Wednesday, 25 April 2018

रेणुका का बयान : महिला सांसदों का अपमान

मुम्बई फिल्म उद्योग की प्रसिद्ध नृत्य निर्देशिका सरोज खान ने दो दिन पूर्व ये कहकर सनसनी मचा दी थी कि कास्टिंग काउच (काम के बदले  महिलाओं का शोषण) तो बाबा आदम के ज़माने से चला आ रहा है। लेकिन महिलाओं के साथ दुष्कर्म की बढ़ती घटनाओं के सन्दर्भ में सरोज ने ये तंज भी कस दिया कि  फिल्म उद्योग महिला का शोषण कर छोड़ नहीं देता अपितु रोटी अर्थात काम भी देता है। उनकी बात पर लोगों को आश्चर्य नहीं हुआ क्योंकि फिल्म उद्योग में महिलाओं के शोषण की अवधारणा बहुत सामान्य है। अनेक मामलों में तो आपराधिक प्रकरण तक दर्ज हुए जिसमें मधुर भण्डारकर का प्रकरण काफी चर्चित हुआ जिसमें एक युवती ने उन पर फिल्म में भूमिका देने के नाम पर शारीरिक शोषण का मुकदमा दर्ज किया था। इसके अलावा कई बड़ी नायिकाओं ने भी समय-समय पर प्रत्यक्ष और अप्रत्क्ष दोनों तरह से स्वीकार किया कि फिल्म उद्योग में जगह बनाने के लिए उन्हें शोषण का शिकार होना पड़ा था। बावजूद इसके आम जनता ग्लैमर की दुनिया में प्रचलित स्वच्छन्दता को सहज-स्वाभाविक मानकर नजरअंदाज कर देती है लेकिन सरोज खान के सार्वजनिक बयान का लोग पूरी तरह संज्ञान ले पाते उसके पहले ही कांग्रेस नेत्री रेणुका चौधरी ने ये कहकर बवाल मचा दिया कि कास्टिंग काउच केवल फिल्म उद्योग तक ही सीमित न रहकर हर क्षेत्र में होता है और संसद तक इससे अछूती नहीं है। रेणुका हाल ही में राज्यसभा से निवृत्त हुई हैं। अपने बिंदास व्यवहार और बयानों की वजह से वे पहले भी चर्चाओं में रही हैं। हाल ही में राज्यसभा में उनके अट्टहास शैली में हंसने पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कटाक्ष को लेकर काफी हंगामा हुआ था। लेकिन रेणुका द्वारा सरोज खान के बयान को विस्तार देते हुए संसद में भी कास्टिंग काउच यानि महिलाओं के शोषण जैसी बात कहकर नई बहस को जन्म देने के साथ ही महिला सांसदों के लिए अपमानजनक स्थिति उत्पन्न कर दी। संसद के दोनों सदनों में रह चुकीं रेणुका देश की अग्रणी एवम मुखर महिला सांसद रही हैं। तेलुगु देशम से सियासत शुरू करने के बाद वे कांग्रेस में आईं और अब तक यहीं हैं। उनका ताजा बयान आसानी से उपेक्षित करने लायक नहीं है क्योंकि संसद में काम के बदले महिलाओं के शोषण जैसी बात इसके पहले कभी किसी ने भी नहीं कही। नेताओं के निजी जीवन को लेकर चर्चाएं होती रही हैं। उनमें कुछ पर खुलकर तो कुछ पर दबी जुबान टीका - टिप्पणी भी होती आई है लेकिन लंबे समय से संसद में रहने वाली रेणुका ने जिस संदर्भ में कास्टिंग काउच के संसद तक फैलने जैसी बात स्वीकारी वह गहराई से चुभने वाली है, क्योंकि राजनीति में महिलाओं की हिस्सेदारी तेजी से बढ़ रही है। बड़ी संख्या में सुशिक्षित युवतियां भी राजनीति को बतौर कैरियर बनाने की महत्वाकांक्षा से भरी हुई हैं। ऐसे में श्रीमती चौधरी जैसी वरिष्ठ नेत्री द्वारा संसद में भी फिल्म उद्योग की तरह महिलाओं के शोषण की पुष्टि करते हुए सभी महिला सांसदों के लिए शर्मनाक स्थिति पैदा कर दी है। आश्चर्य की बात ये है कि अब तक उनके बयान पर कोई प्रतिक्रिया नहीं आई। सरोज खान तो खैर जिस क्षेत्र में है, वहां महिलाओं के शोषण के किस्से सुने-सुनाए जाते रहे हैं लेकिन संसद के बारे में ऐसी सोच शायद ही किसी ने जाहिर की हो। रेणुका महिलाओं को नेतृत्व में भागीदारी देने के लिए चलने वाली मुहिम में सदैव आगे-आगे रही हैं। ऐसे में उन्हें इस बात का स्पष्टीकरण देना चाहिए कि संसद में भी महिलाओं के शोषण जैसी बात कहने का आधार क्या था? यदि वे ऐसा नहीं करतीं तो संसद से जुड़ी तमाम महिलाओं की छवि पर इसका विपरीत असर होगा। प्रधानमन्त्री द्वारा हास-परिहास में उन पर की गई टिप्पणी को समूची महिलाओं का अपमान बताकऱ विशेषाधिकार हनन का प्रस्ताव लाने की जिद पकडऩे वाली  रेणुका ने महिला होते हुए भी संसद में भी कास्टिंग काउच जैसी बुराई की मौजूदगी बताकऱ महिला सांसदों का जो अपमान किया, क्या वह विशेषाधिकार हनन नहीं है? कांग्रेस पार्टी की वास्तविक सर्वोच्च नेत्री आज भी एक महिला ही है। लोकसभा अध्यक्ष के पद पर भी  महिला सुशोभित है। विदेश और रक्षा जैसे महत्वपूर्ण मंत्रालय का दायित्व भी महिलाएं सम्भाल रही हैं। ऐसे में श्रीमती चौधरी का सन्दर्भित बयान घोर आपत्तिजनक है जिसका पूरी संसदीय बिरादरी को विरोध करना चाहिए। संसदीय राजनीति से लंबे समय तक जुड़ी रही एक महिला द्वारा कही गई उक्त बात केवल महिला सांसदों का ही नहीं अपितु पूरी संसद के चरित्र पर आक्षेप है। कांग्रेस पार्टी इस बयान को रेणुका की निजी राय बताकर पिंड नहीं छुड़ा सकती क्योंकि ये कोई साधारण बयान नहीं है। बेहतर हो खुद सोनिया गांधी को इस बारे में कड़ाई से पेश आना चाहिये क्योंकि रेणुका द्वारा कही गई कास्टिंग काउच नामक वायरस के संसद तक फैल जाने की बात का सम्बन्ध किसी व्यक्ति विशेष या राजनीतिक दल से न होकर संसद से जुड़ी प्रत्येक महिला से है।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 24 April 2018

पंचायती राज : राजनीति और भ्रष्टाचार से मुक्त करना जरूरी


मप्र के आदिवासी बहुल जिले मंडला में आज राष्ट्रीय पंचायती राज दिवस पर हो रहे विशाल जलसे में शरीक होने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी आए हुए हैं। बड़ी संख्या में पंचायतों के निर्वाचित जनप्रतिनिधियों को सरकारी खर्चे पर ढोकर लाया गया है। महीनों से मप्र सरकार का अमला इस आयोजन की तैयारियों में जुटा हुआ था। प्रधानमंत्री की मौजूदगी से कार्यक्रम की भव्यता भी निश्चित तौर पर बढ़ गई। कुछ घण्टे के आयोजन पर व्यय होने वाली राशि जाहिर तौर पर करोड़ों में होगी। सुरक्षा पर ही बेतहाशा खर्च हो जाता है। और फिर मंडला सरीखे आदिवासी जिले में वीवीआईपी के लिए इंतजाम करना भी आसान नहीं होता। ऐसे में ये प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि आखिर इतनी भीषण गर्मी में सरकार को क्या सूझी जो मंडला जैसे सुदूर अंचल में इतना बड़ा जमावड़ा करे। और इसका सीधा-सहज उत्तर है राजनीतिक लाभ। ये बात तो किसी से छिपी नहीं है कि राजनेता चाहे सत्ता से जुड़े हों या विपक्ष से, उनकी समस्त गतिविधियों का लक्ष्य वोट बटोरने पर केंद्रित होता है। मंडला का यह आयोजन भी मप्र विधानसभा के आगामी चुनाव को ध्यान में रखकर किया गया है। आदिवासी अंचल में पिछली मर्तबा भाजपा को अच्छी सफलता मिल गई थी किन्तु फिलहाल वह स्थिति नहीं है। इसलिए पार्टी के रणनीतिकारों ने आदिवासी पट्टी में राष्ट्रीय पंचायती राज दिवस के नाम पर बड़ा जमावड़ा करवा दिया। मंडला से छत्तीसगढ़ की सीमा भी सटी है। वहां भी इसी वर्ष विधानसभा चुनाव होने हैं। वैसे वास्तविकता के धरातल पर उतरकर सोचें तो पंचायती राज एक आदर्श व्यवस्था है जिसका उद्देश्य संसदीय प्रजातांत्रिक प्रणाली के अंतर्गत सत्ता का विकेंद्रीकरण करना है। भारत में तो प्राचीनकाल से पंचायत व्यवस्था अत्यंत समृद्ध रही है। महात्मा गांधी के ग्राम स्वराज का समूचा विचार पंचायती राज से ही प्रेरित और प्रभावित था। जब से पंचायती राज की व्यवस्था को संवैधानिक रूप दे दिया गया तब से सत्ता का विकेन्द्रीकरण करने का काम काफी हद तक पूरा हो सका किन्तु शिक्षा और जागरूकता के अभाव की वजह से यह आदर्श व्यवस्था, अव्यवस्था और भ्रष्टाचार के मकडज़ाल में फंसकर रह गई है। महिला एवं अनु.जति/जनजाति के लिए आरक्षित सीटों के नाम पर जिस तरह के जनप्रतिनिधि चुनकर आते हैं उसकी वजह से पंचायती राज सत्ता से ज्यादा भ्रष्टाचार के विकेंद्रीकरण का प्रतीक बन बैठा है। हालांकि इस अंधेरी कोठरी में कुछ रोशनदान भी हैं। देश में अनेक पंचायतें ऐसी हैं जिन्होंने सुशासन और सुनियोजित विकास का सर्वोत्कृष्ट उदाहरण पेश करते हुए इस व्यवस्था की सार्थकता को साबित किया किन्तु राज्य और केंद्र सरकार चाहे जो भी कहें लेकिन पंचायती राज व्यवस्था के जो भी परिणाम देखने में आये वे किसी भी स्तर पर सन्तोषजनक नहीं कहे जा सकते। कहीं जनप्रतिनिधियों की अनभिज्ञता तो कहीं बेईमानी की वजह से नौकरशाही को जनता के धन की लूटपाट और बर्बादी का समुचित अवसर मिल जाता है। ग्रामीण विकास की शासकीय योजनाएं  निश्चित रूप से स्वागत योग्य हैं। गांवों के विकास के बिना देश को आगे लाना नामुमकिन है। इसीलिए हर सरकार  ग्रामों को विकास की मुख्यधारा में लाने के लिए भरसक प्रयास करती है। इस विभाग के पास भारी-भरकम बजट भी होता है। बावजूद उसके यदि अपेक्षित परिणाम नहीं आ रहे तो ये मानकर चलना होगा कि क्रियान्वयन में कहीं न कहीं कमी या गड़बड़ है जिसे दूर किये बिना चाहे दावे कितने भी कर लिए जावें लेकिन पंचायती राज अपने सही स्वरूप में लागू नहीं किया जा सकता। सबसे बड़ी परेशानी है पंचायती राज का राजनीतिकरण। भले ही पंचायतों के चुनाव गैर दलीय आधार पर होते हों किन्तु राजनीतिक दलों का भरपूर दखल रहने से पंचायतें भी चाहे-अनचाहे सियासत के अखाड़े में तब्दील होकर रह गईं जिसका स्वाभाविक परिणाम भ्रष्टाचार, परिवारवाद और अयोग्य व्यक्तियों के निर्णय प्रक्रिया में शामिल होने के तौर पर देखने मिल रहा है।  पंचायतें भारत के गांवों की शासन व्यवस्था  ही नहीं वरन सामाजिक व्यवस्था की भी रीढ़ रही हैं किंतु जब से वे संसदीय प्रणाली के अंतर्गत आईं तबसे उनका स्वरूप विकृत होता चला गया और अन्य सरकारी महकमों की तरह पंचायती राज के साथ भी वे बुराइयां और बदनामियां अनिवार्य रूप से जुड़ गईं जो हमारे प्रजातन्त्र की पहिचान बन चुकी हैं। प्रधानमन्त्री श्री मोदी और मप्र के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान दोनों ग्रामीण विकास में काफी रुचि लेते हैं। श्री मोदी तो उन्नत तकनीक से ग्रामीण विकास के पक्षधर हैं लेकिन सरकार की समूची सदिच्छाएँ राजनीतिक जोड़ तोड़ और भ्रष्टाचार के स्थायी गठबंधन के आगे बेअसर होकर रह जाती हैं। यद्यपि अब ग्रामीण भारत पहले सरीखा नहीं रहा लेकिन आज भी वहां शहरों की तुलना में यदि विकास सम्बन्धी असंतुलन है तब ये कहना सही रहेगा कि ग्राम विकास की पूरी कल्पना तब तक अधूरी रहेगी जब तक उसे राजनीति और भ्रष्टाचार के चंगुल से न निकाला जाए। प्रधानमंत्री के मंडला आगमन की सार्थकता तभी है जब पंचायती राज को सरकारी कर्मकांड से मुक्त करवाकर उसका सही स्वरूप प्रदान किया जाए। वरना ले देकर वही ढाक के तीन पात वाली कहावत चरितार्थ होती रहेगी।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 23 April 2018

महाभियोग : ये तो होना ही था


जैसी संभावना थी वही हुआ। उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू ने कांग्रेस द्वारा देश के मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा के विरुद्ध राज्यसभा में प्रस्तुत महाभियोग के नोटिस को अमान्य कर दिया है। श्री नायडू ने अनेक संविधान एवं संसदीय प्रक्रिया के विशेषज्ञों से सलाह-मशविरा  के बाद उक्त निर्णय लिया। गत दिवस अपनी आंध्र यात्रा बीच में छोड़कर जब वे दिल्ली लौट थे तभी ये आभास हो गया था कि आज वे कोई न कोई  फैसला कर ही लेंगे। इस जल्दबाजी की एक वजह रविवार को कांग्रेस द्वारा की गई पत्रकार वार्ता में श्री मिश्रा से सर्वोच्च न्यायालय में प्रकरणों की सुनवाई रोक देने की मांग भी थी। महाभियोग नोटिस स्वीकार होने की स्थिति में मुख्य न्यायाधीश द्वारा अदालती कार्रवाई में भाग लेने पर वैधानिक से ज्यादा नैतिक संकट उत्पन्न हो जाता। इसीलिए उपराष्ट्रपति ने और इंतज़ार किया बिना कांग्रेस के नोटिस को आधारहीन मानते हुए विचार करने योग्य नहीं समझा। जिन लोगों से श्री नायडू ने सलाह ली उनके अलावा सर्वोच्च न्यायालय के अनेक पूर्व मुख्य न्यायाधीशों ने भी महाभियोग के औचित्य पर प्रश्न उठाते हुए उसे अनावश्यक और अनुचित बताया था। विशेषज्ञों की सलाह और पूर्व न्यायाधीशों की प्रतिक्रियाओं से भी श्री नायडू को निर्णय लेने में सहूलियत हुई। यद्यपि अभी भी पूर्व लोकसभा अध्यक्ष और वरिष्ठ अधिवक्ता सोमनाथ चटर्जी जैसे कुछ लोगों ने उपराष्ट्रपति के फैसले को जल्दबाजी में उठाया कदम बताकर उसकी आलोचना की। ऐसा करने वालों में कांग्रेस के राज्यसभा सदस्य और दिग्गज अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी भी हैं जिन्होंने महाभियोग के प्रस्ताव पर हस्ताक्षर नहीं किये थे। वैसे कांग्रेस को श्री नायडू से इसी तरह के फैसले की उम्मीद ही रही होगी। उसे ये भी पता था कि महाभियोग किसी भी स्थिति में राज्यसभा द्वारा पारित किए जाने की संभावना नहीं है क्योंकि उच्च सदन में मौजूद विपक्षी दलों में ही इसे लेकर एक राय नहीं बन सकी। ये बात पूरी तरह स्पष्ट हो चुकी है कि  महाभियोग का असली उद्देश्य श्री मिश्रा को उन महत्वपूर्ण मामलों की सुनवाई से अलग रखना था जिन्हें लेकर भाजपा विरोधी खेमा काफी भयभीत हो चला था। अब अगले कदम के तौर पर कांग्रेस सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटा सकती है लेकिन वहाँ भी पीठ का गठन तो श्री मिश्रा के अधिकार क्षेत्र में ही होगा जिसे लेकर कांग्रेस बवाल मचाए बिना नहीं रहेगी। बहरहाल महाभियोग प्रस्ताव के जरिये कांग्रेस एक वर्ग विशेष को अपनी बात समझाने में भले ही सफल हो गई हो लेकिन उसके इस पैंतरे के पीछे की राजनीति भी उजागर हुए बिना नहीं रह सकी। यदि देश भर के विधिवेत्ता और सेवानिवृत्त न्यायाधीशगण एक स्वर में महाभियोग को सही और आवश्यक बता देते तब शायद उपराष्ट्रपति भी दबाव में रहे होते लेकिन कांग्रेस ने कुछ गलतियां करते हुए अपना प्रकरण कमजोर कर लिया। इनमें सबसे पहले उपराष्ट्रपति को सौंपे प्रस्ताव के ब्यौरे को सार्वजनिक करना रहा । खुद श्री नायडू ने इस पर अप्रसन्नता व्यक्त कर दी थी। इसी तरह महाभियोग प्रस्ताव विचारार्थ मंजूर होने के पहले ही मुख्य न्यायाधीश को अदालत में सुनवाई करने से रोकने की मांग से भी ये लगा कि कांग्रेस जानती थी कि उसके प्रस्ताव में कोई दमखम नहीं है। इसलिए उसने जितना हो सके उतना सियासी लाभ लेने की कोशिश की। लेकिन उपराष्ट्रपति ने उसे अधिक अवसर नहीं दिया और बिना समय गंवाए विधि विशेषज्ञों की सलाह के आधार पर महाभियोग प्रस्ताव को खारिज कर दिया। मुख्य न्यायाधीश के विरुद्ध चार न्यायाधीशों द्वारा चलाई गई मुहिम के पीछे कोई राजनीतिक चाल थी ये बिना ठोस प्रमाण के कहना अनुचित होगा किन्तु उनकी बगावतनुमा कोशिश को कांग्रेस ने लपकते हुए उसको राजनीतिक रंग दे दिया। ऐसा प्रचारित किया गया मानो देश की न्यायिक व्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई है। मुख्य न्यायाधीश के विरुद्ध पुराने मामले उखाड़कर उनकी छवि धूमिल करने का भी अभियान चलाया गया। खैर, उपराष्ट्रपति के फैसले के बाद भले ही मामला सर्वोच्च न्यायालय में अपील के रूप में ले जाया जाए लेकिन उसका नूर उतर चुका है। बागी बनकर सामने आए चार न्यायाधीशों में वरिष्ठतम श्री चेलमेश्वर की सेवानिवृत्ति को महीना भर बचा है। श्री मिश्रा भी अक्टूबर में निवृत्त हो जाएंगे। संसद का मानसून सत्र भी अभी दूर है। कर्नाटक के विधानसभा चुनाव के परिणाम मई के दूसरे हफ्ते में आ ही जायेंगे जिसके बाद राष्ट्रीय राजनीति की दिशा नए सिरे से शुरू होगी  इस आधार पर देखें तो कांग्रेस के लिए अफसोस की बात ये है कि जोरशोर से उठाए इस मुद्दे को वह ज्यादा लम्बा नहीं खींच सकी। इसकी एक वजह ये भी रही कि ये विषय न्यायपालिका के भीतर रहता तब उसकी गम्भीरता बनी रह सकती थी लेकिन राजनीति में आते ही उसकी अहमियत खत्म होती गई। कांग्रेस की इस जल्दबाजी ने उन चार न्यायाधीशों की पहल को भी नुकसान पहुंचा दिया और उन पर भी भाजपा विरोधी होने का आरोप लगने लगा। कुल मिलाकर फिलहाल तो कांग्रेस की मेहनत पर पानी फिर गया है। उसने ऐसा माहौल बना दिया था मानो महाभियोग पेश होते ही मुख्य न्यायाधीश इस्तीफा देकर खुद चलते बनेंगे जैसा पिछले अधिकतर महाभियोगों में हुआ लेकिन श्री मिश्रा विचलित नहीं हुए। वेंकैया नायडू भी संसदीय प्रक्रिया के अच्छे जानकार हैं। इसलिए वे भी दबाव में नहीं आये। उनके निर्णय के बाद बेहतर होगा कांग्रेस और उसके सहयोगी दल न्यायपालिका में सुधार लाने के लिए सकारात्मक सुझावों के साथ सामने आएं तो देश भी उन्हें गम्भीरता से लेगा लेकिन अभी भी यदि वह इसे घसीटती रही तब ये आरोप और मज़बूत हो जाएगा कि वह मुद्दा विहीन होकर रह गई है। महाभियोग मामले में उपराष्ट्रपति का फैसला जिन विशेषज्ञों की सलाह पर लिया गया उनकी प्रामाणिकता पर किसी को कोई संदेह नहीं है इसलिए इस निर्णय को स्वीकार करना ही सही होगा क्योंकि न्यायपालिका की छवि खराब करने से समूची लोकतांत्रिक व्यवस्था कलंकित होती है ।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 21 April 2018

मिश्रा जी तो बहाना हैं - मोदी असली निशाना हैं

आखिर कांग्रेस ने देश के मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा के विरुद्ध महाभियोग का नोटिस राज्यसभा के सभापति वेंकैया नायडू को दे ही दिया। 71 सदस्यों के हस्ताक्षरयुक्त उक्त नोटिस पर संविधान में वर्णित प्रक्रिया के तहत महाभियोग चलाया जावेगा। वैसे इसके पारित होने की कोई सम्भावना नहीं है क्योंकि उच्च सदन में आवश्यक दो तिहाई बहुमत महाभियोग पेश करने वालों के पास नहीं है। विपक्ष में भी इसे लेकर अंतर्विरोध है। कल्पना के तौर पर मान भी लें कि राज्यसभा इसे स्वीकार कर ले तब भी लोकसभा में तो विपक्ष के पास महाभियोग पेश करने लायक सदस्य संख्या तक नहीं है। इसलिए ऐसा लगता है इस प्रस्ताव का हश्र भी सरकार के विरुद्ध साधारणतया पेश किए जाने वाले अविश्वास प्रस्ताव की तरह होगा जिसका गिरना तय होता है लेकिन सदन में बहस के जरिये विपक्ष जनता तक अपनी बात प्रेषित कर ले जाता है। मुख्य न्यायाधीश के विरुद्ध महाभियोग कोई राजनीतिक मसला नहीं है इसलिए उस पर सदन में होने वाली बहस अथवा अन्य कार्रवाई का अकादमिक महत्व ही रहेगा। ऐसे में प्रश्न उठता है कि आखिर कांग्रेस सहित कुछ विपक्षी दलों को क्या सूझा जो वे उसका परिणाम जानते हुए भी महाभियोग जैसा असामान्य कदम उठाने बाध्य हुए? चूंकि आम जनता को भी इस विषय से कोई सरोकार नहीं है इसलिए महाभियोग से क्या हासिल होगा ये भी समझ से परे है। लेकिन बुद्धिजीवी वर्ग के अलावा विधि क्षेत्र से जुड़े लोगों को भी ये बात समझ आ रही है कि इस पूरी कवायद का उद्देश्य न्यायपालिका पर दबाव बनाना है। मुख्य न्यायाधीश पर जो आरोप लगाए गए हैं वे कितने सही हैं ये तो जांच से ही पता चल सकेगा किन्तु सामान्य अवधारणा ये है कि उनके कतिपय फैसलों से कांग्रेस और उससे जुड़े कुछ अन्य विपक्षी दलों को परेशानी हो रही थी। सबसे अधिक चर्चा इस बात को लेकर भी है कि श्री मिश्रा द्वारा राम जन्मभूमि विवाद की सुनवाई तेजी से करते हुए उसे निश्चित समय सीमा में निपटाने की जो पहल की गई वह कांग्रेस की चिंता का सबसे बड़ा कारण है। उल्लेखनीय है महाभियोग लाने में सबसे आगे रहने वाले कांग्रेस के राज्यसभा सदस्य और वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल इस प्रकरण की सुनवाई आगामी लोकसभा चुनाव के बाद करवाने का अनुरोध सर्वोच्च न्यायालय में कर चुके थे जिसे श्री मिश्रा ने अस्वीकार करते हुए सुनवाई तेज कर दी। ऐसा लगता है कांग्रेस को डर है कि अयोध्या विवाद पर यदि फैसला मंदिर के पक्ष में हुआ तब 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा राम लहर को पुनर्जीवित करने में कामयाब हो जाएगी और खुदा न खास्ता सर्वोच्च न्यायालय ने मस्जि़द समर्थकों की बात को सही करार दिया तब उसकी सहज प्रतिक्रिया हिन्दू ध्रुवीकरण के रूप में नरेंद्र मोदी का बेड़ा पार लगाने में सहायक होगी। इसके अलावा मुख्य न्यायाधीश के प्रति खुन्नस तीन तलाक़ के विरोध में दिए गए निर्णय भी रहे और उसके बाद मुस्लिम समाज में बहुपत्नी प्रथा और हलाला जैसी रीतियों को समाप्त करने सम्बन्धी याचिकाओं पर भी श्री मिश्रा द्वारा स्वयं सुनवाई करने से भी कांग्रेस आशंकित है क्योंकि तीन तलाक़ की तरह यदि बहु पत्नी और हलाला जैसी प्रथा भी गैरकानूनी घोषित हो गई तो उससे मुस्लिम समुदाय जाहिर तौर पर नाराज होगा जिसकी प्रतिक्रियास्वरूप हिन्दू मतदाताओं के गोलबंद होने की सम्भावना स्वाभाविक रूप से बढ़ जाएगी। यदि श्री मिश्रा की बजाय कोई अन्य न्यायाधीश उक्त मामलों की सुनवाई कर रहा होता तब शायद महाभियोग जैसा दांव न चला जाता। मुख्य न्यायाधीश पर एक निजी संस्थान सम्बन्धी मामले में अतिरिक्त रुचि लेकर हस्तक्षेप करने का जो आरोप है वह अवश्य प्रथम दृष्ट्या विचारणीय लगता है। शेष आरोपों में सर्वोच्च न्यायालय की प्रशासनिक व्यवस्था सम्बन्धी उनकी स्वेच्छाचारिता ही प्रमुख है। महाभियोग का आधार सही मायने में जनवरी माह में सर्वोच्च न्यायालय के चार न्यायाधीशों द्वारा पत्रकार वार्ता में श्री मिश्रा के विरुद्ध लगाए गए आरोपों के बाद ही तैयार कर लिया लगता है। पत्रकार वार्ता के फौरन बाद उनमें से एक न्यायाधीश श्री चेलमेश्वर से सीपीएआई नेता डी.राजा का मिलने जाना राजनीतिक षडय़ंत्र के संकेत भी दे गया। महाभियोग में उन चार न्यायाधीशों के उस आरोप को भी मुद्दा बनाया गया जिसके अनुसार श्री मिश्रा महत्वपूर्ण मामलों की सुनवाई वरिष्ठ न्यायाधीशों की बजाय कनिष्ठों को दे दिया करते हैं। इसी विवाद के चलते एक न्यायाधीश के निर्णय को दूसरे द्वारा उलटने जैसे वाकये भी देखने मिले। मुख्य न्यायाधीश के कतिपय फैसलों पर भी कांग्रेस को ऐतराज है। कुल मिलाकर श्री मिश्रा के विरुद्ध लाया गया महाभियोग केवल ये प्रचार करने का जरिया बनेगा कि न्यायपालिका स्वतंत्र और निष्पक्ष नहीं है । मुख्य न्यायाधीश पर भाजपा समर्थक होने का आरोप इसलिये नहीं ठहरता क्योंकि बतौर न्यायाधीश उनका कैरियर कांग्रेस सरकार के समय प्रारम्भ हुआ था और सर्वोच्च न्यायालय में आकर मुख्य न्यायाधीश बनने तक किसी ने उन पर उंगली नहीं उठाई। उनके अनेक फैसले तो भाजपा और केंद्र सरकार दोनों को हजम नहीं हुए। इसीलिए ये मान लेना पूरी तरह गलत नहीं होगा कि महाभियोग एक सुविचारित रणनीति का हिस्सा है जिसका असली उद्देश्य वह नहीं है जो बताया जा रहा है। यही वजह है कि पूरा विपक्ष उसके साथ नहीं खड़ा हुआ। यहां तक कि भाजपा की सबसे बड़ी विरोधी ममता बैनर्जी की तृणमूल कांग्रेस तक ने उससे दूरी बना ली। इसी तरह सलमान खुर्शीद जैसे वरिष्ठ कांग्रेस नेता ने जो खुद भी जाने माने अधिवक्ता हैं, महाभियोग के औचित्य पर सवाल उठाकर ये संकेत दे दिया कि इस मुहिम पर पार्टी के भीतर भी एक राय नहीं है। लोकसभा में महाभियोग के पेश होने की कोई सम्भावना नहीं होना और राज्यसभा में उसके पारित होने लायक संख्याबल के अभाव को देखते हुए उसका हश्र कांग्रेस भी अच्छी तरह जानती है। ज्यादा से ज्यादा ये होगा कि ऐसा करके वह अन्य न्यायाधीशों पर मनोवैज्ञानिक दबाव बना सके किन्तु चार न्यायाधीशों की नाराजगी को अपने लिए फायदेमंद मानने वाली कांग्रेस और कपिल सिब्बल सरीखे उसके सलाहकार भूल जाते हैं कि सर्वोच्च न्यायालय के बाकी न्यायाधीश मुख्य न्यायाधीश के पक्ष में हैं। रही बात प्रशासनिक दृष्टि से न्यायाधीशों के अधिकारों और कार्य विभाजन की तो तमाम न्यायविद और एक दो को छोड़कर अधिकांश पूर्व न्यायाधीशों ने भी खुले तौर पर कहा है कि मुख्य न्यायाधीश मास्टर ऑफ रोस्टर होने के कारण किसे कौन सा प्रकरण सुनवाई हेतु आवंटित किया जावे ये तय करने स्वतंत्र हैं। ऐसे में पूर्व से चली आ रही व्यवस्था पर अचानक सवाल खड़े कर देना सन्देह उत्पन्न करता है। मुख्य न्यायाधीश पर व्यक्तिगत रूप से जो आरोप लगे हैं उनकी सफाई उन्हें अवश्य देनी चाहिए। बाकी सब राजनीति प्रेरित लगते हैं। कुल मिलाकर कहें तो ये महाभियोग मुख्य न्यायाधीश के बहाने मोदी सरकार पर निशाना साधने की कोशिश लगती है लेकिन अति उत्साह में पांसा उल्टा पड़ा तो कांग्रेस के लिए ये कदम आत्मघाती भी हो सकता है। वैसे भी कपिल सिब्बल वकील कितने भी बड़े हों किन्तु उनकी राजनीतिक समझ बहुत अच्छी नहीं कही जाती। अतीत में भी वे कांग्रेस के नुकसान का कारण बनते रहे हैं ।

-रवीन्द्र वाजपेयी