Wednesday, 26 December 2018

मप्र : सक्रिय मुख्यमंत्री और मजबूत विपक्ष

मप्र के नये मुख्यमंत्री कमलनाथ ने अपने मंत्रिमंडल का गठन करते हुए सभी मंत्रियों को कैबिनेट का दर्जा देकर एक नया प्रयोग कर डाला। विधानसभा की सदस्य संख्या को देखते हुए मप्र में 35 मंत्री बनाये जा सकते हैं। उस लिहाज से अभी आधा दर्जन की गुंजाइश और है। हो सकता है सरकार को समर्थन दे रहे निर्दलीयों के अलावा सपा और बसपा के किये कुछ स्थान रिक्त रखे गये हों या फिर लोकसभा चुनाव  तक यथास्थिति बनाकर रखी जावेगी। सभी मंत्री चूंकि कैबिनेट स्तर के हैं इसलिए  ये उम्मीद की जा सकती है कि निर्णय प्रक्रिया में तेजी आएगी क्योंकि मंत्रीमंडल की बैठक में उन सभी को हिस्सा लेने का अवसर मिलेगा जिससे सामूहिक उत्तरदायित्व के सिद्धांत का व्यवहारिक रूप में पालन सम्भव होगा। हालांकि जैसा प्रचारित हुआ है मंत्रियों के चयन का आधार उनकी गुटीय प्रतिबद्धता है। कमलनाथ के प्रति व्यक्तिगत निष्ठा रखने वालों के साथ ही पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह और मुख्यमंत्री की दौड़ में आखिर तक शामिल रहे ज्योतिरादित्य सिंधिया के समर्थक विधायकों को मंत्री पद से नवाजा गया है। हालांकि दिग्विजय और कमलनाथ एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। इन दोनों की जुगलबंदी ने ही श्री सिंधिया की अतृप्त महत्वाकांक्षा को एक बार फिर निराशा की खाई में धकेल दिया।  ढाई दशक पहले लगभग ऐसा ही उनके पिता स्व. माधवराव सिंधिया के साथ भी हो चुका था।  लेकिन सबसे बड़ी बात ये है कि मंत्रीमंडल में चूंकि कमलनाथ सबसे बड़े कद के नेता हैं इसलिए कोई मंत्री उनसे टकराने की हिम्मत नहीं करेगा जैसा शिवराज सिंह चौहान के मंत्रिमंडल में बाबूलाल गौर और सरताज सिंह किया करते थे।  हालांकि कई ऐसे विधायक सरकार का हिस्सा बने हैं जो छह बार और उससे भी ज्यादा चुनाव जीत चुके हैं लेकिन ये भी सच है कमलनाथ और दिग्विजय सिंह के बीच बेहतर तालमेल होने की वजह से सिंधिया गुट के मंत्री दांतों के बीच जुबान की तरह रहने मजबूर होंगे। कमलनाथ ने आँचलिक के साथ जातीय संतुलन का भी अच्छा ध्यान रखा है। उन्हें अच्छी तरह से पता है कि भले ही जनादेश पांच वर्ष के लिए मिला हो लेकिन उनकी पहली बड़ी परीक्षा कुछ महीनों बाद ही लोकसभा चुनाव में होगी। विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को बहुमत नहीं मिलने से भाजपा का मनोबल पूरी तरह टूटा नहीं है और फिर चुनावी वायदों को पूरा करने के लिए प्रदेश सरकार के पास बहुत कम समय है। ऐसे में मंत्रीमंडल में शामिल सभी सदस्यों को न सिर्फ  तेजी से काम करना पड़ेगा अपितु नतीजे भी देने होंगे। कांग्रेस इस बात को अच्छे से जानती है कि लोकसभा चुनाव में यदि मोदी सरकार वापिस आ गई तब उनके लिए  शासन चलाना कठिन हो जाएगा। इसीलिए उन्होंने कुर्सी संभालते ही फैसले लेने शुरू करते हुए प्रशासन में भी मनमाफिक बदलाव कर डाले। उस दृष्टि से नई सरकार की शुरुवात अच्छी कही जाएगी। मुख्यमंत्री चूंकि अतीत में केंद्रीय मंत्री रह चुके हैं इसलिए उन्हें खासा अनुभव है।  निजी तौर पर भी वे एक बड़े व्यवसायिक समूह का नेतृत्व करते रहे हैं। राजनीति में प्रबंधन का उपयोग कैसे किया जा सकता है ये भी उन्हें भली भांति आता है।  इस आधार पर कहा जा सकता है कि कमलनाथ ने सरकार के गठन की प्रक्रिया आसानी से पूरी कर ली है। अभी तक के संकेत त्वरित निर्णय करने वाली सरकार के हैं। मंत्रियों की औसत आयु भी पिछली सरकार से कम है। अनुभव के साथ क्षमता और योग्यता का भी अच्छा ध्यान मुख्यमंत्री ने रखा है लेकिन देखने वाली बात ये रहेगी कि विधानसभा में सरकार विपक्ष के हमले का सामना किस प्रकार करती है ? भाजपा के 109 विधायक होने से सदन में सत्ता पक्ष घिरा नजर आएगा। पूर्व मुख्यमंत्री श्री चौहान ये एहसास करवा चुके हैं कि सत्ता जाने के बावजूद उनकी सियासी सक्रियता कम नहीं होगी तथा भाजपा आक्रामक विपक्ष की भूमिका का निर्वहन करेगी। खबर ये भी है कि श्री चौहान नेता प्रतिपक्ष बनने के लिए भी प्रयत्नशील हैं जिससे वे मुख्यमंत्री से सीधे मुकाबले में दिख सकें। केंद्र की राजनीति में जाने से इनकार कर उन्होंने ये इशारा भी कर दिया कि चुनावी पराजय के बाद भी उनके भीतर फिर सत्ता में लौटने की इच्छा है। आयु और स्वास्थ्य के दृष्टि से वे चुस्त-दुरुस्त है और जनता से सीधे संवाद की कला में भी माहिर हैं। थोड़ी सी सीटों की कमी से सरकार चली जाने से उन्हें सहानुभूति भी मिल रही है। मुख्यमंत्री इस पहलू से बेखबर नहीं हैं। मंत्रीमंडल बनाने के बाद वे संसदीय सचिव बनाने की सम्भावनाएँ तलाश रहे हैं ताकि सत्ता से वंचित रहे लोगों को ठंडा रखा जा सके। हालांकि विभागों के बंटवारे का काम भी आसान नहीं है क्योंकि मंत्री बनने के बाद मलाईदार विभाग की तलब भी सत्ता प्रतिष्ठान से जुड़ गई है। चूंकि अधिकतर मंत्री नए हैं इसलिए उनसे समुचित काम लेना भी मुख्यमंत्री के लिए कठिन होगा। किसानों की ऋण माफ़ी सबसे बड़ी चुनौती है। भले ही शपथ के फौरन बाद चुनावी वायदा पूरा कर दिया हो किन्तु उस निर्णय को जमीन पर उतारना उतना आसान नहीं होगा। लोकसभा चुनाव करीब नहीं होते तब शायद जल्दबाजी से बचा भी जा सकता था किंतु मौजूदा हालात टी -20 क्रिकेट मैच जैसे हैं जिसमें पहली ही गेंद से रन बनाने की जरूरत होती है। राज्य की खस्ता माली हालत भी रोड़े अटकाने का कारण बनेगी। कुल मिलाकर आजादी के बाद ये पहला अवसर है जब सत्ता और विपक्ष के बीच सँख्याबल में बहुत कम फासला है। मतदाताओं ने पिछली सत्ता को अपदस्थ तो किया किन्तु भाजपा को पूरी तरह से किनारे नहीं किया। इस प्रकार जनादेश यही है कि सत्ता और प्रतिपक्ष दोनों सक्रिय रहते हुए समन्वय और सन्तुलन बनाकर काम करें। मुख्यमंत्री को भी चाहिए कि वे लोकसभा चुनाव तक अपने घोषणापत्र के वायदे पूरे करने पर ध्यान दें और राजनीतिक प्रतिशोध से बचने की कोशिश करें। वरना वे व्यर्थ के पचड़ों में उलझकर विपक्ष के जाल में फंस जाएंगे। वैसे मप्र की राजनीति में आने वाला समय बहुत ही रोचक राजनीति के नजारे उत्पन्न करने वाला रहेगा।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 25 December 2018

जीएसटी : मजबूरी में मेहरबानी

दो दिन पहले जीएसटी दरों में राहत देने के बाद वित्तमंत्री अरुण जेटली ने संकेत दिया है कि 5 , 12 , 18 और 28 फीसदी के विभिन्न स्तरों को समाप्त करते हुए केवल एक दर रखने पर विचार हो रहा है। सम्भवत: ये दर 12 से 18 फीसदी के बीच की हो सकती है।  अनेक देशों में जहां जीएसटी प्रचलित है वहां भी एक ही दर लागू है जिससे उत्पादक , व्यापारी और उपभोक्ता सभी को सुविधा रहती है। कर विवरणी भरने में भी आसानी होती है वहीं सरकार के संबंधित विभाग भी व्यर्थ की झंझटों से बच जाते हैं। हालांकि इस निर्णय तक पहुंचते-पहुंचते केंद्र सरकार ने बहुत देर लगा दी जिसकी वजह से श्री जेटली देश के सबसे बदनाम राजनेता बन गए। जीएसटी काउंसिल में चूंकि सभी राज्य सरकारों की भागीदारी है और सभी फैसले सर्वसम्मति से होते आए हैं इसलिए निर्णय प्रक्रिया में विलम्ब स्वाभाविक है। 23 दिसम्बर की बैठक में दरें कम करने को लेकर गैर भाजपा शासित राज्यों ने विरोध जताते हुए अपनी राजस्व हानि की क्षतिपूर्ति का सवाल भी उठा दिया। पेट्रोलियम वस्तुओं को जीएसटी के दायरे में नहीं लाने की वजह भी राज्यों का विरोध है। मोदी सरकार को आर्थिक मोर्चे पर नोटबन्दी के बाद जिस एक निर्णय के कारण जनता और व्यापार जगत दोनों का विरोध झेलना पड़ा उसमें जीएसटी सबसे ऊपर कहा जा सकता है क्योंकि इसकी वजह से भले ही टेक्स चोरी रुकी हो और सरकार के खजाने में एक व्यवस्थित आय का स्रोत बन गया हो किन्तु जीएसटी की विभिन्न दरों के साथ ही विवरणियों के भरने की जटिल प्रक्रिया ने व्यापार जगत को हलाकान कर डाला।  सबसे ज्यादा परेशानी अनिश्चितता को लेकर हुई। इसकी वजह से ये एहसास प्रबल हुआ कि देश की कर प्रणाली में किये गए सबसे बड़े बदलाव को पर्याप्त तैयारी के बिना ही लागू कर दिया गया। गुजरात विधानसाभा चुनाव में इसकी वजह से ही भाजपा को घुटनों के बल चलकर जीत मिली। चूंकि मामला राज्यों को होने वाले राजस्व घाटे का फंस गया इसलिये ये माना जा सकता है कि कुछ मामलों में श्री जेटली और केन्द्र सरकार चाहकर भी वह नहीं कर सके जो वे करना चाह रहे थे।  सबसे बड़ा पेच था पेट्रोलियम वस्तुओं को जीएसटी के अन्तर्गत लाने का जिसे लेकर आश्वासन तो कई मर्तबा सुनाई दिए लेकिन वित्त मंत्री के ताजे संकेतों में भी उस बारे में कुछ न कहा जाना ये प्रमाणित करता है कि भले ही जीएसटी की एक ही दर लागू हो जाये लेकिन पेट्रोल और डीजल पर मनमाना करारोपण करने का अधिकार राज्यों के पास बना रहेगा।  फिर भी यदि जीएसटी काउंसिल की अगली बैठक में एक ही दर सम्बन्धी फैसला लागू हो जाता है तो उससे भी बड़ी राहत सभी पक्षों को प्राप्त होगी। हालांकि 5 फीसदी के अंतर्गत आने वाली वस्तुओं  पर कर बढ़ जाएगा लेकिन कुल मिलाकर एक ही दर का फार्मूला जीएसटी की उपयोगिता और उद्देश्य दोनों की सार्थकता को साबित कर देगा।  वैसे ये कहना भी गलत नहीं है कि अपनी खडूस छवि से बाहर निकलने का ये प्रयास श्री जेटली सम्भवत: अभी भी नहीं करते यदि मप्र, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में भाजपा के हाथ से सत्ता नहीं गई होती। ये बात सोलह आने सच है कि भाजपा को शून्य से शिखर तक पहुंचाने में जिस व्यापारी और मध्यमवर्ग का सर्वाधिक योगदान रहा वही उससे सबसे ज्यादा नाराज होता गया। विशेष रूप से वित्त मंत्री के प्रति तो नाराजगी घृणा का रूप ले बैठी। विपक्षी तो छोड़ दें किन्तु भाजपा के भीतर भी बहुत बड़ी संख्या उन लोगों की है जो ये मानते हैं कि मोदी सरकार के प्रति लोगों का मोहभंग होने के पीछे श्री जेटली का रवैया सर्वाधिक जिम्मेदार है। चूंकि लोकसभा चुनाव की उल्टी गिनती शुरू हो चुकी है और केंद्र सरकार के पास दोबारा जनादेश मांगने के बहुत ठोस कारण नजर नहीं आ रहे हैं इसलिए भी शायद जीएसटी से मिले घावों पर मरहम लगाने का ये अंतिम प्रयास किया जा रहा है। वैसे सरकार किसी की भी हो वह वित्तीय मामलों में पूरी तरह से शोषक की तरह से ही व्यवहार करती है । बड़े उद्योगपति, किसान और कर्मचारी चूंकि दबाव बनाने में सक्षम हैं इसलिए उनकी बात सुनकर मान भी ली जाती है लेकिन छोटे व्यापारी और मध्यम वर्ग की स्थिति अनाथ सरीखी बना दी गई है । ये धारणा काफी मजबूती से स्थापित हो चुकी है कि सरकार की सभी योजनाएं प्रत्यक्ष रूप से गरीबों  और अप्रत्यक्ष रूप से अमीरों के लिए ही होती हैं। इसीलिए जीएसटी लागू होने से बड़े उद्योगपति और व्यापारी तो प्रसन्न दिखे किन्तु छोटा और मध्यमवर्गीय कारोबारी अकल्पनीय मुसीबतों में फंसकर सरकार को कोसने लगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रति जो आसक्ति एक बड़े वर्ग में जागी थी वह पहले नोटबन्दी और फिर जीएसटी से पैदा हुई व्यवहारिक परेशानियों की वजह से विरक्ति में बदलने लगी जिसकी बानगी बीते एक डेढ़ वर्ष में हुए चुनावों में देखने आई। हालांकि आलोचक भी ये मानते हैं कि श्री मोदी की नीयत ठीक है किंतु उक्त दोनों निर्णयों को लागू करने में सरकारी मशीनरी की अक्षमता ने इनके सकारात्मक पहलू पर नकारात्मकता का आवरण चढ़ा दिया। यद्यपि श्री जेटली लगातार ये आश्वासन देते रहे कि राजस्व वसूली लक्ष्यानुसार होते ही सरकार रियायतें देगी। विभिन्न वस्तुओं पर जीएसटी घटाकर इस दिशा में पहल भी हुई लेकिन अधिक दरें सदैव खटकती रहीं। धीरे-धीरे गाड़ी पटरी पर आने लगी। व्यापार जगत भी नई व्यवस्था के साथ समायोजन करना सीख गया। रिटर्न भरने वालों की संख्या में भी अच्छी खासी वृद्धि हो गई। ऐसा ही कुछ नोटबन्दी के बाद आयकर को लेकर भी देखने मिला। यद्यपि ये कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि लोकसभा चुनाव सामने आ जाने से श्री जेटली की भाषा और व्यवहार दोनों बदल गए। गुजरात की फीकी जीत, कर्नाटक में बहुमत के करीब पहुंचकर भी सत्ता से वंचित रह जाना और हाल ही में तीन राज्य गंवा देने के बाद भाजपा के उच्च नेतृत्व को ये समझ आ गया है कि दीर्घकालीन नीतियों का अपना महत्व है किंतु भारत जैसे विविधता भरे देश में तात्कालिक फायदों के बिना चुनाव जीतना कठिन होता है। शायद इसीलिए दरें घटाने के दो दिन बाद ही वित्तमंत्री ने कारोबारी जगत के साथ ही उपभोक्ताओं को संतुष्ट करने के संकेत दे दिए। ये कार्य सरकार जितनी जल्दी कर ले जाये उतना ही अच्छा है क्योंकि ज्यों ज्यों चुनाव का समय करीब आता जाएगा त्यों त्यों इस तरह की राहतों का अपेक्षित असर मतदाताओं पर नहीं होगा। व्यापार जगत में ये बात गहराई तक बैठ गई है कि भाजपा ने उनके धंधे पानी का कबाड़ा कर दिया।  हो सकता है वित्तमंत्री को उसका एहसास अब जाकर हुआ हो। खैर, देर आए दुरुस्त आए की तर्ज पर ही सही लेकिन जीएसटी की एक सी दर लागू करने से इसके प्रति व्यापारी और जनता दोनों के बीच व्याप्त असंतोष दूर होगा। लगे हाथ पेट्रोल और डीजल को भी अगर जीएसटी के दायरे में मोदी सरकार लाने का साहस दिखाए तो फिर लोकसभा चुनाव में अच्छे दिन आने का दावा भाजपा कर सकेगी।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 24 December 2018

बेमेल गठबंधन राष्ट्रीय दलों की मजबूरी बनी

बिहार में भाजपा, जद ( यू) और पासवान परिवार की पार्टी लोजपा के बीच लोकसभा सीटों का बंटवारा हो गया। इसके अन्तर्गत भाजपा और जद ( यू ) 17-17 तथा लोजपा को 6 सीटों पर लडऩे का अवसर मिलेगा। इसके अलावा रामविलास पासवान को भाजपा सम्भवत: असम से राज्यसभा में लाएगी। इस समझौते को भाजपा की शिकस्त और श्री पासवान की जीत के तौर पर देखा जा रहा है। 2014 में लोजपा भाजपा के साथ मिलकर 6 सीटें जीती थी जिनमें तीन तो श्री पासवान के घर की ही थीं। लेकिन तब जद (यू) अलग से लड़ा था। बाद में विधान सभा चुनाव के समय उसका लालू प्रसाद यादव के राजद से गठबंधन हुआ जो जल्द ही टूट गया और नीतीश कुमार ने नाटकीय अंदाज में फिर भाजपा का दामन थाम लिया। ऐसे में भाजपा की मजबूरी ये थी कि वह जद (यू) को किनारे नहीं कर सकती थी। उधर उपेंद्र कुशवाहा को नीतीश का एनडीए में महत्वपूर्ण बनना हजम नहीं हो रहा था और वे अपने लिए  पहले से ज्यादा सीटें मांग रहे थे। जब उन्हें लगा कि नीतीश के रहते उनकी पूछ-परख कम हो गई है तब उन्होंने कांग्रेस और लालू के महागठबंधन का दामन थाम लिया। उसके बाद से पासवान परिवार ने दबाव और बढ़ाया तथा एनडीए छोडऩे तक का इशारा कर दिया। यदि भाजपा हाल में हुए विधानसभा चुनावों में जीत जाती तब शायद अमित शाह रामविलास को भी नजरंदाज कर सकते थे किंतु तीन राज्यों की सत्ता हाथ से निकल जाने के  बाद भाजपा की अकड़ काफी कम हो गई जिसका असर गत दिवस हुए समझौते पर स्पष्ट दिखाई दिया। इस सीट बंटवारे को भाजपा की हार कहना गलत नहीं है लेकिन मौजूदा हालात में लगभग हर पार्टी  इस तरह के नखरे झेलने मजबूर है। 2017 के उप्र विधानसभा चुनाव में जोरशोर से शुरू हुई राहुल गांधी की खटिया यात्रा अचानक रुक गई और कांग्रेस ने समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव के सामने समर्पण कर दिया। कहां तो प्रेक्षक उप्र में कांग्रेस की वापसी की संभावना बता रहे थे और कहां राहुल ने 400 में से 300 सीटें सपा के लिए छोड़कर अपने कैडर को निराश कर दिया। चुनाव बाद इससे भी एक कदम आगे बढ़कर मायावती और अखिलेश के बीच बुआ और भतीजे वाला प्रेम उत्पन्न हुआ जिसके अंतर्गत उपचुनावों में सपा-बसपा मिलकर लड़े तथा भाजपा को जबर्दस्त तरीके से मात दी। उसके बाद कर्नाटक में जब किसी को बहुमत नहीं मिलने की स्थिति बनी तब कांग्रेस ने बिना देर लगाए ही देवेगौड़ा एंड कंपनी की निजी पार्टी जद (एस) को समर्थन दे दिया और मात्र 40 विधायकों के साथ कुमार स्वामी मुख्यमंत्री बन गए। इस प्रकार जो कांग्रेस किसी जमाने में विपक्षी गठबंधन को भानुमती का कुनबा कहकर उपहास करती थी वह भी कहने लगी कि गठबंधन समय की मांग है। और इसी के साथ भाजपा के विरोध में महागठबंधन का बीजारोपण शुरू कर दिया गया लेकिन हाल ही में संपन्न विधानसभा चुनाव में महागठबंधन नहीं बना। सपा और बसपा ने कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के रवैये की आलोचना करते हुए अपने उम्मीदवार उतार दिए। बसपा ने छत्तीसगढ़ में तो अजीत जोगी के साथ गठजोड़ तक  किया। चुनाव बाद जब मप्र और राजस्थान में कांग्रेस बहुमत की देहलीज पर आकर रुक गई तो सपा और बसपा ने भाजपा विरोध के नाम पर कांग्रेस की सत्ता बनवा दी। ऐसा लगा जैसे महागठबंधन की कांग्रेसी मुहिम अंजाम तक पहुंच जाएगी किन्तु संसद के सत्र के पहले सोनिया गांधी द्वारा बुलाई गई विपक्ष की बैठक में मायावती और अखिलेश यादव न तो पहुँचे और न ही किसी प्रतिनिधि को भेजा। उधर तेलंगाना के मुख्यमंत्री चंद्रशेखर राव ने भाजपा और कांग्रेस से अलग तीसरे मोर्चे की मुहिम फिर छेड़ दी। द्रमुक द्वारा राहुल गांधी को नरेंद्र मोदी के मुकाबले आगे करने की पहल को अपेक्षित समर्थन नहीं मिलने से एक बात तो स्पष्ट हो गई कि महागठबंधन अभी भी चेहराविहीन है और छोटे-छोटे दल कांग्रेस को वैसे ही आंखें दिखाने से बाज नहीं आ रहे जैसा पासवान परिवार ने भाजपा के साथ किया। इस प्रकार जितनी मजबूर भाजपा अपने सहयोगियों के सामने है उतनी ही कांग्रेस भी बल्कि कुछ हद तक तो ज्यादा भी। एनडीए में अभी तक तो श्री मोदी के नेतृत्व को लेकर कोई भी सन्देह नहीं है किंतु राहुल को महागठबंधन का नेता मानने पर सहमति  नहीं बन पा रही है। फिर भी कांग्रेस, भाजपा के अंधे विरोध के चलते उन सभी दलों से हाथ मिलाने राजी हैं जिनके साथ उनकी वैचारिक साम्यता नहीं है। व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखें तो गठबंधन अब ऐसी वास्तविकता बन गई है जिसे भाजपा और कांग्रेस को चाहे या अनचाहे स्वीकार और सहन करना ही पड़ेगा। शायद यही कारण है कि मप्र, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में एक दूसरे के विरोध में लडऩे के बाद भी कांग्रेस चाहती है कि उप्र में मायावती और अखिलेश यादव उसके साथ आ जाएं। इसी तरह से शिवसेना से रोज गालियां खाने के बाद भी भाजपा कह रही है कि 2019 के लोकसभा चुनाव में दोनों का गठबंधन जारी रहेगा। भारत सरीखे विविधता भरे देश में राजनीतिक दलों के बीच इस तरह का लचीलापन बुरा नहीं है लेकिन इसकी वजह से विचारधारा के आधार पर जो अंतर था वह नष्ट हो चला है। कहां तो सपा और बसपा के बीच सांप और नेवले जैसे रिश्ते थे और कहां बुआ-भतीजे सत्ता की खातिर एक साथ आना चाहते हैं। ममता बैनर्जी और चंद्रबाबू नायडू की पार्टी कांग्रेस की नीतियों से क्षुब्ध होकर बनी लेकिन अब वे उसी के साथ बैठने को तत्पर हैं। जम्मू कश्मीर में भाजपा और पीडीपी का गठबंधन अवसरवाद और वैचारिक पलायन का बड़ा उदाहरण बना। लेकिन इस सत्य को स्वीकार करना पड़ेगा कि गठबंधन मजबूरी की जगह जरूरी बन गया है। बावजूद इसके एक बात विचारणीय है कि येन प्रकारेण सत्ता हासिल करने के लिए किये जा रहे गठजोड़ भविष्य में देश के लिए नुकसानदेह साबित हो सकते हैं क्योंकि इनके पीछे नेताओं की निजी महत्वाकांक्षा और स्वार्थ हावी होने लगे हैं। भाजपा और कांग्रेस दोनों जिस तरह से दबाव झेलने मजबूर हो रहे हैं उससे उनकी दयनीयता उजागर हो रही है। इस सम्बंध में देखने वाली बात ये होगी कि इसका दूरगामी प्रभाव क्या होगा क्योंकि क्षेत्रीय दलों के दबाव के समक्ष राष्ट्रीय पार्टियों का समर्पण कालांतर में नई समस्याएं उत्पन्न कर सकता है।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 22 December 2018

सही और सच्चे व्यक्ति को डरने की क्या जरूरत

निजता या प्राइवेसी का सम्मान निश्चित रूप से किसी सभ्य और कानून से संचालित समाज की पहिचान होती है। किसी व्यक्ति की निजी जिंदगी एक तरह से उसका मौलिक अधिकार है। लेकिन दूसरी तरफ  ये भी सही है कि निजता के नाम पर उतना ही छिपाया जाना चाहिये या जा सकता है जिसकी वजह से समाज और देश को नुकसान न हो। कानून के समुचित पालन में भी निजता का उल्लंघन कई बार कानून सम्मत हो जाता है। उदाहरण के तौर पर किसी होटल में ठहरते समय अपनी पहिचान संबंधी कोई दस्तावेज देना होता है। एक समय ऐसा था जब इसकी कोई जरूरत नहीं पड़ती थी परंतु आतंकवाद के उदय के साथ ही आंतरिक सुरक्षा के लिए खतरे उत्पन्न हुए तबसे इस तरह की व्यवस्था शुरू की गई। इसके कारण कई अपराधी पकड़ में  भी आये। इसी तरह बैंकों में खाता खोलने जैसे कामों में भी निजी पहिचान को प्रमाणित करने का प्रावधान रखा गया। रेलगाड़ी में आरक्षित टिकिट पर यात्रा करने वाले को भी अपनी पहिचान दिखानी होती है। लेकिन इस सबके बावजूद भी निजता से जुड़ी कई ऐसी चीजें हैं जिन्हें व्यक्ति सार्वजनिक नहीं करना चाहता। इसीलिए आधार कार्ड से व्यक्ति की निजी जानकारी बाजार में बिकने के कारण ही उस पर सवाल उठने लगे। फेसबुक और सोशल मीडिया पर दी गई निजी जानकारी का व्यवसायीकरण  विश्वस्तर पर विवाद और बहस का विषय बना हुआ है। ऐसे में भारत सरकार द्वारा निजी कम्प्यूटर में संग्रहित जानकारी हासिल करने का जो नया प्रावधान किया गया उसका जमकर विरोध हो रहा है। 10 जांच एजेंसियों को इसका अधिकार दिया गया है। हालांकि इसमें काफी सतर्कता बरतने की बात कही गई है और गृह मंत्रालय की पूर्व अनुमति के बिना कोई भी जांच एजेंसी किसी के कम्प्यूटर को नहीं खंगाल सकेगी लेकिन विपक्ष द्वारा इसे मोदी सरकार की तानाशाही बताकऱ जोरदार विरोध शुरू कर दिया गया है। उधर सरकार सफाई दे रही है कि इस सम्बंध में पिछली सरकार द्वारा बनाये गए कानून को ही लागू किया जा रहा है। इसके पीछे जो उद्देश्य बताया गया वह देश की सुरक्षा है। सरकार का तर्क है कि किसी के फोन  वार्तालाप को निगरानी में लेने की तरह से ही कम्प्यूटर में निहित जानकारी को हासिल करना अगर राष्ट्रीय सुरक्षा की दृष्टि से आवश्यक हो तब वैसा करने के लिए अधिसूचित 10 एजेंसियां अधिकृत होँगी। लेकिन विपक्ष का कहना है कि इसके जरिये व्यक्ति की निजी जिंदगी में ताक झांक करने का तानाबाना बुना जा रहा है। सतही तौर पर देखें तो विपक्ष के सन्देह सही लगते हैं। लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा के  संदर्भ में देखें तब ऐसा लगता है कि आम शांतिप्रिय नागरिक को किसी भी प्रकार की चिंता करने की जरूरत नहीं है। जिन 10 एजेंसियों को निजी कम्प्यूटर से कोई भी जानकारी निकालने का अधिकार दिया गया है वे केंन्द्रीय गृह सचिव अथवा राज्य के मुख्य सचिव की पूर्व स्वीकृति के बिना वैसा नहीं कर सकेगी। इस प्रावधान के जरिये जांच एजेंसियों को किसी भी प्रकार की मनमानी करने और शांतिप्रिय नागरिक को बेवजह अथवा बदला लेने के लिए परेशान करने से रोक दिया गया है। और फिर जिन सरकारी जांच एजेंसियों को इसका जिम्मा सौंपा गया है वे सभी इतनी जिम्मेदार हैं कि उनसे किसी भी तरह के दुर्भावनापूर्ण कार्य की अपेक्षा साधारण स्थितियों में तो नहीं की जा सकती। देश की जो वर्तमान परिस्थितियाँ हैं उनमें ऐसा करना गलत नहीं लगता। आतंकवाद जिस तरह से देश के अंदरूनी हिस्सों तक फैल चुका है उसके मद्देनजऱ कम्प्यूटर जैसे उपकरण में समाहित जानकारी यदि सुरक्षा अथवा अथवा किसी अन्य जरूरी कारण से आवश्यक हो तब उसे हासिल करने का अधिकार तानाशाही नहीं माना जा सकता। लेकिन इसका दुरुपयोग किसी भी सूरत में न हो सके ये देखना भी सरकार का दायित्व  है वरना यह प्रावधान अपना उद्देश्य खो बैठेगा। स्मरणीय है जब मनमोहन सरकार ने एनआइए (राष्ट्रीय जांच एजेंसी) का गठन किया तब भाजपा के साथ अन्य विपक्षी दलों ने भी ये कहते हुए उसके विरोध में आसमान सिर पर उठा लिया था कि इससे राज्यों के अधिकार क्षेत्र में केंद्र का बेजा दखल बढ़ जाएगा जो संघीय ढांचे के लिए नुकसानदेह हो सकता है। लेकिन आज भाजपा की केंद्र सरकार भी एनआईए का खुलकर उपयोग कर रही है तथा इसे लेकर अब तक तो किसी राज्य से टकराव की जानकारी नहीं मिली। उस आधार पर ये मानना गलत नहीं होगा कि कम्प्यूटर में कैद जानकारी हासिल करने का जो अधिकार 10 जांच एजेंसियों को दिया जा रहा है उसका विरोध के लिए  विरोध करने की बजाय विपक्ष को चाहिए कि वह सरकार से इस सम्बन्ध में पूरी जानकारी हासिल करने के बाद किसी निष्कर्ष पर पहुंचे। और फिर जो व्यक्ति किसी तरह का गलत अथवा देश विरोधी काम नहीं करता उसे डरने की क्या जरूरत? ये प्रावधान आर्थिक अपराधों को पकडऩे के काम भी आएगा। बीते कुछ सालों में जो आर्थिक घोटाले हए उनको अनावृत्त करने में कम्प्यूटरों की जांच करने से काफी मदद मिली है। उस दृष्टि से देखें तो नए प्रावधान को परिस्थितियों की मांग समझकर स्वीकार करना ही अच्छा होगा। कम्प्यूटर के बढ़ते उपयोग से एक तरफ जहां कामकाज और संचार आसान हुआ है वहीं दूसरी तरफ  इससे हाइटेक अपराधों की भी बाढ़ सी आ गई है। पुलिस सहित अन्य जांच एजेंसियों में भी सायबर अपराध पकडऩे की व्यवस्था की गई है। केंद्र सरकार द्वारा शुरू की जा रही नई व्यवस्था को प्रारम्भ में ही आलोचना के घेरे में लेने से जांच एजेंसियों पर अनावश्यक दबाव पड़ेगा जो किसी भी तरह से देश हित में नहीं।

-रवीन्द्र वाजपेयी