Monday, 26 November 2018

राम मंदिर : भावनात्मक विस्फोट के पूर्व समाधान जरूरी

अयोध्या में विश्व हिंदू परिषद द्वारा आयोजित धर्म संसद शांतिपूर्ण तरीके से सम्पन्न हो गई। राम मंदिर के निर्माण के लिए केंद्र सरकार पर दबाव बनाने के उद्देश्य से साधु-संतों के अलावा लाखों हिन्दू धर्मावलंबी अयोध्या में एकत्र हुए। शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे भी परिवार सहित अयोध्या आए। उनके समर्थन में शिव सैनिक भी बड़ी संख्या में इस पवित्र शहर में जा पहुंचे जिससे शांति व्यवस्था खतरे में पडऩे की आशंका व्यक्त की जाने लगी। मायावती और अखिलेश यादव ने इसी आधार पर सेना तैनाती की मांग भी कर डाली। लेकिन लाखों हिंदुओं के जमावड़े के बावजूद सब कुछ सामान्य तरीके से निबट गया। श्री ठाकरे भी देवदर्शन के साथ ही सियासी बयानबाजी करते हुए मुंबई लौट गए और विश्व हिंदू परिषद के आह्वान पर एकत्रित हुए संत गण भी मंदिर निर्माण के लिए केंद्र सरकार की तरफ  से मिले कथित आश्वासन के उपरांत सन्तुष्ट हो गए। हालांकि सरकार और सर्वोच्च न्यायालय पर दबाव बनाने के मकसद से तीखी बयानबाजी से परहेज नहीं किया गया। कई संतों ने भाजपा को ये चेतावनी भी दे डाली कि मंदिर निर्माण शुरू नहीं हुआ तो 2019 के लोकसभा चुनाव में उसका फट्टा साफ  हो जाएगा। उक्त आयोजन ऐसे समय रखा गया जब अनेक राज्यों में विधानसभा चुनाव का प्रचार चरम पर है। विपक्ष का आरोप है कि भाजपा के पक्ष में माहौल बनाने के लिए संघ परिवार ने विहिप के संयोजकत्व में अयोध्या में बड़ा जलसा किया चुनाव वाले राज्यों में भाजपा के पक्ष में हिन्दुओं का धु्रवीकरण किया जा सके। ये उद्देश्य कितना पूरा होगा ये तो 11 दिसम्बर की दोपहर तक स्पष्ट होगा लेकिन इसके कारण पूरे देश में राम मंदिर एक बार पुन: मुख्य एजेंडे में आ गया। सरकार पर अध्यादेश के जरिये मंदिर निर्माण की राह प्रशस्त करने का जो दबाव बीते कुछ दिनों में बनाया गया वह परोक्ष रूप से सर्वोच्च्च न्यायालय को भी इस बात का इशारा है कि यदि उसने अयोध्या विवाद सम्बन्धी अपना रवैया नहीं बदला तब सरकार कानूनी प्रक्रिया को दरकिनार रखते हुए अपने स्तर पर कोई निर्णय कर देगी। ये भी सर्वविदित है कि वैसा नहीं होने पर लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी और भाजपा को जवाब देना कठिन हो जाएगा। चूंकि सर्वोच्च न्यायालय इस बारे में अपना रुख स्पष्ट कर चुका है। प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई तो मंदिर मसले को अपनी प्राथमिकता मानने से इंकार करते हुए  नियमित सुनवाई से पहले ही मना कर चुके थे। लेकिन बीते कुछ दिनों में श्री गोगोई की टिप्पणी के विरोध में जिस तरह की प्रतिक्रियाएं आईं उन्होंने भाजपा का मनोबल बढ़ा दिया। उसे एक बार पुन: ये एहसास हो गया कि मंदिर मुद्दा अभी भी प्रासंगिक और हिन्दू जनमानस को प्रभावित करने वाला है। शायद अयोध्या में धर्म संसद नहीं हुई होती यदि विपक्ष मंदिर मुद्दे पर भाजपा को रोज़ाना उलाहना देते हुए उसका उपहास नहीं करता। मंदिर निर्माण शुरू होने की तिथि नहीं बता पाने को लेकर राहुल गांधी और उद्धव ठाकरे दोनों भाजपा का आए दिन मजाक उड़ाया करते है। इसलिए मजबूर होकर भाजपा को मंदिर मुद्दे को नए सिरे से गर्माने का निर्णय करना पड़ा। एक संत ने तो ये तक कह दिया कि केंद्र के एक बड़े मंत्री ने उन्हें 11 दिसम्बर के बाद मंदिर निर्माण सम्बन्धी बड़े निर्णय का आश्वासन दिया है। क्या सच है क्या गलत ये तो कोई नहीं जानता लेकिन भाजपा के लिए भी ये मुद्दा उगलत निगलत पीर घनेरी बन गया है। सर्वोच्च न्यायालय का ताजा रुख देखकर जल्द फैसले की आशा खत्म होने से  ही पार्टी धर्मसंकट में आ गई। अधिकतर देश पर राज और केंद्र में पूर्ण बहुमत वाली सरकार के अलावा नरेंद्र मोदी जैसे हिन्दूवादी प्रधानमन्त्री के रहते भी यदि मंदिर बनना शुरू नहीं हो सका तब लोकसभा चुनाव में उप्र में भाजपा के बुरे दिन आना तय है जहां योगी आदित्यनाथ के रूप में एक हिन्दू सन्यासी सत्तासीन है। कुल मिलाकर समय आ गया है जब केंद्र सरकार को साहस दिखाते हुए कोई ठोस निर्णय  लेना ही चाहिए क्योंकि सर्वोच्च न्यायालय और विपक्ष की प्राथमिकताओं में भले न  हो किन्तु देश की बहुसंख्यक आबादी के लिए राम मंदिर का निर्माण बेहद भावनात्मक विषय है। छद्म धर्मनिरपेक्षता की आड़ में हिंदुओं की जो उपेक्षा इस देश के राजनीतिक नेताओं ने की उससे बहुसंख्यक समुदाय में बेहद गुस्सा है। यदि इसकी गंभीरता को नहीं समझा गया तो किसी बड़े भावनात्मक विस्फोट की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता। बेहतर है उसके पहले कोई समाधान निकाल लिया जावे।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 24 November 2018

कश्मीर : चुनाव से ज्यादा अलगाववाद का सफाया जरूरी

कश्मीर घाटी के अनन्तनाग जिले में सुरक्षा बलों ने घर में छिपे 6 आतंकवादियों को मार गिराया। उनमें वह आतंकवादी भी शामिल था जिसने कुछ समय पूर्व एक पत्रकार की हत्या की थी। सुरक्षा बलों ने सर्जिकल स्ट्राइक शैली में उस घर को ही उड़ा दिया जिसमें वे छिपे थे। यद्यपि फुटकर-फुटकर इक्का दुक्का आतंकवादी तो आए दिन मारे जाते रहे हैं लेकिन एक साथ आधा दर्जन को मार गिराना उल्लेखनीय सफलता है। इस कार्रवाई में किसी भी नागरिक को जान माल का नुकसान नहीं हुआ। जबसे जम्मू कश्मीर निर्वाचित सरकार की जगह राज्यपाल शासन के रूप में केंद्र सरकार के नियंत्रण में आया तबसे सुरक्षा बलों ने बड़ी संख्या में आतंकवादियों को ढूँढ़ ढूंढकर मार गिराया। इस वजह से अलगाववादियों के हौसले भी काफी पस्त हुए हैं। हुर्रियत के तमाम नेताओं को नजरबंद कर दिए जाने से भी भारत विरोधी ताकतों की मैदानी हरकतों पर लगाम लगी है लेकिन दूसरी तरफ  ये बात भी सही है कि कश्मीरी जनता के मन में  आतंकवादियों का खौफ  अभी भी खत्म नहीं हुआ। इसका प्रमाण आतंवादियों के जनाजे में होने वाले उग्र प्रदर्शनों से मिलता है। गत दिवस भी अनंतनाग में सुरक्षा बलों के ऑपरेशन की सफलता के बाद काफी जनता सड़कों पर उतरी और कफ्र्यू लगाना पड़ा। ये सब देखते हुए कहना गलत नहीं होगा कि जम्मू कश्मीर में अभी नया विधानसभा चुनाव टाला जाना चाहिए। हालाँकि विधानसभा भंग होने के बाद केंद्र सरकार ने संकेत दिया कि लोकसभा चुनाव के पहले राज्य विधानसभा चुनाव करवाने का विचार है लेकिन ऐसा करने से सुरक्षा बलों के अभियान को धक्का पहुँचेगा। चुनाव प्रक्रिया प्रारंभ होते ही सुरक्षा बलों की जिम्मेदारी कानून व्यवस्था बनाए रखकर चुनाव सम्पन्न करवाने की हो जाएगी जिससे आतंकवादियों के विरुद्ध चल रहे अभियान में व्यवधान आएगा। बेहतर होगा केंद्र सरकार इस विषय में थोड़ा व्यवहारिक होकर विचार करे और राजनीतिक प्रक्रिया शुरू करने से पहले दूरगामी राष्ट्रीय हितों के बारे में सोचकर फैसला करते हुए सेना और उसके सहयोगी बलों की सलाह और जरूरतों को प्राथमिकता दे। यद्यपि नेशनल कांफे्रंस, पीडीपी और कांग्रेस विधानसभा चुनाव टालने का समर्थन नहीं करेंगी वर्तमान हालातों में वहां चुनाव करवाने से कुछ नेताओं और दलों के राजनीतिक हितों का पोषण भले हो जाए लेकिन ऐसा राष्ट्रहित की कीमत पर होगा और इसलिये उसे टालना चाहिए। अतीत में भी जम्मू कश्मीर विधानसभा लम्बे समय तक भंग रही जिस कारण वहां  राष्ट्रपति शासन की अवधि छह माह के बाद और बढ़ाई जाती रही। अगले साल मई के अंत तक केंद्र में नई सरकार बन जायेगी। उसी के बाद जम्मू कश्मीर के विधानसभा चुनाव सम्बन्धी फैसला किया जाए तो अच्छा रहेगा। इस दौरान सुरक्षा बलों को खुलकर आतंकवादियों की कमर तोडऩे की छूट मिलनी चाहिए जो राज्य सरकार के रहते नामुमकिन है क्योंकि वहां जो भी सरकार बनेगी वह होगी तो अब्दुल्ला या मुफ्ती परिवार की ही पार्टी की। ये दोनों कहें कुछ भी लेकिन कश्मीर की तथाकथित स्वायत्तता के नाम पर ये अलगाववाद की जड़ों को सींचने में ही लगी रही हैं। फारुख और उमर अब्दुल्ला की तरह ही महबूबा मुफ्ती भी अलगाववादियों से बातचीत करने का दबाव बनाती रहती हैं। इनकी निगाह में सुरक्षा बलों पर पत्थर फेंकने वाले और आतंकवादियों को बचकर निकलने में सहायता करने वाले तो भटके हुए नौजवान हैं जबकि उनकी देशविरोधी गतिविधियों को रोकने वाले जवान मानवाधिकारों का हनन करने वाले। दुर्भाग्य से कांग्रेस और भाजपा दोनों राष्ट्रीय पार्टियां होने के बाद भी उक्त क्षेत्रीय दलों की कुटिल चालों में फंसकर राष्ट्रहित से खिलबाड़ कर चुकी हैं। भले ही इसके पीछे उनकी इच्छा बड़ी नेक रही हो किन्तु अंतत: वह सांप को दूध पिलाने वाली गलती ही सिद्ध हुई। विधानसभा चुनाव होने पर कांग्रेस और भाजपा अपने दम पर सरकार नहीं बना सकेंगे। त्रिशंकु सदन की स्थिति में ज्यादा से ज्यादा वे उनके साथ कनिष्ठ सहयोगी बनकर सत्ता का हिस्सा बन सकते हैं। लेकिन इतिहास गवाह है कि उस स्थिति में भी अलगाववादियों को संरक्षण मिलता रहेगा और सुरक्षा बलों का हौसला तोडऩे की शरारत भी जारी रहेगी। इसलिए बेहतर यही रहेगा कि इस समस्याग्रस्त राज्य में नई सरकार चुनने की जल्दबाजी न की जाए और घाटी को सुरक्षाबलों की निगरानी और नियंत्रण में रखा जावे। ऐसा होने से उन्हें आतंकवादियों के सफाये का पर्याप्त अवसर मिलेगा तथा वे जरूरत के मुताबिक उचित निर्णय ले सकेंगे। कश्मीर समस्या के हल हेतु हुर्रियत अथवा अन्य किसी अलगाववादी संगठन से बतियाने की बात करने सम्बंधी सुझाव सिवाय समय गंवाने के और कुछ भी नहीं है। घाटी में अलगाववाद की कमर तोडऩे के लिए वही करना पड़ेगा जो श्रीलंका में तत्कालीन राजपक्षे सरकार ने तमिल उग्रवादियों को जड़ से उखाड़ फेंककर अपने देश को आतंकवाद से स्थायी मुक्ति दिलवाने के लिए किया। चीन सरकार  भी इन दिनों अपने देश में इस्लामी आतंकवाद की जड़ों में मठा डालने के लिए हरसम्भव कड़े कदम उठाने की इच्छाशक्ति दिखा रही है। भारत को भी इसी शैली का प्रयोग करना चाहिए। जम्मू कश्मीर में राजनीतिक प्रक्रिया से ज्यादा जरूरी राष्ट्र की सुरक्षा और सम्प्रभुता के लिए खतरा बने गद्दारों का सर्वनाश करना है ।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 23 November 2018

ध्रुवीकरण का मौका दे दिया कमलनाथ ने

मप्र में विधानसभा चुनाव के चंद रोज पहले प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ द्वारा मुस्लिम समुदाय से 90 प्रतिशत मतदान करने की अपील करने वाला वीडियो सार्वजनिक होने पर भाजपा ने चुनाव आयोग में उसकी शिकायत कर दी। इसके पहले एक और वीडियो उजागर हो चुका था जिसमें श्री नाथ ये कहते दिखे कि उन्हें तो जीतने वाला प्रत्याशी चाहिये चाहे उस पर कितने भी अपराधिक प्रकरण हों। इस वीडियो को तो कांग्रेस ने भाजपा की शरारत बताया किन्तु मुसलमानों को 90 प्रतिशत मतदान हेतु उकसाने वाले वीडियो का अब तक न कांग्रेस ने खंडन किया और न ही कमलनाथ ने। भाजपा की शिकायत पर चुनाव आयोग क्या कदम उठाता है ये भी नहीं कहा जा सकता क्योंकि ऐसी शिकायतों पर कार्रवाई होते तक तो चुनाव सम्पन्न हो चुके होंगे। शिकायत और उस पर सम्भावित कार्रवाई से अलग हटकर देखें तो भाजपा को हराने के लिए प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष की मुस्लिमों से 90 प्रतिशत मतदान करने की अपील ये साबित करती है कि वे भाजपा पर हिन्दू सांप्रदायिकता का जो आरोप लगाते हैं वह दरअसल कांग्रेस द्वारा मुस्लिम साम्प्रदायिकता को प्रोत्साहित करने की प्रतिक्रियास्वरूप ही जन्मी। एक तरफ तो कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी 2014 के लोकसभा चुनाव की हार के बाद एके एंटोनी समिति की रिपोर्ट में सुझाये गए उपाय के तौर पर सौम्य हिंदुत्व की राह पर चलने का दिखावा करते हुए मंदिर और मठों में जाकर पूजा-अर्चना कर रहे हैं तथा पार्टी प्रवक्ता उन्हें जनेऊधारी ब्राह्मण साबित करते हुए भाजपा पर ये तंज भी कसते हैं कि हिंदुत्व पर उसका एकाधिकार नहीं है लेकिन कमलनाथ ने जिस तरह मुसलमानों को ये उलाहना दिया कि पिछले चुनाव में जिन मुस्लिम बहुल मतदान  केंद्रों पर कम मतदान हुआ वहाँ कांग्रेस हार गई , इसलिए इस चुनाव में उन्हें भाजपा को हराने के लिए 90 प्रतिशत मतदान करना चाहिये। उससे ये स्पष्ट हो गया कि उसे अब भी बहुसंख्यक हिंदुओं के समर्थन में सन्देह है और इसीलिए वह मुस्लिमों के मन में भाजपा का हौआ खड़ा कर उन्हें अपने खूंटे से बांधे रखना चाह रही है। उसका ये प्रयास कितना सफल होगा ये कोई नहीं बता सकता क्योंकि मुस्लिम समाज में भी शिक्षा की रोशनी जिन तक पहुंच गई है वे साम्प्रदायिक सोच से निकलकर वास्तविक मुद्दों पर सोचने लगे हैं। तीन तलाक और हलाला जैसे विषयों पर मुस्लिम महिलाओं में भी कठमुल्लेपन के विरुद्ध भावना मजबूत हुई है। ऐसे में सारे के सारे मुस्लिम मत कांग्रेस को चले जायेंगे ये सोचना उसी तरह गलत है जिस तरह से पूरे बहुसंख्यक हिन्दू वोट भाजपा के पक्ष में जाने की बात सही नहीं है। बहरहाल कमलनाथ का वीडियो सामने आने के बाद भाजपा को भी अब हिन्दू कार्ड खुलकर खेलने का अवसर मिल गया है। रास्वसंघ की शाखाओं पर रोक की घोषणा के बाद संघ परिवार में कांग्रेस के विरुद्ध जो गुस्सा उत्पन्न हुआ वह श्री नाथ का वीडियो देखकर और बढ़ गया होगा। तमाम कोशिशों के बावजूद मप्र की राजनीति पर धार्मिक मुद्दे पूरी तरह हावी नहीं हो पा रहे थे। लेकिन कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष के मुस्लिम तुष्टीकरण का प्रमाण सामने आने से वे हिन्दू भी चौकन्ने हो गए जिन्हें राहुल का हिन्दू प्रेम आकर्षित करने लगा था। इन सबका चुनाव परिणामों पर क्या असर पड़ेगा ये तो अभी अनुमान लगाना कठिन है लेकिन इससे कांग्रेस को बहुसंख्यक समाज में मिलने वाला संभावित समर्थन जरूर अधर में लटक गया है। कमलनाथ एक अनुभवी और बेहद व्यवहारिक राजनेता हैं जो विकास की राजनीति के लिए जाने जाते हैं लेकिन जिताऊ प्रत्याशी के अपराधों को नजरअंदाज करने के साथ ही मुस्लिमों की चापलूसी करने की कोशिश से ये स्पष्ट हो गया कि कमलनाथ भी उसी ढर्रे पर चल रहे हैं जिसके कारण कांग्रेस मप्र में घुटनों के बल खड़ी होने के लिए मजबूर कर दी गई। उनकी इस गलती का भाजपा ने यदि समुचित लाभ उठा लिया तब आखिरी क्षणों में पलड़ा अपने पक्ष में झुकाने में उसकी महारत एक बार फिर कांग्रेस के लिए निराशा का काऱण बन जायेगी जिसका ठींकरा कमलनाथ के सिर पर फूटेगा। दिग्विजय सिंह इस बात पर खुश होंगे कि जिस बात के लिए उन्हें कठघरे में खड़ा किया जाता था वही इस मर्तबा कमलनाथ की जुबान से निकल पड़ी।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 22 November 2018

कश्मीर में राष्ट्रीय राजनीति की मजबूती जरूरी

जम्मू कश्मीर विधानसभा को भंग किये जाने से एक तरफ जहां राज्य में व्याप्त राजनीतिक अनिश्चितता समाप्त हो गई वहीं विधायक रूपी घोड़ों की मंडी पर भी ताला लग गया । विगत जून माह में भाजपा के समर्थन वापिस ले लेने से महबूबा मुफ्ती सरकार गिर गई थी । भाजपा पीडीपी के साथ मिलकर सरकार बनाने के निर्णय को अपने समर्थकों और कार्यकर्ताओं के गले कभी नहीं उतार सकी । यद्यपि पहली बार जम्मू कश्मीर राज्य में सरकार का हिस्सा बनने से भाजपा को ऐसे अनेक लाभ हुए जो कालांतर में सामने आएंगे । सबसे बड़ी बात ये रही कि आतंकवाद के विरुद्ध कार्रवाई में तेजी आई । महबूबा से भाजपा का अलगाव होने के पीछे एक कारण ये समझा जा रहा था कि आतंकवाद के विरुद्ध सुरक्षा बलों की सख्ती में वे अड़ंगे लगाती थीं । उनकी सरकार गिरने के बाद नेशनल कांफे्रंस और कांग्रेस ने तत्काल नए चुनाव करवाने की मांग की लेकिन तब भाजपा ने विधानसभा निलंबित करने का निर्णय लिया । उसके पीछे मकसद ये था कि राज्यपाल शासन लगाकर घाटी के भीतर स्थिति को सामान्य बनाने के बाद नए चुनाव के लिए उतरा जाए । इस बीच घाटी में स्थानीय निकाय के चुनावों के जरिये राजनीतिक प्रक्रिया को पुनर्जीवित करने की जो कोशिश की गई उससे पार्टी को वहां अपनी जड़ें जमाने का अवसर मिला जिससे उत्साहित होकर भाजपा ने पीडीपी को तोड़कर सज्जाद लोन के नेतृत्व में नई सरकार बनाने की कोशिश की । दिसम्बर में राज्यपाल शासन की छह माह की म्याद समाप्त होने वाली है जिसके बाद नया चुनाव या फिर राष्ट्रपति शासन का विकल्प बचता। भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व चाह रहा था कि घाटी के भीतर पीडीपी और नेशनल कांफे्रंस को दरकिनार करते हुए कोई नया राजनीतिक गठबंधन जीवित किया जाए जिससे वहां स्थापित दोनों क्षेत्रीय दलों का एकाधिकार  खत्म होकर राष्ट्रीय राजनीति के पैर जम सकें । उल्लेखनीय है कांग्रेस भी इस राज्य में कभी अब्दुल्ला परिवार की बपौती नेशनल कांफे्रंस तो कभी मुफ्ती खानदान की मिल्कियत पीडीपी की पिछलग्गू बनने मजबूर रही है। भाजपा का प्रभाव क्षेत्र जम्मू के हिन्दू बहुल अंचल तक ही सिमटा हुआ था । पिछले चुनाव में भाजपा ने काफी जोर लगाकर जम्मू की अधिकतर सीटें जीत लीं तथा पीडीपी और नेशनल कांफे्रंस के बीच बनी खाई का लाभ उठाकर एक प्रयोग करते हुए आतंकवाद के प्रति नर्म रहने वाले मुफ्ती मो.सईद के साथ सत्ता में भागीदारी हासिल कर ली। उसे उम्मीद थी कि पीडीपी की सोच को बदल लेगी किन्तु मशर्रत आलम जैसे खूंखार आतंकवादी को रिहा कर मुफ्ती ने कुत्ते की पूंछ के सीधे न होने की कहावत को सही साबित कर दिया । उसे लेकर भाजपा को बहुत नीचा देखना पड़ा । मुफ्ती की मौत के बाद कुछ दिन तक अनिश्चितता रही । बाद में उनकी बेटी महबूबा से भाजपा ने गठबन्धन कर लिया । लेकिन पत्थरबाजों पर पैलेट गन के प्रयोग के अलावा सघन तलाशी और एनकाउंटर को लेकर महबूबा का भाजपा से टकराव शुरू हो गया । सही मायनों में  पीडीपी प्रशासन में भाजपा के बढ़ते दखल से चौकन्नी थी। महबूबा उससे पिंड छुड़ाकर कांग्रेस से गठजोड़ करने के लिए गोटियां बिठाने में लग गईं। विधानसभा भंग करवाने की भी उन्होंने सोची थी किन्तु भनक लगते ही भाजपा ने समर्थन वापिस लेकर फटाफट राज्यपाल शासन लगवा दिया। बीते पांच माह में राज्य एक तरह से भाजपा के निर्देशन पर चल रहा था। नेशनल कांफे्रंस, पीडीपी और कांग्रेस इसे लेकर चिंतित थे कि भाजपा विधायकों में तोडफ़ोड़ कर सज्जाद लोन को चेहरा बनाकर कठपुतली सरकार बना सकती है। इसके तुरंत बाद तीनों ने  भाजपा की कार्ययोजना को ध्वस्त करने के लिए मतभेद भूलकर एक साथ आने की मुहिम चलाई किन्तु भाजपा को ज्योंही इसका पता चला उसने विधानसभा भंग करने जैसा तुरुप का पत्ता चल दिया और इस तरह अब राष्ट्रपति शासन लगाकर वहां के प्रशासन पर अपनी लगाम कसने का मौका उसके हाथ में आ गया। लोकसभा के साथ विधानसभा चुनाव करवाने की तैयारी भी इस तरह कर ली गई। वैसे कल विधानसभा भंग करने पर हैरानी व्यक्त करने वाली पीडीपी, नेशनल कांफे्रंस और कांग्रेस महबूबा सरकार गिरने के बाद से ही  विधानसभा भंग करने का दबाव बना रही थीं । ऐसा लगता है सतपाल मलिक को राज्यपाल बनाने के पीछे भाजपा की कोई दूरगामी सोच है क्योंकि लम्बे समय बाद इस समस्याग्रस्त राज्य में नौकरशाह की बजाय राजनीतिक पृष्ठभूमि वाले राज्यपाल की नियुक्ति की गई थी । भाजपा अपनी योजना में कितनी सफल होगी ये तो भविष्य बताएगा लेकिन सरकार बनाने के लिए शुरू हुई जोड़तोड़ पर पूर्णविराम लग जाने से घाटी के भीतर सख्ती दिख रहे सुरक्षा बलों को खुलकर काम करने का  मौक़ा मिल गया वरना अब्दुल्ला , मुफ्ती और गुलाम नबी की तिकड़ी मानवाधिकारों के नाम पर  अलगाववादियों के प्रति नर्म रवैया अपनाने की नीति वापिस ले आती। जम्मू कश्मीर में सरकार बनना केवल किसी राजनीतिक प्रक्रिया का हिस्सा न होकर राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा विषय भी है । इसलिए उसके बारे में कोई भी फैसला दलगत हितों से ऊपर उठकर होना चाहिए । बेहतर तो ये होता कि राष्ट्रवादी राजनीति के प्रतिनिधि बनकर कांग्रेस और भाजपा इस राज्य में अलगाववादियों को प्रश्रय देने वाली ताकतों को हराने के लिए एक साथ खड़े हो जाते किन्तु कांग्रेस इसके लिए शायद ही कभी राजी होगी । भाजपा और पीडीपी के गठबंधन को कोसने वाली कांग्रेस भी अतीत में  मुफ्ती सरकार का हिस्सा रही और बाद में नेशनल कांफे्रंस के साथ  सत्ता सुख लूटती रही। ताजा हालात में बेहतर यही होगा कि भाजपा और कांग्रेस मिलकर जम्मू कश्मीर में राष्ट्रीय राजनीति को मजबूत बनाने के लिए रणनीतिक साझेदारी करें । राष्ट्रीय सन्दर्भ में ये अपेक्षा बेमानी लग सकती है किंतु जम्मू कश्मीर में जहां राष्ट्रीय हित दांव पर लगे हों वहां राजनीतिक हितों को पीछे रखकर सोचना जरूरी है । कांग्रेस को कश्मीर समस्या के लिए जिम्मेदार माना जाता है । राजनीतिक समझदारी दिखाकर वह इस धारणा को बदल सकती है लेकिन एक कदम भाजपा को भी बढ़ाना चाहिए।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 21 November 2018

34 साल बाद भी केवल दो को ही सजा !

1984 में श्रीमती इंदिरा गांधी की हत्या के बाद दिल्ली में हुए सिख नरसंहार की दिल दहला देने वाली घटनाएं नई पीढ़ी को तो याद भी नहीं होंगी। उस समय के बहुत सारे लोग भी उम्रदराज होकर चल बसे। लेकिन जिन परिवारों ने अपने आंखों के सामने अपने परिजन की नृशंस हत्या देखी उनकी मन:स्थिति वही जानते हैं। इंदिरा जी की हत्या एक घृणित कृत्य था जिसका समर्थन कोई भी मानवतावादी नहीं कर सकता लेकिन दूसरी तरफ  उसका बदला लेने के लिए दिल्ली में सैकड़ों सिखों का कत्ले आम किया जाना भी पूरी तरह से अमानुषिक था। भले ही श्रीमती गांधी के पुत्र स्व. राजीव गांधी ने ये कहते हुए कि जब बड़ा पेड़ गिरता है तब धरती हिलती है, उस नरसंहार का बचाव किया किन्तु कोई भी समझदार व्यक्ति उस राक्षसी व्यवहार का अनुमोदन नहीं कर सकता। दुर्भाग्य की बात ये रही कि उस नृशंस अपराध के दोषी माने गए अनेक नेताओं को कांग्रेस ने सांसद, विधायक और मंत्री तक बनाया। लेकिन जो सबसे ज्यादा दुखद है वह किसी को भी कत्ल के आरोप में अब तक सजा नहीं मिलना। चौंकाने वाली बात ये रही कि 1994 में तो दिल्ली पुलिस ने कुछ मामले बन्द कर दिए क्योंकि वह समुचित सुबूत आरोपियों के विरुद्ध नहीं जुटा सकी। लेकिन 2015 में मोदी सरकार ने विशेष जांच दल गठित कर दोबारा तहकीकात शुरू की और उसी का नतीजा ये है कि गत दिवस दो लोगों को सजा हुई जिनमें एक को फांसी तथा दूसरे को उम्र कैद की सजा के अलावा 35-35 लाख का अर्थदण्ड भी लगाया गया। अदालत के बाहर सिखों की भारी भीड़ फैसला सुनने जमा थी। ज्योंही उसकी जानकारी लगी त्योंही अनेक लोग बिलखते हुए कांग्रेस नेता जगदीश टाइटलर और सज्जन कुमार को भी दंडित किये जाने की उम्मीद जताते देखे गए। सिखों के कत्ले आम के एक और आरोपी कांग्रेस नेता हरिकिशनलाल भगत पहले ही दिवंगत हो चुके हैं। जिन दो आरोपियों को गत दिवस सजा दी गई अभी उनके पास अपील के कई अवसर उपलब्ध हैं। पता नहीं आखिरी फैसला होने में कितने बरस और लगेंगे? सिख समुदाय को इस बात का संतोष तो हुआ कि आखिरकार किसी को तो सजा मिली लेकिन दंडित दोनों व्यक्ति साधारण लोग हैं जबकि जिन दिग्गज कांग्रेस नेताओं को समूचे नरसंहार का निर्देशक माना जाता रहा वे अभी भी स्वतंत्र घूम रहे हैं। इसका आशय ये हुआ कि विशेष जांच दल के हाथ भी अभी तक बड़े गुनाहगारों की गर्दन तक नहीं पहुंच सके हैं। इस आधार पर यही मानना पड़ेगा कि पूरे मामले का निपटारा होते-होते कई साल तो क्या कई दशक तक लग सकते हैं। तब तक सिख नरसंहार के भुक्तभोगिय़ों और आरोपियों में से कितने जीवित बचेंगे ये वह सवाल है जिसका उत्तर किसी के पास नहीं होगा। इस बारे में विचारणीय मुद्दा ये है कि सैकड़ों लोगों के सामूहिक कत्ल के अलावा हुई लूटपाट, आगजनी जैसे अकल्पनीय अपराध के महज दो अति साधारण से दोषियों को निचली अदालत से सजा दिलवाने में ही यदि तीन दशक से ज्यादा का वक्त लग गया तब जो लोग उस नरसंहार के असली कर्ताधर्ता रहे, उनकी गर्दन में कानून का फंदा कसने में तो न जाने कितना समय लग जायेगा और तब तक वे जि़ंदा भी रहेंगे या नहीं?  सच बात तो ये है कि 34 साल पहले देश की राजधानी दिल्ली में हुए उस भीषण नरसंहार की जांच और दोषियों को दंडित करने संबंधी पूरी प्रक्रिया शासन-प्रशासन के स्तर पर जिस तरह रुक-रुककर चली वह किसी भी ऐसे सभ्य समाज के लिए शर्मनाक है जो कानून का राज होने का दावा करता हो। सिख समुदाय के शरीर पर लगे घाव भले ही भर गए हों, धन-संपत्ति, कारोबार को हुए नुकसान की भी भरपाई हो गई हो लेकिन मन पर लगे घाव अभी भी ताजे हैं। गत दिवस आए अदालती फैसले ने थोड़ी उम्मीदें तो बढ़ाई हैं लेकिन जब तक किसी नामचीन आरोपी पर दंड प्रक्रिया का शिकंजा नहीं कसता तब तक सिखों के कलेजे को ठंडक नहीं पहुंचेगी। इस पूरे मामले में राजनीति का जो घिनौना रूप सामने आया वह भी अत्यंत दुखद कहा जायेगा। कांग्रेस पार्टी को चाहिए था कि वह अपने स्तर पर ही उन बड़े नेताओं को दंडित कराने की पहल करती जिनकी सक्रिय भूमिका उस नरसंहार में स्पष्ट तौर पर सामने आ चुकी थी लेकिन बजाय उसके जांच बन्द करवाकर उन्हें न सिर्फ बचाया जाता रहा अपितु सरकारी पद देकर सिखों के जख्मों पर नमक छिड़कने की हिमाकत तक की गई। खैर, देर आए दुरुस्त आए की तर्ज पर गत दिवस दो लोगों को सजा मिलने से ये उम्मीद बढ़ चली है कि इंसाफ की डगर में अटकाए गए रोड़े हट जाएंगे और जगदीश टाइटलर तथा सज्जन कुमार जैसे चर्चित नेताओं पर भी समुचित कार्रवाई होगी। ऐसा करना केवल सिख समुदाय की संतुष्टि के लिए नहीं बल्कि न्याय व्यवस्था के प्रति सम्मान और विश्वास कायम करने के लिये आवश्यक है। यदि लगभग साढ़े तीन दशक बाद भी सैकड़ों निरपराध सिखों के हत्यारों को सजा नहीं दिलाई जा सकी तो शासन व्यवस्था की इससे बड़ी नाकामयाबी और क्या होगी? कल के फैसले के बाद थोड़ी उम्मीद तो बंधी है लेकिन इस मामले में अब तक हुई प्रगति कतई संतोषजनक नहीं है। दिल्ली पुलिस द्वारा 1995 में सन्दर्भित प्रकरण को जिस तरह से बन्द किया गया। उसकी भी जांच होनी चाहिए। निरपराध व्यक्ति को जबरन थाने में बिठाए रखने वाली पुलिस को बड़े लोगों के विरुद्ध सुबूत-गवाह क्यों नहीं मिलते इस प्रश्न का उत्तर भी खोजा जाना जरूरी है क्योंकि न्यायपालिका की पूरी कार्यप्रणाली तो पुलिस अथवा जांच दल द्वारा जुटाए गए प्रमाणों पर ही निर्भर होती है।

-रवीन्द्र वाजपेयी