Tuesday, 27 August 2019

भ्रष्टाचार की जड़ों में मठा डालने का अच्छा प्रयास

न खाउंगा न खाने दूंगा के नारे के साथ सत्ता में आये नरेंद्र मोदी ने राजनीतिक भ्रष्टाचार पर तो काफी हद तक रोक लगाई लेकिन ये कहने में कुछ भी गलत नहीं है कि प्रशासनिक अमले का भ्रष्टाचार बदस्तूर जारी रहा। केन्द्रीय सचिवालय में भले मोदी प्रभाव नजर आता हो लेकिन दिल्ली में ही स्थित केंद्र सरकार के अन्य दफ्तरों में पुराना ढर्रा यथावत रहने से इस आम धारणा की पुष्टि होती रही कि भ्रष्टाचार को कोई नहीं मिटा सकता। ये बात लोगों के मन में इसलिए बैठ गई क्योंकि ऊपरी स्तर पर होने वाले भ्रष्टाचार से भले ही साधारण जनता का पाला नहीं पड़ता हो लेकिन राशन कार्ड, जाति प्रमाणपत्र जैसे अति साधारण कामों के लिए भी जब सरकारी दफ्तर में बैठा कर्मचारी घूस लेता हो तब ये मान लेना गलत नहीं होगा कि भ्रष्टाचार की जड़ें बेहद गहरी हो चुकी हैं। कुछ जगहों से तो मृत्यु प्रमाणपत्र तक में पैसा लेने जैसी शिकायतें सामने आईं। भ्रष्टाचार कहने को तो पूरी दुनिया में हैं। जापान जैसे देश के कुछ प्रधानमंत्री तक इसके कारण जेल जा चुके हैं। विकसित देशों में भी बहुराष्ट्रीय कम्पनियां चुनाव में दिए जाने वाले चंदे का मुआवजा रक्षा एवं अन्य बड़े विदेशी सौदों के जरिये वसूलती हैं। लेकिन उनका पर्दाफाश होने पर दोषी नेता को तत्काल पदमुक्त कर दण्डित किया जाता है। हमारे देश में भी आजादी के बाद से घपलों और घोटालों में सता में बैठे अनेक नेताओं की गद्दी गयी लेकिन उसका असर नीचे नहीं पड़ा। हाल के कुछ वर्षों में अनेक नेता जेल गए और कुछ जाने की लाइन में हैं लेकिन भ्रष्टाचार का असली केंद्र सरकारी दफ्तरों में बैठे बड़े और छोटे बाबू हैं जो सीधे आम जनता का शोषण करते हैं। उस दृष्टि से मौजूदा केंद्र सरकार ने भ्रष्टाचार के आरोपी अधिकारियों की पहिचान करते हुए उन्हें अनिवार्य सेवानिवृत्ति देने का जो निर्णय किया वह एक अच्छी शुरुवात है। इसी के तहत गत दिवस तीसरी किश्त में कर विभाग से जुड़े 22 अधिकारियों की छुट्टी कर डाली। कार्रवाई करने से पहले पूरी गोपनीयता बरती गई। सरकारी विभागों में इस बात की जमकर चर्चा है कि जिन कर्मचारियों और अधिकारियों पर कामचोरी और अक्षमता का आरोप है उनकी सूची बनाकर उन्हें सेवानिवृत्त करने की योजना पर कार्य चल रहा है। इसकी प्रक्रिया को लेकर काफी असमंजस भी है। लोगों का ये मानना है कि वरिष्ठ अधिकारी इसके जरिये व्यक्तिगत खुन्नस निकाल सकते हैं। बहरहाल भ्रष्ट अधिकारियों को अनिवार्य सेवानिवृत्त किये जाने से आम जन खुश हैं जो उसी अवधारणा की पुष्टि करती है जिसका जिक्र प्रारंभ में किया गया है। यद्यपि प्रधानमंत्री की इस सोच को भाजपा शासित राज्यों की सरकारें भी पलीता लगाने में पीछे नहीं हैं जहां हर स्तर पर भ्रष्टाचार नामक गंदगी फैली हुई है। कुछ लोग ये भी कहते पाए जाते हैं कि मोदी सरकार एक निश्चित आयु सीमा और सेवा काल पूरा कर चुके कर्मचारियों और अधिकारियों की छुट्टी करते हुए बेरोजगारों को रोजगार देने की नीति पर चल रही है परन्तु ये ऊँट के मुंह में जीरा जैसा होगा। लेकिन जहां तक बात भ्रष्ट अधिकारियों को निकाल बाहर करने की है तो उसमें किसी को ऐतराज नहीं हो रहा। हालांकि ये बात भी बिलकुल सही है कि सरकारी अमला तभी भ्रष्ट होता है जब उसे राजनीतिक संरक्षण मिलता है। विशेष रूप से उच्च पदों पर आसीन नौकरशाह तो किसी न किसी नेता के प्रति निजी तौर पर निष्ठावान बने रहकर अपने आप को सुरक्षित बनाये रखते हैं। इसका प्रमाण सरकारों के बदलते ही मिलने लगता है। नए हुक्मरान सत्ता में आते ही सबसे पहला काम साचिवालय में बदलाव का करते हैं और फिर आने वाले कुछ महीने स्थानान्तरण उद्योग चला करता है। जिसका ताजातरीन उदाहण मप्र है। 2014 में केंद्र की सत्ता में आते ही मोदी सरकार ने भी केन्द्रीय सचिवालय में जमकर परिवर्तन किये। महत्वपूर्ण पदों पर अपनी पसन्द के अधिकारियों की नियुक्ति की गई। चूंकि ऐसा पहले भी होता रहा इसलिए किसी ने उस पर आपत्ति नहीं की लेकिन इस परम्परा ने प्रतिबद्ध नौकरशाही का चलन शुरू कर दिया जिसका फायदा सत्ता में बैठे नेताओं से ज्यादा उनके दुमछल्ले बने बैठे अधिकारियों ने उठाया। ये बात भी सही है कि सत्ता में बैठे जनप्रतिनिधियों की योग्यता की वजह से भी नौकरशाहों को खुलकर खेलने का अवसर मिला गया। बहरहाल भले ही ये छोटी सी शुरुवात हो लेकिन जिस तरह नेताओं के भ्रष्टाचार पर नकेल डालने की कार्रवाई चल पड़ी है वैसी ही यदि सरकारी अमले के विरुद्ध भी ईमानदारी से चलाई जा सके तब भ्रष्टाचार की जड़ों में मठा डालने के काम में सफलता मिल सकती है। लेकिन मोदी सरकार को ये ध्यान रखना चाहिए कि इसमें पक्षपात, पूर्वाग्रह और दुराग्रह से बचा जाए।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 26 August 2019

जी -7 सम्मलेन में भारत की मौजूदगी अच्छा संकेत

संयुक्त अरब अमीरात द्वारा प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी को सर्वोच्च नागरिक सम्मान आर्डर ऑफ़ जायद प्रदान करने के बाद जी-7 देशों के समूह का सदस्य न होने के बाद भी भारत को फ्रांस में हो रहे उसके सम्मेलन में आमंत्रित किया जाना वैश्विक स्तर पर देश के बढ़ते महत्व का परिचायक है। संयुक्त अरब अमीरात में श्री मोदी को सम्मानित किये जाने पर पाकिस्तान की नाराजगी से जाहिर हो गया कि उसे भारत का बढ़ता प्रभाव बर्दाश्त नहीं हो रहा। कश्मीर के मौजूदा हालातों के मद्देनजर जी-7 देशों के सम्मलेन में भारत के प्रधानमन्त्री की उपस्थिति और भी मायने रखती है। विशेष रूप से तब जबकि अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान से मिलने के बाद कश्मीर विवाद में मध्यस्थता के लिए उतावले हुए जा रहे हैं। उसके अलावा दुनिया के सबसे ताकतवर देशों के राष्ट्रप्रमुख भी वहां उपस्थित हैं। आर्थिक मंदी के इस माहौल में दुनिया की प्रमुख आर्थिक महाशक्तियां नीति निर्धारण के मामले में भारत को भी यदि हिस्सेदार बना रही हैं तो इससे ये सिद्ध होता है कि विकासशील होने के बावजूद भारत अब विकसित देशों की बराबरी से बैठने की हैसियत हासिल कर चुका है और दक्षिण एशिया में चीन के समकक्ष महत्व उसे प्राप्त हो रहा है। हालाँकि इसका प्रमाण आतंकवाद के विरुद्ध लड़ाई में संरासंघ द्वारा भारत को प्रदत्त समर्थन से भी मिल चुका था। चीन के जबर्दस्त विरोध को नजरअंदाज करते हुए विश्व संस्था ने पकिस्तान में बैठे हाफिज सईद को वैश्विक आतंकवादी घोषित कर दिया। पुलवामा में हुए आतंकवादी हमले के बाद भारत द्वारा बालाकोट में की गयी हवाई सर्जिकल स्ट्राइक और उसके बाद अभिनंदन की रिहाई तक के घटनाक्रम में भारत को जिस तरह का कूटनीतिक समर्थन पूरी दुनिया से मिला वह अभूतपूर्व था। सबसे बड़ी बात ये रही कि चीन भी अब पकिस्तान को पहले जैसा संरक्षण नहीं दे रहा। उसकी एक वजह ये भी है कि वह विश्व मंच पर अकेला पडऩे लगा है। सुरक्षा परिषद में पकिस्तान की अर्जी पर कश्मीर पर हाल ही में हुई अनौपचारिक बैठक में भी उसे मुंह की खानी पड़ी। श्री मोदी ने राष्ट्रपति ट्रम्प से फोन पर लम्बी बातचीत करते हुए भारत का पक्ष समझाया जिसके बाद उनहोंने इमरान खान को भारत विरोधी बयान देते समय संयम बरतने की सलाह दे डाली। जी-7 सम्मेलन में भारत को विशेष तौर पर बुलाया जाना इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि अमेरिका और चीन के बीच चल रहे आर्थिक शीत युद्ध का सबसे ज्यादा प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष प्रभाव भारत पर ही हो रहा है और आगे भी होने की आशंका है। आज ही खबर आ गयी कि राष्ट्रपति ट्रम्प ने अमेरिकी कम्पनियों और कारोबारियों को चीन से बोरिया-बिस्तर समेटने की हिदायत दे डाली है। इस फैसले से विश्व की अर्थव्यवस्था में भारी उथलपुथल की सम्भावना है। भारत चूँकि चीन का निकट पड़ोसी और एक तरह से प्रतिद्वंदी भी है इसलिए अमेरिका के कड़े फैसलों का भारत पर असर पडऩा अवश्यम्भावी है इसलिए भी जी-7 में भारत के प्रधानमंत्री की मौजूदगी का रणनीतिक महत्व है। राष्ट्रीय रक्षा सलाहकार अजीत डोभाल को भी श्री मोदी साथ ले गए हैं और जैसी खबर है उसके मुताबिक कश्मीर के बारे में विश्व के ताकतवर देशों के सामने भारत का पक्ष दृढ़ता के साथ रखने की पूरी तैयारी कर ली गई है। चूँकि पाकिस्तान के अंदरूनी हालात बहुत ही अस्थिर हैं और इमरान सरकार पर सेना का दबाव बढ़ता ही जा रहा है वहीं सीमा पर तनाव में भी वृद्धि हो रही है। जनरल बाजवा के कार्यकाल में तीन साल की बढ़ोतरी से ये उजागर हो गया है कि चुनी हुई सत्ता पूरी तरह से मजबूर है और इन स्थितियों पर भारत के साथ युद्ध भड़काने की कोशिश पाकिस्तान कर सकता है जिसके बाद सेना तख्तापलट की परम्परा का निर्वहन करे तो आश्चर्य नहीं होगा। बहरहाल उस सबके पूर्व कश्मीर के हालिया घटनाक्रम को लेकर पाकिस्तान और चीन के प्रलाप को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ख़ास तवज्जो नहीं मिलना और उसके बाद जी-7 देशों के सम्मलेन में भारत की शिरकत का तात्कालिक कूटनीतिक प्रभाव तो पड़ेगा ही, एशिया की राजनीति पर उसका दूरगामी असर भी होगा। आर्थिक मंदी की चपेट में भारत भी जिस तरह से आ रहा है उसे देखते हुए इस सम्मेलन में श्री मोदी के मौजूद रहने से निर्णय प्रक्रिया में भारत की भूमिका तो रहेगी ही उससे निबटने के लिए देश को तैयार रखने में भी मदद मिलेगी। साथ ही संरासंघ के वार्षिक महाधिवेशन के पहले कश्मीर को लेकर भारत अपना पक्ष दुनिया के ताकतवर देशों के सामने मजबूती से रख सकेगा।

- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 23 August 2019

मुफ्त उपहार बन गए खजाने पर भार

आर्थिक मंदी की मार के शिकार बाज़ार की चर्चाओं के बीच अब सरकारी खजाने के खाली होने की बात भी सामने आने लगी है। इसका सबसे बड़ा कारण वोट बैंक की राजनीति है जिसकी आड़ में अनेक कल्याणकारी योजनाओं की घोषणा कर दी जाती है। लेकिन जब उन पर अमल करने का अवसर आता है तब या तो आर्थिक संसाधनों के अभाव का रोना रोया जाता है या फिर दूसरे वर्गों पर नये कर या अधिभार थोपकर भरपाई की जाती है। चुनाव जीतने का सबसे आसान तरीका किसानों और गरीबों को लालच देना है। इसकी शुरुवात कब और किसने की इस बात पर मगजमारी करने की बजाय बदले हुए हालातों में सरकार में बैठे लोगों को चाहे वे किसी भी पार्टी के क्यूं न हों, अर्थशास्त्र से जुड़ी कड़वी वास्तविकताओं को स्वीकार करते हुए तदनुसार आर्थिक नियोजन करना चाहिये। ताजा संदर्भ मप्र का ही है। गत वर्ष नवम्बर में हुए विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने सत्ता संभालने के 10 दिनों के भीतर ही किसानों को दो लाख तक के कर्ज माफ करने का प्रलोभन दिया था। इसी तरह मुख्यमंत्री कन्या विवाह और निकाह योजना में गरीब बच्चियों के विवाह हेतु 51 हजार की राशि बतौर अनुदान की बात भी घोषणापत्र में शामिल थी। इस हेतु पिछली शिवराज सरकार 21 हजार दिया करती थी। चूंकि चुनाव में कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी बनकर सत्ता में आ गई इसलिए ये माना गया कि उक्त दोनों और ऐसे ही अन्य वायदे जिनमें बेरोजगारी भत्ता भी था इस जीत में सहायक बने। सता संभालते ही मुख्यमंत्री कमलनाथ ने किसानों के कर्ज माफ करने का आदेश जारी कर दिया। सरकारी अमला भी नए हुक्मरानों के इशारे पर सक्रिय हो उठा। बीच में लोकसभा चुनाव आ जाने की वजह से खैरात बांटने का काम रुक गया लेकिन उसे संपन्न हुए भी तीन महीने बीत गए तब ये बात सामने आई कि प्रदेश सरकार किसानों के दो लाख तक के कर्ज एक मुश्त माफ करने की बजाय किश्तों में अपना वायदा निभाएगी। हालांकि इसके पीछे तकनीकी और प्रक्रियात्मक कारण भी बताये जा रहे हैं लेकिन कांग्रेस के चुनावी वायदे के बाद से ही किसानों ने बैंकों को पैसा देना बंद कर दिया। इसी तरह अनेक सहकारी समितियां भी दिवालिया होने के कगार पर आ गईं। आज एक और खबर आ गई जिसके अनुसार मुख्यमंत्री कन्या विवाह और निकाह योजना के अंतर्गत बीते छह महीने में संपन्न लगभग 22 हजार 500 विवाह में एक को भी 51 हजार का अनुदान नहीं मिला। राज्य शासन ने इसका कारण आर्थिक तंगी बताते हुए आश्वस्त किया कि जल्द ही हितग्राहियों के खाते में रकम जमा करा दी जावेगी। लेकिन आगामी विवाह आयोजन के लिए खजाने में पैसा नहीं है। ये कहना तो गलत होगा कि राज्य सरकार अपने वायदे से पीछे हट रही है लेकिन वित्तीय प्रबंधन और लोक-लुभावन नारों में समन्वय स्थापित कर पाना भारत जैसे देश में बहुत कठिन होता है। किसी भी सरकार का मुखिया जनता की नाराजगी मोल नहीं लेना चाहता क्योंकि उसकी कार्यकुशलता और सफलता का पैमाना चुनाव जिताने की उसकी करिश्माई क्षमता मानी जाती है। लेकिन इसके फेर में राज्य और केंद्र दोनों सरकारों का खजाना खाली होता जा रहा है जिसका असर विकास संबंधी गतिविधियों पर भी पडऩे लगा है। गत वर्ष जिन तीन राज्यों में कांग्रेस ने भाजपा को हराकर सत्ता पर कब्जा किया था उनमें लोकसभा चुनाव आते तक स्थिति उलट गई। इसका एक कारण किसानों के कर्ज दस दिनों में वापिस नहीं होना भी माना गया। मौजूदा आर्थिक परिस्थितियों में सरकारों द्वारा सामाजिक कल्याण की योजनाओं पर ख्रर्च की जा रही मोटी राशि उनके लिए असहनीय बोझ बनती जा रही है। इस दिशा में सभी राजनीतिक दलों को गंभीरता से विचार करना चहिये। देश जिन हालातों से गुजर रहा है उनमें घर फूंक तमाशा देखने वाली राजनीति बंद होनी चाहिए। मुफ्त बिजली से शुरू हुआ सिलसिला देश भर के विद्युत मंडलों की कमर टूटने के रूप में सामने आ चुका है। रही बात समाज के साधनहीन वर्ग को दी जाने वाली मदद की तो उसकी उपयोगिता और आवश्यकता से कोई इंकार नहीं कर सकता लेकिन सरकार में बैठे लोगों को केवल चुनाव जीतने की नहीं बल्कि उसके आगे की भी चिंता करनी चाहिए। मप्र की पिछली शिवराज सरकार ने भी किसानों को ऊंची कीमत देने का वायदा किया लेकिन महीनों तक उनके खाते में भुगतान नहीं हो सका जिससे उस वर्ग में नाराजगी फैली। यही स्थिति प्राकृतिक विपदाओं के समय दी जाने वाली मुआवजा राशि के वितरण में भी सामने आई। विभिन्न राज्यों से मिल रही जानकारी के अनुसार मुफ्त चुनावी उपहारों के फेर में सरकारी खजाने की हालत बेहद चिंताजनक हो चुकी है। राज्यों पर कर्ज बढ़ता जा रहा है जिसका ब्याज चुकाने तक के लिए उन्हें और कर्ज लेना पड़ता है। सरकारी विभागों में समय पर वेतन नहीं बंट पाना काफी कुछ कह जाता है। ये हालात किसी भी दृष्टि से संतोषजनक नहीं कहे जा सकते। आर्थिक मंदी की पदचाप तो काफी समय से सुनाई दे रही थी लेकिन अब वह दरवाजे पर आकर खड़ी हो गई है। निजी क्षेत्र में उसे लेकर हाहाकार मचा है। लाखों लोगों की नौकरी जाने की खबरें लगातार आने से आम जनता में भी नाराजगी है। चारों तरफ  से ये आवाज उठ रही है कि सरकार तत्काल जरूरी कदम उठाये। लेकिन सरकारी खजाना दोनों हाथों से बेरहमीपूर्वक लुटाने की प्रतिस्पर्धा नहीं रुकी तो हालात और बिगड़ सकते हैं। राजनीतिक बिरादरी जितनी जल्दी इस बात को समझ जाए उतना अच्छा वरना आर्थिक अराजकता समूची व्यवस्था को अस्त-व्यस्त कर देगी।

- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 22 August 2019

राजनीति और पत्रकारिता को ढाल बनाना गलत

कल का दिन अत्यंत घटनाप्रधान रहा। सुबह से लेकर देर रात तक पूर्व गृह मंत्री पी. चिदम्बरम की गिरफ्तारी खबरों में छाई रही। सर्वोच्च न्यायालय में जमानत अर्जी पर सुनवाई नहीं होने के बाद उनके पास दो ही विकल्प थे। पहला शुक्रवार को सुनवाई होने तक गुप्तवास पर रहना और दूसरा सामने आकर सीबीआई को गिरफ्तारी दे देना। जब ये लगा कि दो दिन तक गिरफ्तारी से बचने के लिए छिपने से उनकी और कांग्रेस पार्टी दोनों की छीछालेदर होती रहेगी तब जैसा कि प्रचारित किया गया उन्होंने सोनिया गांधी के कहने पर कांग्रेस मुख्यालय में प्रकट होकर पत्रकारों के समक्ष अपना संक्षिप्त वक्तव्य पढ़ा और घर चले गए जहां से सीबीआई ने उन्हें हिरासत में ले लिया। उन्होंने स्वेच्छा से गिरफ़्तारी नहीं दी क्योंकि घर के दरवाजे नहीं खोले जाने पर सीबीआई को दीवार फांदकर भीतर जाना पड़ा। आज सीबीआई उन्हें अदालत में पेश करते हुए पूछताछ के लिए रिमांड मांगेगी जबकि श्री चिदम्बरम जमानत की अर्जी दाखिल करेंगे। यदि उन्हें आज ही जमानत मिल गयी तब वे विजेता की मुद्रा में आ जायेंगे अन्यथा दिक्कतें और बढ़ती जायेंगी। देर सवेर उनके सांसद पुत्र कार्ति भी लपेटे में आयेंगे। उधर कांग्रेस इसे राजनीतिक बदले से जोड़कर मोदी सरकार को घेरने में जुटी है। आज सुबह उसकी पत्रकार वार्ता भी हुई। इस समूची कार्रवाई को अमित शाह के ऊपर अतीत में चले मुकदमे से जोड़कर भी पेश किया जा रहा है। संयोगवश उस समय श्री चिदम्बरम गृह मंत्री थे जबकि आज उसका उल्टा है। इस प्रकरण का अंजाम क्या होगा ये तो अदालत पर ही निर्भर है लेकिन इससे ये मुद्दा फिर विचारणीय हो गया कि राजनेता अपने आपको कानून के सामने वीआईपी समझने की प्रवृत्ति से कब मुक्त होंगे? ये सवाल केवल श्री चिदम्बरम के प्रकरण से नहीं उठा अपितु पूरी राजनीतिक बिरादरी को ये लगता है कि वह कानून से ऊपर है और उनकी शान में गुस्ताखी नहीं की जानी चाहिए। लेकिन गत दिवस ही सीबीआई द्वारा समाचार चैनल एनडीटीवी के संचालक प्रणय रॉय, उनकी पत्नी राधिका रॉय के अलावा संस्थान के मुख्य कार्यपालन अधिकारी विक्रम चन्द्रा के विरुद्ध भी आर्थिक मामलों से जुड़े विभिन्न आरोपों में प्रकरण दर्ज कर लिया गया। इस मामले में भी लम्बे समय से जांच चल रही थी। हाल ही में रॉय दंपत्ति को विदेश यात्रा पर जाने से पहले हवाई अड्डे पर ही रोक लिया गया था। एनडीटीवी ने अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए आरोप लगा दिया कि चैनल के सरकार विरोधी रवैये के कारण ये कार्रवाई हो रही है जिससे उसकी आवाज दबाई जा सके। एक वर्ग ऐसा है जिसे एनडीटीवी के आरोपों में सच्चाई नजर आती है। इस तरह अब राजनेता और पत्रकार दोनों एक ही तरह के आरोपों में फंसे हैं और दोनों का कहना है कि राजनीतिक वैमनस्य के कारण उन्हें सताया जा रहा है। वैसे तो ऐसी स्थिति में साधारण व्यक्ति भी अपने को निर्दोष ही बताता है लेकिन उसकी बात को कोई महत्व नहीं मिलता। प्रणय रॉय केवल एक पत्रकार ही नहीं बल्कि समाचार चैनल के अलावा और भी व्यवसाय करते हुए पैसे कमाते हैं। उनके विरूद्ध जो आरोप हैं उन्हें देखने के बाद ये साफ़  हो जाता है कि उनका पत्रकारिता से कोई सम्बन्ध नहीं है। ऐसे में विचारणीय मुद्दा ये है कि समाज में क़ानून की परवाह न करने वाला एक वर्ग पैदा हो गया है जो अपनी विशिष्ट स्थिति को हर मामले में भुनाने की कोशिश करता है। लालू प्रसाद यादव और मायावती जैसों पर कानून का शिकंजा कसते ही पिछड़ी और दलित जातियों के अपमान को मुद्दा बना लिया जाता है। आजम खान के गिरेबान पर हाथ डालते ही मुस्लिमों के साथ अन्याय का शोर मचा दिया जाता है। जिसकी गर्दन में कानून का फंदा कसता है वही लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की आजादी पर खतरे का हल्ला मचाने लगता है। उक्त दोनों मामलों को आधार बनाकर विचार करें तो ये लगता है कि राजनीति और समाचार माध्यम को ढाल बनाकर कुछ भी करने की स्वतंत्रता हासिल करने का सुनियोजित्त खेल चल पड़ा है। ये दोनों वर्ग समाज में विशेषाधिकार संपन्न माने जाते हैं। लोकतांत्रिक देश में ऐसा होना अनोखा नहीं है लेकिन राजनेता और समाचार जगत के दिग्गज कहे जाने वाले राजनीति और पत्रकारिता के अलावा बाकी जो भी व्यवसाय करते हैं उसमें भी उन्हें वीआईपी माना जाए ये स्थिति अच्छी नहीं होती। और दुर्भाग्य से हमारे देश में ये बुराई चरम पर है। राजनेता बनते ही कारोबार चमकने लग जाता है। पूरा परिवार सम्पन्नता की चमक में खो जाता है। इसी तरह बड़े समाचार समूह और उनके साथ जुड़े पत्रकार भी जिस तरह के गोरखधंधों में लिप्त हो जाते हैं वह एक तरह से प्रजातंत्र का शोषण ही है। सवाल केवल श्री चिदम्बरम या श्री रॉय तक ही सीमित नहीं है। इस बिरादरी के तमाम नामी-गिरामी लोगों के चेहरों पर कालिख पुत चुकी है और अनेक जांच के घेरे में हैं।  इनमें कांग्रेस-भाजपा सहित अन्य दलों एवं खेमों में लोग हैं। मनसे के सर्वेसर्वा राज ठाकरे भी आज ही तामझाम के साथ प्रवर्तन निदेशालय में पेश हुए हैं। वहीं हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेन्द्र सिंह हुड्डा भी जाँच एजेंसी के सवालों का सामना कर रहे हैं। ऐसे में होना तो ये चाहिए कि जाँच शुरू होने पर अपनी विशेष स्थिति को भुनाने के लिए उठापटक करने की बजाय यदि सामान्य तरीकों से पेश आया जाए तब शायद इस तरह की स्थिति बने ही न। सत्ता में बैठे लोगों पर बदले की भावना से कार्रवाई का आरोप जब वही लोग लगाते हैं हैं जो स्वयं कुछ समय पहले तक इसी आरोप से घिरे हुए थे, तब हंसी आती है। देश के अनेक नामी पत्रकार भ्रष्टाचार और दलाली जैसे आरोपों में फंसकर प्रतिष्ठा गंवा चुके हों तब इस पेशे से जुड़े महानुभावों को भी परम-पवित्र मानने की अवधारणा बदलनी होगी। राजनेताओं और पत्रकारों के प्रति यदि पहले जैसा सम्मान नहीं रहा तब उसके लिए दूसरों को दोषी ठहराने की जगह उन्हें आत्मलोचन करने की जरूरत है। हालांकि सभी लोग एक जैसे नहीं होते लेकिन कुछ लोगों के दामन दागदार होने के कारण बाकी की छवि पर भी संदेह के बादल मंडराना स्वाभाविक है।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 21 August 2019

आयुध निर्माणी हड़ताल : दोनों पक्ष हठधर्मिता से बचें

इसे महज संयोग ही कहा जा सकता है कि देश की सभी आयुध निर्माणियों में एक साथ शुरू हुई एक माह की हड़ताल के दिन ही वायु सेनाध्य्क्ष बी.एस धनोआ का ये बयान आ गया कि वायुसेना अब भी 44 साल पुराने मिग- 21 लड़ाकू विमानों का उपयोग कर रही है जबकि इतनी पुरानी तो कोई कार तक नहीं चलाता। जिस समारोह में उन्होंने उक्त टिप्प्णी की उसमें रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह भी मौजूद थे। वायु सेनाध्यक्ष की यह पीड़ा नई नहीं है। उल्लेखनीय है बालाकोट सर्जिकल स्ट्राइक के उपरान्त पाकिस्तानी एफ-16 का पीछा करते हुए पाकिस्तानी वायु क्षेत्र में घुसे विंग कमांडर अभिनंदन भी मिग लड़ाकू विमान ही उड़ा रहे थे। अस्त्र-शस्त्रों के मामले में आधुनिकीकरण की धीमी प्रक्रिया की शिकायत थल सेनाध्यक्ष और नौ सेनाध्यक्ष भी समय-समय पर करते रहे हैं। कहते हैं मनमोहन सरकार के समय रक्षा उपकरणों की खरीद में बहुत ही सुस्ती बरती गई जिसका प्रभाव सेना की मारक क्षमता पर भी पड़ा। मोदी सरकार ने सत्ता संभालते ही इस दिशा में तेजी से कदम बढ़ाये और विदेशों से आधुनिकतम हथियार और रक्षा उपकरण खरीदने संबंधी प्रक्रिया को सर्वोच्च प्राथमिकता दी। इनमें लड़ाकू विमान, हेलीकाप्टर और तोपें सहित अन्य सामग्री भी है। सबसे बड़ी बात ये रही कि किसी एक देश पर निर्भरता खत्म करते हुए विभिन्न देशों से रक्षा सौदे किये गए जिनमें आर्थिक बचत के साथ ही जल्द आपूर्ति को सुनिश्चित किया गया। इसी का सुपरिणाम है कि एक तरफ  चीन से डोकलाम विवाद के समय भारत ने दो-दो हाथ करने की हिम्मत दिखाई वहीं अरुणाचल में आधुनिक तोपें और मिसाइलों के अलावा रडार वगैरह लगाकर सुरक्षा इंतजाम पुख्ता किये गये। पाकिस्तान के मोर्चे पर थल और वायु सेना द्वारा की गईं सर्जिकल स्ट्राइक भी अपने आप में काफी कुछ कह जाती हैं। लेकिन ये भी उतना ही सच है कि रक्षा उत्पादन के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता के बिना देश की सुरक्षा सदैव खतरे में रहती है और इसीलिये प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी ने मेक इन इंडिया योजना के अंतर्गत रक्षा सामग्री का उत्पादन भारत में ही करने की बात सोची और निजी क्षेत्र को भी इसके लिए अनुमति दे दी। इस बारे में उल्लखनीय होगा कि ब्रम्होस जैसी आधुनिक मिसाइल का रूस के सहयोग से उत्पादन करने के बाद उसका कुछ देशों को निर्यात करने से ये संभावना बढ़ी कि यदि भारत में रक्षा उत्पादन भी कमाई का जरिया बन सकता है। शायद इसी सोच ने निजी क्षेत्र की राह प्रशस्त की जिसकी नींव उदारीकरण के साथ ही पड़ चुकी थी। कल से शुरू हुई आयुध निर्माणियों की हड़ताल के पीछे वर्षों से चली आ रही वह आशंका है जिसके अनुसार सरकार धीरे-धीरे इस सम्वेदनशील क्षेत्र को भी निजी कंपनियों के हाथों बेचने की रूपरेखा बना रही है। ध्यान देने वाली बात ये है कि आयुध निर्माणियों की समस्त श्रमिक यूनियन इस हड़ताल में शामिल हैं जबकि वे अलग-अलग राजनीतिक दलों से सम्बद्ध बताई जाती हैं। कर्मचारियों का कहना है कि आयुध निर्माणियों के मौजूदा प्रशासनिक ढांचे को बदलकर उसे सार्वजानिक क्षेत्र का उद्यम बनाने और उसका निगमीकरण करने की सरकार की योजना दरअसल निजीकरण करने का षडयंत्र है जिससे रक्षा उत्पादन के क्षेत्र पर भी बाजारवादी सोच हावी हो जायेगी और युद्ध की स्थिति में सेना की जरूरतों को पूरा करने में परेशानी आ सकती है। निजी कंपनियों का उद्देश्य जाहिर तौर पर मुनाफा कमाना होता है जबकि सरकारी फैक्ट्रियां देश की जरूरत के मुताबिक दिन रात काम करने से भी पीछे नहीं रहतीं। ये भी कहा जा रहा है कि निजी क्षेत्र कीमतों को लेकर भी सरकार और सेना का शोषण कर सकता है। कर्मचारियों के मन में अपने भविष्य और सेवा शर्तों को लेकर भी तरह-तरह की शंकाएँ हैं। कर्मचारी संगठन काफी समय से सरकार से इस बारे में बातचीत करते रहे हैं। हालाँकि निजीकरण नहीं किये जाने का आश्वासन भी मिलता रहा लेकिन इससे कर्मचारी संतुष्ट नहीं हुए और एक महीने की लम्बी हड़ताल का निर्णय ले लिया गया। अभी तक सरकार ने हड़ताल को लेकर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी और न ही उसे खत्म करवाने की दिशा में हो रहे प्रयासों की जानकारी मिली है लेकिन सबसे बड़ी चिंता का विषय ये है कि जब सीमा पर युद्ध के बादल मंडरा रहे हों तब देश में रक्षा उत्पादन से जुड़ी सभी फैक्ट्रियां एक साथ लम्बी हड़ताल पर चली जाएं तो इसका दूरगामी असर हो सकता है। हालांकि श्रमिक संगठनों ने ये भी कह दिया है कि युद्ध की स्थिति में वे तत्काल काम पर लौट आएंगे लेकिन एक महीने हड़ताल चली तब रक्षा उत्पादन के लक्ष्य प्रभावित हो सकते हैं। सरकार को चाहिए कि वह कर्मचारियों के साथ सौहाद्र्रपूर्ण वातावरण में वार्ता करते हुए उनकी शंकाओं को दूर करे। निश्चित रूप से सरकार की अपनी परेशानियां और शिकायतें होंगीं। सरकारी क्षेत्र कार्य संस्कृति के अभाव के अलावा अधिक उत्पादन लागत और पूंजी की किल्लत से जूझ रहा है। अनेक विकसित देशों में रक्षा उत्पादन निजी क्षेत्रों में होने से नई तकनीक का विकास तेजी से हो सका जबकि रक्षा अनुसन्धान के मामले में भारत बहुत पीछे है। भले ही डी.आर.डी.ओ जैसे संस्थान ने बीते कुछ दशकों में सराहनीय कार्य किया है लेकिन सरकारी क्षेत्र में व्याप्त कछुआ चाल की वजह से हम अंतर्राष्ट्रीय मानकों के लिहाज से बहुत ही फिसड्डी हैं। यद्यपि इसके लिए सरकारी निर्णय प्रक्रिया को बाधित्त करने एवं हर काम में टांग अड़ाने वाली नौकरशाही भी कम जिम्मेदार नहीं है। ऐसे में केंद्र सरकार को ये देखना चाहिए कि रक्षा उत्पादन के क्षेत्र से जुड़े 82 हजार कर्मचारी और वैचारिक मतभेदों को भुलाकर एकस्वर में बोलने वाले उनके संगठन यदि इतनी लम्बी हड़ताल पर जाने मजबूर हुए तो उसकी वजहें क्या हैं और समय रहते इस बारे में कोई कदम क्यों नहीं उठाया गया? तमाम विरोधाभासों के बावजूद रक्षा उत्पादन से जुड़े कर्मचारी भी अप्रत्यक्ष तौर पर सेना का ही हिस्सा हैं और इसलिए उनके साथ सामान्य कर्मचारी से हटकर व्यवहार होना चाहिए। दोनों पक्षों के अपने-अपने तर्क हैं लेकिन हठधर्मिता किसी की भी अच्छी नहीं होगी। वैसे भी हड़ताल श्रमिकों का अन्त्तिम अस्त्र होता है जिसकी विफलता उनके पूरे संघर्ष को मिट्टी में मिला देती है। 1974 की रेल हड़ताल उसका उदाहारण है। वहीं सरकार को भी सोच-समझकर आगे बढऩा होगा क्योंकि उसकी अपनी नीयत पर भी संदेह बना हुआ है।

- रवीन्द्र वाजपेयी