Tuesday, 29 January 2019

जॉर्ज : समाजवादी आंदोलन की अंतिम कड़ी

स्वतंत्र भारत में समाजवादी आन्दोलन के अंतिम सेनानी जॉर्ज फर्नांडीज नहीं रहे। 88 साल की उम्र में उनका निधन अप्रत्याशित कदापि नहीं है क्योंकि बीते अनेक वर्षों से वे गम्भीर रूप से अस्वस्थ रहे। अटल जी की तरह से जॉर्ज भी अचेतन अवस्था में चले गये थे। 2009 में वे आखिरी बार चुनाव लड़े किन्तु हार गए। मुम्बई में टैक्सी यूनियन के नेता के रूप में श्रमिक आंदोलन से जुड़े जॉर्ज, डॉ लोहिया के दौर में युवा समाजवादी नेता के रूप में स्थापित हुए। 1974 की प्रसिद्ध रेल हड़ताल भी उन्हीं के नेतृत्व में हुई थी। 1975 में लगे आपात्काल के दौरान जॉर्ज पर बड़ौदा डायनामाइट कांड जैसा आरोप भी लगा। 1977 के लोकसभा चुनाव में हथकड़ी लगा उनका चित्र जनता पार्टी के प्रचार का सशक्त माध्यम बना और जेल में रहते हुए ही वे चुनाव जीते। ओजस्वी वक्ता के रूप में वे जनता को मंत्रमुग्ध कर देते थे। लोकसभा में विपक्ष और सत्ता में रहते हुए वे सदैव प्रभावशाली रहे। बतौर मंत्री उनकी सादगी और फक्कड़पन चर्चा का विषय रहा। वाजपेयी सरकार में जब वे रक्षा मंत्री बने तब उन्होंने अपने बंगले से मुख्य दरवाजा ही हटवा दिया था। जॉर्ज पर भ्रष्टाचार के आरोप भी लगे। सत्तर के दशक में तत्कालीन प. जर्मनी के चांसलर बिली ब्रांट के फाउंडेशन से अनुदान लेने के मामले में भी वे विवादग्रस्त हुए किन्तु उसके बाद भी उनकी लोकप्रियता कम नहीं हुई तो उसका कारण उनका समाजवादी तेवर ही था। इसी के चलते वे अपनी ही पार्टी में किनारे लगा दिए गए। बाद में नीतिश कुमार के साथ मिलकर उन्होंने समता पार्टी भी बनाई। लालू, मुलायम और शरद यादव से अलग हटकर जॉर्ज ने अपनी छवि पुराने समाजवादी नेता की बरकरार रखी। इसे दुर्भाग्य ही कहा जायेगा कि 2009 के बाद देश के दो शीर्ष नेता अटल जी और जॉर्ज दोनों बीमारी के कारण सार्वजनिक जीवन से दूर हो गए। इस वजह से राष्ट्रीय राजनीति में एक बड़ा शून्य महसूस किया गया। श्री फर्नांडीज भले ही आज की पीढ़ी के लिए अपरिचित नाम हो किन्तु 1967 से 2009 तक का राजनीतिक इतिहास उनके बिना अधूरा रहेगा। विनम्र श्रद्धांजलि ।

- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 28 January 2019

भारत रत्न : प्रणब दा पर बेवजह विवाद

भारत रत्न देश का सबसे बड़ा नागरिक सम्मान है। आज़ादी के बाद से दर्जनों विभूतियों को इससे अलंकृत किया जा चुका है।  पहले तो किसी ने कोई सवाल नहीं उठाये लेकिन बीते कुछ सालों से ये अलंकरण भी विवादों के घेरे में आ गया है। हालांकि ज्यादा विवाद पद्म अलंकरणों को लेकर होता रहा। ऊंची पहुंच रखने वाले कतिपय लोग बाकायदा जुगाड़ लगाकर पद्मश्री और उससे ऊपर के सम्मान हासिल कर लिया करते थे। इसकी वजह से इन सम्मानों को समाप्त करने की मांग भी उठने लगी। लेकिन मोदी सरकार ने इन अलंकरणों के लिए चयन प्रक्रिया को अत्यंत पारदर्शी बना दिया जिसकी वजह से समाज में रचनात्मक और उत्कृष्ट कार्य कर रहे ऐसे लोगों की झोली में भी पद्म सम्मान आने लगे जो प्रसिद्धि और प्रचार से दूर रहकर नेकी के कार्य में जुटे रहते हैं। इस साल भी ऐसे कई व्यक्तित्व पद्म सम्मान से अलंकृत हुए जिनके कृतित्व को लेकर अभी तक लोग या तो बहुत कम जानते थे या फिर जानते ही नहीं थे। हालांकि कुछ नाम ऐसे जरूर शामिल हो जाते हैं जो इस चयन प्रक्रिया में भी अपने लिए गुंजाइश निकाल लेते हैं। बावजूद उसके ये कहना पूरी तरह से सही होगा कि 2014 के बाद से पद्म सम्मानों में पारदर्शिता आई है जिससे इनकी सार्थकता और प्रतिष्ठा दोनों में उल्लेखनीय वृद्धि हुई। लेकिन भारत रत्न को लेकर अभी भी नाक सिकोडऩे वाले कम नहीं हैं। जब स्व. अटल बिहारी वाजपेयी और स्व. पं मदन मोहन मालवीय को मोदी सरकार ने भारत रत्न दिया तब बसपा नेत्री मायावती ने उसमें भी ब्राह्मण तत्व निकालकर आलोचना कर डाली। उसके पूर्व भी भारत रत्न को लेकर विवाद उठ चुके थे। क्रिकेटर सचिन तेंदुलकर को जब यह मिला तबये सवाल उठा था कि हॉकी के जादूगर स्व. मेजर ध्यानचंद को उनसे पहले वह सम्मान दिया जाना चाहिए था जो आज तक नहीं मिला। इसी तरह के सवाल तमिलनाडु के पूर्व मुख्यमंत्री एमजी रामचंद्रन और सितार वादक पं रविशंकर को भारत रत्न मिलने पर भी उठे थे। एक प्रश्न ये भी अक्सर उठता रहा कि विभिन्न सरकारें अपनी पसंद की विभूतियों को राजनीतिक नफे के आधार पर उपकृत करती रही हैं। क्षेत्रीयता भी कहीं न कहीं भारत रत्न की चयन प्रक्रिया को प्रभावित करती रही। पं मालवीय को भारत रत्न दिए जाने पर उसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के वाराणसी से सांसद होने से जोड़ा गया। यही बात इस वर्ष भी गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या में  भारत रत्न से अलंकृत किये जाने वाली विभूतियों के नामों की घोषणा के बाद सुनाई दी। पूर्वोत्तर राज्यों में अपने गायन से एक विशिष्ट छवि बना चुके स्व. भूपेन हजारिका और पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी को भारत रत्न दिए जाने को आगामी लोकसभा चुनाव में पूर्वोत्तर राज्यों और बंगाल के मतदाताओं की क्षेत्रीय भावनाओं को भुनाने से जोड़ा गया। वहीं राजनीति छोड़कर चित्रकूट में ग्रामीण विकास का आदर्श मॉडल खड़ा करने वाले स्व. नानाजी देशमुख को अलंकृत किये जाने को रास्वसंघ को प्रसन्न करना माना गया। स्व.हजारिका और स्व.देशमुख तो इस दुनिया में नहीं हैं इसलिए उन्हें लेकर तो ज्यादा बवाल नहीं मचा किन्तु प्रणब मुखर्जी जरूर लपेटे में आ गए। पहली प्रतिक्रिया तो भाजपा द्वारा बंगाल के लोगों को खुश करने की कोशिश के तौर पर सामने आई। जीवन भर कांग्रेसी रहे प्रणब दा को भाजपा सरकार द्वारा देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान दिए जाने के निर्णय को एक वर्ग विशेष ने राजनीतिक सौजन्यता से जोड़कर भी देखा  लेकिन सोशल मीडिया में श्री मुखर्जी को मिले सम्मान को गत वर्ष उनके रास्वसंघ के आयोजन में नागपुर जाने का पुरस्कार बताया जाने लगा। बात और आगे बढ़ी तो उन्हें अनिल अंबानी का निकटस्थ बताकर इंदिरा जी के दौर को उजागर किया जाने लगा , जब प्रणब दा की सरपरस्ती में स्व. धीरुभाई अम्बानी नामक एक धूमकेतु देश के औद्योगिक जगत में उभरा और टाटा - बिरला जैसे स्थापित दिग्गजों के समकक्ष खड़ा हो गया। चौकाने वाली बात ये देखी गई कि श्री मुखर्जी को भारत रत्न दिए जाने पर उस तबके से भी आपत्तियां और आलोचनाएं व्यक्त की गईं जो उसके पहले तक उन्हें अनुभवी राजनेता, विद्वान और शालीनता की प्रतिमूर्ति कहते नहीं थकता था। इनमें वे लोग भी शामिल रहे जिहोंने प्रणब दा के उस भाषण को साहसिक बताकऱ उसकी शान में कसीदे पढ़े जो उन्होंने नागपुर में रास्वसंघ के मंच से दिया था। उल्लेखनीय है जब श्री मुखर्जी ने हिन्दू संगठन का आमंत्रण स्वीकार कर नागपुर जाने का निर्णय लिया तब उनकी बेटी और दिल्ली में कांग्रेस प्रवक्ता शर्मिष्ठा तक ने उस पर ऐतराज जताया था। कुछ कांग्रेस नेताओं ने भी अपने - अपने तरीके से मुंह चलाया लेकिन श्री मुखर्जी ने जब अपने लिखित भाषण में भारत के इतिहास में वर्णित समन्वयवादी दृष्टिकोण और नेहरूवादी नीतियों की प्रशंसा की तो आलोचना प्रशंसा में बदल गई। टीवी चैनलों में भी उनके भाषण को लेकर रास्वसंघ का खूब मजाक उड़ाया गया। उसके बाद भी श्री मुखर्जी के कई ऐसे बयान आए जो मोदी सरकार और भाजपा को असहज लगने वाले थे। लेकिन ज्योंहीं उन्हें भारत रत्न दिए जाने की जानकारी सार्वजनिक हुई त्योंही उनकी समूची पुण्याई , विद्वता और वैचारिक प्रतिबद्धता पर सवाल उठाए जाने लगे। मजेदार बात ये रही कि कांग्रेसी और वामपंथी विचारधारा के समर्थक भाजपा को इस बात का उलाहना देने लग गए कि जनसंघ के संस्थापक डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी को अभी तक भारत रत्न नहीं दिया गया। वाकई ये बड़ी ही विचित्र स्थिति है क्योंकि जिस विचारधारा ने श्री मुखर्जी को राष्ट्रपति पद पर बिठाया उसे उनको भारत रत्न मिलना हजम नहीं हो रहा और जिन लोगों ने उस समय उनका विरोध किया उस विचारधारा की सत्ता  उन्हें सर्वोच्च नागरिक सम्मान से अलंकृत कर रही है। कुछ दशक पूर्व जब पीवी नरसिम्हा राव की सरकार ने स्व.अटल बिहारी वाजपेयी को पद्म विभूषण दिया तब इस तरह की कोई बात सामने नहीं आई। ऐसे में श्री मुखर्जी के अलंकृत होने को रास्वसंघ के आयोजन में जाने , अम्बानी से निकटता और बंगाल के मतदाताओं को प्रभावित करने के प्रयास जैसी बातों से जोडऩा उस सहिष्णुता के ही विरुद्ध है जिसके लिए बीते समय में आसमान सिर पर उठाया जाता रहा। हमारे देश में राष्ट्रपति पद से निवृत्त व्यक्ति के प्रति सम्मान और कृतज्ञता व्यक्त करने की परिपाटी रही है। केंद्र सरकार ने उस दृष्टि से श्री मुखर्जी का चयन करते हुए जिस सौजन्यता का परिचय दिया उसका स्वागत होना चाहिये। प्रणब दा के अलावा भारत रत्न से अलंकृत स्व.नानाजी देशमुख और स्व.भूपेन हजारिका भी इस सम्मान के सर्वथा योग्य कहे जाएंगे। अच्छा होता आलोचक समुदाय बजाय रायता फैलाने के  इन विभूतियों के कृतित्व की चर्चा करता जिससे किसी को ये सोचने का अवसर भी नहीं मिलता कि वे किस क्षेत्र या विचारधारा से जुड़े थे?

-रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 25 January 2019

गणतंत्र को गुणतंत्र में बदलना जरूरी

बीते कुछ वर्षों से देश में एक चर्चा जोरों से चल रही है कि संविधान खतरे में है। उसकी आत्मा को ठेस पहुंचाने के आरोपों के साथ ही ये भी कहा जाता है कि संविधान का प्रतिनिधित्व करने वाली संस्थानों को योजनाबद्ध तरीके से ध्वस्त किया जा रहा है। कहने वाले तो यहां तक कहने से भी बाज नहीं आ रहे कि देश में अघोषित आपात्काल लगा हुआ है तथा वर्तमान सत्ता बनी रही तो संसदीय प्रजातंत्र को तिलांजलि दे दी जाएगी तथा तानाशाही का साम्राज्य हो जाएगा। ऐसा कहने के पीछे चूंकि राजनीतिक स्वार्थ जुड़े हुए हैं इसलिये संविधान और लोकतंत्र पर खतरा मंडराने की बात सहसा गले नहीं उतरती। विशेष रूप से उन लोगों के मुंह से तो विशेष रूप से नहीं जिनके पूर्वज लोकतंत्र की हत्या के आरोप में जनता की अदालत द्वारा दंडित किये जा चुके हों। दरअसल देश के सामने असली संकट है तो विश्वास का। लोकतंत्र  शासक और शासित के बीच जिस भरोसे की बुनियाद पर टिका है वस्तुत: उसे कमजोर करने का षडय़ंत्र रच रहे तत्व भय का भूत खड़ा करने पर आमादा हैं। चूंकि बीते सात दशक में अधिकांशत: जनता के साथ वायदा खिलाफी हुई है इसलिये वह भी भ्रम में फंसकर रह जाती है। संविधान की वर्षगांठ के अवसर पर गणतंत्र को लेकर खूब भाषणबाजी और बुद्धिविलास होता आया है। राष्ट्रपति से लेकर गांव का सरपंच तक अच्छी बातें करते हैं। सिर से पाँव तक कर्ज में डूबी सरकारें सत्ता प्रतिष्ठान की प्रतिनिधि इमारतों को जगमगाने के लिये करोड़ों फूंक देती हैं। लेकिन गणतंत्र के मायने एवं उससे आम जनता को मिलने वाले फायदे की चिंता और चर्चा कोई नहीं करवाता । जबकि संविधान की ये वर्षगांठ सही मायनों में देश की जनता के लिये समर्पित होनी चाहिए क्योंकि संविधान बना ही भारत के लोगों के लिये था। दुर्भाग्य का विषय ये है कि ऐसे अवसरों पर बातें तो बड़ी होती हैं किंतु आम जनता की छोटी-छोटी समस्याओं को हल करने का कोई प्रयास नहीं होता और यही सबसे बड़ी विडंबना है। मंगल और चंद्रमा पर पहुंच रहे भारतीय यानों को उपलब्धि मानकर गौरव की अनुभूति होना गलत नहीं है। विश्व की सबसे तेज बढ़ती अर्थव्यवस्था का प्रमाण पत्र भी पीठ ठोंकने वाली बात है। विश्व मंच पर भारत की दमदार उपस्थिति एवं प्रभावशाली भूमिका के कारण भी देश गर्व का अनुभव करता है किन्तु इस सबसे अलग हटकर भी एक भारत है जिसमें आम जनता को खून के आँसू रोने के लिये बाध्य कर दिया जाता है। शिक्षा, स्वास्थ्य, पीने का पानी, आवास जैसी मूलभूत जरूरतें आज भी करोड़ों देशवासियों के लिये स्वप्न सरीखी हैं। गरीबी और बेरोजगारी के अधिकृत आँकड़ें यदि पता कर लिये जाएं तो फिर आर्थिक प्रगति के सारे दावे असत्य लगने लगेंगे। सही बात ये है कि गणतंत्र में जो गण है वह तंत्र के आगे लाचार होकर रह गया है। उसके पास ले-देकर केवल मताधिकार ही बचा है जिसका उपयोग पाँच वर्ष में करने के लिये उसे उत्प्रेरित किया जाता है। उल्लेखनीय बात ये है कि जिस अधिकार को समूचा शासन तंत्र कत्र्तव्य  बताकर प्रचारित करता है वह भी एक दिन का कर्मकांड बनकर रह गया है। भले ही उसके जरिये सत्ता बदलती रही है परन्तु जहां तक बात व्यवस्था परिवर्तन की है तो ये कहने में कुछ भी गलत नहीं है कि गणतंत्र का लाभ चंद उन्हीं लोगों तक सिमटकर रह गया जो तंत्र की चाटुकारिता में लिप्त रहते हैं। जिन योजनाओं और कार्यक्रमों के जरिये आम जनता की दशा सुधारने के प्रयास और दावे होते हैं वे तंत्र के मकडज़ाल में फंसकर हाँफने लग जाते हैं। इसकी वजह सत्ता प्रतिष्ठान में गुणवत्ता का अभाव है। सत्ता परिवर्तन से सुधार या बदलाव की जो उम्मीद की जाती है वह यदि पूरी नहीं होती तो उसका कारण गुणवत्ता की कमी है वरना जितना धन अब तक खर्च किया गया उतने में भारत, चीन, जापान, सिंगापुर की तरह विकास का प्रतीक बन चुका होता। गणतंत्र दिवस के इस पावन अवसर पर आज विचारणीय मुद्दा यही होना चाहिए कि इसे गुण तंत्र में कैसे बदला जाए। कहना अच्छा नहीं लगता किन्तु जिस संसद से संविधान के पालन तथा उसकी रक्षा की उम्मीद की जाती है वह भी गुणवत्ता के पैमाने पर खरी नहीं उतरती। दुख और चिंता की बात तो ये है कि अब न्यायपालिका भी अपनी ख्याति और प्रतिष्ठा खोने लगी है। न्यायाधीशों की चयन प्रक्रिया पर उठती उंगलियां इसका प्रमाण है। सात दशक पुराने लोकतंत्र को दुनिया की सबसे बड़ी जनतांत्रिक व्यवस्था कहने में निश्चित रूप से अच्छा लगता है किन्तु क्या हम अपने श्रेष्ठ संविधान के स्तर के अनुरूप श्रेष्ठ व्यवस्था बना सके और क्या जिस भारत के लोगों के उल्लेख के साथ संविधान की शुरूआत हो सकी उनका जीवन समस्या विहीन हो सका? प्रश्न और भी हैं किन्तु इस वर्ष का गणतंत्र दिवस इसलिये भी महत्वपूर्ण है क्योंकि कुछ महीनों बाद ही हम भारत के लोगों को अपने ऊपर राज करने वाली सरकार का चुनाव करने का अवसर मिलने वाला है। ऐसे में ये जरूरी हो जाता है कि हम चाहे जिस भूमिका में हों , देश के बारे में फैसला करते समय जात-पाँत, धर्म, क्षेत्रीयता, भाषा जैसी विभाजनकारी सोच से ऊपर उठकर राष्ट्र की बेहतरी के लिये अपना फैसला करें। गणतंत्र को गुणतंत्र में बदलने के लिये देश के हर नागरिक को आगे आना होगा। यदि हम चाहते हैं कि बीते सात दशक से चले आ रहे अधकचरेपन की जगह देश में 21वीं सदी की सोच रखने वाली सत्ता बने तो चयन करते समय हमें गुणवत्ता को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी चाहिए वरना अयोग्यता को प्रोत्साहन देने की परिपाटी यूं ही चलती रहेगी और हम आँकड़ों की लहलहाती फसल देख-देखकर खुश होते रहेंगे।
गणतंत्र दिवस पर हार्दिक शुभकामनाओं सहित,
रवीन्द्र वाजपेयी
संपादकस : संपादकीय
-रवीन्द्र वाजपेयी

गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर विशेष :-

गणतंत्र को गुणतंत्र में बदलना जरूरी

बीते कुछ वर्षों से देश में एक चर्चा जोरों से चल रही है कि संविधान खतरे में है। उसकी आत्मा को ठेस पहुंचाने के आरोपों के साथ ही ये भी कहा जाता है कि संविधान का प्रतिनिधित्व करने वाली संस्थानों को योजनाबद्ध तरीके से ध्वस्त किया जा रहा है। कहने वाले तो यहां तक कहने से भी बाज नहीं आ रहे कि देश में अघोषित आपात्काल लगा हुआ है तथा वर्तमान सत्ता बनी रही तो संसदीय प्रजातंत्र को तिलांजलि दे दी जाएगी तथा तानाशाही का साम्राज्य हो जाएगा। ऐसा कहने के पीछे चूंकि राजनीतिक स्वार्थ जुड़े हुए हैं इसलिये संविधान और लोकतंत्र पर खतरा मंडराने की बात सहसा गले नहीं उतरती। विशेष रूप से उन लोगों के मुंह से तो विशेष रूप से नहीं जिनके पूर्वज लोकतंत्र की हत्या के आरोप में जनता की अदालत द्वारा दंडित किये जा चुके हों। दरअसल देश के सामने असली संकट है तो विश्वास का। लोकतंत्र  शासक और शासित के बीच जिस भरोसे की बुनियाद पर टिका है वस्तुत: उसे कमजोर करने का षडय़ंत्र रच रहे तत्व भय का भूत खड़ा करने पर आमादा हैं। चूंकि बीते सात दशक में अधिकांशत: जनता के साथ वायदा खिलाफी हुई है इसलिये वह भी भ्रम में फंसकर रह जाती है। संविधान की वर्षगांठ के अवसर पर गणतंत्र को लेकर खूब भाषणबाजी और बुद्धिविलास होता आया है। राष्ट्रपति से लेकर गांव का सरपंच तक अच्छी बातें करते हैं। सिर से पाँव तक कर्ज में डूबी सरकारें सत्ता प्रतिष्ठान की प्रतिनिधि इमारतों को जगमगाने के लिये करोड़ों फूंक देती हैं। लेकिन गणतंत्र के मायने एवं उससे आम जनता को मिलने वाले फायदे की चिंता और चर्चा कोई नहीं करवाता । जबकि संविधान की ये वर्षगांठ सही मायनों में देश की जनता के लिये समर्पित होनी चाहिए क्योंकि संविधान बना ही भारत के लोगों के लिये था। दुर्भाग्य का विषय ये है कि ऐसे अवसरों पर बातें तो बड़ी होती हैं किंतु आम जनता की छोटी-छोटी समस्याओं को हल करने का कोई प्रयास नहीं होता और यही सबसे बड़ी विडंबना है। मंगल और चंद्रमा पर पहुंच रहे भारतीय यानों को उपलब्धि मानकर गौरव की अनुभूति होना गलत नहीं है। विश्व की सबसे तेज बढ़ती अर्थव्यवस्था का प्रमाण पत्र भी पीठ ठोंकने वाली बात है। विश्व मंच पर भारत की दमदार उपस्थिति एवं प्रभावशाली भूमिका के कारण भी देश गर्व का अनुभव करता है किन्तु इस सबसे अलग हटकर भी एक भारत है जिसमें आम जनता को खून के आँसू रोने के लिये बाध्य कर दिया जाता है। शिक्षा, स्वास्थ्य, पीने का पानी, आवास जैसी मूलभूत जरूरतें आज भी करोड़ों देशवासियों के लिये स्वप्न सरीखी हैं। गरीबी और बेरोजगारी के अधिकृत आँकड़ें यदि पता कर लिये जाएं तो फिर आर्थिक प्रगति के सारे दावे असत्य लगने लगेंगे। सही बात ये है कि गणतंत्र में जो गण है वह तंत्र के आगे लाचार होकर रह गया है। उसके पास ले-देकर केवल मताधिकार ही बचा है जिसका उपयोग पाँच वर्ष में करने के लिये उसे उत्प्रेरित किया जाता है। उल्लेखनीय बात ये है कि जिस अधिकार को समूचा शासन तंत्र कत्र्तव्य  बताकर प्रचारित करता है वह भी एक दिन का कर्मकांड बनकर रह गया है। भले ही उसके जरिये सत्ता बदलती रही है परन्तु जहां तक बात व्यवस्था परिवर्तन की है तो ये कहने में कुछ भी गलत नहीं है कि गणतंत्र का लाभ चंद उन्हीं लोगों तक सिमटकर रह गया जो तंत्र की चाटुकारिता में लिप्त रहते हैं। जिन योजनाओं और कार्यक्रमों के जरिये आम जनता की दशा सुधारने के प्रयास और दावे होते हैं वे तंत्र के मकडज़ाल में फंसकर हाँफने लग जाते हैं। इसकी वजह सत्ता प्रतिष्ठान में गुणवत्ता का अभाव है। सत्ता परिवर्तन से सुधार या बदलाव की जो उम्मीद की जाती है वह यदि पूरी नहीं होती तो उसका कारण गुणवत्ता की कमी है वरना जितना धन अब तक खर्च किया गया उतने में भारत, चीन, जापान, सिंगापुर की तरह विकास का प्रतीक बन चुका होता। गणतंत्र दिवस के इस पावन अवसर पर आज विचारणीय मुद्दा यही होना चाहिए कि इसे गुण तंत्र में कैसे बदला जाए। कहना अच्छा नहीं लगता किन्तु जिस संसद से संविधान के पालन तथा उसकी रक्षा की उम्मीद की जाती है वह भी गुणवत्ता के पैमाने पर खरी नहीं उतरती। दुख और चिंता की बात तो ये है कि अब न्यायपालिका भी अपनी ख्याति और प्रतिष्ठा खोने लगी है। न्यायाधीशों की चयन प्रक्रिया पर उठती उंगलियां इसका प्रमाण है। सात दशक पुराने लोकतंत्र को दुनिया की सबसे बड़ी जनतांत्रिक व्यवस्था कहने में निश्चित रूप से अच्छा लगता है किन्तु क्या हम अपने श्रेष्ठ संविधान के स्तर के अनुरूप श्रेष्ठ व्यवस्था बना सके और क्या जिस भारत के लोगों के उल्लेख के साथ संविधान की शुरूआत हो सकी उनका जीवन समस्या विहीन हो सका? प्रश्न और भी हैं किन्तु इस वर्ष का गणतंत्र दिवस इसलिये भी महत्वपूर्ण है क्योंकि कुछ महीनों बाद ही हम भारत के लोगों को अपने ऊपर राज करने वाली सरकार का चुनाव करने का अवसर मिलने वाला है। ऐसे में ये जरूरी हो जाता है कि हम चाहे जिस भूमिका में हों , देश के बारे में फैसला करते समय जात-पाँत, धर्म, क्षेत्रीयता, भाषा जैसी विभाजनकारी सोच से ऊपर उठकर राष्ट्र की बेहतरी के लिये अपना फैसला करें। गणतंत्र को गुणतंत्र में बदलने के लिये देश के हर नागरिक को आगे आना होगा। यदि हम चाहते हैं कि बीते सात दशक से चले आ रहे अधकचरेपन की जगह देश में 21वीं सदी की सोच रखने वाली सत्ता बने तो चयन करते समय हमें गुणवत्ता को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी चाहिए वरना अयोग्यता को प्रोत्साहन देने की परिपाटी यूं ही चलती रहेगी और हम आँकड़ों की लहलहाती फसल देख-देखकर खुश होते रहेंगे।

रवीन्द्र वाजपेयी
संपादक

Thursday, 24 January 2019

प्रियंका : ये तो होना ही था


आखिऱ वह हो गया  जो होना ही था। लम्बे  समय से इसकी सम्भावना बनी हुई थी। पहले क्यों नहीं हुआ ये सवाल जरूर पूछा जा सकता है किंतु इस फैसले से किसी को आश्चर्य नहीं हुआ। कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी की बेटी और वर्तमान अध्यक्ष राहुल गांधी की बहिन प्रियंका वाड्रा को गत दिवस कांग्रेस का महासचिव बनाकर बिना देर किए पूर्वी उप्र का प्रभारी भी बना दिया गया। यद्यपि इसके पहले वे पार्टी में किस पद पर थीं ये शायद ही किसी को पता हो। लेकिन कांग्रेस और उप्र के लिए श्रीमती वाड्रा का राजनीति के अग्रभाग में आकर नेतृत्व करने से जरूर थोड़ा अचंभा है क्योंकि खुद इसी तरह कांग्रेस में शीर्ष पद तक आ पहुंचे राहुल पैराशूट से आने वालों के विरुद्ध बोलते रहे हैं। बहरहाल अब प्रियंका के साथ महासचिव का औपचारिक सम्बोधन जुड़ गया है वरना पार्टी की उच्च स्तरीय निर्णय प्रक्रिया में तो वे गत माह ही खुलकर शामिल हो चुकी थीं जब मप्र, राजस्थान और छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनावों के बाद कांग्रेस के मुख्यमंत्री चयन के समय वे सोनिया जी और राहुल के साथ न सिर्फ बैठीं वरन निर्णय करने में अपना मंतव्य भी खुलकर व्यक्त किया। सूत्रों के मुताबिक मप्र में कमलनाथ की ताजपोशी में प्रियंका की भूमिका निर्णायक रही थी। हालांकि रायबरेली और अमेठी में क्रमश: माँ और भाई के चुनाव प्रचार में वे मैदान में  दिखाई देती थीं किन्तु बाकी जगह कभी-कभार माँ के साथ दौरे में जाने के अलावा वे प्रचार से दूर ही रहीं। जबसे श्रीमती गांधी का स्वास्थ्य खराब हुआ है तबसे ही प्रियंका के रायबरेली से लडऩे की चर्चाएं चल पड़ी थीं। उस आधार पर कहा जा रहा था कि पहले वे सांसद बनेंगीं और फिर संगठन में उन्हें समाहित किया जाएगा। जब राहुल को कांग्रेस महासचिव , उपाध्यक्ष और अंत में अध्यक्ष बनाया गया तब भी ये बहस चली थी कि श्रीमती गांधी को उनकी जगह प्रियंका को आगे  बढ़ाना चाहिए था, जिनकी छवि और आकर्षण कहीं ज्यादा था किंतु स्व.इंदिरा गांधी और उनके पति स्व. फिरोज गांधी के बीच की अनबन की कड़वी यादों  ने सभवत: सोनिया जी को राहुल के जिम्मे विरासत सौंपने का प्रेरित किया। शुरुवाती लडख़ड़ाहट और विफलताओं के बाद यद्यपि अब वे बतौर राष्ट्रीय नेता स्थापित हो चुके हैं लेकिन ये बात भी दीवार पर लिखी इबारत जैसी साफ है कि दिल्ली की सत्ता का रास्ता जिस उप्र से होकर जाता है उसमें कांग्रेस की हालत दयनीय से भी बदतर है। मायावती और अखिलेश यादव ने लोकसभा चुनाव हेतु गठबंधन करते हुए जिस तरह कांग्रेस के लिए रायबरेली और अमेठी सीट छोड़ दीं उसने राहुल की हैसियत को पलक झपकते कम कर दिया और प्रधानमंत्री बनने की उनकी सम्भावनाओं पर प्रश्नचिन्ह लग गया। चूंकि उप्र में पार्टी के पास एक भी चमकदार चेहरा ऐसा नहीं बचा जिसका प्रभाव 10 सीटों तक पर हो इसलिए आखिरकार प्रियंका को ही मैदान में उतारना पड़ा। यदि सोनिया जी का स्वास्थ्य कुछ अच्छा होता तब भी ये निर्णय चुनाव बाद के लिए टल जाता लेकिन हालात की मजबूरियों और समय की कमी के चलते गांधी परिवार के पास इस अंतिम उपाय को जिसे ब्रह्मास्त्र कहकर प्रचारित किया जा रहा है, इस्तेमाल करने के सिवाय दूसरा विकल्प नहीं था। इस निर्णय की जरूरत उप्र में कांग्रेस के जमीन छू चुके मनोबल को ऊपर उठाने के लिए कितनी ज्यादा थी इसका प्रमाण यही  है कि प्रियंका के विदेश में होते हुए ही उन्हें महामंत्री बनाने की घोषणा करते हुए पूर्वी उप्र का प्रभार भी उनके हवाले कर दिया गया। इस निर्णय के बाद अब कांग्रेस नेहरू - गांधी युग से निकलकर गांधी - वाड्रा दौर में आ गई है। प्रियंका को कमान दिए जाने के कुछ दिन  पहले ही उनके पति रॉबर्ट वाड्रा के भूमि घोटाले के आरोप पत्र अदालत में पेश हो चुके हैं तथा उन्हें सम्मन भी जारी हो गए हैं। अचानक प्रियंका के राजनीति में आरोहण के पीछे अदालती कार्रवाई भी हो सकती है जिससे समूचे आरोपपत्र को सियासी साबित करने का चिर परिचित खेल खेला जा सके। रही बात प्रियंका की तो पहली परीक्षा सपा -बसपा गठबंधन में कुछ ज्यादा हिस्सा प्राप्त करने से होगी। कहते हैं अखिलेश यादव की पत्नी डिंपल और प्रियंका के बीच मित्रता है जिसके कारण ही 2017 के विधानसभा चुनाव में राहुल ने सपा से गठबंधन किया था। यदि प्रियंका उसमें सफल नहीं हुईं तब उन्हें पूर्वी उप्र में पार्टी को लडऩे लायक बनाना होगा जो अभी अखाड़े से ही बाहर है। ये चुनौती बहुत बड़ी है। हो सकता है अपने पुश्तैनी आभामण्डल की वजह से श्रीमती वाड्रा रायबरेली से जीत जाएं और अमेठी में राहुल की मददगार बनें किंतु मौजूदा हालात में उप्र में कांग्रेस को कोमा से निकलना असम्भव सा ही है। भाजपा और अन्य दलों ने प्रियंका के राजतिलक पर जो कहा वह अपनी जगह ठीक है क्योंकि  उनकी एकमात्र योग्यता अभी तक तो सोनिया जी की बेटी और राहुल की बहिन होना ही है। रही बात परिवारवाद की तो कांग्रेस ने जब इसे अपनी संस्कृति और परंपरा बना लिया तब किसी और के ऐतराज करने का औचित्य ही नहीं रह जाता। लेकिन इससे ये बात भी उभरकर सामने आ गई कि कांग्रेस के उच्च नेतृत्व में बैठे तमाम अनुभवी नेताओं की अपेक्षा गांधी परिवार अभी भी अपने खून पर ही विश्वास करता है जो राजघरानों की संस्कृति होती है। प्रियंका आकर्षक व्यक्तित्व और आक्रामक अंदाज के लिए जानी जाती हैं। बहुत लोगों को वे उनकी दादी इंदिरा जी जैसी भी लगती हैं किन्तु राजनीति में उनका विधिवत पदार्पण प्रौढ़ शिक्षा वाली शैली में हुआ है। देखना है वे लोकसभा चुनाव रूपी पहली परीक्षा में क्या कर पाती हैं? लेकिन यदि असफल रहीं तब भी उनका कुछ नहीं बिगडऩे वाला क्योंकि कांग्रेस में उनके परिवार को हर तरह के दोषों से स्थायी मुक्ति दे दी गई है। उनके साथ ही मप्र के मुख्यमंत्री बनते-बनते रह गए ज्योतिरादित्य सिंधिया को भी महामंत्री बनाकर पश्चिमी उप्र सौंप दिया गया किन्तु वह उतना महत्वपूर्ण नहीं है। पार्टी हाईकमान उन्हें मप्र से हटाना चाह रहा था क्योंकि मुख्यमंत्री कमलनाथ के लिए वे सिरदर्द बन सकते थे।

-रवीन्द्र वाजपेयी