Tuesday, 25 September 2018

भाजपा : संगठन और कार्यकर्ता के बीच संवादहीनता बढ़ रही

आज भाजपा मप्र विधानसभा चुनाव के पहले भोपाल में अपना सबसे बड़ा शक्ति प्रदर्शन कर रही है। लाखों की भीड़ को सम्बोधित करने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह को भी बुलाया गया है। हाल ही में राहुल गांधी ने भी भोपाल में बड़ी रैली और रोड शो करते हुए कांग्रेस के पक्ष में माहौल बनाने की कोशिश की थी। भाजपा चाहेगी कि उससे बड़ा जमावड़ा कर विपक्ष पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाए। भारत में लोकतंत्र अब नीतियों और सिद्धांतों से दूर हटकर भीड़तंत्र में चूंकि बदल गया है इसलिए सभी पार्टियां और नेता अपना जनाधार दिखाने के लिए अधिक से अधिक भीड़ एकत्र करते हैं। इस तरह के आयोजन में अनाप-शनाप पैसा, समय और संसाधन खर्च होते हैं। भाजपा मप्र में 15 वर्षों से काबिज है। उसका संगठन भी बेहद मजबूत माना जाता है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान भी प्रदेश के सर्वाधिक लोकप्रिय नेताओं में शुमार होते हैं। उनकी जन आशीर्वाद रैलियों में उमड़े जनसैलाब ने इस बात की पुष्टि भी की लेकिन ये कहने में भी कोई गल्ती नहीं है कि भाजपा को जितनी चुनौती इस बार कांग्रेस दे रही है उतनी पहले शायद ही कभी मिली हो। कमलनाथ के प्रदेश अध्यक्ष बनने का कितना लाभ चुनाव परिणामों में दिखाई देगा ये तो मतगणना से ही स्पष्ट होगा लेकिन इसमें कोई दो मत नहीं है कि उन्होंने कांग्रेस के आत्मविश्वास को बढ़ा दिया है। हालांकि दिग्विजय सिंह और ज्योतिरादित्य सिंधिया अपने पूर्व मतभेद भूलकर एकजुट रहेंगे इसमें संशय है किंतु कांग्रेस पहले से आक्रामक और बेहतर नजर आ रही है। इसके विपरीत भाजपा में वह कसावट नहीं दिखाई देती जो उसकी पहिचान रही है। भोपाल में महाकुंभ के एक दिन पहले समाज कल्याण बोर्ड की अध्यक्ष पद्मा शुक्ला द्वारा पद और पार्टी दोनों से इस्तीफा देना इसकी बानगी है। श्रीमती शुक्ला विजयराघवगढ़ के चुनाव लड़ते रही हैं। पिछले चुनाव में उन्होंने कांग्रेस के संजय पाठक को कड़ी टक्कर दी और वे महज 900 मतों से जीत पाए किन्तु अपने खनन व्यवसाय की रक्षा हेतु संजय भाजपा में आ गए और उपचुनाव जीतकर शिवराज सरकार में मंत्री बन बैठे। श्रीमती शुक्ल को संतुष्ट करते हुए बोर्ड अध्यक्ष बना दिया किंतु दोनों के बीच मतभेद बने रहे और अन्तत: उन्होंने भाजपा को अलविदा कह दिया। इस प्रकरण ने भाजपा में उच्च स्तर के संगठन और सत्ताधारी नेताओं के बीच संवादहीनता को उजागर कर दिया। यदि श्रीमती शुक्ला रुष्ट थीं तो उन्हें समझाने के लिए क्या किया गया? यदि ऊपरी नेताओं को पता था कि वे पार्टी छोडऩे वाली हैं तब या तो उन्हें रोकना था या फिर पद छीन कर उन्हें कमजोर करना था किंतु महाकुंभ के एक दिन पहले उन्होंने पार्टी को ठेंगा दिखाकर ये बता दिया कि भाजपा में सब मोदी भरोसे बैठे हैं। भले ही ये मान लिया जाए कि पद्मा जी एक विधानसभा सीट से ज्यादा असर नहीं डालेंगी किन्तु चुनाव के पहले इस तरह की घटनाएं पार्टी कैडर का मनोबल तोडऩे वाले होती हैं। उनके इस्तीफे को सवर्ण समाज की भाजपा से नाराजगी के तौर पर भी देखा जा रहा है। प्रश्न ये है कि भाजपा में जो संगठन मंत्री हैं वे ऐसे संवेदनशील वक्त में भी इतने उदासीन या बेपरवाह कैसे बने हुए हैं। कांग्रेस ने श्रीमती शुक्ला को पाले में लाकर कोई बड़ी उपलब्धि हासिल भले ही न की हो किन्तु भाजपा को शर्मसार होने तो बाध्य कर ही दिया। ऐसा लगता है भाजपा का प्रदेश नेतृत्व लगातार जीतते-जीतते अब ये मानकर बैठ गया है कि कार्यकर्ता बंधुआ मजदूर और जनता मज़बूर है जिस वजह से दोनों कितने भी नाराज हों किन्तु झक मारकर बटन तो कमल का ही दबाएंगे। लेकिन वह भूल जाता है कि 2000 में जन्मा बच्चा इस बार वोट देने वाला है जिसे मंदिर, हिंदुत्व वगैरह उतना आकर्षित नहीं करते। बेहतर हो भाजपा का प्रदेश नेतृत्व स्थिति की गंभीरता को समझते हुए कार्यकर्ताओं की भावनाओं को समझकर उन्हें विश्वास में ले। यदि सत्ता की मस्ती में अभी भी पार्टी डूबी रही तो महाकुंभ की भीड़ भी अपेक्षित परिणाम नहीं दे सकेगी। कांग्रेस निश्चित रूप से भाजपा के संगठन के आगे कमजोर लगती है लेकिन इस बार उसके कार्यकर्ता जोश में दिख रहे हैं जबकि भाजपा में उल्टा माहौल है। यदि जैसा कांग्रेस दावा कर रही है पद्मा शुक्ला जैसे दो चार एपिसोड और हो गए तो कमल के मुरझाने की आशंका और प्रबल हो जाएगी।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 24 September 2018

रॉफेल : प्रधानमंत्री को देश से मुखातिब होना चाहिए



फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति ओलांद ने शुक्रवार को सीधे-सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को कठघरे में खड़ा करते हुए कांग्रेस के इस आरोप को सही ठहरा दिया कि राफेल लड़ाकू विमान के सौदे में अनिल अंबानी की कम्पनी रिलायंस को हिस्सेदारी देने के लिए भारत सरकार ने दबाव डाला था जिसके बाद विमान निर्माता कम्पनी  दसॉल्ट  के पास कोई और विकल्प नहीं बचा था। कुछ पत्रकारों को दिए साक्षात्कार में ओलांद ने ज्योंही उक्त जानकारी दी भारतीय राजनीति में  बवाल मच गया। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने तो प्रधानमंत्री के लिए पहले घुमा फिराकर और फिर सीधे - सीधे चोर जैसा शब्द इस्तेमाल किया। पूर्व फ्रांसीसी राष्ट्रपति के बयान के बाद राफेल सौदे में भ्रष्टाचार को लेकर लगाए जा रहे आरोप सत्य होते लगे। लेकिन अगले दिन शनिवार को ओलांद का दूसरा बयान प्रसारित हुआ जिसमें उन्होंने अपने पहले बयान से थोड़ा हटते हुए कहा कि भारत सरकार ने अनिल अंबानी को हिस्सेदार बनाने कहा या नहीं ये उन्हें नहीं पता। इस बारे में दसॉल्ट कम्पनी ही पक्के तौर पर कुछ बता सकती है। उन्होंने फ्रांस सरकार की अनभिज्ञता भी इस बारे में उजागर की। उनके इन विरोधाभासी बयानों के बीच फ्रांस सरकार ने भी इस विवाद से पल्ला झाड़ते हुए कहा दिया कि दसॉल्ट और अम्बानी की कंपनी के बीच हुए करार से उसे कोई लेना - देना नहीं है। इस बयान से केंद्र सरकार और भाजपा राहत महसूस कर पाती इसके पहले ही कांग्रेस और आक्रामक हो गई और उसने संसदीय जांच समिति बनाने का दबाव बढ़ा  दिया। साथ ही आज वह सतर्कता आयोग भी जा रही है। इस समूचे विवाद में देखने वाली बात ये है कि प्रधानमंत्री जिन पर पूरा हमला हो रहा है वे अब तक शांत हैं। सरकार की तरफ  से बचाव की जिम्मेदारी रक्षा, कानून और वित्त मंत्री संभाले हुए हैं जबकि राहुल सहित भाजपा विरोधी अन्य पार्टियों ने भी प्रधानमंत्री से सफाई की मांग की है। हालांकि कांग्रेस ने अब तक जितने भी आरोप लगाए वे नये नहीं हैं किन्तु लगातार उनको दोहराए जाने के बावजूद न तो भाजपा और न ही केंद्र सरकार उन्हें गलत साबित कर पा रही है। राहुल गांधी की मजबूरी ये है कि इस मामले में वे इतना आगे बढ़ आए हैं कि पीछे लौटना उनके लिए आत्मघाती होगा। दूसरी तरफ  भाजपा के लिए भी इस मुसीबत से छुटकारा पाना जरूरी है क्योंकि भले ही रॉफेल में हुआ घोटाला साबित न हो पाए किन्तु जिस तरह बोफोर्स घोटाले का आरोप स्व.राजीव गांधी के राजनीतिक पराभव का कारण बना वैसे ही रॉफेल 2019 में नरेंद्र मोदी के विजय रथ को रोकने की वजह बन सकता है। इस समूचे विवाद में भाजपा और केंद्र सरकार दोनों का बचाव पक्ष बेहद कमजोर है। विमान की कीमत उतना बड़ा मुद्दा शायद नहीं बनता यदि दसॉल्ट कम्पनी भारत में अपने कारोबारी सहयोगी में रूप में अनिल अंबानी को न चुनती। राहुल का मुख्य आरोप भी यही है कि सरकारी क्षेत्र की एचएएल को दरकिनार करते हुए रिलायंस डिफेंस को हजारों करोड़ का काम क्यों दिलवा दिया ? ओलांद के प्रारम्भिक खुलासे में भी ये बात सामने आई कि भारत सरकार के दबाव में अनिल अंबानी को रक्षा उत्पादन में अनुभवहीनता के बाद भी उक्त व्यवसाय दिलवाया गया। चूंकि सौदे को अंतिम रूप देने अनिल भी श्री मोदी के साथ फ्रांस गए थे इसलिए उक्त आरोप को सहसा अविश्वसनीय नहीं माना जा सकता। यद्यपि फ्रांस सरकार ने ओलांद की बयानबाजी को किसी के लिए फायदेमंद नहीं बताकऱ  भारत सरकार की मदद का प्रयास किया है। वित्त मंत्री अरुण जेटली ने राहुल गांधी और ओलांद के बीच जुगलबंदी का आरोप लगाकर मामले को दूसरा मोड़ देने की कोशिश भी की है लेकिन अभी तक उसे लेकर जनमानस आश्वस्त नहीं हो सका है। उल्लेखनीय है ओलांद भी पिछला चुनाव हारकर विपक्ष में है। भाजपा ने ये आरोप भी लगाया कि कमीशन नहीं मिल पाने से ओलांद ने ये विवाद उत्पन्न किया। सच्चाई क्या है ये कोई नहीं बता सकता क्योंकि ऐसे मामलों में अक्सर सच्चाई सामने आती ही नहीं। रक्षा सौदों में यूँ भी गोपनीयता को बनाकर रखा जाता है। भारत सरकार भी इसी की आड़ लेकर रॉफेल सौदे का विवरण सार्वजनिक करने से पीछे हटती रही है जिससे कांग्रेस को अपना आरोप दोहराने का मौका मिलता जा रहा है। लेकिन अब ये विवाद जिस मोड़ पर आ गया है उसमें  प्रधानमंत्री को मौन तोडऩा होगा या फिर कोई ऐसा दस्तावेजी प्रमाण सामने लाना पड़ेगा जो राहुल के आक्रमण को निष्प्रभावी करते हुए उन्हें झूठा साबित कर सके। जब तक वे ऐसा नहीं कर पाते तब तक विपक्ष को हमले के अवसर मिलते रहेंगे। हालांकि प्रधानमंत्री की शैली इस तरह के मामलों में मौन रहने की रही है किन्तु ये विवाद अलग हटकर है  जिसमें उनकी साख ही नहीं भाजपा की भावी संभावनाएं भी दांव पर लगी हैं। न्यायशास्त्र के अनुसार केवल आरोप लगने से किसी पर दोष सिद्ध नहीं हो जाता लेकिन ये भी सही है कि जिस पर तोहमत लगती है उसका भी फर्ज है कि वह अपनी सफाई में ऐसा कुछ कहे जिससे न केवल आरोप बेअसर हों बल्कि उन्हें लगाने वाले की बदनीयती भी सामने आ सके। फिलहाल ये मान लेना तो जल्दबाजी होगी कि जो कुछ भी राहुल और बाकी विपक्षी पार्टियां कह रही हैं वह पूरी तरह सच है किंतु साथ-साथ ये भी  मान लेना सही नहीं होगा कि रॉफेल सौदे में हुए उच्च स्तर के भ्रष्टाचार के आरोप पूर्णत: गलत हैं। कुल मिलाकर ये प्रकरण मोदी सरकार के गले की फांस तो बन ही गया है भाजपा के लिए भी चक्रव्यूह समान है जिसे छिन्न-भिन्न करते हुए वह सुरक्षित निकलती है या फिर अभिमन्यु की गति को प्राप्त होती है ये तो बाद में पता चलेगा लेकिन समय और परिस्थितियों का तकाजा है कि प्रधानमंत्री सामने आकर राहुल गाँधी या विपक्ष से नहीं अपितु देश से मुखातिब होकर अपना पक्ष रखें। हो सकता है वे इस हमले का जवाब देने के लिए किसी रणनीति के तहत सही समय की प्रतीक्षा कर रहे हों किन्तु उन्हें ये ध्यान रखना चाहिए कि समय उनके हाथ से निकल न जाए। अनुभव बताते हैं कि  देर से लिया सही निर्णय भी गलत हो जाता है और फिर रॉफेल विवाद बुद्धिविलास तक सीमित न रहकर राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में आ गया है। रक्षा से जुड़ा होने से इसका महत्व और संवेदनशीलता और बढ़ गई है।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 22 September 2018

शांति वार्ता के लिए तैयार ही क्यों हुए थे

हर भारतीय को ये जानकर संतोष हुआ कि अगले सप्ताह प्रस्तावित भारत-पाक विदेश मंत्री वार्ता रद्द कर दी गई। दरअसल पाकिस्तान के नए प्रधानमंत्री इमरान खान ने नरेंद्र मोदी के बधाई संदेश के आभार स्वरूप भेजे पत्र में दोनों देशों के बीच वार्ता की जो पेशकश की उसका भारत ने सकारात्मक उत्तर देते हुए  विदेश मंत्री स्तर की वार्ता के लिए रजामंदी भी दे दी। लम्बे अर्से से चला आ रहा अनबोला खत्म होने से अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर भी राहत महसूस की गई किन्तु इसी दौरान भारत के एक जवान की नृशंस हत्या ने माहौल खराब कर दिया। यद्यपि उसके पहले से ही देश में मोदी सरकार पर सवाल दागे जाने लगे थे। कश्मीर में आतंकवादी घटनाओं के जारी रहने तक पाकिस्तान से वार्ता करने का औचित्य किसी को समझ नहीं आ रहा था। विपक्षी दल भी प्रधानमंत्री को उनके पुराने भाषण याद दिलाकर कटाक्ष करने लगे। आम नागरिक को भी लगने लगा कि प्रधानमंत्री के 56 इंची सीने को क्या हो गया? सीमा सुरक्षा बल के जवान की हत्या न हुई होती तब भी यदि भारत वार्ता की टेबल पर बैठता तो वह  एक तरह का नीतिगत पलायन ही होता लेकिन सीमा पर पाकिस्तानी सैनिकों ने फिर अपनी राक्षसी प्रवृत्ति का परिचय देते हुए हमारे एक जवान की गला रेतकर हत्या की और उसके अंग भंग कर दिए। इस घटना के बाद सरकार ने बिना देर किए वार्ता रद्द करने की घोषणा कर दी। ऐसा लगता है इमरान खान के सौजन्यता वाले पत्र पर जल्दबाजी में केंद्र सरकार द्वारा वार्ता की पेशकश स्वीकार तो कर ली गई लेकिन शीघ्र ही उसे ये एहसास हो गया कि उससे चूक हो गई। ज्योंही उसे मौका मिला उसने फौरन उस अपराधबोध से खुद को मुक्त कर लिया। यही नहीं विदेश मंत्रालय ने इमरान सरकार पर तीखे आरोप भी मढ़ दिए। बहरहाल ये तय हो गया कि भले ही पाकिस्तान की सत्ता एक पूर्व खिलाड़ी के हाथ आ गई हो लेकिन वह खिलाड़ी भावना से परे है वरना सेना को निर्देश दिए जाते कि भारत को वार्ता के लिए आमंत्रित किये जाने के पहले सीमा और कश्मीर में हरकतें बन्द कर दी जाएं किन्तु ऐसा कुछ होने की बजाय उल्टे भड़काऊ गतिविधियां जारी रखी गईं। आखिरकार मोदी सरकार को अपनी उसी नीति पर कायम रहना पड़ा जो उसने काफी समय से अपना रखी थी। अमेरिका के ट्रम्प प्रशासन ने इमरान सरकार के प्रति जैसा कड़क रवैया अपनाया उससे पाकिस्तान मुसीबत में है। नवाज शरीफ  के दफ्तर में उपयोग हुई कारें और भैंसें बेचने से उसकी जो जगहंसाई हुई उसने भी पाकिस्तान पर दबाव बढ़ाया है। इमरान के सामने खाली खजाने वाली अर्थव्यव्यस्था है जो अमेरिका के सहारे के बिना पटरी पर नहीं आ सकती। लेकिन ये तभी सम्भव है जब वह आतंकवादी वाली अपनी छवि में सुधार कर सके और इसके लिए उसे भारत से अपने रिश्ते सुधारने होंगे। मोदी सरकार ने वैश्विक मंचों पर पाकिस्तान को एक आतकंवादी देश के रूप में बदनाम करने में काफी सफलता हासिल कर ली थी। चीन के इकतरफा समर्थन से भी पाकिस्तान की मुसीबतें कम नहीं हो रही थीं। यही सोचकर इमरान खान ने वार्ता का दांव चला जिसमें भारत करीब -करीब फंस गया था किंतु ऐन वक्त पर केंद्र सरकार की अक्ल रास्ते पर आ गई और उसने वह फैसला कर लिया जो पूरा देश चाह रहा था। सही बात तो ये है कि वार्ता का निर्णय खुद भाजपा को हजम नहीं हो रहा था। ख़ैर, देर आए दुरुस्त आए वाली कहावत को चरितार्थ करते हुए मोदी सरकार ने अपने कदम पीछे खींचकर जो बुद्धिमत्ता दिखाई उसने उसे फज़ीहत से तो बचा लिया लेकिन जितनी किरकिरी होनी थी वह तो हो ही गई। पता नहीं इस निर्णय के पीछे किसका दिमाग था लेकिन अब जबकि वार्ता रद्द हो ही गई तब केंद्र सरकार को इमरान सरकार से किसी भी तरह की सौजन्यता की उम्मीद रखने के बजाय ये मान लेना चाहिए कि वे भी अपने पूर्ववर्तियों की तरह फौज के हाथ की एक कठपुतली हैं। जिस दिन वे स्वतन्त्र होकर काम करने की जुर्रत करेंगे उसी दिन गद्दी से उतार दिये जायेंगे। कश्मीर घाटी में सुरक्षा बलों की सघन कार्रवाई से बौखलाए अलगाववादी अब स्थानीय पुलिस कर्मियों की हत्या पर उतारू हो चले हैं। दूसरी तरफ सीमा पार से होने वाले घुसपैठ पर भी काफी नियंत्रण हो गया है। ऐसी स्थिति में पाकिस्तान से शांति वार्ता किये जाने से सैन्य बलों का मनोबल गिरेगा जो दिन रात जान हथेली पर रखकर आतंकवादियों के खात्मे में जुटे हुए हैं। भारत सरकार की नीयत पर शक किये बिना भी ये कहना गलत नहीं होगा कि पाकिस्तान के साथ विदेश मंत्री स्तर की बातचीत के लिए सहमत होना उसकी भूल थी। भले ही उसे समय रहते सुधार लिया गया हो किन्तु इससे एक बात साफ  हो गई कि विदेश मंत्रालय में अब भी ऐसे अधिकारी बैठे हुए हैं जो पाकिस्तान को लेकर खुशफहमी के शिकार हैं। इमरान खान के सत्ता में आने से पाकिस्तान की नीतियों में परिवर्तन की उम्मीद स्वर्ण मृग की कल्पना जैसी भूल ही कही जाएगी। उसका मूल चरित्र या यूँ कहें कि तासीर भारत विरोधी है जिसमें जिन्ना से लेकर आज तक बदलाव नहीं आया फिर चाहे सत्ता में फौजी तानाशाह बैठा रहा या जनता द्वारा चुना प्रधानमंत्री। मोदी सरकार को ये समझ लेना चाहिए कि पाकिस्तान इस समय अपनी आन्तरिक समस्याओं में उलझकर टूटने के कगार पर है। ऐसे में उसे सहारा देना आत्मघाती होगा। बीते कुछ समय से जारी कड़क नीति को और कड़क करने की जरूरत है। देश को सीमा सुरक्षा बल के जवान की कुर्बानी के बदले का  इन्तज़ार है न कि अपने जन्मजात दुश्मन के साथ बैठकर शांति की धुन गुनगुनाए जाने का।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 21 September 2018

मायावती की मायावी राजनीति से कांग्रेस को झटका


बसपा की सर्वोच्च या यूँ कहें कि एकमात्र नेता मायावती और अनिश्चितता समानार्थी हैं। पहले अन्ना द्रमुक की सर्वेसर्वा स्व.जयललिता भी इसी तरह असमंजस बनाये रखने के लिए प्रसिद्ध थीं किन्तु वर्तमान परिदृश्य में मायावती ही उन नेताओं में अव्वल हैं जिनके मन की थाह उनके अगल-बगल रहने वाले भी नहीं ले सकते। इसका ताजातरीन प्रमाण है छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव हेतु कांग्रेस को ठेंगा दिखाते हुए उनका राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी से गठबंधन कर लेना। यही नहीं मप्र में भी अपने लगभग दो दर्जन उम्मीदवार घोषित कर उन्होंने कांग्रेस को एक और झटका दे दिया। पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर कांग्रेस द्वारा गत 10 सितंबर को आहूत भारत बंद से किनारा करते हुए मायावती ने जिस तरह कांग्रेस और भाजपा दोनों को एक ही थैली का चट्टा-बट्टा बताया था उसी से संकेत मिल गया था कि वे दूध में नींबू निचोडऩे की परंपरा को निभाने जा रही हैं। 2019 के लोकसभा चुनाव में मोदी लहर को खत्म करने के लिए बनाए जा रहे महागठबंधन की सम्भावना उप्र के कुछ संसदीय उपचुनावों से उत्पन्न हुई जब बसपा ने सपा उम्मीदवारों को समर्थन देकर भाजपा में लिए खतरे की घण्टी बजा दी। पूरा जोर लगाने के बाद भी भाजपा वे उपचुनाव हार गई। उप्र चूंकि 80 लोकसभा सदस्य भेजता है इसलिये राष्ट्रीय राजनीति में उसका  बेहद महत्वपूर्ण स्थान है। लगभग दो दशक से चले आ रहे सांप-नेवले जैसे रिश्ते के बाद सपा और बसपा का पुनर्मिलन बड़ी राजनीतिक घटना के तौर पर देखा गया जिसने 2019 में मोदी विरोधी महागठबंधन की सम्भावना को वास्तविकता में बदलने का विश्वास प्रबल कर दिया। सपा के नए सुप्रीमो अखिलेश यादव के नर्म रवैये ने बुआ-भतीजे के नए समीकरण की नींव रख दी। कांग्रेस यद्यपि इसमें दूध की दुहनियां वाली स्थिति में ही थी क्योंकि दोनों मिलकर उसको अधिकतम 8 सीटें देने की बातें करने लगे। कांग्रेस की भी मजबूरी ये है कि उप्र में सपा-बसपा हाथ खींच लें तब सोनिया गांधी और राहुल गांधी का चुनाव जीतना तक सम्भव नहीं होगा। इस सबके बीच मायावती द्वारा सर्वाधिक 40 सीटें लड़े जाने के प्रस्ताव ने महागठबंधन के बाकी घटकों के कान खड़े कर दिए। अजीत सिंह का लोकदल 10 सीटें मांगने लगा। इसी बीच मायावती ने सम्मानजनक सीटें नहीं मिलने पर लोकसभा चुनाव में अकेले उतरने जैसा बयान दे डाला जिस पर अखिलेश ने तो झुककर समझौता करने की बात कही किन्तु लोकदल को पश्चिमी उप्र में अपने परंपरागत प्रभावक्षेत्र में बसपा की घुसपैठ नागवार गुजर रही थी। यूँ भी जाट और दलित समुदाय के बीच विवाद नए नहीं हैं। कांग्रेस को उम्मीद रही कि मायावती उप्र में भले कुछ भी कहें किन्तु मप्र और छत्तीसगढ़ में वे भाजपा को हराने के लिए कांग्रेस की बैसाखी बनेंगी। मप्र कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ ने 10 दिनों के भीतर बसपा से सीटों के बंटवारे की उम्मीद भी जताई थी लेकिन मायावती ने बिना पूछे-बताए 22 उम्मीदवारों की सूची जारी करने के साथ सभी 230 सीटों पर अकेले लडऩे की घोषणा करते हुए झटका दे दिया। इसी के साथ अजीत जोगी के साथ पत्रकार वार्ता के जरिये छत्तीसगढ़ में भी कांग्रेस से दूरी बनाने की घोषणा कर डाली। कांग्रेस की ओर से पीएल पूनिया ने बिना देर लगाए इसे भाजपा का खेल बताते हुए बसपा की आलोचना कर डाली। छत्तीसगढ़ में तो बसपा और श्री जोगी के बीच सीटों के बंटवारे का फार्मूला भी तय हो गया। यद्यपि अभी भी मप्र में कांग्रेस के साथ बसपा के गठबंधन की संभावना खत्म नहीं हुई है क्योंकि हो सकता है मायावती कड़ी सौदेबाजी के बाद समझौता कर लें किन्तु उन्होंने अखिलेश यादव द्वारा झुककर गठबन्धन करने की नीति से हटकर ये दिखा दिया कि वे अपनी शर्तों पर ही समझौता करेंगी, केवल भाजपा को हराने के लिए नहीं। बसपा की यही नीति 2019 में भाजपा विरोधी गठबंधन की संभावना को कमजोर कर रही है। मायावती को एहसास हो गया है कि 2019 उनके लिए अभी नहीं तो कभी नहीं की स्थिति लेकर आ रहा है। 2014 में उप्र में एक भी लोकसभा सीट न जीत पाने और विधानसभा चुनाव में भी दयनीय प्रदर्शन के बाद मायावती भविष्य को लेकर चिंतित हो उठी थी। वरना वे उस सपा से कभी हाथ मिलाने की पेशकश नहीं करतीं जिसने उनके सम्मान से खिलवाड़ करने का दुस्साहस किया था। लेकिन अब लगता है वे समझ गईं हैं कि विपक्ष की भावी राजनीति की चाबी उनके पास है। सम्मानजनक सीटों के बिना अकेले लडऩे के ऐलान के बाद मप्र और छत्तीसगढ़ में उन्होंने कांग्रेस को जो झटका दिया वह इस बात का संकेत है कि वे कांग्रेस अथवा अन्य किसी के नेतृत्व की बजाय महागठबंधन की नेता बनकर मैदान में उतरना चाहती हैं। उन्हें ये भय भी सता रहा है कि भाजपा जिस तरह दलित समुदाय को लुभाने में लगी है उससे तो कालांतर में बसपा का अस्तित्व ही संकट में पड़ जायेगा। बहरहाल बसपा सुप्रीमो के ताजे राजनीतिक पैंतरे ने उन लोगों को कतई आश्चर्यचकित नहीं किया जो उनको जानते हैं। उनके इस कदम के पीछे भाजपा का हाथ है या नहीं ये तो कहना मुश्किल है किंतु यदि बसपा मप्र में अकेले और छत्तीसगढ़ में अजीत जोगी के साथ मिलकर लड़ी तब वह भाजपा की मददगार साबित होगी जो कांग्रेस-बसपा की नजदीकियों से घबराहट में थी। बसपा के इस कदम से 2019 में भाजपा के विरुद्ध महागठबंधन बनने की संभावनाएं भी सवालों के घेरे में आ गईं हैं। राहुल गांधी की ताजपोशी का ख्वाब देख रही कांग्रेस के लिए भी ये बड़ा झटका है क्योंकि ममता बैनर्जी के बाद मायावती का दूर हो जाना विपक्षी एकता की राह में बड़ी बाधा बन रहा है। हालांकि मायावती का अगला कदम क्या होगा इसका अंदाज लगा पाना बहुत ही कठिन है। फिर भी फिलहाल तो उन्होंने भाजपा को राहत की सांस लेने का अवसर दे दिया वहीं कांग्रेस का रक्तचाप बढ़ा दिया है। इस पूरे खेल में दो दिन पहले अलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा मायावती के विरुद्ध उनके शासनकाल में बनाये स्मारकों के निर्माण में हुए भ्रष्टाचार का प्रकरण दर्ज करने संबंधी आदेश को भी बड़ी वजह माना जा रहा है। यूँ भी  सियासत अब सिद्धांत नहीं सुविधा के समझौतों पर आकर टिक गई है और मायावती उसमें बेहद पारंगत हैं ।

-रवीन्द्र वाजपेयी