Friday, 6 March 2020

बिना स्वास्थ्य समृद्धि नहीं आ सकती



कोरोना वायरस को लेकर हल्ला  तो खूब मच रहा है लेकिन अपेक्षित गम्भीरता नहीं दिखाई दे रही। कतिपय टीवी  चैनलों ने तो कोरोना को भी अपनी दर्शक संख्या बढ़ाने का माध्यम बना लिया है। भय का भूत भी खड़ा किया जा रहा है। ऐसे अवसरों पर भारत में सुझाव वीर भी खुलकर सामने आ जा आते हैं। कोरोना  से बचने के लिए गांजा , भांग , शराब पीने जैसी सलाहें भी आने लगी हैं। हल्दी के सेवन और कपूर साथ रखने का मशवरा भी सुनने में आया है। ये भी कहा जा रहा है कि होली के बाद ज्योंही तापमान बढ़ेगा त्योंही कोरोना अपने आप खत्म हो जाएगा। इसका संक्रमण होने के बाद 14 दिन तक वायरस शरीर के भीतर बना रहता है और इस दौरान कभी भी प्रभावशील होकर जान के लिए खतरा बन सकता है। भारत में अब तक इसका खास असर नहीं दिखाई दिया। संक्रमित मरीज भी विशाल जनसंख्या के लिहाज से तो बेहद कम हैं। विदेशी पर्यटकों के जरिये इसका आगमन हुआ या जो भारतीय विदेशों से लौटे वे इसका  वायरस लेकर आये ये जांच का विषय है लेकिन जिस तरह की सावधानियां बरतने का सुझाव चिकित्सक और बाकी जानकार दे रहे हैं उनमें अधिकतर स्वच्छता से सम्बधित हैं। अभिवादन में हाथ मिलाने की बजाय नमस्कार करने और कुछ भी खाने के पहले हाथ अच्छी से तरह धोने की बात भारतीय संदर्भ में नई  नहीं है। बहरहाल एल्कोहल युक्त सेनेटाईजर और मास्क का उपयोग करने जैसा सुझाव , भीडभाड़ वाले इलाकों से बचने की हिदायत का पालन करना आम भारतीय के लिए कठिन है। उल्लेखनीय है कि उक्त दोंनों चीजों की कालाबाजारी भी शुरू हो गयी है। इसी तरह करोड़ों ऐसे लोग जो झुग्गी - झोपडिय़ों में नारकीय हालातों में रहते हों उनसे उक्त सलाहों पर अमल करने की उम्मीद व्यर्थ है। एक सुझाव ये भी आया कि बाहर की खाद्य सामग्री का उपयोग न करें। आशय आनलाइन खाने की सेवा का उपयोग न करने का है। लेकिन जिस तरह की चेतावनियां और सुझाव कोरोना को लेकर आये हैं उनका संज्ञान लेने वाला वर्ग हमारे देश में बहुत छोटा है। इस कारण ये आशंका भी व्यक्त की जा रही है कि चीन जैसी स्थिति उत्पन्न होने पर भारत में कोरोना महामारी का रूप ले सकता है। और ये गलत भी नहीं है। यूँ भी हमारे देश में बीमारियों के बारे में  जितना हल्ला मचता है उनसे बचाव की व्यवस्था उस अनुपात में नहीं होती। कोरोना वायरस का इलाज करने के  बारे में तो चिकित्सा जगत अभी तक अनभिज्ञ था लेकिन भारत में  प्रतिवर्ष डेंगू और स्वाइन फ्लू का हमला होता है और पर्याप्त चिकित्सा नहीं मिल पाने से सैकड़ों मारे जाते हैं। उ.प्र. के गोरखपुर में सुअरों से फैलने वाली बीमारी की चपेट में आकर दर्जनों बच्चे हर साल काल के गाल में समा जाते है। गत वर्ष बिहार में चमकी बुखार से बड़ी तादात में छोटे बच्चे मारे गए। हाल ही में यही हालात राजस्थान और गुजरात में भी बने। जब बीमारी फैलती है तब कुछ दिनों तक तो खूब हल्ला मचता है लेकिन बाद में सब कुछ पहले जैसा ही होकर रह जाता है। देश की राजधानी दिल्ली में डेंगू का हमला सालाना कार्यक्रम जैसा है। इन सभी बीमारियों की मुख्य वजह गंदगी और मच्छर हैं। प्रधानमंत्री के राष्ट्रीय स्वच्छता मिशन और स्वच्छता सर्वेक्षण का बिलकुल असर नहीं हुआ ये  कहना तो गलत होगा किन्तु देश के महानगरों तक में सफाई की व्यवस्था जिस तरह लचर है उसकी वजह से संक्रामक बीमारियाँ बे रोक - टोक भारत में तांडव मचाती हैं। कोरोना तो कुछ दिनों बाद विदा हो जाएगा लेकिन तापमान बढऩे के साथ ही गर्मियों के मौसम में होने वाली बीमारियाँ दस्तक देंगीं। फिर आ जायेगी बरसात। कुल मिलाकर भारत में मौसम जनित बीमारियों के अलावा संक्रामक बीमारियाँ पूरे तामझाम के साथ आ धमकती हैं और पूरी चिकित्सा व्यवस्था उनके सामने असहाय खड़ी  नजर आती है। भारत को विश्व की सबसे तेज बढ़ती अर्थव्यवस्था बनाने के लिए हो रहे दावों के बीच इस तरह की बीमारियों से निपटने में अक्षमता की वजह से भारत की छवि निश्चित रूप से खराब होती है। विकसित देशों में इस तरह के संकट आने पर उनकी पुनरावृत्ति रोकने के  लिये युद्धस्तर पर कोशिशें की जाती हैं लेकिन हमारे देश में उनका दिखावा ज्यादा होता है। कोरोना तो  बड़ी बात है  किन्तु अभी तो भारत मच्छरों से होने वाली बीमारियों से ही मुक्त नहीं हो सका। बेहतर हो बड़ी-बड़ी बातें करने और तात्कालिक उपाय करने की बजाय भारत में स्वास्थ्य को लेकर जागरूकता के साथ गंभीरता बरती जाए। किसी भी देश में स्वास्थ्य की स्थिति सुधारे बिना आर्थिक समृद्धि की कल्पना करना बेकार है। भारत की आर्थिक  समृद्धि का सपना बिना स्वस्थ भारत के पूरा नहीं हो सकेगा।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 4 March 2020

सांसदों - विधायकों की आड़ में लोकतंत्र का सौदा



जब भी कहीं जनप्रतिनिधियों की खरीद-फरोख्त होती है तब उसे हॉर्स ट्रेडिंग (घोड़ों का व्यापार) कहा जाता है। सांसद और विधायक को घोड़ा कहना उनका सम्मान है या अपमान इस पर अभी तक बहस नहीं हुई। बिकने और खरीदने वालों की तरफ  से भी इस व्यापार को कोई और नाम देने की मांग अब तक नहीं उठी। लेकिन गत दिवस सोशल मीडिया पर किसी की ये टिप्पणी ध्यान खींचने वाली रही कि जनप्रतिनिधियों की खरीदी-बिक्री को घोड़ों से जोड़कर इस समझदार  और वफादार पशु का अपमान न किया जाए। इस बारे में एक बात और काबिले गौर है कि विज्ञान में घोड़े को शक्ति का प्रतीक मानकर ही हॉर्स पॉवर नामक मानदंड स्थापित किया गया। वैसे अब घोड़ों का उपयोग सीमित हो चला है। तांगे और बग्गियों का चलन खत्म हो चला है। घुड़ दौड़ का आकर्षण भी दिन ब दिन कम हो रहा है। ऐसे में सांसदों - विधायकों की खरीदी को हॉर्स ट्रेडिंग कहना लगता तो अटपटा ही है लेकिन पशु संरक्षण में अग्रणी मेनका गांधी ने भी कभी इस नामकरण पर आपत्ति नहीं व्यक्त की। इस चर्चा का ताजा-तरीन संदर्भ मप्र में चल रही राजनीतिक हलचल है। कांग्रेस नेता और पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह बीते दो तीन दिनों से लगातार ये आरोप लगा रहे हैं कि भाजपा कमलनाथ की सरकार को गिराने के लिए बसपा-सपा, निर्दलीय सहित कुछ कांग्रेस विधायकों को 30 से 35 करोड़ देकर तोडऩा चाह रही है। मुख्यमंत्री कमलनाथ ने भी इसकी पुष्टि की है। एक दो कांग्रेस विधायकों ने भी ये दावा किया कि उन्हें भाजपा से वैसा ऑफर मिला है। गत दिवस श्री सिंह ने ये कहकर सनसनी पैदा कर दी कि कुछ विधायकों को विशेष विमान से दिल्ली ले जाकर एक पांच सितारा होटल में ठहराया गया है। ये खबर भी आई कि दिग्विजय खुद पतासाजी करने उस होटल जा पहुंचे और आरोप लगाया कि उन्हें होटल में जाने नहीं दिया गया। इसी के साथ उन्होंने ये भी फरमाया कि विधायकों से उनकी बात हो गयी है और वे लौट आएंगे। इधर बसपा विधायक के पति ने कांग्रेस के आरोपों का खंडन किया है। मप्र कांग्रेस की आन्तरिक राजनीति में दिग्विजय और कमलनाथ से छत्तीस का आंकड़ा रखने वाले ज्योतिरादित्य सिंधिया ने बहरहाल इस समूचे घटनाक्रम से अनभिज्ञता जाहिर की है। ज्ञातव्य है श्री सिंधिया इस समय कोप भवन में हैं और उनके बगावत किये जाने की अटकलें लग रही हैं। मप्र में व्याप्त राजनीतिक आनिश्चितता किस मुकाम पर पहुंचेगी ये फिलहाल कोई नहीं बता सकता। वैसे भाजपा में चलने वाली चर्चाएं ये संकेत जरूर करती रही हैं कि वह कमलनाथ सरकार को गिराने का इरादा रखती है और मौका लगते ही अपनी कार्ययोजना को अंजाम देगी। हालांकि ऐसा होना कोई अजूबा नहीं होगा। हमारे देश में सरकार बनाने और गिराने के अलावा राज्यसभा चुनाव में भी विधायकों की खरीदी की परम्परा है। झारखंड में तो खुले आम ऐसा होता रहा। विधायकों को खरीदकर राज्यसभा में जाने वालों में विजय माल्या और उन जैसे अन्य उद्योगपति भी रहे हैं। छोटी पार्टियां अपने अतिरिक्त मत बेचकर धनकुबेरों और नामी गिरामी वकीलों को उच्च सदन का सदस्य बनने में मददगार होती रही हैं। कर्नाटक में बीते साल कुमारस्वामी सरकार गिराने की लिए भाजपा ने डेढ़ दर्जन सत्ताधारी विधायकों से इस्तीफा दिलवा दिया। बाद में उपचुनाव जीतकर वे सभी येदियुरप्पा सरकार में मंत्री पद पा गये। विचारणीय है कि दलबदल कानून के बाद भी ये कारोबार थमने का नाम नहीं ले रहा। दिग्विजय सिंह का आरोप कितना सही है ये तो वे ही जानें लेकिन उन जैसे अनुभवी नेता द्वारा 30-35 करोड़ का भाव खोलने से ये संदेह भी मजबूत हुआ है कि क्या कमलनाथ सरकार के लिए बहुमत जुटाने बसपा-सपा और कुछ निर्दलियों को भी मोटी रकम दी गई थी ? कांग्रेस ने भाजपा के दो विधायकों को भी तोड़ रखा है। तो क्या उनका ह्रदय परिवर्तन भी नोटों की गड्डियां दिखाकर किया गया ? पीवी नरसिम्हा राव की सरकार बचाने के लिए झारखंड मुक्ति मोर्चा के सांसदों को संसद भवन की भीतर लाखों की घूस दी गई थी। उसके बाद भाजपा के फग्गन सिंह कुलस्ते और अशोक अर्गल संसद में नोटों की गड्डियां लेकर आये और ये कहकर सनसनी मचा दी कि वह रकम उन्हें दलबदल के लिए दे गयी। चुनाव में निर्धारित खर्च सीमा से कई गुना ज्यादा खर्च होना किसी से छुपा नहीं है। हाल ही में छत्तीसगढ़ में आयकर छापों के दौरान जो जानकारी आई उसके अनुसार तो काले धन का उपयोग राजनीतिक कामों के लिए होता था। मुख्यमंत्री की उपसचिव पर आयकर वालों ने छापा मारा।  उनके अलावा और भी अनेक नेताओं और कारोबारियों पर दबिश दी गई। चूंकि वे सभी कांग्रेस के करीबी हैं इसलिए मुख्यमंत्री भूपेश बघेल भन्ना उठे और भागे-भागे दिल्ली गये । सवाल ये है कि राजनीति में इतना पैसा आता कहां से है ? सरकार बनाना और गिराना प्रजातंत्र का हिस्सा है। दलबदल यदि वैचारिक आधार या नीतिगत मतभेदों पर आधरित हो तब तो बुरा नहीं लेकिन प्रलोभन के कारण हो तब वह प्रजातंत्र का अपमान है। मप्र में ये पहला अवसर नहीं है जब विधायकों के पाला बदलने का खेल हो रहा हो। पिछली शिवराज सरकार के पास पर्याप्त बहुमत होने पर भी भाजपा कांग्रेस के विधायकों की तोडफ़ोड़ किया करती थी। दिग्विजय सिंह के आरोप कितने सही हैं ये आगामी कुछ दिनों में साफ हो जाएगा। राज्यसभा के चुनाव से भी इसे जोड़कर देखा जा रहा है। श्री सिंधिया की नाराजगी भी इसके पीछे हो सकती है। लेकिन एक विधायक को 30-35 करोड़ में खरीदे जाने का आरोप मामूली नहीं है। सबूत मांगे जाने पर दिग्विजय ने समय आने पर साबित करने की बात कही। यद्यपि उनके बयान गंभीरता से नहीं लिए जाते और इस आरोप के पीछे राज्यसभा में दोबारा जाने की उनकी अपनी रणनीति भी हो सकती है किन्तु सरे आम इस तरह के आरोपों से नेताओं और जनप्रतिनिधियों की इज्जत का जो होता हो सो होता हो लेकिन जनता ये सुनकर खुद को अपमानित महसूस करती है कि उसने जिन्हें मत देकर माननीय बनाया वे उसके विश्वास का सौदा करते घूम रहे हैं। दिग्विजय सिंह के आरोप बेहद गम्भीर हैं। उनका खुलासा होना चाहिए क्योंकि सवाल कुछ नेताओं का नहीं लोकतंत्र का है।

-रवीन्द्र वाजपेयी


Tuesday, 3 March 2020

काश, निर्भया के आंसुओं के बारे में भी सोच लेते



जो न्यायपालिका किसी एक मामले में आशा की किरण बनकर सामने आती है वही दूसरे में अपनी लाचारी से निराशा पैदा कर देती है। निर्भया काण्ड के दोषियों की फाँसी की तारीख फिर बढऩे के बाद देश भर से जो प्रतिक्रियाएं मिल रही हैं उनमें गुस्सा साफ देखा जा सकता है। न्याय शास्त्र की प्रसिद्ध उक्ति है कि भले ही सौ गुनहगार छूट जाएं किन्तु किसी बेगुनाह को सजा नहीं होना चाहिए। निश्चित रूप से ये एक आदर्श स्थिति है। नीर - क्षीर विवेक पर आधारित न्याय ही सही माना जाता है। इसीलिये अंतिम निष्कर्ष तक पहुँचने से पूर्व न्याय प्रक्रिया विभिन्न पायदानों से गुजरती है। साक्ष्यों के बयान , उनका प्रति परीक्षण , परिस्थितियों का विश्लेषण और कृत्य के पीछे निहित भावना भी देखी जाती है। अपराधिक प्रकरण में तो और भी सावधानी बरतनी होती है। लेकिन एक बार निष्कर्ष पर पहुँचने के बाद भी यदि सजा टलती जाए तो फिर उसकी गम्भीरता के साथ ही कानून और दंड प्रक्रिया का भय कम होता जाता है। हमारे देश में अपराध करने वालों के मन में ये बात गहराई तक जगह बना चुकी है कि कानून को वे अपनी उँगलियों पर नचा सकते हैं। इस सोच को वे अधिवक्ता भी मजबूती प्रदान करते हैं जो अपराधी के बचाव में तरह - तरह के पेंच फंसाते रहते हैं। ताजा संदर्भ निर्भया काण्ड के दोषियों के मृत्युदंड की तारीख फिर से टल जाने का है। आज उन्हें फांसी दी जानी थी। गत दिवस उनमें से एक की याचिका पर अदालत ने रहम दिखाते हुए न्याय की निष्पक्षता का हवाला देते हुए भगवान के यहाँ तक का हवाला दे दिया। न्याय में निष्पक्षता हर हाल में जरूरी है लेकिन उसकी गम्भीरता नष्ट हो जाये तो वह निरर्थक हो जाता है। निर्भया प्रकरण ने हमारे देश की दंड प्रक्रिया में सुराखों को उजागर कर दिया है। जहां तक बात अधिवक्ताओं के जमीर की है तो उसे उनकी पेशेगत जिम्मेदारी मानकर हवा में उड़ा दिया जाता है किन्तु किसी कू्रर अपराधी के साथ जब कानून रियायत और रहमत दिखता है तो समाज पर उसका बुरा असर पड़ता है। संदर्भित प्रकरण में अभी तक जो कुछ भी हुआ वह निराश करने वाला है। फांसी होगी ये तो हर कोई जानता है लेकिन जिस तरह उसकी तारीख बार-बार आगे बढ़ती जा रही है उससे न्यायपालिका के प्रति सम्मान और भरोसा भले ही कम नहीं हुआ लेकिन ये कहना गलत नहीं होगा कि वह हंसी का पात्र बनती जा रही है। भगवान के यहाँ जाकर अपराधी कानून के  निष्पक्ष न होने की शिकायत न कर सके इसकी चिंता करने वाले न्यायाधीश महोदय को ये भी सोचना चाहिए था कि भगवान के पास बैठी निर्भया हमारी न्याय प्रणाली पर आंसू बहा रही होगी।

- रवीन्द्र वाजपेयी



केजरीवाल : अपने हुए पराये



जो अरविन्द केजरीवाल कुछ समय पहले तक भाजपा विरोधी समाचार चैनलों की आंख के तारे हुआ करते थे वे अचानक खलनायक बन बैठे। कांग्रेस भी दिल्ली चुनाव के बाद उनकी बलैयाँ लेती नहीं थक रही थी। लेकिन ज्योंही दिल्ली सरकार ने कन्हैया कुमार और उनके साथियों पर राजद्रोह का आरोप पत्र दाखिल करने की अनुमति पुलिस को दी त्योंही अरविन्द क्रांतिकारी से फासिस्ट माने जाने लगे। वामपंथी प्रचारतंत्र श्री केजरीवाल द्वारा चार साल पहले किये गये ट्वीट को उछाल रहा है जिसमें उन्होंने कन्हैया के भाषण को शानदार बताया था। उन पर ये आरोप लग रहे हैं कि दिल्ली दंगों के दौरान जनता से कटे रहने की वजह से खराब हुई छवि को सुधारने के लिए उन्होंने कन्हैया को लेकर अपनी नीति बदल डाली। ये भी कहा जा रहा है कि बीते दिनों केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह से मुलाकात के बाद अरविन्द ने यू टर्न ले लिया। सच्चाई तो वे खुद ही बता सकेंगे लेकिन कन्हैया पर आरोप पत्र दाखिल करने की अनुमति के बाद वे अपने ही समर्थकों की आलोचना के शिकार होने लगे हैं। कहने वाले तो यहाँ तक कह रहे हैं कि भाजपा के साथ उनकी कोई गोपनीय डील हुई है। वैसे श्री केजरीवाल को जानने वाले ये मानते हैं कि इसके पीछे भी उनकी कोई दूरगामी राजनीति है। दरअसल बीते पांच साल में वे केंद्र सरकार से पंगा लेकर काफी परेशानी महसूस करते रहे हैं। इसीलिये चुनाव प्रचार के दौरान उन्होंने प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी पर कोई राजनीतिक हमला भी नहीं किया। उन्हें लगता है कि बिजली, पानी, अस्पताल और स्कूल के बारे में वे आगे ज्यादा कुछ नहीं कर पायेंगे। ऐसे में अगली बार जनता के सामने जाने के लिए उन्हें कुछ बड़े काम भी करने होंगे जिनके लिए केंद्र की मदद लगेगी। लोकसभा चुनाव तो अभी बहुत दूर हैं लेकिन दिल्ली के आगामी नगर निगम चुनाव में उन्हें भाजपा से मुकाबला करना पड़ेगा। पिछले चुनाव में भाजपा ने आम आदमी पार्टी का सफाया कर दिया था। वर्तमान में शाहीन बाग और दिल्ली के दंगों की वजह से श्री केजरीवाल की छवि हिन्दू विरोधी नेता की होती जा रही थी। दंगों के दौरान उनकी अनुपस्थिति से हिन्दुओं को ये लगा कि विधानसभा चुनाव में भाजपा को हराकर वे ठगे रह गए। ऐसे में श्री केजरीवाल के आत्मसमर्पण नुमा इस कदम से राजनीति के जानकार जहां सन्न हैं वहीं भाजपा इसे पसंद करने के बाद भी सतर्क है क्योंकि वे कब कौन सा पैंतरा चल जाएँ ये कोई नहीं जानता। कन्हैया पर आरोप पत्र दाखिल किये जाने की अनुमति देकर उन्होंने अपने ऊपर नक्सली होने के आरोप को भी धो डाला है। यद्यपि अभी किसी निष्कर्ष पर पहुंचना जल्दबाजी होगी लेकिन श्री केजरीवाल ने एक बार फिर साबित कर दिया कि वे सामाजिक कार्यकर्ता की छवि से आगे बढ़कर अब विशुद्ध राजनेता बन चुके हैं जिसका हर निर्णय राजनीतिक नफे-नुकसान से प्रेरित होता है।

- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 2 March 2020

भारत के लिए उबरने का स्वर्णिम अवसर




कोरोना वायरस ने चीन को तो भारी नुकसान पहुँचाया ही लेकिन उससे पूरी दुनिया प्रभावित हो रही है। पूंजी बाजार जबरदस्त गोते लगा रहे हैं। इसके प्रभावस्वरूप भारत के शेयर बाजार में भी बीते कुछ दिनों से हिचकोले महसूस किये गये। निवेशकों का अरबों का नुकसान होना बताया जा रहा है। पहले से मंदी की शिकार चल रही अर्थव्यवस्था के लिए ये हालात दूबरे में दो आसाढ़ वाली कहावत को चरितार्थ कर रहे हैं। एक तरफ  तो उक्त वायरस से संक्रमण का खतरा है वहीं दूसरी ओर चीन में आर्थिक गतिविधियाँ ठप्प हो जाने की वजह से भारत जैसे देश में कच्चे माल और अन्य जरुरी चीजों का अभाव हो गया है। जिन भारतीय उद्योगपतियों ने चीन में अपने कारखाने स्थापित कर रखे हैं वे भी काम बंद हो जाने की वजह से मुसीबत में फंस गए। हालंकि चीन की अर्थव्यवस्था में मंदी आने के आसार नजर आते ही अनेक बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ पहले से ही अपना कारोबार समेटकर भारत में जमने की सोचने लगी थीं किन्तु मौजूदा स्थितियों में अब ऐसा करना उनके लिए संभव नहीं रहा। चूँकि चीन से न कोई आ रहा है और न ही वहां जा रहा है इसलिए वहां की स्थिति कब तक सुधरेगी ये पता नहीं लग पा रहा। निश्चित रूप से ये एक बड़ा संकट है जो आर्थिक सुस्ती को और गम्भीर बना रहा है किन्तु मुश्किल के इस दौर में में भी नई उम्मीदें जागृत हो रही हैं। आर्थिक जगत की जानकारी रखने वाले अनेक विशेषज्ञ ये मान रहे हैं कि इस संकट में भारत के लिए उद्योग-व्यापार क्षेत्र में अपार संभावनाएं पैदा हुईं हैं। औद्योगिक संगठनों की प्रतिनिधि संस्था एसोचैम ने इस धारणा की पुष्टि करते हुए कहा है कि कोरोना वायरस से पैदा हुए हालात भारत के निर्यात बाजार को नई ऊँचाइयाँ प्रदान कर सकते हैं। हालंकि ये बात भी याद रखनी होगी कि बीते दो दशक के दौरान भारतीय उद्योग कच्चे माल के लिए काफी हद तक चीन पर निर्भर करने लगे हैं। यही वजह है कि कोरोना संकट के बाद से भारत का मैन्युफेक्चरिंग सेक्टर भी संकटग्रस्त हो गया। लेकिन जब ये तय हो गया कि चीन को उससे उबरने में लंबा समय लगेगा तब विश्व बाजार में उसकी जगह लेने वाला सबसे उपयुक्त देश भारत ही हो सकता है। ये उम्मीद कोई और जताता तब शायद उस पर भरोसा नहीं होता लेकिन एसोचैम जैसे संस्थान ने इस सम्भावना को विश्वसनीय माना तब उम्मीद की जा सकती है। लेकिन केवल खयाली पुलाव पकाने से भारत विश्व बाजार में चीन के स्थान को भरने में सफल नहीं हो सकेगा। अच्छा होगा केन्द्र और राज्य सरकारें उद्योगों के लिए विशेष पैकेज और रियायतें घोषित करें। वैसेे भी आर्थिक सुस्ती से निपटने के लिए ऐसे कदमों की उम्मीद और जरूरत थी। अब जबकि चीन से मिल रही प्रतिस्पर्धा में व्यवधान आ गया है इसलिए भारत के पास स्वर्णिम अवसर है अपनी अर्थव्यवस्था को ऊंचाइयों पर ले जाने का। भारत में कारोबारियों के पास खासा अनुभव है और काम करने वाले हुनरमंद कामगार भी। ऐसे में इस मौके को लपकने में भी यदि भारत चूक गया तब सिवाय हाथ मलने के और कुछ नहीं बचेगा। केंद्र सरकार कहने को तो आर्थिक सुस्ती से निपटने के लिए काफी कुछ करने के दावे कर रही है लेकिन कोरोना वायरस के बाद उत्पन्न हालातों में अब ऐसे उपाय करने की जरूरत है जिनका लाभ त्वरित मिलने लगे। किसी देश के राजनीतिक नेतृत्व और आर्थिक प्रबंधन की परीक्षा ऐसे ही अवसरों पर होती है। वैसे भी नरेंद्र मोदी सरकार को इसी मोर्चे पर सर्वाधिक आलोचना झेलनी पड़ रही है। ऐसे में यदि वह समय रहते देश में अनुकूल वातावरण बनाकर औद्योगिक गतिविधियों में तेजी लाने के लिए नीति निर्धारण करे तो बड़ी बात नहीं भारत के आर्थिक महाशक्ति बनने का रास्ता खुल सकता है। यद्यपि कुछ लोगों का अभी भी ये मानना है कि चीन लम्बे समय तक इस स्थिति में नहीं रहेगा और जल्दी ही दोबारा मैदान में उसी हौसले के साथ खड़ा नजर आयेगा लेकिन वैश्विक शक्ति संतुलन के मद्देनजर ये कहा जा सकता है कि अमेरिका सहित पश्चिम के विकसित देश उसे पहले जैसा पनपने नहीं देंगे। सही बात ये है कि विश्व व्यापार संगठन के नाम पर आई मुक्त अर्थव्यवस्था जिन विकसित देशों ने अपनी मंदी दूर करने के लिए दुनिया भर पर थोपी थी वे उसका अपेक्षित लाभ नहीं ले पाये जबकि चीन ने अपने चारों तरफ  खींचे लौह आवरण को स्वयं होकर तोड़ते हुए अपने दरवाजे पूरे विश्व के कारोबारियों के लिए खोलकर अकल्पनीय तरक्की हासिल कर ली। अमेरिका के बाजारों तक में चीन का बना सामान धड़ल्ले से बिकने लगा। कोरोना वायरस ने चीन के उस दबदबे को पलक झपकते कमजोर कर दिया। विकसित देशों में चूँकि श्रमिक बहुत महंगे हैं इसलिए वे चीन में उत्पादन गतिविधियाँ ठप्प होने का लाभ चाहकर भी नहीं ले सकेंगे। सस्ते मानव संसाधन के मामले में भारत ही चीन के मुकाबले वैश्विक अपेक्षाओं को पूरा करने में सक्षम है। एसोचैम द्वारा दिए संकेत के मर्म को समझकर केन्द्र सरकार को फौरन ऐसा कुछ करना चाहिए जिससे उद्योग-व्यापार जगत निराशा से निकलकर उत्साह का प्रदर्शन करे। भाग्य में विश्वास नहीं करने वालों को भी ये तो मानना ही पड़ेगा कि कोरोना वायरस में जहां चीन का दुर्भाग्य निहित है तो वह भारत की किस्मत खोलने का अवसर भी लेकर आया है। अब ये हमारे ऊपर है कि हम उसका किस तरह फायदा उठा पाते हैं।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 29 February 2020

कन्हैया : चार साल में आरोप पत्र तो सजा कितने साल में



9 फरवरी 2016 अर्थात चार साल से भी ज्यादा पहले दिल्ली के जेएनयू में देश विरोधी नारे लगाये जाने की घटना हुई थी। उसमें तत्कालीन छात्रसंघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार सहित अनेक लोगों पर देशद्रोह का मामला दर्ज हुआ था। कुछ समय तक वे सभी जेल में भी रहे। प्रकरण की जाँच के बाद पुलिस ने दिल्ली सरकार से अदालत में आरोप पत्र पेश करने की अनुमति माँगी लेकिन केजरीवाल सरकार उसे दबाकर बैठी रही। इससे उसके ऊपर आरोप लगते रहे कि वह देशद्रोह के आरोपियों को बचा रही है। उक्त प्रकरण में आरोपित बाकी लोगों के बारे में तो जनसाधारण को ज्यादा पता नहीं है लेकिन कन्हैया डाक्टरेट की उपाधि प्राप्त करने के बाद राजनीति में उतर आया और अपने वामपंथी रुझान के अनुरूप विधिवत सीपीआई में शामिल होकर बिहार की बेगुसराय सीट से लोकसभा चुनाव लड़ बैठा और बुरी तरह से हारा। लेकिन बीते कुछ समय से वह बिहार में घूम-घूमकर आगामी विधानसभा चुनाव के लिए अभियान चला रहा है। राजनीति के अनेक जानकार उसे महत्व भी दे रहे हैं। गत दिवस अचानक खबर आई कि दिल्ली सरकार ने कन्हैया और उसके साथ के सभी आरोपियों पर देशद्रोह का मुकदमा चलाने की अनुमति पुलिस को दे दी है। इस पर कन्हैया ने व्यंग्यपूर्ण प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए केजरीवाल सरकार को बधाई दी और लगे हाथ ये मांग भी कर दी कि प्रकरण फास्ट ट्रैक अदालत में भेजा जाये जिससे जल्द फैसला हो सके। इस बारे में ज्ञात हुआ है कि दिल्ली सरकार ने 400 दिन अनुमति देने  में लगाये। वह भी तब जब सम्बन्धित अदालत ने इस बारे में दबाव बनाया। किसी भी अपराधिक प्रकरण में जब तक आरोप पत्र दाखिल न हो तब तक मुकदमा आगे नहीं बढ़ता। ये मामला चार साल पहले का है। अव्वल तो पुलिस ने जांच में भरपूर समय लगाया और फिर बची-खुची कसर पूरी कर दी केजरीवाल सरकार ने। अनुमति मिल जाने के बाद अब पुलिस आरोप पत्र अदालत में दाखिल करेगी जहां पेशी दर पेशी सुनवाई टलती रहेगी। निचली अदालत से होते हुए सर्वोच्च न्ययालय तक का सफर पूरा होते-होते कितना समय लगेगा ये बड़े-बड़े भविष्यवक्ता भी नहीं बता सकते। सवाल ये है कि तेज फैसले करने के लिए मशहूर केजरीवाल सरकार ने इतने चर्चित और संवेदनशील मामले में अनुमति देनी में 400 दिन क्यों लगाये ? मामला छात्र आन्दोलन के दौरान होने वाले सामान्य झगड़ों से जुड़ा होता तब इस विलम्ब पर ध्यान नहीं जाता किन्तु देशद्रोह जैसी संगीन धाराओं में दर्ज मुकदमे में आरोप पत्र दाखिल करने में की गई देरी चौंकाने वाली है। कन्हैया एक चर्चित शख्सियत बन चुका है। हालाँकि उसके राजनीतिक भविष्य को लेकर कुछ कहना जल्दबाजी होगी क्योंकि वह जिस सीपीआई से जुड़ा हुआ है वह अस्तित्वहीन होने की कगार पर है। दूसरी बात ये है कि बिहार में नीतीश सरकार के विरोधी दल उसे कितना भाव देंगे ये स्पष्ट नहीं है। लेकिन इन सबका देशद्रोह के प्रकरण से कोई सम्बन्ध नहीं है। राजनीति में उतरने के कारण कन्हैया को प्रताडि़त किया जाए ये अनुचित है। उसी तरह नेतागिरी में आने के बाद उसके अपराध को नजरंदाज किया जाना भी गलत है। कानून के सामने सभी बराबर होते हैं और कन्हैया भी अपवाद नहीं है। यही वजह है कि घटना के चार साल बाद जब गत दिवस उस पर आरोप पत्र पेश किये जाने की अनुमति दिल्ली सरकार से पुलिस को मिली और वह भी 400 दिन तक दबाए रखने के बाद तो कन्हैया और उसके साथ के बाकी आरोपी ही नहीं हर समझदार व्यक्ति को आश्चर्य के साथ गुस्सा भी आया। हमारे देश की न्याय व्यवस्था कितनी धीमी रफ्तार से चलती है उसका प्रमाण निर्भया प्रकरण के दोषियों की फांसी में हो रहे विलम्ब से मिल चुका है। दिल्ली के शाहीन बाग़ धरने को लेकर भी न्यायपालिका ने जिस तरह का टरकाऊ रवैया दिखाया वह भी शोचनीय है। लेकिन देशद्रोह के आरोपियों को सालों तक छुट्टा घूमने दिया जाए तो इससे कानून का मजाक उड़ता है। कन्हैया पर अब मुकदमे की शुरुवात होगी। गवाहों के बयान और उनका प्रति-परीक्षण चलेगा। इस सब में कितना समय लगेगा ये कोई नहीं बता सकता। अंतिम फैसला आते-आते कन्हैया युवा से प्रौढ़ हो चुका होगा। देश की राजनीति में भी न जाने कितना बदलाव आ जायेगा। लेकिन उससे भी बड़ी बात ये होगी कि लोगों की स्मृति से समूचा प्रकरण लुप्त होकर रह जाएगा। इस मामले में दिल्ली सरकार की मंशा सवालों के घेरे में आ गई है। इसके पीछे कारण राजनीतिक संरक्षण हैं या प्रतिशोध ये साफ होना चाहिए। जेएनयू को लेकर जितने भी विवाद हुए उनमें अरविन्द केजरीवाल और उनकी पार्टी ने दूर से देखने की नीति अपनाई। कन्हैया एंड कम्पनी चूँकि मोदी सरकार को पानी पी-पीकर कोसती है इसलिए वह आम आदमी पार्टी को अच्छी लगती रही लेकिन कथित देश विरोधी गतिविधियों के कारण वह अपना दामन बचाने के लिए उससे दूरी भी बनाये रही। देशद्रोह के आरोप पत्र की अनुमति में विलम्ब के पीछे केजरीवाल सरकार की राजनीतिक सोच थी या फिर सामान्य प्रशासनिक आलस्य ये स्पष्ट होना चाहिए। लेकिन इतने चर्चित और संवेदनशील मामले के चार साल बाद भी आरोप पत्र दाखिल न हो पाना शर्म और चिंता दोनों का विषय है। कन्हैया कसूरवार है या नहीं ये तो अदालत तय करेंगी किन्तु न्याय में जितनी देरी होगी उतनी ही उसे सहानुभूति मिलती रहेगी। देशद्रोह के मामले में जब ये हाल है तब बाकी का क्या होता होगा इसका अंदाज आसानी से लगाया जा सकता है।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 28 February 2020

सहयोग की आड़ में मुसलमानों का उपयोग हो रहा



दिल्ली के दंगों के लिए कौन जिम्मेदार है ये बहस तब तक चलती रहेगी जब तक वैसा ही कोई दूसरा हादसा न हो जाए। लेकिन सीएए नामक जिस मुद्दे के कारण ये स्थिति बनी वह अभी भी कायम है और रहेगा क्योंकि उसे लेकर किये गये दुष्प्रचार ने पूरे देश में सांप्रदायिक तनाव की जो स्थिति पैदा की है उसको बदलने में लम्बा समय लगेगा। इस कानून को मुस्लिम विरोधी बताकर जो राजनीति की गई उसकी वजह से भ्रम का वातावारण बन गया। चूंकि मुस्लिम समाज में आज कोई भी राजनीतिक चिन्तक-विचारक नजर नहीं आता इसलिए वह धर्मिक सोच से आगे निकल नहीं पा रहा। मुलायम सिंह और लालू यादव जैसे नेताओं ने मुसलमानों को यदि अपने साथ जोड़ा तो उसका कारण न तो उनका समाजवादी हो जाना था और न ही सामाजिक न्याय के नारे से सरोकार। दरअसल पहले मुस्लिम समाज मुख्यत: कांग्रेस का समर्थक था लेकिन आपातकाल के बाद 1977 में हुए लोकसभा चुनाव में वह पहली बार उसके छिटका। हालांकि बाद के कुछ सालों में वह लौटकर फिर उसी के साथ गया किन्तु नब्बे के दशक में जब भाजपा ने हिंदुत्व को अपनी राजनीति का घोषित एजेंडा बनाकर राम मंदिर का मुद्दा हाथ में लिया तब मुसलमानों को ये लगने लगा कि केवल कांग्रेस से चिपके रहने से उनका भला नहीं होगा। लिहाजा वे अलग-अलग राज्यों में विभिन्न पार्टियों के पीछे चलने लगे किन्तु जैसा पूर्व में कहा गया उसके पीछे राजनीतिक सिद्धांत न होकर केवल अपनी धार्मिक पहिचान को सुरक्षित रखना ही एकमात्र मकसद था। इसी के चलते ये गलती हुई कि बजाय राजनीति की मुख्यधारा में आने के वे महज मतदाता बनकर सौदेबाजी का हिस्सा बन गए। आर्थिक, शैक्षणिक या समाजिक प्रगति तो रद्दी की टोकरी में फेंक दी गयी और शरीयत की आड़ लेकर उनके दिमाग में ये भर दिया गया कि उसके बाहर जाकर सोचने मात्र तक से वे इस्लाम विरोधी बन जायेंगे। ये कहना कुछ भी गलत नहीं होगा कि मुसलमानों के बड़े वर्ग में ये डर बिठा दिया गया है कि उनकी धार्मिक पहिचान खतरे में है। इसका सबसे बड़ा कारण ये है कि मुसलमानों का नेतृत्व राजनेताओं के हाथ से निकलकर मुल्ला-मौलवियों के हाथ आ गया। धर्म में विश्वास नहीं करने वाले साम्यवादी और आधुनिकता के सांचे में ढले सुशिक्षित मुसलमान तक किसी भी सुधारवादी कदम के विरोध में खड़े नजर आये। बात शाहबानो के मामले से शुरू होकर तीन तलाक रोकने तक आ गई लेकिन शरीयत के नाम पर धार्मिक कट्टरता इस हद तक बढ़ा दी गई कि समाज के उत्थान के लिए होने वाले फैसलों तक का विरोध करने उन्हें मजबूर कर दिया गया। परिणामस्वरूप जो थोड़े बहुत मुस्लिम राजनेता थे या अन्य धर्मों के नेतागण मुस्लिम समाज के रहनुमा कहलाते थे उन सबको दरकिनार करते हुए पूरी तरह धार्मिक सोच को अपना लिया गया। यही वजह रही कि कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, लालू यादव और ऐसे ही बाकी नेताओं को छोड़कर मुस्लिम समाज असदुद्दीन ओवैसी जैसों में अपना भविष्य देखने लगा। भले ही ओवैसी अभी भी एक सीमित क्षेत्र में ही प्रभावशाली हैं किन्तु उनसे प्रभावित होकर देश के विभिन्न हिस्सों में मुस्लिम समुदाय में ऐसे नेतृत्व ने जन्म ले लिया जो मुसलमानों को शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, महिला सशक्तीकरण जैसे मुद्दों से दूर रखते हुए शरीयत के नाम पर उनका भयादोहन करने में जुट गया। तीन तलाक पर रोक चूँकि सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश पर लगी और मुस्लिम समाज की कतिपय महिलायें ही इसके लिए प्रयासरत रहीं इस कारण मुसलमानों की रहनुमाई करने वाले चाहकर भी ज्यादा कुछ नहीं कर सके। लेकिन कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाये जाने को मुस्लिम विरोधी प्रचारित करने का सुनियोजित प्रयास किया गया। इसके बाद सर्वोच्च न्यायालय ने जब राम मन्दिर के पक्ष में फैसला सुनाया तो कट्टरपंथियों को मुसलमानों के बीच खौफ  फैलाने का एक मौका और मिल गया जबकि अयोध्या ही नहीं उसके बाहर के मुसलमान भी उक्त फैसले से राहत का अनुभव करने लगे और पूरे देश में एक पत्ता तक नहीं खड़का। उसके बाद नागरिकता संशोधन विधेयक ज्योंही आया त्योंही बड़े ही सुनियोजित तरीके से पूरे देश में ये हवा बना दी गई कि इसके जरिये मुसलमानों से उनकी नागरिकता छीन ली जायेगी। ऐसे मौकों पर किसी भी कौम के भीतर धार्मिक, सामाजिक और राजनीतिक नेतृत्व का समन्वय और संतुलन रहे तो विघटनकारी तत्व कामयाब नहीं हो पाते। लेकिन मुस्लिम समाज में इसका सर्वथा अभाव होने से कभी वह ओवैसी बंधुओं की तरफ देखता है तो कभी उसे वारिस पठान में इस्लाम का संरक्षक नजर आता है। इसी का फायदा उठाकर शर्जील इमाम जैसे लोग मुस्लिमों के अघोषित हीरो बन जाते हैं। सीएए कानून से हिन्दुस्तान में रह रहे मुसलमानों का कोई प्रत्यक्ष या परोक्ष सम्बन्ध नहीं है। उसके लागू होने से न उन्हें कोई लाभ है और न ही नुकसान। लेकिन विपक्ष ने उन्हें भड़काया और धार्मिक नेताओं ने आग में घी डालकर उन्हें ऐसे रास्ते पर धकेल दिया जो कुछ दूर जाकर बंद हो जाता है। दिल्ली के जामिया मिलिया विवि में हुई घटना के बाद शाहीन बाग जैसा आयोजन पूरी तरह अतार्किक और औचित्यहीन था। उसे स्वस्फूर्त और स्वप्रेरित बताने से बड़ा झूठ भी कुछ नहीं हो सकता। मुस्लिम समाज में राजनीतिक और सामाजिक चिन्तन की धारा चूँकि पूरी तरह सूख गई है इसलिए धजी का सांप बनाने वाले कामयाब हो गए। कहना गलत नहीं होगा कि नागरिकता जाने के मिथ्या प्रचार के फेर में मुस्लिम समाज एक बार फिर मुख्य धारा में आने से वंचित कर दिया गया। दिल्ली दंगों के पहले भी देश के अनेक शहरों में मुस्लिम समुदाय की ओर से हिंसक आन्दोलन हो चुके थे। उससे सबक लेकर शाहीन बाग़ के धरने को समय रहते उठा लिया गया होता तो मुस्लिम समाज विमर्श की प्रक्रिया का हिस्सा बना रहता लेकिन अधकचरी सोच और कौआ कान ले गया की अफवाह पर आँख मूंदकर भरोसा कर लेने की वजह से अब बात करने की हैसियत भी वह गंवा बैठा। सीएए एक वास्तविकता है जिसे नकारना दिन में आँखें बंद करते हुए रात की कल्पना जैसा है। मुस्लिम समाज को दिल्ली के दंगों के बाद तो कम से कम ये समझ लेना चाहिए कि उनका सहयोग करने वाले दरअसल उनका उपयोग कर रहे हैं। अब भी यदि वह कट्टर और गैर जिम्मेदार अनुभवहीन नेताओं के चंगुल से नहीं निकला तो वह उन स्वार्थी तत्वों के शिकार होता रहेगा जो उसे आग में धकेलकर दूर जा बैठते हैं।

- रवीन्द्र वाजपेयी