Tuesday, 27 March 2018

बंदरों के हाथ से उस्तरा छीनो वरना .......


एक तरफ तो सब कुछ डिजिटल करने की होड़ मची है और आधुनिक दिखने के फेर में ऑन लाइन होने के इंतजाम किए जा रहे हैं लेकिन दूसरी तरफ  सारी कवायद डाटा चोरी के चलते अपराधबोध का कारण बनती जा रही है। भाजपा द्वारा कांग्रेस पर कैम्ब्रिज एनालिटिका नामक फर्म की सेवाएं लेने का आरोप लगाने के बाद राहुल गांधी ने पलटवार करते हुए आरोप मढ़ दिया कि प्रधानमंत्री के नाम पर बने नमो एप से सूचनाएं विदेश भेजी जाती हैं। भाजपा ने इसका खण्डन करते हुए पहले तो राहुल और कांग्रेस दोनों पर अल्पज्ञानी होने की तोहमत लगाई और फिर कांग्रेस के अधिकृत एप  विद आईएनसी पर उपलब्ध जानकारी सिंगापुर के रास्ते देश से बाहर भेजे जाने का आरोप उछाल दिया। नमो नामक एप के बारे में लगाए आरोप को सिद्ध करने के पहले ही अपने दामन पर उछली कीचड़ से सनाके में आए राहुल ने आनन-फानन में कांग्रेस के एप को बंद करवा दिया।  ये कार्रवाई आरोप के सही होने की वजह से की गई या इसके पीछे झंझट से बचने की रणनीति थी ये तो स्पष्ट नहीं हो सका लेकिन इस विवाद से एक बात जरूर सामने आ गई कि देश की दोनों प्रमुख राजनीतिक पार्टियां तकनीक को अपनाने के प्रति जितनी उत्साहित हैं उतना ही उसके उपयोग में बरती जाने वाली सावधानियों को लेकर उदासीन भी हैं। डाटा चोरी और हैकिंग, इंटरनेट के समानांतर चलने वाला व्यवसाय है।  इसमें अपराधी तत्व भी शामिल हैं और पेशेवर भी। व्यक्तिगत और संस्थागत दोनों स्तरों पर ये विश्वव्यापी कारोबार चल रहा है।  जहां तक प्रश्न नमो और विद आईएनसी एप के डाटा को विदेश भेजने का सवाल है तो जांच का विषय ये है कि क्या ये काम  सुनियोजित  तरीके से हो रहा है या फिर उसके पीछे डाटा चोरी करने वाले गिरोह की भूमिका है। ये भी उजागर होने चाहिए कि जो जानकारी विदेश गई या भेजी गई उससे हमारे राष्ट्रीय हित और चुनाव प्रक्रिया पर क्या असर पड़ सकता है? खबर है नमो एप में डेटा की सुरक्षा हेतु अतिरिक्त प्रबंध किए जा रहे हैं।  राहुल के निर्देश पर कांग्रेस ने तो अपना अधिकृत एप ही बन्द करवा दिया जिससे लगता है वह या तो घबरा गई या पकड़े जाने के डर से उसने वैसा किया।  असलियत जो भी हो लेकिन डाटा की चोरी अथवा व्यापार के इन आरोपों-प्रत्यारोपों के बीच जो सबसे बड़ी बात हो रही है वह है राजनीतिक दलों की लापरवाही।  सही बात तो ये है कि जिस तरह सरकारी दफ्तरों में कम्प्यूटर और इंटरनेट लगा तो दिए गए किन्तु मौजूदा स्टाफ प्रशिक्षण के बाद भी उनका उपयोग करने में उतना पारंगत नहीं है जितना जरूरी है।  यही स्थिति कमोबेश राजनीतिक दलों की भी है जिन्होंने आईटी सेल बना तो दिए लेकिन उनमें जिन लोगों की नियुक्ति होती है उनमें से अधिकतर अकुशल श्रमिक की तरह होते हैं। उसी का परिणाम ये हुआ कि भाजपा और कांग्रेस दोनों डाटा चोरी के आरोपों में फंसते ही पिछले पाँव पर खड़े होने मज़बूर हो गए। राहुल के आरोप पर भाजपा ने उनके अज्ञानी होने की बात उछाली तो उन्होंने जिस तेजी से पार्टी का एप बंद करवाया उससे शक की सुई लटकना स्वाभाविक है। नमो एप संबंधी जो सन्देह व्यक्त किया गया उस पर भी स्पष्टीकरण आना ही चाहिए क्योंकि बात प्रधानमंत्री से जुड़ी है। बहरहाल भाजपा-कांग्रेस दोनों को इस बारे में गंभीरता से पेश आना चाहिए क्योंकि ये महज राजनीतिक लाभ लेने तक सीमित रहने वाला विषय न होकर बेहद संवेदनशील है। दोनों दलों की देश की सत्ता में हिस्सेदारी रही है।  निश्चित रूप से  विदेशी शक्तियों को इन दलों में रुचि रहती है और इसके लिए वे डाटा चोरी भी करती हैं और इन पार्टियों में अपने सम्पर्कों के जरिये भी जानकारी एकत्र कर लेती हैं।  ये देखते हुए भाजपा और कांग्रेस दोनों के शीर्ष नेतृत्व को चाहिये वह बंदरों के हाथ में उस्तरे देने से बचे वरना किसी दिन ऐसी स्थिति बन सकती है जिसमें मुंह छिपाना मुश्किल हो जाएगा।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 26 March 2018

क्रिकेट : जीत के जुनून और पैसे की हवस का शिकार

क्रिकेट को भद्र पुरुषों का खेल मानने की धारणा को एक बार फिर ठेस पहुंची है। द.अफ्रीका के साथ केपटाउन में चल रहे टेस्ट मैच में ऑस्ट्रेलियाई टीम के एक खिलाड़ी द्वारा गेंद को खुरचने जैसा कृत्य कैमरे में कैद हो जाने से बवाल मच गया। पूरी दुनिया में उक्त दृश्य टीवी के जरिये करोड़ों क्रिकेट प्रेमियों ने देखा। हर कोई उस घटिया हरकत पर ऑस्ट्रेलियाई टीम को कोसता दिखा। आईसीसी ने कठोर रुख अपनाते हुए तत्काल टीम के कप्तान स्टीव स्मिथ और दोषी खिलाड़ी बेनक्राफ्ट पर गाज गिराने का दबाव बनाया। उधर इस घटना से हुई बदनामी ने ऑस्ट्रेलिया के क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड के साथ ही सरकार तक को हिला दिया। प्रधानमन्त्री भी निंदा करने वालों में शामिल हो गये। ऑस्ट्रेलिया के कप्तान और उपकप्तान बदल दिए गए। मैच फीस के जुर्माने के अलावा जीवन भर के लिए प्रतिबंधित किये जाने पर भी विचार हो रहा है। इस वारदात ने न सिर्फ  ऑस्ट्रेलियाई टीम अपितु क्रिकेट नामक खेल को भी कलंकित कर दिया। यद्यपि ये पहला अवसर नहीं है जब ऐसी किसी हरकत ने खेल और खिलाड़ी को बदनाम कराया हो। अनेक नामी-गिरामी क्रिकेटर नियमों के उल्लंघन के अलावा अनैतिक कृत्य करने के दोषी पाए जाने पर अपमान झेल चुके हैं। मैच फिक्सिंग के आरोप तो आम बात हो गई है। ऐसे में ऑस्ट्रेलियाई टीम की ताजा हरकत सामान्य ही मानी जा सकती थी। और फिर कैमरे की कैद में वह घटना न आई होती तो कोई जान भी नहीं पाता कि हुआ क्या था? कई दशक पहले इंग्लैंड के एक तेज गेंदबाज जॉन स्नो द्वारा गेंद को चमकाने के लिए ग्लिसरीन का उपयोग करने का खुलासा हुआ था। इस तरह की घटनाएं यदा-कदा होती ही रहीं है। 1932 -33 में अंग्रेज कप्तान डगलस जार्डिन की कप्तानी में लारवुड द्वारा बॉडी लाइन गेंद फेंककर ऑस्ट्रेलिया के बल्लेबाजों को घायल किये जाने के कारण एशेज श्रंखला के बीच इतना तनाव उत्पन्न हो गया था कि इंग्लैंड और ऑस्ट्रेलिया के राजनयिक संबंध तक टूटने की कगार पर आ गए। उसके बाद से नियमों में लगातार सुधार किए जाते रहे जिससे इस खेल की गरिमा बनी रहे। बीच में एक दौर ऐसा भी आया जब वेस्ट इंडीज के फै्रंक वारेल और ऑस्ट्रेलिया के रिची बैनो सरीखे कप्तानों के नेतृत्व में क्रिकेट ने भद्रता के चर्मोत्कर्ष को भी देखा किन्तु जब से कैरी पैकर ने इस खेल को पूरी तरह व्यावसायिक बनाया तब से जीत के जुनून और पैसे की हवस ने इस खेल को भी फार्मूला हिंदी फिल्म की तरह बनाकर रख दिया। किसी भी कीमत पर जीत के फेर में खिलाड़ी रेस के घोड़े जैसे हो गए। सट्टेबाजी ने खेल की पवित्रता को ही नष्ट कर दिया। और फिर आईपीएल सरीखे आयोजनों ने बची-खुची कसर भी पूरी कर दी। इसलिये केपटाउन में जो भी हुआ उस पर आश्चर्य तो नहीं किन्तु अफसोस जरूर हुआ। किसी भी कीमत पर जीत की उन्मादी सोच ने निम्नस्तरीय हरकतों के लिए विश्वविजेता टीम को यदि प्रेरित कर दिया तब छोटे-छोटे देशों से क्या अपेक्षा की जा सकती है? द. अफ्रीका के कप्तान रहे हैंसी क्रोनिए का कैरियर मैच फिक्सिंग में ही तबाह हो गया था। भारतीय कप्तान अजहरुद्दीन भी उसी लपेटे में आकर बदनाम हुए। आईपीएल में तो चियर गर्ल और मैच के बाद की रंगीनियों के किस्से उजागर हो ही चुके हैं। विजय माल्या जैसे लोगों ने इस खेल को भी शराब की बोतल में उतारने जैसा काम किया। कुल मिलाकर इस लोकप्रिय खेल की आत्मा तक बिकने की स्थिति बन गई है। ऑस्ट्रेलियाई टीम की ताजा हरकत ने एक बार फिर ये सवाल उठा दिया है कि आखिर हर समय खेलते रहने का जो धंधा आईसीसी ने चला रखा है उसकी वजह से क्रिकेट रुपया छापने की मशीन भले बन गया हो किन्तु उसकी कलात्मकता लुप्त होकर रह गई है। भारत में तो इस खेल के प्रति दीवानगी आसमान छूती जा रही है। बीसीसीआई दुनिया का सबसे अमीर क्रिकेट बोर्ड बन गया है लेकिन खिलाडिय़ों के ऊपर जो मानसिक दबाव है उसकी वजह से खेल की नैसर्गिकता लुप्त होती जा रही है। पता नहीं ये सिलसिला कहाँ जाकर रुकेगा लेकिन ये बात सौ फीसदी सही है कि पैसे की बरसात और खिलाडिय़ों की फिल्मी  सितारों जैसी छवि के बावजूद क्रिकेट के प्रति पहले जैसा सम्मान नहीं बचा। जो कैमरे की गुप्त आंख ने देख लिया वह तो दुनिया को नजर आ गया वरना न जाने और क्या-क्या ऐसा होता होगा जिस पर ध्यान नहीं जाता। मो.शमी नामक भारतीय क्रिकेटर पर उसकी पत्नी द्वारा बीते दिनों लगाए आरोपों में पारिवारिक विवाद के अलावा मैच फिक्सिंग का जो दुबई कनेक्शन बताया गया वह काफी कुछ कह गया। केपटाउन में जो हुआ वह बेहद निन्दाजनक और शर्मनाक है। अच्छा होगा यदि ऑस्ट्रेलिया को कुछ समय के लिए अन्तर्राष्ट्रीय क्रिकेट से बाहर कर दिया जाए वरना खेल को व्यापार मानकर अनैतिक तरीके अपनाने का सिलसिला चलता रहेगा ।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 24 March 2018

लाभ का पद : जनता के पैसे पर सामन्ती ऐश

दिल्ली में आम आदमी पार्टी के 20 विधायकों की सदस्यता समाप्त किए जाने सम्बन्धी चुनाव आयोग के फैसले को रद्द करते हुए दिल्ली उच्च न्यायालय ने आयोग को दोबारा सुनवाई करने का निर्देश दिया है। न्यायालय ने विधायकों की इस दलील को मान्य किया कि चुनाव आयोग द्वारा उन्हें मौखिक सुनवाई का अवसर दिए बिना उनकी बर्खास्तगी की सिफारिश राष्ट्रपति को भेज दी। इस निर्णय से आम आदमी पार्टी ने राहत की सांस जरूर ली होगी किन्तु आयोग द्वारा दोबारा सुनवाई किये जाने तक सदस्यता समाप्ति की तलवार लटकती रहेगी। इस विवाद की जड़ है लाभ का पद। दरअसल मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने अपनी विशाल विधायक संख्या को बांधकर रखने के लिए अधिकतर को संसदीय सचिव या अन्य ऐसे ही अनेक पद बांटकर मंत्री जैसी सुविधाएं एवं वेतन-भत्ते देने की व्यवस्था कर दी। यूँ भी दिल्ली में विधायकों के वेतन-भत्ते देश भर में सर्वाधिक हैं। दिल्ली अकेला राज्य नहीं है जहां विधायकों को लाभ के पद दिए गए हों। लेकिन इस व्यवस्था में राज्य दर राज्य अलग-अलग व्यवस्थाएं हैं। कुछ राज्यों ने लाभ के पद को अपनी सुविधानुसार परिभाषित कर दिया है। दिल्ली में ऐसा न हो पाने की वजह से आम आदमी पार्टी पर संकट आया। यद्यपि अयोग्य ठहराए गए विधायकों  का कहना है कि उन्होंने जो पद उन्हें दिया गया उससे जुड़े वेतन, भत्ते, वाहन एवं बंगले जैसी सुविधाएं हासिल नहीं कीं इसलिए वे लाभ के पद के आरोप से मुक्त हैं। लेकिन कानूनी पेंच ये है कि जब तक दिल्ली सरकार संसदीय सचिव या उस जैसे अन्य पदों को लाभ की श्रेणी से बाहर नहीं करती तब तक संबंधित विधायकों की सदस्यता पर खतरा मंडराता रहेगा। दिल्ली उच्च न्यायालय ने अयोग्य ठहराए गए विधायकों की अयोग्यता पर कोई राय नहीं दी। उसने उन्हें मात्र ये कहकर राहत दी कि चुनाव आयोग ने उनका पक्ष नहीं सुना। इसका अर्थ ये हुआ कि न्यायालय ने लाभ के पद सम्बन्धी विवाद में टांग नहीं अड़ाई। फर्ज करें चुनाव आयोग उन विधायकों का पक्ष सुनकर दोबारा अयोग्य घोषित कर देता है तब उच्च न्यायालय  क्या करेगा? दरअसल ये मसला प्रजातंत्र के सामंतीकरण से जुड़ा हुआ है। मंत्रियों की संख्या सीमित कर दिए जाने से निर्वाचित जनप्रतिनिधियों के असन्तोष को दूर करने के लिए दूसरी तरह से उन्हें सत्ता का लाभ पहुँचाने के तरीके निकाले गए। जब कानूनी अड़चनें आईं तब उन्हें लाभ के पद की फेहरिस्त से बाहर कर दिया गया। इस लिहाज से दिल्ली अकेला राज्य नहीं है जहां विधायकों को रेवडिय़ाँ बांटी गई हों। हो सकता है अब केजरीवाल सरकार भी चतुराई दिखाते हुए सुरक्षा प्रबंध कर ले लेकिन इस प्रश्न का उत्तर कौन देगा कि विधायकों को संतुष्ट करने के लिए जनता से वसूले गए करों की बरबादी का औचित्य क्या है? यदि इसी तरह से पदों की बंदरबांट करनी है तब मंत्रियों की संख्या सीमित करने का क्या लाभ? दिल्ली के 20 विधायकों के बारे में चुनाव आयोग क्या करेगा ये तो वही जाने किन्तु जनता की जेब काटकर पैदा किये जा रहे नव सामंतवाद पर रोक जरूरी है। राजनीतिक दल अपने विधायकों को सत्ता का सुख प्रदान करने के लिए जनता का शोषण करें इसकी छूट नहीं होनी चाहिए वरना लोकतंत्र और सामंतशाही के बीच अंतर ही क्या रह जाएगा?

-रवीन्द्र वाजपेयी

अन्ना का सम्मान तो है सुनवाई नहीं

अन्ना हजारे फिर अनशन पर बैठ गए। सरकार को चुनौती भी दे डाली। किसी राजनेता को मंच पर न चढऩे देने की जि़द भी दिखा दी। मुद्दे कुछ नए और कुछ बरसों पुराने हैं। हां, सहयोगी जरूर बदले - बदले से हैं। किसान भी उनका साथ देने आ गए हैं। संसद के सत्र के कारण दिल्ली में वैसे भी गहमागहमी है। विपक्षी एकता की नई - नई मुहिम चल पड़ी हैं। मोदी सरकार 2019 के चुनाव की तैयारी में जुटी है वहीं काँग्रेस अपने पुनरुद्धार के लिए हाथ पांव मार रही है। ममता बैनर्जी और कुछ अन्य नेता तीसरे मोर्चे के पुनर्जन्म के लिए प्रयासरत हैं। ऐसे में अन्ना के गांधीवादी अनशन पर कौन ध्यान देगा और क्यों देगा ये बड़ा सवाल है। दिल्ली में रामलीला मैदान के उनके पिछले बड़े आयोजन में लाखों की भीड़ उमड़ी थी। मैं भी अन्ना, तू भी अन्ना, अब तो सारा देश है अन्ना के नारे सर्वत्र सुनाई देने लगे। 1974 के लोक नायक जयप्रकाश की याद इस गांधीवादी वृद्ध ने ताजा कर दी। इसके आगे वही हुआ जो गांधी, विनोबा और जयप्रकाश के साथ हो चुका था। अन्ना के कंधों पर चढ़कर कुछ लोग सत्ता की कुर्सी पर जा बैठे। लोकपाल ठंडे बस्ते में चला गया और भ्रष्टाचार के खिलाफ लडऩे वाले सूरमा खुद भ्रष्टाचार के गंदे नाले में डुबकी लगाने में व्यस्त हो चले। लाखों की जनसभा से निकलकर बेचारे अन्ना पूरी तरह अपने गांव में सिमटकर रह गए। उनके प्रति कोई दीवानगी नहीं बची। भले ही सब उनका सम्मान करते हों किन्तु उनके उपदेश उबाऊ लगने लगे। सवाल ये है कि अन्ना का ताजा आंदोलन क्या पहले जैसा प्रभाव छोड़ सकेगा और क्या केजरीवाल एंड कम्पनी के सहयोग के बगैर वे वैसा दबाव बना पाएंगी। जिन टीवी चैनलों ने अन्ना का लाइव कवरेज करते हुए अपनी टीआरपी बढा ली थी वे इस बार भी क्या उन्हें वैसा ही महत्व देंगे? सवाल और भी हैं किंतु अन्ना खुद उत्तर देने की स्थिति में नहीं रहे क्योंकि लाख ईमानदारी के बावजूद वे जिस तटस्थता का नाटक करते हैं वह उन्हें छोडऩा होगी। जयप्रकाश जी ने 1974 में सामने आकर नेतृत्व किया तो देश में बड़े परिवर्तन की बुनियाद पड़ गई। अन्ना उस अवसर को चूक गए। यदि वे आम आदमी पार्टी को ही आशीर्वाद देते रहते तब वह इस तरह पथभ्रष्ट न हुई होती और केजरीवाल भी तानाशाह न बन पाते। यही सब देखते हुए अन्ना के इस प्रयास की सार्थकता समझ में  नहीं आती। उन्हें ये स्वीकार कर लेना चाहिये कि हाथ आया एक बेहतरीन अवसर उन्होंने गंवा दिया और बीते कुछ बरसों में देश जितनी तेजी से बदल रहा  है उसमें उन जैसे लोगों के लिए जगह नहीं बची है। न वे तेज गति से दौड़ पाएंगे और न ही आगे बढ़ गए लोग रुककर उनके साथ आने की प्रतीक्षा करेंगे ।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 23 March 2018

जकरबर्ग की माफी : दाल में काले की पुष्टि


भारत में फेसबुक के करोड़ों उपयोगकर्ता बीते दो-तीन दिन से परेशान हैं। उसके मालिक जकरबर्ग द्वारा माफी मांगे जाने से चिंता और बढ़ गई । भाजपा की तरफ  से केंद्रीय कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी पर आरोप लगा दिया कि वे 2019 के चुनाव में केम्ब्रिज एनालिटिका नामक विदेशी कम्पनी की सेवाएं लेने वाले हैं।  ये कम्पनी सोशल मीडिया से लोगों की निजी जानकारी एकत्र कर अपने ग्राहक को चुनाव जितवाने में मदद करती है। फेसबुक इसका सबसे बड़ा औजार बताया जा रहा है। अमेरिका के पिछले राष्ट्रपति चुनाव में डोनाल्ड ट्रम्प की भारी जीत पर मंडराने वाले शक के बादल अभी पूरी तरह छंटे नहीं हैं। रूस द्वारा डाटा चोरी कर चुनाव अभियान को प्रभावित करने का आरोप लगने के बाद यद्यपि उसे प्रमाणित तो नहीं किया जा सका किन्तु आज भी अमेरिका में ये मानने वाले बहुत हैं कि ट्रम्प की जीत का माहौल बनाने हेतु सोशल मीडिया से लोगों की निजी राय और रुचियों के बारे में जानकारी एकत्र कर चुनाव संचालकों को दी गई।  भारत में अभी तक ऐसा आरोप तो नहीं लगा किन्तु रविशंकर प्रसाद के बयान और उसके बाद कांग्रेस द्वारा उल्टे भाजपा पर आरोप मढ़ देने के बाद कैम्ब्रिज एनालिटिका और भारत में उसकी सहयोगी कंपनियों द्वारा चुनाव अभियान में सेवाएं देने सम्बन्धी बात उजागर हो गई है। राहुल गांधी ने रविशंकर के आरोप का सीधे खंडन करने की बजाय पलटकर आरोप लगा दिया कि भाजपा इराक़ में मारे गए 39 भारतीयों की मौत सम्बन्धी गलत जानकारी से मचे विवाद पर परदा डालने हेतु डाटा चोरी का शिगूफा छोड़ रही है। कांग्रेस प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला तो भाजपा पर ही अतीत में उक्त कम्पनी की सेवाएं लेने का आरोप लगाने से नहीं चूके। बात कितनी सच है ये तो साधारण व्यक्ति की समझ से परे है लेकिन भारत सरकार द्वारा फेसबुक के उपयोगकर्ताओं का निजी डाटा इक_ा कर राजनीतिक दलों को देने और सोशल मीडिया के जरिये चुनाव प्रभावित करने पर कड़ी कार्रवाई किये जाने की चेतावनी के बाद जकरबर्ग द्वारा माफी मांगे जाने और इसे रोकने सम्बन्धी पुख्ता इंतजाम करने का आश्वासन दिए जाने से रविशंकर के आरोप को वजन तो मिला ही। धीरे-धीरे ये बात भी स्पष्ट हो गई कि बीते चुनावों में विभिन्न दलों और निजी तौर पर कुछ प्रत्याशियों ने उन पेशेवर एजेंसियों की सेवाएं ली थीं जो सोशल मीडिया से लोगों की निजी जानकारी एकत्र कर उनका राजनीतिक विश्लेषण करते हुए चुनावी रणनीति बनाने में मदद करती हैं। चुनाव सर्वेक्षण के लिए निजी संस्थानों की सेवाएं लेने का चलन भारत में भी काफी बढ़ गया है। इनके जरिये जनमत को प्रभावित करने का काम भी होता है। विभिन्न राजनीतिक दल इन सर्वेक्षणों के माध्यम से ही प्रत्याशी चयन करते हैं। कुल मिलाकर चुनाव अपने संगठन के बलबूते लडऩे का जमाना खत्म होता जा रहा है और उसकी जगह तरह - तरह की नई पेशेवर संस्थाएं लेती जा रही हैं। भारत में इनका पदार्पण काफी समय पहले हो चुका था लेकिन फेसबुक और इस जैसे ही सोशल मीडिया की अन्य शाखाओं के माध्यम से चुनाव अभियान को अपने मनमाफिक मोडऩे की कोशिश निश्चित रूप से अब सामने आ रही है। 2014 के लोकसभा चुनाव के पहले से ही भाजपा ने सोशल मीडिया का अत्यंत योजनाबद्ध तरीके से उपयोग  करते हुए कांग्रेस पर मनोवैज्ञानिक दबाव बना दिया था। बाद में कांग्रेस ने भी इस माध्यम को अपनाते हुए जवाबी टक्कर देनी शुरू कर दी। जहां तक बात 2019 की है तो इसे जीतने के लिए भाजपा और कांग्रेस दोनों कोई कसर नहीं छोड़ेंगीं। रही बात डाटा चोरी की तो ये काम तो सम्बन्धित एजेंसियां करती हैं न कि राजनीतिक दल। इसलिए अपराध तो कैम्ब्रिज एंटालिटिका जैसी एजेंसियों के खाते में जाता है लेकिन फेसबुक सरीखे नेटवर्क से यदि उपयोगकर्ताओं सम्बन्धी जानकारी बाहर जाती है तो इसके लिए सोशल मीडिया नेटवर्क को कसूरवार माना ही जाना चाहिए। भारत सरकार द्वारा बनाए गए दबाव के तुरंत बाद जकरबर्ग द्वारा माफी मांगते हुए भविष्य में डाटा चोरी रोकने के लिए बेहतर सुरक्षा प्रबंध करने के ऐलान के बाद भी उसे रोक पाना सम्भव नहीं हो सकेगा क्योंकि इंटरनेट के विकास के साथ ही हैकिंग भी समानांतर व्यवसाय के रूप में पनप रहा है। कम्प्यूटर से वायरस दूर करने की तकनीक के साथ- साथ वायरस फैलाने वाले भी उतनी ही तेजी से सक्रिय हैं। भारत में आधार कार्ड को लेकर भी निजी डाटा चोरी होने का भय व्याप्त है। सर्वोच्च न्यायालय इस बारे में विचार कर ही रहा है। ये जो नया विवाद सामने आया है इससे निजी जानकारी की सुरक्षा का प्रश्न एक बार फिर प्रासंगिक हो गया है। फेसबुक के उपयोगकर्ताओं के मामले में भारत दूसरे स्थान पर है। इंटरनेट भी करोड़ों आम भारतीयों की जि़ंदगी का अभिन्न हिस्सा बन चुका है। 125 करोड़ की आबादी का ये मुल्क विश्व भर के लिए एक बड़ा बाजार है जिसका दोहन करने के लिए उपभोक्ताओं की निजी जानकारी बेहद उपयोगी और मददगार होती है। लेकिन चुनाव एक अलग मुद्दा है जिसे प्रभावित करने के लिए यदि निजी डाटा चोरी किया जाता है तो वह निश्चित रूप से आपत्तिजनक है। भाजपा और कांग्रेस दोनों के आरोपों के पीछे उनके अपने निहित स्वार्थ हैं किंतु जब बात बेपर्दा हो ही गई है तब उसे आम आदमी की निजता से जोड़कर भी देखा जाना चाहिए क्योंकि वह महज मतदाता या उपभोक्ता ही नहीं अपितु एक स्वतंत्र शख्सियत है। जकरबर्ग की माफी और आश्वासन से ये तो स्पष्ट हो ही गया कि फेसबुक जैसे सोशल मीडिया के अन्य माध्यमों पर लगने वाले डाटा चोरी के आरोप सही थे। राजनीतिक दल पैसा देकर मतदाताओं की निजता का जो सौदा करते हैं वह केवल अपराध ही नहीं अपितु अनैतिकता भी है। सूचना क्रांति के इस दौर में भले ही कुछ भी छिपाना कठिन होता जा रहा है लेकिन इसका ये अर्थ भी नहीं है कि शयनकक्ष और स्नानागार से दरवाजे हटा दिए जाएं।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 22 March 2018

बिन पानी सब सून......


आज विश्व जल दिवस है। पानी के महत्व और संरक्षण पर उपदेशात्मक जानकारी समाचार माध्यमों में भरी पड़ी है। सरकारी और गैर सरकारी संगठन आज दिन भर जल का स्तुतिगान करते हुए लोगों को भविष्य के खतरों के प्रति आगाह करेंगे। जल बचाने की जरूरत बताते हुए उस हेतु संकल्प लिए जाएंगे। लेकिन बाकी अवसरों की तरह ये दिन भी एकदिवसीय कर्मकांड का रूप ले चुका है। जल संरक्षण का ढिंढोरा उन देशों द्वारा सबसे ज्यादा पीटा जाता है जहां विलासितापूर्ण जीवनशैली के कारण जल का सर्वाधिक अपव्यय होता है। जहां तक भारत का सवाल है तो यहां की संस्कृति प्रकृति से जुड़े हर तत्व के महत्व को स्वीकार करती है। धरती, पानी, आकाश, वायु और अग्नि सभी को देवतुल्य मानकर पूजने का संस्कार भारतीय आध्यात्म का आधार है। घास के तिनके से  लेकर अंतरिक्ष के ग्रहों को पूजने के पीछे प्रकृति के साथ तादात्म्य स्थापित करने की सोच ही रही जिसके कारण जल स्रोतों को भी पवित्र मानना हमारा स्वभाव बन गया। कुआ, तालाब, नदी, समुद्र सभी में ईश्वर का अंश अनुभव करने की प्रवृत्ति जल के संवर्धन और संरक्षण की मानसिकता का ही प्रमाण है। लेकिन समय के साथ बदलती जीवन पद्धति ने जल की बर्बादी की जो स्थितियां उत्पन्न कीं उनके कारण उसकी कमी विकराल समस्या के तौर पर सामने आ खड़ी हुई है। विश्व जल दिवस के आयोजन की प्रासंगिकता अपनी जगह है लेकिन भारत सरीखे देश में आबादी के विस्फोट और अनियोजित शहरीकरण ने पानी के अभाव को चिंताजनक स्थिति तक पहुंचा दिया है। दक्षिण अफ्रीका के केपटाउन नगर को पूरी तरह जलविहीन घोषित कर देने से ये बात सामने आ गई कि विकास के आधुनिक मापदंड तब तक अर्थहीन हैं जब तक उनका प्रकृति से सामंजस्य न हो। भारत में भी राजस्थान के मरुस्थली इलाकों में जल की कमी होने से दूर-दूर से पानी लाना पड़ता था। हालांकि नहरों की वजह से अब वैसी स्थिति भले न रही हो लेकिन कई शहर ऐसे हैं जहां नियमित जल आपूर्ति नहीं हो पाती। भूजल स्तर भी लगातार नीचे जा रहा है। नदियां अस्तित्वहीन होती जा रहीं हैं। वैश्विक स्तर पर तापमान बढऩे से ग्लेशियर पिघल रहे हैं। उत्तरी धु्रव से विशाल हिमशैलों के टूटकर समुद्र में आने से पूरी दुनिया चिंतित है। ये आशंका तक व्यक्त की जाने लगी है कि अगला विश्व युद्ध जमीन नहीं अपितु जल स्रोतों पर कब्जे को लेकर होगा। भारत में 125 करोड़ आबादी के लिए जल प्रबंधन सरकार की प्राथमिक चिंताओं में है। लेकिन ये काम केवल सरकार के जिम्मे छोड़कर बैठ जाना ठीक नहीं होगा। जल का अपव्यय रोकना तो हम सभी के बस में है। हमारी परंपरागत जीवन शैली  प्रकृति के संतुलन को बनाए रखने पर जोर देती थी जिसके परिणामस्वरूप जल संरक्षण भी अपने आप हो जाया करता था। आज के युग में हम इतने आगे बढ़ चुके हैं कि अब पीछे लौटना तो क्या देखना भी सम्भव नहीं रहा लेकिन यदि इसी तरह से बढ़ता जाया गया तब वह दिन दूर नहीं जब विश्व युद्ध तो दूर हमारे अपने देश में ही जल के लिए झगड़े - फसाद होने लगेंगे। यही वजह है कि प्रकृति और पर्यावरण की रक्षा के लिए हर छोटा-बड़ा कमर कसे, ये आवश्यक है। बिजली की बचत ही बिजली का उत्पादन है जैसे नारे को पानी के संदर्भ में भी प्रयुक्त किया जाना चाहिये। इसके लिए बड़े-बड़े प्रयास करने की बजाय व्यक्तिगत और परिवार के स्तर पर भी जल  संरक्षण का पुराना संस्कार पुनर्जीवित करना होगा। बरसाती जल को व्यर्थ  जाने देने की बजाय वाटर हार्वेस्टिंग के जरिये सुरक्षित रखने की पध्दति का हर उस मकान में उपयोग अनिवार्य किया जावे जिसमें पक्की छत है। पुराने जमाने में घर के बीच वाले कच्चे आंगन में जल संरक्षण होता था जो घरों के कुएं में जल के स्तर को बनाए रखता था। अब वह स्थिति नहीं है किंतु बरसाती जल को छतों के जरिये जमीन के भीतर पहुंचाने की तकनीक को अनिवार्य रूप से लागू किया जाना चाहिए। जल की कमी के बाद भी जल की प्रचुरता कैसे की जा सकती है इसका सर्वोत्तम उदाहरण है इजरायल जिसने मरुस्थल में भी हरियाली का आलम पैदा कर दिया। आज यह छोटा सा देश जल की कमी के बावजूद कृषि के क्षेत्र में आश्चर्यजनक प्रगति का उदाहरण बन गया तो उसकी वजह बूंदों से सिंचाई करने की प्रणाली ईजाद करना रहा। भारत इन दिनों इजरायल के काफी निकट है। सैन्य तकनीक तो हम उससे हासिल कर ही रहे हैं किंतु सबसे अधिक सीखने वाली बात है जल क़ा संरक्षण और प्रबंधन। भारत को प्रकृति ने दिल खोलकर दिया है। हिमालय, नदियां,  झीलें, वन, समुद्र सभी का सान्निध्य इसे प्राप्त है। पूर्वजों ने तो इन संसाधनों का अत्यंत विवेकपूर्ण उपयोग करते हुए इनका भरपूर लाभ लिया किन्तु उन्हें क्षति पहुंचाए बिना। विकास की अंधी दौड़ ने प्रकृति को जो नुकसान पहुंचाया वही आज की भयावह स्थिति का कारण है। जरूरत है हम अपनी आदतों को सुधारकर पानी के साथ-साथ ही प्रकृति प्रदत्त हर चीज का दोहन करें किन्तु शोषण से बचें। वरना वह दिन ज्यादा दूर नहीं जब अगली पीढ़ी एक-एक बूंद के लिए जद्दोजहद को बाध्य होते हुए हमें कोसेगी। जल संरक्षण को लेकर नया नारा गढ़ा गया है कि जल है तो कल है। लेकिन सैकड़ों बरस पहले रहीम द्वारा दी गई इस चेतावनी की प्रासंगिकता आज भी जस की तस है :-
रहिमन पानी राखिये, बिन पानी सब सून।

-रवीन्द्र वाजपेयी