Saturday, 26 May 2018

फिलहाल तो सारा परिदृश्य मोदी के ईर्दगिर्द घूम रहा है

भारत सरीखे विविधताओं और समस्याओं से भरे देश में सरकार चलाना मामूली बात नहीं होती। करोड़ों लोगों को शिक्षा, स्वास्थ्य, बिजली,  पीने का पानी, सड़क और यहां तक कि शौचालय तक उपलब्ध न हो वहां ढर्रे से हटकर काम करने का निर्णय दुस्साहसिक ही कहा जायेगा। उस दृष्टि से नरेंद्र मोदी सरकार ने बीते चार साल में क्या किया इसका लेखा जोखा करने बैठें तो कहीं खुशी कहीं गम की स्थिति है। 60 महीनों में सबका साथ सबका विकास के वायदे के साथ सत्ता में आने के बाद श्री मोदी ने शुरुवात तो तेजी से की। समस्याओं की तह में जाकर उनका निराकरण करने की उनकी शैली ने सकारात्मक  प्रभाव भी दिखाया। आम जन को लाभ पहुंचाने के लिए प्रधानमंत्री ने जो पहल की उसके भी अच्छे नतीजे निकले हैं। सबसे अच्छी बात ये रही कि वे अपने निर्णयों को लागू करने में दृढ़ इच्छाशक्ति का प्रदर्शन करते हैं। यही वजह है कि तमाम विरोधों के बावजूद उनकी लोकप्रियता खत्म नहीं हुई। बीते चार सालों में उनकी सरकार और पार्टी के पास गिनाने के लिए तमाम उपलब्धियां हैं वहीं विरोधियों के अनुसार ये सरकार पूरी तरह विफल रही। लेकिन इन सबसे हटकर आकलन करें तो ये मानना पड़ेगा कि श्री मोदी ने देश का आत्मविश्वास घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय दोनों मोर्चों पर ऊंचा किया है। विपक्ष चाहे जितना मजाक उड़ाए किन्तु विदेशी दौरों के जरिये प्रधानमंत्री ने भारत की छवि को उज्ज्वल और सशक्त बनाने में शानदार कार्य किया। न केवल अमेरिका, रूस, ब्रिटेन, फ्रांस , चीन बल्कि मंगोलिया और संयुक्त अरब अमीरात जैसे छोटे - देशों तक से राजनयिक सम्बन्ध सुदृढ़ करते हुए भारत के आर्थिक और सामरिक हितों का संवर्धन करने में  उनकी भूमिका बेहद सराहनीय रही। इसका सुपरिणाम ये हुआ कि वैश्विक स्तर पर भारत किसी एक देश या गुट पर अवलम्बित नहीं रहा। रक्षा सौदों पर अनिर्णय की जो स्थिति इस सरकार को विरासत में मिली उससे बाहर निकलकर सेना को साधन और शक्ति सम्पन्न करने के लिए बीते चार वर्ष में जो काम हुआ वह भले ही जनसाधारण के संज्ञान में नहीं आया हो किन्तु जो लोग रक्षा क्षेत्र के जानकार हैं वे इसे बहुत बड़ी उपलब्धि मानते हैं। विशेष बात ये रही कि अरबों-खरबों के अस्त्र-शस्त्र और रक्षा सम्बन्धी तकनीक के सौदों में पारदर्शिता सर्वोच्च प्राथमिकता रही। दलालों को दरकिनार रखते हुए सीधे सरकार के स्तर पर खरीद हुई जिससे भ्रष्टाचार की गुंजाइश खत्म हो गई। पाकिस्तान, चीन, म्यांमार, बांग्लादेश आदि के साथ सीमा विवाद के मामले में भी मोदी सरकार ने काफी दृढ़ता दिखाई है। डोकलाम विवाद पर चीन द्वारा बनाए गये दबाव का सामना साहस और चतुराई के साथ किया जाना इसका प्रमाण है। विश्व के लगभग सभी राष्ट्राध्यक्षों के साथ निजी सम्बन्ध स्थापित करना आसान काम नहीं था लेकिन इस मोर्चे पर श्री मोदी की कामयाबी हर दृष्टि से उल्लेखनीय रही। विदेश यात्राओं के दौरान भारतीय समुदाय के साथ सीधा संवाद स्थापित करने की उनकी शैली का जबरदस्त प्रभाव हुआ जिससे अप्रवासी भारतीयों के मन में अपने देश के लिए कुछ कर गुजरने की भावना विकसित हुई। जहां तक बात घरेलू मोर्चे की है तो प्रधानमंत्री ने जो भी योजनाएं और कार्यक्रम बनाए उनमें से अधिकाँश दूरगामी लक्ष्यों पर केंद्रित होने से भले ही तात्कालिक रूप से परिणाम न दे पा रहे हों लेकिन भविष्य में देश को उनसे फायदा होना सुनिश्चित है। स्वच्छता मिशन, शौचालय और स्वास्थ्य बीमा जैसी योजनाओं का कोई भी समझदार व्यक्ति विरोध नहीं कर सकता। इसी तरह मुफ़्त रसोई गैस कनेक्शन भी स्वागतयोग्य कदम है। प्रधानमंत्री आवास योजना के अंतर्गत शहरी और ग्रामीण आबादी के बेघरबार लोगों को सस्ते मकान देने का कार्य क्रांतिकारी कहा जा सकता है। प्रधानमंत्री ने पहले दिन से ही केंद्रीय सचिवालय का ढर्रा सुधार दिया जहां से सचिव स्तर तक के अधिकारी भी कार्यालयीन समय में गायब रहा करते थे। वे स्वयं समय से पूर्व दफ्तर आ जाते हैं। नोटबन्दी और जीएसटी जैसे निर्णयों को जबरदस्त विरोध के बावजूद लागू करवाना उनके खाते में बड़ी उपलब्धि कही जाएगी जिसकी वजह से भाजपा का परम्परागत मतदाता भी उससे रूष्ट हुआ किन्तु प्रधानमंत्री विचलित नहीं हुए। मोदी सरकार की सफलता की फेहरिस्त और लंबी बन सकती थी किन्तु हर समय चुनाव-चुनाव का माहौल बना रहने से कई ऐसे निर्णय अधर में अटके पड़े रह गए जिनका लाभ देश को मिल सकता था। रही बात राजनीति की तो ये कहना गलत नहीं होगा कि प्रधानमंत्री ने भाजपा को सही मायनों में अखिल भारतीय पार्टी बना दिया जो बहुत बड़ी बात है। लेकिन कुछ बातें ऐसी भी हैं जिनकी वजह से मोदी सरकार के प्रति 2014 में नजर आने वाले उत्साह और काफी हद तक विश्वास में कमी आई है। विदेशों से काला धन वापिस लाकर हर देशवासी के खाते में 15 लाख जमा करने को  भले ही भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने जुमला कहकर हवा-हवाई कर दिया हो किन्तु विपक्ष के लिए वह आज भी सबसे बड़े हथियार के तौर पर है। काले धन के खात्मे की दिशा में भी मोदी सरकार ने सिवाय नोटबन्दी के और ऐसा कुछ भी नहीं किया जिससे जनता आश्वस्त हो पाती। इसी तरह किसानों को खुश करने के मामले भी यह सरकार कठघरे में खड़ी की जाती है। एक और आरोप प्रधानमंत्री पर लगता है कि उन्होंने सरकार और पार्टी दोनों के भीतर एकाधिकारवादी रवैया अपनाकर बाकी सबको दरकिनार करते हुए इंदिरा गांधी के दौर की स्मृतियां सजीव कर दीं। सरकार में इक्का-दुक्का को छोड़ दें तो किसी मंत्री की हैसियत और हिम्मत नहीं है जो प्रधानमंत्री से असहमत होना तो दूर खुलकर बात तक कर सके। यही हाल पार्टी का भी है जहां मोदी और अमित शाह ने सबको बौना साबित बना दिया है। उनकी यही छवि उनके विरोधियों के लिए मददगार बन गई और देखते ही देखते प्रधानमंत्री को असहिष्णुता का प्रतीक बनाकर ऐसा साबित करने का प्रयास हुआ कि अभिव्यक्ति की आज़ादी छीन ली गई हो। सांप्रदायिकता फैलाने को लेकर भी मोदी सरकार पर जबरदस्त आरोप लगते हैं। तीन तलाक़ के विरुद्ध चलाई मुहिम को भी आधार बनाया गया। मुसलमानों और ईसाइयों में भरोसा पैदा करने में भी ये सरकार अपेक्षानुसार सफल नहीं रही तो उसकी वजह वे हिन्दू संगठन हैं जिनकी स्वछन्दता सरकार के लिए मुसीबतें पैदा करती रही है। इस सरकार की बड़ी विफलताओं में कश्मीर समस्या का हल न ढूंढ पाना भी है। पीडीपी के साथ सत्ता में साझेदारी जिस मकसद से की गई उसका औचित्य जनता तो क्या खुद भाजपाइयों को भी नहीं समझाया जा सका। इसी तरह बिना बहुमत आए भी जोड़तोड़ से कई राज्यों में सरकारें बना लेने से नौतिकता की कसौटी पर मोदी सरकार के अंक घटे हैं। सर्वोच्च न्यायालय के ताजा विवाद पर न्यायपालिका में भ्रष्टाचार को बड़ा मुद्दा बनाते हुए एक लॉबी विशेष ने ये प्रोपेगंडा शुरू कर दिया कि न्यायपालिका स्वतन्त्र नहीं है लेकिन कर्नाटक के सियासी विवाद पर आए फैसले ने उसे गलत साबित कर दिया। कुल मिलाकर बीते चार वर्ष में नरेंद्र मोदी ने ऐसे प्रधानमंत्री की छवि तो बनाई जिसमें निर्णय लेने की क्षमता है। वे ऐसे कप्तान के रूप में भी सामने आए हैं जो कप्तानी पारी खेलकर मुकाबले को मोडऩे में सक्षम है। उनकी कार्यशैली को अहंकारी मानने वाले भी ये तो स्वीकार करेंगे ही कि तमाम विवादों के बावजूद प्रधानमंत्री ने एक ऐसे दमदार नेता के रूप में स्वयं को स्थापित किया है जो सत्ता के साथ ही व्यवस्था बदलने की सोच रखता है। यही वजह है कि हाल ही में जो भी सर्वेक्षण आए उन सभी में नरेंद्र मोदी भारी पड़ते नजर आए। उनका विरोध जनता के बीच उतना नहीं जितना एक लॉबी विशेष कर रही है। पेट्रोल-डीजल को छोड़कर बाकी जीवनोपयोगी वस्तुओं के दाम नियंत्रण में हैं। विदेशी मुद्रा भंडार लबालब है, अर्थव्यव्यस्था मंदी से उबरकर गति पकड़ रही है। सबसे बड़ी बात ये है कि प्रधानमंत्री के सत्ता में लौटने के भय से काँग्रेस सहित सभी विपक्षी पार्टियां एकजुट होने मज़बूर हो गईं। 2019 में ये सरकार फिर लौटेगी या जनता परिवर्तन करेगी ये फिलहाल कहना कठिन है क्योंकि आज की राजनीति भी सीमित ओवरों का क्रिकेट मैच बनकर रह गई है जिसमें आखिरी क्षण तक अनिश्चितता बनी रहती है। फिलहाल तो सारा परिदृश्य प्रधानमंत्री के इर्द गिर्द ही घूम रहा है। आप चाहे उनकी प्रशंसा करें या आलोचना लेकिन उपेक्षा नहीं कर सकते। उन्हें विफल बताने वाले भी इस आशंका से ग्रसित हैं कि ये शख्स अन्तिम ओवरों में मैच अपने पक्ष में करने की कला में माहिर है ।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 25 May 2018

पेट्रोल-डीजल : इसके पहले कि मामला हाथ से निकल जाए ...

पेट्रोल और डीजल की कीमतों के लगातार बढऩे से मोदी सरकार की जबरदस्त किरकिरी हो रही है। पिछली सरकार के कार्यकाल में उक्त चीजों के दाम बढऩे पर वर्तमान प्रधानमंत्री द्वारा व्यक्त की गईं प्रतिक्रियाओं को प्रस्तुत करते हुए उनसे सवाल पूछे जा रहे हैं। हालांकि भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और पेट्रोलियम मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के बीच हुई बैठक के बाद लगा था कि राहत की बरसात होगी लेकिन मूल्य सूरज की गर्मी की तरह बढ़ते ही जा रहे हैं। निश्चित रूप से साग-सब्जियां, दालें, चीनी आदि के दाम कम होना केंद्र सरकार की उपलब्धि मानी जा सकती है लेकिन दूसरी तरफ  ये भी सही है कि 2014 में नरेंद्र मोदी की सरकार बनने के बाद पेट्रोल-डीजल के दामों में आई कमी को अपने नाम लिखने वाली केंद्र सरकार बढ़ती कीमतों को रोक पाने में जिस तरह असहाय नजर आ रही है उससे लगता है कि या तो वह जान-बूझकर पेट्रोलियम कम्पनियों को लूटमार करने की छूट दिए हुए है जिनमें सरकारी और रिलायंस सरीखी निजी कंपनी भी है या फिर सरकार चला रहे लोगों के दिमाग काम नहीं कर रहे। हकीकत जो भी हो लेकिन जब कच्चे तेल की अंतर्राष्ट्रीय कीमतें बेहद कम थीं तब पेट्रोल-डीजल के दाम उस अनुपात में कम नहीं करने के पीछे तर्क दिया जाता था कि ऑयल पूल के पिछले घाटे की पूर्ति हेतु वैसा करना पड़ रहा था। ये आश्वासन भी दिया गया कि जब वैश्विक स्तर पर मूल्य बढ़ेंगे तब सरकार उपभोक्ता को राहत देने के लिए अपने खजाने से मदद देगी। पिछली सरकार द्वारा ईरान को चुकाई जाने वाली बकाया राशि के नाम पर भी मूल्य वृद्धि के औचित्य को सिद्ध किया जाता रहा। लेकिन  धीरे-धीरे जो तथ्य सामने आते गए उनसे स्पष्ट हो गया कि केंद्र और राज्य दोनों की सरकारें पेट्रोल-डीजल को अपनी कमाई का जरिया बना चुकी हैं। जो आकंड़े आए हैं उनके मुताबिक तो कीमत से ज्यादा टैक्स थोपा जा रहा है। जब चारों तरफ  से आलोचना होने लगी और बचाव का कोई वाजिब बहाना नहीं बचा तब केंद्र के मंत्री पेट्रोल-डीजल से होने वाली अंधाधुंध कमाई को विकास कार्यों में खपाए जाने की बात कहने में जुट गए। उनके तर्कों को स्वीकार कर लिया जाए तो भी ये तो कहना ही पड़ेगा कि परिवहन में प्रयुक्त होने वाले पेट्रोलियम पदार्थों की बेलगाम होती कीमतों का असर अंतत: महंगाई बढऩे के तौर पर आता है। मान भी लें कि केंद्र सरकार की नीयत में किसी भी प्रकार की खोट नहीं है और वह जो भी कर रही है वह देश हित में है लेकिन आम जनता का तेल निकालकर किया जाने वाला विकास सैद्धांतिक दृष्टि से कितना भी सही हो लेकिन व्यवहारिक तौर पर देखें तो वह किसी संवेदनशील सरकार से अपेक्षित नहीं होता। विगत दिनों सरकार की तरफ  से संकेत आए कि वह पेट्रोल-डीजल की कीमतों को युक्तियुक्तपूर्ण बनाने के लिए कोई दूरगामी प्रबंध करने जा रही है किंतु कीमतों में हो रही दैनिक वृद्धि के चलते उसकी बात पर भरोसा नहीं होता। केंद्र चाहे तो एक्साइज वहीं राज्य सरकारें वैट घटाकर आम उपभोक्ता को राहत दे सकती हैं लेकिन ऐसा लगता है दोनों में पहले आप, पहले आप की होड़ मची है। गत दिवस नीति आयोग ने भी खुले शब्दों में वैट घटाने की समझाइश दे डाली। पेट्रोल-डीजल को जीएसटी में लाने के लिए सिर्फ  महाराष्ट्र सरकार ने अपनी सहमति दी है जबकि टैक्स के मामले में महाराष्ट्र और मप्र सबसे आगे हैं। आश्चर्य की बात है कि भाजपा शासित गोवा में पेट्रोल-डीजल सबसे सस्ता है तब सवाल उठता है कि बाकी भाजपा शासित राज्यों ने गोवा फार्मूले को क्यों नहीं स्वीकार किया? जहां तक सवाल जीएसटी का है तो देश के अधिकांश राज्यों में भाजपा या उसके सहयोगी दलों का राज है। जीएसटी काउंसिल में भी उन्हीं का बहुमत है। ऐसे में काउंसिल की बैठक में पेट्रोल-डीजल पर विचार क्यों नहीं होता इसका उत्तर देने कोई सामने नहीं आ रहा। पूरे देश में इन चीजों की कीमतों में लगी आग से जनता गुस्से से उबल रही है। विपक्षी दलों को भी मोदी सरकार को घेरने का अवसर मिल गया है। कर्नाटक में सरकार बनाते-बनाते रह गई भाजपा को भी मप्र, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के चुनाव की चिंता सता रही है। पेट्रोल-डीजल की कीमतें यदि इसी तरह बढ़ती गईं तो भाजपा उक्त राज्यों में अपनी सरकारें बचाने में सफल नहीं होगी। ये कहना भी गलत नहीं होगा कि मोदी सरकार की कथित उपलब्धियों के नाम पर भाजपा 2019 में फिर एक बार मोदी सरकार का नारा लोगों के गले नहीं उतार पाएगी। प्रधानमंत्री आवास योजना, स्वच्छता, उज्ज्वला, जनधन, मुफ्त रसोई गैस कनेक्शन के अलावा देश भर में राष्ट्रीय राजमार्गों के अलावा फ्लाईओवर, जैसे काम  तेजी से चल रहे हैं। नोटबन्दी और जीएसटी के विपरीत प्रभाव भी धीरे-धीरे  कम होने लगे हैं। प्रधानमंत्री की छवि भी अच्छी है। आम धारणा है कि वे एक ईमानदार और मेहनती इंसान हैं जो देश के चौतरफा विकास के लिए प्रतिबद्ध हैं। विदेश नीति के मोर्चे पर भी उनका प्रदर्शन बेहद प्रभावशाली रहा है। बावजूद इस सबके पेट्रोल-डीजल की क़ीमतों के आसमान की तरफ  उठते जाने से जनता के मन में जबरदस्त असन्तोष है। अगर अंतर्राष्ट्रीय कीमतें कम होने के समय मोदी सरकार उनका लाभ भारतीय उपभोक्ता तक पहुंचने देती तब आज की स्थिति में मूल्य वृद्धि का औचित्य सिद्ध करने का पूरा अवसर और अधिकार उसके पास होता। बीते दिनों सरकारी तेल कंपनियों के मुनाफे सम्बन्धी जो आंकड़े उजागर हुए उनके कारण भी आम जनता के मन में ये धारणा घर करती जा रही है कि सरकार पूरी तरह मुनाफाखोर हो गई है और जनता की जेब काटने का कोई मौका वह नहीं चूकती। भाजपा के भीतरखानों में भी पेट्रोल-डीजल की कीमतों को लेकर जबर्दस्त आक्रोश है किन्तु मोदी-शाह के दबदबे के चलते किसी की हिम्मत नहीं पड़ रही जुबान खोलने की। हालांकि लगातार ये संकेत मिल रहे हैं कि अतिशीघ्र केंद्र सरकार कोई न कोई ऐसा कदम उठाएगी जिससे दाम नीचे लाये जा सकें। देखादेखी राज्य भी टैक्सों का भार घटा सकते हैं। कम से कम एनडीए शासित प्रदेशों को तो ऐसा करना चाहिए क्योंकि उससे अन्य राज्यों पर भी जनमत का दबाव बढ़ेगा। भाजपा और मोदी सरकार को ये नहीं भूलना चाहिए कि देर से लिया गया सही निर्णय भी अपेक्षित परिणाम नहीं दे पाता। इसके पहले कि मामला हाथ से निकल जाए उसे संभालने में ही बुद्धिमानी होती है।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 24 May 2018

बिरयानी के बदले पत्थर !

खबर बहुत छोटी सी लेकिन चौंकाने वाली है। रमजान के मद्देनजर कश्मीर घाटी में राज्य की मुख्यमंत्री मेहबूबा मुफ्ती के आग्रह पर सुरक्षा बलों ने युद्धविराम किया हुआ है। अतीत में भी ऐसा होता रहा है। इसका उद्देश्य पारस्परिक सद्भाव में वृद्धि करना है। यद्यपि सीमा पार से हो रहे पाकिस्तानी हमले का भारतीय सेना माकूल जवाब दे रही है लेकिन घाटी के भीतर सक्रिय आतंकवादियों और अलगाववादियों के विरुद्ध सुरक्षा बल पूरी तरह से ठंडे पड़ गए। हालांकि पूरे देश में इस इकतरफा युद्धविराम का विरोध हुआ लेकिन केंद्र सरकार ने अपना निर्णय नहीं बदला। लेकिन गत दिवस जो घटना घटी उससे साबित हो गया कि सांप को दूध पिलाने से उसका ज़हर कम नहीं होता। घाटी के सोपिया नामक स्थान के एक ग्राम में सेना ने रमजान के अंतर्गत रोजा रखने वालों के लिए इफ्तार पार्टी आयोजित की। सैनिक बिरयानी के साथ और भी व्यंजन गांव वालों के लिए ले गए किन्तु इस सौजन्यता के लिए शुक्रिया अदा करने के स्थान पर गांव वालों ने सेना के जवानों पर पत्थरबाजी शुरू कर दी। हालात बेकाबू होने पर सैनिकों को गोली चलानी पड़ी। उक्त वारदात के बाद सेना को निर्देश दे दिए गए हैं कि वह विरोध की संभावना वाले इलाकों में रोजा इफ्तार का आयोजन नहीं करे। उसी तरह इकतरफा युद्धविराम के बावजूद यदि कहीं कोई हमला होता है तो सेना जवाबी कार्रवाई करने के लिए स्वतंत्र रहेगी। इसे  एक साधारण स्थानीय घटना कहकर उपेक्षित भी किया जा सकता है लेकिन ऐसा करना अपने आपको धोखा देने जैसा होगा। कश्मीर घाटी रूपी हांडी का ये एक चावल देखकर काफी कुछ अंदाज लगाया जा सकता है। सीमा पार से तो रमज़ान के शुरू होते ही जबरदस्त गोलाबारी की जा रही है। सैन्य सूत्रों के मुताबिक युद्ध जैसी हालात से इंकार नहीं किया जा सकता। लेकिन घाटी के भीतर सुरक्षा बलों द्वारा अपना अभियान बंद कर देने के बाद भी यदि अलगाववादी इफ्तार दावत को ठुकराकर पत्थरबाजी जैसा टुच्चापन करते हैं तब सुरक्षा के लिए तैनात जवानों के हाथ बांधने का कोई लाभ या अर्थ नहीं है। वैसे ये पहला अवसर नहीं है जब सेना द्वारा बढ़ाए गए दोस्ती के हाथ के उत्तर में देश विरोधी ताकतों ने ज़हर बुझे तीर छोड़ दिये हों। इस्लाम के अनुयायियों के लिए रमज़ान सबसे पवित्र महीना माना जाता है। भरी गर्मी में रोज़ा रखकर अपने मन को शुद्ध करने का प्रयास मुसलमान करते हैं। इस अवसर पर इफ्तार पार्टियां भी आयोजित होती हैं। गैर मुस्लिम भी अपने मुसलमान मित्रों के लिए इफ्तार आयोजित करते हैं। इनके जरिये साम्प्रदायिक सद्भाव बढ़ाने का प्रयास किया जाता है। कश्मीर के उपद्रवग्रस्त इलाकों में सेना की तरफ  से इफ्तार पार्टी रखना इसी दिशा में बढाया कदम था लेकिन सद्भावना के उत्तर में फूल की बजाय पत्थर मिलना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। घाटी के भीतर रमज़ान के दौरान सुरक्षा  बलों को संयम बरतने का सख्त निर्देश दिया जाता है। सही मायनों में उनकी इच्छा के सर्वथा विरुद्ध होने के बाद भी वे उसका ईमानदारी से पालन करते हैं। वैसे भी अनुशासन और आदेशों के पालन में भारतीय सेना बेमिसाल है वरना कश्मीर घाटी में आतंकवादियों को बचाने के लिए पत्थरबाजी करने वालों की लाशें बिछा दी जातीं। ताजा उदाहरण तमिलनाडु के तूतीकोरिन का है जहां प्रदर्शनकारियों द्वारा पत्थरबाजी किये जाने पर वहां मौजूद बल ने गोलियां चला दीं। जिसमें दर्जन भर से ज्यादा लोग मारे गए । कश्मीर घाटी में तो सुरक्षा बलों को आए  दिन पत्थरबाजी झेलनी पड़ती है परंतु वे कभी आपा नहीं खोते। लेकिन सोपिया के ग्राम में इफ्तार पार्टी के आयोजन पर जिस तरह पत्थरबाजी हुई उसके बाद तो केंद्र सरकार को भी अपने निर्णय पर पुनर्विचार करना चाहिए। किसी भी धर्म के पवित्र अवसरों पर उनकी गरिमा और सम्मान बनाए रखना सभ्य समाज का लक्षण है लेकिन कश्मीर में पल रहे पाकिस्तान के मानसपुत्रों में चूंकि खुद भी इस्लाम के प्रति कोई आदरभाव नहीं है तब उनके साथ रहम करना सिवाय मूर्खता के और कुछ भी नहीं है जो आज़ादी के बाद से शुरू होकर आज भी जारी है। वर्तमान केंद्र सरकार ने काफी सख्ती दिखाते हुए घाटी के हालात बहुत हद तक सुधारे लेकिन कुछ ज्ञात और कुछ अज्ञात कारणों से उसे बार-बार कदम पीछे खींचना पड़े। रमज़ान में युद्धविराम के माध्यम से कश्मीर घाटी की मुस्लिम आबादी के प्रति जो मोहब्बत दर्शाई गई यदि उसका जवाब पत्थर है तब बिरयानी की जगह अलगाववादी मानसिकता से लबरेज ऐसे लोगों को उनकी माकूल सजा मिलनी ही चाहिए। अपने ऊपर हमला होने पर सुरक्षा बलों को समुचित जवाब देने की जो छूट दी गई वह पूरी तरह उचित है। यदि सोपिया जैसी कोई घटना दोहराई जाती है तब इकतरफा युद्धविराम को भी वापिस ले लेना चाहिए।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 23 May 2018

बर्र के छत्ते में पत्थर मार दिया आर्च बिशप ने

दिल्ली में कैथोलिक ईसाई समुदाय के आर्च बिशप अनिल काउटो द्वारा समस्त चर्चों को भेजे एक पत्र के मजमून ने राजनीतिक रूप ले लिया। आर्च बिशप ने पत्र में देश के मौजूदा माहौल को धर्मनिरपेक्षता के लिए खतरा बताकर हुए राजनीतिक अशांति को लोकतंत्र के लिए भी नुकसानदेह मानते हुए ईसाई समुदाय से व्रत रखने के साथ 2019 में नई सरकार के गठन हेतु चर्चों में प्रार्थना करने की समझाइश भी दी है। ये पत्र सार्वजनिक कैसे हुआ या जानबूझकर किया गया ये तो स्पष्ट नहीं है लेकिन उससे जबरदस्त विवाद उत्पन्न हो गया। श्री काउटो ने अपने पत्र को चर्च में पढ़े जाने का अनुरोध भी किया है। इससे लगता है कि वह कोई सामान्य परिपत्र नहीं है। भाजपा और संघ परिवार सहित अन्य हिन्दू संगठनों ने आर्च बिशप के पत्र को लेकर जिस तरह से  बवाल मचा दिया वह स्वाभाविक ही है। रोमन कैथोलिक चर्च वैटिकन सिटी के अधीन हैं जो एक स्वतंत्र देश है। कैथोलिक ईसाइयों के सर्वोच्च धर्मगुरु पोप उसके राष्ट्राध्यक्ष हैं। इस आधार पर हिन्दू संगठनों ने आर्च बिशप के सम्बन्धित पत्र को भारत के अंदरूनी मामलों में वैटिकन का हस्तक्षेप बताते हुए उसकी तीखी आलोचना की और उसे 2019 के लोकसभा चुनाव में ईसाई समुदाय को भाजपा के विरुद्ध गोलबंद करने का षडयंत्र बताया। हालांकि श्री काउट ने अपने पत्र को गैर सियासी बताते हुए देश के लिए प्रार्थना करने को चर्च की परंपरा से जोड़ दिया लेकिन गुजरात सहित पूर्वोत्तर के कुछ राज्यों में  विधानसभा चुनाव के दौरान ईसाई पादरियों द्वारा भाजपा के विरोध में की गईं वोट अपीलों के आधार पर भाजपा एवं संघ परिवार ने आर्च बिशप के पत्र को मुद्दा बनाकर दिल्ली से लेकर वैटिकन तक पर आरोपों की बौछार कर दी। वैसे एक बात तो सही है कि मोदी सरकार के आने के बाद से ईसाई मिशनरियों को काम करने में परेशानियां आने लगी हैं। एनजीओ के जरिये विदेशों से आने वाले अनुदानों पर भी सरकार ने जबरदस्त बंदिशें लगाकर धर्मांतरण की मुहिम को कमजोर कर दिया है। पूर्वोत्तर के राज्यों में जिस तेजी से भाजपा का प्रभाव क्षेत्र बढ़ता जा रहा है उसे देखते हुए भी ईसाई मिशनरियों में चिंता व्याप्त है। जैसी कि जानकारी मिलती रहती है उसके मुताबिक न सिर्फ  छत्तीसगढ़, उड़ीसा, झारखंड जैसे राज्यों बल्कि पूर्वोत्तर के प्रदेशों में भी नक्सली या उन जैसे ही दूसरे अलगाववादी संगठनों के साथ चर्चों का दोस्ताना है। यही वजह है कि नक्सली एवं पूर्वोत्तर में सक्रिय अन्य उग्रवादी संगठन चर्चों या पादरियों को कभी नुकसान नहीं पहुँचाते। ये सब देखते हुए आर्च बिशप के ताजे पत्र से यदि हिन्दू संगठन उद्विग्न हैं तो उसे अनावश्यक नहीं कहा जा सकता। जहां तक बात धर्मनिरपेक्षता और लोकतंत्र पर खतरे की है तो ये बात साफ  हो चुकी है कि ये सब पूरी तरह प्रायोजित दुष्प्रचार है जिसमें वामपंथी बुद्धिजीवी और समाचार माध्यमों में बैठे वे पत्रकार शामिल हैं जिनकी मानसिकता किसी भी तरह भाजपा और नरेंद्र मोदी की छवि धूमिल करना है। ये लॉबी समय-समय पर नए विवादास्पद मुद्दे छेड़कर व्यर्थ विवाद और तनाव पैदा करती है। इसका समय भी जानबूझकर ऐसा रखा जाता है जिससे कोई  न कोई चुनाव उससे प्रभावित हो सके। कर्नाटक के बाद मप्र, छत्तीसगढ़ और राजस्थान के विधानसभा चुनाव की सुगबुगाहट प्रारम्भ हो गई है। इनमें मप्र और छत्तीसगढ़ में आदिवासी बहुल सीटें भी काफी हैं जिनमें ईसाई मिशनरियों का जाल फैला हुआ है। चर्चों में 2019 के चुनाव हेतु प्रार्थना करने सम्बन्धी आर्च बिशप का पत्र इन राज्यों में ईसाई मतदाताओं को भाजपा के विरूद्ध उकसाने का शरारत भरा प्रयास भी हो सकता है। अब यदि भाजपा इस पत्र को मुद्दा बनाकर हमलावर हो गई तो वह उसकी रणनीति का हिस्सा है और प्रारंभिक तौर पर निश्चित रूप से ये कहा जा सकता है वह उसमें सफल हो गई। आर्च बिशप के पत्र की विषय वस्तु ज्योंही सामने आई त्योंही भाजपा के बड़े नेता और कार्यकर्ता आक्रामक होकर सामने आ गए जिसकी बानगी सोशल मीडिया पर प्रसारित टिप्पणियों से दिख जाती है। आर्च बिशप या ईसाई समुदाय के अन्य बड़े धार्मिक नेता ऊपर-ऊपर कहें कुछ भी लेकिन सत्य यही है कि संघ और भाजपा उनके  शत्रु नम्बर एक हैं। ऐसा क्यों है ये सभी जानते हैं लेकिन आर्च बिशप ने अपने पत्र से हिन्दू संगठनों को बैठे-बिठाए एक अवसर दे दिया धु्रवीकरण करने का। आर्च बिशप कितनी भी सफाई क्यों न देते फिरें लेकिन उनका पत्र सार्वजनिक होने से ईसाई समुदाय शक के घेरे में आ गया। यद्यपि बीते कुछ वर्षों में मुसलमानों की तरह से है ईसाई समुदाय में भाजपा ने अपने कदम बढ़ाए हैं लेकिन यथार्थ यही है कि ईसाई मिशनरियों और संघ परिवार के बीच सांप-नेवले जैसी जन्मजात शत्रुता है। इसीलिए ये माना जा रहा है कि आर्च बिशप ने व्यर्थ में बर्र के छत्ते में पत्थर मार दिया जिसका फायदा कम नुकसान ज्यादा हो गया। चर्च की प्रार्थनाओं में क्या हो, क्या नहीं ये तय करना उसका आंतरिक मामला है लेकिन जिस तरह कतिपय ईसाई धार्मिक नेता मुस्लिम धर्मगुरुओं की तरह फतवा जारी करने का शौक पाल रहे हैं उससे उनके समुदाय को राजनीतिक नुकसान होने की ही आशंका है। ईसाई समुदाय में उनके पत्र को लेकर लोगों का क्या अभिमत है ये तो साफ  नहीं है लेकिन इससे हिन्दू समाज का चौकन्ना हो जाना इस बात का संकेत है कि क्रिया की प्रतिक्रिया स्वाभाविक रूप से होती है और उस आधार पर आर्च बिशप ने अपने समुदाय को व्यर्थ में विवादग्रस्त बना लिया जिसका लाभ भाजपा उठाने में जुट गई है।

-रवीन्द्र वाजपेयी