Wednesday, 24 April 2019

मोदी लाओ या हटाओ में समा गए सारे मुद्दे

कल तीसरे चरण के मतदान के साथ ही 302 लोकसभा सीटों का चुनाव संपन्न हो गया। हर चरण में देश के विभिन्न हिस्सों में मतदान होने की वजह से राजनीतिक विश्लेषक अभी तक ये अनुमान लगाने में विफल रहे हैं कि ऊँट किस करवट बैठेगा ? कांग्रेस के बहुमत में आने की उम्मीद तो उसी के नेता छोड़ चुके हैं लेकिन भाजपा क्या 2014 के प्रदर्शन को दोहरा सकेगी इसे लेकर भी संदेह व्यक्त किये जा रहे हैं। शरद पवार जैसे अनुभवी नेता तक ये कह चुके हैं कि भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरेगी और उस सूरत में जाहिर है कि सत्ताधारी एनडीए ही सबसे बड़ा गठबंधन होगा लेकिन बहुमत से दूर होने पर उसका साथ कौन देगा इसे लेकर भी अनिश्चितता है। अनेक राजनीतिक पंडित त्रिशंकु लोकसभा की आशंका व्यक्त करने में लग गए हैं। हालांकि एक वर्ग का अभी भी ये मानना है कि राहुल गांधी को लेकर आम मतदाता में व्याप्त अरुचि का लाभ सीधे नरेंद्र मोदी को मिल रहा है और भाजपा के उम्मीदवारों से असंतुष्ट या नाराज लोग भी फिर एक बार मोदी सरकार के नारे से प्रभावित नजर आ रहे हैं। एक बात ये भी है कि क्षेत्रीय पार्टियां इस चुनाव में अपने लिए सुनहरा अवसर देख रही हैं। उन्हें लग रहा है कि1996 की तरह से एक बार फिर दिल्ली में अस्थिरता उत्पन्न होने जा रही है जिसकी वजह से उनके भाव बढ़ जायेंगे। द्रमुक, अद्रमुक, टीआरएस, तेलुगु देशम, वाईएसआर कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, बसपा और लालू की राजद जैसी पार्टियां ये मान बैठी हैं कि यदि नरेंद्र मोदी का करिश्मा नहीं चला  तब उस स्थिति में चिल्लर की तरह उनकी पूछ-परख भी बढ़ जायेगी और सत्ता की मलाई में उनकी भी हिस्सेदारी बढ़ेगी। ऐसी ही सोच एनडीए में भी देखी जा रही है जहां शिवसेना और अकाली दल जैसे सहयोगी सोच रहे हैं कि अगर भाजपा स्पष्ट बहुमत से दूर रह गई तब उसे उनकी कहीं ज्यादा जरूरत पड़ेगी। बीते पांच साल में राजनीतिक जगत में ये स्थापित हो गया है कि श्री मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह विशुद्ध दादागिरी दिखाते रहे। न सिर्फ सहयोगी दलों बल्कि भाजपा के भीतर भी इन दोनों ने अन्य नेताओं की हैसियत दो कौड़ी की बनाकर रख दी। इस वजह से सहयोगी दल मानकर चल रहे हैं कि त्रिशंकु की स्थिति में भी यदि मोदी सरकार वापिस लौटी तब उनकी बल्ले-बल्ले होकर रहेगी। मनपसन्द विभाग के साथ ज्यादा मंत्री पद मिल जायेंगे। विपक्ष में भी कुछ छोटी-छोटी पार्टियां ऐसी हैं जिनके दो-चार सांसद ही अधिकतम जीत सकेंगे किन्तु किसी को बहुमत नहीं मिला तब उनकी भी पौ-बारह होना तय है। सपा के नए सुप्रीमो अखिलेश यादव चुनाव शुरू होने के पहले तक कहते रहे कि अगला प्रधानमंत्री कौन होगा ये उप्र ही निश्चित करेगा लेकिन गत दिवस वे यहां तक कह गए कि उसका निर्णय उनके हाथ में होगा। यद्यपि मायावती को इस पद का दावेदार माने जाने के सवाल का कोई जवाब उन्होंने नहीं  दिया। सही बात ये है कि भारतीय राजनीति इस समय तालाब खुदा नहीं और मगर कूदने लगे वाली स्थिति से गुजर रही है। भाजपा का मानना है कि विपक्ष सहित वामपंथी खेमे के पत्रकार और विश्लेषक उसको बहुमत नहीं  मिलने का जितना प्रचार कर रहे हैं उतनी ही उसकी स्थिति मजबूत होती जा रही है क्योंकि देश का आम मतदाता विशेष रूप से पहली और दूसरी बार मतदान करने वाले युवा किसी भी स्थिति में देश को अस्थिरता की आग में  झोंकने का समर्थन नहीं करेंगे। राहुल गांधी को बतौर प्रधानमन्त्री प्रस्तुत नहीं करने से कांग्रेस के आत्मविश्वास में कमी पहले ही बाहर चुकी है। यही वजह है कि तीन चरण के मतदान के बाद तक विपक्ष अपनी संभावनाओं को लेकर आश्वस्त नहीं है। लेकिन भाजपा भी भीतर ही भीतर किसी अनिष्ट की आशंका से ग्रसित है। उसके मन में 2004 के इण्डिया शाइनिंग के फुस्स होने की कड़वी यादों का खौफ अभी भी ताजा है। उस चुनाव में स्व. अटलबिहारी वाजपेयी की सरकार की वापिसी को लेकर पूरे देश में उम्मीद की लहरें उठ रही थीं जो अंतत: विनाशकारी साबित हुई। यद्यपि ये भी सही है कि श्री वाजपेयी की उम्र और स्वास्थ्य दोनों उनका साथ नहीं दे रहे थे और पूरी पार्टी प्रमोद महाजन के शिकंजे में फंसी हुई थी। उस दृष्टि से नरेंद्र मोदी ज्यादा ताकतवर हैं और सरकार तथा पार्टी संगठन दोनों पर उनकी जबर्दस्त पकड़ है। हालांकि कुछ मामलों में ये कमजोरी भी नजर आती है। दूसरी तरफ  इसे ही भाजपा की ताकत माना जा रहा है क्योंकि वाजपेयी युग की समाप्ति के बाद के दौर में कोई दूसरा नेता जनता के सामने चहरे के तौर पर नहीं उभर सका। जिसका प्रमाण 2009 के लोकसभा चुनाव में मिला जब लालकृष्ण आडवाणी को प्रधानमन्त्री पद के दावेदार के तौर पर पेश करने के बावजूद भाजपा को जबरदस्त पराजय झेलनी पड़ी थी। नरेंद्र मोदी ने उस शून्य को जिस कुशलता से भरा उसी की वजह से वे अटल जी के बाद देश के सबसे लोकप्रिय नेता बनकर उभरे और भाजपा का विस्तार भी उन क्षेत्रों तक करने में सफल हुए जहां उसका कोई नामलेवा तक नहीं था। यही  वजह है कि राहुल गांधी चाहे कुछ भी कहें किन्तु इस चुनाव का पूरा केंद्र श्री मोदी बन गये हैं। विपक्ष ने भी इसमें खासा योगदान दिया है। तीसरे चरण का मतदान आते तक चुनाव के सभी मुद्दे मोदी लाओ या मोदी हटाओ में आकर समाहित हो गए। इसका लाभ किसे होगा ये दावे के साथ कोई नहीं कह पा रहा तो उसकी असली वजह मतदाता की खामोशी है। मतदान में 2014 की अपेक्षा थोड़ी सी कमी से भी अनुमान लगाने वाले संशय में हैं।

-रवीन्द्र वाजपेयी

काँग्रेस : बीच लड़ाई में मनोबल गिराने वाली बातें

मप्र के मुख्यमंत्री कमलनाथ के राजनीतिक चातुर्य पर कोई भी संदेह नहीं कर सकता। लम्बे संसदीय जीवन के साथ ही बतौर केन्द्रीय मंत्री उनकी कार्यकुशलता का विरोधी भी लोहा मानते हैं। कांग्रेस के वरिष्ठतम नेताओं में उनकी गिनती होती है। प्रदेश के एक और पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के विपरीत श्री नाथ कभी भी विवादग्रस्त बयान नहीं देते। ऐसे में विगत दिवस उनके एक बयान ने सियासी क्षेत्रों में हलचल मचा दी कि मौजूदा लोकसभा चुनाव में अच्छा प्रदर्शन करने के बावजूद कांग्रेस को बहुमत नहीं मिलेगा और चुनाव बाद गठबन्धन की स्थिति बनेगी। हालांकि वे ये भी कह गए कि भाजपा भी बहुमत की सीमा रेखा नहीं छू सकेगी तथा एनडीए के बाहर के गैर कांग्रेसी दल उसे समर्थन नहीं देंगे। कमलनाथ के कहने का आशय ये था कि नरेंद्र मोदी सरकार नहीं बना पायेंगे। लेकिन उनका ये कहना कि कांग्रेस को बहुमत नहीं मिलेगा भले ही सत्य को स्वीकार करना हो लेकिन बीच लड़ाई में जब सेनापति स्तर का कोई व्यक्ति ही अपने पक्ष की सफलता में संदेह व्यक्त करे तब विरोधी पक्ष का मनोबल और बढ़़ता है। उल्लेखनीय है राकांपा के अध्यक्ष शरद पवार भी कुछ दिन पूर्व एक समाचार चैनल को दिए  साक्षात्कार में स्वीकार कर चुके हैं कि नरेंद्र मोदी का बहुमत नहीं आ रहा और कांग्रेस की सदस्य संख्या  100 से उपर चली जायेगी लेकिन राहुल के प्रधानमंत्री बनने की सम्भावना को वे पूरी तरह नकार गये। श्री पवार कांग्रेस के सबसे बड़े गठबंधन सहयोगी हैं और एक जमाने में प्रधानमंत्री पद के प्रबल दावेदार रहे हैं। उनके अलावा कांग्रेस के कुछ और नेतागण भी  बातचीत के दौरान सार्वजानिक तौर पर श्री मोदी के बहुमत से पिछडऩे की आशंका जताने के बाद भी कांग्रेस के बहुमत और राहुल के प्रधानमंत्री बनने के प्रति जरा भी आश्वस्त नहीं हैं। इसकी एक झलक भाजपा छोड़ ताजे-ताजे कांग्रेसी बने शत्रुघ्न सिन्हा के लखनऊ में दिए गये  उस बयान से मिली जिसमें उन्होंने कांग्रेस को बहुमत नहीं मिलने की बात तो नहीं कही लेकिन प्रधानमंत्री बनने के लिए राहुल गांधी की बजाय अखिलेश यादव और यहाँ तक कि मायावती को उपयुक्त बताते हुए सपा-बसपा गठबंधन की तारीफ में भी कसीदे पढ़ डाले। सर्वविदित है कि शत्रु की पत्नी लखनऊ से राजनाथ सिंह के विरुद्ध सपा उम्मीदवार हैं। इन सब बयानों से एक निष्कर्ष तो निकलता ही है कि एनडीए भले ही बहुमत के जादुई आंकड़े को न छू सके  सके लेकिन कांग्रेस तो उसके पास तक नहीं फटक सकेगी। और इस आधार पर राहुल के प्रधानमंत्री बनने की सम्भावनाएं क्षीण से क्षीणतर रहेंगी और यही इस चुनाव की वह पहेली है जिसे बूझने में बड़े-बड़े राजनीतिक पंडितों को पसीना आ रहा है। हालाँकि कांग्रेस काफी सीटों पर चुनाव लड़ रही है लेकिन उप्र और बिहार में वह मुख्य प्रतिद्वंदी नहीं बन सकने की वजह से बहुमत की दौड़ से मुकाबला शुरू होने के पहले ही बाहर नजर आने लगी। ऊपर से शरद पवार, कमलनाथ और शत्रुघ्न सिन्हा जैसे लोगों के बयानों के अलावा भाजपा विरोधी अन्य क्षेत्रीय दलों की तरफ से राहुल और कांग्रेस दोनों को लेकर आने वाले बयान रही सही कसर पूरी कर देते हैं। क्षेत्रीय दलों में अपनी दम पर सबसे ताकतवर मामता बैनर्जी तो राहुल को बच्चा तक कहकर उनका उपहास कर चुकी हैं। वहीं उप्र में अखिलेश यादव और मायावती कांग्रेस की खुलकर आलोचना करने के साथ ही राहुल को किसी भी तरह का भाव नहीं दे रहे। इन सबका ही परिणाम है कि महीनों पहले से मोदी सरकार के विरुद्ध मोर्चा खोलकर बैठे कांग्रेस अध्यक्ष अभी तक प्रधानमंत्री पद के लिए विपक्ष तो क्या अपनी पार्टी के भीतर ही भरोसा स्थापित नहीं कर पाए। राजनीति के विश्लेषक ये मानकर चल रहे हैं कि ऐसी ही स्थिति 1971 में थी जब विपक्ष ने इंदिरा गांधी को घेरने के लिये आसमान सिर पर उठा लिया था लेकिन उसके पास न तो कोई साझा रणनीति थी और न ही कोई सर्वमान्य चेहरा। जिसकी वजह से इंदिरा जी को प्रचंड बहुमत हासिल हो गया था। इसमें कोई दो मत नहीं हो सकते कि यदि कांग्रेस समूचे विपक्ष को गोलबंद करते हुए साझा मोर्चा बनाने में सफल हो जाती तब आज भाजपा के माथे पर बूंदों की जगह पसीने की धार बह रही होती। शरद पवार और उनके बाद कमलनाथ जैसे जिम्मेदार नेता के बयानों से कांग्रेस की मारक क्षमता के कमजोर होने की बात सहज रूप से सामने आ गई है। मतदान के तीसरे चरण के पहले मप्र के मुख्यमंत्री का बयान किस रणनीति का हिस्सा है ये तो वे ही बेहतर बता सकेंगे लेकिन कांग्रेस अध्यक्ष के मप्र दौरे के एक दिन पहले दिया उनका बयान कई रहस्यों को जन्म देने वाला है।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 23 April 2019

काँग्रेस : बीच लड़ाई में मनोबल गिराने वाली बातें

मप्र के मुख्यमंत्री कमलनाथ के राजनीतिक चातुर्य पर कोई भी संदेह नहीं कर सकता। लम्बे संसदीय जीवन के साथ ही बतौर केन्द्रीय मंत्री उनकी कार्यकुशलता का विरोधी भी लोहा मानते हैं। कांग्रेस के वरिष्ठतम नेताओं में उनकी गिनती होती है। प्रदेश के एक और पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के विपरीत श्री नाथ कभी भी विवादग्रस्त बयान नहीं देते। ऐसे में विगत दिवस उनके एक बयान ने सियासी क्षेत्रों में हलचल मचा दी कि मौजूदा लोकसभा चुनाव में अच्छा प्रदर्शन करने के बावजूद कांग्रेस को बहुमत नहीं मिलेगा और चुनाव बाद गठबन्धन की स्थिति बनेगी। हालांकि वे ये भी कह गए कि भाजपा भी बहुमत की सीमा रेखा नहीं छू सकेगी तथा एनडीए के बाहर के गैर कांग्रेसी दल उसे समर्थन नहीं देंगे। कमलनाथ के कहने का आशय ये था कि नरेंद्र मोदी सरकार नहीं बना पायेंगे। लेकिन उनका ये कहना कि कांग्रेस को बहुमत नहीं मिलेगा भले ही सत्य को स्वीकार करना हो लेकिन बीच लड़ाई में जब सेनापति स्तर का कोई व्यक्ति ही अपने पक्ष की सफलता में संदेह व्यक्त करे तब विरोधी पक्ष का मनोबल और बढ़़ता है। उल्लेखनीय है राकांपा के अध्यक्ष शरद पवार भी कुछ दिन पूर्व एक समाचार चैनल को दिए  साक्षात्कार में स्वीकार कर चुके हैं कि नरेंद्र मोदी का बहुमत नहीं आ रहा और कांग्रेस की सदस्य संख्या  100 से उपर चली जायेगी लेकिन राहुल के प्रधानमंत्री बनने की सम्भावना को वे पूरी तरह नकार गये। श्री पवार कांग्रेस के सबसे बड़े गठबंधन सहयोगी हैं और एक जमाने में प्रधानमंत्री पद के प्रबल दावेदार रहे हैं। उनके अलावा कांग्रेस के कुछ और नेतागण भी  बातचीत के दौरान सार्वजानिक तौर पर श्री मोदी के बहुमत से पिछडऩे की आशंका जताने के बाद भी कांग्रेस के बहुमत और राहुल के प्रधानमंत्री बनने के प्रति जरा भी आश्वस्त नहीं हैं। इसकी एक झलक भाजपा छोड़ ताजे-ताजे कांग्रेसी बने शत्रुघ्न सिन्हा के लखनऊ में दिए गये  उस बयान से मिली जिसमें उन्होंने कांग्रेस को बहुमत नहीं मिलने की बात तो नहीं कही लेकिन प्रधानमंत्री बनने के लिए राहुल गांधी की बजाय अखिलेश यादव और यहाँ तक कि मायावती को उपयुक्त बताते हुए सपा-बसपा गठबंधन की तारीफ में भी कसीदे पढ़ डाले। सर्वविदित है कि शत्रु की पत्नी लखनऊ से राजनाथ सिंह के विरुद्ध सपा उम्मीदवार हैं। इन सब बयानों से एक निष्कर्ष तो निकलता ही है कि एनडीए भले ही बहुमत के जादुई आंकड़े को न छू सके  सके लेकिन कांग्रेस तो उसके पास तक नहीं फटक सकेगी। और इस आधार पर राहुल के प्रधानमंत्री बनने की सम्भावनाएं क्षीण से क्षीणतर रहेंगी और यही इस चुनाव की वह पहेली है जिसे बूझने में बड़े-बड़े राजनीतिक पंडितों को पसीना आ रहा है। हालाँकि कांग्रेस काफी सीटों पर चुनाव लड़ रही है लेकिन उप्र और बिहार में वह मुख्य प्रतिद्वंदी नहीं बन सकने की वजह से बहुमत की दौड़ से मुकाबला शुरू होने के पहले ही बाहर नजर आने लगी। ऊपर से शरद पवार, कमलनाथ और शत्रुघ्न सिन्हा जैसे लोगों के बयानों के अलावा भाजपा विरोधी अन्य क्षेत्रीय दलों की तरफ से राहुल और कांग्रेस दोनों को लेकर आने वाले बयान रही सही कसर पूरी कर देते हैं। क्षेत्रीय दलों में अपनी दम पर सबसे ताकतवर मामता बैनर्जी तो राहुल को बच्चा तक कहकर उनका उपहास कर चुकी हैं। वहीं उप्र में अखिलेश यादव और मायावती कांग्रेस की खुलकर आलोचना करने के साथ ही राहुल को किसी भी तरह का भाव नहीं दे रहे। इन सबका ही परिणाम है कि महीनों पहले से मोदी सरकार के विरुद्ध मोर्चा खोलकर बैठे कांग्रेस अध्यक्ष अभी तक प्रधानमंत्री पद के लिए विपक्ष तो क्या अपनी पार्टी के भीतर ही भरोसा स्थापित नहीं कर पाए। राजनीति के विश्लेषक ये मानकर चल रहे हैं कि ऐसी ही स्थिति 1971 में थी जब विपक्ष ने इंदिरा गांधी को घेरने के लिये आसमान सिर पर उठा लिया था लेकिन उसके पास न तो कोई साझा रणनीति थी और न ही कोई सर्वमान्य चेहरा। जिसकी वजह से इंदिरा जी को प्रचंड बहुमत हासिल हो गया था। इसमें कोई दो मत नहीं हो सकते कि यदि कांग्रेस समूचे विपक्ष को गोलबंद करते हुए साझा मोर्चा बनाने में सफल हो जाती तब आज भाजपा के माथे पर बूंदों की जगह पसीने की धार बह रही होती। शरद पवार और उनके बाद कमलनाथ जैसे जिम्मेदार नेता के बयानों से कांग्रेस की मारक क्षमता के कमजोर होने की बात सहज रूप से सामने आ गई है। मतदान के तीसरे चरण के पहले मप्र के मुख्यमंत्री का बयान किस रणनीति का हिस्सा है ये तो वे ही बेहतर बता सकेंगे लेकिन कांग्रेस अध्यक्ष के मप्र दौरे के एक दिन पहले दिया उनका बयान कई रहस्यों को जन्म देने वाला है।

-रवीन्द्र वाजपेयी

बलि के बकरे तलाशने से काम नहीं चलेगा

मप्र की सरकार आजकल बिजली विभाग के अधिकारियों और कर्मचारियों के पीछे पड़ी हुई है। बड़ी संख्या में उनका निलम्बन किया जा रहा है। इसकी वजह किसी प्रकार का भ्रष्टाचार नहीं अपितु बिजली आपूर्ति में आ रहा व्यवधान है। राज्य की नई सरकार को संदेह है कि विद्युत आपूर्ति की स्थिति को बिगाडऩे के पीछे राजनीतिक षडय़ंत्र है जिसका उद्देश्य लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की छवि खराब करना है। ये भी कहा  जा रहा है कि भाजपा से जुड़े अधिकारी और कर्मचारी जानबूझकर बिजली की आपूर्ति को बाधित कर भाजपा को ये प्रचार करने का अवसर दे रहे हैं कि कांग्रेस की सरकार लौटते ही दिग्विजय सिंह के जमाने का अंधेरा दौर वापिस आ गया है। स्मरणीय है 2003 के विधानसभा चुनाव में दिग्विजय सरकार का सूपड़ा साफ होने के पीछे बिजली भी बहुत बड़ा मुद्दा रहा। ये भी सच है कि पिछली सरकार ने जैसे भी किया हो लेकिन प्रदेश के गाँव-गाँव तक बिजली पहुँचाने में सफलता प्राप्त की थी। कमलनाथ सरकार के आते ही ज्योंही बिजली जाने-आने का झंझट शुरू हुआ त्योंही आम जनता में नई सरकार के प्रति असंतोष फैलने लगा। यदि लोकसभा चुनाव नहीं आये होते तब शायद बिजली महकमे पर इतनी जल्दी निगाहें टेढ़ी नहीं हुई होती लेकिन सिर मुंड़ाते ही ओले पडऩे जैसी स्थिति की वजह से कमलनाथ सरकार ने चाबुक चलाना शुरू तो कर दिया लेकिन उसे ये बात समझनी होगी कि सौ-दो सौ लोगों को निलम्बित करने मात्र से उसकी छवि नहीं सुधरने वाली। बिजली विभाग में भ्रष्टाचार और कामचोरी कम नहीं है लेकिन इसके लिए केवल कर्मचारी और अधिकारी ही नहीं बल्कि राजसत्ता भी जिम्मेदार है। प्रदेश में बिजली की कमी नहीं होने के बाद भी यदि उसकी किल्लत है तब ये,माना जा सकता है कि बिजली विभाग के मंत्री और उनके निकट सलाहकार भी बराबर के दोषी हैं। यदि भाजपा समर्थक मानकर इस तरह कर्मचारियों को प्रताडि़त किया जायेगा तो कल को अन्य विभागों में भी सरकार को ऐसी ही आशंका परेशान करती रहेगी। बेहतर हो राज्य सरकार बलि के बकरे तलाशने की बजाय अपनी प्रशासनिक शैली  पर ध्यान दे। उसे ये याद रखना चाहिये कि नौकरशाही वह घोड़ा है जो सवार की कुशलता और क्षमता के अनुसार दौड़ता है।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 22 April 2019

गोगोई : नैतिकता के मापदंड सबके लिए समान

गत वर्ष सर्वोच्च न्यायालय के जिन चार न्यायाधीशों ने तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा के विरोध में पत्रकार वार्ता बुलाकर मोर्चा खोला था उसकी अगुआई कर रहे उनके उत्तराधिकारी रंजन गोगोई पर उनकी एक महिला सहयोगी द्वारा यौन शोषण का आरोप लगाये जाने के बाद न्यायपालिका के सर्वोच्च स्तर पर तो खलबली मच गई लेकिन राजनीतिक जगत में जिस तरह की चुप्पी नजर आई वह आश्चर्यजनक है। स्मरणीय है श्री मिश्र के विरुद्ध तो महाभियोग लाने तक की बातें हुईं और कांग्रेस सहित पूरी वामपंथी लॉबी ने आसमान सिर पर उठाते हुए ऐसा एहसास करवाया मानों श्री मिश्रा भाजपा की तरफदारी करने लगे हों। उस विवाद के चलते चूँकि केंद्र सरकार पर भी न्यायपालिका में हस्तक्षेप के काफी आरोप लगे थे इसलिए ये आशंका व्यक्त की जा रही थी कि मोदी सरकार श्री गोगोई की वरिष्ठता को नजरअंदाज करते हुए किसी अन्य न्यायाधीश को मुख्य न्यायाधीश बनायेगी। अतीत में ऐसा हो भी चुका था। लेकिन वह आशंका निर्मूल साबित हुई। श्री गोगोई के सामने राम मन्दिर और जम्मू कश्मीर की  चर्चित धारा 35 ए जैसे तमाम ऐसे चर्चित प्रकरणों पर त्वरित निर्णय करने का दबाव था जिनसे देश की राजनीति काफी गहराई तक प्रभावित होने वाली है। राम मन्दिर मसले पर तो दैनिक सुनवाई की तारीख भी तय कर दी गयी लेकिन उसे किसी न किसी वजह से टाला जाता रहा जिससे श्री गोगोई पर तरह-तरह के आरोप भी लगे। जब वह मामला मध्यस्थों को सौंपा गया तब भी विरोध के स्वर उठे । ये भी कहा गया कि वे कांग्रेस नेता और वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल की उस दलील के मुताबिक इस मामले को लम्बा खींचा जा रहा  हैं जिसमें लोकसभा  चुनाव के पहले मन्दिर-मस्जिद विवाद पर कोई फैसला नहीं करने के लिये कहा गया था। और भी कई ऐसे मामले हुए जिनमें सर्वोच्च न्यायालय की मंथर गति से श्री गोगोई के भाजपा विरोधी होने की बात हवा में तैरने लगी। बीते शनिवार को जब उन पर यौन शोषण  का आरोप लगा तब ये उम्मीद की जा रही थी कि उनके समर्थन में वामपंथी और कांग्रेसी आगे आयेंगे लेकिन आश्चर्यजनक रूप से वैसा नहीं हुआ और उस पर भी श्री गोगोई का ये बयान नए संदेहों को जन्म दे गया कि न्यायपालिका की आवाज को दबाने का प्रयास हो रहा है।  लगे हाथ वे ये कहने से भी नहीं चूके कि  आगामी दिनों में उन्हें राफेल और राहुल सहित अनेक ज्वलंत प्रकरणों की सुनवाई करनी है जो वे करेंगे। जिस महिला ने उन पर आरोप लगाए उसके बारे में मिली जानकारी सही है तब ये कहा जा सकता है कि आरोप दुर्भावनापूर्ण  होने के साथ ही किसी षडय़ंत्र का हिस्सा हैं। बार काउन्सिल द्वारा मुख्य न्यायाधीश के पक्ष में आकर खड़े हो जाने के बाद केन्द्रीय वित्त मंत्री और वरिष्ठ अधिवक्ता अरुण जेटली ने भी खुलकर न सिर्फ श्री गोगोई का बचाव किया अपितु मुख्य न्ययाधीश नामक संस्था को कमजोर करने जैसे आरोप भी लगाये किन्तु ये प्रकरण उतना सरल भी नहीं है जितना समझा जा रहा है। श्री जेटली का मुख्य न्यायाधीश के समर्थन में आना और कांग्रेस तथा वामपंथियों का मौन किसी रहस्यमय घटनाक्रम की तरफ इशारा कर रहा है । उधर एक वकील ने दावा किया है  आरोप लगाने वाली महिला के रिश्तेदार ने उनसे उसकी तरफ से पैरवी  करने के लिए डेड़ करोड़ देने तक का प्रस्ताव दिया है। श्री जेटली ने भी इसे रहस्यपूर्ण बताते हुए कहा कि ये न्यायाधीशों पर दबाव बनाने और उन्हें सुनवाई से रोकने का कुचक्र है । लेकिन इस सबसे हटकर देखने वाली बात ये है कि वे कौन सी ताकतें या लोग हैं जो श्री गोगोई को घेरकर उन्हें महत्वपूर्ण प्रकरणों की सुनवाई से दूर रखना चाहते हैं जिससे उनका निपटारा नहीं हो सके। वित्त मंत्री जैसी बातें ही मुख्य न्यायाधीश ने भी कही हैं। ऐसे में महज आरोप लगाने वाली महिला के संदिग्ध चरित्र को उजागर करने से ये आग ठंडी नहीं होगी। इसे चुनाव का मुद्दा बेशक नहीं बनाया जावे लेकिन न्याय की सर्वोच्च आसंदी पर विराजमान व्यक्ति के चरित्र पर उंगली उठने के बाद नैतिकता के और भी तकाजे अपेक्षित होते हैं। यदि ये मामला किसी अन्य न्यायाधीश अथवा शासकीय अधिकारी और उससे भी बढ़कर नेता के विरुद्ध होता तब भी क्या उसे इतनी ही आसानी से लिया जाता? सवाल और भी हैं जिनके घेरे में श्री गोगोई आये बिना नहीं रहेंगे। दीपक मिश्रा पर आरोप लगते समय उन्होंने और उनके साथी न्यायाधीशों ने जिस नैतिकता की अपेक्षा उनसे की थी वैसी ही श्री गोगोई से भी अपेक्षित है क्योंकि यहाँ प्रश्न किसी व्यक्ति का नहीं अपितु न्यायपालिका की सर्वोच्च पीठ पर विराजमान सर्वोच्च व्यक्ति के चरित्र का है। न्यायशास्त्र के अनुसार जिस तरह आरोप सिद्ध होने तक किसी को गुनहगार नहीं माना जा सकता उसी तरह ये भी सही है कि अपने ऊपर लगे आरोप की सफाई देने मात्र से कोई व्यक्ति निर्दोष साबित नहीं हो सकता, फिर चाहे वह देश का मुख्य न्यायाधीश ही क्यों न हो।

-रवीन्द्र वाजपेयी