Wednesday, 25 September 2019

सोशल मीडिया : स्वच्छता अभियान की जरूरत

जिस तरह शरीफों की आवासीय बस्ती में  समाजविरोधी गतिविधियों से जुड़े कुछ लोगों के आकर बस जाने से  घबराहट का माहौल बन जाता है ठीक वही स्थिति सोशल मीडिया नामक उस संचार माध्यम की हो गई है जो निकले  थे कहाँ जाने के लिए पहुंचे हैं कहाँ, मालूम नहीं, के मुकाम पर आ खड़ा हुआ है। सूचनाओं के आदान-प्रदान और लम्बी दूरी रूपी बाधा को बेमानी साबित करते हुए संवाद और वैचारिक आदान प्रदान से शुरू हुआ ये माध्यम संभवत: ऑरकुट नामक चैटिंग सुविधा से शुरू हुआ जिसे फेसबुक ने विश्वव्यापी बना दिया। ट्विटर, व्हाट्स एप और इन्स्टाग्राम  सरीखे माध्यमों ने सोशल मीडिया को समाचार माध्यमों के एक प्रभावी विकल्प से भी आगे बढ़कर सूचना तकनीक के चरमोत्कर्ष का एहसास करवा दिया। इसका महत्व और ताकत तब पहिचानी गई जब फ्रांस में बैठी एक युवती ने फेसबुक का उपयोग करते हुए मिस्र में सत्ता परिवर्तन करवा दिया। शायद उसी के बाद अपरिचित लोगों से मित्रता कायम करते हुए हलके फुल्के संवाद के इस माध्यम का स्वरूप और व्यापक होता गया और यह राजनीति के अलावा निजी खुन्नस और घृणा के साथ ही अश्लीलता के प्रसार तक चला गया। तथ्यहीन जानकारी, अफवाहें और चरित्र हनन का बोलबाला होने से इस सामाजिक माध्यम में समाज विरोधी तत्वों का दबदबा नजर आने लगा  जिसकी वजह से उसका मौलिक स्वरूप और उद्देश्य विकृत होने लगे। महापुरुषों और महत्वपूर्ण पदों पर बैठे लोगों का उपहास करना सामान्य बात हो गयी है। जिस ट्विटर नामक माध्यम का उपयोग देश और दुनिया की सुविख्यात और सम्मानित हस्तियाँ अपने विचारों के सम्प्रेषण  के लिए करती हैं उसमें में भी अक्सर ऐसी  सामग्री परोसी जाने लगी है जो किसी भी लिहाज से सभ्य समाज में स्वीकार्य नहीं  हो सकती। व्हाट्स एप तो मानों सिरदर्द सा बन गया है। वहीं यूट्यूब में भी वर्जनाहीनता का प्रत्यक्ष दर्शन हो जाता है। पश्चिमी देशों में जहां वैचारिक स्तर पर खुलापन नग्नता की देहलीज पर जा खड़ा हुआ है वहां के समाज में ऐसी बातों से कोई  फर्क नहीं पड़ता लेकिन भारत सरीखे परम्परागत देश में इस तरह की बातों को आपत्तिजनक माना जाता है। भले ही समलैंगिकता, लिव इन रिलेशनशिप और यौन सम्बन्धों  जैसे विषयों पर बात करना बुरा न माना जाता हो लेकिन ये भी सच है कि आज भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और स्वछंदता में फर्क किया जाता है। यही वजह है कि सोशल मीडिया को लेकर आचार संहिता बनाये जाने की जरूरत काफी  अरसे से महसूस की जाती रही है। गत दिवस सर्वोच्च न्यायालय ने आखिरकार केंद्र सरकार से तीन सप्ताह के भीतर ये बताने के लिए कहा  है कि वह इस बात की जानकारी दे कि इस बारे में कोई गाइड लाइन बनाने की दिशा में क्या कदम उठा रही है? दो न्यायाधीशों की पीठ में से एक ने तो यहाँ तक कहा कि वे तो सोशल मीडिया से बचने के लिए स्मार्ट फोन का उपयोग बंद करने की सोच रहे हैं। ऐसा सोचने वाले उक्त न्यायाधीश महोदय अकेले नहीं हैं। अनगिनत लोग ऐसे हैं जिन्हें सोशल मीडिया से विरक्ति होने लगी है। अपने बच्चों के इसमें उलझे रहने से अभिभावक भी त्रस्त हैं। सर्वोच्च न्ययालय ने  सरकार को फटकारते हुए ये भी कह  दिया कि सोशल मीडिया का नियंत्रण विदेशों में होने का बहाना नहीं चलेगा। न्यायालय की चिंता पूरी तरह अपेक्षित  और सामयिक है लेकिन प्रश्न ये है कि सरकार की अपनी सीमाएं हैं और फिर हमारा देश चीन जैसा नहीं जहां अभिव्यक्ति की सीमाएं और स्वरूप सरकारी तन्त्र ही निर्धारित करता है। और जबकि एक बड़ा वर्ग मौजूदा सरकार पर असहिष्णु होने का आरोप लगाने में जुटा रहता है तब उसके लिए सोशल मीडिया पर किसी भी तरह की लक्ष्मण रेखा खींचना कितना संभव होगा ये विचारणीय प्रश्न है। बेहतर तो यही होगा कि इस बारे में समाज स्वयं मर्यादाओं को तय करे। जो लोग सोशल  मीडिया के जरिये अश्लीलता, अभद्रता, अफवाहें और अनर्गल प्रलाप करते हों उनका बहिष्कार किया जाना सबसे ज्यादा जरूरी है। वैसे कुछ समय से सरकार ने इस दिशा में कदम उठाये  हैं। अवमानना करने और अन्य आपत्तिजनक सामग्री प्रस्तुत करने वालों के विरुद्ध शिकायत मिलने पर कार्रवाई भी होने लगी है  लेकिन उसका व्यापक असर नहीं हुआ। फेसबुक के जरिये रिश्ते बनाकर ठगी और यौन शोषण तक होने लगा है। फर्जी नामों से अनेक लोग इसमें सक्रिय होने से पकड़ में नहीं आ पाते। शायद इसी वजह से सर्वोच्च न्यायालय ने आधार कार्ड की उपयोगिता अनिवार्य करने जैसी बात भी कही है। दरअसल  इस समस्या का हल सोशल मीडिया का रचनात्मक उपयोग करने वाले ही  बेहतर तरीके से कर  सकेंगे। समाज में अच्छाई और बुराई दोनों हर समय मौजूद रहा करती हैं। जिसके प्रति लोगों का रुझान ज्यादा होता है वही जोर मारने लगती है। सोशल मीडिया को साफ-सुथरा बनाये रखने के लिए उसका उपयोग करने वाले यदि मुस्तैद होकर गंदगी फैलाने वालों का विरोध करने  का साहस दिखाने  लगें तो समस्या काफी हद तक हल हो सकती है। इस बारे में एक टीवी चैनल से जुड़े पत्रकार संजय सिन्हा ने अनोखा उदहारण पेश करते हुए एक फेसबुक परिवार बनाया जिससे हजारों ऐसे लोग जुड़ गए जो पूरी तरह से अपरिचित थे। प्रतिवर्ष वे इस परिवार का सम्मेलन करते हैं जिसमें देश विदेश से लोग आते हैं। उनके बीच आत्मीय सम्बन्धों का बनना वाकई चौंकाता है लेकिन इससे साबित हो गया कि सोशल मीडिया के आभासी संसार के जरिये इस तरह के कार्य भी हो सकते हैं। सर्वोच्च न्यायालय और सरकार  जो और जब करेंगे तब करेंगे किन्तु सोशल मीडिया से जुड़े लोगों का भी ये दायित्व है कि वे खुद आगे बढ़कर इसमें स्वच्छता अभियान चलायें।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 24 September 2019

इमरान की आखिरी उम्मीद भी टूटी

ऐसा लगता है इमरान खान के बुरे दिन चल रहे हैं। इसकी एक वजह वे खुद हैं। एक तरफ तो वे स्वीकार करते हैं कि उनके देश में हजारों आतंकवादी मौजूद हैं। अल कायदा के लोगों  को प्रशिक्षित किये जाने की बात भी उन्होंने कुबूली है वहीं दूसरी तरफ जब भारत ऐसे ही आरोप लगाता है तब बजाय सहयोगात्मक रुख अपनाने के वे ईंट का जवाब पत्थर से देने से भी आगे बढ़कर अपने परमाणु बम की धौंस दिखाने लग जाते हैं। बात-बात में वे विश्व बिरादरी को ये चेतावनी देते रहते हैं कि भारत के साथ युद्ध हुआ तो वह परम्परागत शैली से ऊपर उठकर परमाणु अस्त्रों के उपयोग तक जा सकता है जिसका असर पूरी दुनिया पर पड़े बिना नहीं रहेगा। लेकिन उनकी बात पर किसी भी बड़े देश ने ध्यान नहीं दिया। अपने भाषणों में वे भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का जिस तरह जिक्र करते हैं उसके विरुद्ध उन्हें अनेक मुस्लिम देश तक चेता चुके हैं। पकिस्तान का सबसे भरोसेमंद साथी चीन भी यद्यपि मौजूदा विवाद में भारत के साथ नहीं है लेकिन वह खुलकर पकिस्तान के समर्थन में आने से भी हिचक रहा है। अब ले देकर एक अमेरिका बच रहता है जिस पर इमरान खान की उम्मीदें टिकी थीं लेकिन बीते कुछ समय से वह भी उसे ठेंगा दिखाने की नीति पर चल रहा है। जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने के फैसले के बाद पाकिस्तानी प्रधानमंत्री भागे-भागे अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के पास गए और कश्मीर मसले पर मध्यस्थता की गुजारिश की जिसे उन्होंने स्वीकार करते हुएकहा कि श्री मोदी भी उनसे इसके लिए कह चुके थे। जब भारत ने इसका खंडन किया तब श्री ट्रम्प बोलने लगे  कि दोनों देश राजी हों तब वे इसके लिये अपनी सेवाएं देने तैयार होंगे। भारत ने उसके बाद लगातार ये स्पष्ट किया कि कश्मीर दोनों देशों के बीच का विवाद है जिसमें किसी तीसरे की दखलंदाजी उसे मंजूर नहीं। इसके ठीक उलट पाकिस्तान कभी संरासंघ तो कभी अमेरिका को बीच में डालने की कोशिश करता रहता है। लगातार असफल रहने के बाद गत दिवस उसने एक बार फिर कोशिश की। परसों अमेरिका के ह्यूस्टन शहर में हाउडी मोदी नामक अति भव्य आयोजन में श्री ट्रम्प न सिर्फ शरीक हुए अपितु श्री मोदी की तारीफ करते हुए इस्लामिक आतंकवाद से साथ लडऩे जैसी बात भी कही। उसके बाद कल इमरान खान की उनसे  मुलाकात होनी थी। पाकिस्तान को उम्मीद रही होगी कि अपने स्वभाव के अनुसार श्री ट्रम्प इस दौरान राग पाकिस्तानी गायेंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ और श्री ट्रम्प ने कह दिया कि कश्मीर दो देशों का मामला है जिसे सुलझाने में मध्यस्थता के लिए वे तभी राजी होंगे जब दोनों इसके लिए सहमत हों। उन्होंने  इस अवसर पर ह्यूस्टन के आयोजन का जिक्र करते हुए श्री मोदी के भाषण का उल्लेख भी किया। पाकिस्तानी पत्रकारों द्वारा  कश्मीर पर लगातार सवाल पूछे जाने पर अमेरिकी राष्ट्रपति ने इमरान पर तंज कसते हुए पूछा कि ऐसे लोग वे कहाँ से ढूंढ़कर लाते हैं। हालांकि उनने पाकिस्तान के साथ अपने अच्छे रिश्तों  पर श्री मोदी की तारीफ करते हुए इमरान खान को एक तरह से बैरंग चलता किया। वैसे पाकिस्तान परसों रात के बाद ही ये समझ चुका  था कि राष्ट्रपति ट्रम्प पर भारत का जादू चल चुका है। भले ही अमेरिका  लंबे समय तक पाकिस्तान को संरक्षण देता रहा लेकिन जब वह उसे आस्तीन का सांप लगने लगा तब उसने सतर्कता बरतना शुरू किया। विशेष रूप श्री ट्रम्प के सत्ता में आने के बाद से अमेरिका ने इस्लामी आतंकवाद  के खिलाफ जो सख्त रवैया अपनाया उसकी वजह से भी पाकिस्तान के साथ उसके रिश्तों में खटास आने लगी। परसों रात के बाद से तो पूरा पाकिस्तान डोनाल्ड ट्रम्प को गरियाने में जुट गया है। इमरान भी हाल ही में बोल चुके हैं कि पाकिस्तान ने अमेरिका के हितों की रक्षा के लिए तालिबानी लड़ाके तैयार किये थे।  कुल मिलाकर मौजूदा हालात में पाकिस्तान की  पीठ पर से अमेरिका का हाथ पूरी तरह भले ही  न उठा हो लेकिन अब उसमें पहले जैसी ताकत नहीं रही। इसकी एक वजह भारत की बढ़ती आर्थिक और सामरिक क्षमता भी है। दक्षिण  एशिया में चीन के विरुद्ध अमेरिकी मोर्चेबंदी में भारत ही उसके लिए सबसे अधिक सहायक हो सकता है ये बात अमेरिकी नीति निर्धारक समझ बैठे हैं। यही वजह है कि अनुच्छेद 370 खत्म करने जैसे बड़े फैसले पर वाशिंगटन भारत के विरुद्ध जाने की हिम्मत नहीं कर सका। प्रधानमंत्री श्री मोदी ने जिस चपलता के साथ रूस, फ्रांस सहित सऊदी अरब जैसे देशों  को भरोसे में लेने का दांव चला उसके बाद इमरान खान पूरी तरह किनारे लग गये। पाकिस्तान पश्चिमी ताकतों का पालित पुत्र रहा है। ये कहना भी गलत नहीं होगा कि वह उनके फेंके टुकड़ों पर ही पलता रहा है। लेकिन 2014 के बाद स्थिति बदलती गयी और भारत को विश्व शक्तियों ने अपनी बिरादरी में शामिल कर  लिया। इसके पीछे व्यापारिक स्वार्थ भी हैं लेकिन ये भी सही है कि इस दौरान भारत की छवि को संवारने का काम अत्यंत कुशलता से हुआ और उस वजह से पाकिस्तान लगातार कमजोर पडऩे लगा। बीते दो दिनों में अमेरिका में उसे जो देखने और सुनने मिला उसके बाद इमरान खान को ये समझ लेना चाहिए कि वे भारत के विरुद्ध नफरत को त्यागकर बिना जिद किये दोस्ती का हाथ बढ़ाएं वरना उनका हश्र भी उनके पूर्ववर्ती शासकों जैसा होना तय है। उनकी नासमझी का इससे बड़ा उदाहरण क्या होगा कि वे अमेरिका यात्रा में अपने साथ फौजी जनरल बाजवा को लेकर गये हैं।

- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 23 September 2019

भारत के गौरवगान में बदल गया हाउडी मोदी

अमेरिका के ह्यूस्टन शहर में बीती रात प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के स्वागत में प्रवासी भारतीयों द्वारा आयोजित हाउडी मोदी नामक सांस्कृतिक आयोजन उस समय एक अनौपचारिक कूटनीतिक मंच में तब्दील हो गया जब अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने भी उसमें आने की सहमति दे दी।  कल शाम से ही पूरी दुनिया की निगाहें इस अनूठे आयोजन पर टिकी रहीं जो भारतीय समय के अनुसार आधी रात के एक घंटे बाद तक चलता रहा। भारतीय कला और  संस्कृति के प्रदर्शन को देखने एनआरजी स्टेडियम में 50  हजार भारतीय मूल के लोगों के अलावा अमेरिकी सांसदों की बड़ी  संख्या में मौजूदगी से ये संकेत मिला कि भारत को  लेकर इस विश्वशक्ति की सोच में  कितना बदलाव आ गया है। ये कहने में कतई संकोच नहीं करना चाहिए कि राष्ट्रपति ट्रंप और अमेरिका के बाकी राजनेता उक्त आयोजन में अगले  साल होने वाले राष्ट्रपति चुनाव में भारतीय समुदाय के मतदाताओं का समर्थन जुटाने की गरज से घंटों बैठे रहे। लेकिन दूसरी तरफ ये भी उतना ही सही है कि डोनाल्ड ट्रम्प जैसा राष्ट्रपति एक गैर राजनयिक कार्यक्रम के लिए वाशिंगटन से ह्यूस्टन आकर भारत के प्रधानमन्त्री के साथ गलबहियां करता हुआ पूरे स्टेडियम का चक्कर लगाते घूमे  तब उसके दूरगामी कूटनीतिक संकेतों को भी अनदेखा नहीं किया जा सकता। जब श्री मोदी ने अपने स्वागत भाषण में अब की बार ट्रम्प सरकार कहा तब अनेक लोग ये समझे कि वे अमेरिका के राष्ट्रपति की चापलूसी कर रहे हैं। सोशल मीडिया पर तत्संबंधी प्रतिक्रियाएं भी आने लगीं। लेकिन जब श्री ट्रम्प ने अपने भाषण में मोदी सरकार की तारीफ करते हुए इस्लामी आतंकवाद से मिलकर लडऩे की बात कहते हुए साफ किया  कहा कि भारत और अमेरिका दोनों को अपनी सीमाओं की रक्षा करने का अधिकार है तब ये स्पष्ट हो गया कि आयोजन की दिशा उसी तरफ घूम गयी जो भारत वस्तुत: चाहता था। ट्रम्प ने लंबा भाषण देकर अपनी सरकार की उपलब्धियों  को गिनाते हुए अगले चुनाव का प्रचार शुरू कर दिया। भारतीय मूल के अमेरिकी मतदाताओं की इतनी बड़ी संख्या एक ही जगह शायद उन्हें दोबारा नहीं देखने मिलेगी। इसीलिये वे अवसर का भरपूर दोहन करने से नहीं चूके। कई घंटों से कार्यक्रम  देख रहे लोग समझे कि अमेरिकी राष्ट्रपति के भाषण के बाद आयोजन संपन्न हो जाएगा। इस दौरान श्री मोदी मंच के नीचे प्रथम  पंक्ति में विशिष्ट अतिथियों के साथ बैठ-बैठे उनका भाषण सुनते रहे किन्तु उसके बाद वे दोबारा मंच पर आये और फिर हिन्दी में अपना लम्बा उद्बोधन देते हुए पूरी दुनिया को ये दिखा दिया कि भारत अब विश्वशक्ति के तौर पर व्यवहार करने का आत्मविश्वास अर्जित कर चुका है। श्री ट्रम्प की तरह से भारत के प्रधानमन्त्री ने भी अपनी सरकार की उपलब्धियों का प्रचार करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। उनके द्वारा ऐसा करना कोई नई बात नहीं थी क्योंकि वे अपनी हर विदेश यात्रा में भारत की मार्केटिंग करते आये हैं। लेकिन प्रधानमंत्री ने जब जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाये जाने का जिक्र करते हुई पूरे जनसमुदाय से उस ऐतिहासिक निर्णय के लिए भारत के सभी सांसदों का खड़े होकर अभिनंदन करने कहा तब वह न केवल श्री ट्रम्प अपितु पूरी विश्व बिरादरी को संदेश था। बिना नाम लिए उन्होंने इमरान खान पर ये कटाक्ष कर  दिया कि जिनसे अपना मुल्क नहीं  संभल रहा वे भारत के मामलों में टांग अड़ाते हैं। राष्ट्रपति ट्रम्प के सामने ही उन्होंने न्यूयार्क के 9/11 और मुम्बई के 26/11 आतंकवादी हमलों का जिक्र करते हुए पाकिस्तान को कठघरे में खड़ा करते हुए कहा कि दोनों हमलों के दोषी वहीं पाए गए। एक गैर राजनयिक आयोजन में श्री मोदी ये सब नहीं कहते लेकिन अव्वल तो श्री ट्रम्प ने अपने भाषण में इस्लामिक आतंकवाद  का इस्तेमाल करते हुए उन्हें मौका दे दिया दूसरी तरफ श्री मोदी के  दिमाग में ये बात भी मौजूद थी कि आयोजन के अगले दिन अर्थात  आज सोमवार को ही इमरान खान भी अमेरिकी राष्ट्रपति से मिलने वाले हैं। ये भी संयोग है कि कल मंगलवार को श्री मोदी भी उनसे औपचारिक मुलाकात करेंगे। उस दृष्टि से उन्होंने कल के भाषण में अमेरिका को संकेत दे दिया कि कश्मीर को लेकर भारत अपने रुख पर अडिग है  और इमरान को वह खास महत्व नहीं देता। कूटनीति में केवल बातचीत नहीं अपितु पृष्ठभूमि भी  काफी महत्वपूर्ण होती है। भले ही श्री मोदी को अंतर्राष्ट्रीय राजनीति का विशेष  पूर्व अनुभव न रहा हो लेकिन बीते पांच वर्ष के दौरान उन्होंने विश्व मंच पर भारत को एक ताकतवर देश के रूप में  पेश करते हुए दुनिया के सभी बड़े नेताओं के साथ जिस तरह के निजी रिश्ते कायम किये वह उनकी विलक्षण क्षमता का जीवंत प्रमाण है। राष्ट्रपति ट्रम्प को अस्थिर दिमाग वाला माना जाता है। इसीलिये कुछ लोगों का मानना है कि रात गई बात गई की तर्ज पर वे इमरान से मिलते समय ह्यूस्टन में जो कहा और सुना उसे भूलकर नया राग अलापने लग जाएँ तो आश्चर्य नहीं होगा। लेकिन व्यवसायी से व्हाईट हॉउस पहुंचे इस  शख्स को  श्री मोदी ने भारतीय मूल के अमेरिकी मतदाताओं पर अपनी पकड़ का एहसास करवाते हुए बिना लाग-लपेट के समझा दिया कि आगामी चुनाव में भारत की उपेक्षा उन्हें महंगी साबित हो सकती है। यहाँ ये भी उल्लेखनीय है कि कल ही अमेरिकी अखबारों में किसी वरिष्ठ  रिपब्लिकन सांसद ने भारत की कश्मीर नीति की आलोचना वाला लेख लिखा था। श्री मोदी द्वारा श्री ट्रम्प की प्रशंसा दरअसल उसी की प्रतिक्रिया के बतौर थी। कुल मिलकर ह्यूस्टन का समूचा आयोजन एक  बार फिर श्री मोदी की अनोखी संवाद क्षमता का बेहतरीन प्रदर्शन बन गया। कुछ लोग इसे भारत में दो राज्यों के चुनाव से भी जोड़कर देख रहे हैं, जो गलत नहीं है। लेकिन इस बारे में ये कहना ही पर्याप्त होगा कि प्रधानमंत्री हर अवसर का समुचित उपयोग करने में सिद्धहस्त हैं और यही उनकी सफलता का आधार है। रही बात इस आयोजन के आलोचकों की तो वे अप्रसांगिक होकर रह जायेंगे क्योंकि कल रात पूरे देश ने जो देखा और सुना वह किसी व्यक्ति या नेता का नहीं वरन भारत का गौरवगान था।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 21 September 2019

खुश हो गए कारोबारी : कब आयेगी जनता की बारी

जैसा कि अनुमानित था मोदी सरकार ने एक बार फिर सबको चौंकाया। मंदी की चौतरफा चर्चाओं के बीच गत दिवस जीएसटी काउन्सिल की गोवा में आयोजित बैठक पर पूरे कारोबारी जगत की निगाहें लगी थीं। हर किसी को उम्मीद थी कि काउन्सिल शाम तक अर्थव्यवस्था सम्बन्धी कोई न कोई खुशखबरी अवश्य देगी लेकिन बैठक शुरू होने के पहले ही वित्त मंत्री निर्मला सीतारमन ने जोरदार घोषणा करते हुए बताया कि केंद्र सरकार ने कार्पोरेट टैक्स की दरें घटाकर 22 फीसदी कर दी हैं। इसके प्रभावस्वरूप अधिभार वगैरह मिलकर यह टैक्स 25.17 फीसदी हो गया जो बजट में की गई वृद्धि के बाद 33 फीसदी से भी ज्यादा होने से न सिर्फ  घरेलू उद्योगपतियों को नागवार गुजरा अपितु विदेशी निवेशकों को भी रास नहीं आया जिसकी वजह से भारत में आया विदेशी धन वापिस जाने लगा और रुपया अमेरिकी डालर की तुलना में कमजोर होता गया। समूचे घटनाक्रम ने भारतीय अर्थव्यवस्था को लेकर बीते कुछ वर्षों में बनाये गए बहुरंगी चित्र को बदरंग कर दिया। भारी-भरकम बहुमत के साथ लौटी मोदी सरकार ने शुरुवात में ही अनेक ऐतिहासिक राजनीतिक फैसले लेकर जो प्रशंसा बटोरी थी वह आर्थिक मोर्चे पर व्याप्त अनिश्चितता की वजह से सवालों के घेरे में आ गई। चारों तरफ  से जैसी खबरें आ रही थीं उनसे ये आशंका प्रबल हो गई कि भारतीय अर्थव्यवस्था पतन के कगार पर जा पहुँची है और केंद्र सरकार स्थिति को संभालने में पूरी तरह से नाकाम साबित हो रही  है। ये भी कहा जाने लगा कि सरकार में बैठे लोग आर्थिक पेचीदगियों को समझ पाने में असमर्थ हैं। बेरोजगारी के बढ़ते आंकड़े भी चिंता का सबब बनते जा रहे थे। लोकसभा चुनाव तक मोदी सरकार पर उद्योगपतियों की हितचिन्तक होने का आरोप लगा करता था लेकिन बीते कुछ महीनों में पूरा कारोबारी जगत असंतुष्ट हो गया। जिस तरह से व्यापार और उद्योगों में सुस्ती आई उससे आम आदमी भी चिंता में पड़ गया। ये कहना गलत नहीं होगा कि सरकार इस दौरान दूसरे मोर्चों पर ज्यादा उलझी रहने से आर्थिक परिस्थितियों पर समुचित ध्यान नहीं दे सकी। यद्यपि बीच में रिजर्व बैंक ने ब्याज दरें घटाकर अर्थव्यवस्था को टेका लगाने की कोशिश की किन्तु उसका भी वांछित असर नहीं हुआ। हाल ही में जब वित्तीय वर्ष की पहली तिमाही में विकास दर के घटकर 5 फीसदी पर आने की जानकारी सार्वजानिक हुई त्योंही ये बात घर-घर में फैल गई कि देश की आर्थिक हालत गम्भीर अवस्था में जा पहुँची है। भले ही दावे कितने भी किये जा रहे हों लेकिन मोदी सरकार का कोई भी प्रवक्ता लोगों को आश्वस्त करने में कामयाब नहीं हो रहा था। जो उपाय किये गये वे भी कारगर नजर नहीं आये। आखिर में सरकार को ये लग गया कि उसके पास राहतों का पिटारा खोलने के सिवाय दूसरा चारा नहीं है। कारोबारी सुस्ती की वजह से जीएसटी की वसूली में भी चिंताजनक गिरावट आ गई। यहाँ तक कहा जाने लगा कि सरकार के पास विकास के लिए धन नहीं होने से वह रिजर्व बैंक सहित अन्य सरकारी उपक्रमों के पास सुरक्षित रखे गए कोष में से पैसा निकालकर काम चलाने में जुटी है। डूबने के कगार पर आ चुके कर्जों ने बैंकों की दशा भी बिगाड़कर रख दी। कुल मिलाकर जब सरकार को लगा कि साधारण दवाई असर नहीं कर रहीं तब उसने पहले तो कार्पोरेट टैक्स घटाकर उद्योग जगत को गदगद कर दिया जिसकी वजह से शेयर बाजार में रिकार्ड तेजी आ गई। ऐसा लगता है उससे जीएसटी काउन्सिल भी उत्साहित हो गयी और उसने भी शाम होते-होते तक तमाम रियायतों का एलान कर दिया। उन सबका सकारात्मक असर हुआ और कारोबारी जगत के अलावा आम जनता को भी ये लगा कि सरकार को उसकी तकलीफों का एहसास हुआ है। इन सब फैसलों का तात्कालिक असर कितना होगा इसके लिए थोड़ा इन्तजार करना पड़ेगा लेकिन दूरगामी प्रभाव को लेकर जो उम्मीदें व्यक्त की जा रही हैं यदि वे वास्तविकता में बदलीं तब जरुर अच्छे दिन आने की बात सच्चाई में बदल सकती है। हालाँकि ये भी कहा जा रहा है कि प्रधानमंत्री की अमेरिका यात्रा शुरू होने से पहले कार्पोरेट टैक्स के साथ ही जीएसटी में राहत महज संयोग नहीं बल्कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प से मुलाकात के पहले वहां के निवेशकों को रिझाने का सोचा समझा दांव है। चीन के साथ अमेरिका की कारोबारी तनातनी जिसे ट्रेड वार कहा जा रहा है, के चलते भारत के लिए अच्छे अवसर हो सकते हैं। जैसे संकेत हैं ट्रम्प के साथ नरेंद्र मोदी की भेंट के दौरान आर्थिक क्षेत्र में कुछ महत्वपूर्ण समझौते संभावित हैं। देश में कारोबारी माहौल अनुकूल बनाये बिना विदेशी निवेश की उम्मीद करना चूँकि बेकार होता इसलिए प्रधानमंत्री के रवाना होने के पहले ही सौगातों की बरसात कर दी गयी। यद्यपि इससे आर्थिक मोर्चे पर व्याप्त चिंताएं कुछ कम जरुर होंगीं लेकिन उनका असली असर तब माना जाएगा जब आम जनता या उपभोक्ता तक उसका लाभ पहुंचे। कारोबारियों की नाराजगी दूर करने के बाद अब सरकार से मध्यमवर्ग भी अपेक्षा करने लगा है कि कार्पोरेट टैक्स की तरह से ही उसे भी आयकर में वैसी ही छूट मिले जिससे उसके जेब में पैसा बचे और बाजार की मुर्दानगी दूर हो सके। सरकार के सलाहकारों को ये भी समझ लेना चाहिए  कि टैक्स की दरें कम रखने से सरकार को अपेक्षाकृत ज्यादा कमाई हो जाती है क्योंकि ज्यादा दरें टैक्स चोरी को प्रोत्साहन देती हैं। उस दृष्टि से उद्योग व्यापार जगत की नारजगी तो काफी हद तक दूर हो गयी  लेकिन अभी उस आम जनता को खुश करना बाकी है जिसकी दम पर नरेंद्र मोदी सत्ता में बने हुए हैं।

-रवीन्द्र वाजपेयी