Friday, 26 October 2018

सावजी ढोलकिया का अनुकरणीय कृत्य

दुनिया के सबसे रईस रहे वारेन बफेट ने एक मर्तबा भारतीय धनकुबेरों की कंजूसी पर तंज कसते हुए कहा था कि वे परोपकार और दान से बहुत दूर रहते हैं। दरअसल  बफेट और उन्हीं के देश के बिल गेट्स सदृश अन्य धनपतियों द्वारा जिस दरियादिली का परिचय देते हुए अपनी संपत्ति और कमाई का बड़ा हिस्सा परोपकार हेतु दान किया जाता रहा है उसकी तुलना में वाकई भारतीय उद्योगपतियों का योगदान इस दिशा में नगण्य ही रहा है। हालांकि मंदिर, धर्मशालाएं, विद्यालय और अस्पताल आदि बनवाने के लिए ये वर्ग अपनी तिजोरी से धन निकालता रहा लेकिन सही मायनों में  जिसे परोपकार कहा जाता है उस मद में उनका योगदान बहुत ज्यादा नहीं कहा जा सकता। बड़े औद्योगिक घरानों ने बीते कुछ दशक से शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में कदम रखा किन्तु इक्का-दुक्का छोड़कर उनके अधिकांश प्रकल्प व्यावसायिक उद्देश्य से ही संचालित हैं  जिनमें परोपकार का दिखावा होता है। यही नहीं अपने कर्मचारियों का हितचिंतन करने के प्रति भी औद्योगिक घरानों का रवैया प्रशंसनीय नहीं रहा। हालांकि बीते कुछ सालों में परिदृश्य थोड़ा बदला है। विप्रो के अध्यक्ष अज़ीम हाशिम प्रेमजी ने अपनी कमाई का काफी बड़ा हिस्सा दान कर दिया। उनकी देखासीखी कुछ और धनकुबेर भी सामने आए। यद्यपि इस जमात में बहुत से ऐसे भी हैं जो दान का ढिंढोरा नहीं पीटते। टाटा घराने का नाम इनमें अग्रणी है। लेकिन जिस तरह की दानशीलता वारेन बफेट, बिल गेट्स और विकसित देशों के अन्य उद्योगपति दिखाते हैं वह हमारे देश में बिरली ही नजर आती है। कुछ लोग ऐसे हैं जिनकी उदारता प्रशंसा बटोरने के लिए होती है या उसके पीछे किसी स्वार्थसिद्धि का मकसद निहित होता है। आजकल राजनीतिक नेताओं के अलावा सरकारी अधिकारियों की पत्नी एवं अन्य परिजन स्वयंसेवी संगठन (एनजीओ) बनाकर उनके लिए जो दान बटोरते हैं वह भी अप्रत्यक्ष रूप से चंदा या रिश्वत ही होती है। जैसा सन्दर्भित है उस तरह की दानशीलता भारतीय औद्योगिक घरानों में कम ही नजर आती है। लेकिन बीते कुछ वर्षों में गुजरात के हीरा व्यापारी सावजी ढोलकिया ने दीपावली पर अपने कर्मचारियों को बतौर बोनस महंगे उपहार देने का जो चलन शुरू किया वह अपने आप में अनूठा है। कभी कार तो कभी फ्लैट बतौर बोनस बांटकर वे चर्चा में रहते हैं। इस वर्ष भी अपने 600 कर्मचारियों को कारें और कुछ को रिहायशी फ्लैट दीपावली पर उपहार के तौर पर वे देने जा रहे हैं। पिछले वर्षों की तरह इस वर्ष भी सावजी की ये उदारता समाचारों की सुर्खियां बन गई। यद्यपि हीरों के व्यापार में अरबों-खरबों का मुनाफा होता है इसलिए कहने वाले कह सकते हैं कि सावजी की उदारता सामान्य बात है लेकिन हीरे के अंतर्राष्ट्रीय कारोबारी नीरव मोदी और मेहुल चौकसी बैंकों का अरबों-खरबों डकारकर विदेश भाग गये वहीं सावजी अपनी मोटी कमाई का बड़ा हिस्सा अपने कर्मचारियों में बांटकर उनको प्रोत्साहित करते हुए मालिक और कर्मचारी सम्बन्धों के आत्मीय संबंधों का सकारात्मक रूप प्रस्तुत कर रहे हैं जो अन्य व्यवसायियों और उद्योगपतियों के लिए भी अनुकरणीय है। हीरे के कारोबार में हस्तकौशल बेहद महत्वपूर्ण होता है। उसी के साथ ईमानदारी  भी मायने रखती है। उस लिहाज से जैसी जानकारी मिली सावजी हीरे तराशने वालों की कार्यकुशलता के अनुरूप उन्हें पुरस्कृत करते हैं जिनसे उनमें अपनी कार्यक्षमता और गुणवत्ता बढ़ाने की प्रवृत्ति विकसित हो सके। सावजी के इस व्यवहार को भारत की महाजनी परंपरा का निर्वहन माना जा सकता है। यदि अन्य व्यवसायी और उद्योगपति भी ऐसी ही दरियादिली का प्रदर्शन करने लग जाएं तो देश में कार्यसंस्कृति का विकास अंतर्राष्ट्रीय मानकों के अनुरूप हो सकता है। कर्मचारियों में कार्यकुशलता और उद्यमशीलता बढ़ाने के लिए केवल जुबानी प्रशंसा ही नहीं अपितु आर्थिक लाभ भी मिलना चाहिए। सरकारी अनुदान ने हमारे देश में उद्यमशीलता का सत्यानाश कर दिया है। सावजी  जैसे उद्योगपति देश में कार्यसंस्कृति का समुचित विकास करने के प्रेरणास्रोत बन सकते हैं। बशर्ते उद्योग जगत उनका मजाक उड़ाने के बजाय उनका अनुसरण करे। श्रमिक की गरिमा का जो सिद्धांत विकसित देशों में है वह मुफ्तखोरी की बजाय कार्यकुशलता को प्रोत्साहित करने से ही बनी रह सकती है ।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 25 October 2018

सीबीआई के बहाने मोदी पर निशाने


विपक्ष का काम सत्ता पक्ष पर आरोप लगाना है और उस दृष्टि से राहुल गांधी एवं अन्य विरोधी नेता यदि केंद्र सरकार और विशेष रूप से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर ये आरोप लगा रहे हैं कि सीबीआई निदेशक आलोक वर्मा और विशेष निदेशक राकेश अस्थाना के बीच घूसखोरी के आरोप-प्रत्यारोप के उपरांत दोनों को छुट्टी पर भेजने जैसे कदम के पीछे रॉफेल लड़ाकू विमान सौदे के भ्रष्टाचार की जांच को रोकना है तो इस आरोप को साधारण मानकर हवा में उड़ाने की बजाय प्रधानमंत्री और केंद्र सरकार को विपक्ष के आरोप का पुख्ता जवाब देते हुए देश को आश्वस्त करना चाहिए कि सीबीआई की स्वायत्तता बरकरार है और दोनों वरिष्ठ अधिकारियों को जबरन अवकाश पर भेजे जाने की वजह उन दोनों पर लगे आरोपों की निष्पक्ष  जांच करवाना है । चूंकि श्री वर्मा और श्री अस्थाना ने एक दूसरे को फंसाने के लिये अपने अधीनस्थों के माध्यम से चक्रव्यूह बनाना शुरू कर दिया था इसके कारण शीर्ष स्तर पर सीबीआई के अधिकारी और कर्मचारी दो गुटों में विभक्त होते दिखने लगे । ऐसे में जरूरी था कि उक्त दोनों अधिकारियों के हाथ से दायित्व और अधिकार छीनकर पूरे मामले की जांच कर दूध का दूध , पानी का पानी किया जाए क्योंकि श्री वर्मा और श्री अस्थाना के अधिकार सम्पन्न रहते तक जांच करने वाले अधीनस्थ अधिकारी असमंजस और भय में डूबे रहते । केंद्र सरकार के सामने सबसे बड़ा धर्मसंकट ये आ खड़ा हुआ कि श्री अस्थाना को जब गुजरात से सीबीआई में नियुक्त किया तभी ये कहा गया था कि वे प्रधानमंत्री और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के करीबी हैं । इसके अलावा जैसा कहा जा रहा है उनकी नियुक्ति को श्री वर्मा ने पसंद नहीं किया और इस कारण दोनों के बीच पहले दिन से तनातनी चलने लगी । मौजूदा विवाद में सतही तौर पर देखने में ही लगता है कि इसकी जड़ में कहीं न कहीं ऐसा कुछ है जिससे किसी न किसी का कोई बड़ा नुकसान होने वाला था क्योंकि जिस तरह की जानकारी सामने आई है उससे सन्देह पैदा होता है कि उच्च स्तर पर चल रहे इस शीतयुद्ध में ये दोनों अधिकारी तो महज कठपुतली हैं जिनकी डोर किन्हीं और लोगों के हाथ में है । जिस तरह से श्री अस्थाना को श्री मोदी और श्री शाह का करीबी बताया गया और श्री वर्मा को अवकाश पर भेजे जाने के विरुद्ध राहुल खुलकर सामने आये उससे ये स्पष्ट हो गया कि उनके भी राजनीतिक संरक्षक हैं । कुल मिलाकर सीबीआई की इस अंतर्कलह ने नए राजनीतिक विवाद की ज़मीन तैयार कर दी है । श्री अस्थाना और श्री वर्मा के बीच शुरू हुई कीचड़ फेंक प्रतियोगिता जिस तरह से केंद्र सरकार विरुद्ध विपक्ष में तब्दील गई और घूसखोरी का आरोप  रॉफेल की जांच से जाकर जुड़ गया उसके बाद अब ये कहने में कुछ भी गलत नहीं होगा कि प्रधानमंत्री भले सीधे न कहें किन्तु सरकार की ओर से देश को  विश्वास दिलाना जरूरी हो गया है कि सीबीआई में उच्च स्तर पर प्रारम्भ हुई जंग से उसका कोई लेनादेना नहीं है । चूंकि ये जांच एजेंसी सीधे -सीधे प्रधानमंत्री के मातहत होती है इसलिए उसकी जो छीछालेदर इस झगड़े में ही रही है उससे प्रधानमंत्री कार्यालय अछूता नहीं रह सकता । हो सकता है राहुल गांधी का आरोप हवा में छोड़ा गया तीर हो लेकिन इसके बाद भी ये जरूरी हो जाता है कि उस आरोप का समुचित स्पष्टीकरण दिया जावे । जहां तक दोनों शीर्ष अधिकरियों को अवकाश पर  भेजकर जांच दल बदलने का सवाल है तो वह सही और अपेक्षित निर्णय है जिसके बाद अब श्री अस्थाना और श्री वर्मा दोनों समूची जांच प्रक्रिया को प्रभावित करने की स्थिति में नहीं रहे । श्री वर्मा की याचिका पर सर्वोच्च न्यायालय को फैसला करना है कि उन्हें अवकाश पर भेजना सही है या गलत । वैसे उनको पद से हटाया नहीं गया केवल छुट्टी पर भेजकर दायित्व से मुक्त कर दिया गया है और ऐसा शासकीय सेवा में होना नया नहीं है । और फिर जिस तरह के हमले इन दोनों अधिकारियों ने एक दूसरे पर किये उनके बाद दोनों को दफ्तर से बाहर किये बिना निष्पक्ष और सही जांच करवाना सम्भव नहीं होता । उस दृष्टि से उन्हें अवकाश पर भेजकर नए अधिकारी को दायित्व देने में गलत कुछ भी  न होने के बावजूद केंद्र सरकार को जनता को विश्वास दिलवाना होगा कि इस निर्णय के पीछे मुख्य सतर्कता आयुक्त की भूमिका थी । चूंकि राहुल के साथ अन्य विपक्षी दलों ने भी रॉफेल घोटाले को समूचे प्रकरण से जोड़ा है इसलिए प्रधानमंत्री से तत्काल सफाई अपेक्षित है वरना जो आरोप उन पर लगाए गए वे सत्य नहीं होने पर भी तब तक लोगों के ध्यान में बने रहेंगे जब तक उनको आधारहीन साबित न कर दिया जावे । यूँ भी प्रधानमंत्री और भाजपा इन दिनों विश्वास के संकट से जूझ रहे हैं।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 24 October 2018

हेलमेट जैसा हश्र न हो जाए इस फैसले का


सर्वोच्च न्यायालय ने दीपावली पर पटाखों से होने वाले ध्वनि और वायु प्रदूषण को रोकने के लिए जो निर्देश गत दिवस दिए वे कमोबेश पहले जैसे ही हैं। देश की राजधानी दिल्ली के जो आंकड़े बीते सालों में सामने आये वे भयावह होने से देश भर में दीपावली की रात में जलाई जाने वाली आतिशबाजी से होने वाले प्रदूषण का संज्ञान लिया जाने लगा। भारतीय पर्व परंपरा में दीपावली देश के हर हिस्से में बेहद धूमधाम से मनाई जाती है जिसमें पटाखों का जमकर उपयोग होता है। ये कहना गलत नहीं होगा कि धन-धान्य की अधिष्ठात्री देवी लक्ष्मी को समर्पित इस पर्व पर आतिशबाजी के जरिये अपनी रईसी का वीभत्स प्रदर्शन भी होने लगा है। सर्वोच्च न्यायालय ने तीन बच्चों की याचिका पर जो भी निर्णय दिया उससे सैद्धान्तिक तौर पर शायद ही कोई असहमत होगा बजाय इसके कि उसमें पटाखे चलाने के लिए जो समय सीमा तय कर दी गई है वह धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप है। उज्जैन के भाजपा सांसद डॉ. चिंतामणि मालवीय ने तो ऐलान भी कर दिया कि वे रात्रि 10 बजे के बाद पटाखे चलाएंगे क्योंकि  दीपावली का त्यौहार मुहूर्त और चौघडिय़ा के मुताबिक मनाया जाता है। इसी तरह की और भी प्रतिक्रियाएँ सुनने और पढऩे मिल रही हैं। न्यायालय ने पटाखों की गुणवत्ता भी निश्चित कर दी है। तेज आवाज वाले पटाखों पर भी बंदिशें लगाई गई हैं। घटिया आतिशबाजी के उत्पादन और विक्रय पर भी न्यायालय ने नजर टेढ़ी करते हुए शासन, प्रशासन और पुलिस को निर्देश दिए हैं कि वह उसके आदेशों के पालन की व्यवस्था करे। क्रिसमस और नए साल पर पटाखे चलाने के लिए रात्रि 11.55 से 12.30 तक का समय रहेगा वहीं शादी सहित अन्य धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजनों में भी निश्चित स्थान पर ग्रीन (पर्यावरण को नुकसान न पहुंचाने वाली) आतिशबाजी के उपयोग की अनुमति रहेगी। कुल मिलाकर सर्वोच्च न्यायालय का उक्त फैसला पूरी तरह प्रदूषण को रोकने पर केंद्रित है जिसके औचित्य से कोई भी समझदार व्यक्ति शायद ही असहमत होगा लेकिन इसके लागू होने में वही व्यवहारिक परेशानियाँ देखने मिलेंगीं जो अतीत में सर्वोच्च न्यायालय के अन्य फैसलों के साथ देखी गईं। देश में प्रदूषण न फैलाने वाली आतिशबाजी का कितना उत्पादन होता है ये कोई पक्के तौर पर नहीं बता सकता। बीते कुछ वर्षों से चीन में बनी आतिशबाजी ने भारतीय पटाखा उद्योग की कमर तोड़कर रख दी। चीन में बने अन्य सामान की तरह पटाखे भी घटिया स्तर के होते हैं। लेकिन सस्ते होने से भारतीय बाजार पर उनका आधिपत्य हो गया। घरेलू आतिशबाजी उत्पादक भी पर्यावरण सुरक्षा के बहुत जागरूक नहीं होते। ऐसे में जबकि आतिशबाजी का व्यापार चरम पर है, इस फैसले का कितनी  ईमानदारी और कड़ाई से पालन हो सकेगा ये दावे के साथ कोई नहीं कह सकता। सबसे महत्वपूर्ण बात ये होगी कि समय सीमा के बाद या निर्धारित से ज्यादा आवाज वाले पटाखे फोड़े जाने पर पुलिस क्या कर सकेगी जो पहले से ही काम के बोझ तले दबी है और कानून व्यवस्था बनाये रखने के अपने मूल दायित्व तक का निर्वहन ठीक तरीके से नहीं कर पा रही। और फिर करोड़ों क्या अरबों रुपये की जो आतिशबाजी बनकर विक्रेताओं के पास आ चुकी है वह सर्वोच्च न्यायालय के मानकों पर खरी नहीं उतरने पर बेकार हो जाएगी। उस दृष्टि से देखें तो ये फैसला कुछ माह पहले आया होता तब इसके प्रति आम जनता में स्वप्रेरित समर्थन  की उम्मीद की जा सकती थी लेकिन जिस समय ये आया वह सही नहीं है जिसके कारण इस फैसले का मजाक बनना सुनिश्चित है। पर्यावरण संरक्षण के प्रति चिंता बढ़ी है। अनेक सुशिक्षित परिवारों ने आतिशबाजी के उपयोग को सीमित किया है। नई पीढ़ी भी प्रदूषण रोकने बेहद सजग है किंतु दीपावली के चंद दिन पहले इस तरह का फैसला लागू करवा पाना असंभव होगा। कुछ जगह भले ही पुलिसिया डंडा चलेगा लेकिन जिस तरह दोपहिया वाहन चलाते वक्त हेलमेट लगाना अनिवार्य कर दिए जाने के बाद भी पुलिस के सामने से बिना हेलमेट लगाए दोपहिया वाहन चालक बिना डरे निकलते है ठीक उसी तरह दीपावली जी रात मु_ी भर लोगों को छोड़ दें तो शेष देशवासी सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश का रत्ती भर पालन नहीं करेंगे। सर्वोच्च न्यायालय ने रात्रि 10 के बाद पटाखा फूटने पर इलाके के थानेदार पर अवमानना की कार्रवाई करने का जो फरमान सुनाया उसका पालन भी कितना हो सकेगा ये भी अनिश्चित है है। कुल मिलाकर बिना समाज में जागृति और दायित्व बोध के इस तरह के आदेशों को लागू करना लगभग असम्भव है। खास तौर पर भारत सरीखे देश में जहां धार्मिक रीति-रिवाज के प्रति लोगों के मन में अपार आस्था होती है और फिर समाज में एक वर्ग ऐसा भी है जो इस तरह के आदेशों की अवहेलना कराना अपनी शान समझता है। ये सब देखते हुए इस फैसले के लागू होने में सन्देह किया जा सकता है। सबसे बड़ी बात ये होगी कि प्रदूषण न फैलाने वाले पटाखे अव्वल तो मिलेंगे नहीं और मिले भी तो आम इंसान की हैसियत से बाहर होंगे ।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 23 October 2018

सबरीमाला : ये टकराव अच्छा नहीं

केरल के सुप्रसिद्ध सबरीमाला मंदिर के पट बंद हो गए। सर्वोच्च न्यायालय ने एक याचिका पर निर्णय देते हुए इस पूजा स्थल में सदियों से चली आ रही उस परंपरा को रद्द कर दिया था जिसके अंतर्गत 10 से 50 वर्ष तक की महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध था। उक्त फैसले का प्रगतिशील तबके ने तो स्वागत किया लेकिन केरल ही नहीं वरन दक्षिण के अन्य राज्यों के हिन्दू धर्मावलंबियों को न्यायपालिका का हस्तक्षेप पसंद नहीं आया। विगत दिनों जब मंदिर के पट दर्शनार्थ खुले तब महिलाओं के प्रवेश को रोकने के लिए पुजारीगण और स्थानीय नागरिक ही नहीं अपितु बड़ी संख्या में महिलाएं भी खड़ी हो गईं। कुछ महिलाओं ने सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के परिप्रेक्ष्य में मंदिर में प्रवेश का प्रयास भी किया लेकिन उन्हें भी रोक दिया गया। केरल की वामपंथी सरकार भले ही न्यायालयीन फैसले को लागू करवाकर राज्य में तेजी से प्रभाव बढ़ा रहे हिन्दू संगठनों को दबाना चाह रही थी किन्तु ये कहने में कुछ भी गलत नहीं है कि वह भी जनसैलाब के विरुद्ध जाने का साहस नहीं कर सकी। प्रगतिशील तबका भी मौके की नजाकत को भांपकर किनारे हो गया और इस तरह से सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को जनता की अदालत ने नकार दिया। वैसे तो यह अदालत की अवमानना के साथ कानून के राज की अवधारणा को रद्दी की टोकरी में फेंकने जैसा ही है लेकिन सबरीमाला में आम जनता ने ही मोर्चा संभाला। राजनीतिक ताकतें बेशक उसके पीछे रही हों किन्तु यदि आम जन विशेष रूप से महिलाएं निडर होकर मोर्चा न संभालतीं तब सर्वोच्च न्यायालय के फैसले की अवहेलना करने का साहस शायद ही और किसी का हुआ होता। अब पट बंद हो जाने के बाद मामला फिलहाल ठंडा पड़ सकता है। यद्यपि सर्वोच्च न्यायालय में पुनर्विचार की अर्जी लगी है किंतु सबरीमाला में बीते कुछ दिनों में जो कुछ भी हुआ उसने न्यायपालिका के सामने भी शोचनीय स्थिति पैदा कर दी है। सन्दर्भित फैसला देते समय सर्वोच्च अदालत ने महिलाओं और पुरुषों की समानता के विचार को अपने निर्णय का आधार बनाया था। और किसी बारे में इस सिद्धांत को स्वीकार करना उतना विवादास्पद सम्भवत: नहीं बना होता किन्तु सैकड़ों वर्षों से चली आ रही परंपरा को संविधान के दायरे में लाकर अवैध घोषित करने से सबरीमाला मंदिर में आस्था रखने वाले असंख्य लोगों को भावनात्मक दृष्टि से अस्वीकार्य लगा और इसीलिए उन्होंने बिना हिचके और डरे एक नई परिपाटी को जन्म दे दिया। सर्वोच्च न्यायालय निश्चत तौर पर मन ही मन क्रोधित हो रहा होगा लेकिन सबरीमाला के श्रद्धालुओं ने भी एक जनादेश न्यायपालिका को दे दिया है। हमारे देश में न्यायापालिका के प्रति लोगों की श्रद्धा बरकरार है। ये भरोसा भी कायम है कि सर्वोच्च न्यायालय विधायिका और कार्यपालिका की स्वेच्छाचारिता पर लगाम लगाकर जनता के हितों की सुरक्षा करने के प्रति सजग और सक्रिय है किन्तु दूसरी तरफ  ये भावना भी एक बड़े वर्ग में व्याप्त हो रही है कि सर्वोच्च न्यायालय कई मामलों में अपनी सीमाओं के बाहर जाकर फैसले करने लगा है। सरकार तो चाहे या न चाहे उन फैसलों को सिर झुकाकर मानने बाध्य है और जब वे उसे असहनीय लगते हैं तब विधायिका का सहारा लेकर उन्हें पलट भी देती है लेकिन कुछ फैसले ऐसे होते हैं जिनका संबंध और सरोकार सीधे जनता से होता है। विशेष रूप से धार्मिक आस्था एवं विश्वास से जुड़े विषयों पर न्यायपालिका का हस्तक्षेप एक हद के बाद असहनीय और अनुचित प्रतीत होता है। सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेेश पर प्रतिबंध संबंधी फैसला ऐसा ही था। न्यायालय ने जिन बातों का संज्ञान लिया वे निरर्थक कतई नहीं कही जा सकतीं। घर परिवार के बीच भले ही प्राचीन मान्यताएं शिथिल पड़ रही हों किन्तु व्यक्ति के निजी और सामूहिक आचरण में फर्क होता है और यहीं सर्वोच्च न्यायालय भूल कर बैठा। आगे क्या होगा ये फिलहाल तो अधर में है। सर्वोच्च न्यायालय अपने निर्णय को संशोधित करेगा या फिर उसे कड़ाई से लागू करवाने के लिए दबाव बनाएगा ये तो वही जाने लेकिन जिस तरह का प्रतिरोध सबरीमाला में देखने मिला वह अच्छा है या बुरा लेकिन एक संकेत तो है जिसे सर्वोच्च न्यायालय और समाज दोनों को गम्भीरता से समझना चाहिए वरना न्यायिक सक्रियता और उस पर समाज की रोषपूर्ण प्रतिक्रिया अराजकता की राह प्रशस्त करेगी।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 22 October 2018

सीबीआई : जब ऊपर ये हाल हैं तब ...

किसी भी बड़े अपराधिक मामले की जांच सीबीआई से करवाने की मांग आम तौर पर सुनाई देती है। स्थानीय पुलिस एवं अन्य जांच एजेंसियों की क्षमता और विश्वसनीयता पर सन्देह की वजह से भी सीबीआई पर लोगों का भरोसा बढ़ा। यद्यपि बड़ी मछलियों को फांसने में इस जांच एजेंसी की सफलता के आंकड़े बहुत संतोषजनक नहीं कहे जा सकते लेकिन ये तो मानना ही पड़ेगा कि भ्रष्टाचार एवं अन्य संगीन अपराधों के बाकी दोषियों को दंड दिलवाने में इसकी भूमिका बेहद महत्वपूर्ण रही है। नेता भले इसके चक्रव्यूह से निकल आते हों लेकिन नौकरशाहों सहित अन्य लोगों के अपराध की जांच और दंड प्रक्रिया में सीबीआई की भूमिका काफी उल्लेखनीय रही है। हालांकि यह जांच एजेंसी विवादों में भी घिरती रही है। विशेष रूप से जब भी विपक्ष के किसी नेता पर इसका शिकंजा कसता है तब सत्ता पक्ष पर उसके दुरुपयोग का आरोप लगाया जाना आम बात है। इसके पीछे आधार भी हैं। मसलन मायावती और मुलायम सिंह यादव पर भ्रष्टाचार के जो मामले सीबीआई ने दायर किये थे वे आज तक अंजाम तक नहीं पहुंच सके। केंद्र में सरकार बदलते ही जांच की गति प्रभावित हो जाती है। एक बार तो यूपीए सरकार ने जांच ही खत्म करवा दी जिसे सर्वोच्च न्यायालय की पहल पर  दोबारा खोला गया। लेकिन आज तक ये कोई नहीं बता सकता कि सीबीआई को अब तक उनमें कितनी सफलता मिल पाई। टू जी स्पेक्ट्रम घोटाले के आरोपी ए. राजा का बेदाग छूट जाना सीबीआई की विफलता का बड़ा उदाहरण है। सर्वोच्च न्यायालय भी सीबीआई को पिंजरे में बंद तोता कहकर उसकी खूब भद्द पीट चुका है। सही बात ये है कि सीबीआई जिस उद्देश्य से बनाई गई उसकी बजाय उसे छोटे - छोटे मामलों में उलझाकर रख दिया गया। राज्य सरकारें भी अपना सिरदर्द टालने के लिए छोटे-छोटे प्रकरण सीबीआई के पास टरका देती हैं। चूंकि सीबीआई के पास पर्याप्त स्टाफ नहीं है इसलिए राज्यों से आईपीएस अधिकारी प्रतिनियुक्ति पर इसमें भेजे जाते हैं। ये भी बड़ा ही विरोधाभासी और हास्यास्पद है। जिस अधिकारी को राज्य पुलिस में रहते हुए अविश्वसनीय माना जाता है वह सीबीआई में जाते ही ईमानदारी का पुतला बन जाता होगा ये आसान नहीं है। यही कारण है कि भ्रष्टाचार और अनसुलझे आपराधिक मामलों की जांच हेतु रामबाण औषधि मान ली गई सीबीआई में भी धीरे-धीरे ही सही किन्तु वे सभी बुराइयां आती गईं जिनके लिए राज्यों की पुलिस कुख्यात है। इसके मुखिया की नियुक्ति में भी राजनीति होती आई है। वर्तमान निदेशक आलोक वर्मा की नियुक्ति पर भी उंगलियाँ उठीं। देश की इस प्रमुख जांच एजेंसी के भीतर की राजनीति भी समय-समय पर सामने आती रही है। भ्रष्टाचार के विषाणु भी इसमें प्रविष्ट हो चुके हैं। पूर्व निदेशक रंजीत सिन्हा के कारनामे जगजाहिर हो चुके हैं लेकिन जो ताजा प्रकरण सामने आया है उससे सीबीआई की अंदरूनी खींचतान सड़क पर आ गई है।  विशेष निदेशक के रूप में इसके दूसरे सबसे बड़े अधिकारी राकेश अस्थाना के विरुद्ध करोड़ों की घूस लेने का प्रकरण दर्ज किया जाना इस बात का संकेत है कि जिस बुराई को दूर करने यह संस्था बनी अब खुद उन बुराइयों से घिर चुकी है। श्री अस्थाना ने भी बाकायदा कैबिनेट सचिव को पत्र लिखकर सीबीआई निदेशक आलोक वर्मा सहित कुछ अन्य अधिकारियों पर जवाबी आरोप करोड़ों की घूस खाने के लगाए। आरोप-प्रत्यारोप के इस मुकाबले में रॉ के कुछ अफसरों के दामन पर भी छींटे पड़ रहे हैं। अब तक जो संस्था दूसरों का पर्दाफाश करती आई थी आज उसी के चेहरे पर कालिख पुत रही है वह भी उसके उच्च पदस्थ अधिकारियों द्वारा ही। इस मामले में  श्री अस्थाना और श्री वर्मा में से कोई एक तो सच होगा ही क्योंकि जिस गवाह के बयान से मामला बनाया गया उस पर दबाव के आरोप भी लग सकते हैं। इस बारे में रोचक बात ये है कि केंद्र सरकार के कैबिनेट सचिव के पास महीनों पहले पहुंची लिखित शिकायत के बाद मामला दर्ज कराने में इतना समय कैसे लग गया ? यद्यपि प्रथम दृष्टया तो श्री अस्थाना पर शिकंजा कस गया है जिसका पूर्वानुमान उन्हें हो चुका था तभी उन्होंने अपने उच्च अधिकारी के विरुद्ध पहले ही शिकायत भेज दी थी। इस प्रकरण में सच झूठ का पता तो गहन जांच के बाद में चलेगा किन्तु इससे सीबीआई की पोल खुल गई है। इसके पहले भी इस तरह की घूसखोरी के मामले सामने आए थे। सीबीआई के अनेक छोटे बड़े कर्मचारी-अधिकारी पकड़े भी गए लेकिन निदेशक और विशेष निदेशक के पद पर आसीन अधिकारी पर इतने संगीन आरोप लगना बेहद चिंताजनक है क्योंकि इस प्रकरण से सीबीआई की तथाकथित पवित्रता तार-तार होकर रह गई है।  घूस श्री अस्थाना ने  खाई या श्री वर्मा सहित और लोगों ने भी ये तो अदालत में ही साबित होगा लेकिन सीबीआई को भी बिकाऊ कहने का मौका तो उसके आलोचकों को मिल ही गया। केंद्र सरकार को इस विवाद में गंभीरता से जरूरी कदम उठाने चाहिए क्योंकि ये महज दो या कुछ अधिकारियों के बीच का मसला नहीं अपितु देश की प्रमुख जांच एजेन्सी की प्रतिष्ठा और विश्वसनीयता का सवाल है। विचारणीय मुद्दा ये है कि जब सीबीआई में शीर्ष स्तर पर इस तरह के गोरखधंधे चल रहे हों तब निचले स्तर पर क्या हो रहा होगा इसकी कल्पना आसानी से की जा सकती है।

-रवीन्द्र वाजपेयी