Friday, 4 October 2019

कांग्रेस बन गई विपक्ष की कमजोरी का कारण



लोकतंत्र में विपक्ष की मजबूती एक अनिवार्य तत्व है। उस दृष्टि से अनेक लोग वर्तमान परिदृश्य को लेकर चिंतित रहते हैं। 2014 के बाद  2019 के लोकसभा चुनाव में भी विपक्ष बुरी तरह पराजित हुआ। कहां तो ये आशंका व्यक्त की जाने लगी थी कि भाजपा को अपनी दम पर बहुमत नहीं मिलेगा और उसे सहयोगी दलों की बैसाखी का सहारा लेना होगा। उस स्थिति में नरेन्द्र मोदी की ताकत घट जाती। ये सोचने वाले भी कम नहीं थे कि भाजपा के नेतृत्व वाला एनडीए बहुमत से पीछे रह जाएगा और तब कांग्रेस की अगुआई में विपक्षी गठबंधन सत्ता में आ जाएगा। लेकिन जब नतीजे  आये तब सबको चौंकाते हुए अकेले भाजपा ने 300 से ज्यादा सीटें जीतकर अपने दम पर स्थायी सरकार बनाने की ताकत हासिल कर ली। यद्यपि उसने एनडीए के अपने सहयोगियों को सत्ता में हिस्सेदारी भी दी जिसे नीतीश कुमार की जद (यू) को छोड़कर सभी ने चुपचाप स्वीकार कर लिया। जिस शिवसेना ने बीते पांच साल तक साथ रहते  हुए भी खूब मुंह चलाया वह भी दूसरी पारी में शालीनता दिखा रही है। महाराष्ट्र में विधानसभा सीटों के बंटवारे से ये साफ भी हो गया। नई लोकसभा में हालांकि कांग्रेस की सीटें 10 सीटें बढ़ गईं लेकिन तमाम दिग्गजों के हार जाने से उसकी रंगत फीकी पड़ गई। खुद राहुल गांधी अपनी पुश्तैनी अमेठी सीट नहीं बचा सके और केरल से लोकसभा पहुंचे। बहरहाल विपक्ष के कमजोर होने को लोकतंत्र के लिए खतरा मानने वालों की चिंता तब और बढ़ जाती है जब संसद और उसके बाहर कांग्रेस का प्रदर्शन बेहद लचर दिखाई देता है। इसकी असली वजह  शीर्ष स्तर पर व्याप्त नेतृत्व शून्यता और अनिर्णय की स्थिति है। लोकसभा चुनाव में करारी हार की जिम्मेदारी लेते हुए राहुल गांधी ने पार्टी का अध्यक्ष पद त्यागकर जिस नैतिकता का परिचय दिया वह तब पानी में चली गयी जब महीनों तक उनका उत्तराधिकारी तय नहीं हो सका और अंत में सोनिया गांधी को ही कार्यकारी अध्यक्ष बनाकर गाड़ी घसीटने का निर्णय किया गया। दूसरा उदाहरण मप्र का है। कमलनाथ ने मुख्यमंत्री बनने के बाद प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष पद त्यागने की पेशकश कर  दी लेकिन उनकी जगह कौन लेगा इसे लेकर पार्टी के अंदर ही रस्साकशी चल रही है। ऐसे ही नजारे हरियाणा और महाराष्ट्र में भी दिखाई दे रहे हैं। हरियाणा में भूपिंदर सिंह हुड्डा बगावत पर उतारू हो गए तब अशोक तंवर को हटाकर उन्हें पार्टी की बागडोर सौंप तो दी  गई लेकिन श्री हुड्डा के ताकतवर होने के बाद श्री तंवर पार्टी  की जड़ें खोदने पर आमादा हैं। उन्होंने चुनाव संबंधी समितियों से स्तीफा देते हुए आरोप लगा दिया कि हरियाणा में पार्टी हुड्डा कांग्रेस बन चुकी है। हरियाणा की आग महाराष्ट्र में भी जा पहुंची जहां मुम्बई कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष और उत्तर भारतीयों के नेता के रूप में स्थापित संजय निरुपम ने टिकिट वितरण के विरोध में पार्टी का प्रचार करने से मना करते हुए यहां तक कह दिया कि उम्मीद है पार्टी को गुड बाय कहने की नौबत नहीं आयेगी। इन दोनों राज्यों में पार्टी के अनेक दिग्गज नेता और विधायक कांग्रेस छोड़ चुके हैं। कांग्रेस समर्थक माने जाने वाले विश्लेषक भी कह  रहे हैं कि दोनों जगह कांग्रेस की हालत पतली ही नहीं बेहद पतली है। इसकी वजह राज्य में पार्टी की अंतर्कलह से ज्यादा केन्द्रीय स्तर पर व्याप्त दिशाहीनता है। महत्वपूर्ण राष्ट्रीय मुद्दों पर अपना दृष्टिकोण स्पष्ट करने में विफलता ने कांग्रेस को  अंतर्विरोधों में ही उलझाकर रख दिया है। अनुच्छेद 370 पर अनेक वरिष्ठ नेताओं के बयान पार्टी नीति से अलग आना इसका प्रमाण है। नई संसद के पहले सत्र में सदन के भीतर उसका प्रदर्शन भी प्रभावहीन रहा। विपक्षी महागठबंधन की कोशिशें तो पहले ही बीच रास्ते  में दम तोड़ चुकी हैं। आज की तारीख में पूरे देश में विपक्ष का जो बिखराव है उसके लिए कांग्रेस ही सबसे ज्यादा जिम्मेदार है जिसके कारण क्षेत्रीय दल भी उससे छिटकने लगे। भाजपा यदि इस परिस्थिति का लाभ लेकर अपने को मजबूत कर रही है तो ये उसकी अक्लमंदी कही जायेगी। ऐसा नहीं है कि कांग्रेस और विपक्ष में बैठी शेष पार्टियों के पास मोदी सरकार और भाजपा को कठघरे में खड़ा करने के लिए मुद्दे कम हों। लेकिन उनकी समझ में नहीं आ रहा कि वे  करें तो करें क्या? उप्र ने पहले कांग्रेस और सपा का गठबंधन देखा और उसके बाद सपा और बसपा का। लेकिन आज की स्थिति में ये तीनों अलग हैं। बिहार में कांग्रेस लालू से पिंड छुड़ाना चाह रही है। आन्ध्र में उसके सहयोगी बने चंद्रा बाबू नायडू की लुटिया डूब चुकी है। तमिलनाडु में भी वह पूरी तरह से द्रमुक पर निर्भर है। पंजाब में जो सफलता मिली थी वह सिद्धू और अमरिंदर की लड़ाई में चमकविहीन  हो गयी। मप्र और राजस्थान में भी गुटबाजी बढ़ती जा रही है जिसे रोकने का कोई प्रयास नजर नहीं आ रहा। केवल छत्तीसगढ़ में ही कांग्रेस की दशा और दिशा ठीक है वरना तो वह पूरी तरह हाशिये की तरफ  तेजी से बढ़ रही है। देश की  सबसे पुरानी पार्टी का इस तरह कमजोर होता जाना लोकतंत्र के लिए अच्छा संकेत नहीं है। उसका यह आशावाद भी हवा - हवाई है कि 1984 में भाजपा भी तो लोकसभा में 2 सीटों पर आ गयी थी जबकि आज पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में है। कांग्रेस भूल जाती है कि भाजपा ने अपने संगठन के साथ ही जनता की भावनाओं को समझते हुए नीतियां बनाकर वापिसी की किन्तु कांग्रेस न तो अपने चरमराते संगठन की मरम्म्त पर ध्यान दे रही है और न ही जनता की नब्ज पर हाथ रखने का उसे ध्यान है। ये बात पूरी तरह से सही है कि भले ही देश में पार्टियों की भरमार हो लेकिन राष्ट्रीय स्तर के विकल्प के रूप में कांग्रेस पर ही लोगों की निगाह जाती है और उस लिहाज से यदि देश में विपक्ष को मजबूत बनाना है तो कांग्रेस को दोबारा खड़ा होना पड़ेगा। लेकिन मौजूदा सूरते हाल में तो उसकी संभावना नहीं लग रही। यदि हरियाणा और महाराष्ट्र विधानसभा के चुनाव नतीजे भी  जैसी संभावनाएं व्यक्त की जा रही हैं, वैसे ही आये तब तो कांग्रेस के भविष्य पर मंडराने वाले काले बादल और गहरे हो जायेंगे।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 3 October 2019

समाधि महात्मा की: नाम राजघाट



गांधी जी की 150 वीं जयंती पूरी देश में धूमधाम से मनाई गयी। विविधताओं का देश होने से सभी ने अपने-अपने ढंग से गांधी जी को पूजा और सराहा। इस दौरान ये जताने की कोशिश भी हुई कि उनका असली वारिस कौन है। कोई रैली निकाल रहा था तो कोई पदयात्रा के जरिये उनसे अपनी निकट रिश्तेदारी साबित करने की कोशिश में जुटा था। सभाओं, गोष्ठियों और सांस्कृतिक आयोजनों के जरिये भी महात्मा जी को याद करने की औपचारिकता का निर्वहन किया गया। संसद भवन से साबरमती आश्रम तक उनके प्रति श्रद्धा का उद्घोष किया गया। इस दौरान आरोप-प्रत्यारोप भी हुए जिसका उद्देश्य गांधी पर अपना पक्का कब्जा जताने की कोशिश ही थी। प्रधानमंत्री और उनकी पार्टी ने देश को खुले में शौच से मुक्त कराने का श्रेय लूटा तो कांग्रेस ने उन पर बीते पांच वर्षों में बापू की आत्मा को दुखी करने की तोहमत थोप दी। राज्यों में भी अपनी-अपनी पसंद और सुविधानुसार राष्ट्रपिता के प्रति लगाव दर्शाने का प्रयास किया गया। बीते सत्तर साल में बापू के उपदेशों की धज्जियां उड़ाने वालों ने नये सिरे से उनमें निवेश करने की दिशा में कदम उठाते  हुए उनके नाम  पर स्तंभ, पीठ और स्मारक बनाकर खाने-पीने के नए रास्ते भी तलाश  लिए। चूंकि गांधी को संसार छोड़े हुए सात दशक से ज्यादा हो गए  इसलिए उन पर किसी का कापीराईट नहीं रहा। यही वजह है कि गांधी जी के अपने परिवार को पीछे रखते हुए उनके नये रिश्तेदार माहौल पर कब्जा करते नजर आये। राजघाट तो खैर, ऐसे अवसर पर रेडीमेड सरकारी पर्यटन केंद्र बन ही जाता है लेकिन देश में जहां-जहां गांधी जी के चरण कभी भी पड़े उन सभी स्थानों को लीप-पोतकर उनकी उपस्थिति को महसूस करने का प्रयास हुआ। संभवत: गांधी जी ही एकमात्र ऐसे व्यक्ति हैं जो पूरे देश में लोगों के साथ सीधे जुड़े और जहां भी गये अपनी छाप छोड़कर आये। यही वजह थी कि गत दिवस पूरे देश ने उन्हें याद करते हुए उनके कृतित्व के प्रति अपना आभार व्यक्त किया। लेकिन इस दौरान भी वह कटुता नहीं मिट सकी जो वे चाहते थे। किसी ने  गांधी जी की ह्त्या को मुद्दा बनाया तो किसी ने उनके विचारों को दफन करने के लिए दोषारोपण करने की पुरजोर कोशिश की। राष्ट्रपिता कहलाने वाले एक युगपुरुष को श्रद्धांजलि देते समय भी राष्ट्रीय एकता की बजाय खेमेबाजी के शर्मनाक प्रदर्शन ने उनकी आत्मा को निश्चित तौर पर दु:ख पहुँचाया होगा। ये सब देखने के बाद सवाल उठ खड़ा होता है कि गांधी-गांधी करने के बाद भी उनकी इच्छाओं और उपदेशों के प्रति क्या अपेक्षित सम्मान का भाव हमारे नेताओं और उनके अनुयायियों में है? यदि होता तब गत दिवस अच्छी-अच्छी बातों के बीच जहर  बुझे तीर नहीं छोड़े जाते। बरसों पहले स्व. हरिशंकर परसाईं ने एक व्यंग्य लिखा था। जिसमें गणेश विसर्जन  के जुलूस में इस बात पर विवाद होने का जिक्र था कि उच्च जाति के लोगों द्वारा रखी गयी प्रतिमा से आगे नीची जाति के लोगों की प्रतिमा कैसे चल रही थी। उनका आशय ये था कि लोगों की आस्था भगवान गणेश में कम और अपनी कथित जातिगत श्रेष्ठता में ज्यादा थी। परसाईं जी तो नहीं रहे लेकिन उनका वह कटाक्ष गत दिवस गांधी भक्ति को लेकर हुए विवाद के रूप में फिर ताजा हो  गया। महात्मा जी ने जीते जी ही कह  दिया था कि उनके विचारों को किसी दर्शन का नाम नहीं दिया जाए क्योंकि उनमें विभिन्न विचारों का संग्रह है। फिर भी सत्य और अहिंसा को उनके नाम पर चस्पा कर दिया गया। इस पर किसी को ऐतराज  भी नहीं है क्योंकि वे जीवन भर इन दोनों का भरसक पालन भी करते रहे। लेकिन परेशानी तब हो जाती है जब गांधी दर्शन से अभिप्राय गांधी को दर्शनीय बनाने से लगा लिया जाता है। हमारे देश की समूची व्यवस्था गांधी जी को हाजिर नाजिर मानकर संचालित होती है। वैध-अवैध सभी प्रकार का लेनदेन जिस मुद्रा के माध्यम से किया जाता है उस पर भी मुस्कुराते बापू नजर आते हैं। इस तरह उनके योगदान का मूल्यांकन हर कोई अपनी अंटी में रखे रूपये के नोट के मुताबिक करने लगा है। 150  वां जन्मदिन मनाकर महात्मा जी के गौरवगान  के साथ ही केंद्र और राज्यों की सरकारों  ने उनके नाम पर अर्जित कुछ उपलब्धियों और कुछ नये कार्यक्रमों का ऐलान करते हुए अपने कर्तव्य की इतिश्री कर ली। आचरण की बजाय उन्हें भी आंकड़ों की विषयवस्तु बना दिया गया। बेहतर होता इस अवसर पर बीते सात दशकों का हिसाब-किताब तैयार करते हुए देश और दुनिया को ये बताया जाता कि हमने किस हद तक गांधी जी को धोखा दिया और उनकी कही गईं किन-किन बातों को राजघाट के पीछे बहने वाली प्रदूषण की प्रतीक यमुना में सडऩे फेंक दिया गया?  सही बात तो ये है कि गांधी जी, सिद्धान्तों की ओट लेकर सत्ता  हथियाने का जरिया मात्र  बनकर रह गए हैं। उनके नाम से किसी को परहेज नहीं है  लेकिन उनके कामों को दोहराने के प्रति अरुचि  भी कम नहीं है। एक फकीराना जीवन जीने वाले महात्मा जैसे व्यक्ति  की समाधि का नाम राजघाट रखा जाना भी विरोधाभास नहीं तो और क्या है?

-रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 2 October 2019

बापू: उनकी वैश्विक प्रासंगिकता ही सबसे बड़ा सम्मान

आज महात्मा गांधी की 150 वीं जयन्ती है । वे एक ऐसे इंसान थे जिनका जीवन दो शताब्दियों में बंटा हुआ था  लेकिन अपनी मृत्यु के सात दशक बाद 21 वीं सदी में भी वे उतने ही प्रासंगिक और स्वीकार्य बने हुए हैं तो उसका कारण उनका अत्यंत विस्तृत कार्यक्षेत्र था जिसमें मानव जीवन से जुड़ी हर छोटी बड़ी चीज के लिए कुछ न कुछ था । यही वजह रही कि वे अपने जीते जी ही एक किंवदंती बनते हुए हुए वैश्विक जिज्ञासा का विषय हो चुके थे । जिस ब्रिटिश साम्राज्य को भारत से उखाड़  फेंकने के लिए उन्होंने अपना समूचा जीवन लगा दिया वह भी उन्हें पूरी तरह तिरस्कृत करने का दुस्साहस नहीं कर सका । वरना राजद्रोह के  आरोप में वह उन्हें भी अपने रास्ते से हटा देता । हालाँकि इस बारे में ये कहने वाले भी कम नहीं हैं कि उनका अहिंसक आन्दोलन अंग्रेजों को क्रांतिकारियों की अपेक्षाकृत ज्यादा सुविधाजनक प्रतीत होता था ।  इसलिए सुनियोजित तरीके से उन्होंने  बापू को ही स्वाधीनता संग्राम के नेता के तौर पर स्वीकार भी किया और स्थापित भी । लेकिन इस सबसे अलग हटकर भी उनका योगदान भारतीय समाज के लिए था जिसे पुनर्जागरण के लिहाज से देखा जाना कहीं बेहतर होगा । अछूतोद्धार , गाम स्वराज और  स्वदेशी जैसी बातें उन्होंने उस दौर में कीं जब भारतीय समाज पूरी तरह से दिशाहीनता  और नेतृत्व शून्यता का शिकार था । दक्षिण अफ्रीका से लौटे बैरिस्टर एम.के गांधी का महात्मा के तौर पर रूपांतरण उन्नीसवीं सदी के रुढि़वादी भारतीय समाज के लिए  बहुत बड़ा वैचारिक बदलाव था । ऐसा नहीं है कि उनके पहले किसी ने आजादी के बारे में सोचा नहीं हो । गांधी जी के जन्म से 12 वर्ष पहले ही 195। की क्रांति हो चुकी थी । लोकमान्य तिलक और गोपालकृष्ण गोखले जैसे स्वाधीनता के प्रवक्ता भी उनसे पहले ही सक्रिय थे लेकिन ये कहना पूरी तरह सही होगा कि आजादी की ललक को जन - जन में पैदा करने का जो कारनामा उस फकीरनुमा इंसान ने कर दिखाया वह इतिहास होने के बाद भी आज तक जीवंत है । उनकी लड़ाई यूँ तो राजनीतिक नजर आती थी लेकिन गांधी जी ने सत्ता के साथ ही समाज की व्यवस्था और सोच को भारतीय परिवेश के अनुसार ढालने का जो प्रयास किया वह उनका असली योगदान था । वे केवल आजादी की लड़ाई को ही अपना मिशन बनाते तब शायद इतिहास उनके लिए इतना उदार नहीं होता । लेकिन गांधी जी ने अपने समकालीन भारत ही नहीं बल्कि समूचे विश्व को प्रभावित किया क्योंकि उनका समूचा चिंतन और कार्यशैली मानवता के बेहद करीब थी । यही वजह रही कि वे जीते जी विश्व मानव के तौर पर स्वीकार्य हो गये थे । भारतीय समाज की ताकत और कमजोरियों को जितनी बारीकी से उन्होंने समझा उसके कारण उन्हें एक सिद्धहस्त मनोवैज्ञानिक कहना भी गलत नहीं होगा । जातियों में बंटे समाज को एकजुट करते हुए रचनात्मक कार्यों के लिए प्रेरित करने का कार्य उनसे बेहतर  किसी ने नहीं किया । भारत लौटने के कुछ समय बाद ही वे इस वास्तविकता से अवगत हो चुके  थे कि आजादी की लड़ाई सीधे शुरू करना आत्मघाती हो सकता है और इसीलिये उन्होंने एक कुशल सेनापति के रूप में समाज के हर तबके को एकजुट किया जिसे अंग्रेज जब तक समझ पाते तब तक बहुत देर हो चुकी थी ।  अहिंसा के प्रति उनका आग्रह जिद की हद तक था जिसे लेकर आज  भी उनकी आलोचना की जाती है । ये भी कहा जाता है कि अहिंसा के जरिये मिली आजादी का मोल भारत के लोग चूँकि नहीं समझे इसीलिये सत्तर साल बाद भी हमारा देश उन लक्ष्यों को हासिल करने में सफल  नहीं हो सका जिनका सपना 15 अगस्त 194। को देखा और दिखाया गया था । लेकिन  गांधी जी का व्यक्तित्व और कृतित्व इतना बड़ा  और व्यापक था कि उसको सीमित दायरे में रखकर उनका मूल्यांकन करना नासमझी होगी । गांधी जी आजादी के बाद ज्यादा समय नहीं रहे और उनकी तासीर जैसी थी उसके मुताबिक यदि रहते तब वे दोबारा संघर्ष के रास्ते पर चल पड़ते । आज उनके 150 वें जन्मदिवस पर देश और दुनियाँ में बहुत कुछ हो रहां है । उनकी प्रशंसा में अखबारों के पन्ने भरे हुए हैं लेकिन गांधी का सपना किस तरह अधूरा है उसकी एक बानगी गत दिवस देश के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दलितों पर अत्याचार संबंधी  एक निर्णय से मिली । सात दशक बीत जाने के बाद भी भारत में जातिगत भेदभाव मिटना तो दूर और बढ़ गया है जिसके लिए वे सब कसूरवार हैं जिन्होंने गांधी जी की फर्जी वसीयतें बनवाकर खुद को उनका मानस पुत्र घोषित कर रखा है । केवल बाहरी स्वच्छता का अभियान  चलाकर गांधी जी के प्रति श्रद्धा सुमन अर्पित कर देना पर्याप्त्त नहीं होगा । साबरमती के संत के प्रति सबसे बड़ा सम्मान तब होगा जब हम अपना मन भी स्वच्छ कर लें । भले ही उन्हें नोबल जैसे पुरस्कार से वंचित रखा गया हो लेकिन महात्मा जी की वैश्विक प्रासंगिकता उनका सबसे बड़ा  सम्मान है । डेढ़ शताब्दी पहले जन्मे एक इंसान ने जिस प्रभावशाली ढंग से पूरी दुनिया को रास्ता दिखाया उसके आधार पर ये  कहना गलत नहीं  होगा कि उनके बाद उन जैसा महामानव आज तक दूसरा कोई नहीं जन्मा ।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 1 October 2019

भौतिक सम्पन्नता ने बना दिया गरीब

सुबह - शाम बेटों - बहुओं के फोन आ रहे हैं । बेटी - दामाद भी दिन में कई मर्तबा Get well soon कहने की रस्म अदायगी कर देते हैं।

दरअसल घर में फिसलकर गिरी माँ को चिकित्सकों ने एक महीने तक बिस्तर से उठने तो क्या हिलने - डुलने तक से रोक दिया है । उसकी तीमारदारी के लिए घर की नौकरानी ही एकमात्र है लेकिन उसके भी बाल बच्चे हैं । सो बीच -बीच में चली जाती है । माँ ने खाना -पीना न के बराबर कर दिया है। वरना जरूरत के समय कौन सहायता करेगा।

पड़ोसी आते हैं । हमदर्दी के साथ समय भी देते हैं। लेकिन कई घण्टे कमरे की छत अकेले ताकते रहने की बाध्यता का कोई इलाज नहीं है ।

डॉक्टर हौसला अफजाई के लिए एक महीना बता तो गए लेकिन क्या पता कितना वक्त लगे ? देखने वाले विचलित हो जाते हैं लेकिन सबके अपने -अपने गम हैं।

ये स्थिति किसी एक की नहीं अनगिनत वृद्धों की है ।

सीनियर सिटीजन दिवस पीछे छूट गया है लेकिन जिनके लिए वह मनाया जाता है वे एकाकीपन नामक सजा भोगने मजबूर हैं । बच्चों को आगे बढ़ाने के फेर में उनकी जिन्दगी ठहरकर रह गई।

कहने को सब कुछ है । बड़ा सा मकान , सुख - सुविधा के साधन , बैंक बैलेंस , और भरा -पूरा लेकिन देश - विदेश में बिखरा परिवार ।

भारत को युवाओं का देश कहा जाने लगा है लेकिन साथ ही यह उपेक्षित और एकाकी वृद्धजनों का भी मुल्क बनता जा रहा है ।

दो दिन पहले ही  श्राद्ध पक्ष समाप्त हुआ। दिवंगत पितरों के प्रति अपेक्षित कर्मकांड भी देश भर में हुआ लेकिन अकेले रह रहे जीवित माता -पिता की अतृप्त इच्छाओं को पूरा करने का प्रयास या तो मजबूरियों का शिकार है या लापरवाही का ।

कभी - कभी लगता है पुराने गांव और मोहल्ले ही अच्छे थे जहां हर कोई अपना सा लगता था ।

भौतिक सम्पन्नता ने सही मायनों में हमें गरीब बना दिया । रिश्तों की जो दौलत थी वह भी जमीन में गड़े उस खजाने जैसी होकर रह गई जो न तो मिलता है और न ही उसका मोह छूटता है।

-रवीन्द्र वाजपेयी

हनीट्रैप : ट्रेलर आया पिक्चर बाकी

मप्र में इन दिनों जिस हनीट्रैप की चर्चा हर किसी की जुबान पर है उसे लेकर रोचक बात ये है कि जिन महिलाओं ने अपने मोहपाश में राजनेताओं और सरकारी अधिकारियों को फंसाकर पैसे ऐंठे उनके नाम और चेहरे तो सामने आ गए लेकिन जो लोग इन सुन्दरियों के जाल में फंसे उनके नाम हालांकि संचार माध्यमों विशेष रूप से सोशल मीडिया पर उछल रहे हैं लेकिन उनमें से किसी ने भी अभी तक ये कहने का साहस नहीं दिखाया कि ये सब असत्य और उनके चरित्र हनन का षडय़ंत्र है। अनेक वीडियो भी सार्वजनिक हो चुके हैं जिनमें कई पूर्व और वर्तमान नेता शर्मनाक स्थिति में देखे जा सकते हैं। कुछ समय पहले एक वरिष्ठ अधिकारी का ऐसा ही वीडियो उजागर होने के बाद उन्हें पद से हटा दिया गया था। जैसे दावे किये जा रहे हैं उनके अनुसार पूर्व हो चुके एक राज्यपाल और मुख्यमंत्री के अलावा सांसद रहे अनेक नेता भी हनीट्रैप में फंसे थे। कुछ वर्तमान जनप्रतिनिधियों के दामन पर भी दाग बताये जा रहे हैं। ये मामला केवल देह व्यापार का न होकर सीधे-सीधे भयादोहन का है। जिन महिलाओं ने इस पूरे मामले को अंजाम दिया उन्होंने शासन और प्रशासन के उच्च पदों पर बैठे लोगों की चारित्रिक कमजोरी का लाभ उठाते हुए जमकर आर्थिक लाभ अर्जित किया। नगद राशि, जमीन-जायजाद और सुख-सुविधा के तमाम साधन भी उसी से जुटाए गए। ये कारोबार बरसों से चला आ रहा था। जब इंदौर के एक इंजीनियर ने ब्लैकमेल में माँगी जा रही बड़ी रकम देने में असमर्थ होने पर पुलिस में शिकायत की तब जाकर भंडाफोड़ हुआ और उसके बाद पुलिस के हाथ वे रिकार्डिंग्स आईं जिनके जरिये वे फंसे हुए नेताओं और अफसरों से वसूली किया करती थीं। मामला खुला तो पुलिस भी सक्रिय हुई। जाँच दल बना लेकिन उसमें भी ताबड़तोड़ बदलाव हुए। सम्बन्धित थाना के प्रभारी हटा दिए गए। जिस वरिष्ठ अधिकारी को जाँच का मुखिया बनाया गया वह बीच में ही छोड़कर अलग हो गया। और उसके बाद पुलिस महानिदेशक स्तर के दो अधिकारियों के बीच शीतयुद्ध शुरू होने से जांच की दिशा भटकने का खतरा भी नजर आने लगा। विवाद सार्वजनिक होने पर मुख्यमंत्री कमलनाथ को हस्तक्षेप करना पड़ा और गत दिवस उन्होंने प्रदेश के दो-तीन सर्वोच्च अधिकारियों को बिठाकर उनकी खिंचाई करते हुए इस बात पर ऐतराज भी जताया कि बीते कुछ महीनों से किसके कहने पर इस कांड की निगरानी चल रही थी और खुलासा होने पर जाँच के लिए एंटी टेररिस्ट दल को क्यों लगाया गया ? मुख्यमंत्री ने और क्या-क्या कह़ा ये तो पता नहीं चला लेकिन जिस तरह दो वरिष्ठ पुलिस अधिकारी खुलेआम लड़े और उसके बाद कमलनाथ को बैठकर पंचायत करवानी पड़ी उससे ये साबित हो गया कि मामला बेहद संगीन है और जाँच में सच्चाई उजागर किये जाने की बजाय उस पर पर्दा डालने की चाल चली जा रही है। इसकी वजह केवल नेताओं का ही नहीं अपितु पुलिस और प्रशासन के तमाम अधिकारियों का भी फंसना है। सबसे बड़ी बात ये है कि हनीट्रैप के जरिये जो गलत-सलत काम करवाए गए उनका खुलासा होने पर पूरा प्रशासनिक ढांचा ही कठघरे में खड़ा हो जायेगा। कमलनाथ की समूची राजनीति का आधार प्रशासनिक अधिकारी ही रहे हैं और इस कांड में उनके कुछ चहेते अफसरों के चेहरों पर भी कालिख पुतने की आशंका को खारिज नहीं किया जा सकता। ये बात भी सही है कि जो महिलाएं पकड़ी गईं हैं वे सब बेहद शातिर और निडर होने से किसी के बारे में भी मुंह खोलकर अप्रत्याशित धमाका कर सकती हैं। यही वजह है कि उनके पास से जप्त वीडियो फिल्मों को लेकर जबर्दस्त गोपनीयता बरती जा रही है। वैसे एक चर्चा ये भी है कि उनका उपयोग राजनीतिक ब्लैकमेलिंग के लिए भी किया जा सकता है जिसका उद्देश्य राज्य सरकार के स्थायित्व पर मंडराने वाले खतरे को पूरी तरह से समाप्त कर देना है। गौरतलब है कि जबसे ये मामला प्रकाश में आया उसके बाद कमलनाथ सरकार को गिराने की भाजपाई हुंकारें शांत होकर रह गईं हैं। हो सकता है इसीलिये मुख्यमंत्री ने वरिष्ठ अधिकारियों को ज्यादा तेजी दिखाने से रोका हो। ये भी सच है कि जितनी देर होती जायेगी सबूतों से छेड़छाड़ की आशंका उतनी ही बढ़ती जायेगी। वैसे ये प्रकरण नेताओं और अधिकारियों की बजाय समाज के किसी और वर्ग से सम्बंधित होता तब शायद अभी तक तो पुलिस के सूरमा पत्रकार वार्ता करते हुए अपनी पीठ ठोंकने का पराक्रम दिखाते नजर आते लेकिन मामला चूंकि शासन और प्रशासन से जुड़े बड़े लोगों का है इसलिए बड़े-बड़े परदे खींच दिए गए हैं। बहरहाल ये सवाल जोरदारी से उठ रहा है कि जिन नेताओं और बाकी लोगों के नाम हनीट्रैप में चर्चित हो रहे हैं उनमें से कोई अभी तक अपना चरित्र प्रमाणपत्र लेकर मैदान में नहीं उतरा। ये भी कहा जा रहा है कि जिनके नाम अभी तक चर्चा में और करतूत कैमरे में नहीं आईं उनमें से भी अनेक सफेदपोशों के माथों पर पसीने की बूंदें छलछला रही हैं। ये कहना भी गलत नहीं होगा कि जो सामने आया वह तो ट्रेलर मात्र है। पूरी पिक्चर अभी बाकी है।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 30 September 2019

कभी प्याज, कभी दाल तो कभी आलू और टमाटर


आखिर केंद्र सरकार ने प्याज के निर्यात पर प्रतिबन्ध लगाकर घरेलू बाजारों में उसकी आसमान छूती कीमतों पर लगाम लगाने की तैयारी कर ली। ये काम हर साल होता है। चूंकि प्याज के दाम और सियासत का सीधा रिश्ता बरसों पहले जुड़ चुका है इसलिए बरसात आते ही केंद्र और राज्य दोनों सरकारें इसे लेकर चिंता में डूब जाती हैं। सरकारी दावे के मुताबिक प्याज के पर्याप्त स्टाक के बावजूद जब कीमतें उछलती हैं तब सस्ती दरों पर प्याज की आपूर्ति का कर्मकांड भी किया जाता है। दिल्ली में केजरीवाल सरकार फिलहाल ऐसा कर रही है। इसकी वजह जनता की भलाई से ज्यादा चुनाव में होने वाले नुकसान की चिंता होती है। केंद्र सरकार ने कल जो रोक लगाई उसे पहले भी लगाया जा सकता था लेकिन तब प्याज उत्पादक किसान उसके उपर चढ़ बैठता। कुल मिलाकर इस मामले में सरकार दो पाटों के बीच फंसकर रह जाती है। महाराष्ट्र के नासिक और उसके आसपास के इलाकों से अक्सर इस बात की खबरें आती हैं कि प्याज उत्पादक किसानों को उचित मूल्य नहीं मिलने से वे घाटे में आ गए। कई बार तो ऐसी स्थिति भी बन जाती है कि किसान को अपना प्याज मंडी में लाकर बेचना महंगा सौदा लगता है जिसके कारण वह उसे सड़कों पर फेंक देता है। उप्र से ऐसी खबरें आलू के बारे में भी आती हैं। शिवराज सरकार के जमाने में मप्र के मंदसौर इलाके में प्याज के भरपूर उत्पादन के बाद जब किसानों को वांछित मूल्य नहीं मिला तब वे आन्दोलन पर उतर आये। गोली चली और कुछ मौतों के बाद जमकर राजनीति हुई। डरी-सहमी राज्य सरकार ने छह रूपये किलो की दर से प्याज खरीदकर प्रदेश भर में पहुँचाने का बीड़ा उठाया लेकिन वह कोशिश भी भ्रष्टाचार के शिकंजे में फंसकर विवादग्रस्त हो गई। प्याज और सियासत का सीधा रिश्ता कई दशक पहले शुरू हुआ था। वरना बरसात में उसके दाम पहले भी बढ़ा करते थे। अब सवाल ये उठता है कि कि केवल प्याज की कीमतों पर ही बवाल क्यों मचता है और क्या वह ऐसी चीज है जिसके बिना काम नहीं चल सकता? बरसात में और सब्जियाँ भी अपेक्षाकृत महंगी हो जाती हैं लेकिन प्याज को गरीबों से जोड़कर जनचर्चा का विषय बनाया जाने लगा। आर्थिक मंदी के दौर में किसी भी चीज के निर्यात पर रोक लगाना अटपटा लग सकता है। खास तौर पर तब जबकि प्याज उत्पादकों को उससे लाभ होता हो। ऐसा ही उस समय भी हुआ था जब दालों की कीमतें नियंत्रण से बाहर होती जा रही थीं। सरकार किसानों और उपभोक्ताओं के बीच संतुलन बनाने के लिए अपनी तरफ  से जो बनता है वह करती है लेकिन उसका समय चयन और पूर्वानुमान गलत होने से अच्छी कोशिश भी बेअसर और अक्सर नुकसानदेह होकर रह जाती है। प्याज इसका सबसे अच्छा उदाहरण है। चूंकि यह मामला उपभोक्ता से जुड़ा हुआ है इसलिए आम जनता को भी इसमें सहज रूचि होने लगती है। लोगों का एक वर्ग ऐसा भी है जो ऐसी स्थिति में किसानों द्वारा बनाये जाने वाले दबाव को अनुचित मानता है। ऐसा कहने वाले भी कम नहीं हैं कि ऊंचे मूल्य पर अपना उत्पादन बेचते समय जनता की मुसीबतों की तरफ  तो किसान ध्यान नहीं देता लेकिन जब उसे वाजिब दाम नहीं मिलते तब वह सरकार पर चढ़ बैठता है। इस बारे में किसानों की तरफ से सफाई दी जाती है कि जब दाम काम मिलते हैं तब तो उसे नुकसान उठाना पड़ता है लेकिन कीमतें बढ़ते समय बिचौलिए उसका लाभ लेते है जबकि उसके पल्ले अतिरिक्त कुछ नहीं आता। बाजार में होने वाले इन उतार - चढ़ावों को नियंत्रित करते हुए उपभोक्ताओं के हितों की सुरक्षा करने हेतु सरकार खरीदी करती जरुर है लेकिन न तो उसके पास समुचित भण्डारण व्यवस्था है और न ही वितरण प्रणाली के भ्रष्टचार को रोकने में उसका तन्त्र सफल हो सका है। निजी क्षेत्रों को गोदामें बनाने हेतु ऋण देकर भंडारण समस्या को हल करने का प्रयास भी सही परिणाम नहीं दे सका क्योंकि सरकारी विभागों की तरफ  से गोदाम मालिकों को दिए जाने वाले भुगतान में भी भर्राशाही का बोलबाला है। ये सब देखते हुए कहना गलत नहीं होगा कि सरकार जब तक समस्या के तात्कालिक समाधान की सोच से चलेगी तब तक इस तरह की दिक्कतें बनी रहेंगी। अर्थशास्त्र से जुड़े अनेक लोगों का ये भी मानना है कि सरकार का काम व्यापार करना नहीं बल्कि व्यापार को कानून के अनुसार चलाने की व्यवस्था करना है जिसमें उत्पादक, व्यापारी और उपभोक्ता तीनों के हित सुरक्षित रहें। दुर्भाग्य से हमारे देश में एक पक्ष को राहत दो तो दूसरा मुसीबत में आ जाता है। एक वर्ष दाम ज्यादा मिलने से अगले वर्ष उसी चीज का उत्पादन जरूरत से ज्यादा हो जाने से कीमतों में गिरावट आ जाती है जिसके बाद किसान चिल्लपुकार करने लगता है वहीं व्यापारियों पर ज्यादा लगाम लगाने पर कारोबारी जगत नाराज हो उठता है। लेकिन इन सबके बीच आम जनता या उपभोक्ता के हितों को सुरक्षित करने की कोई पुख्ता व्यवस्था नहीं है। आज प्याज रुला रहा है तो कल कुछ और परेशान करेगा। आलू और टमाटर भी जब राष्ट्रीय विमर्श का विषय बन जाते हैं तब आश्चर्य होता है। केंद्र और राज्य सरकारों को इस बारे में गंभीरता से अध्ययन करते हुए सभी पहलुओं पर ध्यान समय रहते समुचित कदम उठाना चाहिए, अन्यथा हर साल ये रोना लगा रहेगा।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 28 September 2019

इमरान: न गहराई न गम्भीरता

संरासंघ की महासभा में गत दिवस भारत के प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी ने एक जिम्मेदार वैश्विक नेता के तौर पर समकालीन समस्याओं और उनके हल में भारत की भूमिका का प्रभावशाली प्रस्तुतीकरण किया और  विश्व को आतंकवाद के विरूद्ध भारत की चिंता और आक्रोश दोनों से अवगत करवाते हुए कहा कि भारत ने दुनिया को युद्ध नहीं शान्ति के प्रतीक बुद्ध दिए हैं | श्री मोदी ने प्रकृति , पर्यावरण , कार्बन उत्सर्जन , बढ़ते तापमान और विभाजित विश्व जैसे विषयों पर गम्भीर बातें कहते हुए जहां विश्व बिरादरी के समक्ष भारत की छाप छोड़ी वहीं उनके बाद दिए अपने लम्बे भाषण में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने भारत को गरियाया तथा  काश्मीर में खूनखराबा होने के  साथ ही  एक बार फिर परमाणु युद्ध की धमकी देते हुए उसकी अग्रिम जिम्मेदारी संरासंघ पर डाल दी | इमरान के भाषण का केंद्र बिंदु इस्लामी एकता रही | कश्मीर मसले का बार - बार उल्लेख करते हुए उन्होंने भारत के विरोध में इस्लामी देशों को एकजुट होने की बात कहते हुए इस बात पर भी तंज कसा कि आतंकवाद के लिए केवल मुसलमानों को ही कसूरवार ठहराया जाता है | और भी अनेक बातें उनने ऐसी कहीं जिन्हें विश्व मंच की गरिमा के लिहाज से सही नहीं माना जा सकता | लेकिन वे इन दिनों जिस मानसिक स्थिति  से गुजर रहे हैं उसमें उनसे ऐसी ही अपेक्षा थी | इमरान का गुस्सा भारत पर तो सर्वविदित है लेकिन कश्मीर मसले पर विश्व की बड़ी शक्तियों ने जिस प्रकार पाकिस्तान का समर्थन करने से परहेज किया उससे तो वे भन्नाए थे ही लेकिन उनकी निराशा तब और बढ़ गई जब लगभग सभी प्रमुख मुस्लिम देशों ने पाकिस्तान को  भाव नहीं दिया | यही वजह रही कि वे मुस्लिम एकता की बात को दोहराते हुए भारत के विरुद्ध इस्लामी मोर्चा बनाने की कोशिश करते दिखे | कश्मीर में कर्फ्यू हटते ही खूनखराबा होने और भारत से कई गुना  छोटा होने की वजह से परम्परागत युद्ध में सुनिश्चित पराजय की स्थिति में परमाणु हथियारों का प्रयोग करने को उन्होंने पाकिस्तान  के अस्तित्व की रक्षा की जरूरत के रूप में पेश किया | कुल मिलाकर वे जो कुछ भी बोले वह बीते एक - डेढ़ महीने में कही  गई बातों का दोहराव मात्र था | ये कहना भी गलत नहीं होगा कि विगत एक सप्ताह के भीतर अमेरिका में ही इमरान को श्री मोदी के मुकाबले जिस तरह की उपेक्षा और उपहास झेलना पड़ा उससे वे बौखलाहट की चरम अवस्था पर जा पहुँचे हैं | पाकिस्तान के समाचार माध्यमों में उनकी जबर्दस्त फजीहत हो रही है | उसके मद्देनजर इस तरह का भाषण देकर वे अपनी कटी नाक को जोड़ना चाहते हैं | लेकिन वे भूल गए कि उनके देश के हुक्मरानों द्वारा अतीत में भी इसी तरह का बड़बोलापन इस विश्व मंच पर दिखाया जा चुका है लेकिन उनका अंत क्या हुआ ये भी वे जानते होंगे | ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो , जिया उल हक , नवाज शरीफ और परवेज मुशर्रफ सभी ने संरासंघ महासभा में भारत को लेकर ज़हर बुझे तीर चलाकर   खुद को सूरमा साबित करने की कोशिश की थी | लेकिन उन सबका हश्र बुरा हुआ | इसकी वजह पाकिस्तानी चरित्र है | भुट्टो ने तो भारतीय कुत्ते जैसी शब्दावली का उपयोग करते हुए एक हजार साल तक लड़ते रहने जैसा दंभ भरा था किन्तु बाद में  वे खुद कुत्ते की मौत मरे और उन्हीं के रहते पकिस्तान के दो टुकड़े हो गए | इमरान  खान भले ही लम्बे समय से सियासत करते आ रहे हों लेकिन उनमें न तो गहराई है और न ही गंभीरता | बार - बार परमाणु युद्ध की धमकी देकर उन्होंने पूरी दुनिया में पाकिस्तान की छवि को मटियामेट कर  दिया | वहीं आतंकवादी संगठनों को प्रशिक्षण की बात को स्वीकार करते हुए  अमेरिका को फांसने की जो कोशिश की उसमें  उनका अपना दामन ही दागदार हो गया | आये दिन भारत से मुकाबला नहीं कर पाने की मजबूरी दिखाकर  जिस बचकाने ढंग से वे परमाणु हमले की धमकी देते हुए पूरी दुनिया को आतंकित कर रहे हैं उसके कारण पाकिस्तान की छवि एक गैर जिम्मेदार देश के रूप में और भी  पुख्ता होती जा रही है | गत दिवस संरासंघ में दिया उनका भाषण उनके सिर पर सवार पराजयबोध का ताजा प्रमाण है | पाकिस्तान के पास परमाणु हथियार हैं लेकिन ये उसे भी पता है कि उनका प्रयोग  करने का नतीजा  क्या निकलेगा |  1998 में भारत द्वारा परमाणु परीक्षण किये जाने के बाद से लगातार ये आश्वासन दिया जाता रहा है कि वह इन अस्त्रों का उपयोग पहले कभी नहीं करेगा | लेकिन इमरान को ये याद रखना चाहिए कि यदि दोनों देशों के बीच परमाणु युद्ध  की नौबत आई तब पाकिस्तान का अस्तित्व ही मिट जाएगा | उनकी शिक्षा ऑक्सफ़ोर्ड विवि जैसे प्रतिष्ठित संस्थान में होने के बाद भी वे इतने अपरिपक्व साबित होंगे ये उम्मीद कम थी लेकिन इन दिनों उनका जो व्यवहार देखने मिल रहा है उससे तो लगता है वे विक्षिप्त होने लगे हैं और उनके मन में सत्ता जाने का डर बैठ चुका है | सेनाध्यक्ष जनरल बाजवा का इस दौरान पूरी तरह से चुप रहना किसी आने वाले तूफ़ान का संकेत हो सकता है |

-रवीन्द्र वाजपेयी