Monday, 25 February 2019

ये काम धर्माचार्यों को भी करना चाहिए

राजनीति से जुड़े व्यक्ति की प्रत्येक क्रिया उसी से प्रेरित और प्रभावित मानी जाती है। उस लिहाज से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा प्रयागराज में चल रहे कुम्भ में पांच सफाई कर्मियों के पांव पखारने पर हो रही व्यंग्यात्मक टिप्पणियां सहज स्वाभाविक ही कही जाएंगी। गत दिवस श्री मोदी ने कुम्भ स्नान भी किया लेकिन उनकी प्रयागराज यात्रा का सबसे चर्चित दृश्य कुम्भ की स्वच्छता को विश्वस्तर पर चर्चित कर देने वाले समर्पित सफाई कर्मचारियों के प्रतिनिधि के तौर पर पाँच लोगों के पैर धोने वाला बन गया। प्रधानमंत्री इस समय चुनावी दौरे पर भी हैं और तकऱीबन रोजाना ही किसी शहर में जनसभा करते हैं। प्रयागराज में उन्होंने यद्यपि सभा तो नहीं की किन्तु उससे भी बड़ा काम वे कर गए। सामाजिक समरसता का जो भाव उनके इस कार्य से व्यक्त हुआ उसे सकारात्मक तौर पर लिया जाए तो राजनीति को जातिवाद के ज़हर से बचाया जा सकता है। वैसे होना तो ये चाहिये कि कुम्भ जैसे आयोजन के अवसर पर साधु-महात्मा और अन्य धर्माचार्य इस तरह का उदाहरण पेश करें। कुम्भ का एक उद्देश्य ये भी होता है कि समूचा समाज बिना भेदभाव के एकजुट होकर एकाकार हो जाये। जितने भी डेरे लगते हैं उनमें प्रवेश और भोजन के लिए कोई भी जा सकता है। श्री मोदी ने बिना उपदेश झाड़े जो कार्य गत दिवस किया उसे चुनावी मौसम से जोड़कर भी देखा जा सकता है किन्तु बेहतर हो सभी नेतागण इस तरह के आयोजन करने लगें। हिन्दू समाज वर्ण व्यवस्था व्यक्ति के व्यवसाय से जुड़ी थी किन्तु कालांतर में उसने जाति का रूप ले लिया। आज़ादी के आन्दोलन के दौरान ही महात्मा गांधी ने छुआछूत मिटाने का अभियान छेड़ा था। आज ये कहने में कोई संकोच नहीं है कि छुआछूत तो काफी हद तक मिट गई लेकिन जाति की दीवारें वोट बैंक का सहारा लेकर और भी ऊंची और मजबूत होती जा रही हैं। राजनीतिक गठबंधन भी विचारधारा और सिद्धांतों की जगह  जाति विशेष के वोटों की संख्या पर निर्भर हो गए हैं। निश्चित रूप से राजनेता इसके लिए कसूरवार हैं लेकिन धर्माचार्यों ने भी जातिगत भेदभाव मिटाने के लिए अपेक्षित प्रयास नहीं किये। उल्टे अनेक साधु-सन्यासी तो खुद ही अपनी जाति को भुनाने राजनीति की मंडी में बैठ गए। गत दिवस श्री मोदी ने सांकेतिक तौर पर जो किया उसे आगे बढ़ाने की खासी जरूरत आज के माहौल में है। कुम्भ के बाद धर्माचार्य यदि इस अभियान को पूरे देश में संचालित करें तो एक बड़ी सामाजिक क्रांति हो सकती है ।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 23 February 2019

आपसी कलह बढ़ा रही कमलनाथ का सिरदर्द

विधानसभा चुनाव के दौरान जिस एकता की वजह से कांग्रेस ने भाजपा के अभेद्य बन चुके किले में सेंध लगाई थी वह सत्ता मिलने के बाद इतनी जल्दी छिन्न-भिन्न होने लगेगी ये कोई नहीं सोचता था। मुख्यमंत्री की कुर्सी के लिए चली खींचातानी तो सोनिया गांधी, राहुल और प्रियंका ने किसी तरह दूर करते हुए ज्योतिरादित्य सिन्धिया की तुलना में अनुभवी कमलनाथ को महत्व दे दिया। उसके बाद श्री सिंधिया को प्रदेश से हटाकर उप्र में लोकसभा चुनाव की व्यूहरचना में उलझा दिया गया।  लेकिन मप्र की सियासत के सबसे अनुभवी खिलाड़ी और दस वर्ष तक मुख्यमंत्री रह चुके दिग्विजय सिंह की भूमिका स्पष्ट नहीं होने  के कारण सत्ता में आने के बाद भी कांग्रेस अपेक्षित प्रभाव नहीं छोड़ पा रही।  सही बात तो ये है कि ऊपर-ऊपर कहें कुछ भी लेकिन दिग्विजय सिंह की इच्छा एक बार फिर भोपाल की शामला हिल पर बने आलीशान मुख्यमंत्री निवास में रहने की थी।  2003 में सत्ता से हटने के बाद 10 वर्ष तक प्रदेश की राजनीति में नहीं लौटने की उनकी प्रतिज्ञा भी पूरी हो चुकी थी।  विधानसभा चुनाव के पूर्व उनकी पैदल नर्मदा परिक्रमा भले ही उनका निजी धार्मिक मसला था किंतु ये कहना भी गलत न  होगा कि राजनीति के चतुर खिलाड़ी के रूप में उन्होंने उस यात्रा के माध्यम से पूरे प्रदेश में अपनी प्रासंगिकता को पुनस्र्थापित करने के साथ ही अपनी छवि भी सुधार ली। यद्यपि मुख्यमंत्री की दौड़ से वे स्वयं को बाहर बताते रहे किन्तु पूरे चुनाव में जिस तरह सक्रिय रहे उससे वे कमलनाथ के बराबर की हैसियत बनाये रखने में कामयाब हो गए।  टिकिट वितरण में भी उन्होंने अपने समर्थकों को जमकर उपकृत किया। चुनाव बाद जब उन्हें लगा कि उनके पक्ष में हवा नहीं है तब बिना देर लगाए श्री सिंधिया को किनारे करते हुए कमलनाथ के पक्ष में माहौल बना दिया।  सरकार बनने के बाद मंत्रियों के चयन में भी उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। उसके बाद जब प्रशासनिक अधिकारियों के तबादले की बात आई तब भी वे समानांतर मुख्यमंत्री की भूमिका में नजर आए। यहां तक भी ठीक था लेकिन जब उन्होंने मंत्रियों को हांकने की कोशिश की तब बात बिगड़ गई। विधानसभा में पिछली सरकार के भ्रष्टाचार से जुड़े सवालों के जो उत्तर दिए गए वे शिवराज सरकार के लिए चरित्र प्रमाणपत्र जैसे साबित हुए। उसकी वजह से कांग्रेस की जमकर किरकिरी हुई।  मुख्यमंत्री कमलनाथ ने तो उस पर नाराजगी नहीं दिखाई लेकिन दिग्विजय सिंह ने जबर्दस्त गुस्से का प्रदर्शन करते हुए मंत्रियों को जमकर लताड़ा। बाकी मंत्री तो उनकी नाराजगी पचा गए किन्तु उमंग सिंगार नामक मंत्री ने उन्हें पत्र लिखकर खुला विरोध व्यक्त कर दिया। और तो और उन्हें ये उलाहना भी दे डाला कि उनके पुत्र जयवर्धन सिंह भी उन मंत्रियों में शामिल थे जिनके जवाब से वे नाराज हो उठे। बाद में कमलनाथ ने मामले को ठंडा करने की कोशिश की किन्तु दूसरी तरफ  विधायकों की बड़ी संख्या मंत्रियों से नाराज होकर मुख्यमंत्री के पास शिकायत लेकर जाने लगी है।  प्रशासनिक ढांचे में पूरी तरह उथलपुथल हो जाने से नौकरशाही भी नई व्यवस्था से सामंजस्य स्थापित नहीं कर पा रही है।  चुनाव के दौरान किये गए वायदे पूरे करने में धन की कमी आड़े आ रही है। किसानों के कर्जे माफ  करने के काम में देर होने से लोकसभा चुनाव में किसानों के बीच जाने में जो कठिनाई होगी वह भी चिंता का कारण बनती जा रही है। कमलनाथ के पास मुख्यमंत्री और कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष का दोहरा दायित्व होने से वे सत्ता और संगठन में समन्वय और सन्तुलन बनाये रखने का भरपूर प्रयास कर रहे हैं लेकिन सत्ता के समानांतर उभर रहे शक्ति केंद्र उनकी मुसीबत बढ़ा रहे हैं। बहुमत जुटाने के लिए जिन बाहरी विधायकों का समर्थन लिया गया वे भी आए दिन आंखें तरेरते रहते हैं। इन सब बातों के कारण सरकार अपना असर नहीं दिखा पा रही।  जिन तीन नेताओं की एकता को प्रचारित करते हुए कांग्रेस ने जनता का समर्थन प्राप्त किया वे विपरीत धु्रवों में खड़े होते दिख रहे हैं।  उमंग सिंगार जैसे युवा मंत्री का दिग्विजय सिंह सदृश वरिष्ठ नेता को लिखा गया पत्र साधारण बात नहीं है।  अप्रत्यक्ष रूप से ये कमलनाथ को भी संकेत है कि उनके मंत्रीमंडल के सदस्य होने के बावजूद भी अनेक मंत्रियों की निष्ठा अपने उन आकाओं के प्रति है जिनकी कृपा से वे मंत्री पद प्राप्त कर सके। सरकार बनने के उपरांत शुरुवाती दौर में ऐसा होना स्वाभाविक माना जाता है लेकिन अब काफी समय बीत चुका है। चूंकि लोकसभा चुनाव के लिए आचार संहिता कभी भी लग सकती है इसलिये कांग्रेस के लिए जरूरी हो चला है कि वह विधानसभा चुनाव के पहले वाली एकता का प्रदर्शन फिर करे।  विभिन्न पदों पर नियुक्तियों को लोकसभा चुनाव के बाद टालने के कारण कांग्रेस कार्यकर्ताओं में बेचैनी बढऩे लगी है।  उन्हें ये डर सताने लगा है कि लोकसभा चुनाव के बाद बड़े नेताओं और मंत्रियों के खासमखास बने लोगों को उपकृत करते हुए उनकी उपेक्षा कर दी जाएगी।  कुल मिलाकर ये कहा जा सकता है कि यही हालात रहे तो लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के लिए राह आसान नहीं रहेगी। ज्योतिरादित्य भले उप्र में व्यस्त हों लेकिन वे ग्वालियर, भिंड, मुरैना, गुना, उज्जैन, विदिशा, रतलाम के अलावा पन्ना, सागर आदि में अपने समर्थकों को टिकिट दिलवाने की भरपूर कोशिश करेंगे।  दिग्विजय सिंह भी ज्यादा से ज्यादा सीटें झटकने का प्रयास करेंगे। सत्ता संचालन में व्यस्तता के वजह से कमलनाथ संगठन के कार्यों के लिए समय नहीं निकाल पा रहे हैं जिसके कारण पार्टी का प्रदेश कार्यालय भी व्यवस्थित नहीं हो पा रहा। इस सबसे हटकर देखें तो सरकार के अस्तित्व पर मंडराता खतरा भी कांग्रेस की चिंता का कारण है।  भाजपा के अनेक नेता कह चुके हैं कि उन्हें ऊपर से इशारा मिलते ही वे सत्ता पलट देंगे।  खुदा न खास्ता लोकसभा चुनाव के पहले ऐसा कुछ हुआ तब कांग्रेस के अच्छे दिन जिस तरह आए उसी तरह लौट भी सकते हैं। कमलनाथ के लिए परिस्थितियां दिन ब दिन चुनौतीपूर्ण होती जा रही हैं।  बाहरी लोगों से वे एक बार निबट भी लें किन्तु घर के भीतर की कलह उनका बड़ा सिरदर्द बनती जा रही है।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 22 February 2019

पाकिस्तान का पानी उतारने का सही समय

केंद्रीय मंत्री नितिन गड़करी यद्यपि विदेशी मामलों में नहीं बोलते लेकिन गत दिवस उन्होंने पाकिस्तान को लेकर जो बयान दिया वह काफी गम्भीर है। हालांकि जो बात उन्होंने कही वह चूंकि उनके विभाग से ही संबंधित है इसलिए उसे अनधिकृत भी नहीं कहा जा सकता। उनकी छवि चूंकि ठोस बात करने वाले नेता की है इसलिए उनकी घोषणाओं पर विश्वास किया जा सकता है। पुलवामा हमले के बाद देश में उत्पन्न रोषपूर्ण वातावरण के चलते पाकिस्तान के साथ रिश्ते तोडऩे का दबाव बढ़ रहा है। हमले के फौरन बाद पाकिस्तान से मोस्ट फेवर्ड नेशन का दर्जा वापिस लेने का फैसला किया गया। लेकिन जैसी जानकारी मिली उसका उतना असर नहीं होगा क्योंकि दोनों देशों के बीच व्यापार बहुत अधिक नहीं है। फिर भी पाकिस्तान पर मनोवैज्ञानिक दबाव तो बढ़ा ही। अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत ने जो मोर्चेबंदी की उसका भी अनुकूल परिणाम देखने मिल रहा है। गत दिवस पाकिस्तान ने हाफिज सईद के संगठन पर प्रतिबन्ध लगाकर दुनिया को अपनी नेकनीयती दिखाने की कोशिश भी उसी दबाव के चलते की। लेकिन उसकी विश्वसनीयता पूरी तरह खत्म हो चुकी है इसलिये ये मानना कठिन है कि इमरान सरकार वाकई आतंकवादियों की नकेल कसेगी। हाफिज सईद पर पहले भी शिकंजा कसा गया था जिसे बाद में ढीला कर दिया गया। अन्य आतंकवादियों को लेकर भी यही रवैया रहा है। ऊपर से पाकिस्तान का हर शासक बड़ी ही मासूमियत से कहता है कि उनका मुल्क खुद ही दहशतगर्दी का शिकार है। दो दिन पहले इमरान ने भारत को हमला करने पर करारा जवाब देने की धमकी देते हुए भी ये रोना रोया था कि बीते दस वर्षों में ही उसके 50 हजार नागरिक आतंकवादी हमलों में मारे जा चुके हैं। ये सब देखते हुए भारत के लिए जरूरी होता जा रहा है कि वह ऐसा कुछ करे जिससे पाकिस्तान पर दबाव बढ़ाया जा सके। कश्मीर के अलगाववादी नेताओं की सुरक्षा खत्म करने के निर्णय का असर हालांकि घाटी में तो होगा लेकिन पाकिस्तान पर प्रत्यक्ष दबाव फिर भी नहीं बन पायेगा। जम्मू कश्मीर के विशेष संवैधानिक दर्जे वाली धारा 370 को खत्म करने हेतु भी चौतरफा मांग उठ रही है लेकिन राजनीतिक आम राय नहीं बन पाने की वजह से ऐसा करना आसान नहीं लगता। पाकिस्तान की बांह मरोडऩे के लिए युद्ध भी एक विकल्प के तौर पर चर्चा में है। सेना को दी गई छूट का आशय भी यही लगाया जा रहा है कि यदि वह उचित समझे तो दुश्मन के घर में घुसकर उसे सबक सिखा सकती है। लेकिन युद्ध शुरू करने के पहले काफी कुछ विचार करना होता है और फिर वह स्थायी निदान भी नहीं है। पिछले जितने भी युद्ध हुए उन सब में पाकिस्तान को पराजय झेलनी पड़ी लेकिन उसके बाद भी वह अपनी हरकतों से बाज नहीं आया। ऐसे में भारत को ऐसा करना जरूरी हो गया है जिससे पाकिस्तान वाकई दबाव में आये और शायद इसीलिए श्री गड़करी ने सिंधु नदी समझौते को तोडऩे की बात कहते हुए कहा कि भारत से जिन तीन नदियों का पानी पाकिस्तान को जाता है उसे अवरुद्ध या कम कर दिया जाए। ऐसा होने पर एक तरह से आधा पाकिस्तान पानी के लिए तरस जायेगा। उन्होंने इसकी कार्ययोजना भी सामने रख दी। हालांकि ये काम पूरा होने में कम से कम पांच साल लग जाएंगे लेकिन इसकी तैयारी होते ही नदियों के प्रवाह पर असर पडऩा शुरू हो जायेगा। यद्यपि इस कदम से ये आशंका भी है कि पाकिस्तान का संरक्षक बना बैठा चीन ब्रह्मपुत्र नदी का जल रोककर भारत के लिए समस्या उत्पन्न कर सकता है किंतु भारत के बड़े बाजार को खोने का खतरा  बीजिंग में बैठे हुक्मरान शायद ही उठाना चाहेंगे। और फिर भारत भी अब विश्व जनमत को प्रभावित करने की स्थिति में आ गया है। इस वजह से चीन भारत से सीधा पंगा लेने से बचना चाहेगा। इसके अलावा उसके भी कुछ इलाकों में मुस्लिम आतंकवाद सिर उठाने लगा है। उसके वन बेल्ट वन रोड प्रकल्प का भारत ने जिस तरह से विरोध किया उससे चीन को ये एहसास तो हो ही गया कि अब भारत पहले जैसा नहीं रहा। आर्थिक और सामरिक तौर पर वह धीरे-धीरे ही सही लेकिन चीन के बराबर खड़ा होने की हैसियत हासिल करने की राह पर है। अरुणाचल में भारत ने सड़कों और हवाई अड्डे का विकास करते हुए वहां अपनी तोपें और मिसाइल तैनात कर रखी हैं । उनसे भी चीनी हेकड़ी प्रभावित हुई है। इस प्रकार ये सही अवसर है जब पाकिस्तान जाने वाली नदियों के पानी को रोकने का स्थायी इंतजाम भारत करे। यद्यपि इसमें अंतर्राष्ट्रीय हस्तक्षेप आड़े आ सकता है लेकिन पुलवामा की घटना के बाद जिस तरह विश्व जनमत पाकिस्तान के विरुद्ध मुखर हुआ है उसे देखते हुए भारत के लिये ऐसे किसी कदम को उठाने का इससे अच्छा अवसर नहीं मिलेगा। श्री गड़करी ने कश्मीर की नदियों के पानी से हरियाणा-पंजाब सहित उत्तर भारत की जल जरूरतें पूरी करने का जो इरादा जताया वह देश के व्यापक हितों में है। एक सभ्य और जिम्मेदार देश के रूप में भारत ने अतीत में हुए किसी भी युद्ध के समय और उसके बाद ऐसा करने के बारे में नहीं सोचा लेकिन आतंकवाद के रूप में पाकिस्तान ने भारत के खिलाफ  जो छद्म युद्ध छेड़ रखा है उसका जवाब देने के लिए उसी भाषा में जवाब देना जरूरी है। मु_ी भर कुछ लोगों को छोड़कर देश का जनमत इस मामले में सरकार के साथ खड़ा है। बेहतर हो मौजूदा वातावरण का लाभ लेते हुए भारत, नदी जल रोकने के प्रकल्प पर तत्काल प्रभाव से अमल करे। सीधी उँगली से घी निकालने की प्रत्याशा में कई दशक बीत चुके हैं। देशहित का तकाजा है कि अब उँगली टेढ़ी की जाए। पाकिस्तान ने हर बार युद्ध हारने के बाद शांति कायम करने की कसमें खाईं लेकिन वह अपनी बात से सदैव मुकरता रहा। ऐसे में भारत ही समझौतों को ढोता रहे ये अटपटा लगता है। बेहतर हो मोदी सरकार श्री गड़करी की घोषणा को लागू करने के लिए विपक्षी दलों को भी विश्वास में ले जिससे रायता फैलाने वालों को अवसर नहीं मिल सके। देश में शीघ्र ही लोकसभा चुनाव होने वाले हैं। इसलिए बेहतर यही होगा कि सर्वदलीय सहमति इस विषय पर बन जाये। वैसे भी जब देश का भविष्य और सुरक्षा दांव पर हो तब दलगत नफे-नुकसान को दरकिनार रखना ही बेहतर होता है।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 21 February 2019

गरीबों के मसीहा की अय्याशी : लोकतंत्र बना लूटतंत्र

देश-विदेश की अनेक खबरें ऐसी हैं जिन पर लंबा चौड़ा सम्पादकीय लिखा जा सकता है लेकिन उन सबसे हटकर पटना के एक बंगले को आज के विषय के तौर पर चुना क्योंकि ऐसी बातों पर भी चर्चा होनी चाहिए जो हमारे लोकतंत्र के नव सामन्तों की सोच को अनावृत्त करती है। संदर्भ, बिहार की राजधानी पटना के उस बंगले का है जिसे सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के बाद पूर्व उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव को खाली करना पड़ा। न्यायालय ने उन पर 50 हजार का जुर्माना भी ठोंका है। सत्ता से हटने की बाद तेजस्वी से राज्य सरकार ने उक्त बंगला खाली करने को कहा लेकिन वे अड़ गए। बात देश की सबसे बड़ी अदालत तक जा पहुँची जिसने लालू प्रसाद यादव के इस साहेबजादे को उससे बेदखल कर दिया। उसके बाद वह बंगला वर्तमान उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी को आवंटित कर दिया गया। गत दिवस जब वे उसका मुआयना करने पहुँचे तो उनकी आंखें फटी रह गईं। चौंकिये मत, तेजस्वी उस बंगले की एक कील भी अपने साथ नहीं ले गए। लेकिन श्री मोदी उस बंगले में सात सितारा होटल जैसी सुविधाएं और राजसी शैली के निर्माण को देखकर हतप्रभ रह गए। उन्होंने समाचार जगत के लोगों को गरीबों के मसीहा के लाड़ले बेटे के राजसी रहन-सहन का प्रत्यक्ष दर्शन करवाते हुए कह दिया कि वे इतने आलीशान बंगले में नहीं रह सकेंगे क्योंकि उनका ज्यादातर समय इसके शाही स्वरूप को बनाये रखने में ही चला जायेगा। उन्होंने मुख्यमंत्री नीतिश कुमार से उस बंगले में आकर रहने का अनुरोध करने की बात भी कह डाली। समाचार माध्यमों के प्रतिनिधि जब बंगले के भीतर पहुँचे तब उन्हें समझ आया कि तेजस्वी उसे खाली क्यों नहीं करना चाह रहे थे। ये जानकारी भी आ रही है कि बंगले की शान-शौकत लोगों की निगाह में न आए इसके लिए श्री यादव बहुत सतर्क रहा करते थे। बंगले में प्रवेश भी बिना अनुमति प्रतिबंधित था। कभी-कभार किसी आयोजन के समय उसे बड़े परदों से ढंक दिया जाता था। बताया जाता है नीतीश सरकार में लोक निर्माण विभाग तेजस्वी के पास ही था। यूँ भी इसे सबसे भ्रष्ट महकमों में शुमार किया जाता रहा है। उस दौरान उन्होंने बेरहमी से बंगले की साज-सज्जा पर सरकारी धन लुटाया जिसका विवरण अधिकारिक तौर पर तो नहीं उजागर हुआ किन्तु देखने वालों का अनुमान है कि 25-30 करोड़ की होली तो आसानी से खेली गई। यदि तेजस्वी अपने निजी मकान में इस तरह के शाही इंतजाम करते तब शायद उस पर उँगली उठाने का अधिकार हर किसी को नहीं होता। बसपा सुप्रीमो मायावाती की तरह वे अपने लाखों समर्थकों से जन्मदिवस या अन्य किसी जश्न के जरिये करोड़ों कमाकर राजमहल बनवा लेते तब भी बात कुछ कुछ समझ में आती लेकिन तेजस्वी ने ऐशो आराम के जो भी प्रबंध उक्त बंगले में किये वे सब सरकारी खजाने के बलबूते किये गए। और यदि उसमें निजी धन खर्च हुआ तब एक तो सरकारी बंगले में वैसा करने का औचित्य समझ से परे है और फिर वह भ्रष्टाचार की कमाई ही रही होगी। ऐसा लगता है तेजस्वी ये मानकर बैठे रहे कि वह बंगला उन्हें जीवन भर के लिए मिल गया था। कुछ समय पहले लखनऊ में समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव द्वारा खाली किये गए सरकारी बंगले को लेकर भी काफी हल्ला मचा था लेकिन उसकी मुख्य वजह ये थी कि श्री यादव उसमें से बहुत सारा कीमती सामान न सिर्फ  निकाल ले गए बल्कि उसमें बड़े पैमाने पर इस तरह से तोडफ़ोड़ भी की गई जैसे किसी से शत्रुता निभाई जा रही हो। उल्लेखनीय है अखिलेश को भी सर्वोच्च न्यायालय के फरमान पर ही वहां से  बेदखल किया गया था। सवाल ये है कि लोकतंत्र के इन तथाकथित सेवकों का ये मालिकाना आचरण क्या उस जनादेश का अपमान नहीं है जो गरीबों, बेरोजगारों और किसानों के नाम पर हथियाया जाता है? पाठक ये न समझें कि हमारा निशाना केवल लालू और मुलायम सिंह के बेटे ही हैं। दरअसल ये तो दो उदाहरण मात्र हैं। लेकिन विहंगम दृष्टि डालें तो  देखने में आएगा कि कमोबेश नेता नामक अधिकांश प्राणी जनता के धन को बेरहमी से लुटाने में तनिक भी संकोच नहीं करते। हालांकि अभी भी मानक सरकार, ममता बैनर्जी और ऐसे ही कुछ राजनेता हैं जिनकी सादगी और सरलता प्रभावित करती है लेकिन ऐसे लोगों की संख्या हजारों में एक ही रह गई है। तेजस्वी जिन लालू और राबड़ी देवी के पुत्र हैं वे बिहार ही नहीं बल्कि पूरे देश में अपने आपको गरीबों का हमदर्द बताते नहीं थकते। सत्ता में आने के बाद किसी भी नेता को सुविधाजनक रहन-सहन का अधिकार है। मंत्री से मिलने-जुलने सैकड़ों लोग प्रतिदिन आते हैं। निर्वाचन क्षेत्र के मतदाता और पार्टी कार्यकर्ताओं की आवभगत भी उसे करनी पड़ती है। उस लिहाज से राजधानी में सरकारी बंगले उन्हें दिए जाते हैं। शासकीय कामकाज निपटाने के लिए उसी में एक छोटा सा कार्यालय भी रहता है। सुरक्षाकर्मियों सहित घरेलू कर्मचारियों के लिए भी आउटहाउस की व्यवस्था होती है। लालू जी सरीखे नेता शासकीय आवास में डेरी जैसे उपक्रम भी कर लिया करते हैं। लेकिन तेजस्वी ने जिस शाही अंदाज का परिचय दिया वह न केवल आपत्तिजनक बल्कि निंदनीय भी है। डॉ. लोहिया के ये अनुयायी जिस सामन्ती जीवनशैली का प्रदर्शन करते हैं वह देखकर दुख होता है। मुलायम सिंह यादव के गांव सैफई का भ्रमण कर चुके लोग बताते हैं कि उन्होंने जो निवास बनाया है वह किसी राजप्रासाद से कमतर नहीं है। कल जैसा सुशील मोदी ने बताया उसके मुताबिक तो तेजस्वी द्वारा खाली किये बंगले को प्रधानमंत्री निवास के समकक्ष कहना गलत नहीं होगा। वैसे ये बीमारी सभी पार्टियों के नेताओं को लग गई है। सरकार बदलने पर नए मंत्री बंगले में लाखों रुपये खर्च करवा देते हैं। मनमोहन सरकार के मंत्री शशि थरूर तो बंगले की साज-सज्जा के चलते कई महीने हजारों रु. रोज के पाँच सितारा होटल में मेहमानी करते रहे। और भी उदाहरण हैं जिनमें सरकारी धन पर अय्याशी साफ -साफ  दिखाई देती है। गांधी, लोहिया और दीनदयाल के चेले उनकी जयंती मनाते समय जिस तरह की अच्छी-अच्छी बातें करते हैं अगर उसका दशमांश भी वे अपने आचरण में समाहित कर लें तो पूरे देश की सोच बदल सकती है। वरना लोकतंत्र इसी तरह लूटतंत्र बना रहेगा और गरीबों के मसीहा राजसी जीवन जीते रहेंगे।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 20 February 2019

कश्मीर में श्रीलंका जैसी हिम्मत की जरूरत

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने गत दिवस भारत को धमकाया है कि यदि उसने हमला किया तो करारा जवाब दिया जाएगा। पुलवामा हमले के बाद भारत के आरोपों पर पहले तो इमरान ने सफाई दी कि पाकिस्तान पर बिना प्रमाण आरोप लगाए जाने का कोई औचित्य नहीं है। उसके बाद उन्होंने ये दलील दी कि उनकी सरकार बनने के बाद जिस नए पाकिस्तान की रचना हो रही है वह आतंकवाद को बढ़ावा देने में यकीन नहीं रखता। इमरान ने ये भी कहा कि उनके देश ने बीते एक दशक में आतंकवाद के चलते 50 हजार लोग खोए हैं। इस प्रकार वह खुद भी इसका शिकार है। लेकिन जब उनकी किसी भी दलील पर भारत नहीं पसीजा तब उन्होंने हमले का मुंहतोड़ जवाब देने की डींग हांकी जो उनकी घरेलू राजनीतिक मजबूरी भी है। उधर केंद्र सरकार द्वारा दी गई खुली छूट के बाद सेना ने कश्मीरी जनता को दो टूक कह दिया कि जो बंदूक उठाएगा मारा जायेगा। सेना ने कश्मीरी महिलाओं से अनुरोध किया है कि अपने बच्चों को समझा लें और आत्म समर्पण करने हेतु प्रेरित करें। पुलवामा हमले के सूत्रधार कामरान गाजी के मारे जाने से सेना का मनोबल भी ऊंचा हुआ है। देश के अन्य हिस्सों से भी केंद्र को जिस तरह का समर्थन मिल रहा है उससे भी सरकार और सेना दोनों कड़े कदम उठाने की मानसिकता बना चुके हैं। सबसे अच्छा ये हुआ कि वैश्विक स्तर पर भारत को जबर्दस्त समर्थन और सहानुभूति हासिल हुई। केवल चीन को छोड़कर शेष महाशक्तियों ने पाकिस्तान पर दबाव बढ़ाया है। इजऱायल का भारत के साथ आना तो स्वाभाविक था ही लेकिन फ्रांस ने जिस तरह संरासंघ में पाकिस्तान के विरुद्ध मोर्चा खोला वह बेहद महत्वपूर्ण है। उल्लेखनीय है बीते कुछ सालों से फ्रांस भी इस्लामिक आतंकवाद से बुरी तरह पीडि़त है। जैश ए मोहम्मद के मसूद अजहर को वैश्विक आतंकी घोषित करने के लिए वह विश्व संस्था में बाकायदा प्रस्ताव लाने जा रहा है। हालांकि ऐसा होना आसान नहीं है क्योंकि पाकिस्तान के समर्थन में चीन किसी भी स्तर पर जाने के लिए तैयार बैठा हुआ है लेकिन इतना जरूर हुआ कि भारत की कूटनीतिक चपलता ने पाकिस्तान पर दबाव बढ़ा दिया है। इमरान सबूतों के अभाव में अपनी कितनी भी बेगुनाही बताएं किन्तु जब जैश का कारोबार ही पाकिस्तान से चल रहा है और मसूद रहता भी वहीं है तब किसी प्रमाण की जरूरत ही क्या है? और तो और जब पुलवामा हमले के तुरंत बाद जैश ए मोहम्मद ने उसकी जिम्मेदारी ले ली तब इमरान का मासूम बने रहना बेमतलब है। इमरान पाकिस्तान में आधुनिक सोच और सुधार के प्रतीक माने जाते रहे हैं। भ्रष्टाचार  के खिलाफ  उन्होंने लंबी लड़ाई भी लड़ी जिसकी वजह से नवाज शरीफ और उनका पूरा कुनबा जेल चला गया। लेकिन ये भी सच है कि इमरान को सत्ता जनता से ज्यादा सेना की मदद से मिल सकी और इसलिए वे दावे कितने भी करें किन्तु उनका तथाकथित नया पाकिस्तान भी सेना द्वारा संचालित है। आर्थिक दृष्टि से कंगाली की स्थिति में पहुंचने की वजह से उसकी हालत लगातार खस्ता हो रही है। अमेरिका और उसके समर्थक देशों द्वारा हाथ खींच लेने से जो खैरात पाकिस्तान को मिला करती थी वह अचानक कम हो गई। इमरान के पास चूंकि पूर्ण बहुमत नहीं है इसलिए उन्हें सेना की मदद से सरकार चलानी पड़ रही है। यह वजह है कि वे चाहकर भी भारत के साथ अच्छे रिश्ते बनाने की बात सोच भले ही लें लेकिन उसे लागू नहीं कर सकेंगे। मौजूदा हालात में पाकिस्तान पूरी दुनिया में बदनाम हो चुका है। यहां तक कि अरब जगत के इस्लामी देश तक उससे दूरी बनाकर चल रहे हैं। ऐसी स्थिति में भारत के लिए बेहतर होगा कि वह इस अवसर को हाथ से नहीं जाने दे। सीमा पर भारतीय सेना की हलचल बढऩे से सतर्क पाकिस्तान ने अपने आतंकी अड्डे पीछे सरका लिए हैं। यद्यपि युद्ध की सम्भावनाएँ बहुत ज्यादा नहीं है और पाकिस्तान भी कारगिल सरीखी कोई हरकत करने की स्थिति में नहीं है इसलिए उसकी तरफ  से आक्रामक सैन्य गतिविधि की आशंका तो कम है किंतु जैसा गत दिवस सेना के कुछ वरिष्ठ अधिकारियों ने कहा उसके मुताबिक कश्मीर घाटी के भीतर अलगाववादी सोच और उसके संरक्षण में पलने वाले आतंकवाद के विरुद्ध निर्णायक लड़ाई छेड़ देनी चाहिए। बंदूक उठाने वाले को मौत की चेतावनी को हकीकत में बदलना ही वक्त का तकाजा है। इस संबंध में भारत को श्रीलंका से सीखना चाहिए जिसने लिट्टे नामक आतंकवादी संगठन के सफाये के लिए सेना को खुला हाथ देते हुए न तो मानवधिकारों की चिंता की और न ही विश्व जनमत की। तत्कालीन राजपक्षे सरकार के उस ऑपरेशन की खास बात ये रही कि लिट्टे प्रमुख प्रभाकरण के मारे जाने के बाद उसके नाबालिग बेटे को जीवित गिररफ्तार किये जाने की बाद भी इस कारण मार दिया जिससे कि लिट्टे का कोई नया संस्करण जन्म न ले सके। हाल ही में चीन ने भी अपने एक मुस्लिम बहुल प्रांत में मुसलमानों के बीच बढ़ती धार्मिक कट्टरता के विरुद्ध बेहद कड़ा रवैया अपनाते हुए उनके धार्मिक रीति-रिवाजों पर प्रतिबंध लगा दिया। यदि भारत सरकार वाकई कश्मीर में अलगाववाद की कमर तोडऩा चाहती है तो उसे श्रीलंका और चीन के उदाहरण से प्रेरणा लेकर दबावमुक्त होकर काम करना चाहिए। इस काम के लिए इससे अनुकूल समय नहीं मिलेगा क्योंकि कश्मीर मसले का बातचीत से हल निकालने के पक्षधर लोगों की बोलती इस समय बंद है। देश का जनमत राजनीतिक प्रतिबद्धता से ऊपर उठकर कश्मीर में आर-पार की लड़ाई का इच्छुक है। सेना भी हौसले से भरपूर है। बीते दो साल में घाटी के भीतर सैन्य बलों ने शानदार काम किया लेकिन उसके हाथ कई मामलों में बंधे होने से वह चाहकर भी बहुत कुछ नहीं कर सकी। पुलवामा में 40 फौजियों की मौत ने उसके हाथ बंधनमुक्त कर दिए हैं। सरकार और देश सेना के पीछे है और विश्व जनमत भी पक्ष में है। ये अवसर यदि गंवा दिया गया तब कश्मीर में भारत विरोधी भावनाएं और सिर उठाएंगी। जरूरत है भारत एक मजबूर देश की बजाय इजरायल की तरह एक मजबूत राष्ट्र जैसे अपने को पेश करे।

-रवीन्द्र वाजपेयी