Saturday, 4 January 2020

बढ़ती महंगाई में सस्ता होता इंसान



वैसे तो देश और दुनिया के इतने विषय हैं जिन पर लम्बे आलेख लिखे जा सकते हैं लेकिन राजस्थान के कोटा शहर में बीते एक महीने में सौ से अधिक बच्चों की मौत को लेकर जो ठंडा रवैया अख्तियार किया जा रहा है वह इस बात का इशारा करता है कि हमारी संवेदनाएं किस हद तक मर चुकी हैं। सरकारी अस्पताल में ऑक्सीजन की पर्याप्त आपूर्ति नहीं होने से ही अधिकतर मौतें होना बताया जा रहा है। इसी तरह अस्पताल में लगी सभी वैन्टीलेटर मशीनों में कुछ ही काम कर रही थीं। लगातार हो रही मौतों के बाद भी राज्य के चिकित्सा मंत्री कल अस्पताल पहुंचे और 15 जनवरी तक समूची व्यवस्था को सुधारने का आश्वासन देकर लौट गए। इसी बीच मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने ये कहकर विवाद खड़ा कर दिया कि सर्दी में तो बच्चे मरते ही हैं। गत दिवस उन्हें ये कहते सुना गया कि बीते एक साल में केवल 900 बच्चों की मृत्यु हुई जबकि उसके पहले के सालों में 1000 मरा करते थे। ऐसी घटनाओं पर राजनीति न हो ये नामुमकिन है। सो, विपक्ष अपना कर्तव्य निभा रहा है। चिकित्सा मंत्री और मुख्यमंत्री से त्यागपत्र मांगते हुए धरना प्रदर्शन आदि जारी है। समाचार माध्यमों में आलोचना हो रही है जिससे बचने के लिए सत्तारूढ़ लोग उप्र के गोरखपुर जिले में हुईं बच्चों की मौतों का उल्लेख करना नहीं भूलते। कोटा लोकसभाध्यक्ष ओम बिरला का निर्वाचन क्षेत्र होने से केंद्र से भी विशेषज्ञों का दल पहुंचने की जानकारी आई। 130 करोड़ के इस देश में महंगाई की दर चाहे कितनी भी बढ़ जाए लेकिन इंसानी जि़न्दगी दिन ब दिन सस्ती होती चली जा रही है। कोटा हो या गोरखपुर सभी जगह इस तरह की थोक मौतों का शिकार गरीब परिवार ही होते हैं। इसकी मुख्य वजह वे परिस्थितियां हैं जिनमें उन्हें रहना पड़ रहा है। गोरखपुर से मिली जानकारी के अनुसार सुअरों की वजह से फैलने वाली एन्सीफ्लाइटिस नामक बीमारी के कारण प्रतिवर्ष वहां बड़े पैमाने पर मौतें होती हैं। ये सिलसिलाया बरस दर बरस चला आ रहा है। जब बात ज्यादा बाढ़ जाती है तब कुछ समय के लिए होहल्ला मचता है और फिर बात आई गई हो जाती है। प्रभावित परिवारों को मुआवजा बांटकर सरकार अपना पल्ला झाड़ लेती है और जाँच वगैरह बिठाकर लोगों का गुस्सा ठंडा करते हुए दो चार को निलम्बित कर प्रशासनिक दृढ़ता दिखाई जाती है। इस दौरान कोई बड़ी घटना होने के बाद लोगों का ध्यान उस तरफ घूम जाता है। कोटा के हादसे के बाद भी यही होगा। और सरकार अगले साल मौतों के आंकड़ें में कमी का ढिंढोरा पीटकर अपनी पीठ ठोंकने में जुटी रहेगी। आजादी के सात दशक से ज्यादा बीत जाने के बाद भी देश के किसी न किसी हिस्से में इस तरह थोक के भाव लोगों का मर जाना शर्मनाक भी है और दुखदायी भी। एक तरफ  तो देश में चिकित्सा पर्यटन (मेडीकल टूरिज्म) के विकास की बात होती है जिसके अंतर्गत विदेशियों को इलाज के लिए आकर्षित करने का प्रचार करते हुए देश में चिकित्सा सुविधाओं के विश्वस्तरीय होने का दावा भी किया जाता है लेकिन दूसरी तरफ  कभी गोरखपुर तो कभी कोटा में इलाज के अभाव में सैकड़ों बच्चे मौत के मुंह में चले जाते हैं। बीती गर्मियों में बिहार में चमकी बुखार से हुई मौतों ने बवाल मचाया था। सफाई में कहा गया कि लीची खाने से प्रतिवर्ष ऐसा होता है। नीतीश सरकार भी कठघरे में खड़ी की गई किन्तु दोबारा वह हादासा नहीं दोहराया जाएगा इस बात की गारंटी कोई नहीं दे सकता। प्रश्न ये है कि ये सिलसिला कभी रुकेगा या नहीं ? विकास के नए-नए दावों के बीच ये बात समूची व्यवस्था के माथे पर कलंक है कि देश की बड़ी आबादी जानवरों से भी बदतर हालातों में रहने मजबूर है। एक तरफ  तो प्रधानमन्त्री ने गरीबों को 5 लाख तक की मुफ्त चिकित्सा जैसी सुविधा प्रदान की है वहीं दूसरी तरफ  जिला स्तर के अस्पतालों में प्राथमिक चिकित्सा तक का समुचित इंतजाम नहीं है। गोरखपुर में हुए हादसे के दौरान भी अस्पताल में आक्सीजन की कमी की बात सामने आई थी। जब जिला अस्पतालों में ये बदहाली है तब और भी निचले स्तर पर क्या हालात होंगे इसकी कल्पना सहज ही की जा सकती है। पांच लाख तक के नि:शुल्क इलाज की सुविधा बहुत ही अच्छी है लेकिन जब अस्पतालों में इलाज का इंतजाम ही नहीं होगा तब योजना का क्या लाभ? मुख्यमंत्री और चिकित्सा मंत्री से त्यागपत्र मांगने वाले विपक्ष को भी तो अपने गिरेबान में झांककर देखना चाहिए। क्योंकि राजस्थान में साल भर पर पहले तक तो वही सत्ता में था और व्यवस्थाएं कोई एक दिन में तो सुधरती और बिगड़ती नहीं हैं।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 3 January 2020

विडंबना : किसान उगाए - सरकार सड़ाए



बीते कुछ दिनों से देश के अनेक हिस्सों में बारिश हो रही है। पहाड़ों पर बर्फबारी के बाद मैदानी इलाकों में कोहरा और बरसात इस मौसम में होती ही है। उधर दक्षिण भारत में तो शीतकालीन वर्षा (विंटर मानसून) प्रकृति चक्र का स्थायी हिस्सा है। शीतऋतु का आनंद उठाने वालों के लिए तो कुदरत के ये नजारे सुखद होते हैं लेकिन इसका नुकसान खेती के साथ सरकार द्वारा खरीदे गए अनाज के खराब होने के रूप में भी देखने मिलता है। आज आई जानकारी के अनुसार बीते दो-तीन दिनों की बरसात में ही मप्र के अनेक हिस्सों में सरकार द्वारा समर्थन मूल्य पर खरीदी गयी लगभग 150 करोड़ रूपये की धान खराब हो गयी। इसका कारण नया नहीं है। प्रतिवर्ष देश भर से आने वाली खबरों के अनुसार रबी और खरीफ  दोनों ही फसलों के बाद सरकार द्वारा किसानों से खरीदे गए अनाज की बड़ी मात्रा महज इसलिए खराब हो जाती है क्योंकि उसका ठीक तरह से भंडारण नहीं होने के कारण वह खुले में पड़ा रहता है। आज़ादी के कुछ वर्षों बाद देश में अनाज की कमी के चलते हरित क्रांति का सूत्रपात करते हुए खाद्यान्न के मामले में आत्मनिर्भरता तो हासिल कर ली गयी लेकिन भंडारण क्षमता में वृद्धि के बारे में समय रहते नहीं सोचा गया। सार्वजानिक वितरण प्रणाली (राशन दूकान) एवं सूखा आदि की स्थिति से निबटने के लिए देश में अनाज का सुरक्षित भंडार रखने के उद्देश्य से सरकार किसानों से सीधे अनाज खरीदकर गोदामों में रखती है। पहले केवल भारतीय खाद्य निगम के पास ही अपनी गोदामें हुआ करती थीं। लेकिन जब वे अपर्याप्त पडऩे लगीं तब निजी क्षेत्रों को बैंकों से कर्ज दिलवाकर गोदामें बनवाने की पहल भी हुई। बावजूद इसके भंडारण क्षमता का अपेक्षित विकास नहीं होने से सरकार द्वारा खरीदा गया अनाज खुले मैदान में रखे रहने पर बारिश में भीगकर खराब हो जाया करता है। बड़े-बड़े चबूतरों पर टीन शेड बनाकर तिरपाल से उन्हें ढंककर रखने का इंतजाम भी बदहाली का शिकार होने से साल दर साल सोना कहलाने वाला अनाज या तो सड़ जाता है या उसकी गुणवत्ता कम हो जाती है। गोदामों के भीतर रखे अनाज को चूहों द्वारा कुतर दिए जाने की खबरें तो आम है ही किन्तु गोदाम के भीतर जाने के पहले ही बरसाती पानी से उनका खराब हो जाना भी नियमित घटना बन गयी है। निजी गोदामों को किराये पर लेने की जो व्यवस्था है वह भी सरकारी ढर्रे का शिकार है। समय पर गोदाम मालिकों का भुगतान नहीं होने से वे भी परेशान होकर रह जाते हैं। अनेक ऐसे गोदाम मालिक हैं जिन्हें सरकार से समय पर किराया नहीं मिलने की वजह से उन पर बैंक का कर्ज और ब्याज बेतहाशा बढ़ गया। गोदामों के आवंटन में भी भारी भ्रष्टाचार है। सरकारी अधिकारी इस काम में जमकर पैसे खाते हैं। राजनीतिक तौर पर प्रभावशाली लोग तो अपने रसूख से किराया वसूलने में सफल हो जाते हैं लेकिन दीगर गोदाम मालिकों को नौकरशाही खून के आंसू रुलाने से बाज नहीं आती। ये सिलसिला निरंतर जारी है। किसान धूप में पसीना बहाकर जो अनाज उगाता है वह सरकारी खरीद के बाद धूप  और पानी में पड़े रहने से बर्बाद होता है। हरित क्रांति के समय ही यदि बढ़ते उत्पादन के समुचित भंडारण का प्रबंध किये जाने के बारे में सोचा गया होता तब इस विसंगति से बचा जा सकता था। बीते कुछ दशकों में किसानों ने अनाज से इतर फल और सब्जियों के उत्पादन पर भी काफी ध्यान दिया लेकिन भंडारण और प्रसंस्करण की पर्याप्त व्यवस्था नहीं होने से उनकी उपलब्धि का सही लाभ उन्हें और देश दोनों को नहीं मिल पाता। करोड़ों रूपये के फल और सब्जियां इस वजह से नष्ट हो जाते हैं। 21 वीं सदी के भारत में एक तरफ  तो चाँद और मंगल को छूने जैसी महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने की ललक और आत्मविश्वास हिलोरें मारता दिखाई देता है वहीं दूसरी तरफ  धरती की उर्वरा शक्ति से अर्जित अन्न, फल और सब्जियों के सुरक्षित भंडारण और उनके प्रसंस्करण की पर्याप्त व्यवस्था नहीं होने से किसानों की मेहनत पर पानी फिर जाता है। भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि क्षेत्र का सबसे महत्वपूर्ण योगदान है। बीते कुछ दशकों में किसानों ने उत्पादन बढ़ाने में उल्लेखनीय योगदान दिया। लेकिन ये कहना पूरी तरह से सही है कि इसका पूरा-पूरा लाभ देश को नहीं मिल पा रहा। वैसे तो हर सरकार भंडारण और प्रसंस्करण को प्रोत्साहित करने का इरादा व्यक्त करती है किन्तु उस पर अपेक्षित अमल नहीं हो पाने से आगे पाट पीछे सपाट की स्थिति बरकरार है। इसका लाभ सरकारी अमला भी जमकर लेता है जो खराब होने वाले खाद्यान्न के अतिरंजित आंकड़े प्रचारित कर अपना और अपने राजनीतिक संरक्षकों की तिजोरियां भरता है।

- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 2 January 2020

वोट वासना से अर्थव्यवस्था की मुक्ति जरूरी




केंद्र सरकार 6 करोड़ किसानों के खाते में आज 2-2 हजार रूपये जमा करेगी। इस प्रकार कुल 12 हजार करोड़ रूपये का भार खजाने पर आयेगा। इसके पहले कल ही रेल किराये में कुछ पैसे की वृद्धि किये जाने के साथ ही गैर सब्सिडी वाले घरेलू गैस सिलेंडर की कीमत में बढ़ोतरी कर दी गयी। मप्र सरकार कर्मचारियों को 5 फीसदी महंगाई भत्ता देने जा रही है। साथ ही विधान परिषद के गठन का प्रस्ताव भी केंद्र को भेजा जा रहा है। बीते माह जीएसटी का संग्रहण लगातार दूसरे महीने एक लाख करोड़ का आँकड़ा पार कर गया जिससे सरकार की जान में जान आई। आगामी बजट में आयकर की दरें घटाने की संभावनाओं पर विराम लग रहा है। सरकार के भीतरखानों में चल रही चर्चाओं के अनुसार कारपोरेट टैक्स घटाए जाने से राजस्व में आई कमी के कारण वित्त मंत्री और दरियादिली नहीं दिखा सकेंगीं। सरकार की उम्मीदें एयर इंडिया सहित सार्वजानिक क्षेत्र के कुछ उद्यमों के विनिवेश (बेचने) पर टिकी हैं। लेकिन इस दिशा में अभी तक मिले संकेत बहुत आशा नहीं जगाते। बहरहाल अच्छे मानसून की वजह से कृषि क्षेत्र से अच्छी खबर आने की उम्मीद से अर्थव्यवस्था के लडख़ड़ाते कदमों के सम्भलने की संभावना जताई जा रही है। नई नौकरियों के सृजन के साथ ही वेतन वृद्धि की उम्मीद भी आर्थिक विशेषज्ञ व्यक्त कर रहे हैं। बावजूद इसके आम जनता को बहुत ज्यादा राहत मिलने की उम्मीद इसलिए नहीं है क्योंकि अभी तक जीएसटी के ढांचे को लेकर चली आ रही अनिश्चितताएं खत्म नहीं हुईं। आये दिन कोई न कोई नया नियम या फार्म आ जाता है। जिन कारोबारियों ने जीएसटी समय पर जमा कर दिया है उन्हें भी इनपुट के्रडिट का लाभ नहीं मिल रहा। सरकार के पास पैसा नहीं होने से इन्फ्रा स्ट्रक्चर के तमाम काम रुके पड़े हैं। राज्यों की हालत तो और भी खराब है। मप्र सरकार ने दो दिन पहले ही एक हजार करोड़ का कर्ज फिर ले लिया। चुनावी वायदे के मुताबिक किसानों के कर्ज माफ़  करने का काम अभी तक ठीक तरह से आकार नहीं ले सका। जिन राज्यों के विधानसभा चुनाव में सत्ता परिवर्तन होता है वहां नई सरकार पिछली सत्ता पर खजाना खाली कर जाने का आरोप तो लगाती है परन्तु उसकी अपनी नीतियाँ भी आर्थिक हालात सुधारने की बजाय मुफ्तखोरी बढ़ाने वाली होने से हालत और भी चिंताजनक हो जाती है। दरअसल जब सरकार के पास पर्याप्त धन नहीं है तब उसे बेकार की रईसी दिखाने से बचना चाहिए। किसानों, कर्मचारियों, निराश्रित बुजुर्गों और गरीबों को मिलने वाली सौगातों से किसी को तब तक कोई ऐतराज नहीं होता जब तक उसका बोझ किसी दूसरे के कंधों पर नहीं आये। दुर्भाग्य से सता में बैठे लोगों की मानसिकता तदर्थ व्यवस्थाओं पर आकर सिमट गई है। होना तो यह चाहिए कि जितनी चादर हो उतना ही पैर पसारा जाए लेकिन यहाँ तो पाँव खाट से बाहर आने वाली नौबत है। प्रश्न ये है कि राजनीतिक पार्टियों को अपना स्वार्थ सिद्ध करने के लिए सरकारी खजाने की लूटमार का अधिकार आखिर कब तक दिया जाता रहेगा? जरुरतमंदों की मदद करना किसी भी लोक कल्याणकारी शासन व्यवस्था की जिम्मेदारी है लेकिन उसके साथ ही ये भी देखा जाना चाहिए कि उस हेतु समुचित संसाधन हैं भी या नहीं ? यही स्थिति विकास कार्यों के सम्बन्ध में है। उनकी आड़ में होने वाले भ्रष्टाचार पर तो किसी का नियंत्रण नहीं है जिसकी वजह से आने वाली पीढिय़ों पर कर्ज चढ़ रहा है। सुरक्षा के क्षेत्र की तो अनदेखी नहीं की जा सकती इसलिए उस पर चाहे-अनचाहे व्यय करना ही पड़ता है किन्तु शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे बेहद जरूरी क्षेत्रों की उपेक्षा बदस्तूर जारी है। मोदी सरकार ने पिछले कार्यकाल में गरीबों को 5 लाख तक के मुफ्त इलाज की जो सुविधा दी उसके औचित्य और उपयोगिता को तो स्वीकार करना ही पड़ेगा लेकिन वह गरीबों से ज्यादा निजी अस्पतालों की कमाई में सहायक साबित हुई है। कहने का आशय ये है कि सरकारी क्षेत्र का समूचा आर्थिक प्रबंधन चूंकि राजनीतिक हित संवर्धन पर टिका हुआ है इसलिए उसमें सच्चाई से आँखें मूंदने की गलती दोहराई जा रही है। भारत के बैंकिंग उद्योग का सत्यानाश करने में भी सत्ताधीशों की वोट वासना ही सर्वाधिक जिम्मेदार है। न सिर्फ  छोटे अपितु बड़े कर्ज भी राजनीतिक दबावों के चलते नियमों को शिथिल करते हुए बंटवाये गए जिसका नतीजा माल्या और नीरव मोदी के रूप में देश को झेलना पड़ रहा है। कुल मिलाकर आज की स्थिति में देश एक ऐसे दोराहे पर खड़ा है जहां उसे अपनी आर्थिक दिशा दूरगामी सोच के अनुसार तय करनी होगी। चुनाव जीतने के लिए की जाने वाली मार्केटिंग अपनी जगह है लेकिन उसके लिए सरकारी खजाना लुटाने की छूट बंद होनी चाहिए। सरकार में बैठे लोग मुफ्तखोरी को बढ़ावा देकर अपना उल्लू तो सीधा कर ले जाते हैं लेकिन उसका भार उन ईमानदार करदाताओं पर पड़ता है जिनके प्रति सरकार पूरी तरह बेरहम है। इस बारे में किसी एक पार्टी को दोषी ठहराना न्यायोचित नहीं होगा क्योंकि सभी एक ही दिशा में बढ़ रही हैं। बेहतर होगा आर्थिक प्रबन्धन के समूचे ढांचे को व्यवहारिक रूप देते हुए सरकार की कर नीति को अस्थिरता और अनिश्चितता से मुक्त किया जाए। यदि ऐसा नहीं किया जाता तब आर्थिक अराजकता की आशंका दिन ब दिन प्रबल होती जायेगी। कड़े निर्णय बिल्ली के गले में घंटी बांधने जैसा है लेकिन किसी न किसी को तो वह करना ही पड़ेगा। 21 वीं सदी का बीसवां वर्ष शुरू हो गया है। दुनिया कहाँ से कहाँ जा पहुँची है और हम हैं कि दिन रात बस वोट के फेर में उलझे हुए हैं। राजनीति और अर्थशास्त्र रेल की पटरी की तरह एक साथ चलते हैं लेकिन उनके बीच सदैव एक निश्चित दूरी रखी जाती है। उसमें थोड़ी सी भी घट-बढ़ दुर्घटना का कारण बन जाती है। भारतीय अर्थव्यवस्था के गड़बड़ाने का कारण पटरियों के बीच की दूरियों में अंतर आना ही है। जब तक हमारे राजनेता इस वास्तविकता को समझकर उसे दुरुस्त नहीं करते तब तक एक कदम आगे दो कदम पीछे वाली हालत जारी रहेगी।

- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 1 January 2020

2020 : अर्थव्यवस्था पर केन्द्रित हो



बीता वर्ष 2019 बड़ी घटनाओं से भरा हुआ रहा। लोकसभा चुनाव के जरिये एक बार फिर मोदी सरकार का नारा साकार हुआ और भाजपा ने 300 का आंकड़ा पार करते हुए भारतीय राजनीति में कांग्रेस के बाद पहले ऐसे राजनीतिक दल के तौर पर खुद को स्थापित किया जिसे अपने दम पर लोकसभा में स्पष्ट बहुमत हासिल हो सका। मतदाताओं के उस फैसले ने सरकार को वह सब करने का हौसला दिया जिसे लगभग असंभव मान लिया गया था। जम्मू कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाले संविधान के अनुच्छेद 35 ए तथा 370 की विदाई जिस अंदाज में हुई वह किसी कारनामे से कम नहीं था। इसी तरह अयोध्या का सैकड़ों वर्ष पुराना विवाद भी सर्वोच्च न्यायालय ने जिस तरह निपटाया वह भी ऐसी घटना है जिसे इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान मिले बिना नहीं रहेगा। इसके पहले तीन तलाक पर रोक जैसे संवेदनशील मामले में भी केंद्र सरकार को संसद में जो समर्थन मिला वह बड़ी उपलब्धि थी। इन सब वजहों से विपक्ष पूरी तरह निहत्था और बेबस होकर रह गया। प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी अपनी पार्टी के मूलभूत मुद्दों को अमल में लाने के कारण एक महानायक के तौर पर उभरे। निश्चित ही इन सबकी वजह से उनका मनोबल ऊंचा हुआ जिसका प्रमाण नागरिकता संशोधन विधेयक को पारित करवाकर कानून बनवाने के रूप में सामने आया। वर्ष 2019 के अंत में इस मुद्दे पर सरकार को संसदीय मोर्चे पर जो विजय मिली उससे विपक्षी दलों में ये भय व्याप्त हुआ कि भाजपा और श्री मोदी के विरुद्ध मोर्चेबंदी नहीं की गयी वे वह अप्रासंगिक होकर रह जाएंगे। और उसके बाद जो कुछ हुआ और हो रहा है वह देश के सामने है। यद्यपि केंद्र सरकार की दृढ़ इच्छाशक्ति के चलते ये मानना गलत नहीं होगा कि अंतत: इस मुद्दे पर भी विपक्ष को विफलता ही हाथ लगेगी क्योंकि मामला कानूनी से ज्यादा एक समुदाय विशेष पर आकर केन्द्रित हो गया। बीते वर्ष में लोकसभा की धमाकेदार जीत के बाद भी भाजपा ने दो राज्य गंवाए। लेकिन सबसे बड़ी बात हुई शिवसेना से उसका अलगाव। आने वाले कुछ महीनों में भाजपा को दिल्ली और बिहार जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा। मौजूदा राजनीतिक हालातों में उसके लिए इनसे निपटना बेहद कठिन लागता है। ये बात भी सही है कि भाजपा का दबदबा उसके सहयोगी दलों पर अब पहले जैसा नहीं रहा। दिल्ली में न सही लेकिन बिहार में जरुर उसे नीतिश कुमार जैसे अनुभवी नेता से जूझना होगा। बंगाल में भी ममता बैनर्जी एक बड़ी चुनौती केंद्र के लिए हैं। नागरिकता संशोधन और उसके बाद राष्ट्रीय जनसँख्या रजिस्टर को लेकर अनेक गैर भाजपा शासित राज्यों की सरकारें जिस तरह से टकराहट के मूड में हैं उसे देखते हुए 2020 में देश की राजनीति को अप्रत्याशित घटनाचक्र से गुजरना पड़ सकता है लेकिन राजनीति से अलग हटकर सबसे बड़ी चुनौती देश और सरकार के सामने अर्थव्यवस्था की चिंताजनक स्थिति है। सरकार और विपक्ष दोनों के बीच चलने वाली रस्साकशी को एक बार छोड़ भी दें तो ये मान लेने में कुछ भी गलत नहीं होगा कि बीते वर्ष देश का आर्थिक माहौल निराश करने वाला रहा। इसके लिए भले ही वैश्विक हालातों को जिम्मेदार मानकर मन को संतोष दे दिया जाये किन्तु केंद्र सरकार जिस तरह से अपनी उपलब्धियों का श्रेय लूटने में कंजूसी नहीं करती ठीक वैसे ही उसे आर्थिक मोर्चे पर छाई निराशा की जिम्मेदारी भी लेना चाहिए। मंदी की बजाय इसे आर्थिक सुस्ती माना जाए तब भी ये तो कहना ही पड़ेगा कि अच्छे दिन और सबका विकास जैसे नारे भी 1971 के गरीबी हटाओ के वायदे की कतार में आ खड़े हुए हैं। आर्थिक विशेषज्ञ और उद्योग जगत ये स्वीकार कर रहा है कि सरकार और रिजर्व बैंक द्वारा उठाये गये कतिपय क़दमों से अर्थव्यवस्था की बदहाली दूर होने का रास्ता खुल गया है लेकिन इसमें कितना वक्त लगेगा ये दावे के साथ चूंकि कोई भी नहीं बता पा रहा इसलिए आम जनता के मन में घबराहट बढ़ती जा रही है। बैंकों की गिरती सेहत भी बड़ी चिंता का विषय है। नया रोजगार तो दूर की बात है उलटे नौकरी में लगे लोगों का काम छिन रहा है। सरकार कुछ नहीं कर रही ये कहना तो गलत होगा परन्तु उसकी कोशिशों का असर दिख नहीं रहा ये कहने में कुछ भी गलत नहीं है। लोगों की ये अपेक्षा भी सही है कि प्रधानमंत्री अर्थव्यवस्था की स्थिति को लेकर देश से संवाद करें। जहां तक बात वित्त मंत्री द्वारा दी जाने वाली सफाई और आश्वासनों की है तो इस सरकार के बारे में ये धारणा पूरी तरह स्थापित हो चुकी है कि हर महत्वपूर्ण फैसला प्रधानमंत्री कार्यालय से ही होता है। इसलिए बेहतर हो अर्थव्यवस्था पर श्री मोदी राष्ट्र से मुखातिब हों और अपनी सरकार की कार्ययोजना प्रस्तुत करें। प्रधानमन्त्री के बारे में अभी भी जनमानस में भरोसा कायम है। बेहतर हो वे 2020 को अर्थव्यवस्था केन्द्रित रखते हुए प्राथमिकताएँ तय करें। दूरगामी उपायों की अपनी अहमियत है लेकिन आम जनता के लिए कुछ ऐसा भी किया जाना चाहिए जिससे तत्काल राहत मिले। आर्थिक क्षेत्र में तथाकथित सुधारों की चर्चा बीते तीन दशक से चली आ रही है लेकिन उसके परिणामों के बारे में कुछ भी स्पष्ट नहीं है। प्रधानमन्त्री को चाहिए कि वे उद्योग व्यापार जगत की परिशानियों को हल करने के लिए बेशक जरूरी कदम उठायें लेकिन आम जनता की क्रय शक्ति बढ़ाये बिना आर्थिक विकास का कोई भी लक्ष्य पूरा नहीं हो सकता। भारत पर निगाह रखे हुए आर्थिक विशेषज्ञ भी मान रहे हैं कि यहाँ का घरेलू उपभोक्ता बाजार ही इतना विशाल है कि बिना निर्यात किये भी भारत के उद्योगों का समूचा उत्पादन घरेलू बाजार में ही खप सकता है। इसलिए जिस तरह सरकार उद्योग व्यापार को बढ़ावा देने के लिए तरह-तरह की सुविधाएँ और रियायतें देती है ठीक उसी तरह आम करदाता का बोझ भी कम किया जाना चाहिए जो कि भारतीय अर्थव्यवस्था को गतिशील बनाये रखने में सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। भाजपा का उत्थान भी जिस मध्यमवर्ग के बूते हुआ वही आज के माहौल में सबसे ज्यादा परेशान है। छोटी पूंजी वाले व्यापारी को भी इसी श्रेणी में रखा जा सकता है। यदि मोदी सरकार 2020 में भारत के विशाल मध्यमवर्ग और घरेलू बाजार पर ध्यान केन्द्रित करते हुए नीतियों का निर्धारण और क्रियान्वयन करे तब उसके राजनीतिक फैसलों पर उठने वाले सवाल भी बेमानी होकर रह जायेंगे। दोबारा सत्ता में आने के बाद कुछ महीनों के भीतर ही प्रधानमन्त्री ने अपनी निर्णय क्षमता और दृढ़ता का जो परिचय दिया वैसा ही कुछ आर्थिक मोर्चे पर किया जाना समय की मांग है। रही बात दुनिया भर के विशेषज्ञों की टीका-टिप्पणियों की तो ये बात पक्के तौर पर समझ लेना चाहिए कि भारत की समस्याओं का इलाज घर में ही मौजूद है। उसके लिए किराये के आयातित दिमागों की जरुरत नहीं है।

- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 31 December 2019

वंशवाद : भारतीय राजनीति का स्थापित सत्य



महाराष्ट्र मंत्रीमंडल का गत दिवस जो विस्तार हुआ उसकी सबसे उल्लेखनीय बात ये है कि 14 मंत्री ऐसे हैं जो किसी नेता के परिवारजन हैं। पूर्व मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण कैबिनेट मंत्री बने लेकिन शरद पवार के भतीजे अजीत को एक बार फिर उप मुख्यमंत्री पद मिल गया। सबसे चौंकाने वाला नाम मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे के पुत्र आदित्य का रहा जिन्हें कैबिनेट मंत्री बना दिया गया। हालाँकि इससे शिवसेना के भीतर ही असंतोष की खबरें भी मिली हैं। मिली जुली सरकार में योग्यता से ज्यादा सौदेबाजी महत्वपूर्ण होती है और उस लिहाज से उद्धव ने कुछ अप्रत्याशित नहीं किया। चूंकि सरकार की स्थिरता पर प्रश्नचिन्ह कायम हैं इसलिए मुख्यमंत्री ने आलोचना की परवाह किये बिना अपने बेटे को कैबिनेट मंत्री बनाकर भविष्य के लिए तैयार कर लिया। वैसे भी शिवसेना ने शुरुवात में आदित्य का नाम ही बतौर मुख्यमंत्री आगे किया था। कल ज्योंही मंत्रीमंडल का विस्तार हुआ त्योंही परिवारवाद के आरोप लगे। इसकी वजह आदित्य का मंत्री बनना ही रहा लेकिन शिवसेना की सहयोगी एनसीपी और कांग्रेस दोनों को परिवारवाद से धेले भर परहेज नहीं रहा और फिर खुद उद्धव भी तो इसी वजह से राज ठाकरे को किनारे करते हुए पार्टी के मुखिया बन बैठे। यूँ भी देश में जितनी क्षेत्रीय पार्टियां हैं सभी वंशवाद की पोषक हैं इसलिए उद्धव को कठघरे में खड़ा करना औचित्यहीन है। पिछली देवेन्द्र फणनवीस सरकार में भी स्व. गोपीनाथ मुंडे की बेटी पंकजा मंत्री थीं। इसी तरह स्व. प्रमोद महाजन की बेटी पूनम मुम्बई से भाजपा सांसद हैं। हालाँकि नीतीश कुमार जैसे नेता भी हैं जिनके परिवारजन सियासत से दूर हैं लेकिन भाजपा के शेष सहयोगी अकाली, लोजपा आदि में वंशवाद का बोलबाला है। सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि जब मतदाता नेताओं के परिजनों को चुनाव जितवाने में मददगार बनते हैं तब उन्हें जनस्वीकृति मिल जाती है। वरना राहुल और प्रियंका गांधी, सुखबीर और हरसिमरत बादल, ओमप्रकाश और दुष्यंत चौटाला, अखिलेश यादव, तेजस्वी यादव, स्टालिन, कनिमोझी, फारुख और उमर अब्दुल्ला, महबूबा मुफ्ती जैसे तमाम नेता राजनीति में स्थापित नहीं होते। भाजपा के शीर्षस्थ स्तर पर भले ही परिवारवाद अभी भी उतना हावी नहीं है लेकिन उसके बाद वाले स्तर पर उसकी शुरुवात हो चुकी है। वामपंथी दलों में परिवारजनों को आगे बढ़ाने का चलन बेशक नहीं है। समूचे परिदृश्य पर नजर डालने के बाद ये कहने में कुछ भी गलत नहीं है कि वंशवाद भारतीय राजनीति की सच्चाई बन चुका है। उद्धव ठाकरे द्वारा अपने बेटे को अपने ही मंत्रीमंडल में कैबिनेट मंत्री बनाने पर इसीलिये किसी को आश्चर्य नहीं हुआ।

-रवीन्द्र वाजपेयी

सीडीएस : सही समय, सही निर्णय, सही व्यक्ति



यद्यपि यह आम जनता से जुड़ा हुआ विषय नहीं है इसलिए इस पर सार्वजानिक चर्चा अपेक्षाकृत कम ही होगी लेकिन सुरक्षा से सम्बन्धित होने के कारण सीडीएस (चीफ  ऑफ डिफेन्स स्टाफ ) पद का सृजन निश्चित रूप से एक महत्वपूर्ण निर्णय है जो वर्षों से लंबित था। मोदी सरकार ने इस दिशा में कदम बढ़ाते हुए आज ही सेवानिवृत्त हो रहे थलसेनाध्यक्ष जनरल बिपिन रावत को इस पद पर नियुक्त करने का आदेश पारित कर दिया। सीडीएस की आयु सीमा भी 65 वर्ष रखी गई है। सीडीएस दरअसल सेना के तीनों अंगों के बीच समन्वयक की भूमिका का निर्वहन करने के साथ ही रक्षा संबंधी जरूरतों को लेकर सलाहकार का काम भी देखेंगे। वैसे तो अजीत डोभाल के रूप में पूर्णकालिक रक्षा सलाहकार पहले से है लेकिन उनके पास और भी ऐसे कार्य है जिनकी वजह से सेना की जरूरतों के साथ रणनीतिक निर्णयों के लिए एक विशेषज्ञ की आवश्यकता लम्बे समय से अनुभव की जा रही थी। कारगिल युद्ध के दौरान सेना के सभी अंगों के बीच समन्वय की कुछ कमी की वजह से जो नुकसान उठाना पड़ा उसके बाद से ही इस पद की जरूरत पर जोर दिया जाता रहा था। लेकिन इच्छाशक्ति की कमी की वजह से बात टलती चली गई। बीते कुछ समय से केंद्र सरकार इस बारे में गम्भीर थी। विशेष रूप से पाकिस्तान और चीन दोनों की तरफ  से सीमा पर मौजूद खतरे को दृष्टिगत रखते हुए ये जरूरी हो गया था कि रोजमर्रे की सैन्य गतिविधियों के सुचारू संचालन में बार-बार राजनीतिक नेतृत्व का मुंह नहीं ताकना पड़े और सरकार के उच्च स्तर को भी बजाय सेना के तीनों अंगों से बात करने के एक ही सूत्र से सारी जानकारी मिलती रहे। मोदी सरकार ने सेना को सुसज्जित करने के साथ ही मोर्चे पर कार्रवाई करने के मामले में काफी छूट दी है। इसके अच्छे परिणाम भी आये। रक्षा उपकरणों की जो खरीदी मनमोहन सरकार ने धीमी कर रखी थी उसमें भी तेजी लाई गयी और बजाय एक या दो देशों पर निर्भर रहने के राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखते हुए विभिन्न देशों से बाकायदा मोलभाव करते हुए अस्त्र-शस्त्र खरीदे जाने के अलावा देश में उनके उत्पादन संबंधी अनुबंध भी उन देशों से किये गए। ये बात भी सही है कि भारत जैसे विविधता भरे देश में आंतरिक समस्याओं में केंद्र सरकार इतनी उलझी रहती है कि उसके पास रक्षा मामलों पर समुचित ध्यान देने हेतु समय कम पड़ता है। इस वजह से महत्वपूर्ण फैसले लालफीताशाही के शिकार होकर रह जाते हैं। वाजपेयी सरकार के समय रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नांडीज सियाचिन दौरे पर गए तब उन्हें मालूम हुआ कि सैनिकों को बर्फ  पर चलने के लिए आइस स्कूटर दिए जाने की फाइल लम्बे समय से रक्षा मंत्रालय में दबी पड़ी है। उस पर नाराज होते हुए जॉर्ज ने आदेश दिया कि उसके लिए जिम्मेदार मंत्रालय के अधिकारियों को कुछ दिनों तक सियाचिन में रखा जाए जिससे उन्हें सैनिकों की मुश्किलों की जानकारी मिले। ये बात भी सही है कि सेना के अधिकारी सिविल प्रशासन के साथ समुचित संवाद नहीं कर पाते क्योंकि दोनों की कार्यशैली में जमीन आसमान का अंतर होता है। सीडीएस उस लिहाज से सेना की समन्वित आवाज सरकार तक पहुँचाने में सेतु का काम करेंगे। तीनों अंगों के बीच बेहतर तालमेल और संवाद के लिए सैन्य पृष्ठभूमि का व्यक्ति ही सर्वथा उपयुक्त रहेगा ये बात विभिन्न अध्ययनों से साबित हो चुकी है। प्रधानमंत्री और रक्षा मंत्री के लिए भी तीन सेनाध्यक्षों से संवाद करने की बजाय समूची सेना के एक मुखिया से संवाद निर्णय और रणनीति दोनों के लिए फायदेमंद रहेगा। दुनिया के विभिन्न देशों में सीडीएस का पद है। और फिर जनरल रावत ने बतौर थलसेनाध्यक्ष उल्लेखनीय काम किया। सर्जिकल स्ट्राइक के अलावा सीमा पार से होने वाली घुसपैठ रोकने में उनकी रणनीति कारगर रही। चीन से सटी सीमा पर भी भारतीय सेना ने अनेक विषम परिस्थितियों में सराहनीय काम किया। सबसे बड़ी बात ये है कि वे काफी आक्रामक माने जाते हैं जो शत्रु पर मनोवैज्ञनिक दबाव बनाने में सहायक होता है। सीडीएस प्रधानमंत्री को आणविक हथियारों सबंधी सलाह देने हेतु भी अधिकृत होंगे जो बहुत ही जिम्मेदारी भरा काम है। कुल मिलाकर केंद्र सरकार का ये निर्णय रक्षा व्यवस्था को चाक-चौबंद करने के साथ ही निर्णयात्मक अनिश्चितता को दूर करने वाला होगा। सेना के तीनों अंगों के लिए भी अपने ही बीच के व्यक्ति के जरिये सरकार के साथ सम्पर्क करना अपेक्षाकृत आसान रहेगा। जनरल रावत का मौजूदा सरकार के साथ अच्छा समन्वय बना रहने से ये उम्मीद की जा सकती है कि सीडीएस पद का सृजन अपनी सार्थकता को साबित करेगा।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 30 December 2019

अपना घर भी साफ करे पत्रकार बिरादरी



मप्र की राजनीति में हलचल मचा देने वाले हनी ट्रैप कांड में हुए खुलासे के अनुसार न सिर्फ राजनेता और प्रशासनिक अधिकारी अपितु कतिपय पत्रकार भी उसमें लिप्त बताये जा रहे हैं। फर्क  केवल ये है कि एक तरफ नेता और अधिकारी जहां अय्याशी के चक्कर में फंसकर ब्लैकमेल होते रहे वहीं जिन पत्रकारों के नाम उछले हैं वे उन महिलाओं के साथ इस धंधे में शामिल होकर ब्लैकमेलिंग में भागीदार बनते रहे। अखबारी रिपोर्ट के अनुसार जो प्रारंभिक आरोप पत्र दाखिल हुए उनमें नेताओं और अधिकारियों को तो अलग रखा ही गया लगे हाथ पत्रकारों को भी बख्श दिया गया है। यद्यपि ये कहा जा रहा है कि अभी जांच चल रही है और हो सकता है आने वाले दिनों में आरोपियों की सूची में उन लोगों के नाम भी दिखाई दें जो प्रतिष्ठा रूपी खजूर के झाड़ पर बैठे हुए हैं। ये सम्भावना भी जताई जा रही है कि अदालत भी स्वत: होकर आरोप पत्र से बाहर रखे गये उन लोगों को लपेटे में ले सकती है जिन्हें सरकारी जाँच एजेंसी ने अभी तक दूर रखा हुआ है। इस बारे में एक बात तो साफ है कि जिन महिलाओं को हनी ट्रैप का जाल फैलाकर करोड़ों वसूलने के आरोप में पकड़ा गया वे लम्बे समय से अपना कारोबार फैलाये हुईं थीं। बीच-बीच में कुछ सीडी भी प्रकाश में आईं लेकिन तत्कालीन सरकार ने उसकी तरफ  ध्यान क्यों नहीं दिया ये बड़ा सवाल है। शायद मौजूदा सरकार भी हाथ पर हाथ धरे बैठी रहती यदि सत्ता के गलियारों में अच्छी पहुँच रखने वाले कतिपय वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों की इज्जत तार-तार होने की नौबत नहीं आती। संचार क्रांति के इस दौर में इस तरह की बातों को प्रसारित करना बेहद आसान हो गया है। यू ट्यूब पर इस काण्ड के सम्बन्ध में जो सामग्री उपलब्ध है उसका प्रमाणीकरण भले न हो पाया हो लेकिन उसे हांडी का एक चावल मानकर कुछ निष्कर्ष तो निकाले ही जा सकते हैं। यूँ भी राजनेताओं और उच्च पदस्थ प्रशासनिक अधिकारियों का गठजोड़ कोई नई बात नहीं है। सता प्रतिष्ठान में शराब और शबाब के चलन की परम्परा तो अनादिकाल से चली आ रही है परन्तु इस तरह का नंगा नाच नहीं होता था। इस सम्बन्ध में सबसे चिंताजनक और शर्मनाक बात ये है कि अब समाचार माध्यमों से जुड़े लोग भी इस तरह के धंधों में शरीक पाए जाने लगे हैं। पत्रकारिता के नाम पर राजधानियों में होने वाली दलाली भी नई बात नहीं रही। टेलीकॉम घोटाले में जिस तरह से देश के नामचीन पत्रकारों की असलियत सामने आई वह देखकर पूरे देश को आश्चर्य हुआ। भले ही वे जिस संस्थान में कार्यरत थे वहां से बाहर कर दिए गए हों लेकिन उनकी करतूतों ने पूरे पत्रकार जगत को संदेह के घेरे में खड़ा कर दिया। मप्र के हनी ट्रैप काण्ड में भी पत्रकारों की संलिप्तता ने समूची पत्रकार बिरादरी के समक्ष शोचनीय हालत उत्पन्न कर दिए हैं। भले ही चंद स्तरहीन लोगों के कारण पूरी पत्रकार बिरादरी को लांछित नहीं किया जा सकता लेकिन दूसरों की टोपी उछालकर खुद को परम पवित्र समझने वालों को भी ये सोचना और समझना चाहिए कि वे अपने ही बीच बैठे उन लोगों का पर्दाफाश करें जो इस पवित्र पेशे को कलंकित कर रहे हैं। खोजी पत्रकारिता की आड़ में चल रहे गोरखधंधे भी चिंता का विषय हैं। ये कहने में कोई संकोच नहीं होना चाहिए कि कुछ लोगों के लिए पत्रकारिता भी राजनीति की तरह अपने स्वार्थ सिद्ध करने का जरिया बन गई है। कुछ अखबार और टीवी चैनलों के मालिक इस माध्यम का किस हद तक दुरूपयोग करते हैं ये किसी से छिपा नहीं है। हनी ट्रैप काण्ड में नेताओं और अधिकारियों के साथ ही पत्रकारों के नाम आने से निश्चित रूप से उन लोगों का चिंतित होना लाजमी है जो व्यवसायिकता के इस दौर में भी स्वस्थ ही नहीं अपितु स्वच्छ पत्रकारिता के प्रति संकल्पित हैं। बेहतर हो खोजी पत्रकारिता में महारत रखने वाले रोमांच प्रेमी पत्रकार अपनी बिरादरी में घुसे और छिपे उन चेहरों से नकाब उतारने का भी दुस्साहस करें जो इस पवित्र पेशे के साथ व्यभिचार करने पर आमादा हैं। पत्रकारों की सुरक्षा के लिए आये दिन शासन से गुहार लगाने के साथ ही पत्रकारिता की सुरक्षा की चिंता समय की मांग है। राजनीति और प्रशासन में बैठे लोगों ने तो मान-मर्यादा को कब की तिलांजलि दे दी। लेकिन पत्रकारिता से जुड़े लोगों को अपने पेशे की प्रतिष्ठा बनाये रखने आगे आना चाहिए क्योंकि उनके पास इसके अलावा और कुछ होता भी नहीं है। इसके पहले कि मीडिया माफिया को औपचारिक मान्यता मिल जाए पत्रकार बिरादरी को अपना घर साफ करने की पहल करनी चाहिए।

-रवीन्द्र वाजपेयी