Tuesday, 21 April 2020

घर के भीतर का कबाड़ उठाकर गैरेज में रखना कोई हल नहीं : शहरों की बसाहट और आवास नीति में बदलाव जरूरी



 
कुछ दिन पहले मैंने ‘ क्योंकि धारावी में लोग नहीं वोट रहते हैं ‘ शीर्षक से देश में झुग्गी  - झोपड़ी की मौजूदगी के मद्दे नजर अपने आलेख में सुझाव दिया था कि कोरोना के बढ़ते  संक्रमण के बाद हमें अपने शहरों की बसाहट को नये सिरे से नियोजित करते हुए  कोरोना संकट  के बाद भी भविष्य  में सम्भावित  किसी महामारी में भारत सामुदायिक संक्रमण से बचा रहे इसके लिए अपने नगरों को झुग्गी विहीन बनाना होगा |

एक सुधी पाठक ने उस पर   ‘एक स्तर पर आकर भौतिक सुविधा सम्पन्न पीढ़ियों के व्यक्तियों की चिन्तन शैली ‘ , जैसी टिप्पणी भी की | लॉक डाउन का दूसरा चरण शुरू होने के बाद कोरोना संक्रमित लोगों की बढ़ती संख्या कभी खुशी - कभी गम वाली स्थिति उत्पन्न कर रही है | अभी तक के जो आंकड़े आये हैं उनमें ये बात देखी गई  है कि घनी बस्तियों में रहने वाले लोगों में  इस महामारी का संक्रमण तुलनात्मक तौर पर ज्यादा है | और ये भी कि वहां लॉक डाउन या कर्फ्यू कुछ भी लगाया जावे किन्तु सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करना नामुमकिन है |

 मेरे संदर्भित आलेख में कोरोना के बाद के भारत में झुग्गी झोपड़ी नामक कलंक को धोने की जो बात थी उसे अधिकतर पाठकों ने समर्थन दिया | लेकिन विगत दिवस  समाचार माध्यमों में देश के सबसे सम्मानित उद्योगपति रतन टाटा का एक बयान देखने मिला जिसमें उन्होंने कहा कि कोरोना के बाद हमें गन्दी बस्तियों की पुनर्बसाहट की अपनी नीति बदलनी चाहिए | उनका आशय बड़ी इमारत बनाने के लिए इन बस्तियों को दूसरी जगह बसा देने से था | श्री टाटा ने पुनर्बसाहट के दौरान गरीबों को गुणवत्तापूर्ण जीवन देने के उद्देश्य को सामने रखते हुए देश की हाऊसिंग पॉलिसी पर भी सवाल उठाये | ‘ फ्यूचर ऑफ डिजाइनिंग एंड कंस्ट्रक्शन ‘ विषय पर आयोजित एक ग्लोबल चर्चा में  उन्होंने उक्त बात कही | इस वर्चुअल पैनल डिस्कशन में 10 हजार  कारपोरेट एवं 100 से ज्याफा स्टार्टअप शामिल थे |

रतन टाटा की छवि बड़े ही सुलझे हुए व्यक्ति की है |  वे न सिर्फ एक सफल उद्योगपति हैं बल्कि समाजसेवा के क्षेत्र में उनका योगदान उन्हें हर किसी के सम्मान का पात्र बना देता है | ये कहना गलत नहीं होगा कि वे उन सर्वश्रेष्ठ भारतीयों में हैं जिनकी वजह से दुनिया भर में देश का मान - सम्मान बढ़ता है | इसीलिए जब उनका उक्त बयान पढ़ा तो मुझे अपने आलेख की सार्थकता महसूस हुई और ये भी लगा कि मैं अकेला ही नहीं हूँ , इस विषय पर और भी बहुत से लोग विचार करने लगे हैं |

 उक्त  फोरम में अपने विचार रखते हुए उन्होंने बड़ी ही साफगोई  से कहा कि मेरा सुझाव है कि गन्दी बस्तियों में रहने वालों के रहन  - सहन पर शर्मिन्दा होने के बजाय हमें उनको नये भारत का हिस्सा मानकर स्वीकार करना चाहिये | श्री टाटा ने गन्दी बस्ती उन्मूलन की नीति  बनाते समय वहां के लोगों की जरूरतों और गुणवत्ता के स्वीकार्य मानकों को ध्यान में रखने की बात भी कही |

श्री टाटा के उक्त विचार जानकर मुझे लगा कि अब इस विषय पर राष्ट्रीय बहस शुरू होकर किसी अंजाम तक जरुर पहुंचेगी | किसी भी देश पर जब आपदा आती है तो उसके कारण जन और  धन का नुकसान  तो होता ही है किन्तु उसका जो सबसे बड़ा दुष्परिणाम सामने  आता है , वह है अवसाद | चारों तरफ बर्बादी , भय और लाशें देखते - देखते सामूहिक चेतना सामूहिक वेदना में बदल जाती है और समाज का बड़ा तबका जीवन के प्रति निराशा के भाव से भर उठता है | ऐसा होना अस्वाभाविक भी नहीं है | 

लेकिन तस्वीर का दूसरा पहलू भी है | द्वितीय विश्वयुद्ध में उसमें शामिल प्रत्येक  देश को नुकसान उठाना  पड़ा | जो जीते वे भी उससे बच नहीं सके और जो परास्त हुए उन पर तो दोहरी मार पड़ी | उनमें जापान को तो परमाणु हमले की त्रासदी तक झेलनी पड़ी | लेकिन वहां के लोगों ने जबरदस्त पौरुष का प्रदर्शन किया | लाखों लाशों के ढेर , बर्बादी का चौतरफा मंजर और आने वाले कई सालों तक पैदा हुए बच्चों की विकलांगता देखकर किसी का भी कलेजा बैठ जाता | लेकिन जापान ने एक उदहारण पेश किया जिजीविषा का | और मात्र 10 से 15 साल के भीतर वह देश नवनिर्माण का प्रतीक बनकर विकास की ऊँचाइयों को  छूने लगा |

बाकी एशियाई देशों की तुलना में जापान में भी आबादी का घनत्व बहुत ज्यादा है | जमीन की कमी के कारण भविष्य की आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर पुनर्निर्माण की जो नीति बनाई गयी उसने जापान में विध्वंस और गरीबी के रहे - सहे अवशेष  भी मिटाकर रख दिए |

भारत 1947 में जब आजाद  हुआ तब एक चलता हुआ देश अंग्रेज सौंप गए थे | हमें केवल अपनी जरूरतों का पुर्निर्धारण करते हुए भविष्य की राह बनाना थी | इसे लेकर प्रयास नहीं हुए ऐसा तो नहीं कहा जा सकता | लेकिन अनेक ऐसी चीजें उपेक्षित हो गईं जो कालान्तर में लाईलाज बीमारी की शक्ल ले बैठीं | आवास समस्या और शहरों तथा महानगरों की व्यवस्थित बसाहट को लेकर जो लापरवाही बरती गई उसका दुष्परिणाम मुम्बई की धारावी झोपड़ पट्टी के रूप  में सामने आया | और देखते - देखते पूरे देश में उसके छोटे रूप नजर आने लगे |

 दुर्भाग्य से बजाय समस्या को हल करने के उसे इतना जटिल बना दिया गया कि स्थिति मर्ज बढ़ता गया ज्यों - ज्यों दवा दी वाली हो गई। कोरोना ने इस दुखती रग पर हाथ रखने के लिये मजबूर न किया होता तब शायद न मैं सोचता और न ही रतन टाटा जैसे बड़े लोग | 

हमें ये स्वीकार करने में भी नहीं हिचकना  चाहिये कि ऐसा हम उन गरीबों की बेहतरी से ज्यादा अपनी और अपनी संतानों की सुरक्षित ज़िन्दगी के लिए सोच रहे हैं |

इसलिए  अब जो नया भारत विकसित हो उसमें पहले से बेहतर के साथ ही सबके लिए सुलभ चिकित्सा सुविधाओं के अलावा हर इन्सान के लिए रहने लायक ऐसे आवास की उपलब्धता सुनिश्चित हो जिसमें जीवन की न्यूनतम सुविधाएँ रहें  | यदि अब भी भारत ऐसा नहीं कर  पाया तो ये एक बड़ी सामाजिक , आर्थिक  समस्या के साथ ही महामारियों का स्वागत द्वार बना रहेगा |

 रतन टाटा ने भी इसीलिये कहा कि झोपड़ पट्टी में पास - पास रहने के बारे में  इस महामारी ने चेताया है | देश की आवास नीति में शहरों की बसाहट को भावी जरूरतों के मुताबिक बनाने के साथ ही झोपड़ पट्टियों को एक जगह से हटाकर दूसरी जगह उनका पुनर्वास कर देना बुद्धिमता नहीं  कही जा सकती | 

कुछ बीमारियों को राज रोग कहा जाता है क्योंकि अक्सर सम्पन्न वर्ग ही उनका शिकार होता है | विलासितापूर्ण जीवन शैली  ऐसी बीमारियों को शरीर में प्रवेश का रास्ता दिखाती हैं |

 लेकिन कोरोना ने बता दिया कि वह पूरी तरह समाजवादी है | उसकी नजर में अमीर - गरीब और  महल  - झोपड़ी में कोई अंतर नहीं है | इसने इस आत्मविश्वास को भी झुठला दिया कि आम भारतीय की रोग प्रतिरोधक क्षमता जबरदस्त है क्योंकि वह जिस तरह की परिस्थितियों में रहता है उसकी वजह से वायरस उसका कुछ नहीं बिगाड़ पायेगा |

 लेकिन ज्योंहीं उसका फैलाव हुआ तो क्या बंगला - कोठी और क्या झोपड़ पट्टी , सभी को उसने अपने बाहुपाश में जकड़ लिया | भारत के  बारे में ये माना जा रहा है कि ये कम से कम नुकसान के साथ कोरोना पर विजय हासिल करने में कामयाब हो जाएगा | लेकिन मेरे पूर्व आलेख के बाद अब रतन टाटा का ये कहना कि महामारी ने हमें सघन बस्तियों की बसाहट के खतरे से आगाह कर दिया , सोचने को मजबूर कर देता है | विचारणीय बात ये हैं कि ये महामारी दोबारा नहीं आयेगी इसकी गारंटी कोई भी नहीं दे सकता और क्या पता अगली बार किसी और नाम और लक्षणों के साथ नया वायरस हम पर हमला कर दे |

 ऐसे में हमें न केवल झोपड़ पट्टी का पुनर्वास नये तरीके से करना चाहिए   बल्कि अपने  महानगरों ही नहीं महानगर बनने की राह पर अग्रसर दूसरे बड़े शहरों में प्रवासी मजदूरों की आवासीय व्यवस्था के बारे में भी व्यापक कार्ययोजना बनानी चाहिए | ये भी कि बड़े शहरों के आकार और जनसंख्या का भार वहन करने की क्षमता का अध्ययन करते हुए उनके असीमित विस्तार को रोका जाए |

भविष्य में किसी ऐसी ही महामारी से यदि देश को सुरक्षित रखना है तो आबादी का विकेंद्रीकरण करना जरूरी है | घर के भीतर का कबाड़ उठाकर गैरेज में रख देना तात्कालिक निदान तो हो सकता है लेकिन आगे जाकर वह भी नई समस्या बने बिना नहीं रहेगा | इसीलिये पहले झुग्गियों का विस्थापन और उसके बाद किसी और जगह पुनर्स्थापन करना भी घर  के भीतर का कबाड़ गैरेज में जाकर रख देना  जैसा ही हैं |

 भारत के सामने अनेक नए अवसर आने वाले हैं लेकिन उनको सफलता  में बदलने के लिए अपने शहरों और उनमें झुग्गी बनाकर रह रहे लोगों का रहन सहन सुधारते हुए गरीबों  के जीवन स्तर को ऊँचा उठाने का काम करना होगा | वरना महामारी जैसी आपदाएं आती  रहेंगीं और लोग मरते रहेंगे |

 न सिर्फ ध्यान देने बल्कि याद रखने वाली बात ये है कि महामारी केवल मेड इन चाइना हों , ये जरूरी नहीं | वह मेड इन इण्डिया भी तो  हो सकती है | इसलिए बेहतर होगा  शहरी बसाहट में झोपड़ पट्टी का समुचित विकल्प ढूंढा जाए क्योंकि कोरोना तो अपेक्षाकृत सम्पन्न वर्ग से शुरू हुआ  परन्तु भावी महामारी ने कहीं झोपड़ पट्टी से शुरुवात की तो जो स्थिति बनेगी उसकी कल्पना भी रोंगटे खड़े कर देती है |

पेट्रोल-डीजल के उपयोग पर भी लॉक डाउन किया जाये



अमेरिका में गत दिवस कच्चे तेल के भाव जमीन से भी नीचे चले गये। कहा जा रहा है वहां बोतलबंद पानी पेट्रोल से भी महंगा बिक रहा है। अमेरिका के पास अपने तेल भंडार भी हैं लेकिन वह उन्हें सुरक्षित रखते हुए तेल उत्पादक बाकी देशों से कच्चा तेल खरीदता है। विलासितापूर्ण जीवन शैली के कारण वहां ऐसी कारें बड़ी संख्या में हैं जिनमें ईधन खर्च बहुत ज्यादा है। जिन शहरों में लॉक डाउन नहीं है वहां भी लोग घरों से कम ही निकल रहे हैं। बड़ी कम्पनियों ने कर्मचारियों को घर में रहकर काम करने की सुविधा पहले से ही दे दी थी। इस वजह से सड़कों पर वाहनों की संख्या भी घट गयी। इसी तरह उद्योगों में भी जहां कच्चे तेल से बनी चीजों का उपयोग होता है, वहां भी काम बंद होने से उसकी जरूरत कम हो गई। अमेरिका ही नहीं अपितु दुनिया के दूसरे सम्पन्न देशों में भी पेट्रोल - डीजल का उपयोग बड़े पैमाने पर घट जाने से कच्चे तेल की मांग में कल्पनातीत कमी आ गयी। चीन और भारत इसके सबसे बड़े उपभोक्ता हैं। चीन में तो जनजीवन सामान्य होने से फिर भी मांग है लेकिन भारत में लॉक डाउन के कारण मांग नाम मात्र की रह गयी। और कोई समय होता तो, हर देश ये कोशिश करता कि बाजार के टूटे रहने की स्थिति में वह अधिक से अधिक कच्चे तेल का भंडारण कर ले। लेकिन कोरोना प्रभाव की वजह से पहले खरीदा गया तेल ही उपयोग में नहीं आ सका। अमेरिका की समस्या तो ये हो गयी कि उसने जरूरत के मद्देनजर खरीदी के जो अग्रिम सौदे किये थे उनको पूरा करने में भी दिक्कत होने लगी क्योंकि उसकी तेल भंडारण क्षमता पूरी तरह समाप्त हो चुकी है। ये स्थिति अभूतपूर्व तो है ही लेकिन कल्पना से भी बाहर की है। कुवैत और ईराक की जंग के समय विश्व में तेल की कमी का संकट नहीं आया। पश्चिम एशिया में बीते अनेक सालों से जंग के हालात होने से कच्चे तेल के दाम भले ही ऊपर नीचे हुए हों लेकिन ये स्थिति नहीं आई कि कोई उसे लेने को तैयार नहीं हो। इसकी वजह से तेल कम्पनियों के शेयर तो नीचे आये ही लेकिन वैश्विक अर्थव्यवस्था भी अजीब से संकट में फंस गई। ये पहला अवसर है जब काला सोना कहे जाने वाले कच्चे तेल का तेल इस बुरी तरह निकला हो। कोरोना संकट आने वाले अनेक महीनों तक जारी रहेगा। वायरस के निष्क्रिय होने के बाद भी दुनिया को पटरी पर लौटने में लम्बा अरसा लग सकता है।  हवाई यातायात पूरी तरह कब तक रफ्तार पकड़ेगा ये बता पाना भी किसी के बस में नहीं है। अंतर्राष्ट्रीय पर्यटन पूरी तरह चौपट हो चुका है। कोरोना संक्रमण का भय लोगों को सैर-सपाटे से रोकेगा। व्यवसायिक यात्राएं भी कम हो जायेंगीं। बड़ी-बड़ी बैठकें तक वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से होने लगेंगी। अर्थव्यवस्था में आयी गिरावट के चलते चूंकि ऑटोमोबाइल उद्योग भी लम्बी चपत खा गया है अत: नये वाहनों की बिक्री का आंकड़ा भी उछलने के आसार नहीं है। कुल मिलाकर कोरोना ने जिस तरह पूरी दुनिया को उलट पुलट कर दिया तब कच्चा तेल आखिर कहां बच सकता था। उसका उत्पादन घटाने को लेकर तेल उत्पादक देश एकमत नहीं हैं। खाड़ी और अरब के मुल्कों ने पहल की भी थी लेकिन वेनेजुएला राजी नहीं हुआ जिसका दारोमदार तेल पर ही टिका हुआ है। ऐसे में कोरोना बाद की वैश्विक व्यवस्था में पर्यावरण संरक्षण सबसे बड़ा विषय होगा। बीते कुछ महीनों में प्रकृति को जो राहत मिली उसे जारी रखने के लिए पेट्रोल - डीजल का उपयोग घटाने पर जोर दिया जायेगा। चीन और भारत दोनों इलेक्ट्रानिक वाहनों के उपयोग को बढ़ावा दे रहे हैं। सौर उर्जा के बढ़ते उपयोग ने भी पेट्रोल-डीजल के उपयोग को कम करने का रास्ता खोल दिया। ऐसे में अब तेल उत्पादक देशों का भविष्य भी कोरोना ने संकटमय बना दिया है। दूसरे विश्व युद्ध के बाद कच्चा तेल वैश्विक अर्थव्यवस्था के साथ ही महाशक्तियों के बीच तेल स्रोतों पर कब्जे की होड़ में फंस गया। इस्लामिक आतंकवाद के पीछे भी इसी काले सोने से आई अकूत दौलत ही तो है। पश्चिम एशिया में बीते अनेक दशकों से  जिस तरह के हालात हैं वे भी बेशुमार दौलत से उपजे अहंकार का ही नतीजा है। विश्व की महाशक्तियां अरब देशों को अपने उन्नत हथियार बेचने के लिए वहां युद्ध का वातावारण बनाये रखती हैं। लेकिन अब जबकि तेल के खेल पर काफी हद तक विराम लगने की परिस्थिति उत्पन्न हो गई तब अमेरिका जैसे देशों को अपने हथियार बेचने में परेशानियां आना तय है। इन हालातों की कल्पना किसी ने नहीं की थी। अब से कुछ महीनों के बाद दुनिया का समूचा शक्ति संतुलन बदला हुआ होगा। डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिका में नये लोगों के आकर बसने पर रोक लगा दी है। अन्य देश भी अपनी व्यवस्थाएं बदल रहे हैं। ऐसे में भारत भी कैसे अछूता रह सकता है। कच्चे तेल की कीमतों में आ रही गिरावट का तात्कालिक लाभ भले हम ले लें लेकिन वह स्थायी नहीं होगा। बेहतर तो यही होगा कि वैकल्पिक ऊर्जा की तरफ  हमारे कदमों की रफ्तार बढ़े। भारत का मौसम सौर उर्जा के असीमित उत्पादन के लिए अनुकूल है। ऐसे में ये संकट भारत के लिये वरदान साबित हो सकता है। विश्व का नेतृत्व करने के लिए सबसे बड़ी जरूरत है अपने पैरों पर खड़े होने की। तेल के इस खेल में खुश होकर उछलने की बजाय हमें उसका उपयोग घटाकर अपनी प्राथमिकताएं नये सिरे से निर्धारित करनी होंगी। कोरोना संक्ट में जब अर्थव्यवस्था ठप पड़ी है तब भी विदेशी मुद्रा का भंडार भरा होने का कारण कच्चे तेल के आयात में आई जबरदस्त गिरावट ही है। अच्छा होगा कि अब भारत में पेट्रोल-डीजल के उपयोग पर भी समय-समय पर लॉक आउट किया जाए। जिसके फायदे दूरगामी होंगे।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 20 April 2020

श्रेष्ठ आचरण का अनुसरण करे नया भारत जड़ता के प्रतीक चित्रों पर माल्यार्पण बंद हो



 25 जून 1975 की रात को तत्कालीन प्रधानमन्त्री इंदिरा गांधी ने आपातकाल लगाया था | वह विशुद्ध राजनीतिक निर्णय था जिसकी वजह से देश में लोकतंत्र के पर कतर दिए गये  | विपक्ष को जेल में ठूंसकर संसद में मनमाफिक फैसले करवाए गये | मौलिक अधिकार तक निलम्बित कर दिये गये | निजी टीवी चैनलों का तो उस दौर में अस्तित्व ही न था लेकिन समाचार पत्रों पर सेंसर लग जाने से अभिव्यक्ति की आजादी भी छिन चुकी थी | वहीं दूसरी ओर रेलगाड़ियाँ सही समय से चलने लगीं , लोग  समय के पाबंद होकर  दफ्तर पहुँचने लगे , जमाखोर , मुनाफाखोर , कालाबाजारिये  पकड़े गये और भी  बहुत कुछ ऐसा हुआ जिसके आधार पर ये कहा जाने लगा कि आपातकाल देश के लिए अच्छा था | बाद में सर्वोदयी आचार्य  विनोबा भावे ने आपातकाल को अनुशासन पर्व कहकर उसे नैतिक आधार भी दे दिया | लेकिन 1977 में जब लोकसभा चुनाव हुए तब इन्दिरा जी की सत्ता सूखे हुए पत्ते की तरह उड़ गई | वे स्वयं भी रायबरेली से चुनाव हार गईं | किसी प्रधानमंत्री का पद पर रहते हुए संसद का चुनाव तक हारने का वह पहला उदाहरण था |

उसके बाद से देश में न जाने कितने सत्ता परिवर्तन हो चुके हैं लेकिन व्यवस्था में खास बदलाव नहीं होने के कारण आज भी अनेक लोग ये कहते मिल जाते हैं कि इस देश को सुधारने   के लिए आपातकाल जैसी  व्यवस्था ही कारगर होगी | कुछ का तो साफ़ कहना है कि सेना के हाथ में सत्ता दे दी जाए तो सब ठीक हो जायेगा | 

कोरोना के कारण लॉक डाउन लागू होने  पर अनेक जगहों पर लोग अनुशासन तोड़ते दिखे और भीड़ अनियंत्रित हुई तब भी तमाम लोगों का यही कहना था कि सेना बुलवाकर उसे जिम्मेदारी सौंप दी जाए तो लोग घर से बाहर निकलने की तो छोड़िये बाहर झाँकने तक की हिम्मत नहीं करेंगे |

 कोरोना चूँकि आपदा मानी गई है इसलिए इस दौरान कुछ नये दंडात्मक  प्रावधान भी किये गए |

आजकल सार्वजनिक स्थान पर थूकने की खूब चर्चा है | जुर्माने से लेकर सजा तक की बातें चल रही हैं | कोई न्यूजीलैंड का उदाहरण दे रहा है तो कोई सिंगापुर का | हाल ही में सऊदी अरब में किसी शॉपिंग मॉल में थूकने वाले को फांसी की सजा देने की तैयारी को भी नजीर बनाकर वैसी ही सख्त व्यवस्था अपने देश में भी किये जाने की मांग उठ रही है | सतही तौर पर देखें तो ये शुभ - संकेत  है कि लोग खुद होकर किसी बुरी आदत के विरुद्ध दंड की मांग कर  रहे हैं |

 लेकिन  मेरा हमेशा ये मानना रहा है कि ऐसे मामलों में किसी निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए जल्दबाजी से बचना चाहिए | देश में रेलगाड़ियां समय पर चलें , दफ्तरों में कर्मचारी और अधिकारी   समय से आयें , प्रशासन जनता  के प्रति संवेदनशील हो , व्यापारी मुनाफाखोरी , जमाखोरी और काला बाजारी से दूर रहे तथा भ्रष्टाचार करने वालों को कठोर दंड मिले , इसके लिए विपक्ष को जेल में डालने और लोगों को मौलिक अधिकारों से वंचित करना लंबे समय तक कारगर नहीं हो सकता । यदि हो भी जाए तब वह लोकतंत्र तो नहीं हो सकता और यदि हुआ भी तो चीन और पुराने सोवियत संघ जैसा ही होगा |

 यही वजह रही कि आपातकाल में सब कुछ सुधरा दिखने  के बाद भी ज्योंही जनता को अवसर मिला उसने उसको पूरी तरह से नकार  दिया | थूकने पर दंड या सजा की जहाँ तक बात है तो उससे कोई भी असहमति व्यक्त नहीं करेगा | हमारे देश में करोड़ों लोग पान , तम्बाखू और गुटका खाते हैं | उसका सेवन करने के  बाद थूकना भी सामान्य प्रक्रिया है | 

चलती हुई कार के दरवाजे को अचानक खोलकर सड़क पर पीक थूकने जैसा रोमांचक कारनामा हमारे देश में प्रतिष्ठा सूचक माना जाता हैं | सार्वजनिक स्थानों पर थूकने के विरुद्ध नारे और निवेदनों के बावजूद भी दीवारें रंगी मिल जायेंगीं | इन चीजों का शौक फरमाने वाले किसी भी वॉश बेसिन को गंदा कर आगे बढ़ जाते हैं | 

यही हाल लघुशंका निवारण का भी है | जिसके लिए हमारे देश में सड़क का किनारा और दीवार का सहारा सबसे उपयुक्त स्थान समझा जाता रहा | इसीलिए प्रधानमंत्री  नरेंद्र मोदी ने जब शौचालय को राष्ट्रीय मुद्दा बनाया तब उसका खूब मजाक भी उड़ा ।और जो डिब्बेनुमा शौचालय जगह - जगह रखवाए गये वे अव्वल तो अच्छी क्वालिटी के न थे और  न ही उनका रखरखाव ठीक से  हुआ | परिणाम स्वरूप उन पर खर्च हुआ अधिकांश धन बर्बाद हो गया | लेकिन खुले में शौच को अपराध बनाने के पहले शौचालय के महत्व और जरुरत को जनमानस में बिठा देने के कारण आज भारत उस समस्या से काफी हद तक मुक्त हुआ है | दुनिया के जिन देशों में भी  सार्वजनिक प्रसाधन की समुचित उपलब्धता है वहां खुले में शौच की प्रथा समाप्त हो गयी |

यही हाल पार्किंग का भी है | जगह - जगह नो पार्किंग  के बोर्ड तो लगे मिल जायंगे लेकिन पार्किंग की व्यवस्था नहीं होने से वाहन गलत जगह खड़े कर दिए जाते हैं | प्रशासन कभी कभार कार्रवाई करता भी है तो वह असरकारक नहीं  होती और लोग जुर्माना भरकर फुर्सत पा जाते हैं | दो पहिया वाहन चालकों को हैलमेट पहनना अनिवार्य है | सर्वोच्च न्यायाएलय तो इस बारे में सख्त निर्देश दे भी चुका है | उसके बाद भी महानगरों को छोड़कर  देश के अधिकतर हिस्सों में हैलमेट का उपयोग नहीं होता | पुलिस को जब मूड होता है तो दो चार  दिन तक चैकिंग अभियान चलता और फिर फुस्स हो जाता है |

कहने का आशय ये है कि सख्ती और कानून तब तक प्रभावशाली नहीं  होते जब तक उनके बारे में जनता के मन में विश्वास और सहमति न हो | आपातकाल की तरह ही आज भी अनेक लोग ब्रिटिश शासन की तारीफ़ करते नहीं थकते लेकिन शासन चलाने में हमारी कतिपय कमजोरियों के बाद  भी विदेशी दासता के विरुद्ध देश एकजुट था |

इस बारे में विचारणीय प्रश्न ये है कि यदि कोरोना न आता और उस पर भी तबलीगी जमात के अनुयायी थूका- थाकी न करते तब सार्वजनिक स्थल पर थूकने को दंडनीय अपराध बनाने के बारे में कौन सोचता ? 

इसी तरह क्या पान , तम्बाकू , गुटका की बिक्री होते तक थूकने की प्रवृत्ति को रोकना संभव होगा ? शौचालय एवं मूत्रालय बेशक अलग विषय हैं लेकिन जहाँ तक बात थूकने जैसी बुराई की है तो उसके लिए बड़े पैमाने पर व्यवस्था करना नामुमकिन है | उक्त चीजें खाने वाले जो थूकते हैं उससे  निश्चित रूप से गन्दगी होती है लेकिन विदेशों में च्युइंगम खाने का जो रिवाज है उसे थूकने पर तो वह बुरी तरह चिपक जाती है | इसी वजह से सिंगापुर के अलावा अनेक देशों ने उसे थूकने पर जुर्माने का प्रावधान किया |

 लेकिन ऐसी समस्याएँ केवल कानून बनाकर हल नहीं हो सकतीं | क्योंकि ये अपराध दूसरे  किस्म के हैं जिनके बारे में लोकशिक्षण के साथ ही लोगों की संकल्पशक्ति विकसित करना जरूरी है | 

नरेन्द्र मोदी राष्ट्रीय  स्वच्छता मिशन चलाकर देश को पूरी तरह चकाचक भले नहीं कर पाए हों लेकिन लोगों में सफाई के बारे में जागरूकता बढ़ी और गन्दगी देखकर  अब वे विचलित भी होते हैं | घर - घर  आकर कचरा ले जाने की व्यवस्था ने काफी बड़ा सुधार किया है । वरना लोग घर के भीतर का कूड़ा - कचरा अपने घर के सामने फेंकने में कोई संकोच नहीं करते थे |

 कुछ वर्ष पूर्व दिल्ली में एक पारिवारिक आयोजन के दौरान मुझे मोदी जी से मुलाकात और बात का अवसर मिला | मुझे लगा कि प्रधानमन्त्री के पास आने का मौका तो मिल गया लेकिन बात करें तो करें भी क्या ? और तभी मैंने स्वच्छता मिशन की बात छेड़ दी | ये देखकर संतोष हुआ कि उन्होंने बिना संकोच कहा कि मैं जानता हूँ कि शायद अपने जीवनकाल में  भारत को पूरी तरह स्वच्छ न देख सकूंगा किन्तु फिर पास में खड़े युवाओं की तरफ देखते हुए बोले कि ये पीढ़ी जरुर स्वच्छ भारत के सपने को साकार होते देखेगी | उनकी दूरदर्शिता और जमीनी सच्चाई को स्वीकार करने के  साहस ने मुझे प्रभावित किया | 

ये बात पूरी तरह सही है कि पिछले कुछ वर्षों में भारत के युवाओं में ही नहीं अपितु छोटे बच्चों तक में स्वच्छ्ता के प्रति जागरूकता बढ़ी हैं | इस तरह के अभियान जब सामाजिक स्तर पर स्वीकार्य हो जाते हैं तब वे बिना कानून के भी व्यवस्था का हिस्सा  बने बिना नहीं रहते | 

कहते हैं 1965 में मलेशिया से अलग होते समय सिंगापुर भी साधारण एशियाई देशों जैसा था लेकिन देखते ही देखते वह किसी भी यूरोपीय महानगर से ज्यादा विकसित और खूबसूरत बन गया तो उसके पीछे वहां के लोगों की मानसिकता को उस बदलाव के पक्ष में तैयार करना प्रमुख वजह बनी |

 तकरीबन 9 वर्ष पहले  श्रीलंका जाने का मौका मिला | यात्रा का मुख्य उद्देश्य अशोक वाटिका नामक उस स्थान को देखना था जहां लंकापति रावण द्वारा सीता जी को रखा गया था | मेरे साथ मित्रद्वय कमल ग्रोवर और सुभाष भाटिया भी थे | राजधानी कोलम्बो पहुंचने के बाद हमने कैंडी नामक एक खूबसूरत शहर में रात बिताई और अगली सुबह वहां से नुवराएलिया नामक स्थान रवाना हुए जहां अशोक वाटिका स्थित है |

 रास्ता बेहद खूबसूरत था | एक तरफ चाय की हरी भरी बागानें और दूसरी तरफ नदी और पहाड़ के मनमोहक दृश्य थे | कुछ दूर चलने के बाद टैक्सी चालक से रुकने के लिए इशारा किया | चूंकि वह  सिंहली भाषा जानता था इसलिए संकेतों में उसे बताया कि लघुशंका निवारण करना है | उसने कुछ देर रुकने जैसा इशारा करते हुए गाड़ी चलाना जारी रखा | हमने अनेक बार उससे कहना चाहा कि वह वाहन रोक दे ताकि हम सड़क के किनारे निवृत्त हो सकें | उस मार्ग पर यातायात भी ज्यादा न था | लेकिन उसने हमारी बात अनसुनी कर दी और फिर अचानक सड़क किनारे एक जूस पार्लर पर रुक गया | 

गाड़ी रोककर उसने हम लोगों को इशारे से बाहर बुलाया और फिर पार्लर के  भीतर बने प्रसाधन तक ले गया | वह बहुत अच्छा तो नहीं था लेकिन उस टैक्सी चालक ने अपने देश का एक परिचय बिना कुछ कहे हमें दे दिया | हालांकि हमें  बिना किसी परिचय के उस प्रसाधन का उपयोग करना शिष्टाचार के विरुद्ध लगा किन्तु टैक्सी चालक ने काउन्टर पर बैठे व्यक्ति से उसके  लिए स्वीकृति ले ली थी | बाद में सौजन्यता के विनिमय स्वरूप हमने भी वहां जूस खरीदकर पिया |

 आप कहेंगे कि इसमें ऐसा क्या  था जिसका उल्लेख किया जाए | लेकिन उस टैक्सी चालक ने हम विदेशियों को एक संदेश तो दे ही दिया कि भले ही श्रीलंका भारत की तुलना में आकार , शक्ति और सम्पन्नता में कहीं ठहरता न हो लेकिन लिट्टे समस्या से उबरने के बाद सिंगापुर जैसा बनने की महत्वाकांक्षा वहां जोर पकड़ती दिखाई दी और जैसी कि जानकारी है बीते एक दशक में भारत का ये पड़ोसी टापूनुमा देश पर्यटकों के लिए प्रमुख आकर्षण बन गया |

 लौटकर भारत पर आयें तो कोरोना के प्रकोप के बाद हमें लगा कि सार्वजनिक स्थान पर थूकना भी अपराध होना चाहिये | लेकिन  पान , तम्बाखू , गुटका खाने वाले देश में इस तरह का प्रतिबन्ध कानून से लगा पाना कैसे सम्भव होगा जबकि हर जगह उनकी बिक्री धड़ल्ले से चल रही हो | 

स्व. माधवराव सिंधिया ने रेलमंत्री के  रूप में स्टेशनों पर पान , सिगरेट वगैरह की बिक्री रोकी थी | लेकिन बाहर जब भी ऐसी कोशिश हुई तो राजनीति आड़े आ गई और लाखों  लोगों के  बेरोजगार होने का हवाला देते हुए विरोध किया गया | इसीलिए जहाँ - जहाँ गुटका प्रतिबंधित है वहां भी उसकी बिक्री धड़ल्ले से होती है |

 विगत दिवस मप्र के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भी गुटका पर रोक की बात कही है | लेकिन ये सब श्मसान वैराग्य जैसा है |  कोरोना और थूक का निकट संबंध होने की वजह से थूक का राष्ट्रीय संज्ञान लिया जा रहा है | वरना तो पूरा देश ही पीकदान बना हुआ है | 

चूंकि आजकल भारत में कोरोना के बाद के समाज को लेकर विमर्श चल पड़ा है इसलिए लगे हाथ अब ये भी तय होना चाहिए कि क्या हम अपने आचरण में बदलाव के लिए तैयार हैं ? और यदि हाँ तो वह भय का परिणाम  होगा अथवा चारित्रिक बदलाव का प्रतीक बनेगा ?

क्योंकि भय से उपजा परिवर्तन परिस्थितिजन्य होता है | आपातकाल के बाद  बिना देर किये देश पुराने ढर्रे पर लौट आया और उसके पहले आजादी मिलते ही हमारी राष्ट्रभक्ति निजी स्वार्थों के लिए बलि चढ़ गयी | क्या कोरोना पर जीत मिलते ही हम फिर से वही सब करने लगेंगे जो एक महीने पहले तक खुलकर करते थे या कोरोना के चरण हमारा आचरण सुधारने का कारण बनेंगे ?

कोरोना का अंत होते तक हम बहुत  कुछ खो चुके होंगे | आर्थिक ही नहीं सामाजिक स्तर पर भी हमें नवसृजन के लिए कमर कसनी होगी | लेकिन उसके लिए हमें उन्हें आदर्श बनाना होगा जिन्होंने भारत को मौत के जबड़े से बचा लिया |  

निराशा और विघटन की भावना फैलाने वालों को आईना दिखाने का वक्त आ गया है | वैचारिक बंधुआ बने रहकर चरण चुम्बन की प्रवृत्ति त्यागकर श्रेष्ठ आचरण का अनुसरण ही नये भारत का ध्येय वाक्य होना चाहिए | जड़ता के प्रतीक बन चुके चित्रों पर माल्यार्पण करने की बजाय उन लोगों का चरित्र चित्रण होना जरूरी है जो भारत को भय , भूख और भ्रष्टाचार से आजादी दिला सकें  |
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(चित्र श्रीलंका स्थित अशोक वाटिका में सीता जी के मंदिर का है।)

लॉक डाउन : छूट का दुरुपयोग खतरनाक



जान है तो जहान है से शुरू हुआ लॉक डाउन दूसरे चरण में आकर जान भी और जहान भी, में बदल रहा है। आज से देश के सैकड़ों जिलों में जनजीवन को सामान्य बनाने के उद्देश्य से लॉक डाउन में काफी छूट दी जा रही है। जरूरी चीजों की आपूर्ति बनाये रखने के साथ ही उनका उत्पादन करने की अनुमति भी आज से मिल गयी। कृषि कार्य के साथ ही ग्रामीण क्षेत्र में चल रहे उद्योगों को भी पूरी तरह काम करने का अवसर दिया जा रहा है। जिन क्षेत्रों में कोरोना का प्रभाव कम है वहां चुनिन्दा दफ्तरों को आधे स्टाफ के साथ शुरू करने कह दिया गया है। सरकारी विभागों में भी काम सामान्य करने के प्रयास शुरू हो रहे हैं। किराना और दवाई की दुकानों के अलावा अस्पतालों की सेवाएं पूर्ववत किये जाने की व्यवस्था हो रही है। कोरोना के संक्रमण से ज्यादा प्रभावित जिलों को खतरनाक मानकर वहां किसी भी तरह की ढील नहीं दी जा रही। जिन कार्यालयों या सेवाओं को काम करने की छूट दी गई है उनके अलावा अन्य सभी सेवाओं में सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करने के निर्देश हैं। राजमार्गों पर ट्रक परिवहन शुरू होने के कारण ढाबे , पंचर सुधारने वाले तथा मैकेनिकों को भी फिर से काम शुरू करने कहा गया है। लेकिन स्थिति की गम्भीरता को देखते हुए अनेक राज्यों ने तो अभी से लॉक डाउन की अवधि 3 मई से भी आगे बढ़ा दी है। केंद्र सरकार ने पिछली गलतियों से सीख लेते हुए किसी भी तरह का यात्री परिवहन प्रारंभ करने का मन नहीं बनाया और टिकिटों के अग्रिम आरक्षण के लिए भी मना कर दिया है। यहाँ तक कि निजी चौपाहिया वाहन में अधिकतम दो लोग ही बैठ सकेंगे। उसमें भी एक चालक की और दूसरा पिछली सीट पर बैठेगा। वहीं दोपहिया वाहन के लिए केवल एक ही व्यक्ति को अनुमति होगी। और भी अनेक सुविधाएँ आज से प्रारंभ होने जा रही हैं। लेकिन व्यापार जगत के कड़े विरोध के कारण ऑन लाइन कम्पनियों को केवल जरुरी सामान बेचने की अनुमति रहेगी। उन्हें इलेक्ट्रानिक उपकरण की भी होम डिलीवरी करने की छूट दिए जाने का भारी विरोध होने पर उसे रद्द कर दिया गया। बहरहाल इस कोशिश के साथ सरकार ने लॉक डाउन के दौरान ही निजी, सामाजिक, सार्वजानिक जीवन को सामान्य करने के साथ ही सरकारी कामकाज में भी गति लाने का प्रयोगात्मक प्रयास किया है। जिसकी सफलता और विस्तार इस बात पर निर्भर करेगा कि जनता अपनी भूमिका के निर्वहन में कितनी ईमानदार रहती है। समझने वाली बात ये है कि केंद्र और राज्यों की सरकारों के साथ ही स्थानीय स्तर पर प्रशासन द्वारा लगाई गईं बंदिशे नागरिकों की सुरक्षा के लिए ही हैं। लॉक डाउन के दौरान नि:संदेह जनता को अकल्पनीय परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है लेकिन देखने वाली बात ये भी है कि प्रशासन और पुलिस को इसे लागू करवाने में जो मशक्कत करनी पड़ रही है उसके बारे में सोचने पर हमें अपनी दिक्कतें कम लगने लगेंगी। इसी तरह चिकित्सा के काम से जुड़े लोगों के लिए भी इस दौर में युद्ध जैसी स्थितियां उत्पन्न हो गईं। बीते तकरीबन एक माह से चिकित्सा अमले के हजारों कार्यकर्ता अपने घर तक नहीं जा पाए हैं। ऐसे में अब ये हमारा फर्ज है कि आज से जो छूट मिल रही है उसका दुरूपयोग करने की मूर्खता भूलकर भी न करें। वरना छूट वापिस होगी सो अलग लेकिन कोरोना से हमारी लड़ाई को जबरदस्त नुकसान पहुंचने के साथ ही अभी तक की सारी मेहनत पर पानी फिर जाएगा। लॉक डाउन का ही असर है कि भारत में अभी तक कोरोना सामुदायिक संक्रमण की पायदान तक नहीं पहुंचा। अनेक शहरों के कुछ इलाके जरुर हॉट स्पॉट बने हुए हैं लेकिन उनकी सघन घेराबंदी के कारण स्थिति भयावाह नहीं हुई  है। ये वाकई बड़ी बात है कि सैकड़ों जिले अभी भी कोरोना की पकड़ से बचे हुए हैं। गोवा जैसे राज्य ने तो अपने आपको पूरी तरह उससे मुक्त कर लिया। बीती एक अप्रैल से कोरोना के मरीजों में वृद्धि का प्रतिशत भी पूर्वापेक्षा घटा है। मृत्यु दर तो वैश्विक अनुपात से कम है ही। इसका सबसे ज्यादा श्रेय लॉक डाउन को ही है। कुछ सिरफिरे लोगों की हरकत न हुई होती तो बड़ी बात नहीं यदि अभी तक भारत कोरोना को परास्त करने की स्थिति में आ जाता। समाज के गरीब वर्ग को इस दौरान जो मुसीबतें उठानी पड़ीं उनकी वजह से अनेक बार लगा कि सोशल डिस्टेंसिंग का पूरा मकसद ही बर्बाद हो गया। घनी बस्तियों में उसका पालन यूँ भी बेहद कठिन है। बावजूद इसके यदि हालात काबू में रहे तो ये देश का सौभाग्य ही कहा जा सकता है। ऐसे में आज से शुरू की गयी छूटों से बेपरवाह होने की जुर्रत आत्मघाती होगी। ये सभी का सामूहिक दयित्व है कि बिना जरूरत छूट के समय भी बाहर निकलने की स्वतंत्रता का इस्तेमाल न करें। कोरोना से बचाव ही उससे लड़ने का सर्वोत्तम उपाय है। सरकार को भी इस बात की चिंता है कि लोग काफी दिनों से घरों में बंद हैं। उस कारण कारोबार बंद पड़ा है। कामगार आजीविका के लिए भटक रहे हैं। वित्तीय संकट गहरा रहा है। लेकिन इस समय लॉक डाउन ही सबसे सफल साबित हुआ है। सोशल डिस्टेंसिंग इसे लागू करने का सबसे कारगर उपाय है। उम्मीद की जानी चाहिए कि लॉक डाउन के दूसरे चरण में दी जा रही रियायतों का दुरूपयोग नहीं किया जाएगा। सरकार ने एक कदम आगे बढ़ाया है। यदि जनता का रवैया सहयोगात्मक रहा तो और भी छूट मिल सकती हैं। लेकिन  भीड़ तंत्र हावी हुआ, अनुशासन टूटा तब ये सुविधा तत्काल वापिस ली जा सकती है तथा प्रतिबन्ध और लम्बे व कड़े हो सकते हैं।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Sunday, 19 April 2020

पाप साबित होने पर भी प्रायश्चियत नहीं किया तो...अगली सजा इससे भी कड़ी होगी !



 

 जिन शहरों में नदियाँ हैं वहां के लोग आजकल बड़े ही प्रसन्न हैं | नदियों का जल अपने आप स्वच्छ हो गया | घाटों के किनारों पर मछलियां  मंडराती दिख रही हैं | जल का  वैज्ञानिक परीक्षण करने पर उसकी गुणवत्ता में आश्चर्यजनक सुधार पाया गया | अनेक शहरों में सरोवरों के करीब विदेशी पक्षियों का डेरा अभी तक जमा हुआ है | किसी को दूर से पहाड़ नजर आ रहे हैं तो कोई कह रहा है कि लगता है आसमान में नए तारामंडल चमकने लगे हैं | हवा की शुद्धता नापने वाले उपकरण भी अच्छी खबर दे रहे हैं | अनेक मित्रों ने स्वीकार किया कि दिन में पारा 40 डिग्री पहुंचने के बाद भी उन्होंने अब तक अपने घरों में एयर कंडीशनर चालू नहीं किये | भले ही रात उतनी ठंडी न हो लेकिन पंखे में काम चल जाता है | मैं भी उनमें से एक हूँ | यहाँ तक कि मैंने दोपहर अख़बार के दफ्तर जाने के समय भी कार का एसी नहीं चलाया | यद्यपि इसके पीछे सरकार द्वारा किया गया आग्रह भी है किन्तु मैं देख रहा हूँ कि आधे अप्रैल के बाद भी अभी गर्मी ने उतना हलाकान नहीं किया | चूँकि इलेक्ट्रिशियन उपलब्ध नहीं हैं इसलिए विंडो कूलर्स की फिटिंग भी नहीं हो सकी |

 
वाराणसी में गंगा और यमुना की स्वच्छता से पूरे देश में राहत भरी प्रसन्नता का अनुभव किया गया | बीते कुछ दिनों से हम जबलपुर वासियों को नर्मदा नदी के बारे में भी ऐसी ही उत्साहजनक जानकारी  मिल रही है | घाटों पर कचरे का नामोनिशान नहीं है | पूजा सामग्री बेचने वाली दुकानें बंद हैं | प्रातःकाल नर्मदा स्नान करने वाले 25 मार्च से नहीं आ रहे | और शाम को नर्मदा भक्तों की , जिनमें राजनेता भी बड़ी संख्या में होते हैं ,  धमाचौकड़ी बंद है | घाटों पर होने वाले दीपदान और बहाव के अभाव में सड़ांध मारती विसर्जित पूजन सामग्री की अनुपस्थिति ने भी न जाने कितने दशकों बाद पुण्य सलिला  कही  जाने वाली नर्मदा को चैन की साँस लेने का अवसर दिया है |

बीते कुछ दिनों से स्थानीय प्रेस फोटोग्राफर नर्मदा पर फोकस कर रहे हैं | धरती  पर खड़े रहकर खींचे जाने वाले चित्रों के अलावा ऊंचाई से ड्रोन कैमरों द्वारा  लिए जा रहे चित्र देखकर लगता नहीं कि ये वही नदी है | और विगत दिवस किसी ने अंडर वाटर चित्र भी लिए जिनमें तलहटी साफ़ नजर आ रही और उसमें पड़ी वे चीजें भी जो वजनदार होने से बह नहीं सकीं | इसी तरह का सुखद एहसास नर्मदा पर ही प्रकृति निर्मित विख्यात धुंआधार जलप्रपात भी दे रहा है जिसका जल पूर्वापेक्षा अधिक दूधिया हो गया है |

 जबलपुर शहर से डुमना हवाई अड्डे जाने वाले मार्ग पर खंदारी झील के किनारे विकसित किये गये नेचर पार्क में रहने वाले वन्य पशु - पक्षी तो मानो कोरोना महोत्सव मना रहे हैं | 

पहली बार उन्हें  अनुभव हो रहा है कि ये वाकई नेचर पार्क है  | कुछ चित्रों में हिरणों के विशाल झुण्ड दिखाई   दे रहे हैं जो इसके पहले इस संख्या में किसी को नहीं नजर आये | तेंदुआ जैसे पशु भी मनुष्य रूपी दो पैरों वाले प्राणी की अनुपस्थिति से ये अनुभव कर पा रहा है कि इस वन संपदा पर पहला अधिकार पशु - पक्षी समुदाय का है |

 आप सब भी अपने - अपने स्थान पर वातावरण में आये सुखद बदलाव से आनन्दित हो रहे होंगे | कभी - कभी ऐसा भी प्रतीत होने लगता है मानो अभी तक हम सभी किसी ऐसे कमरे में रह रहे थे जिसके दरवाजे और खिड़कियां इस बुरी तरह से बंद थे कि बाहर  की हवा अंदर प्रवेश ही नहीं कर  पा रही थी | लेकिन अचानक उन सबको खोल दिया गया जिसकी वजह से कमरा रोशनी और शुद्ध हवा के अकल्पनीय अनुभव से भर उठा हो |

 पहाड़ों और अन्य पर्यटन स्थलों पर सैलानियों का हुजूम नहीं होने से उनका नैसर्गिक सौन्दर्य और निखरकर सामने आया है | देश भर में बीते 25 दिनों से पेट्रोल और डीजल का धुंआ फेंकने वाले वाहन सड़कों से गायब हैं , रेल और हवाई यातायात ठहरा हुआ है , कारखानों की चिमनियों से निकलने वाला प्रदूषण भी लुप्त है | बाकी कारोबारी गतिविधियाँ अवरुद्ध  होने से  कचरे की निकासी भी चूँकि घट गई है इसलिए प्रकृति से जुड़ी हर गतिविधि को लम्बे समय बाद जैसे आजादी मिली  |

गत दिवस  सुबह मैं घर की बालकनी में रखे गमलों में से पूजा के लिए फूल तोड़ने गया तो अर्से बाद दो तितलियां एक गमले पर सुस्ताती दिखीं | उनके आराम में खलल न पड़े इसलिए मेरे कदम ठिठक गए | कुछ देर बाद जब वे नजर नहीं आईं तब जाकर फूल प्राप्त किये | ये तो छोटा सा उदाहरण है जिससे मेरा साक्षात्कार हुआ | लेकिन जिस शहर में भी मित्रों और संबंधियों से बात होती है वे सभी ये मानते हैं कि लॉक डाउन की अन्तर्निहित परेशानियों के बाद भी माहौल में सुखद और  सकारात्मक बदलाव आया है |

 जरा पीछे चलें तो हमारे देश में पर्यावरण जिस खतरनाक स्थिति तक जा पहुंचा था उसके कारण आप  छोटे , मध्यम या महानगर कहीं भी रह रहे हों , धीमा ज़हर सांसों के जरिये शरीर में प्रविष्ट होता जा रहा था | किसी भी प्रकार का मास्क  उसे रोकने में सक्षम नहीं था | स्वस्थ जीवन के लिए केवल अच्छा रहन - सहन , पौष्टिक आहार ,आमोद - प्रामोद , सुख सुविधाएँ ही नहीं अपितु शुद्ध आबोहवा और प्रकृति के साथ अच्छा संतुलन भी जरूरी होता है |

 सम्पन्न वर्ग ने तो शुद्ध पर्यावरण के लिए अंग्रेजों की देखासीखी ब्रिटिश राज में  विकसित  हिल स्टेशनों में जाना शुरू कर दिया | लेकिन मानवीय अतिक्रमण के अतिरेक ने वहां का प्राकृतिक संतुलन बिगाड़ दिया | 

सत्तर - अस्सी  के दशक में मैंने कुमाऊं , हिमाचल , गढ़वाल और जम्मू कश्मीर में जगह - जगह रास्तों पर बहता पानी देखा था | जो ऊंचाई से झरने  की शक्ल में सड़कों  रूपी सीढ़ियों से उतरता हुआ नीचे बह  रही नदी या पहाड़ी नाले में मिलकर उसे प्रवाहमान करता था । वह जल शीतल  होने के साथ पूरी तरह साफ़ रहता जिसे वहां से गुजरने वाले लोग पीने के लिए भर लिया करते थे | पहाड़ी रास्तों में चढ़ाई  होने से वाहनों के एंजिन भी जल्दी गर्म हो जाते थे | उन झरनों का पानी उन्हें ठंडा करने में भी सहायक होता | उसके स्पर्श से थकान दूर हो जाती थी | आसपास रहने वाले वहीं से अपनी जल सम्बन्धी जरूरतें पूरी कर  लेते थे |

 लेकिन उसके बाद के दशकों में मैंने  झरनों की संख्या में उत्तरोत्तर कमी के बाद उनको लुप्त होते भी देखा | हिमालय की विशाल पर्वत श्रृंखला के आंचल में छिपे मीठे पानी के हजारों साल पुराने स्रोत के रूप में विद्यमान हिमनदों ( ग्लेशियरों ) के पिघलकर सिकुड़ जाने की जानकारी हमारी प्रमुख नदियों के अस्तित्वहीन होने के भविषयवाणी कर रही हैं |

 देश में सबसे ऊँचाई पर स्थित हिल स्टेशन है शिमला | यहाँ जाकर सैलानी गर्मी में भी ठंड का एहसास करता था| लेकिन अब हिमाचल की राजधानी में गर्मियों में भी पंखे और एसी चलने लगे हैं | पेय जल के लिए वैसी ही मारामारी होती है जैसी मैदानी शहरों में | मसूरी पहाड़ों की रानी कहलाती है लेकिन लगभग 25 वर्ष पूर्व जून के महीने में वहां जाने पर मुझे ये नहीं लगा कि मैं किसी ऊँचे स्थान पर हूँ |

 सत्तर के दशक में ऋषिकेश के शिवानन्द आश्रम में कुछ दिन ठहरा था | गंगा जी में सैकड़ों लकड़ी के बड़े - बड़े लट्ठे बहते हुए देखने के बाद कौतुहलवश पता करने पर ज्ञात हुआ कि जंगल के ठेकदारों द्वारा ऊँचाई  वाले स्थानों पर वृक्ष काटने के बाद उसके टुकड़े कर बहा दिए जाते हैं | सब पर ठेकेदार अपनी पहिचान वाला ठप्पा लगा देता था और उसके लोग मैदानी इलाका आते ही उनको उठा लेते थे  | बहुत बाद में जब चिपको आन्दोलन शुरू हुआ तब मालूम चला कि पहाड़ों का वातावरण खराब करने में वृक्षों की अविवेकपूर्ण कटाई बड़ा कारण बनी | ये दंश तो मैदानी इलाकों को  भी  वन संपदा की लूटमार के कारण सहना पड़ा | यहाँ तक कि समुद्र तट तक के सौन्दर्य तक को मानवीय वासना ने नष्ट कर दिया | मुम्बई इसका सबसे अच्छा उदाहरण है |

 समूची चर्चा का सार ये है कि लॉक डाउन के तीन सप्ताहों ने हम सबका गुनाह साबित कर दिया | कोरोना से बचाव के लिये पूरी दुनिया ज्यादा से ज्यादा वेंटीलेटर नामक उपकरण हासिल करने के लिए प्रयासरत है , जो फेफड़े का मशीनी विकल्प है | लेकिन जब कोरोना नामक वायरस के भय से समूची मानव जाति की साँसें ऊपर नीचे हो रही हैं तब प्रकृति को  लम्बे इंतजार के बाद खुली हवा में सांस लेने और अपनी मर्जी से जीने का अधिकार और अवसर मिला | लेकिन ये सब तब सम्भव हुआ जब वह मनुष्य के बेजा हस्तक्षेप से मुक्त हुई |

 ये भी कहना गलत नहीं होगा कि बीते कुछ सप्ताह प्रकृति और पर्यावरण के लिए पराधीनता से मुक्ति की अनुभूति जैसे रहे | अब जबकि ये प्रमाणित हो चुका है कि प्रकृति के साथ अमानुषिक अत्याचार के लिए हम सभी सामूहिक रूप से दोषी है तब क्या इसका दंड हमें नहीं मिलना चाहिए ? 

वर्तमान स्थिति यदि हमने स्वेच्छा से बनाई होती तब इसे सदाशयता मानकर हम दंड में रियायत के हकदार हो सकते थे लेकिन ये तो फिसल पड़े तो हर गंगे वाली कहावत को चरितार्थ करने वाली  है |

 इस सबंध में हमें ये बात बिना लाग - लपेट के स्वीकार कर लेनी चाहिए कि यदि पाप हमने किये तो उसका प्रायाश्चियत भी खुद होकर हमें ही  करना चाहिए | यदि हम इसके बाद भी सीनाजोरी करते रहेंगे तो फिर ये मानकर चलना होगा कि अभी तो प्रकृति की निचली अदालत ने हमें कुछ दिन  की नजरबंदी के साथ  एक तरह से सुधर जाने की नसीहत दी है | इसे न समझ पाने की स्थिति में दंड और कड़ा होते - होते उस स्थिति से भी आगे तक जा सकता है जिसका दर्दनाक अनुभव अमेरिका , इटली , फ़्रांस , स्पेन जैसे उन देशों को करना पड़ रहा है जो खुद को पर्यावरण का सबसे बड़ा संरक्षक होने का ढोंग तो करते हैं लेकिन धरती , समुद्र और आकाश तक में उसके साथ अत्याचार करने में कभी पीछे नहीं रहे | साथ ही गरीब और विकाशील देशों पर रौब जमाते हुई  उन्हें संधियों  और समझौतों की जंजीरों में जकड़कर अपनी चौधराहट जमाये रहे | वहीं चीन ने विकास की हवस में एक तरह  से व्यभिचारी जैसा आचरण करते हुए पूरी मानवजाति को मौत के मुहाने पर लाकर खड़ा कर दिया |

 लेकिन उक्त देशों की अपेक्षा भारत का दोष कहीं ज्यादा कहा जाएगा क्योंकि उन देशों की तो सोच ही भोगवादी है जबकि हमारा समूचा जीवन दर्शन और शैली प्रकृति के साथ मित्रता बनाये रखते हुए उसकी सुरक्षा के प्रति सदैव समर्पित रहने पर आधारित है |

 पृथ्वी को माता का दर्जा देना , सूर्य को जल अर्पित करना , तुलसी के पौधे से आध्यात्मिक चेतना प्राप्त करना जैसे संस्कारों को दकियानूसी बताने वाले दरअसल बौद्धिकता के अजीर्ण का शिकार हैं |

 मौजूदा संकट ने हमें हल्की सी सजा के साथ कुछ महत्वपूर्ण संकेत और सन्देश भी दिए हैं | उन सबका निचोड़ ये है कि लॉक डाउन समाप्त होने के बाद जब ज़िन्दगी दुबारा व्यवस्थित तरीके से शुरू हो तब हमें इस दौरान महसूस किये सुखद एहसासों को स्थायी बनाने के प्रति संकल्पबद्ध होना पड़ेगा | 

इस दौर का सबसे गंभीर और यक्ष प्रश्न ये है कि क्या हम कोरोना उपरांत आने वाने वाले दौर में अपनी पुरानी गलतियों को दोहराने से बचेंगे ? क्या गंगा , यमुना , नर्मदा के जल की शुद्धता आज जैसी ही रहेगी , क्या वायु प्रदूषण के स्तर में हुआ सुधार कायम रहेगा और क्या हिमालय में स्थित ग्लेशियरों को नष्ट होने से रोका जा सकेगा ?  

 ऐसे ही अनेक प्रश्न समूची मानव जाति के सामने प्रकृति ने रख दिए हैं | कोरोना संकट की वजह से भले ही निचली क्लास के छात्रों को बिना परीक्षा दिये ही पास किया जा रहा है लेकिन हमें प्रकृति की परीक्षा में उत्तीर्ण होना ही पड़ेगा | अन्यथा कहीं ऐसा न हो कि अगली बार हम परीक्षा देने की पात्रता तक खो दें |

 मेरे एक मित्र हमेशा कहते हैं कि इन्सान को अपना वजन और पाप स्वयं ढोना पड़ते हैं | शरीर का वजन तो  जिम में जाकर कम किया भी जा सकता है लेकिन इसके पहले कि पापों की गठरी के बोझ  से कंधे जवाब दे जाएं हमें उनके प्रायश्चियत  की प्रक्रिया शुरू कर देनी चाहिए |

 दूरदर्शन पर दिखाए जा रहे महाभारत के एक गीत की पंक्ति है :--

सीख हम बीते युगों से , नये युग का करें स्वागत ....

क्या नये युग का स्वागत करने के पहले अतीत से हम कुछ सीखेंगे या  अपने विनाश की पटकथा लिखने पर आमादा बने रहेंगे ?

ध्यान रहे ये सवाल किसी एक से नहीं सभी से है क्योंकि धरती पर अवतरित  होने के बाद तो भगवान को भी उनकी गलतियों के लिए शापित  होकर उनका दंड यहीं भोगना पड़ा था फिर हम इंसानों की क्या औकात ?

Saturday, 18 April 2020

संस्कृति रूपी धरोहर की रक्षा सरकार नहीं संस्कार करते हैं संयम ही इस युद्ध का सबसे अचूक अस्त्र है

संस्कृति रूपी धरोहर की रक्षा सरकार नहीं संस्कार करते हैं

 संयम ही इस युद्ध का सबसे  अचूक अस्त्र  है

 
परसों रात  जबलपुर के एक पत्रकार  मित्र का फोन आया और उन्होंने मुझसे विश्व विरासत दिवस (World Heritage Day) पर संदेश मांगा | मैंने  जबलपुर के  आसपास की धरोहरों के बारे में अपनी राय उन्हें बता दी | हालाँकि ये एक दिवसीय कर्मकांड मुझे रास नहीं आता | खास तौर पर इसलिए क्योंकि इसमें नैसर्गिकता कम और शुष्क औपचारिकता अधिक  होती है | हमारे देश में तो ऐसा कोई दिन नहीं होता जो किसी न किसी रूप में उत्सव न हो | घास के तिनके से वट वृक्ष और छोटे से पत्थर से हिमालय की चोटियों तक सब कुछ तो हमारी उत्सवधर्मिता के विषय हैं | कुआ , तालाब , झरना , नदी ,और समुद्र में हम देवत्व की उपस्थिति का एहसास करते हैं | चूहा जैसा छोटा सा जीव हो या हाथी जैसा विशालकाय प्राणी , सभी हमारी आध्यात्मिक  मान्यताओं से जुड़े हुए हैं | 

कहने का आशय यह है कि भारत जिस सनातन संस्कृति का अनुगामी है उसमें एकाकीपन न होकर एक समन्वयवादी दृष्टिकोण है | मानव शरीर की रचना में पंचतत्वों की उपस्थिति को भारतीय ज्ञान परम्परा ने सहस्त्रों वर्ष पहले तब समझ लिया था जब आधुनिक चिकित्सा पद्धतियाँ कल्पना के भी बाहर थीं | समूचे ब्रह्माण्ड से अपना नाता जोड़कर उसके साथ सहअस्तित्व के सिद्धांत  का पालन  करते हुए जीना  ही सही मायनों में भारतीय संस्कृति है और यही हमारी विरासत है जिसकी हमें रक्षा ही नहीं करना अपितु सुरक्षित रखते हुए अगली पीढ़ी को हस्तांतरित भी करना है |

 विश्व धरोहर दिवस पर सर्वत्र पुराने निर्माणों , किलों , महलों , धर्मस्थलों , ऐतिहासिक घटनाओं के साक्षी स्थानों सहित उन सभी को सुरक्षित रखने का संकल्प लिया गया जो प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष तौर से मानव सभ्यता से जुड़े हैं | निश्चित रूप से ऐसी धरोहरों का संरक्षण और संवर्धन होना ही चाहिए | ये अतीत से जोड़ने का माध्यम होने के  साथ ही मानव जाति की संघर्षपूर्ण विकास यात्रा के जीवंत प्रमाण हैं | 

ये बात सही हैं कि पीढ़ियां  आती और जाती रहेंगीं किन्तु हमारे पूर्वजों द्वारा निर्मित  ये अवशेष हमारे मन  में उनके प्रति श्रद्धा और सम्मान का भाव उत्पन्न करते हुए ऐसा  कुछ करने की प्रेरणा भी देते हैं जो हमारे बाद इस दौर की यादें उस दौर के लोगों को दिलाते रहें | दरअसल मानव जाति इसीलिये समस्त प्राणियों में श्रेष्ठ मानी  जाती है क्योंकि वह अतीत को सहेजने का कठिनतम प्रयास करने के साथ ही  भविष्य का निर्धारण  करने के लिए भी अपनी पूरी प्रतिभा का उपयोग करती है जो उसके हाथ में नहीं है  | उसकी इसी प्रवृत्ति ने तो विज्ञान को जन्म दिया जो शोध के बाद तथ्यों के आधार पर प्रामाणिकता के साथ अपनी बात स्थापित करता है |

 इस आधार पर देखें तो केवल पुराने भवनों या अन्य निर्माणों के अवशेष ही धरोहर नहीं होते बल्कि ज्ञान भी धरोहर है जिसको संरक्षित रखते हुए उसका संवर्धन करना जरूरी है | 

भारतीय संदर्भ में देखें तो श्रुतियों से स्मृतियों और फिर वेद - पुराण , उपनिषद से होते हुए रामायण और महाभारत के रूप में हमें जो अमूल्य धरोहरें प्राप्त हुईं वे हम पर हमारे पूर्वजों का बहुत  बड़ा उपकार है  | वरना बीते इतिहास के ऐसे अनेक मानव निर्मित अवशेष हैं जिनके दौर का इतिहास तो दुनिया जानती है लेकिन उस विरासत का कोई वारिस न होने से वे  लावारिस होकर रह गये  |

 सिन्धु घाटी  , मिस्र , ग्रीक सभ्यता जैसे अनेक नाम हैं जिनके भौतिक अवशेष  आज भी विद्यमान हैं और उन्हें विश्व धरोहर मानकर संरक्षित भी किया जाता है । लेकिन उनके प्रति न किसी का लगाव है और न ही रूचि | और यहीं संस्कृति जैसा शब्द महत्वूर्ण हो जाता है जो किसी भी विरासत के व्यवस्थित हस्तान्तरण की प्रणाली विकसित करते हुए उसे अमरत्व प्रदान कर  देती है । 

सभ्यता  जैसी  किसी बात का  तो अब जिक्र नहीं होता लेकिन संस्कृति की बात आते ही भारत विश्व मानचित्र में एकमात्र ऐसे देश के तौर पर विद्यमान है जिसकी संस्कृति का प्रारंभ कालगणना की सीमाओं से भी परे है | और यही वजह है कि सभ्यताओं के नाम पर उत्पन्न व्यवस्थाएं एक निश्चित कालखंड के बाद अपनी मौत मर गईं क्योंकि उनमें मानव मूल्यों का अभाव  होने के साथ ही सांसारिक व्यक्ति को ईश्वर मानकर उसकी सत्ता को  स्वीकार करने के लिये डाला जाने वाला दबाव था | उनके जल्दी अस्तित्वहीन होने का एक कारण ये भी रहा कि वे किसी सनातन परंपरा से अलग तात्कालिक रूप से गढ़ी  गई मान्यताओं को ही अंतिम सत्य मानती थीं | ऐसा नहीं था कि उन सभ्यताओं के काल में विचार शून्यता रही हो | अनेक दार्शनिक और वैज्ञानिक ऐसे हुए जिनका दर्शन और शोध आज तक अध्ययन का विषय है  | लेकिन उनके अपने दौर में ही उसे नकार भी दिया गया |

 इसके विपरीत  भारतीय संस्कृति  में जड़ता कभी नहीं रही | ज्ञान परम्परा के सभी साधकों को युग  प्रवर्तक के तौर पर मान्य किया गया | उनके निष्कर्षों को कसौटी पर कसा जाने के बाद भले  ही अस्वीकार किया गया लेकिन उसे भावी पीढ़ियों की जानकारी के लिए सुरक्षित रखकर विरासत का हिस्सा बनाया गया | इसी कारण ये माना जाता है कि सुधार और उससे जुड़े संशोधनों के कारण भारतीय संस्कृति ने समय - समय पर उत्पन्न हुए विरोधाभासों और अंतर्द्वंदों का सकारात्मक तरीके से  समाधान निकालकर अपने मूल स्वरुप को अक्षुण्ण बनाये रखा | और इसी वजह से उसे  सही मायनों में विरासत कहलाने का अधिकार है |

अक्सर विरासत पर कब्जे के लिए वारिसों में विवाद होते हैं | कभी - कभी तो वे इतने भयानक होते हैं कि विवाद खत्म होने तक विरासत ही नष्ट होकर रह जाती है | लेकिन भारतीय संस्कृति को एक या कुछ अवशेषों , पांडुलिपियों अथवा अवधारणाओं तक सीमित नहीं रखे जाने के कारण ही वह विरासत के लिए होने वाले किसी भी विवाद से परे रही |

 चूँकि वैदिक संस्कृति का कोई ज्ञात संस्थापक नहीं है , इसलिए वह सहज स्वीकार्य हो जाती है | यदि उसके साथ उसके रचयिता या उपदेशक का नाम होता तब वह निर्विवाद शायद नहीं रहती | विश्व के सामने आज जो संकट खड़ा हुआ है उसमें यदि भारतीय समाज पूरी मुस्तैदी से और काफी हद तक बिना डरे  डटा हुआ है तो ये उसी सांस्कृतिक विरासत के कारण है | इसमें जीवन मूल्यों का महत्व है जो प्रत्येक जीव के कल्याण के  प्रति संवेदनशील है | 

गत दिवस भारत सरकार के संस्कृति एवं पर्यटन राज्यमंत्री ( स्वतंत्र प्रभार ) प्रह्लाद सिंह पटेल ने बड़ी ही अच्छी बात कही | कोरोना संकट का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि हम साधन से नहीं संयम से जीत हासिल कर रहे हैं | उल्लेखनीय है प्रह्लाद भाई की पहिचान उनकी सियासत नहीं अपितु शख्सियत है | वे नर्मदा नदी की  अनेक बार पैदल परिक्रमा कर चुके हैं | इस कारण उन्हें सहज रूप से नर्मदा भक्त कहा जाता है | लेकिन उससे बढ़कर वे उसके सेवक भी हैं | पूरे नरसिंहपुर जिले में नर्मदा तटों की सफाई जैसा महायज्ञ उनके सेवाभाव को दर्शाता है | मंत्री  बनने के बाद भी जबलपुर प्रवास के दौरान वे नर्मदा जी  के किनारों पर पड़ी गन्दगी खुद साफ़ करते देखे जा सकते हैं |

 इसीलिये जब उन्होंने कहा कि मौजूदा युद्ध साधनों से नहीं वरन  संयम से जीता जा रहा है , तब उनकी बात विश्व धरोहर दिवस से स्वाभाविक रूप से जुड़ गई ।  क्योंकि संयम हमारा संस्कार है और यह संस्कार हमें अपनी संस्कृत्ति रूपी विरासत से ही प्राप्त हुआ है | इस आधार पर कहा जा सकता है कि धरोहर किसी भी रूप में हो लेकिन उसका संरक्षण संस्कार द्वारा ही हो सकता है और होना भी चाहिए |

 भारतीय परिप्रेक्ष्य में देखें तो आज का जो वातावरण है उसमें संयम ही सबसे  बड़ा शस्त्र है | 130 करोड़ लोगों का ये देश न  तो चीन की तरह तानाशाही के अंतर्गत है और न ही अमेरिका जैसा सम्पन्न | इसके बाद भी यदि लॉक डाउन का दूसरा चरण शुरू करने का साहस सरकार कर सकी तो वह भारतीय जनमानस में  निहित संयम के संस्कार की वजह से ही है | रही बात पुरातात्विक महत्त्व के अवशेषों की तो वे भी अपनी जगह हैं तो विरासत किन्तु उनके साथ जुड़ी सभी बातों की प्रामाणिकता साबित करना कठिन होता है | लिखित इतिहास का अभाव होने से किंवदन्तियां अथवा लोककथाएं ही  उस विरासत का प्रमाण होती हैं | लेकिन संस्कृति  और उससे प्राप्त संस्कार ऐसी धरोहर है जिसकी निरन्तरता ही उसका महत्व और जरूरत साबित कर  देती है |

ऐसे में जिन लोगों को विरासत के संरक्षण में वाकई रूचि हो , उन्हें हमारी संस्कृति और संस्कारों को प्रश्रय देने के काम  में जुटना चाहिए | कोरोना  के बाद सामाजिक जीवन में नये  बदलाव की उम्मीदें की जा रही हैं | ऐसा मानने वालों में वे लोग भी हैं जो लोग अभी तक हम नहीं सुधरेंगे की जिद पकड़े हुए थे | अचानक ऐसा क्या हुआ कि सब अच्छी बातें करने लगे | बल्कि इससे भी आगे बढ़कर तो सकारात्मक सोचने भी लगे | और इसे ही सही मायने में परिवर्तन कहा  जा सकता है |

लेकिन ये क्यों हो रहा है , इसकी तह  में जाने पर भारत की महान सांस्कृतिक  विरासत का शाश्वत स्वरूप सामने आ जाता है | सरकार ने  पुरातात्विक अवशेषों की सुरक्षा के लिए कानून भी बना रखा है | उनके रखरखाव पर करोड़ों रूपये हर साल खर्च होते हैं | लेकिन संस्कृति रूपी धरोहर को सहेजने में न कानून की जरूरत होती  है और न ही धन की | ये समाज की सामूहिक सहमति और इच्छा शक्ति पर आधारित होकर  आगे बढ़ती है |

 
उस लिहाज  से कोरोना संकट एक अवसर बन गया है अपनी धरोहर की सुरक्षा और रखरखाव के प्रति जागरूक होकर कर्तव्य के निर्वहन का | मानव जाति पर आई  इस आपदा ने  भारतीय समाज की  सम्वेदनशीलता को जिस तरह उजागर किया वह हमारी धरोहर का ही तो सांसारिक रूप है | वरना अनेक विकसित देशों में इस बीमारी ने सामाजिक विघटन और अमानवीय सोच को बढ़ावा देते हुए साबित कर दिया कि वहां की सरकारों ने भले ही खंडहर हो  चुके प्राचीन अवशेषों को बतौर धरोहर संरक्षित कर  रखा हो लेकिन वे मानवीय मूल्यों जैसी इन्सानियत रूपी विरासत को नष्ट करने का अपराध भी कर बैठे | संस्कृति राज्यमंत्री  श्री पटेल ने जिस संयम को कोरोना के विरुद्ध मुख्य हथियार बताया वह भारतीय जीवन शैली का आधारभूत गुण है  |

 ऐसा नहीं है कि लोग परेशान  नहीं हैं | घरों में सीमित रह जाना किसी सजा से कम नहीं है | जरूरी चीजों की उपलब्धता में भी कठिनाई तो है ही | गरीबों को हो रही परेशानियां सुनकर हर किसी को दुःख होता है | विलासिता का जीवन जीने वाले लोगों ने भी इस दौरान जिस  सहजता से बदले हुए हालातों से सामंजस्य कायम  किया वह दरअसल सरकारी दबाव से ज्यादा संयम नामक संस्कार का असर है जो भारत की उस प्राचीनतम सांस्कृतिक धरोहर की देन है जिसे हमारे पूर्वजों ने बड़ी ही कुशलता से सुरक्षित रखते हुए और परिष्कृत तथा समृद्ध बनाकर अगली पीढ़ी को हस्तांतरित किया |

अब ये जिम्मेदारी हमारे कंधों पर आ गयी है | कोरोना न आता तब इस विषय की चर्चा का संदर्भ ही नहीं मिलता | अब अवसर मिला है तो उसका उपयोग करना चाहिए | लॉक डाउन के अंतर्गत शारीरिक रूप से घर में रहकर संक्रमण को रोकना जरूरी है | लेकिन मानसिक तौर पर तो हम सभी सक्रिय रह सकते हैं | सरकार , केंद्र की हो अथवा राज्य की , वह इस समय केवल एक समस्या से ही जूझने में व्यस्त है | ऐसी स्थिति में देश के नागरिकों का फर्ज है कि वे अपनी प्राचीन  विरासत को सुरक्षित रखने हेतु विचार प्रक्रिया जारी रखें |

 पुराने खंडहर तो बेशक सरकार के जिम्मे छोड़े जा सकते हैं लेकिन संस्कृति रूपी धरोहर की रक्षा सरकार नहीं संस्कार ही कर सकते हैं |

 क्या हम इसके लिए तैयार हैं ?

राहत पैकेज : दूरगामी प्रभाव वाले उपाय किए जाएं




रिजर्व बैंक ने गत दिवस जिस राहत पैकेज का ऐलान किया उससे दो बातें होंगी। पहली तो बैंकों के पास कर्ज बाँटने के लिए ज्यादा पैसा होगा और दूसरा ये कि एनपीए की सीमा 90 दिन से बढ़ाकर 180 दिन कर दी गयी। कोरोंना संकट के बाद ये दूसरा राहत पैकेज है। ये सब ठप्प पड़ीं हुई औद्योगिक-व्यापारिक गतिविधियों को गति देंने के लिए किया जा रहा है। निश्चित रूप से इस समय ऐसे उपायों की बहुत जरूरत है। उद्योग और व्यापार जगत पहले ही मुसीबत से गुजर रहा था। आर्थिक मंदी ने हालत खराब कर रखी थी। एनपीए बढ़ते जाने से बैंक वसूली का दबाव बनाते रहे लेकिन वसूली नहीं होने से नया कर्ज बाँटने में भी वे हिचकिचा रहे थे। कोरोंना ने दूबरे में दो आसाढ़ वाली हालत जरूर बना दी किन्तु वह नहीं आता तब भी उद्योग-व्यापार जगत को टेका लगाने के लिए राहत देना ही पडती। ताजा पैकेज कितना कारगर होगा ये कह पाना कठिन है। क्योंकि बैंकों के अलावा भी अनेक ऐसी देनदारियां हैं जिनका बोझ यथावत बना हुआ है। देश में निजी फायनेंसिंग कम्पनियां भी बड़े पैमाने पर कर्ज बाँटने का काम करती हैं। आज ही जबलपुर के ऑटो रिक्शा चालकों की समस्या सामने आई जिसमें उन्होंने फायनेंस कम्पनियों द्वारा कर्ज की अदायगी के लिए परेशान करने का आरोप लगाते हुए कहा कि उनकी कमाई तो बंद है फिर वे कर्ज की किश्त्त कहाँ से भरेंगे? इसी तरह औद्योगिक इकाइयाँ बिजली के बिलों में स्वीकृत भार पर लगने वाले फिक्स चार्ज को लेकर हलकान हैं। बैंकों द्वारा लम्बित ऋणों पर ब्याज दरों में किसी भी तरह की रियायत न दिया जाना भी परेशानी का कारण बन रहा है। कोरोना के बाद भारत की अर्थव्यवस्था के ऊंची छलांग लगाने की जो उम्मीदें व्यक्त की जा रही हैं वे भी उसी स्थिति में वास्तविकता में तब्दील हो सकेंगी जब उद्योग-व्यापार जगत पर पडऩे वाले चौतरफा दबावों का बोझ कम करते हुए उन्हें कुछ वर्षों के लिए बिना गति अवरोधक वाली सड़क पर दौडऩे दिया जाए। ऐसा किये बिना अर्थव्यवस्था को वापिस पटरी पर लाने की कोई भी योजना असर नहीं डाल सकेगी। कोरोंना संकट के रहते गरीब और मजदूर वर्ग को दी जा रही राहत अपनी जगह बिलकुल सही है लेकिन वह सदैव तो जारी नहीं रखी जा सकती। वरना देश में निठल्लापन और बढ़ेगा। इस आपदा के बाद देश को दोबारा मजबूती से खड़ा करना सभी का दायित्व है जिसमें श्रामिक वर्ग का योगदान भी जरूरी है। सरकार में बैठे लोगों को एक बात अच्छी तरह समझ लेनी चाहिए कि इस संकट के खत्म होने के बाद देश में उत्पादन लागत घटाकर ही हम वैश्विक बाजारों में चीन को टक्कर दे सकेंगे। इसके लिए न्यूनतम मजदूरी वाला अडंगा दूर करना होगा। जब हर चीज के दाम गिर रहे हों तब केवल मजदूरी बढ़े ये राजनीति के लिये भले ही लाभप्रद हो किन्तु अर्थनीति के लिए नुकसानदेह है। भारत में सरकारी औपचारिकतायें इतनी ज्यादा हैं कि उद्योगपति का कीमती समय उनको पूरा क्र्रने में ही चला जाता है और भ्रष्टाचार पनपता है सो अलग। सरकार को ये समझना चाहिए कि मजदूरी कम होने पर उद्योगों में काम बढ़ेगा जिसके कारण नया रोजगार सृजन हो सकेगा। सांसदों का वेतन कम करने के बाद अब ये चर्चा भी होने लगी है कि सरकारी अमले के वेतन-भत्ते भी कम किये जाएं जो सरकारी खजाने के लिए बहुत बड़ा बोझ है। आर्थिक पैकेज चुनावी घोषणापत्र जैसा बनकर न रहे अपितु उसक असर धरातल पर उतरकर प्रभाव दिखाए तभी उसका मतलब है। बेहतर होगा सरकार भी आकलन करे कि इस रियायतों का असर हो रहा है या वह हवा में ल_ घुमा रही है। कोरोना के बाद भारत के लिए तरक्की के आसमान छूने का जो अवसर है उसके लिए तात्कालिक घोषणाएं पर्याप्त नहीं होंगीं। बेहतर हो एक दीर्घकालीन योजना बनाकर उसे लागू किया जाये। देश में औद्योगिक क्रांति की सख्त जरूरत है और ये समय उसके लिए सर्वाधिक अनुकूल है। कोरोना को लेकर भारत जिस तरह आगे बढ़ रहा है यदि ऐसे ही चला तब वह महामारी से न्युनतम नुकसान के साथ बाहर निकलने में सफल हो जाएगा। लेकिन उसके बाद के पांच साल उद्योग -व्यापार को जितनी हो उतनी रियायतें दी जानी चाहिए। इसका दूरगामी लाभ होगा। बेरोजगारी के भयावह आंकड़ों के बाद भी देश में काम करने वालों का जबरदस्त अभाव है। इसका प्रमुख कारण एक बहुत बड़े वर्ग को बिना कुछ किये दाल रोटी मिल जाना है। वामपन्थी प्रभाव वाला श्रमिक आन्दोलन अब दम तोड़ता जा रहां है। वेतन-भत्तों में निरंतर वृद्धि होने से सरकारी खजाना खाली होता जा रहा है। समय आ गया है जब उन विसंगतियों को दूर रकने का साहस दिखाया जाये जिनकी वजह से हमारे देश में व्यापारी और उद्योगपतियों में ये भावना घर करती जा रही है कि बेहतर है वे कारोबार से बाहर निकल आयें। कोरोंना के बाद बड़ी संख्या में छोटी और मध्यम औद्योगिक इकाइयाँ यदि खुद को दिवालिया घोषित कर दें तो आश्चर्य नहीं होगा। और वह स्थिति कहीं से भी श्रेयस्कर नहीं हो सकती। गत दिवस रिजर्व बैंक द्वारा की गई घोषणाएं बुरी नहीं हैं लेकिन अपर्याप्त और अस्पष्ट हैं। केंद्र सरकार को फिलहाल राजनीतिक फायदे और नुकसान की बात सोचना तो छोड़ ही देना चाहिए। गरीबों को मुफ्त उपहार देकर अकर्मण्य बनाने की बजाय उनके लिए काम के अवसर पैदा किये जावें और ये काम व्यापार-उद्योग जगत ही कर सकता है। इसीलिये उसे अधिकतम सहायता और संरक्षण की सबसे ज्यादा जरूरत है।

-रवीन्द्र वाजपेयी