Monday, 27 May 2019

कांग्रेस को परिवार की बजाय विचार आधारित बनना चाहिए

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को अब अनुभवहीन कहना गलत होगा। लोकसभा में तीन कार्यकाल वे पूरे कर चुके हैं। बतौर पार्टी उपाध्यक्ष भी वे वस्तुत: अध्यक्ष का कार्यभार ही सम्भाल रहे थे। सोनिया गांधी ने बिगड़ते स्वास्थ्य और बढ़ती आयु की वजह से उन्हें अध्यक्ष का पदभार भी सौंप दिया था। जिसे सभी कांग्रेसजनों ने बिना किसी एतराज के स्वीकार कर लिया। उसके बाद अनेक राज्यों के चुनाव हुए जिनमें कांग्रेस को मिली-जुली सफलता मिली। उस वजह से ये कहा जाने लगा कि श्री गांधी में परिपक्वता और क्षमता दोनों आ गए हैं। विशेष रूप से गुजरात में भाजपा को कड़ी टक्कर देने और कर्नाटक में उसको सबसे बड़ी पार्टी होने पर भी सरकार बनाने से रोकने के बाद ये माना जाने लगा कि वे नरेंद्र मोदी के विकल्प बन सकते हैं। कम से कम विपक्ष के अन्य किसी भी युवा अथवा वरिष्ठ नेता की अपेक्षा राहुल को जानने और चाहने वाले अपेक्षाकृत अधिक होते जा रहे थे। बीते वर्ष दिसम्बर में मप्र, छत्तीसगढ़ और राजस्थान के विधानसभा चुनाव में भाजपा से सत्ता छीनकर कांग्रेस ने जो कारनामा किया उसने श्री गांधी की लोकप्रियता को और बढ़ा दिया। उसके बाद वे जिस तरह से आक्रामक हुए उससे ये एहसास भी होने लगा कि 2019 के लोकसभा चुनाव में श्री मोदी के लिए कठिन चुनौती खड़ी कर देंगे। ज्यों-ज्यों चुनाव करीब आते गए त्यों-त्यों श्री गांधी प्रधानमंत्री के प्रति और कठोर होते गए। जिस अंदाज में वे श्री मोदी को बहस के लिए उकसाते हुए चौकीदार चोर का नारा लगाते रहे उससे उनके आत्मविश्वास की झलक मिलती थी। आखिरी चरण के मतदान के उपरांत तो श्री गांधी ने खुले आम मोदी सरकार की विदाई की भविष्यवाणी कर डाली। यद्यपि कांग्रेस के बहुमत की बात उन्होंनें कभी नहीं कही किन्तु उसके समर्थन से एक मिली जुली सरकार बनाने का दावा वे पूरी जोरदारी से करते रहे। लेकिन 23 मई की दोपहर आते-आते तक उनकी उम्मीदें धूल में मिल चुकी थीं। कांग्रेस के 100 सीटों तक पहुंचने के अनुमान भी ध्वस्त हो गए। बमुश्किल वह 50 की संख्या पार कर सकी किन्तु मान्यता प्राप्त विपक्षी दल बनने की उसकी इच्छा अधूरी रह गई। सबसे ज्यादा शर्मनाक तो ये हुआ कि राहुल अपनी पुश्तैनी सीट अमेठी ही हार गए। बड़ी संख्या में ऐसे राज्य हैं जहां कांग्रेस का खाता तक नहीं खुला। उसके साथ जुड़े सहयोगी दलों में सिर्फ  द्रमुक ही तमिलनाडु में शानदार प्रदर्शन कर सकी। तेलुगु देशम तो पूरी तरह से फुस्स हो गई। पंजाब छोड़कर कांग्रेस कहीं भी मुंह दिखाने लायक नहीं बची। इस शर्मनाक पराजय के बाद श्री गांधी की जो छवि में जो इजाफा हुआ था वह काफूर हो गया। वे एक निरीह और लाचार सेनापति के तौर पर देखे जाने लगे। जो राजनीतिक विश्लेषक उन्हें श्री मोदी का विकल्प मान बैठे थे वे ही कहने लगे कि उन दोनों के बीच कोई बराबरी ही नहीं थी। और यही वह सच है जिसे कांग्रेस को समझना चाहिए। बहरहाल परिणामों से उत्पन्न निराशा या यूं कहें कि खीझ की वजह से कांग्रेस कार्यसमिति की समीक्षा बैठक से पहले उन्होंने पार्टी अध्यक्ष पद से अपने इस्तीफे का शिगूफा छोड़कर ये प्रचारित करवा दिया कि श्रीमती गांधी और डॉ मनमोहन सिंह ने उन्हें रोक रखा है। बैठक में क्या हुआ ये तो खुलकर बाहर नहीं आया लेकिन कहते हैं सभी सदस्यों द्वारा उनका समर्थन किये जाने पर भी राहुल ने नए अध्यक्ष की नियुक्ति के साथ ये शर्त भी रखी कि वह गांधी परिवार से बाहर का हो। इसके साथ ही उन्होंने अनेक नेताओं के पुत्र प्रेम पर भी आलोचनात्मक टिप्पणी करते हए कहा कि वे पार्टी छोड़कर उन्हें जिताने में लगे रहे। जबकि वे स्वयं भी पुत्र मोह के चलते ही कांग्रेस अध्यक्ष बन बैठे। बैठक में पंजाब के मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह को बड़ी जिम्मेदारी देने की बात भी उठी। बैठक बेनतीजा खत्म हो गई। बाद में जब अमरिंदर सिंह ने नवजोत सिद्धू की शिकायत हेतु मिलने का समय मांगा जो श्री गांधी ने उन्हें नहीं दिया। इससे ये साबित हो गया कि इतनी बड़ी हार के बावजूद वे अपनी कार्यशैली बदलने तैयार नहीं हैं। लोकसभा चुनाव की घोषणा के बाद राहुल ने अपनी बहिन प्रियंका वाड्रा को महासचिव बनाकर पूर्वी उप्र का प्रभार सौंप दिया। ऐसा माहौल बनाने की कोशिश की गई जैसे प्रियंका वह ब्रह्मास्त्र हैं जिसे गांधी परिवार ने इस मौके के लिए बचाकर रखा था। फिल्मी स्टाइल में उन्होंने अपना प्रचार शुरू कर दिया और इसी बीच वाराणसी से श्री मोदी के विरुद्ध लडऩे के संकेत भी दे दिए लेकिन बाद में जो हुआ वह सर्वविदित है। कांग्रेस की सबसे बड़ी दिक्कत ये है कि वह गांधी और अब वाड्रा परिवार के अलावा कुछ और सोचने की मन:स्थिति में ही नहीं आ पाती। प्रियंका के पति रॉबर्ट वाड्रा अनेक मामलों में फंसे हैं। ऐसे में ये माना गया कि उनके बचाव के लिए ही वे राजनीति में सक्रिय हुईं। होना तो ये चाहिए कि श्री गांधी पार्टी में गम्भीर किस्म के नेताओं से अपनी गलतियों और पार्टी की कमियों के बारे में सही जानकारी हासिल करते हुए उनमें सुधार की तैयारी करते। आगामी महीनों में कई राज्यों के चुनाव होने वाले हैं। उनमें उतरने तथा पार्टीजनों में उत्साह का संचार करने के लिए जरूरी है नेतृत्व की अपनी दिशा और सोच स्पष्ट हो जिसका कांग्रेस में सर्वथा अभाव है। ज्योतिरादित्य सिंधिया, दीपेंद्र हुड्डा, मिलिंद देवड़ा, तरुण गोगोई, मल्लिकार्जुन खडग़े और उन जैसे तमाम सक्रिय और सक्षम सांसदों के हार जाने से लोकसभा में पार्टी के पास नेता बनाने लायक तक कोई नहीं बचा। सोनिया जी कभी-कभार बोलती हैं और राहुल अभी तक संसदीय बहस में खुद को स्थापित नहीं कर सके। ऐसी स्थिति में पहले ही सत्र में भाजपा कांग्रेस पर दबाव बनाने का पुरजोर प्रयास करेगी। बेहतर हो राहुल और कांग्रेस ईवीएम और मीडिया जैसे बहाने छोड़कर हार के असली कारणों को समझें और उन कमियों को दूर करने का प्रयास तेज करें जिनकी वजह से जनता ने उन्हें पूरी तरह खारिज कर दिया। हालांकि इतनी बुरी हार के बाद तत्काल उबरना बहुत कठिन होता है लेकिन कांग्रेस को भाजपा से सीखना चाहिए जिसने पांच महीने पहले अपने कब्जे वाले तीन प्रमुख राज्य गंवाने के बाद बजाय निराश होने के अपने को मुकाबले के लिए तैयार कर लिया और पूरे देश में झंडा गाडऩे में कामयाब हो गई। राहुल गांधी को ये बात महसूस कर लेना चाहिए कि अब गांधी परिवार का वह रुतबा और ग्लैमर नहीं बचा। वरना अमेठी में इतनी बुरी हार नहीं हुई होती। गुना से श्री सिंधिया की चौंकाने वाली हार ने नव सामंतवाद के दिन पूरे होने की पुष्टि कर दी। कांग्रेस के आधा दर्जन से ज्यादा पूर्व मुख्यमंत्रियों और उनके बेटों की पराजय भी पार्टी के भीतर बड़े बदलाव की जरूरत की तरफ  इशारा है। राहुल को ये भी समझ लेना चाहिए कि उन्हें गठबंधन करते समय ज्यादा विवेकशील और सतर्क रहना होगा। कर्नाटक में सरकार बनाने की आपाधापी कांग्रेस को कितनी महंगी पड़ी ये सबके सामने है। बिहार में लालू का मोहपाश उसे ले डूबा। यदि राहुल वाकई पद छोडऩा चाहते हैं तब उन्हें पार्टी में खुलापन लाना चाहिए। भाजपा में मोदी-शाह के आभामंडल के पीछे रास्वसंघ का विशाल संगठन भी है जिसके बिना पार्टी बंगाल सहित पूर्वोत्तर राज्यों में इतनी सफल कभी नहीं हुई होती। वहीं कांग्रेस में संगठन केवल कागजों पर बचा है। राहुल ने जिस तरह हिन्दू मतों को लुभाने की कोशिश की वह दिखावटी होने से जनता को आकर्षित नहीं कर सकी। ऐसे में उसे अल्पसंख्यक प्रेम से ऊपर उठकर बहुसंख्यकों का भरोसा जीतना होगा। यदि अब भी कांग्रेस गांधी परिवार के करिश्मे पर निर्भर बैठी रही तब उसका पुनरुद्धार मुश्किल होगा। देश की सबसे पुरानी पार्टी का लगातार दुरावस्था की तरफ बढऩा ठीक उसी तरह खतरनाक होगा जैसा एक जमाने में उसका विकल्प नहीं होने के समय था। बेहतर होगा गांधी परिवार भी इस सच्चाई को समझे कि कांग्रेस उसके बिना भी चल सकती है। भाजपा ने 2004 की पराजय के दस वर्ष बाद ही राष्ट्रीय राजनीति में खुद को मजबूती से स्थापित करते हुए ये साबित कर दिया कि अटलबिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी के नेतृत्व के बिना भी वह सफलता के शिखर को छू सकती है। कांग्रेस भी परिवार छोड़ यदि विचार आधारित बने तब ही उसका भविष्य है वरना क्या होगा ये बताने की जरूरत नहीं है।

- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 25 May 2019

जो कहा करके दिखाओ : अब नहीं चलेगा बहाना

बीते पांच साल तक नरेंद्र मोदी हर समस्या के लिए नेहरु जी से लेकर मनमोहन सरकार तक पर दोषारोपण करते रहे । 2014 के चुनाव प्रचार में उन्होंने 60 महीने मांगे थे देश की दशा और दिशा ठीक करने के लिए। उसके बाद उन्होंने जितना किया और जितना नहीं कर पाए वह सब लोगों के सामने है। उनकी उपलब्धियों, विफलताओं और उनके लिए बनाये गये बहानों पर जनता ने आँख मूंदकर भरोसा किया और जैसा उनने स्वयं कहा कि फकीर की झोली भर दी। 303 सीटों के विशाल बहुमत के साथ 21 वीं सदी के सबसे ताकतवर नेता के तौर पर उनका उभरना एक बड़ी घटना है। लेकिन इस ऐतिहासिक सफलता ने श्री मोदी से उम्मीदें और अपेक्षाएं भी उतनी ही बढ़ा दी हैं। अब न वे कांग्रेस के 50 साल के शासन को कोस सकेंगे और न ही सहयोगी दलों के दबाव को ढाल बनाकर बच निकल सकेंगे। पिछला कार्यकाल उन्हें प्रशिक्षु के तौर पर मिला था लेकिन अब वे पूरी तरह देश के सत्ता संचालन में अनुभवी हो चुके हैं। सरकार की क्षमता और कमियों दोनों का उन्हें ज्ञान हो गया होगा। अपने साथी मंत्रियों और सांसदों की काबलियत भी उन्होंने परख ली होगी। भाजपा संगठन के भीतर कोई चुनौती उनके सामने नहीं है। जनमानस मोदी मैजिक से अभिभूत है। वैश्विक परिदृश्य सर्वकालीन अनुकूल है। आर्थिक हालात बहुत अच्छे न होते हुए भी नियन्त्रण में हैं, जिन कड़े निर्णयों की वजह से बीते कुछ साल तक प्रधानमंत्री को आम जनता और व्यापारी विरोधी प्रचारित किया गया उनके अच्छे परिणाम आने का समय आ गया है। विपक्ष भी किसी प्रकार की बाधा उत्पन्न करने की स्थिति में नहीं बचा। सरकार की स्थिरता के साथ ही राज्यसभा में बहुमत की किल्लत लगभग खत्म हो चुकी है। नवीन पटनायक और जगन रेड्डी जैसे नए साथी एनडीए की ताकत और बढ़ा सकते हैं वहीं नीतीश कुमार और उद्धव ठाकरे जैसे सहयोगी टांग अड़ाने की हैसियत खो चुके हैं। पार्टी में डांटने फटकारने वाले बुजुर्गों का युग समाप्तप्राय है। रास्वसंघ भी मोदी मैजिक की आभा से चकाचौंध में है। शत्रुघ्न सिन्हा, यशवंत सिन्हा और अरुण शौरी अप्रासंगिक होकर रह गए। ये सब देखते हुए अब श्री मोदी को वह सब करके दिखाना होगा जिसके लिए देश की जनता ने केवल अपना मत नहीं वन विश्वास उन्हें सौंपा है। चुनाव परिणाम पर अपनी पहली प्रतिक्रिया में उन्होंने सबका साथ सबका विकास के साथ सबका विश्वास भी जोड़ दिया और यही उनके ऊपर बड़ी जिम्मेदारी है। इसलिए उन्हें ये साबित करना होगा कि वे इस विश्वास की रक्षा करेंगे। राष्ट्रवाद एक चुनावी मुद्दा बनकर न रह जाए ये देखना जरूरी है। मोदी है तो मुमकिन का नारा वास्तविकता में बदलना ही दूसरी पारी की सफलता की कसौटी बनेगा।

-रवीन्द्र वाजपेयी

इंसानी जान की कीमत मुआवजा तो नेताओं को सुरक्षा क्यों?

देश में नई सरकार बनने के जश्न के बीच गुजरात की व्यवसायिक राजधानी सूरत से जो दुखद समाचार आया उसने प्रत्येक संवेदनशील व्यक्ति की आंखें नम कर दीं। एक बहुमंजिला व्यवसायिक इमारत में दोपहर लगी आग से वहां संचालित एक कोचिंग सेंटर में मौजूद 21 बच्चे जलकर मौत के आगोश में चले गये। कुछ ने कूदकर अपनी जान बचाई लेकिन उनमें से भी कई की स्थिति नाजुक है। राज्य सरकार ने मामला सूरत की महानगरपालिका पर ढाल दिया है क्योंकि किसी बहुमंजिला इमारत में अग्निशमन की व्यवस्था संबंधी जाँच करने का दायित्व स्थानीय निकाय के अंतर्गत ही आता है। प्रधानमन्त्री ने भी अपना दु:ख व्यक्त कर दिया। मरने वाले बच्चों के परिजनों को सरकार आर्थिक मुआवजा दे देगी। उसके बाद जाँच समिति बनेगी, दो-चार निलम्बित होंगे, भवन स्वामी के विरुद्ध लापरवाही का मुकदमा दर्ज होगा और हो सकता है दिल्ली के उपहार सिनेमा कांड की तरह सालों तक चलने वाली अदालती कार्रवाई के उपरांत उन्हें जेल भी जाना पड़ जाए। लेकिन इन सबसे न तो उन मासूमों की जि़न्दगी लौटकर आयेगी और न ही उनके परिवारजनों के सीने में जल उठी दु:ख की आग कभी ठंडी होगी। इस तरह का ये कोई पहला मामला नहीं है और न ही आखिऱी होगा क्योंकि बीती ताहि बिसार दे आगे की सुधि लेय वाली उक्ति हमारी मानसिकता पर स्थायी तौर पर हावी हो चुकी है। दुनिया के विकसित देशों में भी ऐसी दुर्घटनाएं होती हैं। लेकिन वहां गलतियों से सीखने की जो प्रवृत्ति है उसकी वजह से हादसों की पुनरावृत्ति रोकने के प्रबंध सर्वोच्च प्राथमिकता के आधार पर किये जाते हैं। जिस इमारत में कल की घटना घटी उसका मालिक यदि कोई राजनेता या उसका करीबी हुआ तब ये मानकर चलिए कि सूरत से दिल्ली तक उसके लिए बचाव कार्य शुरू हो चुका होगा। बड़े-बड़े वकील अग्रिम जमानत की अर्जी तैयार करने में जुट गये होंगे। प्रश्न ये है कि विकास के आसमानी दावों के बीच मूलभूत जरूरतों और सावधानियों के प्रति लापरवाही की ये प्रवृत्ति हम कब तक ढोते रहेंगे? 1997 में जबलपुर में आये भूकम्प के फौरन बाद भाजपा के दिग्गज नेता लालकृष्ण आडवाणी यहाँ आये थे। भूकम्प प्रभावित क्षेत्रों का दौरा करने के बाद उन्होंने पत्रकार वार्ता में तत्कालीन दिग्विजय सिंह की राज्य सरकार पर Criminal indifference (अपराधिक उदासीनता) का आरोप लगाया था। संयोगवश उसी दिन दिल्ली के उपहार सिनेमा में आग की खबर आई और तब श्री आडवाणीं के साथ आईं सुषमा स्वराज को तुरंत उन्होंने दिल्ली जाने का निर्देश दिया। श्रीमती स्वराज उस समय दिल्ली की सदर लोकसभा सीट से सांसद थीं और उपहार सिनेमा उसके अंतर्गत आता था। उस घटना को 22 साल बीत गये लेकिन अग्नि शमन या उस जैसी अन्य दुर्घटनाओं से बचने के उपायों को लेकर व्यवस्थाजनित हमारी उदासीनता यथावत है। सूरत में हुआ हादसा वाकई दिल दहलाने वाला है। अग्निकांड पर बनी Towering Inferno (टावरिंग इन्फर्नो ) नामक हालीवुड की फिल्म पूरी दुनिया में चर्चित हुई थी। उस फिल्म का कथानक एक बहुमंजिला इमारत में लगी भीषण आग और बचाव कार्य पर आधारित था। फिल्म देखने के बाद दुनिया के अनेक देशों में बहुमंजिला इमारतों में इस तरह की दुर्घटनाओं को रोकने संबंधी प्रबंध किये जाने लगे किन्तु हमारे देश में विकास के नाम पर छोटे-छोटे शहरों तक में अट्टालिकाएं तो तन गईं लेकिन उनमें रहने वालों की सुरक्षा के प्रति बरती जाने वाली लापरवाही भी उतनी ही ऊँची होती चली गई। उस विदेशी फिल्म की नकल करते हुए हमारे देश में भी बर्निंग ट्रेन नामक फिल्म बनी लेकिन उसमें मनोरंजन हावी रहा। सूरत की घटना से कुछ बदलेगा या सुधरेगा ये मान लेना दिल को बहलाने के लिए काफी होगा क्योंकि हमारे देश में सुरक्षा और सुविधा पर केवल नेताओं का एकाधिकार है। यदि इंदिरा गांधी की हत्या नहीं हुई होती तब नेताओं को जेड स्तर की सुरक्षा देने के प्रति भी विचार नहीं हुआ होता। सरकार हर व्यक्ति की जान की रक्षा करे ये तो सम्भव नहीं लेकिन उसकी लापरवाही से लोग सस्ते में मर जाएं ये भी आदर्श स्थिति नहीं हो सकती। यदि केवल कुछ लाख रूपये ही इंसानी जान की कीमत है तो बेहतर हो नेताओं की सुरक्षा का तामझाम भी बंद कर दिया जाए। आखिर वे भी तो देश के दूसरे आम इंसानों की तरह ही दो हाथ पैर वाले इंसान ही तो हैं।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 24 May 2019

विचार शून्यता बनी विपक्ष की हार का कारण

जनादेश 2019 की समीक्षा एक-दो दिन में नहीं की जा सकती। पूरे परिणाम देश की जानकारी में आ चुके हैं। कश्मीर से कन्याकुमारी और कच्छ से अरुणाचल तक का राजनीतिक वृत्तांत स्पष्ट हो चूका है। नरेंद्र मोदी दोबारा सत्ता में लौटे हैं और वह भी भाजपा की 303 सीटों के विशाल आंकड़े के साथ। भाजपा के नेतृत्व में एनडीए ने भी 350 की संख्या प्राप्त कर नेहरु-इंदिरा युग की याद ताजा कर दी। राजनीतिक प्रेक्षक श्री मोदी को पंडित नेहरु और इंदिरा जी की श्रेणी का नेता बताकर उनका यशोगान करने में जुटे हैं। कांग्रेस की कमजोरियों का बखान भी हो रहा है। लेकिन ये परिणाम केवल कांग्रेस की ही नहीं अपितु विपक्ष के उस खेमे की शिकस्त है जिसने राष्ट्रवाद की अवधारणा को साम्प्रदायिकता से जोड़कर उसका उपहास और अपमान किया। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने गत दिवस हार स्वीकार करते हुए कहा कि ये दो विचारधाराओं का संघर्ष है। लेकिन चुनाव का हल्ला शांत हो जाने के बाद क्या वे अपनी पार्टी की विचारधारा को स्पष्ट कर सकते हैं ? देश की सबसे बड़ी पार्टी की विचारधारा क्या है ये उसके नेता ही स्पष्ट नहीं कर सकते तब जनता से क्या अपेक्षा की जाए। दुर्भाग्य की बात ये है कि सत्ता की लालच में तकरीबन सभी पार्टियां कांग्रेस की तरह से विचार शून्य हो गईं। यहाँ तक कि नई राजनीति की प्रतिनिधि बनकर उभरी आम आदमी पार्टी तक सियासत के उसी गंदे नाले में डूब गयी जिसे साफ करने का वायदा और दावा उसने किया था। कांग्रेस की देखा सीखी वंशवाद की बयार भी खूब बही और जाति तथा क्षेत्र के नाम पर मैदान में उतरीं तमाम पार्टियां निजी पारिवारिक संपत्ति बनकर रह गईं। इस चुनाव ने केवल गांधी परिवार के वर्चस्व को ही नहीं अपितु अन्य पार्टियों में चल रही कुनबेबाजी की जड़ें भी खोदने का साहस जनता ने कर दिखाया। ज्योतिरादित्य सिंधिया, डिम्पल यादव, मीसा भारती, शिबू सोरेन, एचडी देवगौड़ा और उनके पौत्र , हुड्डा पिता-पुत्र. वैभव गहलोत और उन जैसे तमाम खानदानों को कूड़ेदान में फेंकने का निर्णय भारतीय राजनीति में उत्पन्न उस नई सोच का परिणाम है जो वंशवाद के साथ ही जाति की जंजीरें तोडऩे के लिए प्रयासरत है। उस दृष्टि से नरेंद्र मोदी बधाई के विशेष पात्र हैं जिन्होंने विकास और जनकल्याण की राजनीति को विजय का आधार बनाते हुए तमाम स्थापित धारणाओं को ध्वस्त कर दिया। उनकी ही तरह उड़ीसा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक भी व्यर्थ के प्रपंचों से उपर उठकर रचनात्मक राजनीति करते हुए जनता के मन में लगातार जगह बनाए रखने में कामयाब हुए हैं। इस चुनाव का रोचक पहलू ये है कि तेलंगाना के मुख्यमंत्री के. चन्द्रशेखर राव की लहर के बावजूद उनकी बेटी निजामाबाद से भाजपा उम्मीदवार से हार गई। इस प्रकार मतदाताओं ने अनेक मिथक तोड़ दिए। उप्र और बिहार में जातिवादी गठजोड़ की धज्जियां उड़ गई। कटिहार से तारिक अनवर की पराजय ने मुस्लिम मतों के तिलिस्म को भी बेअसर कर दिया। बिहार में लालू परिवार और पार्टी साफ़ हो गई वहीं उप्र में मुलायम का कुनबा घरेलू यादवी संघर्ष में कमजोर हो गया। मायावती का दलितवाद भी हाँफता नजर आया। सबसे बड़ी बात रही बंगाल में ममता बैनर्जी के अहंकार की धज्जियां उडऩा। सत्ता की चाहत में बहुसंख्यक समुदाय को ठेंगे पर रखने के उनके पागलपन को जनता ने जोरदार झटका दिया। वामपंथी बीते पांच वर्ष में राष्ट्रवादी ताकतों के विरुद्ध वैचारिक विद्रोह को भड़काने में जुटे रहे। दुर्भाग्यवश राहुल गांधी उनके जाल में फंस गये जिसकी वजह से कांग्रेस का रहा-सहा वैचारिक आधार भी जाता रहा। 2014 में हुई हार के बाद कांग्रेस ने जो एंटोनी कमेटी बनाई उसने हिंदुत्व को उसका कारण बनाया। उसके बाद राहुल गांधी ने सौम्य हिंदुत्व नामक प्रयोग करते हुए मंदिरों और मठों में पूजा पाठ शुरू कर दिया। अचानक वे जनेऊधारी ब्राह्मण बनकर अपना गोत्र बताते घूमने लगे। उनके शिवभक्त होने का प्रचार भी किया जाने लगा जिसे साबित करने के लिए वे कैलास मानसरोवर की तीर्थ यात्रा भी कर आये लेकिन जनता ने उस सबको पाखंड मानकर उपेक्षित कर दिया। जबकि दूसरी तरफ नरेंद्र मोदी ने राष्ट्रवाद और हिंदुत्व को सफलतापूर्वक जनता के मन में बिठाते हुए तुष्टीकरण की राजनीति के खतरों को उजागर कर दिया। रही सही कसर पूरी हो गयी आतंकवाद के विरुद्ध छेड़ी गई लड़ाई पर सवाल खड़े करने के मूर्खतापूर्ण निर्णय से। कांग्रेस सहित पूरे विपक्ष ने सैन्य कार्रवाई के सबूत मांगकर अपने आपको जनता की नजर में बुरी तरह से गिरा लिया। लेकिन इन सबसे अविचलित श्री मोदी अपनी उन योजनाओं को लोगों तक पहुँचाने में लगे रहे जिनसे उन्हें सीधा फायदा मिला। राहुल गांधी ने अपना अधिकांश समय राफेल सौदे और अनिल अम्बानी पर खर्च कर दिया जिसे आम मतदाता समझ ही नहीं सका । चौकीदार चोर की उनकी रट की वजह से जनता ने उन्हें गम्भीरता से लेना बंद कर दिया। बाकी विपक्षी दलों ने भी श्री मोदी की घेराबंदी में अपनी ऊर्जा और समय तो नष्ट किया लेकिन वे भाजपा विरोधी एक मोर्चा बनाने की बुद्धिमत्ता दिखाने से चूक गए। लेकिन सबसे बड़ा कारण बना हिंदुत्व, राष्ट्रवाद, राष्ट्रीय सुरक्षा और आतंकवाद को लेकर श्री मोदी की जबरन आलोचना। कड़े निर्णय लेने के बाद उन पर डटे रहने की नीति ने प्रधानमन्त्री की छवि एक सक्षम नेता के तौर पर स्थापित की। भ्रष्टाचार का एक भी आरोप उन पर और उनकी सरकार पर विपक्ष साबित नहीं कर सका। उनके विदेशी दौरों का मजाक उड़ाकर राजनीतिक रोटी सेंकने की राहुल की नीति भी लोगों को पसंद नहीं आई। उलटे उनसे मिले कूटनीतिक फायदों ने श्री मोदी को वैश्विक स्तर का नेता बना दिया। देश के जनमानस पर इसका सकारात्मक प्रभाव पड़ा जिसने विपक्ष को निहत्था कर दिया जो आखिर तक कोई एक चेहरा बतौर विकल्प नहीं दे सका। ये विजय निश्चित रूप से नरेंद्र मोदी के व्यक्तित्व और करिश्माई नेतृत्व की सफलता है। इसकी वजह से ये भी कहा जा रहा है कि उनका कद पार्टी से उपर हो गया लेकिन ये सोच गलत है। नरेंद्र मोदी एक विचार यात्रा के पथिक हैं जिसका उद्देश्य देश की सुरक्षा, समृद्धि और सम्मान में वृद्धि है। पूर्वोत्तर भारत के दुर्गम इलाकों में भाजपा का उदय उसी का हिस्सा है जिसे समझ पाना राहुल, अखिलेश, तेजस्वी जैसों के बस की बात नहीं है। नरेंद्र मोदी जैसे कद्दावर नेता को परास्त करने के लिए कन्हैया कुमार, हार्दिक पटेल, जिग्नेश मेवानी समान गैर जिम्मेदार तत्वों का सहारा लेने की नीति ने राहुल गांधी की अपरिपक्वता को प्रमाणित कर दिया। आजादी के बाद नेहरु जी और इंदिरा जी के इर्द गिर्द वामपंथी बुद्धिजीवियों का एक घेरा था। दुर्भाग्य से राहुल भी उसी में घिर गये। ये तबका राष्ट्रवादी शक्तियों को कमजोर करने में लगा रहता है। जिसके अनेक उदाहरण बीते पांच वर्षों में देखने आये। उस दृष्टि से ये चुनाव परिणाम राष्ट्रीय राजनीति को चुनावी जीत-हार से ऊपर उठाकर राष्ट्रवादी विचारधारा के मजबूत होने की घोषणा है। कांग्रेस अभी भी गांधी परिवार के मोहपाश से मुक्त नहीं हो सकी तब उसका भविष्य अच्छा नहीं कहा जा सकता। अन्य जाति और क्षेत्र आधारित पार्टियां भी यदि जनादेश के मर्म को नहीं समझीं तब इतिहास का कूड़ेदान ही उनकी जगह होगी।

-रवीन्द्र वाजपेयी