्रों में नेताओं के प्रभाव अथवा दबाव से कारखाने वगैरह लगे भी तो कुछ समय बाद बन्द हो गए। अमेठी और रायबरेली इसके उदाहरण हैं। योगी सरकार ने जो निवेशक सम्मेलन किया उसमें चूंकि खुद प्रधानमंत्री ने सक्रियता दिखाई इसलिए हो सकता है अधिकतर घोषणाएं जमीन पर भी उतरें लेकिन ऐसे सम्मेलनों का अब तक का तजुर्बा बहुत अच्छा नहीं कहा जा सकता। कई राज्यों ने एसईजेड बनाकर बड़े औद्योगिक घरानों को बेशकीमती ज़मीनें दीं थी किन्तु उनका समुचित उपयोग नहीं हो सका। कुल मिलाकर जब तक औद्योगिक विकास हेतु सम्बन्धित सरकार की नीति और नियत में एकरूपता न हो तो निवेशक सम्मेलन भी आए, बैठे, खाए, पिए, खिसके का एहसास दिलाने वाले साबित होते हैं ।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 21 February 2018

नेता बिरादरी को भी आत्मावलोकन की जरूरत

हफ्ते भर आलोचना झेलने के बाद वित्तमंत्री अरुण जेटली ने जुबान खोली और पंजाब नेशनल बैंक घोटाले के संदर्भ में बैंक प्रबंधन और आंतरिक तथा बाह्य ऑडिटर्स की लापरवाही के साथ ही बिना नाम लिए रिजर्व बैंक की कमजोर नजर पर भी कटाक्ष किये। वित्त मंत्री का ये प्रश्न गलत नहीं है कि काम करने की स्वायत्तता के बावजूद बैंक प्रबंधन ने अपनी भूमिका का निर्वहन सही तरीके से क्यों नहीं किया? ऑडिट करने वाले चार्टर्ड अकाउंटेंट को आत्मावलोकन की सलाह देते हुए श्री जेटली ने बैंक के आंतरिक और बाहरी ऑडिटर्स पर भी आक्षेप लगाया जो इतने वर्षों से चले आ रहे इतने बड़े घोटाले को सूंघ नहीं सके। रिजर्व बैंक नियमित रूप से विभिन्न बैंकों की शाखाओं का ऑडिट करवाता है। उस दौरान भी पंजाब नेशनल बैंक में चल रहे घोटाले पर नजर नहीं जाने पर भी वित्त मंत्री ने जो तंज कसा वह बेमानी नहीं है। श्री जेटली ने नीरव मोदी कांड उजागर होने के इतने दिनों बाद मुंह खोला तो उसमें दोषियों को पकड़कर लाने और डूबन्त रकम की वसूली जैसा आश्वासन देने के बजाय बैंक प्रबंधन, ऑडिटर्स और रिजर्व बैंक पर ही पूरी जिम्मेदारी थोप दी। वित्त मंत्री शायद ऐसा न कहते यदि  प्रधानमंत्री और उन पर चौतरफा हमले न हुए होते। विजय माल्या मामला तो सीधे-सीधे कर्ज वसूली नहीं हो पाने का था लेकिन नीरव  मोदी कांड में बैंक और ऑडिट करने वाले बैंक अधिकारी और चार्टर्ड अकॉउंटेंट सहित रिजर्व बैंक की अनदेखी की ही भूमिका रही। जिन एलओयू  (लैटर ऑफ अंडरटेकिंग) के जरिये 11300 करोड़ का घोटाला होता रहा उन्हें यदि बैंक के सम्बन्धित अधिकारियों ने रिकॉर्ड पर नहीं लिया तो ये सीधे-सीधे अपराधिक षड्यंत्र की परिधि में आता है। लेकिन इस घोटाले में चूँकि अन्य बैंक भी शामिल थे इसलिए ये बात बेहद रहस्यमय लगती है कि किसी ने भी समूचे लेनदेन पर न निगाह रखी और न ही सन्देह व्यक्त किया। रिजर्व बैंक भी अपने तरीके से विभिन्न बैंकों के अलावा बड़े कारोबारियों की गतिविधियों पर निगाह रखता है। शेयर बाज़ार की उठापटक पर भी उसका ध्यान रहता है। इस लिहाज से श्री जेटली  द्वारा उठाए सवाल न तो अप्रासंगिक हैं और न ही अनावश्यक क्योंकि उनके जरिये उन्होंने देश भर में फैली ऑडिट व्यवस्था को जिस तरह कठघरे में खड़ा कर दिया वह महत्वपूर्ण है। कुछ समय पूर्व चार्टर्ड अकाउंटेंट्स के अखिल भारतीय सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि सीए के हस्ताक्षर प्रधानमंत्री के दस्तखत  से भी अधिक शक्तिशाली होते हैं। ऐसा कहकर उन्होंने पूरी सीए बिरादरी को उसके कर्तव्यबोध से अवगत कराया था। इसमें दो मत नहीं है कि जितने भी बड़े आर्थिक घोटाले होते हैं उनके पीछे कहीं प्रत्यक्ष तो कहीं परोक्ष रूप से चार्टर्ड अकाउंटेंट्स की भूमिका रहती है क्योंकि किसी भी व्यवसायिक प्रतिष्ठान की पूरी कुंडली वही बनाते हैं। आयकर महकमा भी उनके द्वारा प्रमाणित हिसाब-किताब को मान्य करता है। बैंक अथवा ऋण देने वाला कोई भी अन्य वित्तीय संस्थान सीए द्वारा बनाई प्रोजेक्ट रिपोर्ट के आधार पर ही निर्णय करता है। बैंकों की अपनी ऑडिट व्यवस्था के साथ बाहरी ऑडिट भी सीए द्वारा करवाया जाता है और इनके अतिरिक्त रिजर्व बैंक भी समय-समय पर अपने ऑडिटर्स भेजता है। इतनी सघन जांच के बाद भी अगर घोटाले होते हैं तो व्यवस्था में कमी अथवा खुल्लमखुल्ला भ्रष्टाचार ही इसकी वजह है। नीरव मोदी के पहले भी इस जैसे जितने कांड हुए उनमें बैंक और सीए दोनों की संगामित्ति सामने आई थी। पंजाब नेशनल बैंक के कई अधिकारी अब तक पकड़े जा चुके हैं। लेकिन बड़ी मछलियां अब भी जाल से बाहर हैं। हो सकता है जांच एजेंसियां फूंक  -फूंककर कदम रख रही हों लेकिन वित्त मंत्री ने जिन-जिन पर निशाना साधा है उन सभी की भूमिका की जांच के साथ ही इस बात पर राष्ट्रव्यापी मंथन होना चाहिये कि जिन पर गलती पकडऩे का दायित्व और अधिकार दोनों हैं वे ही यदि लापरवाह हो गए अथवा उसी गलती के हिस्से बन गए तो फिर व्यवस्था को चरमराने से कौन और कैसे रोक सकेगा?  यद्यपि पूर्ववर्ती और वर्तमान  सरकार ऐसे प्रकरणों में खुद को बेदाग बताकर पूरा ठींकरा दूसरों पर फोड़कर स्वयं को बाइज्जत बरी कर लें ये भी न्यायोचित नहीं होगा किन्तु  वित्तमंत्री श्री जेटली ने जो मुद्दा छेड़ा वह नीरव मोदी कांड के अलावा भी विचारणीय है क्योंकि वित्तीय घोटाले कोई डकैती तो हैं नहीं  कि पिस्तौल की नोंक पर लूटपाट हो जाए। वर्षों पूर्व जब पहला घोटाला हुआ तब ही यदि जांच और दंड प्रक्रिया में गम्भीरता बरती गई होती तब शायद घोटालेबाजों का हौसला इतना बुलन्द न हुआ होता। स्थितियों को इतना  खराब करने के लिए राजनीतिक बिरादरी की भूमिका भी कम जिम्मेदार नहीं है। बेहतर होता श्री जेटली उस पर भी उंगली उठाते। विपक्ष उनकी सरकार पर जबर्दस्त हमले कर रहा है। माल्या, नीरव और कोठारी जैसे घोटालेबाजों के कारनामे बिना सियासी संरक्षण के होते रहे ये कोई नहीं मान रहा। वित्तमंत्री ने जिन-जिन पर तोहमत लगाई वे तो वाकई कसूरवार हैं ही, लेकिन सरकार में बैठे पूर्व और वर्तमान महानुभाव भी अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकते क्योंकि भ्रष्टाचार का असली स्रोत तो राजनीति ही है। श्री जेटली में यदि साहस है तो वे ऐसे प्रकरणों में सरकारी स्तर पर होने वाली चूक का खुलासा भी करें। जिस दिन वे ऐसा कर देंगे उस दिन से विश्वास का संकट भी कम होने लगेगा। दरअसल आत्मावलोकन की सबसे ज्यादा जरूरत तो इस देश के राजनीतिक नेताओं को है, फिर चाहे वे सत्ता में हों या विपक्ष में।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 19 February 2018

छोटे कर्जदार परेशान : अरबपतियों पर बैंक मेहरबान

नीरव मोदी सीनाजोरी पर उतर आए हैं। उन्होंने पंजाब नेशनल बैंक को खुले शब्दों में  बता दिया कि डूबन्त रकम वसूल करने की उसकी क्षमता समाप्त हो चुकी है क्योंकि बैंक प्रबंधन ने जल्दबाजी में जो कदम उठाए उनकी वजह से उनके ब्रांड की छवि पूरी तरह से मिट्टी में मिल गई। स्मरणीय है घोटाला उजागर होने के बाद नीरव ने आश्वस्त किया था कि वह अपने ब्रांड की साख को बेचकर बैंक की रकम अदा कर देगा लेकिन उसने जो नया पैंतरा दिखाया उसमें तो बैंक को ही कटघरे में खड़ा कर दिया गया है। नीरव ने बिना लागलपेट के बता दिया कि उसने बैंक को धैर्य रखने कहा था किंतु हड़बड़ाहट करते हुए पहले तो पंजाब नेशनल बैंक ने प्रकरण को सार्वजनिक कर दिया। उसके बाद समाचार माध्यमों ने जिस बेरहमी से पूरे मामले की शल्य क्रिया की उससे वह और बिगड़ गया। बची-खुची कसर पूरी कर डाली प्रवर्तन निदेशालय और आयकर छापों ने जिससे उसका देशव्यापी कारोबार चौपट हो गया। इन सबके परिणामस्वरूप उसका पूरा व्यवसाय ठप हो गया। नीरव ने एक बात और भी कही कि बैंक द्वारा प्रचारित 11300 करोड़ की राशि अतिरंजित है और उस पर केवल 5 हजार करोड़ की देनदारी है। शायद उसे लग रहा होगा कि बैंक की शिकायत पर की गई छापेमारी में जप्त की गई चल-अचल -सम्पत्ति से ही बैंक की रकम वसूल हो जाएगी। नीरव यदि देश में ही रहता तब उसकी सफाई पर एकबारगी यकीन भी किया जाता किन्तु मामला उजागर होने के पूर्व ही सपरिवार पलायन ने उसके इर्दगिर्द बने सन्देह के घेरे को और गहरा कर दिया है। ऐसे ही आरोप विजय माल्या ने भी बैंकों पर लगाए थे। वह भी ये भरोसा दिलाता रहा कि बैंकों का पूरा पैसा लौटा देगा लेकिन लंदन में बैठकर गिरफ्तारी के विरुद्ध कानूनी लड़ाई लडऩे के उसके तौर-तरीकों से स्पष्ट है कि माल्या की नीयत में ही खोट है। जैसी बातें माल्या प्रकरण में निकलकर आईं ठीक वही सब नीरव को लेकर ज्ञात हो रही हैं। माल्या ने भी आरोप लगाया था कि वह कर्ज देने वाले बैंकों के साथ समझौता करने को तैयार था लेकिन उनके अडिय़लपन ने खेल बिगाड़ दिया। जानकार सूत्रों का कहना था कि माल्या ने कर्ज की मूल राशि चुकाने का प्रस्ताव देते हुए ब्याज में छूट की मांग रखी थी। पूर्व में भी विभिन्न बैंकों ने डूबते हुए कर्ज की वसूली में ब्याज छोड़कर मूलधन पर संतोष कर लिया था जिसे आधार बनाकर माल्या भी वैसी ही सुविधा चाह रहा था लेकिन अपनी गर्दन बचाने के लिए बैंक प्रबंधन ने उसकी गर्दन जोर से दबाने की कोशिश ज्योंही की त्योंही वह फुर्र हो गया। नीरव के मामले में भी वही सब दोहराए जाने की बात निकल रही है। मसलन वह बैंक से मिलकर बीच का रास्ता निकालने के लिए प्रयासरत था लेकिन सफलता नहीं मिली तो गिरफ्तारी से बचने देश छोड़कर चल दिया। उसके भागने के बाद की गई कड़ी कार्रवाई ने उसके विशाल आर्थिक साम्राज्य की ईंटें हिलाकर रख दीं। इन दोनों प्रकरणों में एक बात स्पष्ट हो गई कि बैंकों से बड़े कर्ज लेकर कारोबार करने वालों की गतिविधियों पर नजर रखने की कोई प्रणाली हमारे देश में नहीं है। ताजा खबरों के अनुसार देश के तमाम धनकुबेरों ने विदेशी नागरिकता ले रखी है। सबका मकसद कर्ज लेकर फरार होने का भले ही न हो लेकिन इसे साधारण समझकर उपेक्षित कर देना भी ठीक नहीं होगा। माल्या और नीरव प्रकरण के बाद अब भारत सरकार के लिए जरूरी हो गया है कि वह उन बड़े कारोबारियों की पूरी जानकारी हासिल करे जो भारतीय बैकों अथवा सरकारी एजेंसियों से न सिर्फ  करोड़ों-अरबों का कर्ज ले चुके हैं अपितु उसका बड़ा हिस्सा विदेशों में बतौर अचल संपत्ति निवेश भी कर रखा है। बैंक प्रबन्धन को भी समय-समय पर ये देखना चाहिये कि उसके द्वारा दिए कर्ज का बड़े उद्योगपति सही जगह उपयोग कर रहे हैं या नहीं? उक्त दोनों मामलों के अलावा कानपुर के एक और धनकुबेर कोठारी की करतूत प्रकाश में आ गई। यद्यपि वह देश छोड़कर नहीं गया लेकिन उस पर भी अरबों रु.पचा जाने का आरोप है। मोटी-मोटी जानकारी के अनुसार भारत के लगभग सभी बैंकों का जो पैसा बड़े कर्जदारों के पास फंसा पड़ा है उसी की वजह से बैंकिंग प्रणाली बैसाखियों पर चलने मज़बूर हो चुकी है। अर्थव्यवस्था को लग रहे हिचकोलों के लिए भी डूबन्त कर्ज बड़ी वजह माने जा रहे हैं। राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से परे हटकर सोचें तो पूरे देश में इस बात पर गुस्सा है कि बैंक और सरकार छोटे और मध्यम श्रेणी के कर्जदारों पर तो वसूली में सीमा से बाहर जाकर भी सख्ती करते हैं वहीं करोड़ों-अरबों डकार जाने वालों के प्रति सौजन्यता बरती जाती है और उन्हें विदेश भाग जाने का भरपूर अवसर भी दिया जाता है। इन प्रकरणों में बैंक अधिकारियों के साथ उच्चस्तर के प्रबंधन की भूमिका भी संदिग्ध होती जा रही है क्योंकि इतने बड़े कर्ज बिना संचालक मण्डल की स्वीकृति के नहीं दिए जा सकते। कुल मिलाकर भगोड़े कर्जदारों से बिना किसी भी तरह की सहानुभूति रखे कहा जा सकता है कि ऐसे प्रकरणों को सही समय पर निपटाने में जो लापरवाही बरती गई ये उसी का नतीजा है। आगे ऐसा न हो इसकी पुख्ता व्यवस्था करना जरूरी है वरना बैंकों से कर्ज लेकर न चुकाने वालों का हौसला बुलन्द होता जाएगा। ये विडम्बना ही है कि कर्ज में डूबे किसानों द्वारा आत्महत्या की खबरें तो नित्यप्रति आती रहती हैं लेकिन अरबों का कर्ज लेने वाले देश छोड़कर विदेशों में विलासितापूर्ण जीवन बिताते हुए पूरी व्यवस्था को ठेंगा दिखाते हैं।

-रवीन्द्र वाजपेयी